शारीरिक विकास : शैशवावस्था, बाल्यावस्था तथा किशोरावस्था

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मानव जीवन के विकास का अध्ययन विकासात्मक मनोविज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है। विकासात्मक मनोविज्ञान मानव के पूरे जीवन भर होने वाले वर्धन, विकास एवं बदलावों का अध्ययन करता है। इसमें शैशवावस्था से लेकर वयस्कावस्था के अंतिम स्तर तक के विकास का अध्ययन सम्मिलित होता है। सारणी में इसे आयु के आधार पर क्रम से प्रदर्शित किया गया है।


विकास की अवस्था आयु विवरण 
1. गर्भावस्था (prenatal stage)गर्भाधान से लेकर जन्म तक
2.  शैशवावस्था (infancy stage)जन्म से तीन वर्ष की आयु तक 
3. बाल्यावस्था(childhood stage) चौथे वर्ष से 12 वर्ष की आयु तक
4. किशोरावस्था (adolescence stage)13 वर्ष से 17 वर्ष तक 
5.  वयस्कावस्था (adulthood stage)18 वर्ष से लेकर मृत्यु तक

मानव विकास के मूल मुद्दे-

  1. किस सीमा तक आनुवांशिकता एवं वातावरण मानव विकास को प्रभावित करते हैं? यह मानव विकास का प्रथम मुद्दा है। वास्तव में पिछली कई शताब्दियों तक विचारक इस बात पर बहस करते रहे हैं कि मानव विकास पर आनुवांशिकता एवं वातावरण का क्या प्रभाव पडता है? इस बहस को प्रकृति-पोषण विरोधाभास केरूप में जाना जाता है। परन्तु वर्तमान में यह बहस प्रकृति एवं पोषण के मध्य न होकर इस पर है कि ये किस सीमा तक मानव विकास के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करते हैं। 
  2. क्या विकास निरंतर होता है अथवा यह कई स्तरों से गुजरता है? यह द्वितीय मुद्दा है। जब हम निरंतरता पर विचार करते हैं तब हम अवस्थाओं की चर्चा नहीं करते क्योंकि अवस्थायें दो स्तरों में गुणात्मक भिन्नता को दर्शाती हैं। दो स्तरों या अवस्थाओं में एक अवस्था में होने वाला विकास दूसरी अवस्था में नहीं होता है।
  3. किस मात्रा तक व्यक्तिगत शीलगुण समय के साथ स्थिर रहते हैं? यहॉं व्यक्तिगत शीलगुणों से तात्पर्य व्यक्तित्व शीलगुणों से है। जैसे बुद्धि, क्रोध, चित्तप्रकृति आदि।
विकासात्मक परिवर्तनों के अध्ययन की विधियॉं- विकासात्मक मनोवैज्ञानिक आयु से संबंधित विकासात्मक बदलावों के अध्ययन हेतु दो प्रकार की अध्ययन विधियों का मुख्य रूप से उपयोग करते हैं।
  1. दीर्घकालिक अध्ययन विधि एवं 
  2. क्रॉससेक्सनल विधि।
दीर्घकालिक अध्ययन (Longitudinal study )विधि - इस विधि में प्रतिभागियों के एक ही समूह का अलग-अलग आयु में अनुवर्तन (फॉलोअप) कर अध्ययन किया जाता है, एवं इस कार्य में कई वर्षों का समय लगता है। इसीलिए इसे दीर्घकालिक अध्ययन विधि कहा जाता है। अत्यधिक समय साध्य एवं खर्चीलापन इस विधि की प्रमुख कमियॉं है इसके अलावा इसमें प्रतिभागियों के अध्ययन को बीच में ही छोड़ देने की संभावना भी अधिक होती है।

क्राससेक्शनल अध्ययन (Cross-sectional study) विधि - यह विधि कम खर्चीली एवं कम समय-साध्य होती है जिसके अन्तर्गत अनुसंधानकर्ता अलग-अलग आयु के प्रतिभागियों के कई समूह विनिर्मित कर उनके बीच आयु आधारित परिवर्तनों एवं भिन्नताओं का तुलनात्मक अध्ययन कर लेता है। मानव विकास बहुत ही रोमांचपूर्ण प्रक्रिया है जो कि जन्म से पूर्व ही प्रारम्भ हो जाती है जिसके बारे में हम आगे की पंक्तियों में जानेंगे।

