नातेदारी का अर्थ

अनुक्रम
नातेदारी शब्द के कई अर्थ है। वास्तव में इस शब्द की जटिलता इतनी अधिक है कि इसके किसी भी अध्ययन में हमें सर्वप्रथम इसका अर्थ स्पष्ट कर लेना चाहिए। नातेदारी का एक अर्थ जैविक है, दूसरा अर्थ व्यवहार संबंधी है और तीसरा भाषा संबंधी। यह बहुत आवश्यक है कि हम नातेदारी के इन तीनों संदर्भों को एक दूसरे से पृथक रखें।

संक्षेप में यह कह सकते हैं कि जो लोग आनुवंशिकता और जैविकता द्वारा बंधे हुए हैं स्वजन या नातेदार है। इस तरह से नातेदारी व्यवस्था जैविक जाल का एक स्वरूप है। इस जाल में व्यक्ति एक गांव की तरह है जो वाहकाणुओं को दूसरों से ग्रहण करता है और इनकों दूसरों को प्रदान करता है। जैविक संबंधों को लेकर मनुष्यों में दो प्रकार के सम्बन्ध हो सकते हैं। सम्बन्धों का एक प्रकार वंशज से सम्बद्ध है और दूसरा यौन सम्बन्धों से जुड़ा हुआ है। इस भांति जैविक अर्थ में सभी नातेदार या तो वंशज है या यौन संबंधों से जुड़े हुए है दत्तक व्यवस्था एक प्रकार से समाज द्वारा स्वीकृत विधि है जो जैविक सम्बन्धों का स्थान ग्रहण करती है। सामान्य शब्दों में हमारे नातेदार दो तरह के हो सकते हैं एक तो वे, जो हमसे रक्त द्वारा जुड़े हुए होते हैं। इन्हें हम सम्बन्धी नातेदार कहते हैं। दूसरे प्रकार के नातेदार विवाह से जुड़े होते हैं। इन्हें हम विवाह सम्बन्धी नातेदार कहते हैं।

नातेदारी व्यवस्था पर मानवशास्त्रियों ने बहुत अधिक काम किया है। उनका क्षेत्रीय कार्य आदिवासियों में हुआ है। प्रमुख मानवशास्त्रियों में मुरडॉक, लेवी, स्ट्राऊस, रेडक्लिफ, ब्रापन, रॉबिन फोक्स, ईवान्स, प्रिट्चार्ड आदि उल्लेखनीय है। मानवशास्त्रियों में हमारे देश में ईरावती कर्वे के अध्ययनों का बहुत बड़ा योगदान है। यदि हम मानवशास्त्रियों की तुलना में समाजशास्त्रियों का नातेदारी क्षेत्र में योगदान की चर्चा करें तो कहना पडे़गा कि इन्होंने इसमें बहुत कम काम किया है। इसका बहुत बड़ा कारण यह है कि समाजशास्त्रियों पर ध्यान विशेष रूप से औद्योगिक नगरीय समाज और इससे संबंधित संस्थाओं के अध्ययन पर केन्द्रित रहा है। औद्योगिक नगरीय संरचना में नातेदारी और इससे जुड़े हुए सामाजिक सम्बन्धों का प्रभाव काफी कमजोर होता गया है। इसी कारण समाजशास्त्रियां का ध्यान भी इसी तरफ कम रहा है। इस प्रसंग में यह बात याद रखने की है आज भी नातेदारी व्यवस्था का, जनजातीय और ग्रामीण सामाजिक संरचना में विशेष महत्व है।

नातेदारी के संरचनात्मक सिद्धांत

नातेदारी के सिऋांत का सर्वप्रथम प्रारंभ मोरगन से है। मोरगन से लेकर लेवी स्ट्राऊस तक नातेदारी के अध्ययन की विधियों और उसके सैद्धान्तिक कोष में पिछली एक सदी में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है। मोरगन ने नातेदारों के वर्गीकरण के लिए सर्वप्रथम वर्गात्मक नातेदारी व्यवस्था को रखा। इस सिद्धात पर टीका करते हुए लेजली व्हाइट ने लिखा है : रिश्तेदारों को मानने के रीजि-रिवाज इस बात को कहते हैं कि नातेदारी का वैज्ञानिक महत्व है नातेदारी के अध्ययन की कई विधियां है। फ्रायड और उनके सम्प्रदाय के लेखकों ने इस विधि का अध्ययन मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और उद्गम द्वारा किया है। इसके अतिरिक्त नातेदारी अध्ययन की जो संरचनात्मक विधियां हैं उन्हें दो भागों में रखा जा सकता है। पहली विधि में यह अध्ययन ऐतिहासिक विधि या विश्लेषणात्मक विधि द्वारा किया जाता है। दूसरी विधि, प्रकार्यात्मक संरचनात्मक है। इन दोनों विधियों का प्रयोग मोरगन से लेकर आज तक बराबर हुआ है।

