18 पुराणों के नाम

यास्क के निरुक्त के अनुसार, ‘पुराण’ की व्युत्पत्ति है- ‘पुरा नव’ भवति अर्थात् जो प्राचीन होकर भी नया होता है। इन व्युत्पत्तियों की मीमांसा करने से स्पष्ट होता है कि ‘पुराण’ का वर्ण्य विषय प्राचीनकाल से सम्बद्ध था। प्राचीन ग्रन्थों में पुराण का सम्बन्ध ‘इतिहास’ से इतना घनिष्ठ है कि दोनों सम्मिलित रूप से ‘इतिहास-पुराण’ नाम से अनेक स्थानों पर उल्लिखित किये गये हैं। छान्दोग्य उपनिषद में सनत्कुमार से ब्रह्म विद्या सीखने के अवसर पर नारद मुनि ने अपनी अधीत विद्याओं के अन्तर्गत ‘इतिहास-पुराण’ को पंचम वेद बतलाया है। इस संयुक्त नाम से स्पष्ट है कि उपनिषद युग में दोनों में अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध की भावना क्रियाशील थी। 18 पुराणों के नाम इस प्रकार है -

18 पुराणों के नाम

18 पुराणों के नाम इस प्रकार है -

1. ब्रह्मपुराण -

यह ब्रह्म या ब्राह्म पुराण के नाम से विख्यात है। इसे समस्त पुराणों में आदि या आद्य पुराण के रूप में परिगणित किया गया है। विष्णुपुराण इस तथ्य की पुष्टि करता है और स्वयं ब्रह्मपुराण में भी इसे अग्रिम पुराण का पद प्रदान किया गया है। इसमें श्लोकों की कुल संख्या चौदह सहò कही गयी है और 245 अध्याय हैं। पर, इस सम्बन्ध में विभिन्न पुराणों में परस्पर विरोधी तथ्य प्रकट किये गये हैं। उदाहरणार्थ नारद, विष्णु, शिव, ब्रह्मवैवर्त्त एव श्रीमद्भागवत के अनुसार इसकी श्लोक संख्या दस हजार है, पर मत्स्यपुराण स्वीकार करता है कि इसमें कुल तेरह सहò श्लोक हैं। 

लिंग, वाराह, कूर्म तथा पद्म पुराण में भी ब्रह्मपुराणस्थ तेरह सहò श्लोकों की बात कथित है। सम्प्रति आनन्दाश्रम से प्रकाशित संस्करण में 13783 श्लोक उपलब्ध होते हैं तथा उत्तर और पूर्व के नाम से ब्रह्मपुराण के दो विभाग किये गये हैं। यह वैष्णव पुराण के नाम से विख्यात है। इस पुराण के 245 वें अध्याय में यह बात कही गई है कि यह वैष्णव पुराण है।

इस पुराण में पुराणविषयक सभी तथ्यों का आकलन है तथा तीर्थों के महात्म्य वर्णन में विशेष रुचि प्रदर्शित की गई है।

औण्ड्र या उत्कल प्रदेश एवं इसके पावन तीर्थों एवं मन्दिरों का वर्णन इसमें अत्यन्त विस्तार के साथ प्राप्त होता है। इसके आरम्भ में कहा गया है कि नैमिषारण्य में लोमहर्षण ने ऋषियों के पास पधार कर सूत जी से विश्व के उद्भव एवं प्रलय के कथा कहने के लिये निवेदन किया। तदनन्तर सूत जी ब्रह्मा द्वारा दक्ष प्रजापति को सुनाये गये पुराण को सुनाने के लिये प्रस्तुत हुए। इसके प्रारम्भ में विश्व की सृष्टि, आदि पुरुष मनु एवं उनकी संतान की उत्पत्ति, देवताओं एवं दैत्यों के जन्म का वर्णन कर सूर्य एवं चन्द्रवंश का संक्षिप्त कथन किया गया है। इसके बीस अध्यायों में पार्वती की कथा कही गयी है और प्रथम पांच अध्यायों में सर्ग, प्रतिसर्ग एवं मन्वन्तर का वर्णन है तथा आगामी सौ अध्यायों में वंश एवं वंशानुचरित का विवरण प्रस्तुत किया गया है। 

इसके वर्ण्य विषयों में पृथ्वी के अनेक खण्ड, स्वर्ग, नरक, तीर्थ-माहात्म्य तथा विशेष रूप से सूर्याराधना का वर्णन है। सूर्य की पूजा के प्रसंग में कहा गया है कि विश्व के उद्भव का मूल सूर्य है और द्वादश सूर्यो की आराधना से सभी प्रकार के शत्राुओं पर विजय प्राप्त हो सकती है। विभिन्न ऋतुओं में सूर्य का तेज किस प्रकार विभिन्न रूप मेंं परिणत होता है, और प्रत्येक मास में आदित्य मण्डल के प्रकाशित होने के कारण उसकी कितनी संज्ञाएं होती है, आदि विषयों का वर्णन इस पुराण में किया गया है। गंगा की उत्पत्ति की कथा भी इस पुराण में वर्णित है। इसमें राम और कृष्ण की कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन है तथा वाराह, नृसिंह आदि अवतारों की भी कथा कही गयी है। श्रीकृष्ण की कथा 32 अध्यायों में समाप्त हुई है। 

इसके अन्तिम अध्यायों में श्राद्धकर्म, धार्मिक जीवन के नियम, वर्णाश्रमधर्म, स्वर्ग के भोग, नरक के कष्ट तथा विष्णु पूजा से प्राप्त पुण्यों का विवरण है। अन्त में सांख्य योग का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करते हुए प्रकृति आदि तत्त्वों का वर्णन है। सांख्य शास्त्रा के विवेचन में अनेक ऐसे तथ्य प्रस्तुत किये गये हैं, जो अवान्तरकालीन विषयों से नितान्त भिन्न हैं। उदाहरणार्थ इसमें सांख्य के 36 तत्त्व कथित हैं जब कि परवर्ती ग्रन्थ 25 तत्वों को निरूपित करते हैं। इसमें सांख्य को निरीश्वरवादी दर्शन नहीं कहा गया है और इसमें ज्ञान तथा भक्ति के तत्त्वों का भी समावेश किया गया है।

इसमें महाभारत, वायुपुराण, विष्णु पुराण और मार्कण्डेय पुराण के अनेक उद्धरण प्राप्त होते हैं और कहीं-कहीं तो उक्त पुराणों के अनेक अध्यायों को अक्षरश: उद्धृत कर दिया गया है। इसी कारण विद्वान् इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि मुख्यत: इस पुराण में 175 अध्याय ही रहे होंगे और 176 से 245 तक के अध्याय प्रक्षिप्त हैं। इस पुराण के उद्धरण ‘कल्पतरु’ तथा ‘तीर्थचिन्तामणि’ में प्राप्त होते हैं। तीर्थचिन्तामणि के रचयिता वाचस्पति मिश्र का आविर्भावकाल पन्द्रहवीं शती शताब्दी है। 

अत: इसके आधार पर इस पुराण का अनुमानित समय 12वीं शताब्दी है। ‘कल्पतरु’ में ब्रह्मपुराण के 1500 श्लोक प्राप्त होते हैं। कोणार्क के सूर्य मंदिर का इसमें उल्लेख होने के कारण पाश्चात्य विद्वानों एच0एच0 विल्सन सवं विंटरनित्स-ने इसका समय 13वीं शती निर्धारित किया है, पर परम्परानिष्ठ अनेक प्रसंग ‘महाभारत’ के अनुशासनपर्व में अविकल रूप से प्राप्त होते हैं, अत: इसका समय उतना अर्वाचीन नहीं माना जा सकता। दण्डकारण्य में गौतमी नदी की श्रेष्ठता सिद्ध करने के कारण इसका रचना स्थान गोदावरी (गौतमी) प्रदेश माना जाता है। इस नदी के तीरस्थ तीर्थों का भी इस पुराण में अत्यन्त विस्तृत विवरण प्राप्त होने के कारण इस तथ्य की पुष्टि होती है। इसके प्रारम्भ से लेकर 69 अध्यायों तक का प्रणयन उत्कल प्रान्त में हुआ होगा। 

2. पद्मपुराण (पाद्मपुराण ) -

पद्मपुराण बृहदाकार पुराण है, जिसमें पचास हजार श्लोक एवं 641 अध्याय हैं। इसके दो रूप प्राप्त होते हैं-प्रकाशित देवनागरी संस्करण एवं हस्तलिखित बंगाीलसंस्करण। आनन्दाश्रम (1894 ई0) से प्रकाशित देवनागरी संस्करण में छह खण्ड हैं, जिसका संपादन बी0एन0 माण्डलिक ने किया था। वे हैं-आदिखण्ड, भूमिखण्ड, ब्रह्मखण्ड, पातालखण्ड, सृष्टिखण्ड और उत्तरखण्ड। इस संस्करण के उत्तरखण्ड में इस बात के संकेत हैं कि मुख्यत: इसमें पांच ही खण्ड थे और छह खण्डों की कल्पना कालान्तर में की गयी। इस पुराण की श्लोक-संख्या विभिन्न पुराणों में भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रस्तुत की गयी है। 

‘मत्स्यपुराण’ के अनुसार पद्मपुराण में 55 हजार श्लोक हैं, तो ‘ब्रह्मपुराण’ के मतानुसर श्लोकों की संख्या 59 हजार है। ‘श्रीमद्भागवत’ में पद्मपुराण की श्लोक-संख्या 55 हजार है। इसी प्रकार खण्डों के क्रम में भी मतभेद दिखाई पड़ता है। बंगाली संस्करण, जो हस्तलेखों में ही प्राप्त है, में पांच खण्ड हैं। स्वंय पद्मपुराण’ में भी इस तथ्य का उल्लेख है कि इसमें पांच खण्ड हैं। किसी-किसी पुस्तक में इसके सात खण्डों का भी वर्णन है-सृष्टि खण्ड, भूमि खण्ड, स्वर्ग खण्ड, ब्रह्म खण्ड, पाताल खण्ड, उत्तर खण्ड तथा क्रिया खण्ड। सम्प्रत्ति प्रचलित पद्मपुराण में पांच ही ख्ण्ड हैं-सृष्टिखण्ड, भूमिखण्ड, स्वर्गखण्ड, पातालखण्ड तथा उत्तर खण्ड।

