एक्यूप्रेशर चिकित्सा क्या है एक्यूप्रेशर चिकित्सा का इतिहास?

Acupressure एक्यूप्रेशर चिकित्सा वह पद्धति है जिससे पैरो, हाथों व चेहरे के कुछ खास केन्द्रों पर दबाव डाला जाता है इन केन्द्रों को Respopnse Center या Reflex Center भी कहते है हिन्दी में इसे प्रतिबिम्ब केन्द्र कहते है। रोग की अवस्था में इन केन्द्रो पर जब प्रेशर देते है तो वहाँ पर बहुत तेज दर्द होता है। तब वहाँ पर दबाव देने से शरीर में रोग की प्रतिक्रिया शक्ति जागृत होती है, जिससे रोग दूर होता है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका प्रभाव चमत्कारी होता है वर्षों पुराने रोग भी दिनों में दूर हो जाते है।

एक्यूप्रेशर दो शब्दों से मिलकर बना है, ACUS+PRESSURE- जिसमें ACUS लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है सुई प्रेशर PRESSURE अंग्रेजी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है दबाव डालना, अर्थात सुई समान किसी नुकीली चील से रोग प्रतिबिम्ब केन्द्र पर दबाव डालना। यह एक प्राकृतिक क्रिया है, इसे हम इस उदाहरण के आधार पर दर्शा सकते है कि जैसे जब किसी स्थान पर दर्द या परेशानी होती है तो अपने आप हमारा हाथ उस स्थान को दबाने लगता है और हम कुछ राहत भी महसूस करते है। 

यह एक्यूप्रेशर पद्धति अति-प्राचीन है, तथा भारतीय संस्कृति की ही देन है, क्योंकि इसका व्यापक वर्णन आयुर्वेद ग्रंथो में किया गया है। 

हमारा जो यह साधारण दिखने वाला शरीर है यह मात्र हांड-मांस का बना नही है। इसके भीतर जो शक्ति कार्य करती है ,वह प्राणरूपी जीवनी शक्ति है इसे चीनी भाषा मे ची करते है उनके अनुसार इस ची नामक शक्ति में दो प्रकार के बल होते है। यिंग और यांग, यिंग ऋणात्मक बल है, और यांग धनात्मक बल है मुनश्य पूर्ण स्वस्थ्य रहता है जब ये दोनों बल अंसतुलित होते है तो वह असंतुलन रोग उत्पन्न करता है ये दोनों प्रकार के यिंग और यांग नामक जो बल है वे शरीर के भिन्न मार्गो से होकर जाती है ये दोनों शक्तियां शरीर के जिन-जिन मार्गों से होकर जाती है उन्हे एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति में मेरिडियन के नाम से जाना जाता है।

यदि हम आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से शरीर को समझे, तो भी यह बात स्पश्ट होती है कि जो पूरे शरीर में रक्त संचार, स्नायु संस्थान की सभी छोटी-बड़ी नस-नाड़ियां है। उनके अन्तिम सिरे हाथ और पैर के तलवे में ही होते है। ये अन्तिम सिरे शरीर में फैले किसी न किसी नस या नाड़ी से सम्बद्ध होते है। जब उनसे सम्बन्धित कोई विकार उत्पन्न होता है तो इन्ही अन्तिम सिरों पर दबाव अर्थात प्रेशर डालकर उस सम्बन्धित रोग का या पीड़ा का निदान किया जाता है।

यही बाते एक्यूप्रेशर के विशेष महत्व को बताती हैं कि बिना किसी औषधी के तथा न ही अनावश्यक धन खर्च करके, न समय बरबाद करके न ही मंहगी-मंहगी जॉच कराके चिकित्सा होती है। बल्कि मात्र हाथ की हथेली व पैर के तलवों में विशेष एक्यू बिन्दु को देखकर ही कुशल एक्यूप्रेशर चिकित्सक अपने रोगी को चिकित्सा करता है। इसके लिए रोगी व्यक्ति को कुछ भी परेशानी नहीं होती क्योंकि इसमें कष्टकारी किसी भी प्रक्रिया से उसे नहीं गुजरना पड़ता है यह महत्व उस समय और भी बढ़ जाता है जब रोगी व्यक्ति इस उपचार प्रकिया के बारे में पूर्ण आश्वस्त होता है। धैर्यवान होता है तथा वह हर समय अपने बारे में व दूसरों के बारे में सकारात्मक सोच रखता है विश्वासी व्यक्ति हर क्षेत्र में विजयी होता हैं। 