आनुवांशिकता एवं जन्मपूर्व (पूर्वप्रसूतिकाल के दौरान) विकास

आनुवांशिक प्रक्रिया के दो महत्वपूर्ण घटकों में जीन्स एवं क्रोमोसोम्स आते हैं। जीन जैविक ब्लूप्रिंट होते हैं कि जो कि सभी आनुवांशिक शीलगुणों एवं विशेषताओं का सीधे रूप में निर्धारित एवं स्थानांतरित करते हैं। जीन DNA का घटक होते हैं एवं क्रोमोसोम्स की संरचना में स्थित होते हैं। ये क्रोमोसोम्स शारीरिक कोशिकाओं के केन्द्रकों में पाये जाते हैं। प्रत्येक सामान्य कोशिका में कुल 23 जोड़े क्रोमोसोम्स पाये जाते हैं जो कि कुल मिलाकर 46 होते हैं। इसके अलावा दो विशेष कोशिकायें भी पायी जाती हैं जिनमें कुल 23 ही क्रोमोसोम्स होते हैं जैसे कि पुरूषों में शुक्राणु कोशिका एवं महिलाओं में अंडाणु कोशिका। गर्भधारण के समय पुरूष के शुक्राणु कोशिका के 23 एवं महिला के अंडाणु कोशिका के 23 क्रोमोसोम्स आपस में मिल जाते हैं एवं एक एकल कोशिका का निर्माण करते हैं जिसे जाइगोट (Zygote) कहा जाता है जिसमें पूरे 23 जोड़े क्रोमोसोम्स होते हैं। इस जाइगोट कोशिका में लगभग 100,000 जीन्स होते हैं जिनमें हर प्रकार वह सूचना कूटसंकेतिक होती है जिसकी की मानव उत्पत्ति में जरूरत होती है। इन 23 जोड़े क्रोमोसोम्स का आखिरी जोड़ा सेक्स क्रोमोसोम्स कहलाता है। क्योंकि यह लिंग निर्धारण करता है। महिलाओं के सेक्स क्रोमोसोम्स में जोड़े के दोनों क्रोमोसोम्स XX होते हैं। वहीं पुरूषों के सेक्स क्रोमोसोम्स में XYहोते हैं। अंडाणु कोशिका के सेक्स क्रोमोसोम्स में हमेशा X क्रोमोसोम्स ही होते हैं। लड़की का जन्म महिला एवं पुरूष के दो X क्रोमोसोम्स के मिलने से एवं लड़के का जन्म महिला के X एवं पुरूष के Y क्रोमोसोम्स के मिलने से होता है।

इस प्रकार अब तक आप ने जाना कि आनुवांशिकता का मानव विकास में क्या भूमिका है। आइये अब पूर्वप्रसूतिकाल में विकास की अवस्थाओं के बारे में जानें।

पूर्वप्रसूतिकाल के दौरान विकास की अवस्थायें -

शुक्राणु एवं अंडाणु कोशिका के मिलते ही जाइगोट का निर्माण शुरू हो जाता है एवं जन्म से पूर्व तक इसका अलग-अलग आकारों में विभिन्न अवस्थाओं में विकास होता रहता है इन्हें निम्नांकित सारणी के माध्यम से भली प्रकार जाना जा सकता है।

पूर्वप्रसूतिकाल की अवस्थायें

अवस्थागर्भधारणोपरान्त समयअवस्था की प्रमुख गतिविधियॉं
जाइगोट (zygote) का काल एक से दो सप्ताहजाइगोट यूटेरस से जुड़ जाता है। एवं दो हफ्तों में यह इस वाक्य के अंतिम बिन्दु के बराबर हो जाता है। 
एम्ब्रियो (embryo) का काल 3 से 8 सप्ताहशरीर की संरचना एवं अंगो का के निर्माण का
संकेत मिलने लगता है। पहली अस्थि को शिकादिखलाई पड़ने के साथ ही इस काल का अन्त हो जाता है। आठ हफ्तों के उपरान्त एम्ब्रियो एक इंच
के बराबर  लम्बा हो जाता है, एवं वनज 4 ग्राम।
भ्रूण(fetus)काल 9 सप्ताह से लेकर
जन्म तक (38 सप्ताह) 
इस दौरान अंगों का विकास जैसे हाथ, पैर, सिर एवं धड़ आदि का विकास तीव्रता से होता है, वजन एवं लम्बाई बढ़ती जाती है।

