एक्यूप्रेशर का अर्थ, परिभाषा एवं महत्व

अनुक्रम
अंगुलियों या किसी कृन्द (तीखी) वस्तु द्वारा किसी बिन्दु पर उपचार देने की पद्धति को एक्यूप्रेशर कहते है, इसमें किसी विशेष स्थान पर पे्रशर देकर चिकित्सा की जाती है, प्रेशर देने से अवरूद्ध चेतना संचार होने लगता है।

एक्यूप्रेशर का अर्थ 

एक्यूप्रेशर दो शब्दों से मिलकर बना है, ACUS+PRESSURE- जिसमें ACUS लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है सुई प्रेशर PRESSURE अंग्रेजी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है दबाव डालना, अर्थात सुई समान किसी नुकीली चील से रोग प्रतिबिम्ब केन्द्र पर दबाव डालना। यह एक प्राकृतिक क्रिया है, इसे हम इस उदाहरण के आधार पर दर्शा सकते है कि जैसे जब किसी स्थान पर दर्द या परेशानी होती है तो अपने आप हमारा हाथ उस स्थान को दबाने लगता है और हम कुछ राहत भी महसूस करने है, इस एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका प्रभाव चमत्कारी होता है वर्शों पुराने रोग भी दिनों में दूर हो जाते है।

एक्यूप्रेशर की परिभाषा

एक्यूप्रेशर चिकित्सा वह पद्धति है जिससे पैरो, हाथों व चहेरे के कुछ खास केन्द्रो पर दबाव डाला जाता है इन केन्द्रो को Respopnse Center या Reflex Center भी कहते है हिन्दी में इसे प्रतिबिम्ब केन्द्र कहते है। रोग की अवस्था में इन केन्द्रो पर जब प्रेशर देते है तो वहा पर बहुत तेज दर्द होता है। तब वहा पर दबाव देने से शरीर में रोग की प्रतिक्रिया शक्ति जागृत होती है, जिससे रोग दूर होता है।

एक्यूप्रेशर तथा मुद्राओं का महत्व

यह एक्यूप्रेशर पद्धति अति-प्राचीन है, तथा भारतीय संस्कृति की ही देन है, क्योंकि इसका व्यापक वर्णन आयुर्वेद ग्रंथो में किया गया है। आयुर्वेद ने इन दबाव बिन्दुओं को मर्म की संज्ञा दी है तथा एक्यू-पंचर को शुचि-भेदक के नाम से वर्णित किया गया है।

हमारा जो यह साधारण दिखने वाला शरीर है यह मात्र हांड-मांस का बना नही है। इसके भीतर जो शक्ति कार्य करती है ,वह प्राणरूपी जीवनी शक्ति है इसे चीनी भाषा मे ची करते है उनके अनुसार इस ची नामक शक्ति में दो प्रकार के बल होते है। यिंग और यांग, यिंग ऋणात्मक बल है, और यांग धनात्मक बल है मुनश्य पूर्ण स्वस्थ्य रहता है जब ये दोनों बल अंसतुलित होते है तो वह असंतुलन रोग उत्पन्न करता है ये दोनों प्रकार के यिंग और यांग नामक जो बल है वे शरीर के भिन्न मार्गो से होकर जाती है ये दोनों शक्तियां शरीर के जिन-जिन मार्गों से होकर जाती है उन्हे एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति में मेरिडियन के नाम से जाना जाता है।

यदि हम आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से शरीर को समझे, तो भी यह बात स्पश्ट होती है कि जो पूरे शरीर में रक्त संचार, स्नायु संस्थान की सभी छोटी-बड़ी नस-नाड़ियां है। उनके अन्तिम सिरे हाथ और पैर के तलवे में ही होते है। ये अन्तिम सिरे शरीर में फैले किसी न किसी नस या नाड़ी से सम्बद्ध होते है। जब उनसे सम्बन्धित कोई विकार उत्पन्न होता है तो इन्ही अन्तिम सिरों पर दबाव अर्थात प्रेशर डालकर उस सम्बन्धित रोग का या पीड़ा का निदान किया जाता है।

