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अलाउद्दीन खिलजी के विजय अभियान, न्याय व्यवस्था, सैनिक सुधार

अलाउद्दीन खिलजी जलालुद्दीन का भतीजा और दामाद था। सन् 1290 ई. मे जलालुद्दीन खिलजी गद्दी पर बैठा। 1296 ई. में अलाउद्दीन ने धोखे से अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या कर दी और वह स्वयं सुल्तान बन गया ।अलाउद्दीन का स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण 2 जनवरी 1316 को मौत हो गयी।

अलाउद्दीन खिलजी के विजय अभियान

अलाउद्दीन एक महत्वाकांक्षी शासक था। अपने प्रारंभिक अभियानों में उसे सफलता मिली। अभी भी उत्तर-भारत के बहुत से क्षेत्र अलाउद्दीन के अधिपत्य से मुक्त थे। अतः शासक बनने के बाद उसने अपने साम्राज्य विस्तार की ओर ध्यान दिया।

गुजरात पर विजय 

अलाउद्दीन के समय यहां का शासक रायकरण था। इस राज्य पर आक्रमण के लिये अलाउद्दीन ने दो दिशाओं से सेना भेजी। उलुग खां को सिंध की ओर से तथा नुसरत खां को राजपूताना के मार्ग से भजे ा। शाही सेनाओं ने मार्ग में आने वाले शहरों को लूटा। गुजरात का शासक इस आक्रमण का सामना नहीं कर पाया और दक्षिण की ओर भाग गया।

रणथंभौर पर विजय 

यह पहले दिल्ली राज्य का अंग रह चुका था। यहां के शासक हम्मीरदेव ने कुछ विद्रोही मुसलमानों को अपने यहां शरण दी थी। उलुग खां एवं नसरत खां को यहां आक्रमण के लिये भेजा। उन्होंने किले पर घेरा डाल दिया, जो एक वर्ष तक बराबर चलता था। किले के भीतर की सामग्री धीरे-धीरे समाप्त होने लगी और बाहर से सहायता मिलना कठिन हो गया। अन्त में 1301 में हम्मीर देव का प्रधानमंत्री सुल्तान से जा मिला। इससे राजपूतों का मनोबल गिर गया। राणा हम्मीरदेव तथा उसके वंश के सभी वीर गति को प्राप्त हुये। नसरत खां भी इस युद्ध में मारा गया।

चित्तौड़ पर विजय

रणथंभौर के पश्चात् 1303 ई. में अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। यहां की रानी पद्मिनी की सुन्दरता से प्रभावित होकर अलाउद्दीन ने चित्तौड़ आक्रमण की योजना बनाई। रानी की सुन्दरता पर मोहित होकर विश्वासघात द्वारा उसने राणा रतनसिंह को कैद कर लिया। रानी के बदले राणा की रिहाई का वादा किया, किन्तु स्वाभिमानी सैनिकों ने स्त्रियों के वेश धरकर सुल्तान के डेरे पर आक्रमण कर दिया। राजमहल में रानी ने स्त्रियों के साथ जौहर कर लिया। इस प्रकार धोखे से चित्तौड़ को जीत कर अलाउद्दीन ने अपने पुत्र खिज्रखां को वहां का शासक नियुक्त कर दिया।

मालवा की विजय 

चित्तौड़ की विजय के बाद राजपूतों की रियासतों ने अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार करना प्रारंभ कर दिया। उसमें मालवा के राजा ने अधीनता स्वीकार नहीं की। अलाउद्दीन आईन-उल-मुल्क-मुल्तानी को जालौर तथा उज्जैन पर आक्रमण के लिए 1305 ई. में भजे ा, जहां पर उन्हें ं कठिन प्रतिरोध झेलना पड़ा, किन्तु अंत में उज्जनै , माण्डू, धार, चंदेरी तथा जालौर पर सुल्तान का अधिकार हो गया।

मारवाड़ की विजय 

1308 ई. में सुल्तान ने मारवाड़ को जीतने का प्रयास किया। इस उद्देश्य के लिये सिवाना दुर्ग का घेरा डाल दिया। यह घेरा लंबे समय तक चलता रहा। आक्रमणकारियों को कोई  सफलता नहीं मिली। तब सुल्तान स्वयं सेना लेकर सिवाना पहुंचा। उसने वहां के राजा शीतलदेव को संधि करने के लिए बाध्य किया। सिवाना का राज्य उसने अमीरों में बांट दिया।