3. विष्णु पुराण -

विष्णु पुराण वैष्णवों का प्रमुख ग्रन्थ माना जाता है। इसकी महत्ता इस रूप में सिद्ध है कि वैष्णव आचार्य रामानुज ने अपने ‘श्रीभाष्य’ में प्रमाण स्वरूप इसके उद्धरण दिये हैं। इसमें एकमात्र विष्णु ही सर्वोच्च देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं और इसी रूप में उनकी महिमा का बखान कर उन्हें ब्रह्मा तथा शिव से अभिन्न माना गया है। इस पुराण का विभाजन अंशों में हुआ है, जिनकी संख्या 6 है और प्रत्येक अंश अनेक अध्यायों में विभक्त है और उनकी संख्या कुल 126 है। इस पुराण में छह सहò श्लोक हैं। पर, इस सम्बन्ध में नारदीय एवं मत्स्य पुराण में क्रमश: चौबीस एवं 23 हजार श्लोक बताये हैं। इस पुराण की तीन टीकाओं का पता चला है-श्रीधर स्वामीकृत टीका, विष्णुचित्त रचित विष्णुचित्तीय तथा रत्नगर्भभट्टाचार्य प्रणीत वैषणवकूत चन्द्रिका। इस पुराण के वक्ता पराशर हैं और श्रोता मैत्रोय अर्थात् दोनों के संवाद के रूप में इसकी रचना हुई है।

विष्णु सम्बन्धी पुराण होते हुए भी इसमें विष्णु के व्रतों, पूजापद्धतियों एवं तीर्थों का वर्णन नहीं है। इसके प्रथम अंश में 22 अध्याय हैं ओर चौबीस तत्त्वों के विचार के साथ जगत् के उत्पत्तिक्रम का वर्णन कर विष्णु की महिमा गायी गयी है। ब्रह्मा की आयु और काल का स्वरूप, उनकी उत्पत्ति, वराह द्वारा पृथ्वी का उद्धार, ब्रह्मा द्वारा पृथ्वी की रचना, अविद्यादि विविध सर्गों का वर्णन, चातुर्वण्र्यव्यवस्था एवं प्रलय का वर्णन करने के पश्चात् धु्रव, प्रह्लाद आदि की कथा का कथन कर विष्णु भगवान् की विभूति और जगत् की व्यवस्था का वर्णन है।

द्वितीय अंश में 16 अध्याय हैं। इसके अन्तर्गत भूगोल, खगोल तथा सात पाताल लोकों के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के नरकों एवं भगवन्नाम के माहात्म्य का वर्णन है। इसमें सूर्य, नक्षत्रा, राशियों की व्यवस्था, कालचक्र, लोकपाल, गंगावतरण ज्योतिश्चक्र, शिशुकुमारचक्र, द्वादश सूर्यों के नाम, अधिकार एवं सूर्य तथा वैष्णवी शक्ति का मनोरम विवरण प्राप्त होता है। इसी खण्ड में जड़ भरत का चरित्रा भी वर्णित है। इसमें भरत-चरित्रा के वर्णन में भारत वर्ष के नामकरण का भी प्रसंग आया है।

तृतीय अंश में 18 अध्याय हैं और आश्रम-विषयक कर्त्तव्यों का निर्देश कर वैदिक शाखाओं का विस्तृत विवेचन हुआ है। इसमें चतुर्युग के अनुसार व्यासों के भिन्न-भिन्न नामों का विवरण प्रस्तुत कर उनकी संख्या 28 बतलायी गयी है और ब्रह्मज्ञान के माहात्म्य का वर्णन किया गया है। इसी अंश में व्यास तथा उनके शिष्यों द्वारा किये गये वैदिक विभागों तथ कई सम्प्रदायों का भी उल्लेख है। तत्पश्चात् अष्टादश पुराणों की परिगणना कर समस्त शास्त्रों एवं कलाओं की सूची प्रस्तुत हुई है। इसके भीतर भगवान् विष्णु की आराधना तथा चातुर्वण्र्यधर्म का प्रतिपादन कर ब्रह्मचर्यादि आश्रमों, जातकर्म नामकरण, विवाह संस्कार की विधि, गृहस्थ-सम्बन्धी आचार, श्राद्ध तथा प्रेतकर्म का भी समावेश किया गया है।

चतुर्थ अंश में 24 अध्याय हैं और ऐतिहासिक सामग्री का चयन किया गया है। इसमें राजवंशों की उत्पत्ति दिखाकर सूर्य एवं चन्द्रवंशी नरेशों की वंशावली प्रस्तुत की गयी है। इसमें पुरूरवा-उर्वशी-संवाद, राजा ययाति, पाण्डवों की कथा, कृष्ण चरित, महाभारत एवं रामायण की कथा का निरूपण कर भविष्य में होने वाले मगध, शिशुनाग, नन्द, मौर्य, आन्धभृत्य प्रभृति राजवंशों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। पंचम अंक के 38 अध्यायों में सम्पूर्ण कृष्ण चरित एवं कृष्ण लीला का वर्णन है। षष्ठ अंश में कुल आठ अध्याय हैं और कलिधर्म निरूपण, व्यास द्वारा कलियुग, शूद्र और िस्त्रायों का महत्त्व वर्णन, प्राकृत प्रलय का निरूपण, आध्यात्मिकादि ित्राविधतापों का वर्णन तथा कृत युग, त्रोता, द्वापर एवं कलियुग का वर्णन कर कलि के दोषों को भविष्य कथन के रूप में दिखाया गया है। अन्तिम अध्याय में सम्पूर्ण पुराण का सारांश देकर विष्णु की स्तुति एवं प्रार्थना में पुराण की समाप्ति होती है।

विष्णु पुराण के रचना-काल के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार के मत प्राप्त होते है। अंतरंग परीक्षा के आधार पर इसका काल-निर्णय किया जा सकता है। इसमें ब्रह्म पुराण के पांच श्लोक उद्धृत हैं विष्णु 4।10।23।27)। याज्ञवल्क्य स्मृति की मिताक्षरा टीका में नारायण बलि के सम्बन्ध में विष्णु पुराण के 14 श्लोक आये हैं और कल्पतरु, स्मृति-चन्द्रिका तथा अपरार्क ने इसके कई सौ श्लोकों को ग्रहण कर लिया है। विष्णु-पुराण के दो श्लोक काव्य प्रकाश के रसध्वनि प्रकरण में उद्धृत हैं। इन आधारों तथा कलियुग के वर्णन में गुप्तकाल का इतिहास प्रस्तुत करने के कारण इसका समय 100 ई0 से 200 ई0 के मध्य माना गया है। तमिल ग्रन्थ मणिमेखले में विष्णु पुराण का उल्लेख होने से डॉ0 रामचन्द्र दीक्षितार इसका आर्विभावकाल ईस्वी पूर्व द्वितीय शती मानते हैं जो अधिक विश्वसनीय प्रतीत होता है।

4. वायुपुराण -

वायुपुराण में ऐतिहासिक तत्त्वों का आधिक्य है तथा अनेक पुराणों की अपेक्षा इसमें वैज्ञानिक तथ्यों की अधिकता है। इस पुराण की रचना असीमकृष्ण के शासनकाल में हुई थी। अन्य पुराणों का प्रवचन नैमिषारण्य में हुआ था, पर इस पुराण में इस प्रकारके संकेत प्राप्त होते हैं कि वायुपुराण का प्रवचन कुरुक्षेत्रा में हुआ। इसके द्वितीय अध्याय में इस प्रकार का कथन है कि इसका अतिप्राचीन प्रवचन नैमिषारण्य में ही हुआ था और यह समय मन्वन्तर का आदिकाल रहा होगा। सृष्टि के प्रारम्भ में मुनियों द्वारा प्रार्थना किये जाने पर वायुदेवता ने इस पुराण को सुनाया था और ‘वातारणि ऋषि’ इस पुराण के प्रवक्ता हुए थे। इसलिये इसे वायुप्रोक्त संहिता भी कहते हैं।

वायुपुराण और शिवपुराण के सम्बन्ध में विचित्रा प्रकार की कल्पनाएं प्रसिद्ध हैं। कतिपय विद्वान् दोनों को एक ही (पुराण) मानते हैं और कुछ इनके स्वतंत्रा अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। ‘विष्णु’, ‘मार्कण्डेय’, ‘कूर्म’, ‘वाराह’, ‘लिंग’, ‘ब्रह्मवैवर्त्त’ एवं ‘भागवतपुराण’ में ‘शिवपुराण’ का उल्लेख है; किन्तु ‘नारद’, ‘मत्स्य’, तथा ‘देवी भागवत’ में वायु की चर्चा की गयी है। पर, सम्प्रति दोनों ही पुराण पृथक्-पृथक् रूप में उपलब्ध हैं और उनके वण्र्य-विषयों में भी पर्याप्त अन्तर है। वायुपुराण 112 अध्यायों से युक्त है, जिसकी श्लोकसंख्या ग्यारह सहò है। यह पुराण चार खण्डों-प्रक्रिया, अनुषंग,उपोद्धात तथा उपसंहार-में विभक्त है, जिन्हें पाद कहा गया है। 

इसके वण्र्य विषयों में सृष्टिक्रम एवं राजाओं की वंशावली है। आरम्भ के कई अध्यायों में सृष्टि का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करने के पश्चात् भौगोलिक सामग्री का चयन किया गया है, जिसमें जम्बू द्वीप का विशेष रूप से वर्णन कर अन्य द्वीपों का भी परिचय दिया गया है। इसके पश्चात् अनेक अध्यायों में खगोल-वर्णन, युग, ऋषि, तीर्थ एवं यज्ञों के विवरण दिये गये हैं। इसमें कई राजाओं के वंशों का वर्णन कर प्रजापति वंश का उल्लेख हुआ है और प्रजावर्ग तथा ऋषिवंशों के अन्तर्गत प्राचीन बाह्यवंशों का ऐतिहासिक विवेचन प्रस्तुत किया गया है। 