यही बाते एक्यूप्रेशर के विशेष महत्व को बताती हैं कि बिना किसी औशधी के तथा न ही अनावश्यक धन खर्च करके, न समय बरबाद करके न ही मंहगी-मंहगी जॉच कराके चिकित्सा होती है। बल्कि मात्र हाथ की हथेली व पैर के तलवों में विशेष एक्यू बिन्दु को देखकर ही कुशल एक्यूप्रेशर चिकित्सक अपने रोगी को चिकित्सा करता है। इसके लिए रोगी व्यक्ति को कुछ भी परेशानी नही होती क्योंकि इसमें कष्टकारी किसी भी प्रक्रिया से उसे नही गुजरना पड़ता है यह महत्व उस समय और भी बढ़ जाता है जब रोगी व्यक्ति इस उपचार प्रकिया के बारे में पूर्ण आवश्स्त होता है। धौर्यवान होता है तथा वह हर समय अपने बारे में व दूसरों के बारे में सकरात्मक सोच रखता है विश्वासी व्यक्ति हर क्षेत्र में विजयी होता हैं। प्राचीन समय में हर महिला इसके महत्व को जानती थी, वह स्वयं की तथा बच्चों की चिकित्सा अपने इसी ज्ञान के आधार पर कर लेती थी वर्तमान की चिकित्सा पद्धति इतनी मंहगी है कि सामान्य वर्ग के लिए उसे अपनाना कठिन हो जाता है, ऐसे में इस चिकित्सा पद्धति की महत्ता और भी बड़ जाती है, क्योंकि इससे ना तो कोई प्रति प्रभाव ही पड़ता है, न ही धन व समय की हानि, इसे स्वंय सीख कर स्वंय को परिवार को तथा अन्य लोगों को स्वास्थ्य लाभ दिया जा सकता है।

एक्यूप्रेशर तथा मुद्राए

तत्व - प्रभावित अंग
  1. अग्नि - हृदय - छोटी ऑत 
  2. वायु - फेफड़े - बड़ी ऑत 
  3. आकाश - यकृत - पित्ताशय 
  4. पृथ्वी - आमाशय - प्लीहा 
  5. जल - वृक्क - मूत्राशय 
योग में मुद्राए करते समय कुछ विशेष अंगो पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है, तथा जो सम्पूर्ण शरीर का सही संतुलन बनाने में सहायक है तथा रोग सम्बन्धी स्थान में हल्का एक्यूप्रेशर देने से उस स्थान के सभी रोग व बीमारियां समाप्त हो जाती है।

मुद्राओं के प्रकार

1. ज्ञान मुद्रा 2. आकाश मुद्रा 3. पृथ्वी मुद्रा 4. वरूण मुद्रा 5. वायु मुद्रा 6. शून्य मुद्रा 7. सूर्य मुद्रा 8. प्राण मुद्रा 9. अपान मुद्रा 10. अपान वायु मुद्रा 11. लिंग मुद्रा 12. शंख मुद्रा ।

ज्ञान-मुद्रा-

हाथ की तर्जनी अंगुली (अंगूठे के पास) के अग्र भाग को अंगूठे के आगे के भाग से मिलाकर रखना चाहिए तथा अन्य अंगुलियॉं सीधी व सामान्य रहना चाहिए। लाभ-  इस मुद्रा द्वारा पिय्यूटरी, पीनियल व मस्तिष्क के बिन्दुओ पर दबाव उत्पन्न होता है। ऊर्जा का संचार तेजी से होता है और समस्त रोग इत्यादि व्याधियॉं दूर हो जाती है। बीमारियॉं - सिर दर्द, अनिद्रा, के रोग जैसे अस्थमा, उच्च रक्तचाप, पेट, छाती, माइग्रेन आदि रोगो का सामाधान होता है।
ज्ञान-मुद्रा