 प्राचीन समय में हर महिला इसके महत्व को जानती थी, वह स्वयं की तथा बच्चों की चिकित्सा अपने इसी ज्ञान के आधार पर कर लेती थी वर्तमान की चिकित्सा पद्धति इतनी महंगी है कि सामान्य वर्ग के लिए उसे अपनाना कठिन हो जाता है, ऐसे में इस चिकित्सा पद्धति की महत्ता और भी बड़ जाती है, क्योंकि इससे ना तो कोई प्रति प्रभाव ही पड़ता है, न ही धन व समय की हानि, इसे स्वंय सीख कर स्वयं को परिवार को तथा अन्य लोगों को स्वास्थ्य लाभ दिया जा सकता है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा का इतिहास

प्राचीन काल से ले कर आज तक शरीर के अनेक रोगों तथा विकारों को दूर करने के लिए जितनी चिकित्सा पद्धति प्रचलित हुई है उनमे एक्यूप्रेशर सबसे पुरानी पद्धति है, विभिन्न देशों में इसे अलग-2 नाम दिये गये है अर्थ और परिभाषा के अध्यन से आप जान गये है कि यह एक पूर्ण प्राकृतिक पद्धति हैं। एक्यूप्रेशर पद्धति कितनी पुरानी है तथ किस देश मे इस का अविश्कार हुआ इस बारे मे अलग-अलग विचार है, ऐसा माना जाता है कि 6000 वर्ष पूर्व भारत में इस का जन्म हुआ, आयुर्वेद मे भी इस पद्धति का वर्णन मिलता है।

जिस प्रकार हम देखते है कि आज विदेशी पर्यटक भारत भ्रमण पर आते रहते है और यहां कि कई चीजों से प्रेरित होकर उसे अपनाते है। ठीक इसी प्रकार चीनी यात्री भारत भ्रमण पे आये और इस पद्धति को अपने साथ अपने देश ले गये, और वहां पर इसका खूव प्रचार-प्रसार किया, तब चीन के चिकित्सकों ने इस पद्धति के आश्चर्यजनक प्रभाव को देखते हुए इसे व्यापक तैर पर अपनाया और इस पद्धति के लिए काफी प्रयास किया इसी कारण यह चीनी चिकित्सा पद्धति के नाम से प्रसिद्ध है, समय के साथ-साथ जब इस पद्धति का चीन में काफी प्रचार-प्रसार हो गया तब तक यह पद्धति भारत में लुप्त हो चुकी थी, इसके लुप्त होने के कारण थे कि इस पद्धति को जो कि सर्वसामान्य जनता के लिए सुलभ थी, उसे सरकारी मान्यता नही मिली न ही इस चिकित्सा पद्धति को सरकार की ओर से भी कोई बढ़ावा मिला, साथ-साथ इसका कारण यह भी रहा कि बदलते परिवेश में लोगों के सामाजिक राजनैतिक, व धार्मिक जीवन में परिवर्तन भी हुए।