देवगिरी पर विजय

सुल्तान बनने से पहले भी 1294 ई. में अलाउद्दीन ने देवगिरी के राजा को पराजित किया था, किन्तु यहां के राजा ने सुल्तान को कर देना बंद कर दिया था। साथ ही उसने गुजरात के शासक कर्णदेव को शरण दी थी। इसलिए अलाउद्दीन ने 1306-07 ई. में मलिक काफूर को देवगिरी पर आक्रमण के लिये भेजा। मलिक काफूर ने रामचंद्र देव को पराजित कर दिल्ली भेज दिया। अलाउद्दीन ने राजा के साथ अच्छा व्यवहार किया और उसे ‘रायरायन’ की उपाधि दी और उसका राज्य वापस कर दिया। इस व्यवहार से रामचन्द्र देव इतना प्रभावित हुआ कि उसने फिर कभी भी सुल्तान के विरूद्ध विद्रोह नहीं किया।

तेलंगाना पर विजय

1303 ई. में तेलंगाना के असफल अभियान के कलंक को धोने के लिए अलाउद्दीन ने 1308 ई. में मलिक काफरू के नेतृत्व मे ं एक सेना भजे ी। राजधानी वारंगल चारांे आरे सुदृढ़ दीवारो ं से घिरी थी। काफरू ने एकाएक आक्रमण कर दिया और वारंगल का े चारांे आरे घरे लिया। वहां का शासक बड़ी वीरतापूर्वक लड़ा, लेकिन अंत में उसे आत्म-समर्पण करना पड़ा। सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर उसने भी वार्षिक कर देना स्वीकार किया।

पाण्डय राज्य की विजय

‘पाण्डय राज्य दक्षिण के अंतिम छोर पर स्थित था। वहां सुंदर पाण्डय और वीर पाण्डय दाने ांे भाईयो ं के बीच सिंहासन को लेकर गृहयुद्ध था। सुन्दर पाण्डय ने अपने भाई के विरूद्ध सुल्तान से सहायता मांगी। सुल्तान के लिये अच्छा अवसर था। अतः सुल्तान के आदेश पर 1311 ई. मे ं काफूर ने पाण्डय राज्य पर आक्रमण कर मदुराई पर अधिकार कर लिया। वीर पाण्डय वहां से भाग खड़ा हुआ। काफूर ने नगर को जी भरकर लूटा, अनेक मंदिर नष्ट किये। अपने साथ वह लूट की अपार धन-सम्पत्ति लाया, जो इसके पूर्व कभी नहीं लाया था।

देवगिरी पर पुनः आक्रमण

राजा रामचन्द्रदेव की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शंकरदेव गद्दी पर बैठा। उसने अपने को दिल्ली शासन से स्वतंत्र कर लिया और कर देना बंद कर दिया। इसलिए 1313 ई. में सुल्तान ने मलिक काफूर को पुनः वहां आक्रमण के लिए भजे ा। इस युद्ध में शकंरदेव मारा गया। यहां भी काफरू ने विभिन्न नगरों को खूब लूटा।

दक्षिण विजयों  से अलाउद्दीन को अपार धन-सम्पत्ति प्राप्त हुई। दक्षिण अभियान में सुल्तान को पूर्ण सफलता प्राप्त हुई। इसका मुख्य कारण यह था कि अलाउद्दीन ने इन राज्यों को जीतने के पश्चात् दिल्ली साम्राज्य में उन्हें मिलाया नहीं। वहां के राजाओ  को ही वापस सत्ता सौंप दी। काफूर जैसे योग्य, वीर, साहसी सेनापति के नेतृत्व में सेना ने बड़ी कुशलता का परिचय दिया तो दूसरी ओर दक्षिणी राज्यों में एकता नहीं थी। इसलिये उन पर विजय प्राप्त करना आसान हो गया।

अलाउद्दीन खिलजी की न्याय व्यवस्था

उसने परिस्थितियों के अनुसार जिन नियमों को उचित समझा उन्हें ही न्याय का आधार बनाया। न्यायाधीशों की सहायता के लिए पुलिस तथा गुप्तचरों की भी नियुक्ति की। दण्ड-विधान अत्यधिक कठोर था। अपराधियों के साथ-साथ सन्देह होने पर सहयोगियों को भी मृत्यु-दण्ड तथा अंग-भंग का दण्ड दिया जाता था। दण्ड देने में किसी के साथ रियायत नहीं की जाती थी। 