शैशवावस्था में शारीरिक विकास एवं सीखना

शैशवावस्था में शारीरिक विकास बहुत ही तीव्रता से होता है। अपने जीवन के पहले साल में अच्छा पोषण प्राप्त होने पर शिशु अपने जन्म के वजन में तकरीबन तीन गुना ( 20 पौण्ड या 09 किलोग्राम) तथा शारीरिक लम्बाई में एक तिहाई (28 से 29 इंच, 71 से 74 सेंटीमीटर) की वृद्धि कर लेते हैं। यद्यपि शिशु जन्म के तुरंत बाद भोजन करने में सक्षम होते हैं बावजूद इसके एक समय में वे कितना पचा सकते हैं इसकी क्षमता उनमें सीमित होती है। उनका पेट एक समय में ज्यादा भोजन नहीं पचा सकता है। इसकी क्षतिपूर्ति वे दिन में कई बाद थोड़ा-थोड़ा भोजन ग्रहण करने के रूप में करते हैं। प्राय: शिशु प्रत्येक तीन से चार घण्टे में थोड़ा-थोड़ा भोजन ग्रहण करते हैं। जन्म के समय अपने शरीर के तापमान को नियंत्रित करने की शिशु में बहुत ही कम क्षमता होती है। यथार्थ तो यह है कि आठ से नौ महीने की आयु का होने तक वे अपने शरीर के सामान्य तापक्रम को मेंनटेन करने में भी असमर्थ होते हैं। इसलिए ऐसी अवस्था में उन्हें गर्म रखने के लिए माता-पिता को खास खयाल रखने की जरूरत होती है।

नवजात (The Neonate)- तुरंत जन्मे शिशु को नवजात कहा जाता है। इन शिशु गर्भावस्था से ही कुछ ऐसी अनुक्रियायें सीखे हुए होते हैं जो कि नवीन वातावरण में उनके अनुकूलन के लिए आवश्यक होती हैं। इन्हें रिफ्लेक्स कहा जाता है। इन अनुक्रियाओं में चूसना, निगलना, छींकना-खांसना और ऑंखें झपकाने की क्रिया शामिल होती है। नवजात किसी पीड़ादायक उद्दीपक से दूर होने के लिए अपने हाथ-पैर एवं अंग आदि हिला सकते हैं एवं जब उनके चेहरे पर कोई चादर अथवा कम्बल आ जाता है तब वे उसे हटा देते हैं। आप किसी शिशु के गालों को थपथपाइये व तुरंत ही दूध हेतु मॉं के स्तन ढूॅंढ़ना शुरू कर देगा।नवजात द्वारा प्रदर्शित किये जाने वाले रिफ्लेक्सेस का वर्णन सारणी में किया गया है।

रिफ्लेक्स (Reflex)विवरण (Description) 
ब्लिंकिंग (Bliniking)शिशु प्रकाश के प्रति ऑंख झपकाकर अनुक्रिया करता है। 
रूटिंग (Rootin) जब शिशु के गालों को स्पर्श अथवा थपथपाया जाता है तब वह स्पर्श की ओर घूम जाता है। तथा अपने होंठ एवं जीभ को चूषण हेतु हिलाता है।
सकिंग (Sucking) जब निप्पल अथवा अन्य दूसरी वस्तु शिशु के मुख में रखी जाती है तो वह उसे चूसने (निगलने) लगता है। 
 टोनिक नेक (Tonic neck)जब शिशु को पीठ के बल इस प्रकार लेटाया जाता है कि उसका सिर एक दिशा में घूमा हुआ हो तो शिशु अपनी बाहों एवं पैरों को उसी दिशा में फैला लेता है जिसमें उसका सिर होता है। 
मोरो (Moro)तीव्र आवाज होने पर अथवा सिर के अचानक लटक जाने पर शिशु तेजी से हाथ पैर पटकने लगता है। 
बाबिन्सकी (Babinski) जब शिशु के पैर को ऐड़ी से अॅंगूठे तक थपथपाया जाता है तो उसके पैर की उॅंगलियॉं एवं अॅंगूठा फैल जाता है।  
 ग्रैस्पिंग (Grasping) जब हाथ की हथेलियों को थपथपाया जाता है तक शिशु अपनी हथेलियों से थपथपाने हेतु इस्तेमाल की जाने वाली वस्तु को पकड़ लेता है। 
स्टेप्पिंग (Stepping) जब शिशु को उठाकर सीधा खड़ा किया जाता है तो वह एक पैर को जमीन पर रखकर दूसरे को उठाकर आगे बढ़ने की कोशिश करता है।

