संचार क्या है?

अनुक्रम
कम्युनिकेशन (Communication) शब्द लैटिन भाषा के कम्युनिस (Communis) से बना है जिसका अर्थ है to impart, make common । मन के विचारों व भावों का आदान-प्रदान करना अथवा विचारों को सर्वसामान्य बनाकर दूसरों के साथ बाँटना ही संचार है ।संचार शब्द, अंग्रेजी भाषा के शब्द का हिन्दी रूपान्तरण है । जिसका विकास Commune शब्द से हुआ है । जिसका अर्थ है अदान-प्रदान करना अर्थात बाँटना ।

संचार में हम लोग कुछ चीजों का आदान-प्रदान करते हैं, तो कुछ लोग इसे सहभागिता की प्रक्रिया मानते हैं। यह तो हम सभी समझते हैं कि संचार है क्या। हम सभी अधिकतर समय संचार की प्रक्रिया में ही लगे रहते हैं। हम कभी संदेश प्रेषक तो कभी प्रापक की भूमिका निभाते हैं। कई बार संचार करने के लिए कुछ मशीनी माध्यमों का प्रयोग भी करना पड जाता है। सफलता व अन्य सभी उद्देश्यों को प्राप्त करने में संचार सहायक बनता है।

उपर्युक्त बातों के आधार पर हम संचार का वर्णन कर सकते हैं। संचार पर चर्चा भी कर सकते हैं। लेकिन जैसे ही हम संचार को परिभाषित करने की कोशिश करेंगे, हम पाएंगे कि यह बहुत ही जटिल कार्य है।

आइए देखते हैं कुछ विशेषज्ञों ने संचार को किस प्रकार परिभाषित किया है।
  1. Larry L. Barker & D. A. Barker के अनुसार : किसी एक निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक व्यवस्था के दो घटकों द्वारा की जाने वाली अन्योन्यक्रिया को संचार कहा जाता है। (इनके अनुसार संचार गतिशील, परिवर्तनशील व अंतहीन प्रक्रिया है।)
  2. J. P. Legan के अनुसार : संचार वह प्रक्रिया है, जिसमें दो या अधिक व्यक्ति आपस में किसी एक संदेश पर समान समझ पैदा करने के लिए विचारों, भावों, तथ्यों, प्रभावों इत्यादि का आदान-प्रदान करते हैं।
  3. Brooker के अनुसार : संदेश के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक कोई अर्थ प्रेषित करने की प्रक्रिया संचार है।
  4. Weaver के अनुसार : संचार नामक प्रक्रिया की सहायता से हम दूसरों को आसानी से प्रभावित कर सकते हैैं।
  5. Thayer के अनुसार : पारस्परिक समझ, विश्वास व अच्छे मानवीय संबंध बनाने के लिए विचारों व सूचनाओं का आदान-प्रदान करने की प्रक्रिया संचार है।
  6. L. Brown के अनुसार : विचार, भाव और कर्तव्य इत्यादि के आदान-प्रदान की प्रक्रिया को संचार कहते हैं।
  7. Wilbur Schramm के अनुसार : उद्दीपकों का प्रसारण ही संचार है।
  8. John Harris के अनुसार : समानता स्थापित करने की प्रक्रिया ही संचार है।
  9. Dennis McQuil के अनुसार : संचार लोगों के बीच में समानता की भावना को बढ़ता है, लेकिन संचार होने के लिए समानता होना एक आवश्यक शर्त है। संचार लगभग वही है जो कि हम अपने दैनिक क्रिया कलापों में करते हैं। लोगों के आपसी संबंधों से इसका काफी कुछ लेना देना है। यह काफी साधारण से काफी जटिल हो सकता है। हम संचार कैसे करें, यह काफी हद तक संदेश, प्रेषक व प्रापक की प्रकृति पर निर्भर करता है। यहां संचार की कुछ और परिभाषाएं दी गई हैं।
संचार वह प्रक्रिया है, जिसमें लोग भावों की सहभागिता करते हैं। एक व्यक्ति (संचारकर्ता) द्वारा दूसरों (प्रापक) के व्यवहार में बदलाव के लिए उद्दीपक प्रसारित करने की प्रक्रिया संचार है।

संचार की श्रेणियां

अन्त:व्यैक्तिक संचार

मनुष्य द्वारा अपने आप से बात करने यानी कि दिमाग में कुछ सोचने विचारने की प्रक्रिया को अन्त:व्यैक्तिक संचार कहा जाता है। सोच, विचार प्रक्रिया, भावनात्मक प्रतिक्रिया, दृष्टिकोण, मूल्य और विश्वास, स्व अवधारणा, अर्थों की रचना व उनकी व्याख्या इसी संचार के अन्तर्गत आते हैं।

