मूत्र चिकित्सा क्या है? और इसके लाभ

अनुक्रम
शाब्दिक रुप से देखने पर मूत्र चिकित्सा का अर्थ स्वत: ही स्पष्ट हो जाता है-’’ मूत्र द्वारा विविध रोगों की चिकित्सा करना मूत्र चिकित्सा कहलाता है। इसके अन्तर्गत प्रमुख रुप से स्वमूत्र एवं गौमूत्र द्वारा चिकित्सा करने का वर्णन आता है। मूत्र चिकित्सा को प्राचीन शास्त्रों में शिवाम्बु कल्प का नाम देते हुए कहा गया है कि मूत्र में विभिन्न रोगों का नाश करने की विलक्षण प्रतिभा पायी जाती है। मूत्र के इस रोग विनाशक गुण के कारण इसके प्रयोग से विभिन्न रोग दूर होते है।

मूत्र चिकित्सा के लाभ

मूत्र चिकित्सा वह लाभकारी एवं गुणकारी स्वास्थ्य की कँुजी है जिससे ना केवल रोगी व्यक्तियों को स्वास्थ्य लाभ होता है अपितु स्वस्थ व्यक्ति भी इसके अनुप्रयोग से अपने स्वास्थ्य को उन्नत बनाते हैं अर्थात यह रोगी एवं स्वस्थ्य दोनों प्रकार के मनुष्यो के लिए समान रुप से लाभकारी होती है। इस प्रकार मूत्र चिकित्सा के लाभों को दो वर्गो में बाटकर अध्ययन किया जा सकता है - 1-स्वस्थ व्यक्तियों को मूत्र चिकित्सा का लाभ- 2-रोगी व्यक्तियों को मूत्र चिकित्सा का लाभ ।

स्वस्थ व्यक्तियों पर मूत्र चिकित्सा का प्रभाव 

  1. मूत्र चिकित्सा एक सुरक्षित एवं दुष्प्रभाव रहित चिकित्सा पद्धति है, जिसके प्रयोग से स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पडता है। 
  2. मूत्र चिकित्सा के प्रयोग से स्वस्थ व्यक्ति की जीवनी शक्ति एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रबल बनी रहती है। 
  3. मूत्र चिकित्सा के प्रयोग से आन्तरिक विकार धुलकर शरीर एकदम स्वच्छ बनता है जिसके परिणामस्वरुप शरीर संक्रमण से मुक्त बना रहता है। 
  4. मूत्र चिकित्सा के प्रयोग से रक्त शुद्ध बनता है तथा रक्त विकार एवं त्वचा रोग (फोडें फुन्सीं) आदि उत्पन्न नही होते है। 
  5. मूत्र चिकित्सा का मानव हृदय पर अच्छा प्रभाव पडता है एवं हृदय गति व रक्त चाप सामान्य बना रहता है।
  6. मूत्र चिकित्सा का शरीर की अस्थियों पर अच्छा प्रभाव पडता है इससे अस्थियां मजबूत एवं जोड लचीले बनते है। 
  7. मूत्र चिकित्सा का दीर्घ कालीन प्रयोग करने से सिर के बाल काले बने रहते हैं और आँखों की रोशनी तेज बनी रहती है। 
  8. मूत्र चिकित्सा का तंत्रिका तंत्र पर अच्छा प्रभाव पडता है एवं मस्तिष्क व तंत्रिकाओं से सम्बन्धित विकार उत्पन्न नही होते हैं। 
  9. मूत्र चिकित्सा का उदर प्रदेश पर अच्छा प्रभाव पडता है जिससे व्यक्ति की पाचन क्रिया स्वस्थ एवं सक्रिय बनी रहती है। 
  10. मूत्र चिकित्सा का अन्त:स्त्रावी तंत्र पर भी बहुत अच्छा प्रभाव पडता है तथा हामोर्ंस संतुलित मात्रा में स्त्रावित होते है। 
  11. मूत्र चिकित्सा के प्रयोग से मनुष्य की चयापचय दर संतुलित रहती है जिससे शरीर में आलस्य, अतिनिन्द्रा अथवा अनिन्द्रा की स्थिति उत्पन्न नही होती है। 
  12. मूत्र चिकित्सा का श्वसन अगों पर अच्छा प्रभाव पडता है जिससे व्यक्ति श्वसन रोगों जैसे खांसी, जुकाम एवं बुखार आदि से मुक्त रहता है।
इस प्रकार मूत्र चिकित्सा का स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पडता है। मूत्र चिकित्सा के प्रयोग से शरीर के सभी तंत्र स्वस्थ एवं सक्रिय बने रहते हैं जिससे शरीर रोग मुक्त बना रहता है। मूत्र चिकित्सा का शरीर की चयापचय दर पर भी अच्छा प्रभाव पडता है। इससे व्यक्ति ऊर्जावान एवं सक्रिय बना रहता है। स्वस्थ व्यक्ति के अतिरिक्त रोगी व्यक्ति पर भी मूत्र चिकित्सा का प्रयोग प्रभावकारी सिद्ध होता है। रोगी व्यक्ति पर मूत्र चिकित्सा के प्रभाव इस प्रकार हैं -

