एक्यूप्रेशर के सिद्धांत, एक्यूप्रेशर देने की विधि

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अनुक्रम

एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का मुख्य सिद्धांत यह है कि शरीर के विभिन्न भागो में अवरूद चेतना का संचार करना प्राण व रक्त के प्रवाह में गति लाना, दाब बिन्दुओं में प्रेशर देकर रोगी को रोगमुक्त करना। इस चिकित्सा पद्धति के कई लाभ है।

  1. एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति किसी भी तरह से बहुत कठिन य बहुत जटिल प्रकिया नही है इसको कोई भी सामान्य ज्ञान व बुद्धि वाला व्यक्ति अपने आप कर सकता है।
  2. इस उपचार पद्धति द्वारा छोटी-मोटी घरेलू बीमारियों का स्वउपचार किया जा सकता है।
  3. दूर-दराज ग्रामीण क्षेत्र में, जहॉं पर किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य सुविधा नही है। वहा पर अन्य उपचार के अभाव में यह चिकित्सा पद्धति रोगियों के लिए उत्तम साधन है।
  4. जब कहीं जा रहे हो, यात्रा कर रहें हो या ऑफिस स्कूल आदि में हो, अचानक कोई पीड़ा या परेशानी हो तो ऐसे में यह एक्यूप्रेशर चिकित्सा उपचार दिया या लिया जा सकता है।
  5. इस उपचार पद्धति का काई भी प्रतिप्रभाव नही होता है।
  6. यह सभी जानते है कि पूरे शरीर में प्राणिक ऊर्जा विघुत की तरह फैली हुई है इस पद्धति की सहायता से शरीर के अव्यवस्थित ऊर्जा प्रवाह को व्यवस्थित किया जा सकता है।
  7. यह पद्धति अत्यन्त सरल, प्राकृतिक व प्रभावशाली, रोग निवारक चिकित्सा पद्धति है।
  8. इसकी सहायता से मनुष्य शरीर में अदृश्य व सुशुप्त कई शक्तियों को जागृत किया जा सकता है।

एक्यूप्रेशर के शारीरिक सिद्धांत

वैज्ञानिक आधार पर स्नापुसंस्थान व रक्तवाहिकाओं की छोटी-छोटी नाड़ियो के आखिरी हिस्से हाथो तथा पैरो में होते है, अर्थात हाथ-पैर की नाड़ियो का शरीर के सारे अंगो से सम्बन्ध है इसलिए विशेष रूप से हाथ व पैरों में ही प्रेशर देकर रोगी का इलाज किया जाता है। कुशल एक्यूप्रेशर चिकित्सकों के अनुसार प्रेशर देने से शरीर में कुछ प्रमुख प्रभाव पड़ते है। जो है-

  1. एक्यूप्रेशर प्रणाली से त्वचा से त्वचा में स्फूर्ति उत्पन्न होती है।
  2. शरीर की मांस पेशीयॉं जो पूरे शरीर को ढके हुए है। यह एक्यूप्रेशर उसमें लचक पैदा करता है।
  3. यह शरीर के आवश्यक तत्वों की वृद्धि करता है।
  4. यह स्नायु संस्थान को स्वस्थ्य बनाता है तथा आस्थियों की विकृति भी इससे दूर होती है।
  5. शरीर में स्थित समस्त अन्त: स्रावी ग्रथिंयों का कार्य नियमित हो जाता है।
  6. जहॉं तक हो सके प्रेशर ऐसे स्थान पर बैठकर देना चाहिये जो स्थान हवादार हो।
  7. चिकित्सा लेते समय रोगी को अपना शरीर ढीला छोड़ देना चाहियें।
  8. रोगी को गहरे व लम्बे-लम्बे श्वास-प्रश्वास करने चाहियें।
  9. एक्यूप्रेशर केवल रोगो को दूर करने की ही पद्धति नही है। बल्कि इससे रोगो को दूर भी रखा जा सकता है इसलिए हर स्वास्थ व्यक्ति को प्रतिदिन हाथ-पैर व सभी प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर प्रेशर देना चाहियें। इससे एक अच्छे स्वास्थ्य को लम्बे समय तक बचाये रखा जा सकता है।
  10. यह एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति न केवल शारीरिक रोगो को बल्कि मानसिक रोग की स्थिति में भी लाभदायी होता है।

एक्यूप्रेशर के मानसिक सिद्धांत

तनाव, अवसाद, या अन्य किसी भी प्रकार की मानसिक परेशानी का सम्बन्ध भी किसी न किसी ग्रंथि (अन्त: सावी ग्रंथि) से तथा किसी विशेष अंग अवयव से होता हैै। कुशल चिकित्सक उस विशेष स्थान पर प्रेशर देकर रोगी को मानसिक लाभ पहुचाते है।