शैशवावस्था में प्रत्यक्षणात्मक विकास-

जन्म के समय से ही शिशु की सभी ज्ञानेंन्द्रियॉं कार्य करना प्रारंभ कर देती हैं और उनमें कुछ खास तरह की गंध, स्वाद, ध्वनि एवं दृश्य वस्तुओं को महत्व देने की प्रवृत्ति पायी जाती है। बसनेल के अनुसार बच्चों की सुनने की क्षमता देखने की क्षमता से कहीं अधिक विकसित होती है क्योंकि शिशु जन्म से पूर्व ही सुनना प्रारम्भ कर देता है। एक नवजात अपने सिर को आवाज की दिशा में घुमाने में सक्षम होता है एवं खास तौर पर वह महिलाओं की आवाज को ज्यादा महत्व देता है। पोरटर के अनुसार नवजात दर्द के प्रति संवेदनशील होते हैं एवं विशेष रूप से स्पर्श के प्रति अनुक्रियाशील होते हैं। थपथपाये एवं सहलाये जाने पर वे प्रतिक्रिया अवश्य करते हैं। जन्म के समय एक नवजात की दृष्टि 20/600 होती है एवं शायद ही कभी दो वर्ष का होने से पूर्व 20/20 हो पाती है। फील्ड के अनुसार नवजात लगभग 9 इंच दूर तक की वस्तुओं पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाते हैं एवं वे धीरे-धीरे चलायमान वस्तु का पीछे भी जा सकते हैं। 22 से 93 घंटे तक की आयु के शिशु अपरिचित महिलाओं की तुलना में अपनी मॉं के चेहरे केा अधिक महत्व देते हैं। ब्राउन के अनुसार यद्यपि नवजात शिशु धूसर रंग की वस्तुओं की तुलना में रंगीन वस्तुओं के प्रति अधिक आकर्षित होते हैं परन्तु वे दो माह के आयु का होने से पूर्व सभी रंगों के बीच भेद नहीं कर पाते हैं। गिब्सन एवं वॉक के अध्ययन के अनुसार जब बच्चे रेंगने की क्रिया में समर्थ हो जाते हैं उनमें गहराई की प्रत्यक्षण क्षमता विकसित हो जाती है।

शैशवावस्था में सीखना

शिशु कब से सीखना शुरू कर देते हैं यदि आप कहेंगे कि जन्म से, तो आप उन्हें कमतर ऑंक रहे हैं। वे जन्म से पूर्व ही सीखना आरंभ कर देते हैं। मेल्टजॉफ एवं मूरे ने 1977 में किये गये अपने अध्ययन में पाया है कि 42 मिनट आयु के शिशु दूसरों द्वारा किये जा रहे जीभ को मुख से बाहर निकालने, एवं मुॅंह को खोलने एवं बन्द करने के व्यवहार का अनुकरण कर सकते हैं। इसके अलावा 42 घंटे की आयु के शिशु सिर के हिलने की गतिविधि का भी अनुकरण भली भॉंति कर लेते हैं। इसके अतिरिक्त 14 महीने के शिशु में प्रेक्षणीय अधिगम के प्रमाण भी प्राप्त होते हैं। मेल्टजॉफ ने 1988 के अपने एक प्रयोग में यह दिखलाया कि - जब शिशुओं को एक टेलीविजन कार्यक्रम में एक व्यक्ति द्वारा खिलौने को विशेष प्रकार से खेलते दिखलाया गया, तो 24 घंटे बाद वही खिलौना जब शिशुओं को दिया गया तो उन्होंने ने भी खिलौने को टेलीविजन पर दिखाये गये व्यक्ति की तरह खेला।

