दृष्टि बाधित बालक की परिभाषा, विशेषताएं एवं वर्गीकरण

अनुक्रम [छुपाएँ]


नेत्र मानव शरीर का एक प्रमुख ज्ञानेन्द्रिय है, जिसका कार्य किसी वस्तु को देखना है। यदि इनकी कार्यक्षमता अवरूद्ध हो जाये तो पूर्णरूप से निष्क्रिय हो जाये, तो मनुष्य दृष्टि जैसी प्राकृतिक उपहार से वंचित हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति अपने जीवना को निरर्थक समझने लगता है और अपने भाग्य को कोसता है। आज के वैज्ञानिक युग में तीव्रगति से प्रगति करते हुए, मानव ने ऐसे साधन खोजे निकाले हैं, जिनके माध्यम से मनुष्य अपनी ज्ञनेन्द्रियों की गतिशीलता व कार्यक्षमता अर्थात् सुनने, सूंघने, स्वाद लेने और स्पर्श करने की शक्ति को बढ़ाकर जीवन को व्यवस्थित कर सकता है।

नेत्र मनुष्य व सभी जीवों के लिए प्रकृति की एक बहुमूल्य देन है। यह फोटो कैमरे की भांति कार्य करती है। नेत्र में वस्तुओं के वास्तविक प्रतिबिम्ब रेटिना पर बनते हैं। नेत्र का एक विशेष प्रकार का प्रकाशिक यंत्र है। इसका लेंस प्रोटीन से बने पारदश्र्ाी पदार्थ का बना होता है।

नेत्र के भाग -

  1. दृढ़ पटल - मनुष्य का एक खोखले गोले के समान होता है। यह बाहर से एक दृढ़ व अपारदश्र्ाी श्वेत परत के ढका रहता है इस परत को दृढ़ पटल करते हैं। यह नेत्र के भीतरी भागों की सुरक्षा करता है। 
  2. रक्तक पटल - दृढ़ पटल के भीतरी पृष्ठ पर लगी काले रंग की झिल्ली को रक्तक पटल कहते हैं। रक्तक पटल आंख पर आवर्तित होने वाली प्रकाश का शोषण करता है, इसे कोरॉइड भी कहा जाता है।
  3. श्वेत मंडल- यह एक कठोर पारदश्र्ाी गोलीय संरचना होती है, जो आंख में प्रकाश का अपवर्तन करती है। 
  4. परितारिका - कार्निया के पीछे के रंगीन एवं अपारदश्र्ाी झिल्ली का पर्दा होता है, जिसे आइरिस कहते हैं। 
  5. पुतली - आइसिर के बीच में एक छिद्र होता है, जिसे पुतली अथवा नेत्र तारा कहते हैं। यह गोल तथा काली कहते होती है। 
पूर्व काल से ही शारीरिक विकलांगता के क्षेत्र में सर्वाधिक रूप से दृष्टिहीनों को स्वीकारा जाता है, परंतु उनका जीवन समाज में दया, सहानुभूमि व भिक्षावृत्ति पर आश्रित रहा है। तथापित इतिहास ने हमें सूरदास जैसे प्रख्यात भक्ति कवि दिये, जो जन्मान्ध थे। लुर्इ ब्रेल, जिन्होंने चक्षुहीनों को स्पर्श के माध्यम से पढ़ने हेतु सफल विधि देकर अत्ंयत ही बड़ा व सराहनीय कार्य किया। वे स्वयं भी चक्षुहीन थे। आज के समय में चक्षुहीन विभिन्न औद्योगिक प्रशिक्षण ग्रहण करने के अतिरिक्त क्रिकेट व पैराशूट द्वारा वायुयान के कूदने जैसे अदभुत प्रदर्शन करने लगे हैं।

चक्षुहीनता एक सरलतापूर्वक पहचानी जाने वाली विकालंगता है, किंतु इसका अर्थ इसके संदर्भ के साथ परिवर्तन हो जाता है। चक्षुहीनता जीवन के प्रत्येक स्तर पर आंकी जा सकती है, जैसे - स्वार्थान्ध, मदान्ध, पदान्ध इत्यादि।

दृष्टिबाधित बालक की परिभाषा

दृष्टिहीनता के समय-समय पर अलग-अलग दृष्टिकोण से परिभाषित किया गया है। आयुर्विज्ञान में दृष्टिहीनता का तात्पर्य नेत्रों से कुछ भी न देखने की स्थिति है।
  1. शैक्षिक दृष्टि से -“दृष्टिबाधिता एक ऐसा दृष्टि विकास है, जिसके परिणामस्वरूप दृश्य - सामगी के प्रयोग से शिक्षण आशिंक रूप से भी संभव न हो सके।” 
  2. चिकित्सीय दृष्टि से - चिकित्सीय विधि से दृष्टिबाधिता की परिभाषा दृष्टि-तीक्ष्णता (Visual acuity) और देखने के क्षेत्र (Field of vision) पर आधारित है। जिसको अग्रलिखित दो प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है - 
    1. दृष्टि-तीक्ष्णता के आधार पर - सभी प्रकार के उपाय करने के बाद व्यक्ति किसी वस्तु तो 20 फीट की दूरी पर नहीं देख पाता, जबकि सामान्य व्यक्ति उस वस्तु को 200 फीट की दूरी पर देखता है, तो उस व्यक्ति को दृष्टिहीन कहा जाता है। दृष्टि-तीक्ष्णता को 20/200 के रूप में लिखा जाता है। यह प्रदर्शित करता है कि व्यक्ति वस्तु को किस-किस दूरी तक देख सकता है। 
    2. देखने के के आधार पर - दृष्टि विकृत व्यक्ति के देखने के क्षेत्र का व्याय 200 से अधिक नहीं होना चाहिए तथा उनकी दृष्टि-तीक्ष्णता 20/200 से अधिक अच्छा होना चाहिए। 