वायुपुराण के 99 अध्याय में प्राचीन राजवंशों की विस्तृत वंशावलियाँ दी गई हैं और अनेक अध्यायों में श्राद्ध एवं प्रलय का वर्णन है। इस पुराण का विवेच्य विषय है-शिवभक्ति एवं उसकी महत्ता का निदर्शन। इसके समस्त आख्यान शिवभक्तिपरक हैं, पर यह पुराण शिवसम्बन्धी पूर्वाग्रह एवं कट्टरता की भावना से रहित है तथा इसमें अन्य देवताओं के प्रति भी श्रद्धास्पद तथ्य प्रस्तुत कर उनको स्थान दिया गया है। इसके कई अध्यायों में विष्णु के अवतारों की गाथा दी गयी है और 11 से 15 अध्यायों तक यौगिक प्रक्रिया का सविस्तर वर्णन है। इस पुराण की समाप्ति शिव के ध्यान में लीन होकर योगियों द्वारा शिवलोक की प्राप्ति में होती है।

रचना कौशल के वैशिष्ट्य, सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित के अनुकीर्त्तन के कारण वायुपुराण का महत्व असंदिग्ध है। इस पुराण के 104 से 112 अध्यायों में वैष्णवमत का जो पुष्टिकरण है, उसे प्रक्षिप्त माना जाता है। पंडितों का अनुमान है कि किसी वैष्णव भक्त ने इसे बाद में जोड़ दिया होगा इसमें राधा का भी नामोल्लेख है और 104 वें अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण की ‘मधुर लीला’ का गान किया गया है। इसके अन्त के आठ अध्यायों में गयामाहात्म्य का विस्तारपूर्वक वर्णन है और उसके देवता के रूप में गदाधर नामक विष्णु का उल्लेख है। इसके प्रक्रिया पाद में 6 अध्याय हैं और उपोद्घात पाद 7 से 64 अध्याय तक है। अनुषंगपाद में 65 से 99 तक अध्याय आते हैं और 100 से 112 तक के अध्याय उपसंहारपाद में हैं। 

इस पुराण में कल्प, सृष्टि एवं सांख्यदर्शन का विलक्षण प्रकार से वर्णन उपलब्ध होता है। अन्य पुराणों में जहां तीस कल्पों के विवरण प्राप्त होते हैं वहां इसमें 28 कल्पों का ही विवेचन है। कल्पों की सूची इस प्रकार है’भव, भुव, तप, भेव, रम्भ, ऋतु, क्रतु, वह्नि, हव्यवाहन, सावित्रा, भुव, उशिक, कुशिक, गन्धर्व, ऋषज्, षड्ज, मार्जालीय मध्यम, वैराजक, निषाद, पंचम, मेघवाहन, चिन्तक, आकूति, विज्ञाति, मन, भाव, बृहत्। इसमें सृष्टि की एक-एक संख्या को कल्प मान लिया गया है। इसके प्रारम्भ में यह बताया गया है कि विश्व की उत्पत्ति के एकमात्रा कारण महेश्वर हैं और वे आनन्दस्वरूप हैं।

वायुपुराण का वैशिष्ट्य ‘पाशुपत योग’ के वर्णन में है जो प्राचीन योगशास्त्रा के स्वरूप के परिज्ञान के लिए अत्यन्त उपादेय है।

इस पुराण का उल्लेख बाणभट्ट ने ‘हर्षचरित’ एवं ‘कादम्बरी’ दोनों ही ग्रन्थों में किया है-पुराणे वायु प्रलपितम्। इससे पता चलता है कि यह उस समय तक अधिक लोकप्रिय हो गया था। शंकराचार्य के ब्रह्मसूत्रा भाष्य में ‘वायुपुराण’ के उद्धरण प्राप्त होते हैं और ‘महाभारत’ के वनपर्व में इसका स्पष्ट निर्देश प्राप्त होता है। इस दृष्टि से इसकी प्राचीनता सर्वविदित है। आधुनिक विद्वान् डॉ0 हाजरा वायुपुराण में गुप्त राज्य के आरम्भिक काल की सीमा का उल्लेख प्राप्त कर इसका समय 400 ई0 के आस-पास मानते हैं, पर इसके पूर्ववर्ती होने के भी प्रमाण विद्यमान हैं।

5. नारदीयपुराण पुराण -

नारदीय पुराण विष्णुभक्तिपरक पुराण है, जो प्रसिद्ध विष्णुभक्त नारद के नाम पर रचित है। इसमें नारद जी विष्णुभक्ति का प्रतिपादन करते हैं। पर, इसे केवल भक्ति ग्रन्थ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसमें वैष्णवों के अनुष्ठानों एवं सम्प्रदायों तथा तत्सम्बन्धी दीक्षा का विधान है। इस पुराण में सभी पुराणों की विषय-सूची दी गई है और अनेक तीर्थों के माहात्म्य प्रदर्शित किये गये हैं। उदाहरणार्थ गंगा माहात्म्य, गया माहात्म्य, काशी माहात्म्य, पुरुषोत्तम माहात्म्य, प्रयाग माहात्म्य, कुरु़क्षेत्रा माहात्म्य, हरिहर माहात्म्य, वदरिकाश्रम माहात्म्य, कामोदामाहात्म्य, प्रभासतीर्थ, पुष्कर माहात्म्य, गौतमाश्रम माहात्म्य, त्रयम्बक माहात्म्य, सेतु माहात्म्य, नर्मदातीर्थ माहात्म्य, अवन्ती माहात्म्य, मथुरा माहात्म्य तथा वृन्दावन माहात्म्य को लिया जा सकता है। ‘मत्स्य पुराण’ में कहा गया है कि इस पुराण की कथा में नारद ने बृहत्कल्प के प्रसंग में धर्म का उपदेश दिया है। 

इस पुराण में 25 हजार श्लोक हैं और पूर्व तथा उत्तर के नाम से दो खण्ड हैं। पूर्व खण्ड में कुल 128 अध्याय हैं और उत्तर खण्ड में 82 अध्याय। सम्प्रति इस पुराण के श्लोको को जोड़ने से उनकी संख्या 18110 होती है। इसके उत्तर भाग में वैष्णव सम्प्रदाय का विशेष रूप से वर्णन कर उनका महत्व प्रदर्शित किया गया है, पर पूर्वभाग में साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह के दर्शन नहीं होते। पौराणिक क्रम से ‘विष्णु पुराण’ को छठा स्थान प्राप्त है। कतिपय विद्वान् सभी पुराणों की विषयानुक्रमणिका को देखकर इसे अर्वाचीन पुराण कहते हैं, पर इस विवरण को परवर्ती प्रक्षेप कहा जा सकता है। 

6. मार्कण्डेय पुराण -

मार्कण्डय ऋषि के नाम पर इस पुराण का नामकरण किया गया है, जो इसके प्रवक्ता है। ‘शिवपुराण’ के उत्तर खण्ड में इस प्रकार का कथन है कि मार्कण्डेय मुनि इस पुराण के वक्ता हैं और यह सप्तम पुराण है। इस पुराण की मौलिकता, प्राचीनता और यथार्थता असंदिग्ध है। इसका विभाजन अध्यायों में हुआ है, जिनकी संख्या 137 है, पर कहीं-कहीं 138 अध्यायों का भी उल्लेख हुआ है। इसमें कुल नौ हजार श्लोक हैं। यह पुराण जैमिनी प्रश्नकर्त्ता है और उनके प्रश्नों के उत्तर मार्कण्डेय ने दिये हैं। इसका प्रारम्भ सृष्टि के वर्णन से न होकर ‘वसु’ के शाप की कथा से होता है। इसमें जैमिनी द्वारा सुनायी गयी कथा चार पक्षियों के माध्यम से कथित है। विंध्यगिरि पर चार पंडित पक्षी रहते थे, जिनके पास जाकर जैमिनी ने चार प्रश्न किये पक्षियों ने उत्तर के रूप में कहा कि भगवान् के चार व्यूह ही पृथ्वी पर अवतार ग्रहण कर संसार की सृष्टि, पालन एवं संहार करते हैं। 

इसी क्रम में चारों व्यूहों द्वारा धारण किये गये अवतारों का भी विवरण है। इन पक्षियों ने द्रौपदी के पंचपतित्व एवं उसके पुत्रों से सम्बद्ध प्रश्न का भी समाधान किया है। उनके अनुसार पूवर्जन्म में पांचों पाण्डव एक ही थे और कारण विशेष से अगले जन्म में पृथक्-पृथक् रूप में उत्पन्न हुए इसी प्रकरण मे राजा हरिश्चन्द्र और विश्वामित्रा की भी कथा आती है।

‘मार्कण्डेयपुराण’ में 31वें अध्याय के पश्चात् इक्ष्वाकुचरित, तुलसीरचित, रामकथा, कुशवंश, सोमवंश, पुरुरवा, नहुष तथा ययाति का वृत्त, कृष्ण-लीला, द्वारिकाचरित, सारख्या कथा प्रप×जसत्त्व एवं मार्कण्डेय की कथा वर्णित है। इस पुराण के प्रारम्भ में महाभारत-विषयक चार प्रश्न उठाये गये हैं और उनका उत्तर पूर्वोक्त चार पक्षियों द्वारा दिलाया गया है। इसमें अनेक पौराणिक आख्यानों के अतिरिक्त गृहस्थ धर्म, श्राद्ध, दैनिकचर्या, नित्यकर्म, व्रत तथा उत्सव-सम्बन्धी विषय वर्णित हैं तथा आठ अध्यायों में योगशास्त्रा का विस्तृत विवेचन है। इस पुराण में अनेक दार्शनिक बातों का भी उल्लेख है और प्राणियों के जन्म तथा मृत्यु के पश्चात् प्राप्त होने वाले अनेक लोकों का कथन किया गया है। इसी क्रम में कार्त्तवीर्य अर्जुन की कथा, दत्तात्रोय का चरित तथा सती मदालसा की कहानी कही गयी है। 

