रक्त के अवयव, रक्त के कार्य

रक्त किसे कहते हैं?

शरीर के भीतर जो एक लाल रंग का द्रव-पदार्थ भरा हुआ है, उसी को रक्त (Blood) कहते हैं। रक्त का एक नाम रुधिर भी है रुधिर को जीवन का रस भी कहा जा सकता है। यह संपूर्ण शरीर में निरन्तर भ्रमण करता तथा अंग-प्रत्यंग को पुष्टि प्रदान करता रहता है। जब तक शरीर में इसका संचरण रहता है तभी तक प्राणी जीवित रहता है। इसका संचरण बन्द होते ही व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। अब प्रश्न उठता है कि रुधिर की उत्पत्ति कैसे होती है। पाठको रुधिर की उत्पत्ति भू्रण की मीसोडर्म से होती है। रुधिर मूल रूप से एक तरल संयोजी ऊतक (Fluid Connective Tissue) होता है।

सामान्यत: मनुष्य शरीर में रक्त की मात्रा 5-6 लीटर होती है। एक अन्य मत के अनुसार मनुष्य के शारीरिक भार का 20वाँ भाग रक्त होता है। रक्त पूरे शरीर में दौड़ता रहता है। परिसंचरण तंत्र में मुख्य रूप से हृदय, फेफड़े, धमनी व शिरा महत्वापूर्ण भूमिका निभाती है। हमारा हृदय एक पम्पिंग मशीन की तरह कार्य करता है जो अनवरत अशुद्ध रक्तम को फेफड़ों में शुद्ध करने तथा फिर शुद्ध रक्त को पूरे शरीर में भेजता रहता है।

रक्त के अवयव 

रक्त (रूधिर) एक तरल संयोजी ऊतक (Fluid Connective Tissue) होता है। इसका Ph -7-3 से 7.5 के बीच होता है। रक्त का आपेक्षिक गुरूत्व 1.065 होता है। मनुष्य शरीर के भीतर इसका तापमान 100 डिग्री फा.हा. रहता है, परन्तु रोग की हालत में इसका तापमान कम अथवा अधिक भी हो सकता है। इसका स्वाद कुछ ‘नमकीन’ सा होता है। इसका कुछ अंश तरल तथा कुछ गाढ़ा होता है। रक्त में निम्नलिखित पदार्थों का मिश्रण पाया जाता है। 1. प्लाज्मा (Plasma) 2. रक्त कणिकायें (Blood Corpuscles) इनके विषय में विस्तारपूर्वक विवरण निम्नानुसार है-