रोगी व्यक्तियों पर मूत्र चिकित्सा का प्रभाव

  1. त्वचा रोगियों द्वारा मूत्र प्रयोग करने से त्वचा रोगों में तुरन्त लाभ मिलने लगता है। 
  2. नेत्र से सम्बन्धित रोगों में मूत्र प्रयोग करने से रोग में लाभ मिलता है एवं नेत्र ज्योति बढने लगती है। 
  3. वृक्क से सम्बन्धित रोगियों द्वारा मूत्र प्रयोग करने से रोगों में लाभ मिलता है। 
  4. श्वास रोगियों द्वारा मूत्र प्रयोग करने से रोगों में लाभ मिलता है। 
  5. पाचन तंत्र के रोगियों द्वारा मूत्र प्रयोग करने रोगों में लाभ मिलता है। रोगी को भूख अच्छी प्रकार लगने लगती है एवं उसके रोग दूर होने लगते हैं। 
  6. बालों का झडने, सफेद होने एवं बालों में रुसी होने पर मूत्र प्रयोग करने से रोग में लाभ मिलता है। 
  7. कैंसर, कुष्ठ, कोढ, ब्लड प्रेशर, गठिया एवं दमा आदि गंभीर एवं असाध्य रोगों से ग्रस्त रोगियों द्वारा मूत्र प्रयोग करने से रोग में तुरन्त आराम मिलना प्रारम्भ हो जाता है।
मूत्र चिकित्सा का प्रयोग करने से एक ओर जहाँ सर्दी, जुकाम, खांसी, पेट दर्द, गैस, अपच आदि सामान्य एवं त्रीव रोगों में आराम मिलता है तो वही मूत्र चिकित्सा के प्रयोग करने से गठिया, आर्थाराइटिस, हृदय रोग, ब्लड प्रेशर, मधुमेह एवं कैन्सर आदि गंभीर एवं असाध्य रोगों के उपचार में भी मद्द मिलती है। विविध जीर्ण रोगों में जब रोगी असहनीय पीडा एवं कष्ट के दौर से गुजर रहा होता है, ऐसी अवस्था में मूत्र चिकित्सा रोगी के लिए अमृत अथवा संजीवनी का कार्य करती है। मूत्र चिकित्सा के प्रयोग से रोगी के शरीर की सुप्त जीवनी शक्ति पुन: जाग्रत होने लगती है और रोगी को शीघ्र आराम पडने लगता है। इस प्रकार मूत्र चिकित्सा स्वस्थ एवं रोगी दोनों प्रकार के मनुष्यों के लिए समान रुप से लाभकारी एवं गुणकारी चिकित्सा है। मूत्र चिकित्सा के उपरोक्त लाभों को जानने के उपरान्त आपके मन में यह जिज्ञासा अवश्य ही उत्पन्न हुर्इ होगी कि मूत्र चिकित्सा के अन्तर्गत किस मूत्र का प्रयोग का प्रयोग किया जाता है? अत: यह तथ्य भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस चिकित्सा के अन्र्तगत प्रमुख रुप से स्वमूत्र का प्रयोग किया गया है किन्तु स्वमूत्र के साथ साथ गौमूत्र के प्रयोग का वर्णन विभिन्न शास्त्रों में किया गया है। स्वमूत्र एवं गौमूत्र के अतिरिक्त आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थ चरक संहिता में आचार्य चरक  आठ प्रकार के मूत्रों का वर्णन करते हैं -
  1. गाय का मूत्र 5 गधे का मूत्र
  2. भैंस का मूत्र 6 घोडे का मूत्र
  3. भेड का मूत्र 7 ऊंट का मूत्र
  4. करी का मूत्र 8 हाथी का मूत्र
आयुर्वेद शास्त्र में उपरोक्त आठ प्रकार के मूत्रों शरीर पर अलग अलग प्रभावों का वर्णन भी किया गया है। उपरोक्त तथ्यों को जानने के उपरान्त आपको मूत्र चिकित्सा के लाभों एवं महत्व का ज्ञान अवश्य ही हुआ होगा किन्तु अब आपके मन में यह प्रश्न भी अवश्य ही उत्पन्न हुआ होगा कि मूत्र चिकित्सा में क्या क्या सावधानियों को ध्यान में रखना चाहिए जिससे किसी प्रकार की हानि की संभावना नही रहे और रोगी को अधिकतम एवं शीघ्र लाभ प्राप्त हो सके, अत: अब मूत्र चिकित्सा की प्रमुख सावधानियों पर विचार करते है।

