जनसंचार का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएँ, कार्य एवं सिद्धांत

अनुक्रम
संचार के साथ ‘जन’ शब्द जुड़ने से ‘जनसंचार’ शब्द बनता है। ‘जन’ का अर्थ भीड़, समूह तथा जन समुदाय से है। मनुष्य के सन्दर्भ में ‘जन’ का अर्थ हे बड़ी संख्या में एकत्र लोग। ‘‘यदि ‘जन’ शब्द को संचार का विशेषण माने तो इसका अर्थ होगा - ‘‘बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करना या सम्मिलित करना। अर्थात् जब संचार की प्रक्रिया या संदेषों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया बड़े पैमाने पर होती है तो वह जनसंचार कहलाता है। इसमें महत्व विचारों का हे मशीन का नहीं क्योंकि मनुष्य ही विचारों का जनक है, मशीनों का अन्वेषक हे और जनसंचार का पुरस्कर्ता है।

टेक्नालॉजी (प्रोद्योगिकी) के कारण अथवा उसके सहयोग से जनसंचार को प्रभावी ढ़ंग से अंजाम दिया गया है। अत: संचार की अपेक्षा जनसंचार एक व्यापक क्रिया है। जब हम एक बड़े श्रोता या दर्शक समूह के साथ संचार करते हैं, तो वह जनसंचार कहलाता है। जनसंचार का श्रोता, दर्शक एक समूह होता है।

जनसंचार प्राय: एकतरफा होता है। श्रोता और दर्शक गुमनाम होते हें। रेडियो का श्रोता रेडियो वाचक को देख नहीं सकता, दूरदर्शन का दर्शक कार्यक्रम देने वाले का देख तो सकता है पर उससे बात नहीं कर सकता। श्रोता उनको नहीं जानता। इसलिए जो संदेश श्रोता या दर्शकों तक पहुंचता हे उसकी प्रतिक्रिया यानी फ़ीडबैक वापस श्रोता तक नहीं लौटती। जनसंचार में प्रेषक और बड़ी संख्या में श्रोता के बीच एक साथ सम्पक्र स्थापित होता रहता है। इसमें इस बात की संभावना बनी रहती है कि सूचना या जानकारी प्राप्त करने वाले लोगों में से अधिकांश में कुछ न कुछ प्रतिक्रिया अवष्य उत्पन्न होगी। 

जनसंचार के माध्यम हें- समाचार पत्र, रेडियो, टेलीविजन, फिल्म, कम्प्यूटर आदि। आमतौर पर जनसंचार शब्द का प्रयोग टीवी, रेडियो, समाचार-पत्र, पत्रिका, फिल्म या संगीत रिकार्ड आदि के माध्यम से सूचना, संदेश, कला व मनोरंजन सामग्री के वितरण को दर्शाने के लिए किया जाता है।

अन्तवैयक्तिक, समूह व अन्य आमने-सामने की स्थिति वाले संचार से जनसंचार काफी भिन्न है। इस संचार में एक संदेश को काफी बडी संख्या में आडियंस के पास पहुंचाया जाता है। संदेश प्राप्त करने वाले लोगों की सांस्कृतिक, भौगोलिक, भाषायी दशा इत्यादि में कोई समानता हो भी सकती है और नहीं भी।

अधिसंख्य लोगों के साथ एक ही वक्त में संचार करने की प्रक्रिया को जनसंचार कहते हैं। यह प्रक्रिया संचार के अन्य सभी स्वरूपों से भिन्न है क्योंकि इसमें एक छोटा सा समूह काफी बडे जनसमूह को एक ही समय में एक ही संदेश उपलब्ध करवाता है। संदेश प्राप्त करने वाले लोगों की प्रकृति, मान्यताएं, विचार, मूल्य इत्यादि एक-दूसरे से काफी भिन्न होते हैं। संचार के इस स्वरूप में संदेश प्रेषक और प्रापक के बीच भौतिक व भावनात्मक स्तर पर भी एक-दूसरे से दूर होते हैं। इस प्रक्रिया में संदेश का उत्पादन करने व उसे दूर-दूर तक प्रसारित करने के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का सहारा लिया जाता है। जनसंचार एक प्रकार से समय व स्थान के बंधनों से पूरी तरह मुक्त है।