अन्त:व्यैक्तिक संचार

दो या दो से अधिक लोगों के बीच होने वाले संचारीय आदान-प्रदान की प्रक्रिया अन्त:व्यैक्तिक संचार कहलाती है। इस प्रकार के संचार में संदेश प्रसारित करने के लिए एक से अधिक स्रोतों का भी प्रयोग किया जा सकता है। जैसे हम शाब्दिक संचार करते वक्त शारीरिक भाव भंगिमाओं से भी कुछ संदेश प्रेषित कर रहे होते हैं।

समूह संचार

सांचे दृष्टिकोण, उद्देश्य या हितों वाले कुछ लोगों का समूह आपस में जो संचार करता है वह समूह संचार की श्रेणी में आता है। इस संचार के प्रतिभागी सांझे मूल्य या व्यवहार के मानक प्रदर्शित करते हैं।

जन माध्यम

आमतौर पर जनमाध्यमों को परिभाषित करते हुए कहा जाता है कि “किसी संदेश का व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन व प्रसार करने वाले संगठन जनमाध्यम हैं।” 1939 में हैरबर्ट ब्लूमर ने मानव एक़ित्रकरण की चार श्रेणियां निर्धारित की थीं। उनके अनुसार एक जगह एकत्रित होने वाले लोगों को समूह, जन समूह, भीडò और मास कहा जाता है। किसी भाषण, लेख, संकेत या व्यवहार के माध्यम से विचार, सूचना, संदेश इत्यादि का आदान-प्रदान ही संचार है। यह सूचना या विचारों को प्रभावशाली तरीके से दूसरों तक पहुंचाने के लिए सही शब्दों व संकेतों के चयन की तकनीक व कला है।

जनसंचार के क्षेत्र में हम उन साधनों के बारे में भी बात करते हैं, जिनमें काफी तीव्र गति से संदेश को काफी लोगों तक पहुंचाया जाता है। उदाहरण के लिए मुद्रण अथवा प्रसारण के माध्यम। इसमें सूचना के प्रसारण से जुडे विभिन्न पेशों जैसे कि विज्ञापन, पत्रकारिता इत्यादि को शामिल किया जाता है। इस प्रणाली में हम ई मेल, टीवी, टेलीफोन इत्यादि की तकनीक के माध्यम से संदेश प्रेषित करते हैं। संचार, खासकर मानव संचार तो इन चीजों को समझने से ही जुडे हुआ है कि मनुष्य संचार कैसे करता है।

अपने आप से : अन्त:व्यैक्तिक संचार
दूसरे व्यक्ति से : अन्तव्र्यैक्तिक संचार
समूह के अन्दर : समूह संचार
संगठन के अंदर : सांगठनिक संचार
अनेक लोगों के साथ : जन संचार
संस्कृतियों के पार : क्रास कल्चरल संचार

साधारणतम शब्दों में हम संचार को S-R से वर्णित करते हैं। यहां वर्ण S का अर्थ उद्दीपक (Stimuli) व R का अर्थ जवाब (Response) से है। प्राप्त किया गया संदेश उद्दीपक है, जबकि उस संदेश की प्रतिक्रिया जवाब है।

इसे प्रेषक-प्रापक माडल के नाम से भी जाना जाता है। यह संचार के प्रारम्भिक माडलों में से एक है। इस माडल में संचार के सिर्फ दो ही तत्व बताए गए हैं। यह कहता है कि हर संचार में इतनी क्षमता तो अवश्य होती है कि वह कोई प्रभाव पैदा कर पाए। कई बार यह प्रभाव साधारण व प्रत्यक्ष होता है तो कुछ मामलों में यह जटिल व विलम्बित भी हो सकता है। यह माडल संचार की प्रक्रिया का एक और महत्वपूर्ण पहलू दर्शाता है कि सभी संचार एक व्यक्तिगत स्तर पर होते हैं। अर्थात् आप भले ही काफी लोगों तक एक ही संदेश पहुंचा दें, लेकिन उस पर हर आदमी की प्रतिक्रिया अलग होगी।

सामान्यतया: संचार को एक गतिविधि के तौर पर देखा जाता है। लेकिन वास्तव में यह एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में सूचना, विचार, भाव, कौशल, ज्ञान इत्यादि आपस में बांटे जाते हैं। यह सब काम कुछ ऐसे चिह्नों के माध्यम से किया जाता है, जिनका अर्थ उस समाज के सभी लोग समझते हों।