दृष्टिबाधित बालक की विशेषताएं

मानव के जीवन में दृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि मीवन में प्रत्येक अनुभव मानवों की दृष्टि से ही संबंधित होते है तथा दृष्टि बाधित व्यक्ति का जीवन भी बाधित हो जाता है पर जिस प्रकार से हम देखते हैं, कि एक विकलांग बालक जो कि अपने हाथ-पैरों से लाचार है, वह भी अपना कार्य करता ही है। ठीक उसी प्रकार से दृष्टि बाधित बालक भी किसी-न-किसी प्रकार से अपना स्वयं का कार्य कर ही लेते हैं, परंतु विकलांगों की तरह ही दृष्टि बाधित बालकों में भी कर्इ विशेषताएं पायी जाती हैं।
  1. दृष्टि बाधितों की मानसिक योग्यता
  2. दृष्टि बाधितों की भाषा का विकास 
  3. दृष्टि बाधितों के समाजिक व समायोजन संबंधी कार्य। 

1. दृष्टि बाधितों की मानसिक योग्यता 

दृष्टि बाधित बालक वह होते हैं, जो कि अपनी आंखों से ठीक प्रकार से नहीं देख पाते हैं। यह बाधित बालक मानसिक योग्यता की दृष्टि से सामान्य बालकों से कम नहीं होते हैं। शोध तथा अनुसंधान कायोर्ं से यह पता चला है कि यदि इन्हें समुचित शिक्षा दी जाये या शिक्षा का अवसर मिल सके, तब इनकी बुद्धि-लब्धि अचानक बढ़ जाती है।

यह बालक किसी वस्तु की दूरी को नहीं समझ पाते सकते हैं, क्योंकि वे दूरी को देख नहीं सकते हैं। अत: इनकी दूरी पर प्रत्यय विकसित नहीं होता है। दृष्टि बाधित बालकों में एकाग्रता का विकास होता है। देखने से एकाग्रता प्रभावित होती है तथा सुनने का कौशल उत्तम हेाता है। प्रथम विश्लेषण स्पर्श अनुभव तथा द्वितीय संश्लेश्“ाण स्पर्श अनुभव से होता है।

2. दृष्टि बाधितों की भाषा का विकास

दृष्टि बाधित बालक भाषा दोषी नहीं होते हैं। यह ठीक प्रकार से सुन सकते है। यह सुनना तथा बोलना भी भाषा के प्रमुख कौशल होते है। मुख्य रूप से भाषा को ही सम्प्रेषण का माध्यम माना जाता है, परंतु अन्धे बालक देखकर सीखते है तथा दृष्टि बाधित बालक इस प्रकार के अनुभवों से वंचित रहते हैं। यह सिर्फ शब्दों से ही अपने विचारों को व्यक्त कर पाते हैं न कि इन्द्रियों के माध्यम से। दृष्टि बाधित बालक सुनकर ही शब्द का चयन करते हैं। क्योंकि इनकी दृष्टि इन्द्रिय क्रियाशील नहीं होती है। सम्पूर्ण जानकारी व ज्ञान श्रवण इन्द्रियों पर भी आधारित होता है। किसी वस्तु का सही प्रत्यक्षीकरण इन्हें नहीं हो पाता है। तथ्यों की भाषा द्वारा ही प्रकट किया जाता है। उसे रंगों का कोर्इ भी बोध नहीं होता है। इनकी शाब्दिक अभिव्यक्ति आंतरिक नहीं होती है। उसे रंगों का का कोर्इ भी बोध नहीं होता है। इनकी शाब्दिक अभिव्यक्ति आंतरिक नहीं होती है तथा उसके अनुभव भी पूर्ण नहीं होते हैं, उनका प्रत्यक्षीकरण सुनने तथा स्पर्श तक ही सीमित रहता है।

3. दृष्टि बाधितों के समाजिक व समायोजन संबंधी कार्य

दृष्टि बाधित बालकों के व्यक्तित्व की समस्याएं आंतरिक नहीं होता है। यदि इन बालाकों में समायोजन क्षमता की समस्या सामाजिक कारणों से होती है। तो वह बालक अपने समायोजन को सुनिश्चित कर लेते हैं।