संदेश प्राप्त करने वाले विविध प्रकृति के लोगों को परिभाषित करने के लिए अंग्रेजी के शब्द आडियंस का प्रयोग किया जाता है। माध्यम विशेष के आधार पर इन्हें पाठक, श्रोता, दर्शक इत्यादि की श्रेणी में विभाजित किया जाता है।

जनसंचार में संदेश प्रेषित करने के लिए कई स्रोत उपलब्ध हैं। इन स्रोतों को जनमाध्यम बोला जाता है। आमतौर पर समाचार-पत्र, पत्रिका, पुस्तक, रेडियो, टीवी, फिल्म, संगीत रिकार्ड आदि को जनमाध्यम की श्रेणी में शामिल किया जाता है।

जनसंचार की परिभाषाएं

  1. जब कुछ लोगों का समूह अधिसंख्य अज्ञात व विषमजातीय जनसमूह को कुछ विशिष्ट माध्यमों की सहायता से कोई संदेश प्रेषित करे तो वह प्रक्रिया जनसंचार कहलताती है। 
  2. संदेश, जनमाध्यम और श्रोतावृंद जनसंचार के सबसे महत्वपूर्ण तत्व हैं। 
  3. जनमाध्यमों की सहायता से अधिसंख्य, विषमजातीय समूहों तक एक ही समय में समान संदेश पहुंचाने की प्रक्रिया जनसंचार है। इसमें लोगों द्वारा मीडिया का प्रयोग व मीडिया के लोगों पर प्रभाव का भी अध्ययन किया जाता है।

जनसंचार की प्रमुख विशेषताएँ

  1. जनसंचार की एक विशेषता है कि जनसंचार द्वारा समाज की बौद्धिक सम्पदा का हस्तांतरण संभव होता है।
  2. जनसंचार द्वारा विभिन्न विषयों पर आधुनिक जानकारी उपलब्ध कराई जाती है ताकि अनेक समस्याओं का हल तुरंत खोजा जा सकें।
  3. जनसंचार द्वारा सन्देश तीव्र गति से भेजा जाता है। समाचार पत्र, रेडियो, टेलीविजन, इंटरनेट, मोबाइलों आदि के द्वारा कोई भी सन्देश तीव्रगति से आम जनता तक पहुँचाया जा सकता है।
  4. युद्ध, आपातकाल, दुघ्रटना आदि के समय जनसंचार की मुख्य भूमिका होती हे। 
  5. जनसंचार की सबसे बडी़ विशेषता यह है कि इसमें जन सामान्य की प्रतिक्रिया का पता चल जाता है।
  6. जनसंचार का प्रभाव गहरा होता हे और उसे बदला भी जा सकता हे। 
  7. जनसंचार एकतरफा होता हे।
इस प्रकार हम देखते है जनसंचार प्रोद्योगिकी या तकनीकी आधार पर विषाल रूप में लोगों तक सूचना के संग्रह और प्रेशण पर आधारित प्रक्रिया है। पारिख के अनुसार- ‘‘आज के विकसित प्रोद्योगिकी के युग में व्यक्ति घर बैठे ही अकेले फिल्म देख सकता है, घर बेठे ही दुनिया से सम्पक्र कर सकता है।’’

जनसंचार कि विकास ने भौगोलिक एवं समय की सीमा को भी तोड़ दिया है। जनसंचार के कारण ही आज ‘ग्लोबल विलेज’ की परिकल्पना साकार हो रही हे। आधुनिक युग में जनसंचार माध्यमों ने सामाजिक अधिरचना के अन्तर्गत लम्बी छलांगें मारी हे। संचार माध्यमों के क्रांन्तिकारी विकास ने दुनिया को गाँव में बदल दिया है। यही नहीं, इस प्रक्रिया में पुराने समाजों में परिवत्रन हुआ है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘टेक्नोलाजी कम्यूनिकेषन एण्ड चेंज’’ में लर्नर ने विस्तार से बताया हे कि ‘‘आधुनिक जनसंचार माध्यम सामाजिक परिवर्तन के बडे़ औजार हे।’’