शैशवावस्था में पेशीय विकास-

जीवन के पहले कुछ वर्षों में शिशुओं का विकास बहुत तीव्रता से होता है। कुछ बदलाव परिपक्वता (maturation) की वजह से होते हैं एवं कुछ अधिगम (learning) के कारण। परिपक्वता शिशु के जैविक समय-सारणी के हिसाब से निर्धारित होती है। उदाहरण के लिए पेशीय विकास के बहुत से महत्वपूर्ण पड़ाव जैसे कि बैठना, खड़ा होना, चलना प्रमुख रूप से परिपक्वता का परिणाम होते हैं। लेकिन यह विकास धीमा हो जाता है जब िशुशु को कुपोषण एवं मॉं से अलगाव आदि जैसे विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। क्रास-सांस्कृतिक शोधों में यह दर्शाया गया है कि कुछ अफ्रीकी देशों जैसे कि यूगांडा और केन्या जहॉं कि बच्चों के पालन-पोषण के तरीके अफ्रीकी संस्कृति से ओतप्रोत हैं, वहॉं कि मातायें बच्चों के पेशीय विकास पर अमेरिकी माताओं की अपेक्षा अधिक ध्यान देती हैं एवं अपने शिशुओं के पेशीय विकास हेतु विशेष तकनीकी प्रशिक्षण का उपयोग करती हैं जिससे उनके बच्चों का विकास अमेरिकी शिशुओं की तुलना में काफी तीव्र गति से होता है (किलब्राइड एवं किलब्राइड, 1975, सुपर, 1981)। आइये अब शैशवावस्था में शिशुओं के क्रमबद्ध विकास के बारे में जानें।

शिशु की आयुशिशु का पेशीय विकास
2 माहइस आयु में शिशु अपना सिर ऊपर उठाना शुरू कर देते हैं। 
3 माहकरवट बदलना एवं तकिये की सहायता प्रदान करने पर बैठना शुरू कर देते हैं।
6 माह छ: माह की आयु में शिशु बिना तकिये की अवलम्बन के हर बैठने लगते हैं।
7 माह सात माह की आयु में शिशु सहारा लेकर खड़े होना सीख लेते हैं। 
9 माह 9 माह आते आते ये शिशु सहारे के साथ चलना शुरू कर देते हैं। 
10 माह दस माह की आयु में शिशु कभी-कभी बिना सहारे खड़े होने लगते हैं।
11 माह ग्यारह माह की आयु में शिशु बिना सहारे के खडे़ होने में समर्थ हो जाते हैं।
12 माह बारह महीने की अवस्था में शिशु बिना अवलम्बन के अकेले चलने में समर्थ हो जाते हैं।
14 माह 14 महीने की आयु में ये इतने कुशल हो जाते हैं कि बिना पीछे देखे ही उल्टा चलने में भी समर्थ हो जाते हैं।
17 माह  इस आयु में शिशु सीढ़ियों पर चढ़ने लगते हैं।
18 माह इस आयु में शिशु गेंद को अपने सामने की दिशा में किक करने में समर्थ हो जाते हैं।

शैशवावस्था एवं बाल्यावस्था में सांवेगिक विकास

संजना खुशमिजाज, सरल एवं स्वयं को परिस्थितियों में आसानी से ढाल लेती है। रोनित हमेशा लगा रहता है एवं किसी समस्या के सामने हल करने तक डटा रहता है, लेकिन बहुत ही आसानी से विचलित हो जाता है। उनके माता पिता कहते हैं कि दोनों शिशु हमेशा से ही ऐसे हैं। क्या दोनों बच्चे अलग-अलग व्यवहार शैली के साथ पैदा हुये हैं अथवा वातावरण के प्रति एक विशेष प्रकार के तरीके के साथ-जिसे की चित्तप्रकृति (temperament) कहा जाता है। थामस एवं उनके साथियों का यह विश्वास है कि व्यक्तित्व, चित्तप्रकृति एवं वातावरण के बीच लगातार होने वाली अंत:क्रिया के द्वारा खास रूप में ढल जाता है। यद्यपि वातावरण चित्तप्रकृति की जन्मजात विशेषता को तीव्र करने, मंद करने एवं परिमार्जित करने में सक्षम होता है बावजूद इसके चित्तप्रकृति लम्बे समय, वर्षों बीतने के बाद भी बच्चों में अपने मौलिक स्वरूप में विद्यमान रहती है। बच्चों की समायोजन क्षमता उनकी चित्त्प्रकृति एवं वातावरण के साथ उनकी व्यवहारात्मक शैली पर निर्भर करती है। हार्ट, कैस्पी एवं सिल्वा आदि अनुसंधानकर्ताओं द्वारा किये गये अध्ययन के अनुसार जो बच्चे शैशवावस्था में अनियंत्रित अथवा आवेगशील होते हैं उन बच्चों में आगे चलकर किशोरावस्था में तीव्र संवेग के साथ आक्रामक होने, खतरा उठाने, एवं उद्विग्नता की प्रवृत्ति पायी जाती है। जिन बच्चों को बचपन में अत्यधिक नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है वे बच्चे किशोरावस्था में समाज से दूरी बनाने की प्रवृत्ति अपना लेते हैं। उनमें सामाजिकता की क्षमता नहीं पायी जाती उनमे दब्बूपन एवं नेतृत्व भूमिकाओं से बचने की प्रवृत्ति होती है एवं उनमें दूसरों को प्रभावित करने की इच्छा नहीं होती है।