तदनन्तर सृष्टि, भुवनकोश एवं मन्वन्तर आदि पौराणिक विषयों का विवेचन हुआ है। इसमें विश्वविश्रुत धर्मग्रन्थ ‘दुर्गासप्तशती’ का समावेश किया गया है, जिसमें तीन चरित हैं। प्रथम चरित में मधुकैटभ-वध, मध्यमचरित में महिषासुरवध तथा उत्तरचरित में शुम्भनिशुम्भ एवं उनके सेनाध्यक्षों-चण्ड, मुण्ड तथा रक्तबीज-का वध वर्णित है। इसमें दुर्गा को सृष्टि की मूलशक्ति मानकर विश्व की मूलचितिशक्ति के रूप में उनका वर्णन किया गया है। इस पुराण में विष्णु कर्मशीलदेव के रूप में वर्णित हैं और भारतवर्ष को कर्मशील देश माना गया है। इसके अन्तिम 27 अध्यायों में सूर्यवंश का वर्णन कर ‘दम’ के चरितवर्णन के साथ पुराण की समाप्ति की गयी है।

7. अग्निपुराण -

अग्नि द्वारा वसिष्ठ को उपदेश दिये जाने के कारण इस पुराण का नाम अग्नि पुराण है। पौराणिक क्रम से इसे अष्टम स्थान प्राप्त है। यह पुराण भारतीय कला, दर्शन, संस्कृति और साहित्य का विश्व कोश माना जाता है, जिसमें शताब्दियों के प्रवह-मान भारतीय विद्या का सार उपन्यस्त है। इसमें पुराणों में वर्णित विषयों के अतिरिक्त अनेक शास्त्राीय विषयों का भी सार-संग्रह किया गया है। इस पुराण का विभाजन अध्यायों में किया गया है, जिनकी संख्या 383 है और 11457 श्लोक हैं। इसके आरम्भ में विष्णु के मत्स्य, कूर्म तथा वराह अवतारों का वर्णन कर रामायण के प्रत्येक काण्ड की कथा का पृथक्-पृथक् अध्यायों में वर्णन किया गया है। 

तदनन्तर श्रीकृष्ण के वंश का वर्णन किया गया है, जिसका नाम हरिवंश है। इसमें महाभारत के सभी पर्वों की कथा स्वतन्त्रा अध्यायों में दी गयी है, बाद में सृष्टि का वर्णन किया गया है। इसमें अनेक व्रतों एवं उपवासों का भी विवरण प्रस्तुत किया गया है तथा भगवान् के अवतारों एवं उनकी प्रतिमाओं के लक्षण उल्लिखित हैं। शिवलिंग, सूर्य प्रभृति प्रतिमाओं के स्वरूप का वर्णन हुआ है तथा अनेक प्रकार की पूजाओं एवं दीक्षाओं का उल्लेख है। 

इसमें गंगा, काशी, गया, प्रयाग तथा नर्मदा के माहात्म्य वर्णित हैं तथा राजा के धर्म एवं व्रत, दान आदि का भी वर्णन है। अग्निपुराण में स्त्राी पुरुष के शारीरिक लक्षणों एवं सामुद्रिक शास्त्रा का वर्णन तथा रत्नों के भी लक्षण दिये गये हैं। इनमें चारों वेद, धनुर्वेद, आयुर्वेद, व्याकरण, दिव्यपरीक्षा तथा नाना प्रकार के अस्त्रों की शान्ति के उपाय वर्णित हैं। सृष्टि की उत्पत्ति, स्वायंभुवमनु, काश्यप, वंशवर्णन तथा विष्णु आदि देवताओं की पूजा का विधान, कर्मकाण्ड के विविध विधान, देवालयों के निर्माण का भी, अत्यन्त विस्तार के साथ वर्णन हुआ है। 

इनके अतिरिक्त भारतवर्ष का वर्णन, तांित्राक उपासना, युद्ध विद्या, श्राद्ध का विधान, ज्योतिषशास्त्रा का निरूपण, वर्णाश्रमधर्म, विवाह संस्कार, शौचाशौच आचार, वानप्रस्थ, पतिधर्म तथा नाना प्रकार के पाप एवं उनके प्रायश्चित्त के उपायों का इसमें निरूपण है। कोश, योग विद्या, ब्रह्मविद्या, श्राद्ध का विधान, ज्योतिषशास्त्रा का निरूपण है। कोश, योग विद्या, ब्रह्मविद्या, गीता का सार, अश्वायुर्वेद, गजायुर्वेद, वृक्षायुर्वेद, गोचिकित्सा, यात्रा, शकुन का वर्णन, दान की महिमा, दण्डनीति, धनुर्विद्या, दायभाग तथा लोक-शिक्षण से सम्बद्ध अनेकविध विद्याओं को इसमें स्थान दिया गया है। अनेक विद्याओं का सार प्रस्तुत करने के कारण विण्टरनित्स ने इसे भारतीय विद्या का महाकोश कहा है। इसके अन्त में कहा गया है कि अग्निपुराण में समस्त विद्यााएं प्रदर्शित की गयी हैं।

8. भविष्य पुराण -

भविष्य की घटनाओं वर्णन होने के कारण इसका नाम भविष्य पुराण है। बृहéारदीयपुराण में इसकी जो विषयय-सूची दी गयी है, उसके अनुसार इसमें पांच पर्व हैं-ब्रह्मपर्व, विष्णुपर्व, शिवपर्व, सूर्यपर्व तथा प्रतिसर्ग पर्व। भविष्यपुराण में कुल 14 हजार श्लोक हैं। नवलकिशोर प्रेस, लखनऊ से प्रकाशित संस्करण में दो खण्ड हैं-पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्द्ध और उनमें क्रमश: 41 एवं 171 अध्याय हैं। संप्रति इसकी जो प्रतियां उपलब्ध हैं, उनमें नारदीयपुराण की विषय-सूची की पुष्टि नहीं होती। भविष्य-कथन में कलि के विभिन्न राजाओं से लेकर रानी विक्टोरिया तक का इसमें वर्णन है। इसके प्रतिसर्गपर्व की अनेक कथाओं की पंडितों ने अविश्वसनीय माना है और इसका भविष्यकथन भी आज की घटनाओं से मेल नहीं खाता, अत: विद्वान् इसे प्रक्षेप मानने को विवश हैं।

भविष्य में होने वाली घटनाओं का वर्णन होने के कारण इसमें समय-समय पर उत्पन्न विद्वानों ने अनेक समय की घटनाओं को जोड़ दिया है, जिससे सारा पुराण गड़बड़ का भंडार हो गया है। इसमें अंगरेजों के लिये ‘इंगे्रज’ शब्द का प्रयोग हुआ है। इस पुराण का मूल रूप समय-समय पर परिवर्तित होता गया है और बेडौल ठूसठास के कारण यह अज्ञेय होता चला गया है। आफ्रेट महोदय ने 1903 ई0 में अपने एक लेख में इसके लिये ‘साहित्यिक धोखेबाजी’ शब्द का प्रयोग किया था। वैंकटेश्वर प्रेस, बम्बई से प्रकाशित संस्करण में इतनी नवीन बातें आ गयी हैं कि सहसा उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। पं0 ज्वालाप्रसाद मिश्र को भविष्यपुराण की जो चार प्रतियां प्राप्त हुई थीं, उनमें परस्पर भिन्नता थी। उनका कहना था कि आज कल जो भविष्यपुराण मिलता है, उसमें चारों प्रतियों के विषयों का मिश्रण है। इस पुराण का प्रारम्भ राजा शतानीक के प्रश्न से होता है जिसका उत्तर सुमन्त मुनि देते हैं। 

इसके वण्र्य-विषयों के युगों की संख्या और धर्म, चतुर्वणों की उत्पत्ति, संस्कार एवं उनके नाम, ब्राह्मणों की प्रशंसा तथा पुराणों की प्रशंसा हैं। इसमें वेदाध्ययन की विधि, संस्कारों की विधि, ब्रह्मचारी के धर्म, स्त्री के लक्षण, चारों वर्णों की वैवाहिक व्यवस्था, विवाह के आठ भेद, पुत्राी के धन लेने का निषेध, पतिव्रता का आचरण एवं शास्त्रा पर विचार, उत्तम देश में निवास करने योग्य स्थान पर विचार, गृहस्थ का व्यवहार, मन्दिर बनाने एवं ब्रह्मा जी की पूजा का फल आदि विषयों का वर्णन है। उपर्युक्त सभी विषय प्रथम कल्प में वर्णित हैं। इसके द्वितीय कल्प में च्यवन ऋषि की कथा तथा पुष्प-द्वितीया की विधि का कथन है। इसमें सूर्य-पूजा का फल आदि विषयों का वर्णन हुआ है और सर्पों की विविध जातियों के लक्षण का वर्णन कर मन्त्रौषधि के प्रयोग की विधि बतायी गयी है। इसमें बताया जाता है कि श्रीकृष्ण के पुत्रा साम्ब को जब कुष्ठ रोग हो गया तो उनकी चिकित्सा के लिये गरुड शाकद्वीप से शाकद्वीपी ब्राह्मणों को ले आये, जिन्होंने सूर्योपासना के द्वारा उन्हें रोग-मुक्त कर दिया।

धार्मिक जीवन के विविध विधानों, सृष्टि-क्रम की चर्चा तथा भौगोलिक विषयों का भी वर्णन इस पुराण में हुआ है। सूर्योपासना के वर्णन में ही सुप्रसिद्ध ‘आदित्य हृदयस्तोत्रा’ का समावेश है। आधुनिक राजाओं का वर्णन करते समय इसमें मुस्लिम शासन की स्थापना, पृथ्वीराज की गाथा तथा आल्हा ऊदल की कहानी कही गयी है। शाकद्वीपी मग ब्राह्मणों की उत्पत्ति का वर्णन ऐतिहासिक महत्त्व रखता है। इस पुराण का उल्लेख अबलेरूनी के ग्रन्थ में होने के कारण विद्वानों ने इसका समय दसवीं शती माना है।