कुछ नया पाने की चाह में जब हम पुरानी बातो, या चीजो को पीछे छोड़ देते है तो हमें स्वयं के दुखों का सामना भी करना पड़ता है। कई प्रमाणित ग्रंथो का अध्ययन करने से पता चलता है कि सभी प्रसिद्ध विद्वानों की एक राय है। इन सबका मानना है कि एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति आज से 3000 वर्ष पहले भारतवर्ष में आयुर्वेद के उत्थान के समय उत्पन्न हुई थी। सुश्रुत-संहिता में शरीर के भीतर अनेक ऐसे बिन्दुओं का वर्णन है जिनमें प्रेशर देने से रोगों का निवारण किया जा सकता हैं। एक्यूप्रेशर विशेषज्ञ मानते है कि प्राचीन भारत में यह बहुत विकसित थी कई स्थानों में वर्णन है कि भगवान बुद्ध के चिकित्सक ‘‘जिवक’’ हाथो से दबाव से रोगियों की चिकित्सा करते थे। बाद मे जब मौर्य-वंश का साम्राज्य आया तब उस समय यह विद्या बौद्ध-भिक्षुकों द्वारा अपनाई गई और इसका स्वरुप बदल गया तब 9वीं सदी के अन्त में इसे डा0 फ्रिट्ज जेराल्ड ने पुर्नजीवित किया। 

 डा0 फ्रिट्ज जेराल्ड ये एक अमेरिकी चिकित्सक है, तथा इन्हे ही आधुनिक युग मे एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति को उजागर करने का श्रेय दिया जाता है। इन्होने अपने एक लेख में बताया है कि मनुष्य शरीर एक मशीन की तरह है। इस मशीन रूपी शरीर में कई संवेदनशील भाग हैं। जैसे- मस्तिष्क, पाचनतन्त्र, ऑंख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, तंत्रिकातंत्र, रक्तसंस्थान, गुर्दे, फेफड़े आदि। ये सभी अंग, प्रत्यंग, संस्थान, अलग-अलग रहकर भी एक शरीर में एक साथ मिलकर काम करते है यह प्रकृति का चमत्कार ही है जैसे एक सफल मशीन में कई तरह के कलपुर्जे मिलकर एक विशेष कार्य को सम्पन्न करते है। लेकिन यदि कभी भाग में खराबी आ जाती है तो उस भाग से सम्बद्ध अद्श्य बटन को दबाने से मशीन का काम पुन: प्रारम्भ हो जाता है। ठीक उसी प्रकार शरीर के अन्तरिक अंगो से सम्बद्ध हाथ, पैर, चेहरे व कई अन्य स्थानों पर इनके अदृश्य स्विच (बटन) बिन्दु होते है। उन बिन्दुओं पर दबाव डालकर, अर्थात पे्रशर देकर, उससे सम्बन्धित अंग में उत्तेजना, गर्मी, चेतना, प्राण आदि भेजी जाती है। जिसके फलस्वरुप वहा का अवरोध हट जाता है वह अंग स्थान पुन: क्रियाशील हो जाता है। तब वहा पर स्वास्थ्य रक्त संचार व प्राण संचार पुन: होने लगता है। एक्यूप्रेशर उपचार पद्धति-प्रकृति प्रदन्त विज्ञान है। 

हमारे ऋशि-मुनि, गृहस्थ आदि सभी समय-समय पर इसका उपयोग करते आये है। यह मानव शरीर प्रकृति की ओर से एक दोशरहित मशीन है। यदि प्रकृति के अनुसार भोजन, श्रम और विश्राम में सन्तुलन न बनाया जाय, या प्राकृतिक नियमों का न माना जाय, तब उस स्थिति में विशैले तत्वों का संग्रह प्रारम्भ हो जाता है। इसके फलस्वरुप शारीरिक क्रियाओं पर प्रभाव पड़ता है। शरीर में विजातिय तत्वों का संग्रह ही रोग कहलाता है।

आज भी अनेको आभूशण, वस्त्र, घर में किये जाने वाले कार्य, तथा श्रमशील कार्य एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के ही रुप है। हाथों मे कंगन, चूड़ी, घड़ी तथा पैरों में पायल, झांझर, गले मे हार, चेन तथा छोटे-छोटे बच्चों के गले में व कमर में काला धागा पहनाना, कान में जनेऊ, हाथ में कलावा बांधना, कपड़े धोना, कुॅए से पानी निकालना, रोटी बनाना, आटा गूथना, बिंदी लगाना, तिलक लगाना, कर्ण छेदन करना,ये सभी कहीं न कहीं एक्यूप्रेशर चिकित्सा के ही तथ्य है।