आकाश-मुद्रा-

मध्यमा को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाने पर यह मुद्रा बनती है। अन्य अंगुलियॉं सहज, सीधी व सामान्य अवस्था में होनी चाहिए तथा रीढ़ की हड्डी एंव गर्दन, सीधी होनी चाहिए। आकाश मुद्रा से आकाश तत्व का संतुलन बना रहता है। लाभ - यह मुद्रा शरीर के विभिन्न अंगो की बीमारियों को दूर करती है यह विशेष रूप से कमर से ऊपरी भाग के सभी अंगो की बीमारियों से मुक्ति पाने का सही मार्ग है। बीमारियॉं - तेज धड़कन थकान होना, हड्डी टूट जाना या हड्डियों का दर्द, हिचकी, उल्टी आना, कानों का दर्द, हृदय के रोग, कलाइयों का दर्द एंव सभी रोग जैसे मोच इत्यादि।

आकाश-मुद्रा

पृथ्वी मुद्रा - 

अनामिका के अग्र भाग को एवं अंगूठे के अग्र भाग को मिलाने से ही पृथ्वी मुद्रा बनाई जाती है। इस मुद्रा को करने से शरीर में पृथ्वी तत्व संतुलित होता है। लाभ - पृथ्वी मुद्रा द्वारा मस्तिष्क, पिय्यूटरी व पीनियल आदि अंग प्रभावित होते है। बीमारियॉं - पीठ दर्द, सीने का दर्द व शरीर गत अधिकतर व्याधियों आदि इसके द्वारा प्रभावित होते है।

पृथ्वी मुद्रा

वरूण मुद्रा - 

कनिश्टिका के अग्र भाग को अंगूठे के अग्र भाग से मिलाने पर वरूण मुद्रा बनती है। इस मुद्रा से जल तत्व का संतुलन होता है। बीमारियॉं - रक्त की अशुद्धता, त्वचा के रोग जैसे मुहासे, एलर्जी व सभी रोग, शरीर में पानी की कमी, रक्त की प्रवाह में आई अनियमिततां आदि।

वरूण मुद्रा

वायु मुद्रा - 

तर्जनी को मोड़कर अंगूठे की जड़ मे लगाकर उसे अंगूठे से दबाने पर वायु मुद्रा बनती है। इस मुद्रा को करने से शरीर मे वायु तत्व संतुलित होता है। बीमारियॉं - गठिया रोग, वात, सर्दी, ज्वर शरीर के ऊपरी अंगो के सभी रोग व दर्द इत्यादि।

वायु मुद्रा

शून्य मुद्रा -  

मध्यमा अंगुली को अंगूठे की गद्दी पर शून्य मुद्रा बनती है। आकाश तत्व यदि बढ़ जाए तो इस मुद्रा के अभ्यास द्वारा उसे नियन्त्रित किया जाता है। रोग - कान दर्द, कलाई के सभी बिन्दु व यह शरीर के बढ़ते अभवा कम होते तापमान के लिए। प्रभावित अंग -  कान तथा मस्तिष्क के सभी भागों पर इस मुद्रा का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

सूर्य मुद्रा - 

अनामिका अंगुली को अंगूठे की जड़ में लगाने पर तथा हल्का दबाव देने पर सूर्य मुद्रा बनती है। विशेष - इस मुद्रा को बज्रासन मे करने से अधिक लाभ होता है। बीमारियॉं - थाइराइड रोगो से सम्बन्धित सभी रोग इससे ठीक हो जाते है। लाभ- वनज पर प्रभाव (ऋणात्मक), पीठ का दर्द, व अनिद्रा, तनाव से मुक्ति मिलती है।