1. प्लाज्मा - यह रक्त का तरल अंश है। इसे रक्त -वारि’ भी कहते हैं। यह हल्के पीले रंग की क्षारीय वस्तु है। इसका आपेक्षिक घनत्व 1.026 से 1.029 तक होता है। 100 सी.सी. प्लाज्मा में वस्तुएँ अपने नाम के आगे लिखे प्रतिशत में पायी जाती हैं-
  1. पानी: 90%
  2.  प्रोटीन: 7%
  3. फाइब्रीनोजिन: 4%
  4. एल्फा ग्लोब्युलिन: 0-46%
  5. बीटा ग्लोब्युलिन: 0-86%
  6.  गामा ग्लोब्युलिन: 0-75%
  7. एलब्युमिन: 4-00%
  8. रस: 1-4%
  9. लवण: 0-6%
‘प्लाज्मा’ रक्त कणिकाओं को बहाकर इधर-उधर ले जाने का कार्य करता है तथा उन्हें नष्ट होने से बचाता है। यह रक्त को हानिकर प्रतिक्रियाओं से बचाता है, विशेष कर इसके ‘एल्फा ग्लोब्युलिन’ सहायक वस्तुओं को उत्पन्न करके रक्त को बाह्य-जीवाणुओं से बचाते हैं। किसी संक्रामक रोग के उत्पन्न होने पर रक्त में इनकी संख्या स्वत: ही बढ़ जाती है। इसका ‘फाइब्रोनोजिन’ रक्तस्राव के समय रक्त को जमाने का कार्य करता है, जिसके कारण उसका बहना रूक जाता है। प्रदाह तथा रक्तस्राव के समय यह एक स्थान पर एकत्र हो जाता है। प्लाज्मा’ के कार्बनिक पदार्थ जो इसके घटक (Constituents) भी होते है जो इस प्रकार है।
  1. प्लाज्मा- प्रोटीन (Plasma Proteins) प्लाज्मा प्रोटीन की मात्रा लगभग 300 से 350 ग्राम होती है। जिसमें  प्रोटीन प्रमुख है। 
    1. एल्बूमिन (Albumin) 
    2. ग्लोूब्यूरमिन (Globulins) 
    3. प्रोथ्राम्बिन (Prothrombin) 
    4. पाइब्रिनोजन (Fibrinogen) 
  2. उत्सर्जी पदार्थ – मानव शरीर कोशिकाओं से मिलकर बना होता है। कोशाओं से निकाली गई अमोनिया तथा यकृत कोशाओं से मुक्त किये यूरिया, यूरिक अम्ल,क्रिटीन,क्रिटिनीन आदि होते है जिसे रक्त से किडनी ग्रहण करती है तथा इनका निष्काशन होता है। 
  3. पचे हुए पोषक पदाथ– इसमें ग्लूकोज,बसा, बसीय अम्ल, ग्लिसरॉल,अमीनों अम्ल,विटामिन,कोलेस्टाइल आदि होते है जिसे शरीर की सारी कोशायें आवश्यकतानुसार रक्त से लेती रहती रहती है। 
  4. हारमोंन्स- ये अन्तरूसावी ग्रन्थियों से सीधे रक्त में सीधे साव्रित होतें है। शरीर की कोशिकाये इन्हे रक्त से ग्रहण करती है।
  5. गैसे- प्लाज्मा में जल लगभग 0.25उस आक्सीाजन व.5उस नाइटोजन व.5 तथा कार्बन आदि गैसे घुली रहती है। 
  6. सुरक्षात्मक पदार्थ– प्लाज्मो में कुछ सुरक्षात्मक पदार्थ (प्रतिरक्षी पदार्थ ) होते है। जैसे लाइसोजाइम, प्रोपरडिन, जो जीवाणुओं तथा विषाणुओं को नष्ट करने में सहायक है।
  7. प्रतिजामन– प्लाज्मा में हिपेरिन नामक संयुक्त पालीसैकराइड मुक्त करती है जिस कारण रक्त को जमने से रोका जा सकता है। 
2. रक्त -कणिकाएँ - ये तीन प्रकार की होती हैं-
  1. लाल रक्त कण(Red Blood Corpuscles) 
  2.  श्वेवत रक्त कण (White Blood Corpuscles) 
  3. प्लेटलेट्स (Platelets) 
  4. स्पिन्डटल कोशिकाये (Spindle Cell) 
इनके विषय में अधिक जानकारी इस प्रकार है-

1. लाल रक्त कण- लाल रक्त कणो को (Erythrocytes) कहा जाता है। रूधिर में 99% RBCs होते है। ये आकार में गोल, मध्य में मोटे तथा चारों किनारों पर पतले होते हैं। इनका व्यास 1/3000 इंच होता है। इनका व्यास-आवरण रंगहीन होता है, परन्तु इनकी भीतर एक प्रकार का तरल द्रव भरा होता है, जिसे ‘हीमोग्लोबिन’ (Haemoglobin) कहते हैं। हीम (Heam) अर्थात् लोहा तथा ‘ग्लोबिन’ (Globin) अर्थात् एक प्रकार की प्रोटीन। इन दोनों से मिलकर ‘हीमोग्लोबिन’ शब्द बना है। ये रक्तकण, जिन्हें रक्त -कोषा (Blood Cell) कहना अधिक उपयुक्त रहेगा, लचीले होते हैं तथा आवश्यकतानुसार अपने स्वरूप को परिवर्तित करते रहते हैं। ‘हीमोग्लोबिन’ की उपस्थिति के कारण ही इन रक्त कणों का रंग लाल प्रतीत होता है। 