भारत से लंका, चीन, जापान आदि देशों में बौद्ध भिक्षु इस ज्ञान को लेकर गये कहीं-कहीं उल्लेख मिलता है कि छटी शताब्दी में बौद्ध भिक्षुओं ने इस ज्ञान को जापान पहुचाया, जापान में यह पद्धति ‘‘शिआस्तु’’ के नाम से जानी पहचानी गई। वहां पर इसे पूर्ण मान्यता प्राप्त हुई इसके कई संस्थान स्थापित किये गये इसकी लोकप्रियता का प्रमुख कारण यहा रहा कि इस पद्धति के प्रति लोगो की पूर्ण सजगता ‘‘शिआस्तु’’ में शि का अर्थ है अंगुली और ‘आत्सु’’ का अर्थ है दबाव।

सिद्धान्ता के अन्र्तगत- एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति में शरीर को 10 भागो में बांटा हैं जिसे जोनोलाजी कहा गया है। शरीर के निदिश्ट जोन में दबाव देकर रोग को दूर भगाना जोनेथैरपी के नाम से जाना जाता है। बांए हाथ की अंगुलियो हथेलियों पर दाब देकर शरीर के बांए भाग की चिकित्सा की जाती है तथा इसी प्रकार दाहिने हाथ पर दबाव देकर शरीर के दाहिने भाग की चिकित्सा की जाती है, तब रोग की पहचान व उपचार पैर के तलवों द्वारा किया जाता है तो यह पद्धति ‘‘फुट रिफ्लेक्सोलॉजी’’ के नाम से जानी जाती है। तथा जब शरीर में स्थित दाब-बिन्दुओं के माध्यम से जब उपचार किया जाता है तब इसे शिआत्सु कहते हैं

एक्यूप्रेशर-प्राचीन चिकित्सा पद्धति -

वर्तमान में जब हम देखते है कि नई-नई चीजों का अविष्कार हो चुका है ऐसे में हर परेशानी का इलाज हो जाता है तब साधारण जन यही समझते है कि विज्ञान ने चमत्कार किया है, जबकि ये चमत्कार पुरातन पद्धतियों की ही देन है बस थोड़ा-बहुत उनके स्वरूप को बदल दिया गया है। प्राचीन समय से लेकर आज तक शरीर के कई रोगों व विकारों को दूर करने के लिए जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां प्रचलित हुई है उनमें से एक्यूप्रेशर सबसे अधिक प्रभावशाली पद्धति है व पूर्ण रूप से प्राकृतिक है प्राचीन ऐतिहासिक सभ्यता से पता चलता है कि क्षत्रीय पुरूष कई प्रकार के आभूशण धारण करते थे उन आभूषणों से जो उस विशेष स्थान पर दबाव पड़ता है वह शरीर के अंग विशेष को प्रभावित करता है। यद वद विधि है जिसमें बिना आपरेशन के रोग निवारण की शक्ति है इसके चमत्कारी प्रभाव को देखते हुए विदेशों में यह काफी प्रचलित एवं लोकप्रिय हो रही है।

इस शरीर रूपी मशीन में भी कई कल पुजे है जिन्हें अंग-अवयव कहा जाता है, जब इन अंग-अवयव रूपी कार्य-प्रणाली प्रभावित होती है तो कई रोग उत्पन्न हो जाते है उन रोगो को दूर करने के लिए मनुष्य ने सबसे पहले जो पद्धति अपनाई वह पद्धति एक्यूप्रेशर चिकित्सा ही है।

आज जब भारतवर्ष में यह पद्धति लगभग खो सी रही है तो इसके कई कारण भी है जैसे-पश्चिमी सभ्यता का हमारे दैनिक जीवन पर प्रभाव, आध्यात्मिक गुणों का हा्रस तथा सरकारी मान्यताओं का अभाव।