एक्यूप्रेशर-नियम

  1. प्रेशर देने के लिए अधिकतम दर्द संवेदना वाले स्थान को ढूडना चाहिये।
  2. नये रोगो में सामान्यत: 2 मिनट व अधिकतम 6-8 मिनट तक दबाव देना चाहिये।
  3. दबाव की मात्रा, रोगी की आयु, अवस्था, तथा सहनशक्ति के अनुसार कम, मध्यम अथवा तेज दी जा सकती है।

सीमाएं

कभी-कभी कुछ परिस्थितियॉं ऐसी भी उत्पन्न हो जाती है कि रोगी का उपचार मात्र एक्यूप्रेशर द्वारा संभव नही हो पाता। इसलिए कुछ सीमांए है नियम है जिनको ध्यान में रखना आवश्यक है-

  1. यदि रोगी जीर्ण स्थिति में है लम्बे समय से बिमार चल रहा है तथा गंभीर व जटिल रोगों से घिरा है तो एक्यूप्रेशर उपचार से पूर्ण लाभ नही हो सकता।
  2. केंसर, मोतियाबिंद, ट्यूमर, स्नायुओं की सूजन, पुराने गठिया ऐसे रोगों में भी एक्यूप्रेशर पूरा-पूरा लाभ नही दे पाता ऐसे में रोगी को पूर्ण वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति का ही सहारा लेना चाहियें।
  3. गर्भवती महिला को भी यह उपचार नही देना चाहियें।
  4. यदि दबाव देने के स्थान पर घाव है, मस्सा है, सूजन या त्वचा जलकर झुर्रीदार हो गई है तो उस रागी का उपचार नही करना चाहियें।
  5. पसीने से भीगा हुआ, दिल की धड़कन तेज होने, खाली पेट होने, या कोई दवा लेने के बाद या टूटी हड्डी वाले स्थान पर एक्यूप्रेशर पद्धति से उपचार नही करना चाहियें।
  6. संक्रामक रोग में भी यह पद्धति कार्य नही करती।
  7. एक्यूप्रेशर उपचार को इस बात का ज्ञान होना चाहिये कि उसे रोगी व्यक्ति को दबाव कब, कहॉं और कैसे देना है।
  8. रोग की सही दिशा व दशा व उससे सम्बन्धित एक्यू बिन्दुओं की सर्वप्रथम खोज करें, फिर दबाव देना प्रारम्भ करें।
  9. रोगी व्यक्ति में इस चिकित्सा पद्धति के प्रति विश्वास जगायें।
  10. प्रेशर देने के बाद दबाव छोड़ते समय हल्का झटका देते हुए उसे छोड़ना चाहिये।
  11. यदि किसी व्यक्ति का आपरेशन हुआ है तो चिकित्सक से पूछने के बाद 2 या 3 माह बाद ही एक्यूप्रेशर चिकित्सा दे सकते है।
  12. जो व्यक्ति रोगी है उसे भी कुछ नियम व सावधानी का ध्यान रखना आवश्यक है अन्यथा चिकित्सक की मेहनत का कोई लाभ नही होगा।
  13. इस उपचार पद्धति में रोगी व्यक्ति को शराब पीना सख्त मना है।
  14. गरम मसाले एंव चटपटे पदार्थ तथा उत्तेजित करने वाली वस्तुओं का सेवन उपचार के दौरान नही करना चाहिये।
  15. खट्टी खाद्य चीजों का सेवन भी वर्जित है।

एक्यूप्रेशर देने की विधि

विभिन्न प्रतिबिम्ब बिन्दुओं पर कितना प्रेशर दिया जाय यह उस अंग और रोगी की सहनशक्ति पर निर्भर करता है, प्रेशर देने की कई विधि है। जैसे-

  1. हल्का दबाव-नाजुक जगहो पर एक अंगुली या अंगूठे से बिल्कुल हल्का दबाव देना चाहिये।
  2. दो अंगुलियों का दबाव-एक अंगुली के ऊपर दूसरी अंगुली रखकर फिर दोनों अंगुलियों से दबाया जाता है।
  3. हथेली का दबाव-शरीर के किसी अंग विशेष पर एक हथेली से या दोनो हथेली से दबाव दिया जाता है।
  4. रोटेटिंग-अर्थात अंगूठे या जिम्मी से एक दिशा में घुमाते हुए दबाव देना।
  5. पुश एण्ड पुल-किसी बिन्दु पर दबाव देना व छोड़ना, इसी क्रिया को दोहराना।
  6. रबिंग -किसी बिन्दु पर घिसते हुए दबाव देना।