हीमोग्लोबिन की सहायता से ये रक्त -फेफड़ों से ऑक्सीजन (Oxygen) अर्थात् प्राण वायु प्राप्तं करके उसे शुद्ध रक्त के रूप में सम्पूर्ण शरीर में वितरित करते रहते हैं, जिसके कारण शरीर को कार्य करने की शक्ति प्राप्त होती है। ऑक्सीजन युक्त हीमोग्लोबिन को (oxi Haemoglobin) अॉक्सी हीमोग्लोबीन कहा जाता है। हीमोग्लोबीन के हीम अणुओ के लौह (Iron) में आक्सीजन के साथ एक ढीला और सुगमतापूर्वक खुला हो जाने वाला अर्थात प्रतिवर्ती वॅान्डस (Reversible Bond) बना लेने की एक विशेष क्षमता होती है। अत फेफड़ों में आक्सीजन ग्रहण कर RBCs रूधिराणु इसका सारे शरीर में संवहन करते है और ऊतक द्रव्य के माध्यण्म से कोशाओं तक पहॅुचाते है इसलिए त्ठब्े को आक्सीजन का वाहक कहा जाता है। हीमोग्लोबीन के प्रत्येक अणु में ग्लोबीन की चार कुण्डलित पालीपेप्टाइड श्रखलायें तथा हीम के चार अणु होते है। 

 4 Molecules of Globin + 4 Molecules of Heam —→ Haemglobin (Hbu)

2. श्वेवत रक्त कण- श्वेवत रक्त अणुओं (Leucocytes) भी कहते है।ये रक्त कण प्रोटोप्लाज्म द्वारा वाहक निर्मित हैं। इनका कोई निश्चित आकार नहीं होता है। आवश्यकतानुसार इनके आकार में परिवर्तन भी होता रहता है। इनका कोई रंग नहीं होता अर्थात् ये सफेद रंग के होते हैं। लाल रक्त -कणों की तुलना में, शरीर में इनकी संख्या कम होती है। इनका अनुपात प्राय: 1:500 का होता है। एक स्वस्थ मनुष्य के रक्त की 1 बूँद में इनकी संख्या 5000 से 8000 तक पाई जाती है। इनका निर्माण अस्थि मज्जा (Bone Marrow), लसिका ग्रंथियाँ (Lymph Glands) तथा प्लीहा (Spleen) आदि अंगों में होता है। रक्त के प्रत्येक सहस्रांश मीटर में जहाँ रक्त कणों की संख्या 500000 होती है वहाँ श्वेवत कणों की संख्या 6000 ही मिलती है। इनकी लम्बाई लगभग 1/2000 इंच होती है तथा सूक्ष्मदशÊ यंत्र की सहायता के बिना इन्हें भी नहीं देखा जा सकता। इनका आकार थोड़ी-थोड़ी देर में बदलता रहता है। साथ ही दिन में कई बार इनकी संख्या में घट-बढ़ भी होती रहती है। प्रात: काल सोकर उठने से पूर्व इनकी संख्या 6000 घन मि.मी. होती है। इन श्वेवतकणों का कार्य शरीर की रक्षा करना है। बाहरी वातावरण से शरीर में प्रविष्ट होने वाले विकारों तथा विकारी-जीवाणुओं के आक्रमण के विरूद्ध ये रक्षात्मक ढंग से युद्ध करते हैं और उनके चारों ओर घेरा डालकर, उन्हें नष्ट कर डालते हैं। 