एक्यूप्रेशर का वर्तमान स्वरूप -

सभ्य समाज व स्वस्थ नागरिक देश की उन्नति में सहायक है रोग की अवस्था में हम कही न कही अपने परिवार व समाज को प्रभावित करते है, इसलिए अपना स्वास्थ्य बनाये रखना ही सब सामाजिक सद्गुणों का आधार है।

इसलिए आज जब हर व्यक्ति तर्क व तथ्यों पर विश्वास करता है तो वह महंगी दवाइयों के प्रतिप्रभाव को भी समझने लगा है जिससे धन, समय की बर्बादी ही होती है तब ऐसे में वह पद्धति जिससे समय बचता है, किसी भी प्रकार का दुश्परिणाम नही होता, तो उसे सभी अपनाना चाहते है। आज इसे सरकारी तौर पर बढ़ावा तो नही मिला है लेकिन व्यक्तिगत तौर पर कई स्थानों में इस चिकित्सा के केन्द्र खुल चुके है, जिनमें कुशल चिकित्सों द्वारा एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा रोगो का समाधान किया जा रहा है लोगो को इस चिकित्सा पद्धति के सत्परिणाम भी मिल रहे है। अनुभवी चिकित्सा पूरे शरीर के क्रिया पद्धति को जानकर, समझकर ही चिकित्सा करते है रोग की स्थिति को देखते हुए, रोगी का पूरा-पूरा घ्यान रखा जाता है, साथ-साथ अन्य प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों का सहारा भी लिया जाता है, जैसे मिट्टी  चिकित्सा, जल चिकित्सा, यौगिक चिकित्सा, आहार-विहार आदि। ये सभी वर्तमान में एक पूर्ण स्थायी चिकित्सा के रूप में उभर चुकी है। क्योंकि धीरे-धीरे ही सही पर लोग प्राकृतिक नियमो को समझने लगे है। प्रकृति के साथ चलना, प्रकृति को मानना, स्वंय के स्वास्थ्य की रक्षा करना ही है।  