सूर्य मुद्रा

प्राण मुद्रा - 

कनिश्ठिका व अनामिका के सिरों को अंगूठे से मिलाने पर प्राण मुद्रा बनती है। विशेष -  इस मुद्रा से प्राण शक्ति तीव्रता से बढ़ती है रक्त संचार से लाभदायक है व इससे अनिद्रा व थकान दूर होती है। लाभ - इस मुद्रा से विशेष लाभ बड़ी ऑत व हृदय को मिलता है। बीमारियॉं -  ऑखों के सभी रोग, थकान, अनिद्रा, हृदय के रोग, कोहनी दर्द, गर्दन का दर्द व निश्क्रियता व सुस्ती आदि बीमारियों में प्राण मुद्रा से लाभ प्राप्त होता है।

प्राण मुद्रा

अपान मुद्रा - 

मध्यमा व अनामिका के अग्रभाग को अंगूठे से मिलाने पर अपान मुद्रा बनती है। अन्य अंगुलियॉं सीधी व सहज रहती है। लाभ -इस मुद्रा को करने से शरीर की उत्सर्जन क्रिया व्यवस्थित रहती है एंव प्राण व अपान वायु की स्थिति सम रहती है। बीमारियॉं -  गैस की समस्या, कब्ज, पाईल्स का रोग, पेट की सभी समस्याएॅ, सिर दर्द, बदन दर्द आदि इस मुद्रा द्वारा दूर होते है।

अपान मुद्रा

अपान वायु मुद्रा-  

तर्जनी अंगुली को अंगूठे की जड़ मे लाकर व अंगूठे के सिरे को मध्यमा व अनामिका अंगुलियों से स्पर्श करने पर अपान वायु मुद्रा बनती है। लाभ-  मस्तिष्क, पिय्यूटरी व पीनियल ग्रन्थि व हृदय पर इस मुद्रा का विशेष प्रभाव पड़ता है। बीमारियॉं-  इस रोग, गैस, थकान, सिर दर्द, रक्तचाप व अनिद्रा आदि मे विशेष लाभ कारी मुद्रा।

अपान वायु मुद्रा

लिंग मुद्रा - 

दोनो हाथों की अंगुलियों को आपस से फॅंसाकर अंगूठे को सीधा रखने पर (कोई एक अंगूठा सीधे) लिंग मुद्रा बनती है। लाभ-  शरीर मे गर्मी व ऊर्जा मे बढ़ोत्तरी छोटी ऑंत व बड़ी ऑंत पर इस मुद्रा का विशेष लाभ पहुॅचता है। बीमारियॉं- मोटापा, शरीर का दर्द, सर्दी, खॉसी, बहरापन, थकान, अनिद्रा व कब्ज मे उपयोगी मुद्रा ही लिंग मुद्रा है।

लिंग मुद्रा

शंख मुद्रा -  

हाथ के अंगूठे को दाये हाथ की मुट्ठी में बंद करके, बायें हाथ की तर्जनी अंगुलि को दायें हाथ के अंगूठे से शंख मुद्रा बनती है। लाभ -  पिय्यूट्री व पीनियल, हृदय, बड़ी ऑंत आदि पर विशेष लाभ। बीमारियॉं -  थाइराइड ग्रन्थि के रोग, घबराहट, सास लेने मे परेशानी, शरीर का दर्द, कोहनी का दर्द, ऑत के सभी रोग व पेट के सभी रोग में शंख मुद्रा का विशेष स्थान है।

एक्यूप्रेशर का इतिहास

प्राचीन काल से ले कर आज तक शरीर के अनेक रोगों तथा विकारों को दूर करने के लिए जितनी चिकित्सा पद्धति प्रचलित हुई है उनमे एक्यूप्रेशर सबसे पुरानी पद्धति है, विभिन्न देशों में इसे अलग-2 नाम दिये गये है अर्थ और परिभाषा के अध्यन से आप जान गये है कि यह एक पूर्ण प्राकृतिक पद्धति हैं। एक्यूप्रेशर पद्धति कितनी पुरानी है तथ किस देश मे इस का अविश्कार हुआ इस बारे मे अलग-अलग विचार है, ऐसा माना जाता है कि 6000 वर्ष पूर्व भारत में इस का जन्म हुआ, आयुर्वेद मे भी इस पद्धति का वर्णन मिलता है।