9. ब्रह्म्रवैवर्त्त पुराण -

ब्रह्म के विवर्त्त के प्रसंग के कारण इस पुराण की संज्ञा ब्रह्मवैवर्त्त है। यह पुराण चार खण्डों में विभक्त है-ब्रह्म खण्ड, प्रकृति खण्ड, गणेश खण्ड तथा कृष्ण-जन्म-खण्ड-और श्लोकों की संख्या अट्ठारह हजार है। यह वैष्णव पुराण है जिसका प्रतिपाद्य विषय श्रीकृष्ण के चरित्रा का विस्तारपूर्वक वर्णन कर वैष्णव तथ्यों का प्रकाशन है। इसमें राधा कृष्ण की पत्नी एवं सृष्टि की आधारभूत शक्ति के रूप में प्रदर्शित की गयी हैं। नारदपुराण के अनुसार इसमें श्रीकृष्ण द्वारा ब्रह्म तत्त्व का प्रतिपादन होने के कारण इसकी अभिधा ब्रह्मवैवर्त्त पुराण है।

अष्टादश पुराण से यह पुराण इस अर्थ में भिन्न है कि अन्य पुराणों में जहाँ पांच तत्त्वों की प्रधानता होती है, वहां इसमें सृष्टि की उत्पत्ति का अल्प मात्रा में वर्णन कर राधा-कृष्ण की ललित-लीला का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए तत्वम्बन्धी साम्प्रदायिक साधानाएं एवं उपासनाएं प्रस्तुत की गयी हैं। इसके कथानक की नव्यता की सूचना स्वयं इसके लेखक ने दी है। “समस्त पुराणों और उप-पुराणों तथा वेदों के भ्रम का भंजन करने वाला, हरि भक्ति का उत्पादक, समस्त ताित्त्वक ज्ञान की वृद्धि करने वाला कामियों को कामना की पूर्ति करने वाला और मोक्षभिलाषियों को मोक्ष दिलाने वाला, वैष्णव जनों की भगवत् भक्ति का मार्ग-दर्शक यह ब्रह्मवैवर्त्त पुराण है। इस प्रकार इसे कल्पवृक्ष समझना चाहिये।”

इसके बह्म खण्ड में श्रीकृष्ण द्वारा सृष्टि की रचना करने तथा परब्रह्म का निरूपण है। इस खण्ड में कुल तीस अध्याय हैं। इस खण्ड में परब्रह्म परमात्मा को सृष्टि का बीज तत्व माना गया है और वे एकमात्र गोलोक वासी श्रीकृष्ण ही हैं। इसमें परब्रह्म को शिव, शक्ति, महाविष्णु, दुर्गा या श्रीकृष्ण से अभिन्न कहा गया है। इसके सोलहवें अध्याय में आयुर्वेद का वर्णन है। प्रकृति खण्ड में देवियों का चरित वर्णित है तथा देवताओं की उत्पत्ति एवं विश्व के निर्माण की उपक्रियायें कथित हैं। इसमें प्रकृति का वर्णन दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्राी एवं राधा के रूप में किया गया है। 

अन्य वण्र्य विषयों में तुलसी-पूजन-विधि, रामचरित तथा द्रौपदी के पूर्वजन्म का वृत्तान्त, सावित्री की कथा, छियासी प्रकार के नरककुण्डों का वर्णन, लक्ष्मी की कथा, भगवती स्वाहा, स्वधा, देवी षष्ठी आदि की कथा तथा पूजन विधि, महादेव द्वारा राधा के प्रादुर्भाव एवं महत्व का वर्णन, श्री राधा का ध्यान एवं षडशोपचार पूजन-विधि, दुर्गाजी के सोलह नामों की व्याख्या, दुर्गाशन स्तोत्रा तथा प्रकृति कवचादि का वर्णन है। गंगा, लक्ष्मी, सरस्वती आदि देवियों का उपाख्यान तथा भक्तों के लक्षणों का वर्णन इसी खण्ड मं है। इसमें काल-कमलेश्वर के गुणों का निरूपण एवं पृथ्वी की कथा दी गयी है और भूमि हरण के पाप एवं भूमि-दान के पुण्य का उल्लेख है। इसी खण्ड में गंगोपाख्यान के अन्तर्गत गंगा-स्तोत्रा का वर्णन हुआ है।

गणेश खण्ड में गणेश के जन्म, कर्म तथा चरित का विशद वर्णन है और उन्हें कृष्णावतार के रूप में दिखाया गया है। श्रीकृष्ण खण्ड में श्रीकृष्ण की सर्वांगपूर्ण गाथा प्रसतुत की गयी है और राधा-कृष्ण के विरह का विवस्तृत वर्णन है।

ब्रह्मवैवर्त्त पुराण स्तोत्रा और कवचों का विशाल संग्रह ग्रन्थ है। इसमें गणेश सम्बन्धी चार, शिवविषयक 6, दुर्गा सम्बन्धी ग्यारह, नारायण के दो, लक्ष्मी के 6, श्रीकृष्ण के 41, राधा के 10 एवं अन्य देवताओं के तीन स्तोत्रा हैं। इसके अन्य प्रतिपाद्य विषयों की सूची इस प्रकार है-भगवद्भक्ति का प्रतिपादन, योग का वर्णन, सदाचार, वैष्णव तथा भक्ति की महिमा, नर-नारी के धर्म, अतिथि-सेवा का महत्त्व, गुरुमहिमा, माता-पिता की महत्ता, रोग-विज्ञान, स्वास्थ्य के नियम तथा औषधों की उपादेयता, वृद्धत्व के न आने के साधन, आयुर्वेद के सोलह आचार्यों एवं उनके ग्रन्थों का विवरण, भक्ष्याभक्ष्य, शकुन, अपशकुन तथा पाप-पुण्य का उल्लेख। 

इस पुराण के प्रमुख चरित्रा श्रीकृष्ण हैं और राधा उनकी ह्लादिनी शक्ति के रूप में वर्णित है। इसमें राधा-कृष्ण के विवाह का भी वर्णन है तथा कृष्ण-भक्ति सम्बन्धी जितने भी सम्प्रदाय हैं-राधावल्लभीय, गौड़ीय, वल्लभीय आदि- उन सबों के साधानात्मक रहस्यों के मूल òोत इसमें विद्यमान हैं। इसमें यह प्रतिपादित किया गया है कि प्रकृति, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव का आविर्भाव श्रीकृष्ण से ही हुआ है। इसमें श्रीकृष्ण और राधा से उस महाविराट् पुरुष या नारायण की उत्पत्ति कही गयी है, जिनके रोम-रोम में ब्रह्माण्ड है। 

इस पुराण के अनुसार हरि-भक्ति और हरि-कीर्त्तन का मार्ग सार्वभौम और सार्वजनीन है। श्रीकृष्ण की भक्ति से विहीन नर महापातकी बतलाये गये हैं। इस पुराण की रचना नारायण और नारद-संवाद के रूप में की गयी है। साहित्यिक दृष्टि से इसका महत्त्व असंदिग्घ है।

10. लिड़्ग पुराण -

यह शिवपूजा एवं लिंगोपासना के रहस्य को बतलाने वाला तथा शिव-तत्त्व का प्रतिपादक पुराण है। इसके आरम्भ में लिंग शब्द का अर्थ ओंकार किया गया है, जिसका अभिप्राय यह है कि शब्द तथा अर्थ दोनों ही ब्रह्म के विवर्त्त रूप हैं। इसमें बताया गया है कि ब्रह्म सच्चिदानन्द स्वरूप है और उसके तीन रूप-सत्ता, चेतना और आनन्द-आपस में संबद्ध हैं। सत्ता के अभाव में न तो ज्ञान की उपलब्धि हो सकती है और न ज्ञान के बिना आनन्द की ही प्राप्ति होगी। तीनों ही देश-काल की सीमा से परे एवं व्यापक हैं। ब्रह्म की माया शक्ति इन्हें सीमा में आबद्ध कर सृष्टि का निर्माण करती है। पुन: सीमाबद्ध होने पर सत्ता सामान्य तथा विशेष रूप में प्रकट होता है और सुख तथा दु:ख के रूप में आनन्द की भी परिणति हो जाती है। उपर्युक्त दार्शनिक तथ्य को पौराणिक भाषा में प्रकट किया गया है।

‘शिव पुराण’ बतलाता है कि लिंग के चरित का कथन करने या शिवपूजा के विधान का प्रतिपादन करने के कारण इसे लिंग पुराण कहते हैं। मत्स्य-पुराण के मतानुसार भगवान शंकर ने अग्निलिंग के मध्य में स्थित होकर तथा कल्पान्तर में अग्नि को लक्षित करते हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पदार्थों की उपलब्धि के लिये जिस पुराण में धर्म को आदेश दिया है, उसे ब्रह्मा ने लिंग या लैंग पुराण की संज्ञा दी है।

लिंग पुराण में कुल ग्यारह सहò श्लोक हैं और अध्यायों की संख्या 163 है। इसके दो विभाग हैं-पूर्व तथा उत्तर। पूर्वार्द्ध में 108 अध्याय हैं और उत्तरार्द्ध में 52 अध्याय। शिव-पुराण में भी इसके श्लोकों की संख्या यही हो गयी है। पूर्वभाग में बताया गया है कि शिव द्वारा ही सृष्टि की रचना हुई है। इसमें वैवरवत मन्वन्तर से लेकर कृष्ण के समय तक की घटनाओं एवं राजाअें के वंशवृत्त दिये गये हैं। चूँकि यह पुराण शिवतत्त्व का प्रतिपादन करता है और इसमें शिवोपासना का प्राधान्य है, अत: अनेक स्थलों पर शिव को विष्णु से महत्तर सिद्ध किया गया है। इसमें शिव के 28 अवतारों का कथन कर शैव तीर्थों एवं व्रतों का विस्तृत विवेचन है। इसके उत्तर भाग में शैवतन्त्रों के अनुसार ही पशु, पाश तथा पशुपति का वर्णन है। इसमें लिंगोपासना से सम्बद्ध से कथा भी प्रस्तुत की गयी है। 