एक्यूप्रेशर देने की विधियां

विभिन्न प्रतिबिम्ब बिन्दुओं पर कितना प्रेशर दिया जाय यह उस अंग और रोगी की सहनशक्ति पर निर्भर करता है, प्रेशर देने की कई विधि है। जैसे-
  1. हल्का दबाव-नाजुक जगहो पर एक अंगुली या अंगूठे से बिल्कुल हल्का दबाव देना चाहिये।
  2. दो अंगुलियों का दबाव-एक अंगुली के ऊपर दूसरी अंगुली रखकर फिर दोनों अंगुलियों से दबाया जाता है।
  3. हथेली का दबाव-शरीर के किसी अंग विशेष पर एक हथेली से या दोनो हथेली से दबाव दिया जाता है।
  4. रोटेटिंग-अर्थात अंगूठे या जिम्मी से एक दिशा में घुमाते हुए दबाव देना।
  5. पुश एण्ड पुल-किसी बिन्दु पर दबाव देना व छोड़ना, इसी क्रिया को दोहराना। 
  6. रबिंग -किसी बिन्दु पर घिसते हुए दबाव देना।
विधि के अन्र्तगत इन सब बातों को जानना आवश्यक है कि बिन्दुओं को पहचाना कैसे जाय, उन बिन्दुओं पर दबाव कितना दिया जाय देने से पहले व प्रेशर देने के बाद क्या किया जाय आदि। इसके अन्र्तगत कुछ मुख्य बाते मुख्य हैं।
  1. प्रत्येक एक्यू बिन्दु पर एक समान दबाव दें। जितना रोगी सहन कर सकें। 
  2. दिन मे दो-तीन बार संबंधित बिन्दुओं पर दबाव देना चाहियें।  
  3. दबाव देते समय यदि एक्यू बिन्दु के आस-पास सूजन या लाली दिखाई पड़े जो अनावश्यक दबाव देना छोड़ दे।
  4. दबाते समय अंगूठे को स्थिर रखते हुए थोड़ा घुमाव रखना चाहियें। 
  5. ध्यान रखें, एक बिन्दु पर तब तक दबाव दें जब तक वहा पर थोड़ा दर्द का अनुभव न हों। 
  6. ध्यान रखें, फिर दबाव तब तक बनाये रखें, जब तक पीड़ा समाप्त न हो जाय, उस स्थान पर पीड़ा समाप्त होने का अर्थ है रोग का समाप्त हो जाना। 
  7. यदि रोज दबाव न दिया जाय तो एक दिन छोड़कार भी दबाव दिया जा सकता है। 
  8. किसी भी स्थान पर अधिक देर तक या बार-बार प्रेशर देना उचित नहीं है किसी पीड़ा या रोग को ठीक करने के लिए प्रयास, व उत्साह आवश्यक है लेकिन अतिरिक्त उत्साह दिखाना उचित नही है।
  9.  ह्रदय से सम्बन्धित एक्यू बिंदु सिर्फ बाई ओर स्थित होते है।
  10.  समान्यत: 7-10 सेकेण्ड तक दबाव देना पर्याप्त देना होता है। इतनी देर दबाव से स्वचलित तंत्रिका तंत्र उत्त्ोजित हो जाता है। अनुभवी उपचारक इस समय सीमा को अपने अनुभव के आधार पर भी निश्चित कर सकता है। 7-10 सेकेण्ड के दबाव को कई बार दे सकते है जिसका समय 10 से 15 मिनट, प्रतिदिन प्रात:, सांय या आवश्यकतानुसार दोपहर में भी दे सकते हैं। 
  11. अंगूठे या हथेली से दबाव देने के अतिरिक्त रगड़ लगाकर अर्थात हल्की मालिश विधि से भी यह किया जा सकता है। इसमें सर्वप्रथम प्रभावित प्रतिबिम्ब केन्द्र पर आगे-पीछे, अंगूठे-अंगुली, हथेली आदि से रगड़ा जाता है। पांवो के तलवों को भी दोनो हथेली से रगड़ा जाता है। इससे प्रतिबिम्ब केन्द्र उत्त्ोजित हो जाते है इसके बाद दबाव देने से उस प्राण प्रवाह के मार्ग में आई हुई बांधा दूर हो जाती है। ताप्पयर्ं यह है कि उस अंग विशेष से सम्बद्ध रोग दूर हो जाता है। 
  12. कभी-कभी एक्यूप्रेशर बिन्दुओं को दबाने के बदले यदि हल्के से पकड़कर खीचें या हिलाये तो यह भी उपचार की एक विधि है इसमं रोग से सम्बनिधत क्षेत्र को दो अंगुली से पकड़कर कम्पन देते हुए हिलाते है मांस-पेशियों को गोलाई से घुमाते है।
  13. एक विधि के अनुसार एक्यूप्रेशर देने के पूर्व एक्यू बिंदु पर थोड़ा टेलकम पाउडर छिड़क लिया जाय तो उस स्थान पर अच्छा दबाव दिया जा सकता है। पाउडर डालने से उस स्थान की त्वचा को नुकसान नही होता। 
  14. एक्यूप्रेशर उपचार को किसी खुले, साफ व हवादार कमरे में करें।