भाषा विकास

जन्म के समय, शिशुओं के संचार का साधन उनका रोना होता है, लेकिन 17 वर्ष की आयु में एक औसत हाईस्कूल के छात्र के शब्दकोश में लगभग 80,000 शब्द होते हैं (मिलर एवं गिल्डिया, 1987)। 18 महीने की आयु से लेकर 5 वर्ष की अवस्था तक बच्चा प्रतिदिन 9 शब्द सीखने के औसत से 14,000 शब्दों का ज्ञान प्राप्त कर लेता है (राइस, 1989)। लेकिन बच्चे अपने शब्दकोश में केवल नये शब्द ही नहीं जोड़ते बल्कि वे इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ करते हैं। जीवन के पहले 5 वर्षों में बच्चे शब्दों के अर्थ की समझ के विकास के साथ ही शब्दों से वाक्य रचना करना एवं उनका समाज में उपयोग करना भी सीखते हैं। बच्चे आश्चर्यजनक रूप से अपनी भाषा का ज्यादातर हिस्सा बिना किसी औपचारिक शिक्षा अथवा प्रशिक्षण के ही सीख लेते हैं।

भाषा विकास की अवस्थायें-

शिशुओं में भाषा विकास की दृष्टि से ध्वनि का उच्चारण दूसरे अथवा तीसरे माह से ही प्रारम्भ हो पाता है। इससे पूर्व की माह में तो शिशु केवल रो कर ही अपने तनाव एवं खुशी को अभिव्यक्त कर पाते हैं। भाषा विकास की क्रमिक अवस्थाओं का वर्णन निम्नांकित है।

कूजन एवं बबलाना (Cooing and Babbling stage) - दो से तीन माह की आयु में बच्चे कूजन ध्वनि करना प्रारंभ कर देते हैं। जिसमें में वे प्राय: ‘अह’ एवं ‘वू’ के स्वर का उच्चारण बार-बार करते हैं। लगभग छ: माह का होने पर ये ही शिशु बबलाने की आवाज निकालना लगते हैं। कूजन एवं बबलाना मुख्य रूप से स्वर एवं व्यंज ही होते हैं जो कि किसी भी भाषा की मूल आवाज होते हैं, तथा मिलकर शब्दों का निर्माण करते हैं। स्वर एवं व्यंजन की संयुक्त रूप से बारम्बार उच्चारण एक श्रृंखला में होता है जैसे कि ‘‘मा-मा-मा’’ और ‘‘बा-बा-बा’’। तीन से लेकर आठ माह की आयु तक शिशु विश्व की भाषाओं मे पायी जाने वाली सभी मूल ध्वनियों का उच्चारण करते हैं। परन्तु आठ माह का होने पर उनका ध्यान केवल अपनी मातृभाषा पर ही केन्द्रित हो जाता है तथा वे अपना उच्चारण माता पिता के उच्चारण के समान ही करने का प्रयास करते हैं।

एक शब्द अवस्था (The One-Word Stage) - लगभग एक साल का होने पर शिशु अपने पहले वास्तविक शब्द का उच्चारण करता है। यह पहला शब्द गतिमान व्यक्तियों जैसे कि माता-पिता अथवा गतिमान वस्तुओं, जीवों जैसे कि बॉल या कुत्ता के लिये ही होता है। इन शब्दों में प्राय:’मम्मा’, पापा, डैडी, कुत्ता, बाल आदि होते हैं (नेल्सन, 1973)। 13 से 18 महीने की आयु में बच्चों की शब्द सामथ्र्य का काफी विकास हो जाता है एवं दो वर्ष की उम्र तक उनके शब्दकोश का आकार 270 शब्दों का हो जाता है (ब्राउन, 1973)। शब्द के उच्चारण के बावजूद बच्चे उनके अर्थ को वयस्कों की भॉंति समझ नहीं पाते हैं एवं उनके दो प्रकार की कमियॉं दृष्टिगोचर होती हैं। 1 अतिविस्तारीकरण (overextention) एवं 2. सीमितीकरण (underextention)। अतिविस्तारीकरण के अंतर्गत बच्चे द्वारा प्रत्येक चार पैरों वाले प्राणी को कुत्ता कहने के उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है, यहॉं बच्चा केवल चार पैर देखकर, गधा, गाय, बिल्ली सभी को कुत्ता ही कहता है। वहीं सीमितीकरण के अन्तर्गत बच्चा अपने घर के कुत्ते को तो कुत्ता ही कहता है परन्तु पड़ोसी का कुत्ता भी कुत्ता ही है यह वह नहीं समझ पाता है।