इसके 92वें अध्याय में काशी का विस्तारपूर्वक वर्णन है और उसके अनेक तीर्थों का विवरण देकर काली की भौगोलिक स्थिति का परिचय दिया गया है। इसमें उत्तरार्द्ध के कई अध्याय गद्य में हैं और तेरहवें अध्याय में शिव की प्रसिद्ध अष्टमूर्तियों के वैदिक नामों के उल्लेख हैं। इसके कई भागों पर तांित्राक प्रभाव भी परिलक्षित होता है। इसमें योग का विस्तृत वर्णन कर उसमें आने वाले विघ्नों का वर्णन दिया गया है।

विघ्न-निवारण के साधनों में ध्यान, यज्ञ, तप, शास्त्रा-श्रवण आदि का कथन है। इसके 98वें अध्याय में विष्णुकृत ‘शिवसहòनाम’ है जिसमें शिव के वैदिक नाम भी आये हैं। लिंग-पुराण के वर्णित विषयों में दधीचि-चरित, युगधर्मविवेचन, लिंगप्रतिष्ठा, पशुपाशाभिमोक्षण, शिवव्रत, सदाचारनिरूपण, प्रायश्चित्तवर्णन, अरिष्टों का वर्णन, काशी की शोभा, अन्धकासुर का आख्यान, वाराहचरित, नृसिंह-चरित, जलन्धर, की कथा तथा उसका वध, शिवसहòनाम, सती की कथा एवं रक्ष-यज्ञ-विनाश का विवरण, काम-दहन, पार्वती-विवाह, विष्णु माहात्म्य कथन, अम्बरीष की कथा, सनत्कुमार और नन्दी-संवाद, शिवमाहात्म्य, सूर्यपूजा-विधि, शिवपूजा द्वारा मुक्ति की प्राप्ति, नाना प्रकार के दान, श्राद्ध-प्रकरण, अधोर-कीर्तन, व्रजेश्वरी, महाविद्या तथा गायत्राी की महिमा, अम्बक की महिमा, पुराणश्रवण का माहात्म्य आदि हैं।

लिंग पुराण का काल-निर्णय अभी तक अज्ञात है और इस सम्बन्ध में कोई सुनिश्चित मत स्थिर नही हो सका है। इसमें कल्कि और बौद्ध अवतारों के नाम हैं तथा नौवें अध्याय में योगान्तरायों का जो वर्णन है, वह ‘व्यासभाष्य’ से अक्षरश: मेल खाता है। ‘व्यासभाष्य’ का समय षष्ठशतक है। लिंग पुराण का निर्देश अल्बेरुनी ने भी किया है और ‘कल्पतरु’ में इसके अनेक उद्धरण हैं। इन्हीं प्रमाणों के आधार पर विद्वानों ने लिंग पुराण का समय आठवीं एवं नवीं शती के मध्य माना है।

11. वाराह पुराण -

विष्णु भगवान् के वराह अवतार का वर्णन होने के कारण इसे वराह पुराण कहा जाता है। इसमें इस प्रकार का उल्लेख है कि विष्णु ने वराह का रूप धारण कर पाताल लोक से पृथ्वी का उद्धार कर, इस पुराण का प्रवचन किया था। यह समग्रत: वैष्णव पुराण है। इसमें रामानुजीय श्री वैष्णव मत का विशद विवेचन प्रस्तुत है। इसके प्रारम्भ में सूतजी ने वराह भगवान् से इसकी कथा कहने की प्रार्थना की है। इसमें प्रश्नकर्त्ता पृथ्वी है और उत्तरदाता स्वयं वराह भगवान् हैं तथा विष्णु के दशावतारों एवं अनेक आख्यानों का विवरण प्राप्त होता है। प्रत्येक तिथि से सम्बद्ध व्रतों का वर्णन करते हुए तत्सम्बन्धी अनेक आख्यान दिये गये हैं और विशिष्ट मासों की तिथियों की अनेक कथाएँ कही गयी हैं। इसमें भगवान् विष्णु की शिवकृत स्तुति तथा स्तोत्रा का वर्णन है।

इस पुराण में 24 हजार श्लोक तथा 217 अध्याय हैं; किन्तु एशियाटिक सोसाइटी (कलकत्ता) से प्रकाशित संस्करण में 10,700 श्लोक हैं। इसके अनेक अध्यायों में केवल ग़द्य तथा पद्य का मिश्रण है। इस पुराण के दो रूप प्राप्त हैं-गौड़ीय एवं दक्षिणात्य, जिनमें पाठ-भेद के अतिरिक्त अध्यायों की संख्या में भी अन्तर है। इसमें सृष्टि तथा राजवंश-वृत्तों की संक्षिप्त चर्चा है, पर पुराणोक्त विषयों की पूर्ण संगति नहीं बैठ पाती। इसमें मुख्यत: भक्तों के निमित्त स्तोत्रों तथा पूजा-विधियों का संग्रह है। वैष्णव पुराण होते हुए भी इसमें शिव तथा दुर्गा से सम्बद्ध कथाएं एवं उनकी पूजा-विधियाँ दी गयी हैं। इसमें मातृ-पूजा और देवियों की पूजा का वर्णन 90 से 95 अध्याय में वर्णित है।

वाराह पुराण में गणेश की जन्म-कथा तथा गणेश-स्तोत्रा का भी वर्णन है तथा श्राद्ध, प्रायश्चित, देवप्रतिमा-निर्माण-विधि आदि का कई अध्यायों में विवरणात्मक परिचय है। इसके 152 से 198 अध्यायों में कृष्ण-कथा एवं मथुरा-माहात्म्य का वर्णन है। मथुरा-माहात्म्य में मथुरा का भौगोलिक विवरण देकर उसकी उपयोगिता बढ़ा दी गई है। वाराह-पुराण में नचिकेता का विस्तृत उपाख्यान देकर नरक और स्वर्ग का वर्णन किया है। रामानुजाचार्य का मत दिये जाने के कारण इसका समय नवम शताब्दी माना जाता है।

12. स्कन्द पुराण -

यह सर्वाधिक विशाल पुराण है, जिसकी श्लोक संख्या 81000 है। इस पुराण में 6 संहितायें हैं।
  1. सनत्कुमार संहिता 36,000
  2. सूत संहिता 6,000
  3. शंकर संहिता 30,000
  4. वैष्णव संहिता 5,000
  5. ब्रह्म संहिता 3,000
  6. सौर संहिता 1,000
                    - - - - - - - --
                  81,000 श्लोक
                  
इस पुराण का विभाजन विभिन्न खण्डों में भी किया गया है, यथा-माहेश्वरखंड, वैष्णवखण्ड, ब्रह्मखंड, काशीखंड, ध्वनिखंड, रेवाखंड, तापीखंड तथा प्रभासखंड।

इस पुराण का नामकरण शिव जी के पुत्रा स्कन्द या कािर्त्तकय के नाम पर किया गया है। इसमें स्कन्द द्वारा शैव तत्त्व का प्रतिपादन कराया गया है। सम्प्रति इस पुराण के दो संस्करण प्राप्त होते हैं-प्रथम संहितात्मक एवं द्वितीय खण्डात्मक। इसमें स्कन्द द्वारा तत्पुरुषकल्प के प्रसंग में अनेक चरित, उपाख्यान एवं माहेश्वर तत्त्व का व्याख्यान किया गया है। शिवपुराण के उत्तरखण्ड में कहा गया है कि ‘स्कन्दपुराण’ के वक्ता स्वयं शिव हैं और श्रोता स्कन्द हैं।

13. वामन पुराण -

विष्णु भगवान् के वामनावतार से संबद्ध होने के कारण इसका नाम वामन पुराण है। इसमें 95 अध्याय एवं दस हजार श्लोक हैं। मत्स्य-पुराण के अनुसार जिसमें ित्राविक्रम (वामन) भगवान् की गाथा ब्रह्मा द्वारा कीिर्त्तत है और उसमें वामन द्वारा तीन पगों में ब्रह्माण्ड को नापने का वर्णन है, उसे वामन पुराण कहते हैं। इस पुराण में चार संहितायें-माहेश्वर संहिता, भागवती संहिता, सौरी संहिता तथा गाणेश्वरी संहिता-हैं और पूर्व तथा उत्तर के नाम से दो विभाग किये गये हैं। इसके आरम्भ में वामनावतार की कथा वर्णित है तथा बाद के कई अध्यायों मे विष्णु के अवतारों का उल्लेख है। यह विष्णुपरक पुराण है। पर इसमें साम्प्रदायिक संकीर्णता परिलक्षित नहीं होती। 

इसमें विष्णु की चरितावली के अतिरिक्त शिव-माहात्म्य, शैवतीर्थ, उमा-शिव-विवाह, गणेश एवं कािर्त्तकेय के जन्म की कथा आदि बातों का समावेश है तथा ‘दुर्गासप्तशती’ मं वर्णित कथा का भी संक्षिप्त विवरण प्राप्त होता है। इसमें ‘मुर दानव’ के आख्यान का वर्णन कर विष्णु भगवान् के ‘मुरारि’ नामकरण का रहस्योद्घाटन हुआ है। भगवान शंकर द्वारा अंधकासुर के वध की कथा भी यहाँ वर्णित है। इस पुराण में वर्णित शिव-पार्वती चरित का कुमारसंभव के साथ आश्चर्यजनक साम्य दिखायी पड़ता है।

14. कूर्म पुराण -

इस पुराण का प्रारम्भ भगवान् कूर्म की प्रशंसा से होता है। प्राचीन काल में जब देवता और दानवों ने मिलकर समुद्र का मथंन किया तो भगवान् विष्णु ने कूर्म का रूप ग्रहण कर मंदराचल को अपने पृष्ठ पर धारण किया। इस पुराण में चार संहितायें रही होंगी-ब्राह्मी संहिता, भागवती संहिता, गौरी संहिता एवं वैष्णवी संहिता-पर सम्प्रति एक भाग ब्राह्मी संहिता ही प्राप्त होती है और उपलब्ध प्रति में केवल छह हजार श्लोक हैं। भावगत एवं मत्स्य पुराण के अनुसार इमें अट्ठारह हजार श्लोक थे, पर अधुना वे अनुपलब्ध हैं। इसमें शिव और विष्णु के अतिरिक्त शक्ति-पूजा की महत्ता पर भी बल दिया गया है ओर शक्तिसहòनाम भी दिया गया है। इसके दो विभाग हैं-पूर्व और उत्तर। पूर्वभाग में 53 एवं उत्तर भाग में 46 अध्याय हैं। 