1. एक्यूप्रेशर उपचार मे प्रयुक्त विभिन्न उपकरण-

एक्यूप्रेशर चिकित्सा देते समय चिकित्सक को कुछ उपकरणों की आवश्यकता होती है। इन उपकरणों के द्वारा रोगी, सीखकर, समझकर स्वंय भी लाभ ले सकता है। वर्तमान में ये सभी उपकरण बाजार में उपलब्ध है। कुछ मुख्य-मुख्य उपकरण इस प्रकार है-
  1. हाथ -पैरो में प्रेशर देने के लिए रबर, लकड़ी या प्लास्टिक के उपकरण। ये देखने में पैन, पैन्सिल की तरह होते है, इन्हें जिम्मी कहते है।  
  2. खेलने वाली गेंद के समान एक उपकरण होता है यह गोल होने के साथ-साथ कई कोनो वाला होता है। जब इसे इथेली मे गोल-गोल घुमाते है तो इसका प्रभाव जादू की तरह होता है, अर्थात एक साथ कई दोष दूर हो सकते है, क्योंकि इसके कई कोनो से एक साथ कई प्रेशर बिन्दु दुखते है, इसे एक्यूप्रेशर मैजिक मशाजर कहते है
  3. रोटी बेलने वाले रोलर की भांति धारीदार कई कोनों वाला भी एक उपकरण होता है। जिसे कुसी, चारपाई या कही भी ऊॅचे स्थान पर बैठकर हाथ आरामदायक स्थिति में रखकर दोनों पैरो के तलवों पर इसे रखकर आगे-पीछे घुमाया जाता है, इसे फुटरोलर कहते है। 
  4. इनके अतिरिक्त अंगूठी नुमा, फिंगर रोलर, कपड़े सुखाने की पिन, (अंगूलियों के लिए) तथा विभिन्न आकृति के एक्यूप्रेशर मैट, एक्यूप्रेशर कार सीट, एक्यूप्रेशर सौन्डिल, एक्यूप्रेशर सू सोल, रीठ की हड्डी के लिए (स्पाइनल केयर मशाजर) आदि उपकरण प्रयोग मे लाये जाते है। एक्यूप्रेशर छलला ऐक्यूप्रेशर सीट एक्यूप्रेशर मैट फुट रोलर एक्यूप्रेशर चप्पल एक्यूप्रेशर मैजिक बॉंल मसाजर

2. एक्यूप्रेशर उपचाकर्ता के गुण एवं उपचार प्रतिक्रियाए-

एक्यूप्रेशर के द्वारा उपचार करने वाला व्यक्ति भी चिकित्सक ही होता है, जो भी व्यक्ति उपचार के लिए आते है, वे उसे कुशल चिकित्सा के रूप मे उस उपचारकर्ता के कुछ गुण होने आवश्यक है- जैसे-
  1. उपचारकर्ता अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार होना चाहियें। 
  2. उपचारकर्ता सेवाभावी व संतोशी होना चाहियें। 
  3. उपचाकर्ता को शरीर क्रिया विज्ञान का पूर्ण ज्ञान होना चाहिये। 
  4. विभिन्न रोगो में उपचार देने हेतु वह कुशल होना चाहिये।  
  5. उपचारकर्ता सरल स्वभाव का होना चाहिये।
  6. सबसे मुख्य गुण व समय का पाबंद होना चाहिये। 
  7. वह अपने रोगियों के प्रति सकारात्मक सोच रखता है। उन्हे हिम्मत बधाता हो कि वे शीघ्र दी लाभ को प्राप्त करेगे। 
  8. उपचारकर्ता के मन में द्वैश भावना न हो। 
  9. उपचार देते समय वह अच्छे, बुरे सम्बन्धों को प्राथमिकता न दे, अपितु सभी के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार करें। 
  10. उपचारकर्ता मुख्यत: स्वंय के प्रति दृढ़निश्चयी, कर्तत्यनिश्ठ व अनुशासित हो।
प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के अन्र्तगत जब कोई भी व्यक्ति, किसी भी प्रकार की उपचारात्मक चिकित्सा लेता है। तो उस समय शरीर के विजातीय द्वव्य बाह्र निकलते है या निकलने का प्रयास कर रहे होते है। उस समय हो रही प्रतिक्रियाओं से घबराना नही चाहियें। उस समय उपचार कर्ता पर पूरा विश्वास रखना चाहिये धौर्य नही खोना चाहिये। ये प्रतिक्रियात्मक लक्षण हो सकते हैं- जैसे-
  1. उपचार के समय शरीर सहज होने के कारण नींद आने लगती हैं। 
  2. ऑतो से उत्सर्जी पदार्थो का निष्कासन होता है।
  3. स्त्रियों में उपचार के समय श्वेतप्रद जैसा स्त्राव होने लगता है।
  4. उपचार के समय उत्सर्जी तत्व फोड़े-फुन्सी, दानें जैसे बनकर उभरते हैं। 
  5. उपचार के दौरान रोगी शांत व गहरी निद्रा में सो जाता है। 
  6. कभी-कभी रोगी अपने आंसुओ के माध्यम से प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। उसका आंसुओं को रोकना लगभग असंभव है। 
  7. कभी-कभी रोगी अपनी बिमारियों के उपचार के दौरान बिस्तृत व्याख्या करने लगते हैं। 
  8. परिणाम स्वरूप यूरिन की मात्रा बढ़ जाती है। 
  9. कभी-कभी दस्त जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है।
  10. छीक आने लगती है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा की सीमाएं