संचार ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें मनुष्य कुछ सीखता है। अर्थात् इस प्रक्रिया में हम दूसरों से सीखने की कोशिश करते हैं। यह गतिशील है व परिस्थिति के अनुसार इसकी प्रकृति भी परिवर्तित होती रहती है। अत: संचार को विचारों, भावों, अनुभवों की सहभागिता की प्रक्रिया कहा जा सकता है।

संचार एकतरफा प्रक्रिया न होकर दोतरफा है। किसी भी स्रोत से संदेश प्राप्त करने के बाद प्रापक अपनी प्रतिक्रिया उस तक पहुंचाने की कोशिश करता है। प्रापक की यह प्रतिक्रिया प्रतिपुष्टि होती है।

संचार के तत्व

हम पहले ही बात कर चुके हैं कि संचार एक प्रक्रिया है और किसी भी प्रक्रिया के पूरे होने में कुछ तत्व सहायक भूमिका निभाते हैं। यहां हम संचार की प्रक्रिया के तत्वों की बात करेंगे। संचार की प्रक्रिया का सबसे पहला तत्व है स्रोत। इसको प्रेषक व संचारकर्ता भी कहा जाता है। लेकिन संचार की प्रक्रिया का अध्ययन करने पर हमें पता चलता है कि प्रेषक सिर्फ संदेश भेजता ही नहीं, बल्कि वह संदेश ग्रहण भी करता है।

संचार की प्रक्रिया का दूसरा तत्व प्रापक है। वह संदेश प्राप्त करता है और उसमें निहीत अर्थ को समझने के लिए उसका विसंकेतीकरण करता है। यहां गौर करने लायक बात यह है कि प्रापक सिर्फ संदेश ग्रहण ही नहीं करता, अपितु वह संदेश भेजता भी है। संचार की चक्रीय प्रकृति के कारण स्रोत व प्रापक के बीच भूमिकाओं की अदला-बदली चलती रहती है। भूमिकाओं की इस अदला-बदली के चलते हम लंबे समय तक स्रोत व प्रापक शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकते। संचार के इन दो तत्वों को दर्शाने के लिए हम प्रतिभागी शब्द का प्रयोग कर सकते हैं। संचार में भाग लेने वाले स्रोत व प्रापक को प्रतिभागी कहने के पीछे कारण यह है कि संचार काफी प्रतिभागी, लोकतांत्रिक व समायोजक प्रकृति का होता है।

संचार का अगला तत्व है संदेश। संदेश शाब्दिक या अशाब्दिक दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं। संदेश आमतौर पर ऐसी भाषा में होता है, जिसे सभी प्रतिभागी समझ सकें। यह मौखिक, लिखित, मुद्रित, दृश्य या दृश्य-श्रव्य किसी भी स्वरूप में हो सकता है।

इसके बाद बारी आती है माध्यम की। यह वह माध्यम है, जिससे हम संदेश को प्रसारित करते हैं। डाक या जनसंचार के किसी भी माध्यम से संदेश प्रसारित किया जा सकता है। प्रतिपुष्टि संचार का अगला तत्व है। यह संदेश के प्रापक भागीदार द्वारा व्यक्त की गई प्रतिक्रिया है, जो कि प्रेषक के पास भेजी जाती है। प्रेषक भागीदार को प्रतिपुष्टि या तो उसी माध्यम से भेजी जाती है, जिससे उसने संदेश भेजा था या फिर प्रापक (जो अब प्रेषक की भूमिका में है) अपनी मर्जी से किसी और माध्यम का चुनाव कर सकता है। संचार की प्रक्रिया को निरंतर चलाए रखने में प्रतिपुष्टि काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

शोर भी संचार का एक महत्वपूर्ण तत्व है। यह कुछ और नहीं बल्कि संचार की राह में आने वाले अवरोधक हैं। यह अवरोधक भौतिक या बौद्कि दो प्रकार के हो सकते हैं। इनको संदेश में खलल माना जाता है और एक हद तक इनको नियंत्रित भी किया जा सकता है।