जनसंचार के कार्य

जनसंचार के तीन मूलभूत काम माने जाते हैं:
  1. लोगों को सूचित करना
  2. लोगों का मनोरंजन करना
  3. उन्हें समझाना या किसी काम के लिए मनाना
साथ ही साथ यह माध्यम लोगों को शिक्षित करने व सभ्यताओं के प्रचार में भी सहायता करते हैं। यहां हम उपर्युक्त तीन कार्यों के बारे में ही बात करेंगे।

1.सूचित करना 

सूचनाओं का प्रसारण समाचार माध्यमों का प्राथमिक कार्य है। समाचार-पत्र, रेडियो और टीवी विश्वभर की खबरें उपलब्ध करवाकर हमारा सूचना स्तर बढाने में सहायता करते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से समाचार की अवधारणा में फर्क आता जा रहा है। समाचार माध्यम अब किसी घटना को ‘जैसे का तैसा’ बताने का कार्य नहीं करते हैं। समाचारों का वर्णन करने से लेकर इनमें मानवीय अभिरुचि, विश्लेषण और फीचराइजेशन को भी अब शामिल कर लिया गया है।

पत्रकार आज सिर्फ पत्रकार ही नहीं रह गए हैं। वे आज समाचार विश्लेषक बन गए हैं, जो किसी भी महत्वपूर्ण समाचार के आगामी प्रभावों के बारे में चर्चा करते हैं। आजकल समाचार माध्यमों में ‘साफ्ट स्टोरीज’ पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। समाचार माध्यम आज हमें किसी भी घटना, विचार, नीति, परिवर्तन, दर्शन आदि को समझने में भी सहायता करते हैं।

2.मनोरंजन करना 

जनसंचार का एक अत्यधिक प्रचलित कार्य लोगों का मनोरंजन करना भी है। रेडियो, टीवी और फिल्म तो सामान्यतया मनोरंजन का ही साधन समझे जाते हैं। समाचार-पत्र भी कामिक्स, कार्टून, फीचर, वर्ग पहेली, चक्करघिन्नी, सूडोकू आदि के माध्यम से पाठकों को मनोरंजन की सामग्री उपलब्ध करवाते हैं।

रेडियो आमतौर पर संगीत के माध्यम से लोगों का मनोरंजन करता है। हास्य नाटिका, नाटक, वार्ता इत्यादि के माध्यम से भी रेडियो मनोरंजन उपलब्ध करवाता है।

टीवी तो मनोरंजन का सबसे बडा साधन बन चुका है। गंभीर विषयों जैसे कि समाचार, प्रकृति, वन्य जीवन से जुडे हुए चैनल भी हास्य की सामग्री प्रसारित करते हैं।

सभी जन माध्यमों में से शायद फिल्म ही ऐसा है, जो सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन के लिए बना है। वृत चित्र, शैक्षणिक फिल्मों और कला फिल्मों को छोड कर बाकी सभी फिल्में मनोरंजन ही उपलब्ध करवाती हैं।

3.लोगों को किसी काम के लिए प्रोत्साहित करना 

किसी वस्तु, सेवा, विचार, व्यक्ति, स्थान, घटना इत्यादि के प्रति लोगों को समझाने या प्रोत्साहित करने के लिए भी जन माध्यमों को औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। अलग-अलग जनमाध्यमों की अलग-अलग प्रकृति व पहुंच होती है (प्रसार, पाठक संख्या, श्रोता संख्या, दर्शक संख्या इत्यादि)।

विज्ञापनदाता और विज्ञापन एजेंसियां इन माध्यमों की प्रकृति को पहचानते हैं। संदेश की प्रकृति और लक्षित समूह को ध्यान में रखकर निर्धारित किया जाता है कि उसे किस माध्यम से प्रसारित किया जाए।