द्वि-शब्द अवस्था और टेलीग्राफिक स्पीच (The Two-Word Stage and Telegraphic Speech) - लगभग 18 से 20 माह की आयु में जबकि बच्चे की शब्द-सामथ्र्य केवल 50 शब्दों की होती है बच्चे संज्ञा, क्रिया एवं विशेषण का प्रयोग दो शब्दों के वाक्य के रूप में करना शुरू कर देते हैं, जैसे कि ‘मम्मा खाऊॅंगा’, पापा-टाफी। हालॉंकि इस अवस्था में वाक्य में छिपे अर्थ को बताने के लिए उन्हें अपने शारीरिक संकेतों, हाव-भाव पर निर्भर रहना पड़ता है (स्लोबिन, 1972)। लगभग ढाई वर्ष की आयु होने पर बच्चे छोटे वाक्यों का उपयोग करना प्रारंभ कर देते हैं जिनमें तीन या तीन से ज्यादा शब्द हो सकते हैं। इसे ही रोजर ब्राउन द्वारा टेलीग्राफिक स्पीच कहा गया है। इस अवस्था में बच्चों में वाक्य रचना के नियमों की समझ का आरंभ हो जाता है। व्याकरण के नियम उपयोग की अवस्था (Stage of Applying Grammatical rule) - टेलीग्राफिक स्पीच का कुछ समय तक अभ्यास करने से बच्चों में व्याकरण की समझ का विकास होने लगता है एवं वे शुद्ध वाक्य रचना करने लगते हैं वे वाक्यों में प्रत्यय, उपसर्ग, एवं, तथा, क्रिया, क्रियाविशेषण आदि का प्रयोग करना सीख जाते हैं। तथा वर्तमान काल, भूतकाल एवं भविष्यकाल की अभिव्यक्ति वाक्यों द्वारा करने लगते हैं।

बालक का सामाजिक विकास

समाज में उन्नत रूप से व्यवहार करने एवं सहज रूप से विकसित होने के लिए बच्चों के लिए उचित अनुचित व्यवहार की समझ होना अति आवश्यक है। इसके लिए सामाजीकरण की प्रक्रिया से गुजरना आवश्यक होता है। समाज द्वारा सहज स्वीकारणीय व्यवहारों, मनोवृत्तियों एवं मूल्यों को सीखने की प्रक्रिया ही सामाजीकरण कहलाती है। सामाजीकरण की इस प्रक्रिया में माता-पिता के अलावा संगी-साथियों, स्कूल, मीडिया एवं धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

सामाजीकरण में माता-पिता की भूमिका

बच्चों के सामाजीकरण में माता-पिता की भूमिका उदाहरण प्रस्तुतकर्ता के रूप में होती है। मैकोबी एवं मार्टिन के अनुसार बच्चों को सामाजिकता का कौशल सिखाने में वे माता पिता अधिक सफल होते पाये गये हैं जो कि अपने बच्चों के प्रति सहृदय, प्रेमपूर्ण, देखभालने वाले एवं समर्थन करने वाले होते हैं। फै्रन्ज के अनुसार सत्य तो यह है कि एक दीर्घकालिक अनुसंधान जिसमें कि 5 वर्ष से लेकर 41 वर्ष की आयु तक व्यक्तियों का अध्ययन किया गया, में पाया गया कि जिन बच्चों के माता-पिता उनके प्रति उत्साही एवं प्रेमपूर्ण थे वे बच्चे अपनी वयस्कावस्था में अर्थात् 41 साल की आयु में भी मानसिक रूप से अधिक स्वस्थ, चुनौतियों का बखूबी सामना करने वाले, एवं अपने कार्यों में, सम्बंधों में एवं उदारता में काफी बढ़े-चढ़े थे (फ्रैन्ज एवं उनके सहयोगी, 1991)। इसके विपरीत प्रकार के माता-पिता के बच्चों में कुसमायोजन के दोष पाये गये (मैकोबी, 1992)। सार रूप में माता-पिता की भूमिका से प्रभावित सामाजीकरण की वही प्रक्रिया प्रभावशाली मानी जाती है जिसका परिणाम बच्चों द्वारा आत्मानुशासन एवं स्वयं के व्यवहार के स्वनियमन के रूप में सामने आए। सामाजीकरण की प्रक्रिया में संगी-साथियों की भूमिका (Peer relationships) -बहुत छोटी सी आयु में ही शिशु एक दूसरे में अपनी रूचि दिखलाना शुरू कर देते हैं। केवल छ: माह की आयु में वे दूसरे शिशुओं में अपनी रूचि, उनकी ओर देखकर, पहुॅंचने के प्रयास के रूप में, छूने, मुस्कराने एवं देखकर बोलने के रूप में अभिव्यक्त करते हैं (वान्डेल एवं म्यूलर, 1980)। तीन से चार वर्ष की आयु में मित्रता की शुरूआत होती है एवं संगी-साथियों के साथ संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। मध्य बाल्यावस्था में एक बच्चे की खुशी उसके संगी-साथियों के समूह की सदस्यता के कारण होती है। ये समूह प्राय: समान जाति, लिंग एवं सामाजिक स्थिति वाले होते हैं। अपने हमउम्र साथियों के समूह में बच्चे अन्य साथियों के साथ भली प्रकार घुलना-मिलना सीखते हैं, सहयोग करना, भावों की अभिव्यक्ति करना, क्रोध पर नियंत्रण करना एवं सामाजिक व्यवहार कुशलता सीखते हैं।

