पूरक चिकित्सा क्या है?

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क्या आप जानते हैं कि पूरक चिकित्सा को दूसरे विभिन्न नामों से भी जाना जाता है। जैसे-वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति, समग्र चिकित्सा पद्धति, पारम्परिक चिकित्सा पद्धति इत्यादि। आपकी जानकारी के लिये इस तथ्य को भी स्पष्ट कर देना अति आवश्यक है कि जब किसी रोगी को आधुनिक चिकित्सा के साथ-साथ पारम्परिक चिकित्सा भी दी जाती है, तब यह पारम्परिक चिकित्सा ‘‘पूरक चिकित्सा’’ कहलाती है और जब रोगी को केवल पारम्परिक चिकित्सा ही दी जाती है, किसी प्रकार की आधुनिक चिकित्सा का प्रयोग नहीं किया जाता तो इसे ‘‘वैकल्पिक चिकित्सा’’ कहते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि पारम्परिक चिकित्सा को रोगी को किस प्रकार दिया जा रहा है, आधुनिक चिकित्सा के साथ-साथ अथवा उसके बिना, इसी आधार पर इसके दो नाम हैं- पूरक चिकित्सा पद्धति और वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति। इस प्रकार अब आप समझ गये होंगे कि पूरक चिकित्सा एवं वैकल्पिक चिकित्सा, इन दोनों में क्या-क्या समानतायें और विभिन्नतायें हैं। अब हम चर्चा करते हैं, पूरक चिकित्सा की मूल मान्यताओं पर अर्थात यह चिकित्सा पद्धति किन सिद्धान्तों पर आधारित है।

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि ‘पूरक चिकित्सा’ एक ऐसा शब्द है, जो अपने अन्दर उपचार की अनेक विधाओं को सम्मिलित करता है। कोई एक चिकित्सा पद्धति पूरक चिकित्सा पद्धति नहीं है, वरन् इसके अन्तर्गत असंख्य उपचार विधियाँ शामिल हैं, जिनमें से अनेकों के नाम भी ज्ञात नहीं है और उपचार की प्रत्येक विधि अपने आप में कुछ विशिष्ट है। इनके अपने सिद्धान्त, नियम और विधियाँ हैं। इसी कारण कुछ शब्दों में इस पूरक चिकित्सा पद्धति की एक सर्वमान्य परिभाशा देना थोड़ा कठिन प्रतीत होता है, लेकिन हाँ, आधुनिक चिकित्सा पद्धति के साथ इसका तुलनात्मक अध्ययन करके हम इसके स्वरूप को भली-भाँति समझ सकते हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि पूरक चिकित्सा से तात्पर्य एक ऐसी चिकित्सा पद्धति से है, जिसमें उपचार की असंख्य ऐसी विधियाँ शामिल हैं, जो प्राण ऊर्जा के सिद्धान्त पर कार्य करती है। इस चिकित्सा पद्धति की मूल मान्यता यह है कि ऊर्जा के असंतुलन के कारण ही कोई भी रोग उत्पन्न होता है और विकृति स्थूल या भौतिक शरीर से पहले सूक्ष्म या ऊर्जा शरीर में उत्पन्न होती है। इसके उपरान्त उसके लक्षण स्थूल शरीर में दिखाई देते है। अत: इसमें प्राणी के केवल भौतिक शरीर की ही चिकित्सा नहीं की जाती वरन् शरीर के साथ-साथ मन और आत्मा को भी स्वस्थ रखने पर बल दिया जाता है अर्थात ऐसे उपाय अपनाये जाते है, जिससे मन एकाग्र एवं शांत हो और आत्मा संतुष्ट हो। इस प्रकार स्वास्थ्य के केवल एक पक्ष (भौतिक शरीर) पर बल नहीं दिया जाता, वरन समग्र स्वास्थ्य की बात की जाती है। इसी कारण इसे ‘‘समग्र चिकित्सा’’ के नाम से भी जाना जाता है।

‘‘वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियाँ अब अंतर्राश्ट्रीय स्तर पर प्रचलित हो गई हैं। वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के सौ से ज्यादा रूप हैं। इसके अन्तर्गत मानव शरीर को शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक पहलुओं के समग्र रूप में देखा जाता है। इसमें स्वास्थ्य के रक्षात्मक और प्रगतिशील पहलुओं पर समान रूप से प्रकाश डाला गया है।’’ नीचे पूरक चिकित्सा पद्धति की मूल मान्यताओं का विवेचन किया जा रहा है, जिससे आपको इसका स्वरूप और अधिक स्पष्ट हो जायेगा। पूरक चिकित्सा की मूल मान्यतायें है-
  1. रोगों का प्रमुख कारण ऊर्जा का असंतुलन । 
  2. समग्र स्वास्थ्य पर बल 
  3. स्वास्थ्य के रक्षात्मक एवं प्रगतिशील दोनों पहलुओं पर समान रूप से बल। 
  4. स्वत: रोग मुक्ति का सिद्धान्त
  5. प्राकृतिक जीवनशैली पर बल। 
  6. शीघ्रतापूर्वक नहीं वरन धीरे-धीरे रोग के समूल नाश पर बल ।