वंशानुक्रम और नातेदारी 

समाज में कई संस्थाएं होती है। नातेदारी भी एक संस्था है। इस संस्था में व्यक्ति का स्थान, उसके अधिकार, और कर्त्तव्य, सम्पत्ति पर उसका दावा, ये सब बातें इस तथ्य पर निर्भर है कि वंशावलिक सम्बन्धों के जाल में व्यक्ति का क्या स्थान है? मनुष्य के प्राथमिक सम्बन्ध उसके नातेदारी के सम्बन्ध ही है और नातेदारी सम्बन्धों का बहुत बड़ा आधार उसकी वंशानुक्रम समूह की सदस्यता है। नातेदारी और वंशानुक्रम एक ही नहीं है। एक अर्थ में वे सब लोग सगे-सम्बन्धी है जिनका समान रक्त है। अर्थ हुआ : एक ही पूर्वज की संतान जिसकी नसों में एक ही पिता का रक्त बहता है, रक्त संबंधी नातेदार है। रक्त सम्बन्धी नातेदार केवल जैविक आधार पर ही गिने जाते हैं। जैसा कि रिवर्स ने कहा है कि नातेदारी व्यवस्था जैविक बंधन की एक सामाजिक मान्यता है। बाद के लेखक नातेदारी के अर्थ को इतना खींच कर ले गये कि नातेदारी संबंध केवल सामाजिक मान्यता मात्र ही रह गया और इसका जैविक सम्बन्धों से कोई वास्ता नहीं रहा। शायद नातेदारी का ऐसा अर्थ अनुचित है। रिवर्स की परिभाषा को थोड़ा अभिव्यक्ति जैविक मुहावरें में होती है। यह अवश्य देखा जाता है कि कभी-कभी जैविक संबंधों के नहीं होने पर भी कुछ व्यक्तियों को नातेदार गिना जाता है। इसका उदाहरण दत्तक पुत्र है लेकिन इस तरह के नातेदारों की संख्या बहुत सीमित होती है।

नातेदारी के बंधन एक व्यक्ति को भूमि में हिस्सेदारी, परिवार की सम्पत्ति में सांझेदारी और पारस्परिक सहयोग का अधिकार देते हैं। साधारणतया नातेदारी में दो तरह के नातेदार होते हैं :एक नातेदार वे हैं, जिनका रक्त सम्बन्ध है, जिनका पूर्वज एक ही है; और दूसरे नातेदार वे है जो विवाह द्वारा नातेदारी सम्बन्ध से जुड़े है।

वंशानुक्रम शब्द का अर्थ उन मान्यता प्राप्त सामाजिक सबंधों से है जिन्हें एक व्यक्ति अपने पूर्वजों के साथ जोड़ता है और पूर्वज वह है जिसकी वह संतान है। किसी भी व्यक्ति के वंशानुक्रम को या तो उसके पिता के परिवार से या माता के परिवा से या दोनों से गिना जाता है। जब एक व्यक्ति का वंश उसके पिता के नाम से गिना जाता है तो इसे पितृवंशीय वंशानुक्रम कहते है। जब वंश को व्यक्ति की माता की ओर से गिना जाता है तो इसे मातृवंशीय वंशानुक्रम कहते हैं। वंशानुक्रम की इस व्यवस्था को एक पक्षीय वंशानुक्रम कहते हैं। कुछ लेखक पितृवंशीय के स्थान पर पैतृकबंध का प्रयोग करते है। इसी प्रकार मातृवंशीय के स्थान पर वे मातृक वंशानुक्रम काम में लाते हैं। अपवाद रूप में कुछ ऐसी जन-जातियां भी है जिन्हें उभयवंशीय भी कहते हैं। यहां यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इस समूह में वे लोग नहीं है जो विवाह संबंधी नातेदार है। कभी-कभी काल्पतकन जैविक सम्बन्धों को भी स्वीकार किया जाता है। धर्म के आधार पर जैविक संबंध स्थापित हो जाते हैं। हम बोलचाल की भाषा में प्राय: धर्म का भाई या धर्म की बहिन की चर्चा करते हैं।

