शिक्षा और विज्ञान

अनुक्रम
विज्ञान की अवधारणा एवं औचित्य विज्ञान एक चिन्तन की प्रविधि है, नवीन ज्ञान अर्जित करने की विधि है। ‘विज्ञान’ शब्द मे मूंल शब्द ज्ञान और ‘वि’ उपसर्ग है इसका अभिप्राय है विशुद्ध ज्ञान, पूर्णतया जॉचा-परखा ज्ञान, तर्कसंगत ज्ञान। वर्तमान के प्रयोगवादी एवं यथार्थवादी युग में उस ज्ञान को प्रश्रय दिया जाने लगा जो कि वास्तविक जीवन के लिये उपयोगी हो। यही विज्ञान है जिसने मानव जीवन में एक क्रांति उत्पन्न कर दी जिसके फलस्वरूप व्यक्ति का आधुनिक जीवन पूर्णतया साहित्यिक शिक्षा के अपेक्षा व्यावहारिक जीवन में उपयोगी शिक्षा की ओर ध्यान देना प्रारम्भ किया और पाठ्यक्रम में वैज्ञानिक विषयों केा महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करने पर बल दिया जाने लगा। शिक्षा में वैज्ञानिक प्रवृत्ति 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में विशेष रूप में फली फूली। इस शताब्दी से ही विज्ञान के अध् ययन एवं अध्यापन पर विशेष बल दिया जाने लगा। इस प्रवृत्ति के उन्नति का प्रमुख कारण है-
  1. यूरोप में अनेक वैज्ञानिक आविष्कारों ने जन्म लिया, इससे औद्योगिक क्रांति हुई, और इन आविष्कारों ने वर्षों से सैद्धान्तिक तथ्यों को व्यावहारिक रूप दिया और इनके सही या गलत होने का दिया इस विचार ने विज्ञान के प्रति लेागों का विश्वास बढ़ाया।
  2. सैद्धान्तिक और साहित्यिक शिक्षा के तथ्य व्यावहारिक जीवन के लिये उपयुक्त नहीं रह गये, और ये जीवन की वास्तविकता तैयारी कराने में असमर्थ रहे।
  3. विश्व के विभिन्न भागों में मानव ने कार्य कारण को ज्ञात करने हेतु प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया इसके फलस्वरूप रूढ़िवादिता, अज्ञानता और अन्धविश्वासों की उपेक्षा होने लगी। इस प्रकार वैज्ञानिक प्रयोगों ने मनुष्य को आकर्षित किया।
  4. विज्ञान की विभिन्न शाखाओं भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र, ज्यातिशास्त्र, भूगर्भशास्त्र, शरीरशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र आदि ने भी अत्यधिक विकास कर सभी क्षेत्रों में लेागों को बनावटी धारणाओं को समाप्त कर वास्तविक तथ्यों को उजागर किया जिससे लोगों की रूचि बढ़ी। 
  5. जीव विज्ञान के विकास का सिद्धान्त ने मानव केा वैचारिक परिवर्तन की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया।
  6. आदर्शवादी दर्शन के विचारकों ने भी शिक्षण एवं चिन्तन में वैज्ञानिक विधियों के समावेश पर बल दिया।

विज्ञान की प्रकृति एवं प्रवृत्ति की विशेषता

विद्यार्थियों में विज्ञान की प्रकृति को बोध के रूप में रखा गया है, और इस बोध को वैज्ञानिक साक्षरता मान लिया गया और अब व्यक्ति से यह आशा की जाती है, कि वह विज्ञान सम्बंधी समस्याओं पर उचित निर्णय लेने की क्षमता रखता हो। इसमें शोध के लिये प्रश्न विकसित करना, आंकड़े, एकत्र करना, आंकड़ों का विश्लेषण करना व निश्कर्ष निकालना आदि प्रमुख है। विज्ञान की मुख्य विशेषताओं कोह म इस रूप में देख सकते हैं कि यह तर्क और प्रमाण पर आधारित ज्ञान का योग है। पालमुनरो ने लिखा-’’शिक्षा में आधुनिक वैज्ञानिक पृवत्ति की मुख्य विशेषतायें प्राय: ठीक वे ही है, जो इन्द्रिय-यथार्थवादी प्रवृत्ति की है। प्रथम- विषयवस्तु के महत्व पर बल तथा प्रकृति की घटनाओं का ज्ञान और द्वितीय-अध्ययन की आगमन विधि के अनुभवातीत महत्व को स्वीकार करना।’’ वैज्ञानिक प्रवृत्ति की कुछ विशेषतायें और है-