विधि के अन्र्तगत इन सब बातों को जानना आवश्यक है कि बिन्दुओं को पहचाना कैसे जाय, उन बिन्दुओं पर दबाव कितना दिया जाय देने से पहले व प्रेशर देने के बाद क्या किया जाय आदि। इसके अन्र्तगत कुछ मुख्य बाते मुख्य हैं।

  1. प्रत्येक एक्यू बिन्दु पर एक समान दबाव दें। जितना रोगी सहन कर सकें।
  2. दिन मे दो-तीन बार संबंधित बिन्दुओं पर दबाव देना चाहियें।
  3. दबाव देते समय यदि एक्यू बिन्दु के आस-पास सूजन या लाली दिखाई पड़े जो अनावश्यक दबाव देना छोड़ दे।
  4. दबाते समय अंगूठे को स्थिर रखते हुए थोड़ा घुमाव रखना चाहियें।
  5. ध्यान रखें, एक बिन्दु पर तब तक दबाव दें जब तक वहा पर थोड़ा दर्द का अनुभव न हों।
  6. ध्यान रखें, फिर दबाव तब तक बनाये रखें, जब तक पीड़ा समाप्त न हो जाय, उस स्थान पर पीड़ा समाप्त होने का अर्थ है रोग का समाप्त हो जाना।
  7. यदि रोज दबाव न दिया जाय तो एक दिन छोड़कार भी दबाव दिया जा सकता है।
  8. किसी भी स्थान पर अधिक देर तक या बार-बार प्रेशर देना उचित नहीं है किसी पीड़ा या रोग को ठीक करने के लिए प्रयास, व उत्साह आवश्यक है लेकिन अतिरिक्त उत्साह दिखाना उचित नही है।
  9. ह्रदय से सम्बन्धित एक्यू बिंदु सिर्फ बाई ओर स्थित होते है।
  10. समान्यत: 7-10 सेकेण्ड तक दबाव देना पर्याप्त देना होता है। इतनी देर दबाव से स्वचलित तंत्रिका तंत्र उत्त्ोजित हो जाता है। अनुभवी उपचारक इस समय सीमा को अपने अनुभव के आधार पर भी निश्चित कर सकता है। 7-10 सेकेण्ड के दबाव को कई बार दे सकते है जिसका समय 10 से 15 मिनट, प्रतिदिन प्रात:, सांय या आवश्यकतानुसार दोपहर में भी दे सकते हैं।
  11. अंगूठे या हथेली से दबाव देने के अतिरिक्त रगड़ लगाकर अर्थात हल्की मालिश विधि से भी यह किया जा सकता है। इसमें सर्वप्रथम प्रभावित प्रतिबिम्ब केन्द्र पर आगे-पीछे, अंगूठे-अंगुली, हथेली आदि से रगड़ा जाता है। पांवो के तलवों को भी दोनो हथेली से रगड़ा जाता है। इससे प्रतिबिम्ब केन्द्र उत्त्ोजित हो जाते है इसके बाद दबाव देने से उस प्राण प्रवाह के मार्ग में आई हुई बांधा दूर हो जाती है। ताप्पयर्ं यह है कि उस अंग विशेष से सम्बद्ध रोग दूर हो जाता है।
  12. कभी-कभी एक्यूप्रेशर बिन्दुओं को दबाने के बदले यदि हल्के से पकड़कर खीचें या हिलाये तो यह भी उपचार की एक विधि है इसमं रोग से सम्बनिधत क्षेत्र को दो अंगुली से पकड़कर कम्पन देते हुए हिलाते है मांस-पेशियों को गोलाई से घुमाते है।
  13. एक विधि के अनुसार एक्यूप्रेशर देने के पूर्व एक्यू बिंदु पर थोड़ा टेलकम पाउडर छिड़क लिया जाय तो उस स्थान पर अच्छा दबाव दिया जा सकता है। पाउडर डालने से उस स्थान की त्वचा को नुकसान नही होता।
  14. एक्यूप्रेशर उपचार को किसी खुले, साफ व हवादार कमरे में करें।

एक्यूप्रेशर उपचार मे प्रयुक्त विभिन्न उपकरण

एक्यूप्रेशर चिकित्सा देते समय चिकित्सक को कुछ उपकरणों की आवश्यकता होती है। इन उपकरणों के द्वारा रोगी, सीखकर, समझकर स्वंय भी लाभ ले सकता है। वर्तमान में ये सभी उपकरण बाजार में उपलब्ध है। कुछ मुख्य-मुख्य उपकरण इस प्रकार है-