अलाउद्दीन खिलजी के सैनिक सुधार

1. अलाउद्दीन खिलजी पहला सुल्तान था जिसने स्थायी सेना की व्यवस्था की जो हमेशा राजधानी में तैयार रहती थी। सैनिको की भर्ती के लिए उसने एक सेना मंत्री की नियुक्ति कर दी। उसके साथ वह स्वयं भी सैनिकों की भर्ती किया करता था। सैनिक योग्यता के आधार पर भर्ती किये जाते थे न कि वंश अथवा जाति के आधार पर। सैनिकों का हुलिया दर्ज किया जाता था, ताकि किसी प्रकार की प्रतिनियुक्ति न हो सके। 

2. अलाउद्दीन से पूर्व सैनिको  को जागीर देने की प्रथा प्रचलित थी, जिससे सैनिकों का जागीर प्रबंध में ही समय बर्बाद होता था। अतः अलाउद्दीन ने इस प्रथा को बंद कर दिया आरै राजकोष से सैनिकों  को नकद वेतन दिया जाने लगा। एक सैनिक का वेतन 234 टंका प्रतिवर्ष था। एक अतिरिक्त घोड़ा रखने पर 78 टंका अधिक मिलते थे। सैनिकों को घोड़े, हथियार तथा अन्य सामग्री राज्य की ओर से दी जाती थी। 

3. बहुधा सैनिक अच्छे घाडे ़ों के स्थान पर घटिया घाडे ़े दर्शाते थे, जा े युद्ध के समय काम नहीं कर पाते थे। इस दोष  को दूर करने के लिये सुल्तान ने घाडे ़ े दागने की प्रथा प्रारंभ की। उपर्युक्त सुधारो से सेना का संगठन अच्छा हुआ आरै वह अपने सैनिक अभियानों में सफल रहा।

खिलजी वंश के पतन के कारण

1. निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी शासन - अलाउद्दीन का शासन निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी था। वह सैनिक बल पर आधारित था। उसने जनहित का विचार किये बिना अपने स्वार्थों पर आधारित निर्णय लिये। अलाउद्दीन ने शासन सुधारो में समाज के सभी वर्गों को असन्तुष्ट कर दिया था। गुप्तचर विभाग की कठारे ता के कारण उच्च तथा मध्य वर्ग के लोग आतंकित हो गये थे और इस स्थिति से छुटकारा पाने के लिए बेचैन थे। उलेमा उसकी स्वच्छंद नीति से असंतुष्ट थे।

2. अलाउद्दीन के निर्बल उत्तराधिकारी - अलाउद्दीन की मृत्यु के पश्चात् कोई भी ऐसा शासक नहीं हुआ कि इतने विशाल साम्राज्य को संगठित रख सकता। सुल्तान के एक भी पुत्र में उसके जैसी योग्यता नहीं थी। उत्तराधिकारियों की निर्बलता का लाभ उठाकर अनेक प्रांतों में विद्रोह उठ खड़े हुये। शासन मे ं अराजकता फैल गई। इस प्रकार खिलजी वंश का पतन सुनिश्चित हो गया।

खिलजी वंश का अन्त

1316 ई. में अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद खिलजी सल्तनत में अराजकता फैल गई । मलिक काफूर कुछ समय के लिए गद्दी पर बैठा । उसे कुतुबुद्दीन मुबारक शाह ने गद्दी से उतार कर अपना अधिकार कर लिया । इस काल में देवगिरि में विद्रोह हुए परन्तु दबा दिये गये । मुबारक शाह की हत्या कर खुसरो गद्दी पर बैठा । वह भी अधिक समय शासन न कर सका । ग्यासुद्दीन के नेतृत्व में असन्तुष्ट अमीरों ने एक युद्ध में उसकी हत्या कर दी । इस प्रकार अलाउद्दीन की मृत्यु के चार वर्ष बाद खिलजी वंश का अन्त हो गया और सत्ता तुगलक वंश के हाथ आई 

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

1 Comments

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