इसी कारण इन्हें शरीर-रक्षक (Body Guards) भी कहा जाता है। यदि दुर्भाग्यवश कभी इनकी पराजय हो जाती है तो शारीरिक-स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है और शरीर बीमारी का शिकार बन जाता है। परन्तु उस स्थिति में भी ये शरीर के भीतर प्रविष्ट होने वाली बीमारी के जीवाणुओं से युद्ध करते ही रहते हैं तथा अवसर पाकर उन्हें नष्ट कर देते हैं तथा पुन: स्वास्थ्य-लाभ कराते हैं। यदि रक्त में इन श्वेवतकणों का प्रभाव पूर्णत: नष्ट हो जाता है तो शरीर की मृत्यु हो जाती है। काम करते समय, भोजन के पश्चात गर्भावस्था में एवं एड्रीनलीन (Adrenaline) के इंजेक्शन के बाद शरीर में इन श्वेवतताणुओं की संख्या बढ़ जाती है। संक्रामक रोगों के आक्रमण के समय इनकी संख्या में अत्यधिक वृद्धि होती रहती है। न्यूमोनिया होने पर इनकी संख्या डîौढ़ी वृद्धि तक होती हुई पाई गयी है। परन्तु इन्फ्रलुऐंजा में इनकी संख्या कम हो जाती है। रक्त में श्वेवतकणों की संख्या में वृद्धि को श्वेवतकण बहुलता (Leucocytosis) तथा हृास को श्वेवतकण अल्पता (Leucopening) कहा जाता है। 

संक्रामक रोगों के आक्रमण के समय ये श्वेवतकण विशैले जीवाणुओं से लड़ने के लिए कोशिकाओं की दीवार से भी पार निकलकर बाहर चले जाते हैं, जबकि उस समय लाल रक्तकण नलिकाओं तथा कोशिकाओं में ही बने रहते हैं। इन श्वेवतकणों के भेद माने जाते हैं- 
(i) कणिकामय श्वेवतरूघिराणु या ग्रैन्यूजलोसाइटस (Granulocytes)
(ii) कणिकाविहीन श्वेवतरूघिराणु या अग्रैन्यू्लोसाइटस (Aranulocytes)
  1. कणिकामय श्वेवतरूघिराणु (Granulocytes)- ये लगभग 10 से 15 तक व्यास के गोल से सक्रिय रूप से अमीबॉएड अर्थात विचरणशील होते है। इनके कोशाद्रव्य में अनेंकों कणिकायें होती है। ये तीन प्रकार के होते है। 
    1. ऐसिडोफिल्सक या इओसिनोफिल्सय (Acidophils or Eosinophils)-ये W-B-C- में 1 से 4 % तक होते है तथा ये शरीर में प्रतिरक्षण, ऐलजÊ एवं अतिसंवेदनशीलता का कार्य करते है।
    2. बेसोफिल्सं (Basophils)-ये W-B-C- की कुल संख्या का 0-5 से 2 तक होते है। इनकी कणिकायें मास्ट कोशिकाओं द्वारा स्रावित हिपैरिन, हिस्टेसिन एवं सिरोटोनिन का वहन करती है। 
    3. हिटरोफिल्स या न्यूैटरोफिल्स ( Heterophils or Neutrophils)- W-B-C में इनकी संख्या सबसे अधिक 60 %से 70% तक होती है। 
(iii) कणिकाविहीन श्वेवतरूघिराणु कोशाद्रब्य. में कणिकायें हल्की नीली रंग की संख्या में कम होती है। इन्हे Amononuclear रूधिराणु भी कहते है। ये दो प्रकार की होती है।
  1. लिम्फोसाइटस (Lymphocytes) ये छोटे 6 से 16 व्यास के होते है। ये W-B-C की संख्या का 20: से 40: होते है। इनका केन्द्रक बडा या पिचका होता है। इनमें भ्रमण की क्षमता कम होती है। इनका कार्य शरीर की प्रतिरक्षी प्रतिक्रियाओं के लिए आवश्यक प्रतिरक्षी प्रोटीन्स बनाना होता है। इसकी खोज नोबल पुरस्कार प्राप्त एमिल बॉन बेहरिग ने 1891 में की थी।
  2. मोनोसाइटस (Monocytes) ये संख्या में कम W-B-C की कुल संख्या का 5: होते है। इनका व्यास 12 से 22 तक होता है। ये सक्रिय भ्रमण एवं भक्षण करते है। 
(iv) प्लेटलेट्स :- प्लेटलेट्स को (Thrombcytes) थ्रोम्बोसाइट या बिम्बाणु भी कहा जाता है । इनकी उत्पत्ति अस्थि-रक्त मज्जा (Red Bone Marrow) में लोहित कोशिकाओं (MEGAKARYOCYTES) द्वारा होती है। इनका लगभग 2.5 (E;w) होता है। इनकी संख्या लगभग 250,000 (150,000 से 350000) तक होती है। इनकी लगभग 1/10 संख्या प्रतिदिन बदलती रहती है और रक्त में नवीन आती रहती है इनके प्रमुख कार्य है।
  1. रक्त कोशिकाओं के endothelium की क्षति की क्षतिपूर्ति। 
  2. अवखण्डित होने पर हिस्टीमीन की उत्पत्ति करना। 
  3. रक्त वाहिकाओं के अन्त स्तर में अथवा ऊतकों में क्षति हो जाने पर, यदि रक्तस्राव की सम्भावना हो या स्राव हो रहा हो तो प्लेटलेट्स रक्त स्कन्दन की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है। 
  4. स्पिन्डल कोशिकाये (Spindle Cell) ये स्तनियो के अतिरिक्त अन्य सभी कशेरूकियों में प्लेटलेटस के स्थान पर पायी जाती है। मानव शरीर में ये नही पायी जाती है पर इनका वही कार्य है जो कार्य प्लेटलेटस का होता है।