जिस प्रकार हम देखते है कि आज विदेशी पर्यटक भारत भ्रमण पर आते रहते है और यहां कि कई चीजों से प्रेरित होकर उसे अपनाते है। ठीक इसी प्रकार चीनी यात्री भारत भ्रमण पे आये और इस पद्धति को अपने साथ अपने देश ले गये, और वहां पर इसका खूव प्रचार-प्रसार किया, तब चीन के चिकित्सकों ने इस पद्धति के आश्र्चयजनक प्रभाव को देखते हुए इसे व्यापक तैर पर अपनाया और इस पद्धति के लिए काफी प्रयास किया इसी कारण यह चीनी चिकित्सा पद्धति के नाम से प्रसिद्ध है, समय के साथ-साथ जब इस पद्धति का चीन में काफी प्रचार-प्रसार हो गया तब तक यह पद्धति भारत में लुप्त हो चुकी थी, इसके लुप्त होने के कारण थे कि इस पद्धति को जो कि सर्वसामान्य जनता के लिए सुलभ थी, उसे सरकारी मान्यता नही मिली न ही इस चिकित्सा पद्धति को सरकार की ओर से भी कोई बढ़ावा मिला, साथ-साथ इसका कारण यह भी रहा कि बदलते परिवेश में लोगों के सामाजिक राजनैतिक, व धार्मिक जीवन में परिवर्तन भी हुए।

कुछ नया पाने की चाह में जब हम पुरानी बातो, या चीजो को पीछे छोड़ देते है तो हमें स्वयं के दुखों का सामना भी करना पड़ता है। कई प्रमाणित ग्रंथो का अध्ययन करने से पता चलता है कि सभी प्रसिद्ध विद्वानों की एक राय है। इन सबका मानना है कि एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति आज से 3000 वर्ष पहले भारतवर्ष में आयुर्वेद के उत्थान के समय उत्पन्न हुई थी। सुश्रुत-संहिता में शरीर के भीतर अनेक ऐसे बिन्दुओं का वर्णन है जिनमें प्रेशर देने से रोगों का निवारण किया जा सकता हैं। एक्यूप्रेशर विशेषज्ञ मानते है कि प्राचीन भारत में यह बहुत विकसित थी कई स्थानों में वर्णन है कि भगवान बुद्ध के चिकित्सक ‘‘जिवक’’ हाथो से दबाव से रोगियों की चिकित्सा करते थे। बाद मे जब मौर्य-वंश का साम्राज्य आया तब उस समय यह विद्या बौद्ध-भिक्षुकों द्वारा अपनाई गई और इसका स्वरुप बदल गया तब 9वीं सदी के अन्त में इसे डा0 फ्रिट्ज जेराल्ड ने पुर्नजीवित किया। डा0 फ्रिट्ज जेराल्ड (क्तण् ॅपससपंउ थ्तपज्रहमतंसक) ये एक अमेरिकी चिकित्सक है, तथा इन्हे ही आधुनिक युग मे एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति को उजागर करने का श्रेय दिया जाता है। इन्होने अपने एक लेख में बताया है कि मनुष्य शरीर एक मशीन की तरह है। इस मशीन रूपी शरीर में कई संवेदनशील भाग हैं। जैसे- मस्तिष्क, पाचनतन्त्र, ऑंख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, तंत्रिकातंत्र, रक्तसंस्थान, गुर्दे, फेफड़े आदि। ये सभी अंग, प्रत्यंग, संस्थान, अलग-अलग रहकर भी एक शरीर में एक साथ मिलकर काम करते है यह प्रकृति का चमत्कार ही है जैसे एक सफल मशीन में कई तरह के कलपुर्जे मिलकर एक विशेष कार्य को सम्पन्न करते है। लेकिन यदि कभी भाग में खराबी आ जाती है तो उस भाग से सम्बद्ध अद्श्य बटन को दबाने से मशीन का काम पुन: प्रारम्भ हो जाता है। ठीक उसी प्रकार शरीर के अन्तरिक अंगो से सम्बद्ध हाथ, पैर, चेहरे व कई अन्य स्थानों पर इनके अदृश्य स्विच (बटन) बिन्दु होते है। उन बिन्दुओं पर दबाव डालकर, अर्थात पे्रशर देकर, उससे सम्बन्धित अंग में उत्तेजना, गर्मी, चेतना, प्राण आदि भेजी जाती है। जिसके फलस्वरुप वहा का अवरोध हट जाता है वह अंग स्थान पुन: क्रियाशील हो जाता है। तब वहा पर स्वास्थ्य रक्त संचार व प्राण संचार पुन: होने लगता है। एक्यूप्रेशर उपचार पद्धति-प्रकृति प्रदन्त विज्ञान है। हमारे ऋशि-मुनि, गृहस्थ आदि सभी समय-समय पर इसका उपयोग करते आये है। यह मानव शरीर प्रकृति की ओर से एक दोशरहित मशीन है। यदि प्रकृति के अनुसार भोजन, श्रम और विश्राम में सन्तुलन न बनाया जाय, या प्राकृतिक नियमों का न माना जाय, तब उस स्थिति में विशैले तत्वों का संग्रह प्रारम्भ हो जाता है। इसके फलस्वरुप शारीरिक क्रियाओं पर प्रभाव पड़ता है। शरीर में विजातिय तत्वों का संग्रह ही रोग कहलाता है।