अब हम समझ चुके हैं कि संचार चक्रीय व अन्योन्यक्रियात्मक प्रक्रिया है। कभी भी निर्वात में संचार नहीं हो सकता है। इसके लिए विभिन्न तत्वों की आवश्यकता होती है। विभिन्न परिस्थितियों और उनमें संचार के विभिन्न तत्वों की मौजूदगी के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि संचार चार स्तरों पर होता है। संचार के यह चार स्तर इस प्रकार हैं:
  1. अन्त:व्यैक्तिक संचार
  2. अन्तव्र्यैक्तिक संचार
  3. समूह संचार
  4. जनसंचार
संचार के इन चार स्तरों या संदर्भों को आमतौर पर संचार के प्रारूप कहा जाता है। यह चारों स्तर प्रतिभागियों की संख्या, प्रतिभागियों के बीच अपनेपन का भाव, बढती जटिलता और प्रतिपुष्टि की प्रकृति इत्यादि के आधार पर एक-दूसरे से भिन्न हैं।

संचार की प्रक्रिया 

एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक सूचना प्रवाहित करने और उसे समझने की प्रक्रिया संचार है। संचार की प्रक्रिया में 6 आधारभूत तत्व समाहित रहते हैं। यह तत्व हैं- प्रेषक (संकेतक), संदेश, माध्यम, प्रापक (विसंकेतक), शोर व प्रतिपुष्टि। यह तत्व संचार को प्रभावी बनाने में किस प्रकार सहायक हैं और आप इनको किस प्रकार प्रयोग कर सकते हैं इनकी जानकारी होने पर कोई भी व्यक्ति अपना संचार कौशल विकसित कर सकता है।

सबसे पहले प्रेषक संचार की प्रक्रिया की शुरुआत करता है। प्रेषक यह सुनिश्चित करता है कि उसे कौन सा अर्थ प्रेषित करना है। इसके बाद वह उसे ऐसे चिह्नों व संकेतों में परिवर्तित करता है जिनको कि संदेश प्राप्त करने वाला समझ सके। (प्रापक उस अर्थ को कितना ग्रहण कर पाता है, यह उस पर निर्भर करता है, लेकिन प्रेषक यही सोचकर संकेतों का चयन करता है कि वह प्रापक की समझने की भाषा है।) अर्थों को संकेतों में ढालने की यह प्रक्रिया संकेतीकरण कहलाती है। अब प्रेषक के पास संदेश तैयार है। फिर वह तय करता है कि संदेश किस माध्यम से प्रापक तक पहुंचाया जाए। संदेश वह सूचना या अर्थ है, जिन्हें प्रेषक प्रापक तक भेजना चाहता है। संचार का माध्यम बोले गए शब्द, लिखित या मुद्रित सामग्री इत्यादि हो सकता है। मौखिक संचार आमतौर पर अनौपचारिक होता है। आधिकारिक भाषणों, कार्यालयीन सम्मेलनों इत्यादि को छोडकर यह सामान्यतया व्यक्तिगत प्रकृति का होता है। जबकि कार्यालयों या फिर जब संचार काफी लोगों के साथ जुडòा हुआ हो तो इसे लिखित स्वरूप में किया जाता है। इंटर आफिस मेमो इत्यादि को अनौपचारिक पड़ताल और जवाब इत्यादि के रिकार्ड के लिए संभाला जाता है। व्यक्तिगत पत्रों के अलावा सभी पत्र काफी औपचारिक प्रकार के होते हैं।

सूचनाओं के आदान-प्रदान व संचार की आवश्यकता को काफी समय तक समय और स्थान की सीमाएं बांध नहीं पाई। ई मेल, वायस मेल, फैक्स इत्यादि ने संचार और ज्ञान की सहभागिता को बढ़ावा दिया है। कम्प्यूटर के माध्यम से लिखित संदेश के प्रसार की प्रक्रिया ई मेल है। वहीं डिजीटल प्रणाली में रिकार्ड आवाज का प्रसारण इत्यादि वायस मेल है। अब तो हमारे पास काफी संख्या में जनमाध्यम भी उपलब्ध हैं।

मौखिक संचार में अनौपचारिक बैठक, सुनियोजित सभा और जनसभा को शामिल किया जाता है। इस संचार में वक्ता की आवाज और प्रस्तुतिकरण की शैली काफी अन्तर पैदा करती है। दैनंदिन कार्य, निर्देशन, सूचनाओं का आदान-प्रदान और अन्तव्यर्ैक्तिक संबंधों में गर्माहट रखने के लिए अनौपचारिक बातें होना काफी आवश्यक है। आजकल सूचना प्रौद्योगिकी ने हम सबके संचार करने के तौर तरीकों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिए हैं। इंटरनेट व अन्य इलैक्ट्रानिक माध्यमों ने हमें किसी भी वक्त किसी भी स्थान से सूचना प्राप्त करने लायक बना दिया है।