  1. पाठ्य्यक्रम में वैज्ञानिक विषयों को प्रमुखता, वैज्ञानिक प्रवृत्ति के समर्थकों ने यह स्पष्ट कर दिया कि मानव जीवन में विज्ञान का महत्व अत्यधिक है। क्योंकि साहित्यिक शिक्षा मानव को भावी जीवन के लिये तैयार नहीं कर सकती है, क्योंकि ये सभी व्यावहारिक नहीं है। इस दृष्टि से उन्होने वैज्ञानिक विषयों शरीर विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, रसायन एवं भौतिक विज्ञान, भूगोल, गणित को पाठ्यक्रम में प्रमुखता से सम्मिलित करने की मांग की है। 
  2. विषय वस्तु पर बल- विज्ञान में विषय वस्तु पर बल दिया जाता है। इस प्रवृत्ति ने विश्व के समक्ष यह प्रश्न रखा कि जिन विषयों की वास्तविक जीवन में उपयोगिता सिद्ध न हो उन्हें पाठ्यक्रम में रखने का क्या लाभ और ज्ञान की प्राप्ति व्यावहारिक विषयों से ही हो सकती है वर्तमान शिक्षा में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि इसकी विषय वस्तु व्यावहारिक नहीं है। 
  3. शिक्षण की आगमन विधि पर बल- विज्ञान शिक्षण की आगमन विधि पर बल देता है क्योंकि यह विधि पूर्णतया मनोवैज्ञानिक है, जिसमें हम सरल से कठिन और ज्ञात से अज्ञात और स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती है, और उसमें आंकड़ों के एकत्रीकरण विश्लेषण, स्वयं कार्यशीलन तथा सत्यान्वेषण पर अप्तिाक बल दिया जाता है, और सीखने वाले स्वयं निश्कर्ष निकलता है और प्रमाणों के साथ सीखता है। 
  4. सैैद्धान्तिक व अव्यावहारिक शिक्षा का विरोध- वैज्ञानिक प्रवृत्ति में सैद्धान्तिक और अव्यावहारिक शिक्षा का विरोध प्राप्त होता है, क्योंकि यह शिक्षा मानव को वास्तविक जीवन के लिये तैयार नहीं कर पाती है। 
  5. विज्ञान द्वारा प्रकृति का वास्तविक ज्ञान- इन प्रवृत्ति ने यह विचार प्रतिपादित किया कि प्रकृति के रहस्यों को समझने के लिये प्रयोग एवं विश्लेषण ही सर्वोत्तम है विज्ञान ने प्रकृति के अनछुये रहस्यों के सन्निकट मनुष्य को पहुॅचाया है और विज्ञान ही प्राकृतिक तथ्यों को समझने का सर्वोत्तम आधार प्रदान करता है क्योंकि प्रयोग द्वारा सिद्ध प्रमाणों को बदला नहीं जा सकता है। 
  6. उदार शिक्षा- वैज्ञानिक प्रत्ति उदार शिक्षा पर बल देता है। पाल मुनरा ने इस सम्बंध में लिखा कि-’’उदार शिक्षा वह है जो मनुष्य केा अपने पेशे के लिये नागरिक के रूप में अपने जीवन के लिये और अपने जीवन की समस्त क्रियाओं को करने के योग्य बनाती है।’’ इसका अभिप्राय यह है कि प्राचीन काल से चली आ रही उदार शिक्षा की अवधारणा अब बदल गयी है। 
  7. शिक्षण की नवीनतम विचारधाराओं के प्रतिरूचि- वैज्ञानिक प्रवृत्ति के समर्थक यह मानते हैं कि ज्ञान की वृद्धि बहुत तेजी से हो रहा है और विज्ञान के क्षेत्र में लगभग 10 वर्ष में ही ज्ञान दोगुना हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में आज की शिक्षण विधियां कल असफल हो सकती हैं। अत: शिक्षक में नवीन ज्ञान के विचारधाराओं के प्रतिरूचि बनी रहनी चाहिये, और यही रूचि वे अपने विद्यार्थियों में भी जाग्रत करें।

विज्ञान का दर्शन एवं समाजशास्त्र

विज्ञान का दर्शन-विज्ञान मूलत: कुछ मान्यताओं पूर्व धारणाओं तथा व्यवहार पर निर्भर करता है और यही मान्यतायें तथा व्यवहार मिलकर विज्ञान को दर्शन बनाते हैं।