कभी-कभी कुछ परिस्थितियॉं ऐसी भी उत्पन्न हो जाती है कि रोगी का उपचार मात्र एक्यूप्रेशर द्वारा संभव नही हो पाता। इसलिए कुछ सीमांए है नियम है जिनको ध्यान में रखना आवश्यक है-
  1. यदि रोगी जीर्ण स्थिति में है लम्बे समय से बिमार चल रहा है तथा गंभीर व जटिल रोगों से घिरा है तो एक्यूप्रेशर उपचार से पूर्ण लाभ नही हो सकता। 
  2. केंसर, मोतियाबिंद, ट्यूमर, स्नायुओं की सूजन, पुराने गठिया ऐसे रोगों में भी एक्यूप्रेशर पूरा-पूरा लाभ नही दे पाता ऐसे में रोगी को पूर्ण वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति का ही सहारा लेना चाहियें। 
  3. गर्भवती महिला को भी यह उपचार नही देना चाहियें। 
  4. यदि दबाव देने के स्थान पर घाव है, मस्सा है, सूजन या त्वचा जलकर झुर्रीदार हो गई है तो उस रागी का उपचार नही करना चाहियें।
  5. पसीने से भीगा हुआ, दिल की धड़कन तेज होने, खाली पेट होने, या कोई दवा लेने के बाद या टूटी हड्डी वाले स्थान पर एक्यूप्रेशर पद्धति से उपचार नही करना चाहियें।
  6. संक्रामक रोग में भी यह पद्धति कार्य नही करती।
  7. एक्यूप्रेशर उपचार को इस बात का ज्ञान होना चाहिये कि उसे रोगी व्यक्ति को दबाव कब, कहॉं और कैसे देना है।
  8. रोग की सही दिशा व दशा व उससे सम्बन्धित एक्यू बिन्दुओं की सर्वप्रथम खोज करें, फिर दबाव देना प्रारम्भ करें।
  9. रोगी व्यक्ति में इस चिकित्सा पद्धति के प्रति विश्वास जगायें।
  10. प्रेशर देने के बाद दबाव छोड़ते समय हल्का झटका देते हुए उसे छोड़ना चाहिये।
  11. यदि किसी व्यक्ति का आपरेशन हुआ है तो चिकित्सक से पूछने के बाद 2 या 3 माह बाद ही एक्यूप्रेशर चिकित्सा दे सकते है।
  12. जो व्यक्ति रोगी है उसे भी कुछ नियम व सावधानी का ध्यान रखना आवश्यक है अन्यथा चिकित्सक की मेहनत का कोई लाभ नही होगा।
  13. इस उपचार पद्धति में रोगी व्यक्ति को शराब पीना सख्त मना है।
  14. गरम मसाले एंव चटपटे पदार्थ तथा उत्तेजित करने वाली वस्तुओं का सेवन उपचार के दौरान नही करना चाहिये।
  15. खट्टी खाद्य चीजों का सेवन भी वर्जित है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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