यहां इससे संबंधित कुछ शब्दों का विवरण दिया गया है। प्रापक वह व्यक्ति या समूह है, जिसे संदेश पहुंचाने के लिए संचार की सारी कवायद की गई। संचारित संदेश में कुछ खलल पैदा करने वाली सभी चीजों को शोर की श्रेणी में रखा जाएगा। प्रतिपुुष्टि यह सुनिश्चित करती है कि संचार की प्रक्रिया में आपसी सहमति का निर्माण हुआ है। प्रापक से प्रेषक की तरफ कुछ सूचनाएं जाने की प्रक्रिया प्रतिपुष्टि कहलाती है।

संचार के कार्य 

डेविड बर्लो के अनुसार संचार का मुख्य उद्देश्य मानव को अपनी आधारभूत आवश्यकताओं व दैनंदिन जरूरतों की पूर्ति के काबिल बनाना है। इसमें आदेश देने, प्रार्थना करने व दूसरों की प्रार्थनाओं पर गौर करने की योग्यताएं शामिल हैं।

बर्लो आगे कहते हैं: ‘संचार हमें सामाजिक संगठनों, आर्थिक संबंधों, सांस्कृतिक मूल्यों इत्यादि को समझने की क्षमता प्रदान करता है।’ यह आवश्यक है कि किसी भी संचार का उद्देश्य और उसके संदेश की अन्तर्वस्तु मनुष्यों की आम जिन्दगी के लिए प्रासंगिकता रखने वाले होने चाहिएं। संचार के क्रियात्मक भाग को प्रदर्शित करने के लिए हार्लोल्ड लासवैल ने यह प्रतिमान सुझाया था: किसने, क्या, किस माध्यम से, किसको, किस प्रभाव के साथ कहा (हार्लोल्ड लासवैल का संचार का प्रतिमान) लासवैल ने कहा था कि यह सभी चरण क्रियात्मक स्तर पर संचार की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। प्रभाव पर उनका इतना बल एक बार फिर संचार की क्रियात्मकता को ही दर्शाता है। मोटे तौर पर देखें तो संचार कार्य करता है: 1. सूचना देना 2. शिक्षा देना 3. मनोरंजन 4.किसी काम के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना  कई लोग इस शृंखला में ज्ञानोदय के नाम से पांचवां कार्य भी जोडते हैं।
इसके अलावा भी संचार के कुछेक अतिरिक्त कार्य हैं। यह कार्य इस प्रकार हैं: 1. मूल्यांकन 2. दिशा निर्देशन 3.प्रभावित करना 4. अभिविन्यास करना।

कोई भी संचार की रूपरेखा तैयार करते वक्त उपरोक्त में से कुछ कामों को उद्देश्यों में अवश्य शामिल किया जाता है। उपर्युक्त काम सही तरीके से पूरे हों इसके लिए संचार की ऐसी रूपरेखा तैयार करना आवश्यक है जो कि प्रापक का ध्यान अपनी तरफ खींचे। ऐसे चिह्नों और संकेतों का प्रयोग किया जाना चाहिए, जो कि प्रापक को आसानी से समझ में आ जाएं। यह प्रापक में कुछ आवश्यकताएं जागृत करे और उनकी पूर्ति के लिए उसको रास्ता सुझाए। ऐसी अवस्था में ही संचार वांछित परिणाम दे सकता है। हालांकि हमें संचार व जनसंचार में भेद को नहीं भूलना है। संचार व जनसंचार में फर्क है।
  1. सूचनाओं के आदान-प्रदान, सहभागिता इत्यादि की प्रक्रिया को हम संचार कहते हैं।
  2. जनसंचार में पेशेवर संचारकर्ताओं का एक समूह संदेश को लगातार, त्वरित गति से व व्यापक दायरे तक पहुंचाने के लिए जन माध्यमों का प्रयोग करते हैं। इसमें एक व्यापक दायरे में लोगों तक एक संदेश पहुंचाकर उन्हें किसी न किसी स्तर पर प्रभावित करने की चेष्टा की जाती है।
अन्तर्वैयक्तिक संचार में सूचनाओं की सहभागिता, कुछ जानकारी देकर या अपने जोरदार पक्ष को रखकर प्रापक को प्रभावित करना मूल उद्देश्य होता है। यदि एक व्यक्ति अपने मत इत्यादि के प्रति किसी को जीतने में कामयाब हो गया है तो संचार को सफल माना जाएगा।
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