  1. प्राकृतिक रहस्यों को जानने हेतु प्रकृति के विषय में विज्ञान की मान्यतायें है- प्रकृति वास्तविक है, इसके क्रियाकलापों के मध्य कार्य एवं कारण का सिद्धान्त है, और प्रकृति को कुछ सीमा तक समझा जा सकता है।
  2. इसी प्रकार वैज्ञाानिक खोज हेतु मान्यतायें है- बारम्बार दोहराते रहना, अच्छे और सही परिणाम की सम्भावना बनाये रखना, अनिश्य की स्थिति बनी रहती हैं।
  3. विज्ञान की अपनी नैतिक मान्यतायें भी है- (i) परिणाम अनुभवों पर आधारित होंगे। (ii) सोच मुक्त होनी चाहिये और इस सोच के साथ प्रयोग किये जाये। (iii) परिणामों में निष्पक्षता होनी चाहिये। (iv) यह परिणाम तब प्रासंगिक थे आज भी है।
  4. विज्ञान का दर्शन कुछ प्रश्नों को लेकर चलता है- (i) विज्ञान ने अन्य प्रकार की खोज से क्या अलग खोजा ? (ii) विज्ञान को खोज हेतु कौन सी प्रवृत्ति का प्रयोग करना चाहिये? (iii) वैज्ञानिक व्याख्या कहां तक दी जा सकेंगी जो कि संतोषप्रद है? (iv) वैज्ञानिक नियमों एवं सिद्धान्तों का संज्ञानात्मक स्तर क्या है?
विज्ञान का समाजशास्त्र- विज्ञान और समाज भी एक-दूसरे से सम्बंधित हैं। विज्ञान के हर खोज एवं आविष्कार ने मानव समूह को सुख दिया और जीवन को समृद्धि से परिपूर्ण बनाया। विज्ञान, पर्यावरण तथा दैनिक जीवन से जुड़ी हुई अनेक समस्यायें एक-दूसरे से जुड़ी है। विज्ञान ने कृषि , ऊर्जा, स्वास्थ्य एवं पोषण आदि सभी पक्षों को प्रभावित किया है। विज्ञान का प्रभाव इक्कीसवीं सदीं के नागरिकों को इस कदर प्रभावित किया है कि इसने वैज्ञानिक एवं प्रोैद्योगिकी, साक्षरता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण व वैज्ञानिक अभिवृत्ति विकसित करना आवश्यक बना दिया। विज्ञान व समाज के सहसम्बंध को इस रूप में देखा जा सकता है-
  1. समाज की अनेक समस्यायें विज्ञान के प्रचार-प्रसार का ही परिणाम है, जैसे- प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, पर्यावरण प्रदूषण, जनसंख्या विस्फोट, शहरीकरण, औद्योगिकरण, विभिन्न भयानक संक्रमण, ड्रग्स इत्यादि।
  2. सभी समाज के विकास के आत्मनिर्भरता का मानक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी है। जिस समाज ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी को अधिक अपनाया और समझा वह उतना ही विकसित हुआ।
  3. विकास करने और विज्ञान के कारण उत्पन्न समस्याओं के लिये सम्बंधित समस्याओं के प्रति बोध और उन पर निर्णय के लिये समाज में वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी साक्षरता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का निर्माण एवं वैज्ञानिक अभिवृत्ति का विकास आवश्यक है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का जन्म व विकास आम समाज के लिये ही हुआ अत: आम जनता के लिये यह आवश्यक है कि वह वैज्ञानिक तकनीकी समस्याओं से सम्बधित कारणों का निर्णय ले सके। प्रो0 डेनियल बेल ने स्पष्ट लिखा है कि ‘‘कोई भी सामाजिक प्रणाली अन्तोगोत्वा उसको लोकाचार से परिभाशित हेाती है। ऐसे लोकाचार मूल्य उसके चिन्तन संस्कृति में होते हैं, और व्यवहार के मानक उनके चरित्र में। विज्ञान के लोकाचार पाश्च औद्योगिक समाज के उदीयमान लोकाचार है।’’

शिक्षा में विज्ञान के प्रवर्तक

