भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

वायुमंडलीय दशायें तापमान, वायुदाब, हवाये, आर्द्रता, वर्षा तथा मेघ मुख्य तथ्य एवं परिस्थितियां हैं। वायुमंडलीय अल्पकालिक या क्षणिक दशाओं को मौसम कहते हैं। मौसम की दीर्घकालिक औसत वायुमंडलीय दशाओं को जलवायु कहते हैं।

भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

1. स्थिति एवं अक्षांशीय विस्तार - भारत मोटे तौर पर 6o उ. से 30o उत्तर अक्षांशों के मध्य स्थित है। कर्क वृत्त देश के मध्य से होकर जाता है। विषुवत् वृत्त के पास होने के कारण दक्षिणी भागों में वर्ष भर उच्च तापमान पाये जाते हैं। दूसरी ओर उत्तरी भाग गर्म शीतोष्ण पेटी में स्थित है। अत: यहां खासकर शीतकाल में निम्न तापमान पाये जाते हैं।

2. समुद्र से दूरी - प्रायद्वीपीय भारत अरब सागर, हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी से घिरा हुआ है। अत: भारत के तटीय प्रदेशों की जलवायु सम या अनुसमुद्री है। इसके विपरीत जो प्रदेश देश के आंतरिक भागों में स्थित हैं, वे समुद्री प्रभाव से अछूते हैं। फलस्वरूप उन प्रदेशों की जलवायु अति विषम या महाद्वीपीय है।

3. उत्तर पर्वतीय श्रेणियाँ - हिमालय व उसके साथ की श्रेणियाँ जो उत्तर-पश्चिम में कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व में अरुणाचल प्रदेश तक फैली हुई हैं, भारत को शेष एशिया से अलग करती हैं। ये श्रेणियाँ शीतकाल में मध्य एशिया से आने वाली अत्यधिक ठन्डी व शुष्क पवनों से भारत की रक्षा करती हैं। साथ ही वर्षादायिनी दक्षिण पश्चिमी मानसून पवनों के सामने एक प्रभावी अवरोध बनती हैं, ताकि वे भारत की उत्तरी सीमाओं को पार न कर सकें। इस प्रकार, ये श्रेणियाँ भारतीय उपमहाद्वीप तथा मध्य एशिया के बीच एक जलवायु विभाजक का कार्य करती हैं।

4. स्थलाकृति - देश के विभिन्न भागों में स्थलाकृतिक लक्षण वहां के तापमान, वायुमण्डलीय दाब, पवनों की दिशा तथा वर्षा की मात्रा को प्रभावित करते हैं। 

5. मानसून पवनें - भारत में पवनों की दिशा के पूर्णतया उलटने से, ऋतुओं में अचानक परिवर्तन हो जाता है और कठोर ग्रीष्मकाल अचानक उत्सुकता से प्रतीक्षित वर्षा ऋतु में बदल जाता है। इस प्रकार दिशा बदलने वाली पवनों को मानसून पवनें कहते हैं। 
6. ऊपरी वायु परिसंचरण - भारत में मानूसन के अचानक आगमन का एक अन्य कारण भारतीय भू-भाग के ऊपर वायु परिसंचरण में होने वाला परिवर्तन भी है। 
7. पश्चिमी विक्षोभ तथा उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात - पश्चिमी विक्षोभ भारतीय उपमहाद्वीप में पश्चिमी जेट प्रवाह के साथ भूमध्य सागरीय प्रदेश से आते हैं। यह देश के उत्तरी मैदानी भागों व पश्चिमी हिमालय प्रदेश की शीतकालीन मौसमी दशाओं को प्रभावित करते हैं। ये शीतकाल में थोड़ी वर्षा लाते है। यह थोड़ी सी वर्षा भी उत्तरी मैदान में गेहूं की खेती के लिए बहुत ही लाभकारी होती है।

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात बंगाल की खाड़ी में पैदा होते हैं। इन चक्रवातों की तीव्रता तथा दिशा पूर्वी तटीय भागों की मौसमी दशाओं को अक्टूबर, नवम्बर और दिसम्बर में प्रभावित करते हैं।