रोगों का प्रमुख कारण ऊर्जा का असंतुलन

पूरक चिकित्सा पद्धति का मूल सिद्धान्त यह हैं कि रोगों का मूल कारण ऊर्जा का असंतुलन है। क्या आप जानते हैं कि इस सृश्टि में प्रत्येक पदार्थ चाहे यह जड़ रूप में हो अथवा चेतन रूप में, वह ऊर्जा का ही एक रूप है। क्योंकि ऊर्जा ही पदार्थ में रूपान्तरित होती है और अन्तत: प्रत्येक पदार्थ ऊर्जा में बदल जाता है। प्राणियों के भीतर यह ऊर्जा ‘प्राण’ कहलाती है। प्राणयुक्त होने पर ही जीव ‘प्राणी’ कहलाता है और प्राणविहीन हो जाने पर मृत। इस प्राणऊर्जा या जीवनीशक्ति पर ही हमारा समूचा जीवन आश्रित है। इस प्राण ऊर्जा को भिन्न-भिन्न नामों से संबोधित किया जाता है। रेकी चिकित्सा के विशेषज्ञ इसे ‘की’ कहते हैं। जब तक जीव का ब्रºमाण्डीय ऊर्जा से सम्पर्क बना रहता है, वह स्वस्थ रहता है, जैसे ही यह सम्पर्क टूट जाता है अथवा इसमें अवरोध आते है, वैसे ही वह विभिन्न प्रकार की विकृृतियों से ग्रसित होने लगता है। ये विकृतियाँ शरीर के स्तर पर भी हो सकती हैं, वैचारिक स्तर पर भी और भावनात्मक स्तर पर भी। कहने का आशय यह है कि ऊर्जा का असंतुलन ही रोगों को जन्म देता है। असंतुलन का आशय है कि ऊर्जा कहीं पर तो आवश्यकता से अधिक और कहीं पर आवश्यकता से कम। संतुलन ही आरोग्य की कुंजी है। जैसे - योग चिकित्सा में माना जाता है कि सत, रज, एवं तम ये तीन गुण होते हैं। इन तीनों में सतोगुण तो विकार का कारण नहीं है अर्थात सतोगुण के कारण रोग उत्पन्न नहीं होते हैं, किन्तु रजोगुण एवं तमोगुण में असंतुलन विभिन्न रोगों को जन्म देता है। इसी प्रकार आयुर्वेद त्रिदोष (वात-पित्त-कफ) के सिद्धान्त पर आधारित है, जिसमें वात, पित्त एवं कफ में असंतुलन को रोगों का प्रधान कारण माना गया है। यदि हम प्राकृतिक चिकित्सा की बात करें तो वहा भी पृथ्वी, जल, अग्नि वायु एवं आकाश इन पंचमहाभूतों को संतुलित करने पर ही बल दिया जाता है। एक्यूपंक्चर एवं एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति की भी मूल अवधारण यही है कि ऊर्जा प्रवाह पथ (मेरीडियन्स) में अवरोध के कारण ही बीमारियाँ जन्म लेती है अर्थात शरीर के किसी अंग में ऊर्जा अधिक हो जाती है और किसी अंग में कम। परिणामस्वरूप व्यक्ति रोगग्रस्त हो जाता है। इसी प्रकार प्राणिक हीलिंग और रेकी विशेषज्ञों के अनुसार विश्वव्यापी ऊर्जा से जीव का सम्पर्क टूटने का कारण ही विकृतियाँ जन्म लेती है। पाठकों, इस प्रकार आप समझ गये होंगे कि पूरक चिकित्सा पद्धति का चाहे कोई भी रूप हो, इन सभी में ऊर्जा के असंतुलन को ही रोगों का प्रमुख कारण माना गया है और उपचार के द्वारा ऊर्जा को संतुलित किया जाता है, जिससे कि प्राण ऊर्जा का संचार सम्यक् रूप से होता रहे।