आज भी अनेको आभूशण, वस्त्र, घर में किये जाने वाले कार्य, तथा श्रमशील कार्य एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के ही रुप है। हाथों मे कंगन, चूड़ी, घड़ी तथा पैरों में पायल, झांझर, गले मे हार, चेन तथा छोटे-छोटे बच्चों के गले में व कमर में काला धागा पहनाना, कान में जनेऊ, हाथ में कलावा बांधना, कपड़े धोना, कुॅए से पानी निकालना, रोटी बनाना, आटा गूथना, बिंदी लगाना, तिलक लगाना, कर्ण छेदन करना,ये सभी कहीं न कहीं एक्यूप्रेशर चिकित्सा के ही तथ्य है।

भारत से लंका, चीन, जापान आदि देशों में बौद्ध भिक्षु इस ज्ञान को लेकर गये कहीं-कहीं उल्लेख मिलता है कि छटी शताब्दी में बौद्ध भिक्षुओं ने इस ज्ञान को जापान पहुचाया, जापान में यह पद्धति ‘‘शिआस्तु’’ के नाम से जानी पहचानी गई। वहां पर इसे पूर्ण मान्यता प्राप्त हुई इसके कई संस्थान स्थापित किये गये इसकी लोकप्रियता का प्रमुख कारण यहा रहा कि इस पद्धति के प्रति लोगो की पूर्ण सजगता ‘‘शिआस्तु’’ में शि का अर्थ है अंगुली और ‘आत्सु’’ का अर्थ है दबाव।

सिद्धान्ता के अन्र्तगत- एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति में शरीर को 10 भागो में बांटा हैं जिसे जोनोलाजी कहा गया है। शरीर के निदिश्ट जोन में दबाव देकर रोग को दूर भगाना जोनेथैरपी के नाम से जाना जाता है। बांए हाथ की अंगुलियो हथेलियों पर दाब देकर शरीर के बांए भाग की चिकित्सा की जाती है तथा इसी प्रकार दाहिने हाथ पर दबाव देकर शरीर के दाहिने भाग की चिकित्सा की जाती है, तब रोग की पहचान व उपचार पैर के तलवों द्वारा किया जाता है तो यह पद्धति ‘‘फुट रिफ्लेक्सोलॉजी’’ के नाम से जानी जाती है। तथा जब शरीर में स्थित दाब-बिन्दुओं के माध्यम से जब उपचार किया जाता है तब इसे शिआत्सु कहते हैं