हम पूर्व में विज्ञान और समाज के सम्बंध को पढ़ चुके हैं, और अब हम यह पढेगें कि शिक्षा में वैज्ञानिक प्रवृत्ति के प्रथम प्रवर्तक हरबर्ट स्पेन्सर है, इनका जन्म 1820 में डर्बी नामक शहर में लन्दन में हुआ। इनके पिता एवं चाचा शिक्षक थे और पिता के विज्ञान के शिक्षक होने के कारण स्पेन्सर की रूचि विज्ञान में बढ़ी और उन्होनें गणित, विज्ञान, इंजीनियरिंग, प्रकृति अध्ययन, अर्थशास्त्र आदि विषयों का ज्ञान प्राप्त किया। हरबर्ट स्पेन्सर ने 1861 में लेखन कार्य किया और उनकी प्रमुख रचनायें है-
  1. वाट एजुकेशन इज मोस्ट वर्थ 
  2. दि प्रिन्सिपल्स ऑफ एथिक्स 
  3. इन्टलैक्चुअल एजुकेशन 
  4. दि प्रिसिंपल्स ऑफ सोशियाजाली 
  5. मोरल एजुकेशन 
  6. मैने वर्सेज स्टेट 
  7. फिजिकल एजुकेशन 
  8. फैक्ट्स एश्ड कमेश्टस 
  9. फस्र्ट प्रिसिंपल्स 
  10. दि फ़र्स्ट प्रिंसिपल्स आफ बायोलाजी 
स्पेन्सर के शैक्षिक विचार - स्पेन्सर के अनुसार-’’शिक्षा जीवन की तैयारी है।’’
  1. शिक्षा के उद्देश्य के सम्बंध में स्पेन्सर ने लिखा-’’शिक्षा को पूर्ण जीवन के नियमों ढंगों से परिचित कराना चाहिये शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण कार्य- हमें जीवन के लिये इस प्रकार तैयार करना है कि हम उचित प्रकार का व्यवहार कर सकें और शरीर मन तथा आत्मा का सदुपयोग कर सकें। स्पेन्सर ने इस बात पर बल दिया कि हमें शिक्षा द्वारा पूर्ण जीवन के कार्य- आत्मरक्षा, जीविकोपार्जन, वंशवृद्धि एवं पालन-पोषण, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक तथा अवकाश के सदुपयोग सम्बंधित कार्यो कों करने के लिये तैयार करना चाहिये जिससे हम जीवन का वास्तविक आनन्द ले सकें। 
  2. पाठ्य्य्यक्रम- स्पेन्सर ने पूर्ण जीवन की समस्त क्रियाओं को पॉच भागों में बांटा है- आत्मरक्षा की क्रिया के लिये शरीर विज्ञान व स्वास्थ्य विज्ञान, जीवन रक्षा के लिये भाषा गणित, भूगोल, पदार्थ विज्ञान, शिशु रक्षा के लिय गृहशास्त्र, शरीर विज्ञान व बालमनोविज्ञान, समाजरक्षा के लिये इतिहास, नागरिक शास्त्र व अर्थशास्त्र अवकाश सम्बंधी क्रियाओं के लिये साहित्य, संगीत, कविता एवं ललित कला रखने का सुझाव रखा।
शिक्षण की वैज्ञानिक विधि-स्पेन्सर ने शिक्षण विधि को राचे क बनाते हुये मानसिक विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया को अपनाने का सुझाव दिया उन्होनें सरल से कठिन की ओर स्थूल से सूक्ष्म की ओर, ज्ञात से अज्ञात की ओर, अप्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष की ओर, अनिश्चित से निश्चित व स्वशिक्षा पर बल दिया। अनुशासन के सम्बंध में स्पेन्सर ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ही अपनाया है, उनके अनुसार- ‘‘ बालक को अपने आचरण के अनिवार्य परिणामों तथा अवश्यम्भावी प्रतिक्रियाओं को भोगना चाहिये, जिनसे उसे लाभप्रद नियंत्रणों का अनुभव होता है, जो वस्तुत: उसके शारीरिक हित से भिन्न होते हैं।’’

भारत सरकार की वैज्ञानिक नीति

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय लम्बे अर्से से परतंत्र रहे भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से लड़खड़ा रही थी, तत्कालीन सरकार के समय सबसे बड़ी चुनौती देश को आत्मनिर्भर बनाने के साथ विकास की श्रेणी में खड़ा करना था। तब भारत सरकार न इसे सहर्ष स्वीकार किया और 4 मार्च 1958 को संविधान द्वारा स्वीकृत विज्ञान नीति संकल्प पर आधारित है। इसमें वैज्ञानिक जानकारी तथा अनुसंधान के व्यावहारिक उपयोग से होने वाले लाभ को जनसामान्य को देने की सरकार की जिम्मेदारी को माना गया। सरकार की यह नीति है कि ज्ञान के प्रसार में व्यक्तिगत प्रयासों को बढ़ावा दिया जाये और यह तय किया गया कि विज्ञान शिक्षा, कृषि उद्योग तथा प्रतिरक्षा के क्षेत्र में वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाये जाने चाहिये। सन् 1958 की राष्ट्रीय विज्ञान शिक्षा नीति के सुझाव थे-