समग्र स्वास्थ्य पर बल 

पूरक चिकित्सा का दूसरा सिद्धान्त यह है कि यह पद्धति समग्र स्वास्थ्य के दृष्टिकोण पर आधारित है। कहने का तात्पर्य यह है कि इस पद्धति के अनुसार प्राणी केवल पंचमहाभूतों से बना स्थूल शरीर मात्र नहीं है, वरन् शरीर के अतिरिक्त मन और आत्मा भी है और तीनों एक दूसरे से सम्बद्ध है। यदि शरीर स्वस्थ है, किन्तु व्यक्ति आत्मिक दृष्टि से संतुष्ट नहीं है, मानसिक रूप से परेशान है तो उसे पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं कहा जा सकता है क्योंकि मन और आत्मा उसकी शारीरिक गतिविधियों को किसी न किसी रूप में अवश्य प्रभावित करेंगे। इसी प्रकार मानसिक रूप से प्रसन्न होने के बावजूद यदि शरीर में कोई पीड़ा है, तब भी व्यक्ति अपने कार्यो को ठीक प्रकार से पूरा नहीं कर सकेगा। कहने का आशय है कि यदि हम अपनी पूरी ऊर्जा के साथ कार्य करना चाहते हैं तो हमें शरीर के साथ-साथ मन और आत्मा को भी स्वस्थ बनाना होगा। आयुर्वेद के महान ग्रन्थ ‘‘सुश्रुत संहिता’’ में समग्र स्वास्थ्य की महत्ता का विवेचन करते हुये कहा गया है कि -

   समदोष: समाग्निश्च, समधातुमलक्रिय:।
   प्रसन्नात्मेन्द्रियमना:, स्वस्थइत्यभिधीयते।।’’ (सुश्रुत सूत्र 15:41)

अर्थात-जिस व्यक्ति के दोष, धातु एवं मल तथा अग्नि व्यापार सम हो अर्थात विकार रहित हो और जिसकी इन्द्रियाँ, मन और आत्मा प्रसन्न हो, वही स्वस्थ है।’’ इस प्रकार स्पष्ट है कि समग्र स्वास्थ्य ही हमारा लक्ष्य होना चाहिये और पूरक चिकित्सा पद्धति हमें इसी लक्ष्य की ओर अग्रसर करती है अर्थात इसमें स्वास्थ्य के शारीरिक पहलू के साथ-साथ मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक पहलू पर भी बल दिया जाता है, जिससे कि व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व का विकास हो सके।

स्वास्थ्य के रक्षात्मक एवं प्रगतिशील दोनों पहलुओं पर समान रूप से बल- 

पाठकों, पूरक चिकित्सा में स्वास्थ्य के रक्षात्मक पहलू के साथ -साथ प्रगतिशील पहलू पर भी बल डाला जाता है। इसका अर्थ यह है कि इस चिकित्सा पद्धति में न केवल उत्पन्न रोग को ठीक किया जाता है, वरन् ऐसे प्रयास किये जाते है कि भविष्य में व्यक्ति पुन: रोगग्रस्त ना हो अर्थात् उसकी प्र्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के उपाय किये जाते हैं। यहाँ आपकी जानकारी के लिये यह बता देना भी आवश्यक है कि प्रतिरोधक क्षमता भी केवल शारीरिक ही नहीं होती वरन् यह मानसिक और आध्यात्मिक भी होती है।

स्वत: रोग मुक्ति का सिद्धान्त- 

पूरक चिकित्सा का अगला सिद्धान्त स्वत: रोग मुक्ति का सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार शरीर में स्वयं में ही अपने को स्वस्थ रखने की क्षमता विद्यमान हैं। प्रकृति का यह नियम है कि यह विकृति को भीतर रहने नहीं देती। यदि विकृति शारीरिक है तो यह शारीरिक रोग के रूप में उभरती है और मानसिक है तो मानसिक रोग के रूप में। इस प्रकार शरीर रोगों के रूप में विकारों को उभारकर शरीर को स्वस्थ करता है। आप सोच रहे होंगे कि यदि शरीर स्वयं ही रोगमुक्त हो सकता है, तो विविध उपचार विधियों की क्या आवश्यकता है? इन उपचार विधियों की भी आवश्यकता है क्योंकि ये सभी विधियाँ शरीर को अपना कार्य करने में सहायता और सुविधा प्रदान करती है, जिससे रोग अपेक्षाकृृत जल्दी ठीक होता है। जैसे -हड्डी टूटने पर डॉक्टर प्लास्टर बाँध देता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि क्या प्लास्टर बॉधने से हड्डी जुड़ती है? नहीं। प्लास्टर तो इसलिये बाँधा जाता है कि हड्डी अपनी जगह पर बनी रहे। शरीर का वह अंग जहाँ की हड्डी टूटी है, वह हिले-डुले नहीं, जिससे की हड्डी जल्दी जुड़ सके। जोड़ने का कार्य तो शरीर स्वयं ही करता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पूरक चिकित्सा पद्धति के अनुसार शरीर स्वयं ही रोगों को ठीक करता है और उपचार की विभिन्न विधियों द्वारा ऐसी परिस्थितियाँ एवं सुविधायें उत्पन्न की जाती है, जिससे शरीर को अपना कार्य करने में सहयोग मिल सके और रोग ठीक होने की गति में वृद्धि हो सके।