एक्यूप्रेशर-प्राचीन चिकित्सा पद्धति -

वर्तमान में जब हम देखते है कि नई-नई चीजों का अविष्कार हो चुका है ऐसे में हर परेशानी का इलाज हो जाता है तब साधारण जन यही समझते है कि विज्ञान ने चमत्कार किया है, जबकि ये चमत्कार पुरातन पद्धतियों की ही देन है बस थोड़ा-बहुत उनके स्वरूप को बदल दिया गया है। प्राचीन समय से लेकर आज तक शरीर के कई रोगों व विकारों को दूर करने के लिए जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां प्रचलित हुई है उनमें से एक्यूप्रेशर सबसे अधिक प्रभावशाली पद्धति है व पूर्ण रूप से प्राकृतिक है प्राचीन ऐतिहासिक सभ्यता से पता चलता है कि क्षत्रीय पुरूष कई प्रकार के आभूशण धारण करते थे उन आभूषणों से जो उस विशेष स्थान पर दबाव पड़ता है वह शरीर के अंग विशेष को प्रभावित करता है। यद वद विधि है जिसमें बिना आपरेशन के रोग निवारण की शक्ति है इसके चमत्कारी प्रभाव को देखते हुए विदेशों में यह काफी प्रचलित एवं लोकप्रिय हो रही है।

इस शरीर रूपी मशीन में भी कई कल पुजे है जिन्हें अंग-अवयव कहा जाता है, जब इन अंग-अवयव रूपी कार्य-प्रणाली प्रभावित होती है तो कई रोग उत्पन्न हो जाते है उन रोगो को दूर करने के लिए मनुष्य ने सबसे पहले जो पद्धति अपनाई वह पद्धति एक्यूप्रेशर चिकित्सा ही है।

आज जब भारतवर्ष में यह पद्धति लगभग खो सी रही है तो इसके कई कारण भी है जैसे-पश्चिमी सभ्यता का हमारे दैनिक जीवन पर प्रभाव, आध्यात्मिक गुणों का हा्रस तथा सरकारी मान्यताओं का अभाव।

एक्यूप्रेशर का वर्तमान स्वरूप -

सभ्य समाज व स्वस्थ नागरिक देश की उन्नति में सहायक है रोग की अवस्था में हम कही न कही अपने परिवार व समाज को प्रभावित करते है, इसलिए अपना स्वास्थ्य बनाये रखना ही सब सामाजिक सद्गुणों का आधार है।

इसलिए आज जब हर व्यक्ति तर्क व तथ्यों पर विश्वास करता है तो वह महंगी दवाइयों के प्रतिप्रभाव को भी समझने लगा है जिससे धन, समय की बर्बादी ही होती है तब ऐसे में वह पद्धति जिससे समय बचता है, किसी भी प्रकार का दुश्परिणाम नही होता, तो उसे सभी अपनाना चाहते है। आज इसे सरकारी तौर पर बढ़ावा तो नही मिला है लेकिन व्यक्तिगत तौर पर कई स्थानों में इस चिकित्सा के केन्द्र खुल चुके है, जिनमें कुशल चिकित्सों द्वारा एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा रोगो का समाधान किया जा रहा है लोगो को इस चिकित्सा पद्धति के सत्परिणाम भी मिल रहे है। अनुभवी चिकित्सा पूरे शरीर के क्रिया पद्धति को जानकर, समझकर ही चिकित्सा करते है रोग की स्थिति को देखते हुए, रोगी का पूरा-पूरा घ्यान रखा जाता है, साथ-साथ अन्य प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों का सहारा भी लिया जाता है, जैसे मिट्टी  चिकित्सा, जल चिकित्सा, यौगिक चिकित्सा, आहार-विहार आदि। ये सभी वर्तमान में एक पूर्ण स्थायी चिकित्सा के रूप में उभर चुकी है। क्योंकि धीरे-धीरे ही सही पर लोग प्राकृतिक नियमो को समझने लगे है। प्रकृति के साथ चलना, प्रकृति को मानना, स्वंय के स्वास्थ्य की रक्षा करना ही है।

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