इस पुराण में ‘पुराण×चलक्षणम्’ का पूर्णत: समावेश है तथा सृष्टि, वंशानुक्रम एवं विष्णु के कई अवतारों का आख्यान दिया गया है। इसमें काशी और प्रयाग के माहात्म्य का भी वर्णन है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश में एकत्व-स्थापना के कारण इस पुराण में साम्प्रदायिक संकीर्णता की गंध नहीं आती। इसमें भगवान् विष्णु शिव के रूप में और लक्ष्मी गौरी की प्रतिकृति के रूप में वर्णित हैं और शिव को देवाधिदेव के रूप में प्रस्तुत कर उन्हीं की कृपा से श्रीकृष्ण को जाम्बवती की प्राप्ति का उल्लेख है। इसमें गीता के आधार पर ‘व्यासगीता’ का समावेश किया गया है, जिसमें पवित्रा कर्मों एवं अनुष्ठानों के कारण भागवत् साक्षात्कार की बात कही गयी है। 

‘व्यास-गीता’ के एकादश अध्याय में पाशुपत योग का विस्तृत वर्णन है तथा उसमें वर्णाश्रमधर्म एवं सदाचार का भी कथन किया गया है। इसके पूर्वभाग में बारहवें अध्याय में महेश्वर की शक्ति के चार विभाग-शान्ति, विद्या, प्रतिष्ठा तथा निवृत्ति-प्रकार मानकर उसका वैशिष्ट्य प्रदर्शित किया गया है। पशुपत मत की प्रधानता के कारण विद्वानों ने इसे सप्तम शती की रचना माना है। कूर्मपुराण की सूची इस प्रकार है-पुराण का उपक्रम, लक्ष्मी-इंद्रद्युम्न-संवाद, कूर्म तथा महर्षियों की वार्त्ता, वर्णाश्रम-सम्बन्धी आचार का विवरण, जगत् की उत्पत्ति का कथन, कालसंख्या-निरुपण, प्रलय के अन्त में भगवान् की वंदना, सृष्टि का संक्षिप्त वर्णन, शंकर-चरित्र, पार्वती सहनाम, योगनिरूपण, भृगुवंश वर्णन, स्वायम्भुवमनु एवं देवताओं की उत्पत्ति, दक्ष-यज्ञ-विध्वंस, दक्ष-सृष्टि-कथन, कश्यप-वंशवर्णन, श्रीकृष्णचरित, मार्कण्डेय-कृष्ण-संवाद, व्यास-पाण्डव-संवाद, युगधर्म-वर्णन, व्यास-जैमिनि-कथा, काशी एवं प्रयाग का माहात्म्य, तीनों लोकों का वर्णन और वैदिक शाखा का निरूपण। उत्तरभाबग ईश्वरीय एवं व्यासगीता का वर्णन, नाना प्रकार के तीर्थों का वर्णन एवं उनके माहात्म्य का कथन, प्रतिसर्ग या प्रलय का वर्णन। उपर्युक्त सभी विषय ब्राह्मी संहिता में वर्णित हैं। इसके कई अध्यायों में अनेक प्रकार के पापों के प्रायश्चित्त का भी विधान है ओर उनसे शुद्धि की चर्चा की गयी है। इसके उत्तरार्द्ध में सांख्ययोग का वर्णन कर मनुष्यों के आचार-शास्त्रा का प्रतिपादन किया गया है।

15. मत्स्य पुराण -

इस पुराण का प्रारम्भ मनु तथा विष्णु के संवाद से होता है। ‘श्रीमद्भागवत’ ‘ब्रह्मवैवर्त्तपुराण’ तथा ‘रेवामाहात्म्य’ में इसकी श्लोक संख्या 15,000 दी गयी है। इसमें 291 अध्याय हैं। आनन्दाश्रम पूना से प्रकाशित इस पुराण के संस्करण में कुल 14,000 हजार श्लोक प्राप्त होते हैं। इस पुराण का आरम्भ प्रलयकाल की, उस घटना के साथ होता है, जब विष्णु ने एक मत्स्य का रूप धारण कर मनु की रक्षा की थी तथा नौकारूढ़ मनु को बचा कर उनके साथ संवाद किया था। इस पुराण के प्रारम्भ में आदि सृष्टि, देवसृष्टि, सूर्यवंश, पितृवंश का वर्णन है और श्राद्ध-विषयक सपिण्डीकरण की विधियां बतलायी गई हैं। इसके तेरहवें अध्याय में वैराज पितृवंश का सविस्तार वर्णन है तथा तेरहवें एवं चौदहवें अध्यायों में अग्निष्वात और बहिर्पत् पितरों का वर्णन है। 

ययांति का उपाख्यान तथा शर्मिष्ठा और देवयानी के प्रसंगों का भी इसमें समावेश है। आगे के अध्यायों में यदुवंशके वर्णनक्रम में भगवान् श्रीकृष्ण की कथा आयी है। तत्पश्चात् अनेक व्रतों का विवरण दिया गया है। हिमालय तथा उसके पाश्र्ववत्त्र्ाी विविध आश्रमों का वर्णन करने के पश्चात् इसमें ित्रापुरासुर, ित्रापुरनिर्माण एवं ित्रापुरदाह का विवरण प्रस्तुत किया गया है। इसमें तारकासुर प्रभृति अनेकानेक राक्षसों के वध का वर्णन है तथा देवासुरसंग्राम का भी प्रसंग आया है। अविमुक्त वाराणसी क्षेत्रा का वर्णन करने के पश्चात् इसमें भृगु, अंगिरा, अित्रा, विश्वामित्रा, कश्यप, वसिष्ठ, पराशर, अगत्स्य आदि के वंशों के विवरण प्राप्त होते हैं। सावित्री सत्यवान की प्रसिद्ध कथा का भी इसमें उल्लेख प्राप्त होता है। इसके अन्य अध्यायों में तीर्थयात्रा, पृथुचरित, भुवनकोश, दानमहिमा, स्कन्दचरित, तीर्थमाहात्म्य, राजधर्म श्राद्ध तथा गोत्रों का वर्णन है और शिवजी के मुख से काशी की महिमा का कथन कर विभिन्न देवताओं की प्रतिमा के निर्माण की विधि बतलायी गयी है। 

नर्मदा नदी का विस्तृत वर्णन 184 से 194 अध्यायों में किया गया है तथा 53 वें अध्याय में सभी पुराणों के वण्र्य-विषय का विस्तृत विवेचन है। प्रतिमाशास्त्रा का इस पुराण में वैज्ञानिक विवेचन प्राप्त होता है और प्रतिमापीठ की स्थापना होती है। इस विषय का वर्णन 257 अध्याय से 270 वें अध्याय तक है। राजधर्म का वर्णन इसकी अपनी निधि है, जिसमें देव, पुरुषकार, साम, दाम, दण्ड, भेद, दुर्ग, यात्रा, सहाय-सम्पत्ति एवं तुलादान आदि विषय वर्णित हैं। श्री हाजरा के अनुसार इस पुराण का समय तृतीय शती का अंतिम चरण एवं चतुर्थशती का प्रारम्भिक काल है। पार्जिटर ने इसका समय द्वितीय शताब्दी का अन्तिम भाग स्वीकार किया है। डॉ0 पी0 वी0 काणे के मत से मत्स्यपुराण का समय छठी शताब्दी के बाद का नहीं हो सकता।

16. गरुड पुराण -

विष्णु के वाहन गरुड के नाम पर इस पुराण का नामकरण हुआ है। इसमें विष्णु द्वारा गरुड को विश्व की सृष्टि का कथन किया गया है। यह वैष्णव पुराण है। यह पुराण पूर्व एवं उत्तर दो खण्डों में विभक्त है और उत्तर खण्ड का नाम प्रेतखण्ड भी है। इस खण्ड में मृत्यु के अनन्तर प्राणी की गति का वर्णन होने के कारण हिन्दू लोग श्राद्ध के समय इसका श्रवण करते हैं। सभी आवश्यक विषयों का समावेश होने के कारण इसे भी अग्निपुराण की भाँति पौराणिक विश्वकोश कहा जाता है। इसके पूर्व खण्ड में 229 एवं उत्तर खण्ड में 35 अध्याय हैं और श्लोकों की संख्या 18 हजार है। ‘श्रीमद्भागवत्’ तथा ‘रेवा माहात्म्य; के अनुसार यह संख्या 19 हजार है। 

वैष्णव पुराण होने के कारण इसका मुख्यध्यान विष्णु पूजा, वैष्णवव्रत, प्रायश्चित तथा तीर्थों के माहात्म्य-वर्णन पर केन्द्रित रहा है। इसमं पुराण-विषयक सभी तथ्यों का समावेश है और शक्ति-पूजा के अतिरिक्त पंचदेवोपासना (विष्णु, दुर्गा, शिव, सूर्य तथा गणेश) की विधि का उल्लेख है। इसमें ‘रामायण’, ‘महाभारत’ तथा ‘हरिवंश’ की विषय-सूची प्रस्तुत की गई है और सृष्टि-क्रम, ज्योतिष, शकुन-विचार, सामुद्रिकशास्त्रा, आयुर्वेद, छन्द, व्याकरण, रत्नपरीक्षा एवं नीति के सम्बन्ध में विचार किया गया है। इसमें याज्ञवल्क्य धर्मशास्त्रा के एक बड़े खण्ड का समावेश है और पशु-चिकित्सा की विधि तथा नाना प्रकार के रोगों को दूर करने का उपाय बतलाया गया है और तत्सम्बन्धी औषधियां भी दी गई हैं। इसमें 6 अध्यायों में छन्दशास्त्रा का विवेचन है और सम्पूर्ण गीता का सारांश एक अध्याय में प्रस्तुत किया गया है। इसके 108 से 115 अध्याय तक राजनीति का वर्णन है और एक अध्याय में सांख्ययोग का विवेचन है। इसके 144वें अध्याय में कृष्णलीला का वर्णन है और आचारखण्ड के अन्तर्गत राधा के अतिरिक्त कृष्ण की आठ पत्नियों का विवरण दिया गया है। इसके 107वें अध्याय में 381 श्लोकों में पराशर-स्मृति का सारांश दिया गया है और याज्ञवल्क्य स्मृति में अनेक वचन कतिपय पाठान्तर के साथ प्रस्तुत हुए हैं। 