मूत्र चिकित्सा की सावधानियां

  1. स्वमूत्र चिकित्सा के अन्र्तगत मूत्रपान करने वाले मनुष्य को केवल पथ्य आहार का सेवन ही करना चाहिए। पथ्य आहार में कच्ची मौसमी सब्जीयां, फल, अंकुरित अन्न, दलिया, खिचडी, गाय का दूध, दही एवं घी आदि पौष्टिक आहार का वर्णन आता है। 
  2. मूत्रपान अथवा मूत्र चिकित्सा का करने वाले मनुष्य को सभी प्रकार के व्यसन, धूम्रपान, मांस मदिरा आदि पूर्ण रुप से त्याग देने चाहिए। 
  3. मूत्र चिकित्सा का प्रयोग करने वाले रोगी को नमक एवं चीनी आदि रासायनिक पदार्थों का प्रयोग पूर्ण रुप से बंद कर देना चाहिए। 
  4. मूत्र चिकित्सा के अन्र्तगत मूत्र की मालिश करते समय किसी प्रकार के अन्य रासायनिक पदार्थ जैसे साबून, शैम्पू अथवा तेल आदि का प्रयोग शरीर पर नही करना चाहिए। 
  5. मूत्र चिकित्सा का प्रयोग करने वाले मनुष्य को एक सुव्यवस्थित दिनचर्या, निन्द्रा एवं ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। 
  6. मूत्र चिकित्सा के अन्र्तगत रोगी को किसी भी प्रकार की अंग्रेजी एलोपैथिक दवार्इयों का सेवन नही करना चाहिए। मूत्र चिकित्सा के अन्र्तगत रोगी के पथ्य एवं अपथ आहार पर विशेष ध्यान दिया जाता है। पथ्य एवं अपथ्य आहार पर ध्यान रखते हुए मूत्र प्रयोग करने से कैन्सर, मधुमेह एवं एवं एड्स जैसे गंभीर एवं असाध्य रोगों पर भी नियंत्रण किया जा सकता है। 
इसके अन्तर्गत रोगी को पथ्य- अपथ्य आहार पर ध्यान रखना चाहिए -
  1. पथ्य आहार - सेब, सन्तरा, अंगूर, पपीता, नारियल, तरबूज, खरबूजा, लौकी, कद्दू, गाजर, ककडी, खीरा, चना, मैथी आदि हरी पत्तेदार सब्जियां, अदरक, हरी धनिया, चौकरयुक्त आटा, मौसमी फल, सलाद एवं पोषक तत्वों से युक्त पौष्टिक आहार पथ्य है।
  2. अपथ्य आहार - नमक, चीनी, चाय, कॉफी, सोफ्ट व कोल्ड डिंक्स जैसे पैप्सी व कोक, एल्कोहल, बाजार की मिठार्इयां, चाकलेट, तला भुना चायनीज फूड, फास्ट फूड, जंक फूड, चावल, फूलगोभी, पत्तागोभी, खट्टी दही, वातवर्धक बासी, रुखा एवं पोषक तत्व विहीन भोजन अपथ्य है। रोगी को धूम्रपान, एल्कोहल एवं माँस के सेवन का पूर्ण रुप से त्याग कर देना चाहिए।

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