8. एल-नीनो प्रभाव - भारत में मौसमी दशायें एल-नीनो से भी प्रभावित होती हैं। यह संसार के उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में विस्तृत बाढ़ों और सूखों के लिये उत्तरदायी है। एल-नीनो एक संकरी गर्म समुद्री जलधारा है जो कभी-कभी दक्षिणी अमेरिका के पेरू तट से कुछ दूरी पर दिसम्बर के महीने में दिखाई देती है। पेरू ठण्डी धारा जो सामान्यतया इस तट के सहारे बहती है, के स्थान पर यह अस्थायी धारा के रूप में बहने लगती है। कभी-कभी अधिक तीव्र होने पर यह समुद्र के ऊपरी जल के तापमान को 10व से. तक बढ़ा देती है। उष्ण कटिबन्धीय प्रशांत महासागरीय जल के गर्म होने से भूमण्डलीय दाब व पवन तंत्रों के साथ-साथ हिन्द महासागर में मानसून पवनें भी प्रभावित होती हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि 1987 में भारत में भयंकर सूखा एल-नीनो का ही परिणाम था।

9. दक्षिणी दोलन तथा उसका प्रभाव - दक्षिणी दोलन मौसम विज्ञान से संबंधित वायुदाब में होने वाले परिवर्तन का प्रतिरूप है। यह हिन्द व प्रशान्त महासागरों के मध्य प्राय: देखा जाता है। ऐसा देखा गया है कि जब वायुदाब हिन्द महासागर में अधिक होता है तो प्रशान्त महासागर पर यह कम होता है अथवा इन दोनों महासागरों पर वायु दाब की स्थिति इसके उलट होती है। जब वायुदाब प्रशान्त महासागरीय क्षेत्रा पर अधिक होता है तथा हिन्द महासागर पर निम्न या कम होता है तो भारत में दक्षिण-पश्चिमी मानसून अधिक कमजोर होता है। इसके विपरीत परिस्थिति में मानसून के ताकतवर होने के आसार अधिक होते हैं।

भारत की जलवायु का आर्थिक जीवन पर प्रभाव 

किसी भी देश की जलवायु का आर्थिक जीवन पर प्रभाव पड़ता है, लेकिन हमारे देश में इसका प्रभाव विविध क्षेत्रों में विशेषकर आर्थिक क्षेत्र में बहुत ही अधिक पड़ता है।

1. हमारे देश में वर्ष में किसी कृषि योग्य भ-ू भाग का तापमान इतना कम नहीं होता कि वहाँ कृषि न हो सके। इसलिए कृषि के लिए सम्पूर्ण वर्ष सुलभ है। इस दृष्टि से हम शीतोष्ण कटिबध्ं ाीय क्षेत्रों जैसे साइबेरिया, जहां कृषि के लिए बहुत कम दिन प्राप्त होते है अपेक्षाकृत अधिक भाग्यशाली हैं। हमारे देश में मई और जून के महीने में तापमान अधिक हो जाता है, साथ ही साथ ये महीने शुष्क होते हैं, इसलिए इनमें कृषि करना संभव नहीं हो पाता है। लेकिन उन क्षेत्रों में जहां सिचाई के लिए जल सुलभ रहता है शुष्क महीनो में भी खेती की जाती है।

2. मानसूनी जलवायु ने भारतीय कृषि-कार्यों में अत्यधिक योगदान दिया है। केवल समतल भूमि का होना ही पर्याप्त नहीं है इसके लिए पर्याप्त मात्रा में वर्षा की भी आवश्यकता है। यदि गंगा व यमुना के मैदान वर्षा शन्ू य होत े तो देश का अधिकांश भाग मरुस्थली होता। इसलिए हम कह सकते है कि हमारी जलवायु ही कृषि के विकास के लिए उत्तरदायी है।


 

3. जलवायु की विषमता विविध फसlलों के उत्पादन के लिए अनुकूल वातावरण उपस्थित करती है। पंजाब और उत्तर प्रदेश की जलवायु गेहूँ की खेती के लिए उपयुक्त है तो पश्चिम बंगाल की पटसन एवं चावल के लिए तथा मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र की कपास के लिए। इस प्रकार देश में शीतोष्ण कटिबध्ं ाीय एवं उष्ण कटिबध्ं ाीय दाने ों प्रकार की फसलें बोयी जाती हैं।