  1. व्यावहारिक और सैद्धान्तिक दोनों स्तरों पर हर सम्भव विज्ञान की शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधानों को विकसित किया जाये। 
  2. वैज्ञानिकों के उच्च स्तरीय अनुसंधानों की प्रतियां सम्पूर्ण देश में उपलब्ध करायी जाये, जिससे कि देश समृद्धिशाली और शक्तिवान बने। 
  3. देश में शिक्षा, विज्ञान, कृषि उद्योग और सुरक्षा की आवश्यकता पूरी करने के लिये वैज्ञानिक और तकनीकि प्रशिक्षण के कार्यक्रम बनाये जाये और इन पर द्रूत गति से कार्य किया जाये।
  4. यह सुनिश्चित करना कि रचनात्मक अभिवृत्ति रखने वाले लोगों को वैज्ञानिक खोजों के लिये अभिप्रेरित किया जाये।
  5. वैयक्तिक रूप से अपने ज्ञान व वैज्ञानिक खोजों के लिये लोगों को प्रोत्साहित किया जाये।
व़िद्यालयीय स्तर पर विज्ञान शिक्षण- स्वतंत्रता के साथ ही भारत ने विज्ञान शिक्षण के महत्व को स्वीकार कर लिया था। स्वतंत्रता से पूर्व भी राजा राममोहन राय और स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा में विज्ञान को समाहित किये जाने का प्रबल समर्थन किया था। प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर की शिक्षा में विज्ञान शिक्षण के पुनर्गठन और विस्तार के लिये सन् 1967 में भारत सरकार और यूनेस्को-यूनीसेफ के मध्य एक करार पर हस्ताक्षर किया गया। 1971 में राज्य सरकारों को यह निर्देशित किया गया कि वे नई अनुदेशनात्मक प्रशाली के परीक्षण हेतु प्रायोगिक कार्य आरम्भ करें। प्रायोगिक कार्य के इस योजना के अन्तर्गत जो धनराशि प्रदान की गयी वह प्रत्येक राज्य के 50 चुने हुये प्राथमिक तथा 30 जूनियर हाईस्कूलों को नि:शुल्क पाठ्यपुस्तकें तथा विज्ञान किटों की आपूर्ति तथा प्राप्त अनुभवों के आधार पर राज्य सरकारों द्वारा सम्मिलित किये गये स्कूलों के शिक्षणों के लिये सेवाकालीन प्रशिक्षण पर होने वाले व्यय तक ही सीमित थी। सभी राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में विज्ञान में प्रायोगिक कार्य का यह कार्यक्रम प्रारम्भ हो गया।
  1. इस कार्यक्रम में 100 शिक्षक प्रशिक्षण कालेज व 400 शिक्षक प्रशिक्षण स्कूलों के लिये विज्ञान, प्रयोगशाला, उपकरण व पुस्तकालय हेतु पुस्तकें दी गयी। 
  2. 24000 स्कूलो और 31000 जूनियर हाईस्कूलों को विज्ञान किटों की आपूर्ति। 
  3. 55000 शिक्षकों अर्थात् प्रतिस्कूल एक शिक्षक का प्रशिक्षण की व्यवस्था।
  4. प्रति राज्य एक पर्यवेक्षक वाहन की सुविधा।
  5. प्रति राज्य एक चलप्रयोगशाला वाहन की आपूर्ति।
  6. नई शिक्षण सामग्री के पुनर्मुद्रण के लिये कागज की आपूर्ति 16.9 विज्ञान शिक्षा की समस्यायें विज्ञान शिक्षा की समस्यायें जिन्हें हम इस रूप में देखते हैं, 
  7. शिक्षा संस्थाओं में निर्धारित विज्ञान के पाठ्यक्रम बहुत पुराने हैं, इनमें उपयोगिता का अभाव है। नवीन आविष्कारों एवं खोजों को समाहित किये जाने की आवश्यकता है।
  8. हमारे देश में प्रचार-प्रसार से विज्ञान शिक्षण का कार्य प्रारम्भ हुआ, पर माध् यमिक विद्यालयों में प्रयोगशालाओं में भौतिक संसाधनों एवं वातावरण की कमी है।
