सहसंबंध का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकार

अनुक्रम
सहसंबंध- correlation शब्द की उत्पत्ति co-relation से हुई है जिसका अर्थ है-पारस्परिक सम्बन्ध। सह-सम्बन्ध इस बात का सूचक होता है। दो विशेषताओं के बीच कितना अंतसंबंध है इससे इसकी जानकारी मिलती है। जैसे -किसी व्यक्ति कि दो विषय कि विशेषताओं का परीक्षण द्वारा मापन करना ओर प्रत्येक व्यक्ति के दोनो विषयों के अलग-अलग प्राप्ताकों को तालिका में जोड़ों के रुप में व्यवस्थित करके सांख्यिकीय गणना द्वारा दोनों में सम्बन्ध ज्ञात किया जाता है उसे सह-सम्बन्ध कहते है।

सहसंबंध

सह संबंध की परिभाषा

  1. गिलफोर्ड के अनुसार - “सह-सम्बन्ध गुणांक वह अकेली संख्या है जो यह बताती है कि दो वस्तुएँ किस सीमा तक एक दूसरे से सह-सम्बन्धित है तथा एक के परिवर्तन दूसरे के परिवर्तनों को किस सीमा तक प्रभावित करते है।” 
  2. डी.एन. श्रीवास्तव के अनुसार - “जब दो चर राशियॉ इस प्रकार सम्बन्धित हो कि एक चर राशि के बढ़ने से दूसरी चर राशि बढ़े या धटे या इसके विपरीत हो तो उन दोनो चर राशियों में सह-सम्बन्ध पाया जाता है।” 
  3. बेलिस के अनुसार- “सह-सम्बन्ध का अभिप्राय है- आकडों के दो या अधिक विभिन्न समूहो की तुलना जिसके उसके सम्बन्ध को जाना जा सके और उस सम्बन्ध की मात्रा को अंकात्मक रुप में व्यक्त किया जा सके।”

सहसंबंध के प्रकार

सहसम्बंध तीन प्रकार का होता है -

धनात्मक सहसम्बंध -

जब किसी वस्तु, समूह अथवा घटना के किसी एक चर के मान में वृद्धि होने से दूसरे साहचर्य चर के मान में वृद्धि होती है अथवा उसके मान में कमी होने से दूसरे साहचर्य चर के मान में कमी होती है तो मान दोनों चरों के बीच पाए जाने वाले इस अनुरूप सम्बंध को धनात्मक सहसम्बंध करते हैं। उदाहरणार्थ किसी गैस का समान दाब पर तापक्रम बढ़ने से उसका आयतन बढ़ना अथवा तापक्रम कम होने से उसका आयतन कम होना गैस के दो चरौ- तापक्रम और आयतन के बीच धनात्मक सहसम्बंध है।

ऋणात्मक सहसम्बंध -

जब किसी वस्तु, समूह अथवा घटना के किसी एक चर के मान में वृद्धि होने से दूसरे साहचर्य चर के मान में कमी आती है अथवा उसके मान में कमी होने से दूसरे साहचर्य चर के मान में वृद्धि होती है तो इन दोनों चरों के बीच पाए जाने वाले इस प्रतिकूल सम्बंध को ऋणात्मक सहसम्बंध कहते हैं। उदाहरणार्थ किसी गैस का समान तापक्रम पर दाब बढ़ने से उसका आयतन कम होना अथवा दाब कम होने से उसका आयतन बढ़ना, गैस के दो चरों-दाब और आयतन के बीच ऋणात्मक सहसम्बंध है।

शून्य सहसम्बंध -

जब किसी वस्तु , समूह अथवा घटना के किसी एक चर में परिवर्तन होने से दूसरे साहचर्य चर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता तो इन दोनों चरों के बीच के सम्बंध को शून्य सहसम्बंध कहते हैं। उदाहरणार्थ किसी गैस के आयतन के बढ़ने अथवा घटने से उसके रासायनिक सूत्र में कोई अन्तर न होना गैस के दो चरों- आयतन और रासायनिक सूत्र के बीच शून्य सहसम्बंध है।

सहसंबंध की उपयोगिता, आवश्यकता और महत्व

विज्ञान का मूल आधार कार्य-कारण सम्बंध (Cause and Effect Relationship) है। इस सम्बंध की जानकारी के आधार पर किसी एक क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन से किसी दूसरे क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन की भविष्यवाणी की जा सकती है। इस प्रकार विज्ञान के क्षेत्र में तो सहसम्बंध की सबसे अधिक उपयोगिता है, उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है और उसका सबसे अधिक महत्व है। इस युग में मनोवैज्ञानिकों ने भी मानव व्यवहार के कारकों का पता लगाकर कार्य-कारण सम्बंधों की स्थापना की है। आज मानवीय व्यवहार में कार्य-कारण सम्बंधों को समझने के लिए सहसम्बंध प्रविधियों (Correlation Techniques) का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार आज मनोविज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में भी सहसम्बंध की बड़ी उपयोगिता है, इसकी बड़ी आवश्यकता है और इसका बड़ा महत्व है। यहाँ शिक्षा के क्षेत्र में सहसम्बंध की उपयोगिता, आवश्यकता एवं महत्व का संक्षेप में वर्णन प्रस्तुत है।
  1. दो विषयों के सहसम्बंधों की सहायता से किसी छात्र की एक विषय की योग्यता के आधार पर उसकी दूसरे विषय की योग्यता का अनुमान लगाया जा सकता है। 
  2. दो विषयों के सहसम्बंध की सहायता से यदि उपरोक्त अनुमान सही न निकले तो यह निदान करना आवश्यक हो जाता है कि उसका कारण क्या है। निदान करने के बाद उपचारात्मक शिक्षण की व्यवस्था की जाती है। 
  3. अध्ययन विषयों के सहसम्बंध की सहायता से छात्रों को शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन देने में सहायता मिलती है। 
  4. क्रियात्मक अनुसन्धान में सहसम्बंध का प्रयोग विशेष रूप से किया जाता है।

सहसंबंध की सीमाएँ

  1. किन्हीं दो विषयों के सहसम्बंध से उनके बीच सहसम्बंधों के मूल कारणों का ज्ञान नहीं होता। 
  2. किन्हीं दो विषयों के सहसम्बंध छात्रों की संख्या पर निर्भर करते हैं, छोटे समूह से प्राप्त सहसम्बंध की अपेक्षा बड़े समूह से प्राप्त सहसम्बंध अधिक विश्वसनीय होता है। 
  3. किन्हीं दो विषयों के बीच का सहसम्बंध विषयों की प्रकृति के साथ-साथ छात्रों की प्रकृति (योग्यता, रूचि और अभिरूचि) पर भी निर्भर करता है। अत: एक निदर्श से प्राप्त सहसम्बंध दूसरे निदर्श पर उसी रूप में लागू नहीं किया जा सकता। 
  4. सहसम्बंध गुणांक का अर्थापन परिस्थितियों पर निर्भर करता है इसलिए उसकी व्याख्या करना थोड़ा कठिन कार्य है।

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