रक्त के कार्य 

  1. आहार- नलिका से भोजन तत्वों को शोषित कर, उन्हें शरीर के सब अंगों में पहुँचाना इस प्रकार उनकी भोजन संबंधी आवश्यकता की पूर्ति करना। 
  2. फेफड़ों की वायु से ऑक्सीजन लेकर, उसे शरीर के प्रत्येक भाग में पहुँचाना और अॉक्सीकृत किये हुए अंग ही शरीर को शक्ति प्रदान करते हैं। 
  3. शरीर के प्रत्येक भाग से कार्बन डाइऑक्साइड, यूरिया, यूरिक एसिड तथा गन्दा पानी आदि दूषित पदार्थों को अपने साथ लेकर उन अंगों तक पहुँचाना, जो इन दूषित पदार्थों को निकालने का कार्य करते हैं।
  4. शरीरस्थ नि:स्रोत ग्रंथियों द्वारा होने वाले अन्त:स्रावों और अॉक्सीकृत किये हुए अंग ही शरीर को शक्ति प्रदान करते हैं। 
  5. शरीरस्थ नि:स्रोत ग्रंथियों द्वारा होने वाले अन्त:स्रावों (Horomones) को अपने साथ लेकर शरीर से विभिन्न भागों में पहुँचाना। 
  6. संपूर्ण शरीर के तापमान को सम बनाये रखना।
  7. बाह्य जीवाणुओं के आक्रमण से शरीर के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने हेतु “वेत कणिकाओं को शरीर के विभिन्न भागों में पहुँचाते रहना। 
  8. रक्त टूटी – फूटी तथा मृत कोशिकाओं को यकृत और प्लीेहा में पहुँचाता है, जहॉं वे नष्ट हो जाती है।
  9. रक्त अपने आयतन में परिवर्तन लाकर ब्लैडप्रेशर पर नियन्त्रण रखता है। 
  10. रक्त जल – संवहन के द्वारा शरीर के ऊतकों को सूखने से बचाता है और उन्हे नम एवं मुलायम रखता है।
  11. रक्त शरीर के अंगों की कोशिकाओं की मरम्मत करता है तथा कोशिकाओं के नष्ट हो जाने पर उसका नव-निर्माण भी करता है। 
  12. रक्त शरीर के विभिन्न भागों से व्यर्थ पदार्थो को उत्सर्जन – अंगों तक ले जाकर उनका निष्कासन करवाता है।

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