  9. ग्रामीण क्षेत्रों में तो साक्षरता प्रतिशत ही अत्यल्प है, तो वैज्ञानिक सोच व अभिवृत्ति का उत्पन्न होना तो और भी कठिन है। 
  10. विज्ञान विषय में सरस रोचक एवं बोधगम्य नवीन ज्ञान से परिपूर्ण पुस्तकों का अभाव है। पुस्तकों में परम्परात्मकता एवं पुरातनता है। पाठ्यपुस्तकें नवीन ज्ञान, जिज्ञासा अन्वेशण एवं कार्यशैली उत्पन्न करने में असमर्थ है। 
  11. शिक्षकों में भी विज्ञान शिक्षण को लेकर रूचि व सजगता का अभाव है। अध्ययनों में यह पाया गया कि विज्ञान एवं गणित में पुनर्बोधात्मक प्रशिक्षण प्राप्त कर विज्ञान किटों को भी प्राप्त कर लेने के पश्चात् भी कक्षा शिक्षण में प्रयोग नहीं करते हैं। शिक्षण हेतु व्याख्यान की परम्परागत विधियों का ही प्रयोग में लाया जाता है। 
  12. विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में न दिये जाने के कारण भी यह विषय आम बच्चों के लिये बोधगम्य कम बन पा रहा है। 
विज्ञान शिक्षा हेतु सुझाव-विज्ञान शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु हमें कुछ कदम उठाने की आवश्यकता होगी-
  1. शिक्षा के सभी स्तरों पर विज्ञान शिक्षा को अनिवार्य कर दिया जाये।
  2. सभी स्तर की शिक्षा संस्थान में विज्ञान शिक्षकों को नियुक्त किया जाये। 
  3. शिक्षण संस्थाओं में प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति की जाये। 
  4. शिक्षकों को समय-समय पर पुनर्बोधात्मक प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिये।
  5. विज्ञान शिक्षा हेतु शिक्षा संस्थाओं को पर्याप्त भौतिक संसाधन प्रदान किये जाये। 
  6. विज्ञान शिक्षा हेतु रूचि लेने व अच्छी उपलब्धि वाले विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति व प्रोत्साहन दिया जाये।
  7. विज्ञान शिक्षा का आकादमिक वातावरण तैयार किया जाये ताकि वैज्ञानिकों, तकनीशियनों एवं कुशल कर्मचारियों की आवश्यकता की पूर्ति के लिये देश की जनशक्ति का सर्वश्रेष्ठ उपयोग किया जा सके।
कोठारी कमीशन ने विज्ञान शिक्षा की प्रगति हेतु सुझाव दिया- 
  1. विज्ञान व गणित के अध्ययन हेतु उच्च शिक्षा केन्द्रों की स्थापना की जाये। 
  2. प्रतिभाषाली शिक्षकों की नियुक्ति की जाये। 
  3. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय वैज्ञानिकों को देश में आमंत्रण दिया जायें।
  4.  सभी स्तर के पाठ्यक्रम में संशोधन व परिवर्द्धन किया जाना चाहिये। 
  5. सभी संस्थाओं की प्रयेागशालाओं एवं वातावरण में भौतिक संसाधनों की आपूर्ति करना होगा। 
  6. विज्ञान शिक्षा के लिये ग्रीष्मकालीन संस्थान खोले जाये। 
  7. प्रौद्योगिकी व विज्ञान को शिक्षा प्रशाली का आवश्यक अंग बनाया जाये। 
  8. अच्छी विज्ञान पुस्तकों की रचना व भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया जाये। राष्ट्रीय शिक्ष नीति के सुझाव- 
  9. विज्ञान शिक्षा का सुदश्ढ़ीकरण करें वैज्ञानिक सोच अभिवृत्ति व सृजनात्मकता हेतु प्रयास किया जाये।
  10. विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास हर स्तर पर किया जाये। 
  11. विद्यार्थियों में विज्ञान को दैनिक जीवन में उपयोग हेतु क्षमता विकसित किया जायें।
  12. विद्यार्थियों में स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग तथा जीवन की अन्य पहलुओं के साथ विज्ञान के सम्बंध को विकसित किया जाय।
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