4. जनू , जुलाई तथा अगस्त के महीनो ं में सबसे अधिक वर्षा होती है जो जल्दी पकने वाली फसला ंे जैसे ज्वार, बाजरा, मक्का के लिए लाभदायक होती है। चारा भी अधिक उपलब्ध हो जाता है जिससे पशु-पालन को बल मिलता है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में भारत में दध्ू ा व घी की नदिया ँ बहती थी।ं यह चारे की पर्याप्त उपलब्धि से ही सम्भव था।

5. ग्रीष्मकालीन तापमान ऊँचे होते है। साथ ही साथ, इनकी वृद्धि एकाएक होती है जिससे फसलें शीघ ्र पकती हैं। इसके फलस्वरूप उनके दाने छाटे े तथा कड े़ हो जाते हैं। अतः फसलें गुणात्मक ;फनंसपजल ब्तवचद्ध न होकर मात्रात्मक ;फनंदजपजल ब्तवचद्ध होती हैं। प्रति हेक्टेयर उत्पादन भी कम हो जाता है।

6. वर्ष के कुछ महीनो ं को छोडक़ र शेष महीने शुष्क होते हैं। इसलिए बड़े-बड़े घास के मैदान सुलभ नहीं हैं। वर्षा काल में उगने वाली घास शुष्क महीना ंे में सूख जाती है। इसलिए पशुओं को एकत्र किया हुआ भूसा खिलाया जाता है।

7. कडी़ गर्मी के ठीक बाद होने वाली घोर वर्षा रागे ा ें की जननी है। गड्ढे, तालाबों में जल एकत्र किया जाता है जिससे गन्दगी के कारण मच्छरो ं का जन्म होता है जिससे मलेि रया तथा अन्य रोगो ं का प्रसार होता है।

8. वर्षा की अनिश्चितता का प्रभाव कृषि पर अत्यधिक पड़ता है। सूखा व अकाल की स्थिति भारतीय कृषक के लिए चिन्ता का विषय है। कभी-कभी वर्षा की अधिकता से भयकं र बाढ ंे़ आती है जिससे अपार क्षति होती है। इन सबको देखकर भारतीय कृषक भाग्यवादी, अध्ं ाविश्वासी तथा धार्मिक प्रवृत्ति का हा े जाता है।

9. ग्रीष्मऋतु की उष्ण और नम जलवायु हमारे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती ही है। साथ ही साथ वह हमें आलसी व आरामपसन्द बना देती है। शीताष्े ण क्षेत्रो ं में शरीर की गर्मी बनाये रखने के लिए लोगा ंे को शारीरिक परिश्रम में रत रहना ही पड़ता है। उपर्युक्त कमी हमारी श्रम-शक्ति पर व्यापक प्रभाव डालती है। शुष्क मौसम में जीवन बिताने वाले एक पंजाबी तथा नम वातावरण में पले एक बंगाली की श्रम-शक्ति एवं स्वास्थ्य में अतं र पाया जाता है। अल्पावस्था में अर्थव्यवस्था के भार से मनोवज्ञै ानिक प्रभाव पडत़ ा है जिसस े लोग निराशावादी बन जाते हैं।

10. ग्रीष्मऋतु में चलने वाली ‘ल’ू ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देती है कि घर से बाहर निकलना कठिन हो जाता है। फलस्वरूप, हमारे देश में वर्ष में कार्य करने के घण्टे उन्नतिशील देशो ं की तुलना में कम होते हैं।

11. वर्षा की मात्रा व समय इस प्रकार है कि उन पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है। इसलिए सिचाई की शरण लेनी पडत़ ी है जिससे कृषि के प्रति हेक्टये र व्यय में भी स्वय ं वृद्धि हो जाती है किन्तु सिचाई भी अतं तः मानसनू पर निर्भर करती है। 12. जलवायु की भिन्नता के फलस्वरूप वन-सपं दा, पश-ु सपं दा, उद्योग, परिवहन एवं मानव-जीवन में भी विभिन्नता पायी जाती है। य े हमार े आर्थिक जीवन के महत्त्वपणर््ू ा तत्त्व हैं। वेरा आन्स्टे ने लिखा है कि मानसनू की गडब़ डी़ एक महान् विपत्ति होती है। जिसको सहन करने के निमित्त साहस, उदारता तथा धर्यै के गुणो ं की आवश्यकता पड़ती है। 13. भारत का कृषि प्रतिमान जलवायु के अनुरूप ह।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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