वंशानुक्रम बंधुत्व को और भी अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। इसका विश्लेषण हम सुविधा के लिए विवाह से प्रारंभ करेंगे। प्रत्येक समाज पुरुष और स्त्री में शारीरिक बनावट को लेकर अंतर करता है। यह इस बनावट के कारण ही है कि स्त्री बच्चों का प्रजनन करती है। पुरुष और स्त्री में विवाह द्वारा यौन संबंध होते हैं। इस तरह पहला रिश्तेदार तो पुरुष का उस स्त्री से है जिससे वह विवाह करता है। इस प्रकार के सम्बन्ध को विवाह रिश्तेदार कहते है। पति-पत्नी से जो संतान उत्पन्न होती है उस संतान का अपने माता-पिता से जो संबंध होता है उसे वंशानुक्रम कहते हैं। इस परिवार में जब दूसरी संतान का जन्म होता है तो एक नये प्रकार के वंशानुक्रम सम्बन्ध पैदा होते हैं। अब ये दोनों बच्चे अपनी उत्पति अपने माता-पिता से मानते है। अत: इन बच्चों का अपने माता-पिता के साथ जो संबंध है उसे नातेदारी व्यवस्था में वंशानुक्रम कहा जाता है। वंशानुक्रम सम्बन्ध के अतिरिक्त यहां हमें एक और संबंध भी मिलता है। परिवार के दोनों बच्चें आपस में भी सम्बन्धी है या तो वे भाई-भाई है, बहिन-बहिन है, या भाई-बहिन। बच्चों में पारस्परिक सम्बन्धों को नातेदारी व्यवस्था में समापाश्र्व नातेदार कहते हैं। इस विवेचन का अर्थ यह हुआ कि एक ही माता-पिता के बच्चे एक ही वंशानुक्रम के हिस्सेदार या सांझेदार होते है लेकिन वे परस्पर एक-दूसरे के लिए वंशानुक्रम स्वजन नहीं है वे तो केवल अर्थात् समपाश्र्व नातेदार है।

बोलचाल की भाषा में समरक्त नातेदारों की गिनती करना चाहें तो इसका यह उपाय है कि हम किन लोगों को अपना नातेदार समझते है और इसके उत्तर में जो नातेदार मिले उन्हें हम नातेदारों के विवरण में रख दें। इस प्रकार का कार्य सबसे पहले मोरगन ने किया था। उन्होंने नातेदारों का विवरण देकर उनका वर्गीकरण कर दिया। मोरगन ने बताया कि वे व्यक्ति जिन्हें हम ‘‘पिता, माता, भाई, बहिन’’ आदि नाम से पुकारते है उन्हें दूसरे व्यक्ति भी इसी नाम से पुकार सकते हैं। इस प्रकार से सभी व्यक्ति जो रक्त से संबंधित है उन्हें पितृ-नातेदार या मातृ नातेदार कहते हैं और वे लोग जो विवाह से संबंधी है, विवाह नातेदार कहलाते है। वंशानुक्रम नातेदारी का विश्लेषण में एक और पद का प्रयोग भी होता है जिसे सम्मिलित समूह कहते हैं। इस समूह में भी वे लोग आते है जिनका एक ही वंशानुक्रम होता है, जो वंश की समपत्ति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक धारण करते रहते हैं। पितृवंशीय या पैतृक नातेदार कहलाते हैं। ऐसे समूह जिनमें एक बच्चे के साथ वंशानुक्रम की कड़ी स्त्री से जुड़ जाती है, मातृवंशीय या मृतत नातेदार कहते हैं। अंग्रेजी का शब्द यूटेराइन लेटिन भाषा का है जिसका अर्थ स्त्री वंशानुक्रम होता है।

वंशानुक्रम के आधार पर बना हुआ सम्मिलित समूह तकनीकी भाषा में वंश कहलाता है। यदि कोई व्यक्ति पितृवंशीय है तो इससे उत्पन्न हुई सन्तान पिता के वंश से जोड़ी जाती है। पिता के माध्यम से ऐसे पुत्र का वंश का उत्पादन साधनों पर अधिकार होता है, चाहे वे उत्पादन भूमि, पशु या कोई छोटा-बड़ा व्यवसाय हो। मातुवंशीय समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपना संबंध माँ के संबंध से रखता है, वंश की सम्पत्ति पर अधिकार ऐसे समाजों में माता का होता है। ऐसे कुछ अपवाद मिले हैं, जहां मातृवंशीय परिवारों में सम्पत्ति पर माता का अधिकार नहीं होता। पिछले पृष्ठों में हमनें वंशानुक्रम नातेदारों का विवेचन किया है।

संक्षेप में हम यह कहेंगें कि वंशानुक्रम नातेदार वे है जिनकी इस समूह में सदस्यता स्वत: जन्म से होती है, जिसमें वंश का नाम एकपक्षीय, मातृ या पितृ होता है और जो अपनी इस परम्परा को सतत बनाये रखते है। इस समूह के दो पक्ष है। एक वह जिसमें वंश का संबंध उपर की पीढ़ियों के साथ जोड़ा जाता है और दूसरा वह जिसमें संबंधों का आधार वंशानुक्रम न होकर एक वंश की संतान होता है। यह समुह समपाश्र्व नातेदारी समूह कहा जाता है।

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