प्राकृतिक जीवनशैली पर बल - 

पूरक चिकित्सा पद्धति प्राणी को प्राकृतिक जीवन जीने के लिये प्रेरित करती है। पाठकों, हम सभी इस तथ्य से सुपरिचित हैं कि आज इंसान जितनी भी समस्याओं से जूझ रहा है उनका मूल कारण अप्राकृतिक एवं यांत्रिक जीवनशैली है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक व्यक्ति एक मशीन की तरह कार्य करता रहता है। अत्यधिक धन और पद - प्रतिष्ठा की भूख ने इसको प्रकृति से दूर कर दिया है। दूसरों से प्रतिस्पर्द्धा की दौड़ में व्यक्ति ने अपनी मौलिकता को खो दिया है। परिणाम क्या मिला ? तनाव, अवसाद, भावनात्मक घुटन। अत: पाठकों, आज एक ऐसी उपचार विधि की आवश्यकता है जो पुन: व्यक्ति को प्रकृति की ओर लेकर जाये। उसे अपने जीवन के मूल लक्ष्य से अवगत कराकर प्रकृति के साथ साहचर्य निभाने के लिये प्रेरित करे। किसी कीमत पर अपनी मौलिकता को बरकरार रखने की प्रेरणा दे।

क्या आपने कभी सोचा है कि पशु-पक्षी-वनस्पतियों इनको क्यों कभी किसी चिकित्सक की आवश्यकता नहीं पड़ती। हालांकि समस्यायें इनके जीवन में भी आती है, विकारग्रस्त ये भी होते हैं। इसका मूल कारण यह है कि ये प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं। प्राकृतिक जीवन जीते हैं। इसीलिये मनुष्यों की अपेक्षा कम बीमार होते हैं और यदि कभी होते भी हैं तो प्राकृतिक जीवनशैली के कारण शीघ्रतापूर्वक ठीक हो जाते हैं। पाठकों, यदि हम वास्तव में प्राकृतिक जीवन जीना चाहते हैं तो हमें सूर्य के अनुसार दिनचर्या, रात्रिचर्या को व्यवस्थित करना चाहिये। सूर्य से अधिक अच्छी घड़ी कोई नहीं हो सकती। क्या आप जानते हैं कि यदि हमारी जैविक घड़ी सूर्य के अनुसार संचालित होती है तो हम प्राय: स्वस्थ रहते हैं।

पाठकों, आपने देखा भी होगा कि बहुत सारी पूरक चिकित्सा पद्धतियों के नाम से ही ऐसे हैं जो हमें प्रकृति की ओर प्रेरित करते हैं। जैसे- सुगन्ध चिकित्सा, पुष्प चिकित्सा, संगीत चिकित्सा, प्राकृतिक चिकित्सा इत्यादि।

इस प्रकार स्पष्ट है कि पूरक चिकित्सा पद्धति प्राकृतिक जीवनशैली पर आधारित है।

शीघ्रतापूर्वक नहीं वरन धीरे - धीरे रोग के समूल नाश पर बल- 

पूरक चिकित्सा की एक मान्यता यह भी है कि शीघ्रतापूर्वक कुछ समय तक ठीक होने की अपेक्षा धीरे-धीरे रोग को जड़ से ही समाप्त किया जाना चाहिये, ताकि भविष्य में वह रोग पुन: ना हो और रोग को दूर करने के साथ-साथ स्वास्थ्य संवर्द्धन पर भी बल देना चाहिये, क्योंकि ऊर्जा के संतुलन में समय लगता है। अत: आप समझ गये होंगे कि पूरक चिकित्सा पद्धति में ऊर्जा के संतुलन द्वारा धीरे-धीरे रोग का समूल नाश किया जाता है।
उपरोक्त विवरण से आप पूरक चिकित्सा पद्धति की अवधारणा को भली-भँाति समझ गये होंगे।

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