  1. हाथ -पैरो में प्रेशर देने के लिए रबर, लकड़ी या प्लास्टिक के उपकरण। ये देखने में पैन, पैन्सिल की तरह होते है, इन्हें जिम्मी कहते है।
  2. खेलने वाली गेंद के समान एक उपकरण होता है यह गोल होने के साथ-साथ कई कोनो वाला होता है। जब इसे इथेली मे गोल-गोल घुमाते है तो इसका प्रभाव जादू की तरह होता है, अर्थात एक साथ कई दोष दूर हो सकते है, क्योंकि इसकेकई कोनो से एक साथ कई प्रेशर बिन्दु दुखते है, इसे एक्यूप्रेशर मैजिक मशाजर कहते है
  3. रोटी बेलने वाले रोलर की भांति धारीदार कई कोनों वाला भी एक उपकरण होता है। जिसे कुसी, चारपाई या कही भी ऊॅचे स्थान पर बैठकर हाथ आरामदायक स्थिति में रखकर दोनों पैरो के तलवों पर इसे रखकर आगे-पीछे घुमाया जाता है, इसे फुटरोलर कहते है।
  4. इनके अतिरिक्त अंगूठी नुमा, फिंगर रोलर, कपड़े सुखाने की पिन, (अंगूलियों के लिए) तथा विभिन्न आकृति के एक्यूप्रेशर मैट, एक्यूप्रेशर कार सीट, एक्यूप्रेशर सौन्डिल, एक्यूप्रेशर सू सोल, रीठ की हड्डी के लिए (स्पाइनल केयर मशाजर) आदि उपकरण प्रयोग मे लाये जाते है।एक्यूप्रेशर छलला ऐक्यूप्रेशर सीट एक्यूप्रेशर मैट फुट रोलर एक्यूप्रेशर चप्पल एक्यूप्रेशर मैजिक बॉंल मसाजर

एक्यूप्रेशर उपचाकर्ता के गुण एवं उपचार प्रतिक्रियाए

एक्यूप्रेशर के द्वारा उपचार करने वाला व्यक्ति भी चिकित्सक ही होता है, जो भी व्यक्ति उपचार के लिए आते है, वे उसे कुशल चिकित्सा के रूप मे उस उपचारकर्ता के कुछ गुण होने आवश्यक है- जैसे-

  1. उपचारकर्ता अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार होना चाहियें।
  2. उपचारकर्ता सेवाभावी व संतोशी होना चाहियें।
  3. उपचाकर्ता को शरीर क्रिया विज्ञान का पूर्ण ज्ञान होना चाहिये।
  4. विभिन्न रोगो में उपचार देने हेतु वह कुशल होना चाहिये।
  5. उपचारकर्ता सरल स्वभाव का होना चाहिये।
  6. सबसे मुख्य गुण व समय का पाबंद होना चाहिये।
  7. वह अपने रोगियों के प्रति सकारात्मक सोच रखता है। उन्हे हिम्मत बधाता हो कि वे शीघ्र दी लाभ को प्राप्त करेगे।
  8. उपचारकर्ता के मन में द्वैश भावना न हो।
  9. उपचार देते समय वह अच्छे, बुरे सम्बन्धों को प्राथमिकता न दे, अपितु सभी के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार करें।
  10. उपचारकर्ता मुख्यत: स्वंय के प्रति दृढ़निश्चयी, कर्तत्यनिश्ठ व अनुशासित हो।

प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के अन्र्तगत जब कोई भी व्यक्ति, किसी भी प्रकार की उपचारात्मक चिकित्सा लेता है। तो उस समय शरीर के विजातीय द्वव्य बाह्र निकलते है या निकलने का प्रयास कर रहे होते है। उस समय हो रही प्रतिक्रियाओं से घबराना नही चाहियें। उस समय उपचार कर्ता पर पूरा विश्वास रखना चाहिये धौर्य नही खोना चाहिये। ये प्रतिक्रियात्मक लक्षण हो सकते हैं- जैसे-

  1. उपचार के समय शरीर सहज होने के कारण नींद आने लगती हैं।
  2. ऑतो से उत्सर्जी पदार्थो का निष्कासन होता है।
  3. स्त्रियों में उपचार के समय श्वेतप्रद जैसा स्त्राव होने लगता है।
  4. उपचार के समय उत्सर्जी तत्व फोड़े-फुन्सी, दानें जैसे बनकर उभरते हैं।
  5. उपचार के दौरान रोगी शांत व गहरी निद्रा में सो जाता है।
  6. कभी-कभी रोगी अपने आंसुओ के माध्यम से प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। उसका आंसुओं को रोकना लगभग असंभव है।
  7. कभी-कभी रोगी अपनी बिमारियों के उपचार के दौरान बिस्तृत व्याख्या करने लगते हैं।
  8. परिणाम स्वरूप यूरिन की मात्रा बढ़ जाती है।
  9. कभी-कभी दस्त जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है।
  10. छीक आने लगती है।

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