इसमें यह भी दिया गया है कि पक्षिराज गरुड का जन्म कैसे हुआ। सूर्य आदि अनेक ग्रहों का वर्णन है तथा अष्टांग योग का वर्णन भी इसी खण्ड में आता है। उत्तरखण्ड या प्रेतकल्प में गरुड तथा विष्णु के संवाद के माध्यम से जीव के गर्भावस्था में आने से लेकर मृत्यु के पश्चात् होने वाले श्राद्ध एवं दान की विधियों विषयों का वर्णन है। इनके अतिरिक्त अनेक प्रकार की मृत्यु तथा आयु एवं मृत्यु के उपरांत होने वाली प्राणी की विविध गतियों का निरूपण है। इस खण्ड के अन्त में मुक्ति के साधन तथा गरुड पुराण के श्रवण का फल कथित है। इसमें गया का माहात्म्य-वर्णन कर इसके श्राद्ध का विशेष महत्त्व प्रदर्शित किया गया है। इस पुराण का समय नवमशती के लगभग माना गया है। डॉ0 हाजरा इसका उद्भव स्थान मिथिला मानते हैं।

इस पुराण में वाग्भट-रचित ‘अष्टांगहृदसंहिता’ की सामग्री संकलित की गयी है और आयुर्वेद विषयक तथ्यों का संकलन उसी के आधार पर किया गया है। वाग्भट का समय अष्टम या नवमशती है, अत: गरुडपुराण का लेखनकाल भी यही है। अल्बेरुनी ने इस पुराण का उल्लेख किया है तथा इसका उल्लेख वल्लालसेनकृत ‘दानसागर’ में हुआ है, जहाँ इसे ‘ताक्ष्र्यपुराण’ कहा गया है। ‘युक्तिकल्पतरु’ में इस पुराण के उद्धरण प्राप्त होते हैं अत: यह एक हजार ईस्वी की परवती रचना नहीं है।

17. ब्रह्माण्ड पुराण -

‘नारदपुराण’ तथा ‘मत्स्य पुराण’ के अनुसार इसमें 108 अध्याय एवं बारह हजार श्लोक हैं। यह पुराण चार पादों में विभक्त- प्रक्रियापाद, अनुषंगपाद, उपोद्घातपाद तथा उपसंहारपाद। सृष्टि के विवरण से ही इस पुराण का प्रारम्भ होता है, तदनन्तर योग का वर्णन है। ‘मत्स्य पुराण’ के अनुसार ब्रह्माण्ड के महत्त्व को प्रदर्शित करने के लिए ब्रह्माा ने जिस पुराण का उपदेश दिया था, उसमें भविष्य एवं कल्पों का वृत्तान्त विस्तारपूर्वक वर्णित है और उसे ‘ब्रह्माण्ड पुराण’ के नाम से अभिहित किया जाता है। समस्त ब्रह्माण्ड का वर्णन होने के कारण इसे ब्रह्माण्ड पुराण की संज्ञा प्राप्त है। समस्त विश्व का सांगोपांग वर्णन ही इस पुराण का प्रतिपाद्य है। इसमें अरिष्ट-लक्षण, ब्रह्मा का उद्भव, कुमार का जन्म, पर्वत तथा सरिताओं का विवरण, नवद्वीपों का वर्णन ऋषियों का वंश-वर्णन तथा मन्वन्तर एवं स्वायम्भवसर्ग का वर्णन इसके प्रमुख विषयों में से है। परशुराम और सहòार्जुन की कथा, समर-चरित्रा तथा विविध राजवंशों की गाथा का इसमें वर्णन है और अन्त में प्रलय और सृष्टि का विवरण प्रस्तुत कर पुराण की समाप्ति हुई हैं

इस समय बम्बई वेंकटेश्वर प्रैस के प्रकाशित ब्रह्माण्ड पुराण के संस्करण में दो ही पाद हैं-प्रक्रियापाद तथा उपसंहारपाद। पार्जिटर एवं विण्टरनित्स दोनों ही इसे वायु पुराण का प्राचीन रूप स्वीकार करते हैं। नारद पुराण में कहा गया है कि इस पुराण का उपदेश वायु ने व्यास जी को दिया था। इसके 33 से लेकर 58 अध्याय तक ब्रह्माण्ड का विस्तृत भौगोलिक विवरण प्राप्त होता है और प्रथम खण्ड में विश्व का विस्तृत भूगोल वर्णित है। 66 से 72वें अध्याय में जम्बू द्वीप तथा उसके पर्वत एवं नदियों का विवरण है तत्पश्चात् भद्राश्व, केतुमाल, चन्द्रद्वीप, किंपुरुष वर्ष, कैलाश, शाल्मली द्वीप, कुशद्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप तथा पुष्कर द्वीप का सविस्तार वर्णन है। इनके अतिरिक्त ग्रहों, नक्षत्रामण्डल एवं युगों का वर्णन है तथा तृतीय पाद में क्षित्रावंश-वर्णन प्राप्त होता है।

नारद पुराण के अनुसार ज्ञात होता है कि अध्यात्मरामायण में राम-कथा का नवीन ढंग से आध्यात्मिक विवरण प्राप्त होता है। ब्रह्माण्ड पुराण में कृष्ण चरित एवं कृष्ण ललित लीला का भी गान मिलता है। इसमें राजा सगर एवं भगीरथ की कथा अत्यन्त विस्तार से 21 से 27 अध्यायों मे दी गई है तथा गंगावतरण का भी उपाख्यान आया है। इसके समय के सम्बन्ध में विद्वानों का कथन है कि इसका वर्तमान रूप चार सौ ईस्वी के आसपास निर्धारित हुआ होगा। इमें ‘राजधिराज’ नामक राजनीतिशास्त्रा-विषयक शब्द को देख कर पण्डितों ने इसका समय मौखरी राजाओं का काल या गुप्तकाल के बाद माना है। इसकी लेखन-शैली पर महाकवि कालिदास की वैदभ्र्ाी शैली का प्रभाव विद्यमान है।

18. शिवपुराण -

शिवपुराण तथा वायुपुराण के सम्बन्ध में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। कुछ विद्वानों के अनुसार दोनों ही पुराण अभिé हैं और कतिपय विद्वान् इन्हें स्वतन्त्रा पुराण के रूप में मान्यता प्रदान करते हैं। कुछ विद्वान् विभिé पुराणों में निर्दिष्ट सूची के अनुसार शिवपुराण को चतुर्थ स्थान प्रदान करते है। पुराणों में भी इस विषय में मतैक्य नहीं है। बहुसंख्यक पुराण शिवपुराण का अस्तित्व स्वीकार कर इसे पौराणिक क्रम से चतुर्थ स्थान का अधिकारी मानते हैं जैसे ‘कूर्म’, ‘पद्म’, ’ब्रह्मवैवर्त’, ‘शिव’, ‘भागवत’, ‘मार्कण्डेय’, ‘लिंग’, ‘वाराह’ तथा ‘विष्णुपुराण’। पर, ‘देवी भागवत’, ‘नारद’ तथा ‘मत्स्य’ वायुपुराण को यह महत्त्व प्रदान करते हैं। 

श्रीमद्भाागवत के बारहवें स्कन्ध के सातवेंं अध्याय में जो सूची प्रस्तुत की गयी है, उसमें वायुपुराण का नामोल्लेख नहीं है। नारदीयपुराण की सूची में वायुपुराण का नाम है। सम्प्रति शिव एवं वायुपुराण संज्ञक दो पुराण प्रचलित हैं, जो वण्र्यविषय तथा आकार-प्रकार में परस्पर भिन्न हैं। शिवपुराण का प्रकाशन वेंकटेश्वर प्रेस बम्बई से सं0 1982 में हुआ था तथा हिन्दी अनुवाद सहित इसका प्रकाशन पंडित पुस्तकालय, वाराणसी से हुआ है। वायुपुराण के भी तीन संस्करण हुए हैं-बिबिब्लओथेका इण्डिका कलक़त्ता, आनन्द संस्कृतग्रन्थावली पूना तथा गुरुमण्डल, ग्रन्थमाला कलकत्ता से।

वेंकटेश्वर प्रेस से मुद्रित शिवपुराण में सात संहितायें हैं-विद्येश्वरसंहिता, रुद्रसंहिता, शतरुद्रसंहिता, कौटिरुद्रसंहितां, उमासंहिता, कैलाससंहिता तथा वायवीय संहिता। इसकी विश्वेर संहिता में 25 अध्याय हैं तथा रुद्रसंहिता में 187 अध्याय। इस संहिता के पांच खण्ड हैं-सृष्टिखण्ड, सतीखण्ड, पार्वतीखण्ड, कुमारखण्ड, युद्धखण्ड। शतरुद्रसंहिता में 42, कौटिरुद्र में 43, उमासंहिता में 51, कैलासंहिता में 23 तथा वायवीसंहिता में 76 अध्याय हैं। शिवपुराण के श्लोकोंं की संख्या 24 हजार है। इसके उत्तरखण्ड में इस प्रकार का कथन है कि जिसके पूर्व एवं उत्तर खण्ड में शिव का चरित विस्तार के साथ वर्णित है, उसे शिवपुराण कहते हैं। शिवपुराण का एक लक्षश्लोकात्मक रूप भी है, जिसमें बारह संहिताएं हैं, पर सम्प्रति यह ग्रन्थ अनुपलब्ध है।

Bandey

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