दृष्टि बाधित बालकों का वर्गीकरण

साधारणत: हम दृष्टि बाधितों को दो भागों में बांटते हैं - 1. आंशिक दृष्टि बाधित बालक, 2. पूर्ण रूप से अन्धे बालक ।

1. आंशिक रूप से दृष्टि बाधित

आंशिक रूप से दृष्टि बाधित बालक वह होते हैं, जो कि बड़े अक्षरों को मुद्रित भाषा को या उत्तम दर्पण की सहायता से शब्द पढ़ सकते हैं। इनकी दृष्टि क्षमता 20 से 70 तक उत्तम आंख में होती है। यह 20 फीट की दूरी तक देख सकते हैं। इसके अंतर्गत सामान्य बालक 70 फीट की दूरी तक तो देख सकते हैं परंतु बाधित बालकों की दृष्टि सामान्यत: किसी बीमारी आदि के कारण कम हो जाती है ।
आंशिक रूप से दृष्टि बाधित बालकों को चार भागों मे बांटा जाता है -
  1. वह बालक जिनकी दृष्टि एक्यूटी (Visual Acuity) 20/70 तथा 20/200 के बीच होती है। 
  2. यह बालक जो गंभीर तथा बढ़ने वाली दृष्टि संबंधी से पीड़ित हैं।
  3. वह बालक जो नेत्र रोगों से पीड़ित हैं या उन रोगों से ग्रस्त है। गंभीर नेत्र रोग होते हैं। 
  4. वह बालक जो औसत मस्तिष्क वाले होते हैं तथा चिकित्सकों के अनुसार यह कम देखने वाले बालकों को दिये जाने वाले समान के आधार पर ही लाभान्वित हो जाते हैं। अत: आंशिक रूप से बाधित बालकों को मेडिकल परीक्षण के द्वारा पहचाना जा सकता है। इन बालकों की आंखों का भी परीक्षण किया जाना अति आवश्यक होता है। विद्यालयों में भी स्वास्थ्य सेवा विभागों का यह कत्र्तव्य है कि वह भी विद्यालयों में परीक्षण व्यवस्था करायें तथा बालकों को इसी प्रकार के शिक्षा निर्देश दें, ताकि बच्चों का व्यापक स्वास्थ्य परीक्षण करायें। 

2. गंभीर रूप से दृष्टि बाधित बालक

गंभीर रूप से दृष्टि बाधित बालकों को पहचानना अत्ंयत सरल है। यह बालक ब्रेल लिपि के द्वारा पढ़ाये जाते हैं। इनकी दृष्टि क्षमता 2/20 होती है। तथा यह श्रव्य यंत्रों का भी प्रयोग करते है। यह बालक चलने में छड़ी का प्रयोग करते हैं।
यह बालक शैक्षिक कार्य हेतु नेत्रहीन तब समझे जाते हैं । जब उनकी दृष्टि एक्यूटी 20/200 होती है। इससे कम होन पर अथवा इसी प्रकार की कोर्इ अन्य असमर्थता है पर भी बालकों को अंधों की श्रेणी में डाला जाता है।
कर्इ बाद ऐसे बालक जिनकी दृष्टि बहुत अधिक बाधित होती है। वह बालक किसी का भेद तक नहीं कर पाते हैं। डॉक्टर के द्वारा इन बालकों को पहचान कर इन्हें चश्मा लगाया जाता है। इन्हें समय-समय पर परीक्षण दिया जाता है, ताकि इनकी आंखों की दशा में जितना संभव हो सुधार हो जाये तथा यदि बालकों की आंखें ऑपरेशन द्वारा ठीक करार्इ जा रही हों तो बालकों के चश्तें का भी ध्यान रखना चाहिए। चूंकि अंधे बालक अपनी दूसरी इंद्रियों पर निर्भर रहते हैं। अत: इनकी अन्य इन्द्रियों के स्वास्थ्य की पहवाह करनी चाहिए।

दृष्टि अक्षमता के कारण 

नेत्र रोग विशेषज्ञों के विभिन्न कारणों के उत्पन्न अक्षमता उपचारोपरांत दृष्टि अक्षमता के समान्य कारण लापरवाही, उचित उपचार न करवाना एवं बीमारी सुनिश्चित सावधानियां न कर सकना आदि है। धूल, धूप व धुआं भी दृष्टि अक्षमता के सामान्य कारणों में से एक है जो आंशिक अन्धता, रतौंधी एवं रंग अन्धता को जन्म देते हैं, दृष्टि अक्षमता के प्रमुख कारण हैं -
  1. संक्रामक रोग - प्राय: 60% से 70% तक बालक संक्रामक रोगों में असावधानी के कारण दृष्टि अक्षमता अवस्था को प्राप्त होते हैं। रक्त के प्रकार की अन्धता का कारण बन जतो हैं। 
  2. दुर्घटना एवं चोट- सुरक्षा एवं निर्देशन के अभाव में मारपीट या दुर्घटना के कारण नेत्र में लगी घातक चोट भी दृष्टि सक्षमता का कारण बन जाती है।
  3. वंशागत - कभी-कभी बालक में होने वाली दृष्टि से संबंधित समस्यायें आनुवंशिकता का परिणाम होती है। 

Comments