हालांकि संचार शास्त्री किसी भी एक परिभाषा पर सहमत नहीं हो पाए हैं। संचार की बहुप्रचलित परिभाषा के अनुसार ‘संचार वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी व्यवस्था के दो या अधिक तत्व किसी वांछित लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु अन्योन्यक्रिया करते हैं।’ एक प्रक्रिया के तौर पर यह निरंतर गतिशील, परिवर्तनशील व अंतहीन है। हमने भूतकाल में जो कुछ पढा, सुना और देखा है, वह आज भी कुछ हद तक हमें प्रभावित करता है।

प्रतिदिन हम हजारों संदेश प्राप्त करते हैं। उन पर प्रक्रिया होने के बाद उनका मूल्यांकन होता है। इस मूल्यांकन के आधार पर हम कुछ संदेशों को खारिज कर देते हैं और कुछ को अपने मस्तिष्क में संग्रहित सूचना, विचार, मत इत्यादि के साथ जमा कर लेते हैं। यह सभी सूचनाएं हमें किसी न किसी स्तर पर प्रभावित करती रहती हैं। आज हम संचार के माध्यम से जो कुछ भी सीख रहे हैं, शर्तिया तौर पर भविष्य में हमारे व्यवहार पर कहीं न कहीं उसका असर देखने को मिलेगा। 

जनसंचार के गुणधर्म

हमने देखा कि संचार के अन्य स्वरूपों से जनसंचार किस प्रकार भिन्न है। जनसंचार के भी कुछ अद्वितीय गुणधर्म होते हैं, जिनके बारे में जानना जरूरी है।

1.विलम्बित प्रतिपुष्टि - अन्त:व्यैक्तिक, अन्तवैयक्तिक व समूह संचार की अपेक्षा जनसंचार में स्रोत व प्रापक के बीच की दूरी बहुत ज्यादा होती है। इसी वजह से आडियंस की प्रतिपुष्टि सीमित व विलम्बित रहती है। कई बार तो यह बहुत कम व नगण्य हो जाती है। 

2.गेटकीपिंग - यह भी जनसंचार का एक अद्वितीय गुणधर्म है। जनसंचार के व्यापक प्रभाव के चलते यह आवश्यकता महसूस की गई कि लगातार प्रसारित होने वाले संदेश के चयन व संपादन पर कुछ नियंत्रण अवश्य होना चाहिए। जनसंचार में सांगठनिक व व्यक्तिगत दोनों ही स्तरों पर गेटकीपिंग की जाती है। 

उदाहरण के लिए पत्रकार, संपादकीय दल व लोकपाल अपने-अपने स्तर पर संदेश की सामग्री की जांच पडताल करते हैं। लोकपाल यह पडताल करते हैं कि कहीं कुछ ऐसा तो प्रकाशित नहीं हो रहा है जो कि कानूनी रूप से संकट पैदा कर दे। (भारत के समाचार-पत्रों में तो सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में ही लोकपाल कार्यरत है।) सरकार, प्रेस परिषद, एडीटर्स गिल्ड आदि कई संगठन हैं जो कि समाचार-पत्रों की सामग्री पर निगाह रखते हैं। भले ही सांगठनिक हो या फिर व्यक्तिगत, गेटकीपिंग में कुछ ऐसे मानक तैयार करने की चेष्टा की जाती है, जो कि संदेश विकसित करते समय व उसे प्रस्तुत करते समय दिशा-निर्देशक की तरह काम करें। 

जनसंचार के सिद्धांत

यहां जनसंचार के कुछ प्रमुख सिद्धांतों के नाम दिए जा रहे हैं -
  1. एजेंडा सैटिंग थ्योरी
  2. कल्टीवेशन थ्योरी
  3. कल्चरल इम्पीरियलिज्म थ्योरी
  4. डिफ्यूजन थ्योरी
  5. फंक्शनल थ्योरी ऑफ मास कम्यूनिकेशन
  6. ह्यूमैन एक्शन एप्रोच थ्योरी
  7. मीडिया डीपेंडेंसी थ्योरी
  8. मीडिया इक्वेशन थ्योरी
  9. रूल बेस्ड थ्योरी
  10. स्पायरल ऑफ साइलेंस थ्योरी
  11. टैक्नोलाजिकल डिटरमिनेशन थ्योरी
  12. यूजेस एंड ग्राटीफिकेशन थ्योरी

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