किशोरावस्था - शारीरिक एवं मानसिक विकास

किशोरावस्था प्यूबर्टी की अवस्था से ही प्रारम्भ हो जाती है। प्यूबर्टी ऐसी अवस्था होती है जिसमें बड़ी ही तीव्रता से शारीरिक बदलाव होते हैं एवं ये बदलाव लैंगिक परिपक्वता में बदल जाते हैं। लड़कियों के लिए औसतन प्यूबर्टी की शुरूआत 10 वर्ष की आयु में एवं लड़कों के लिए 12 वर्ष की आयु में होती है। प्रत्येक बच्चे के किशोरावस्था में पहुॅंचने का समय प्रमुख रूप से आनुवांशिक गुणों एवं वातावरणीय प्रभावों पर निर्भर करता है। प्यूबर्टी की शुरूआत हार्मोन्स के उत्पादन के साथ होती है एवं यह बहुत सारे शारीरिक बदलावों को जन्म देती है। लड़के एवं लड़कियों दोनों में ही प्रजनन अंगों का विकास होने लगता है एवं साथ ही अन्य गौण विशेषतायें भी परिलक्षित होने लगती हैं जो कि पुरूष एवं महिला के रूप में किशोरों की बाह्य पहचान कराती हैं, जैसे कि लड़कियों में स्तनों एवं कटि प्रदेश के नीचे नितंबों का विकास होने लगता है, लड़कों की आवाज में भारीपन तथा चेहरे पर दाढ़ी-मूॅंछ और छाती पर बाल आने लगते हैं एवं दोनो ही लिंगों में बगल एवं प्रजनन अंगों में बालों का वर्धन शुरू हो जाता है।

प्यूबर्टी के समय का किशोरों के मानसिक विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। जिन बच्चों में अपने साथियों की अपेक्षा प्यूबर्टी की अवस्था जल्दी आ जाती है वे बच्चे अपने साथ के बच्चों की अपेक्षा ज्यादा लम्बे एवं ताकतवर हो जाते हैं जिसका असर उनकी शारीरिक गतिविधियों जैसे कि खेल आदि पर पड़ता है वे इन गतिविधियों में अन्य बच्चों से आगे निकल जाते हैं। परिणामस्वरूप ये बच्चे आत्मविश्वास से भरपूर होते हैं एवं प्राय: अपनी शिक्षा में उत्तम प्रदर्शन करते हैं।

वहीं जिन बच्चों में किशोरावस्था देर से आती है वे बच्चे अपने साथी बच्चों की दृष्टि में पिछड़े एवं कमजोर पड़ जाते हैं जिसके कारण उनमें आत्मविश्वास की कमी एवं पढ़ाई में पिछड़ापन दिखलाई देने लगता है। पियाजे के संज्ञानात्मक सिद्धान्त के अनुसार किशोरावस्था, औपचारिक संक्रिया की अवस्था होती है। इस अवस्था में किशोर तार्किक सोच के नियमों को समझने लगता है वह जटिल समस्याओं का समाधान, परिकल्पित रूप से करने में सक्षम होने लगता है।

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