भारत के खनिज संसाधन

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हमारे देश में 100 से अधिक खनिजों के प्रकार
मिलते हैं। इनमें से 30 खनिज पदार्थ ऐसे हैं जिनका आर्थिक महत्व बहुत अधिक है।
उदाहरणस्वरूप कोयला, लोहा, मेंगनीज़, बाक्साइट, अभ्रक इत्यादि। दूसरे खनिज जैसे
फेल्सपार, क्लोराइड, चूनापत्थर, डोलोमाइट, जिप्सम इत्यादि के मामले में भारत में इनकी
स्थिति संतोषप्रद है। परन्तु पेट्रोलियम तथा अन्य अलौह धातु के अयस्क जैसे ताँबा, जस्ता,
टिन, ग्रेफाइट इत्यादि में भारत में इनकी स्थिति संतोषप्रद नहीं है। अलौह खनिज वे
हैं जिनमें लौह तत्व नहीं होता है। हमारे देश में इन खनिजों की आन्तरिक माँगों की
आपूर्ति बाहर के देशों से आयात करके की जाती है।

जैसा कि आपने इतिहास में पढ़ा होगा कि अंग्रेजों की हुकूमत के दौरान भारत के
अधिकांश खनिज निर्यात कर दिये जाते थे। किन्तु स्वतंत्राता के बाद भी भारत से खनिज
पदार्थों का निर्यात हो रहा है, परन्तु खनिजों का दोहन देश की औद्योगिक इकाइयों द्वारा
खपत की माँग के अनुरूप भी बढ़ा है। परिणामस्वरूप भारत में खनिजों के कुल दोहन
का मूल्य 2004-2005 में लगभग 744 अरब रुपयों तक पहुँच गया जो वर्ष 1950-51 में
मात्रा 89.20 करोड़ रुपये ही था। इसका अर्थ यह हुआ कि पिछले 50 वर्षों में 834 गुना
वृद्धि हुई। खनिज पदार्थों को अलग-अलग करके देखें कि उपरोक्त मूल्यों में किसका
कितना योगदान है तो स्पष्ट हो जाता है कि र्इंधन के रूप में प्रयुक्त खनिज (जैसे कोयला,
पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और लिग्नाइट) का योगदान 77% था, धात्विक खनिजों का
10% तथा अधात्विक खनिजों का योगदान 8% था। धात्विक खनिज के अयस्क लौह
अयस्क, क्रोमाइट, मेग्नीज, जिंक, बाक्साइट, ताम्र-अयस्क, स्वर्ण अयस्क हैं जबकि
अधात्विक अयस्कों में चूनापत्थर, फास्फोराइट, डोलोमाइट, केवोलीन मिट्टी, मेग्नेसाइट,
बेराइट और जिप्सम इत्यादि हैं।

यदि खनिजों के सकल मूल्य में इनका अलग-अलग योगदान देखें तो कोयला (36.65%),
पेट्रोलियम (25.48%), प्राकृतिक गैस (12.02%), लौह अयस्क (7.2%), लिग्नाइट
(2.15%), चूनापत्थर (2.15%) तथा क्रोमाइट (1.1%) आदि कुछ ऐसे खनिज हैं, जिनका
अंश 1 प्रतिशत से अधिक है।

कोयला

भारत में कोयला वाणिज्यिक ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। देश के सभी कारखानों में
र्इंधन के रूप में तथा सभी ताप-विद्युत गृहों में एवं देश के कुछ भागों में आज भी कोयला,
घरेलू-र्इंधन के रूप में प्रयुक्त हो रहा है। इसका प्रयोग कच्चे माल के रूप में रसायन
एवम् उर्वरक कारखानों में तथा दैनिक जीवन में उपयोग की जाने वाली हजारों वस्तुओं
के उत्पादक में होता है।

जनवरी 2005 में किए गए एक आकलन के अनुसार देश में कोयले के कुल भण्डार लगभग
2,47,847 मिलियन टन है। परन्तु खेद इस बात का है कि सकल भण्डार में कम गुणवत्ता
वाले कोयले की मात्रा अधिक है। कोकिंग कोयले की आवश्यकता की आपूर्ति आयात
द्वारा की जाती है। भारत में ऐसे प्रयासों को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है जिसके अन्तर्गत
विद्युत-ताप गृहों की उन्हीं स्थानों पर स्थापना होती है जो या तो कोयला-उत्पादक क्षेत्र
में हों या उसके समीपस्थ स्थान में आते हों। इन ताप गृहों में उत्पादित विद्युत ऊर्जा
को सम्प्रेषण द्वारा दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुँचाया जाता है। कभी कोयले की खपत
का सबसे बड़ा उपभोक्ता भारतीय रेल हुआ करता था, परन्तु डीजल एवं विद्युत के
प्रयोग से भारतीय रेल अब कोयले का सीधा एवं प्रत्यक्ष खपत करने वाला ग्राहक नहीं
रहा।

वितरण- भारत में कोयला दो प्रमुख क्षेत्रों में उपलब्ध है। पहला क्षेत्र-गोन्डवाना कोयला
क्षेत्र कहलाता है तथा दूसरा टरशियरी कोयला क्षेत्र कहलाता है। भारत के कुल कोयला
भण्डार एवं उसके उत्पादनों का 98% गोन्डवाना कोयला क्षेत्रों से प्राप्त होता है तथा
शेष 2: टरशियरी कोयला क्षेत्रों से मिलता है। गोन्डवाना कोयला क्षेत्र गोन्डवाना काल
में बनी परतदार शैल समूहों के अन्तर्गत अवस्थित हैं। इनका भौगोलिक वितरण भी
भू-वैज्ञानिकी कारकों से नियंित्रत है। यह मुख्य रूप से दामोदर (झारखण्ड़-प. बंगाल),
सोन (मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़), महानदी (उड़ीसा), गोदावरी (आंध्र प्रदेश) तथा वर्धा
(महाराष्ट्र) नदी घाटियों में वितरित हैं।
टरशियरी कोयला क्षेत्र भारतीय प्रायद्वीप के उत्तरी बाह्य क्षेत्रों में, जिसके अन्तर्गत असाम,
मेघालय, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर तथा सिक्किम आते हैं, में पाये जाते
हैं। इसके अतिरिक्त भूरा-कोयला (लिग्नाइट) तमिलनाडु के तटवर्ती क्षेत्र, गुजरात एवं
राजस्थान में मिलता है।

झारखण्ड कोयला भण्डार एवं उत्पादन की दृष्टि से पूरे देश में सर्वप्रथम है। कोयला
झारखंड के धनबाद, हजारीबाग एवं पालामऊ जिलों में मिलता है। झरिया एवं चन्द्रपुरा
के महत्वपूर्ण कोयला क्षेत्र धनबाद जिला में आते हैं। सबसे पुराना कोयला क्षेत्र रानीगंज,
पश्चिम बंगाल में है, जो कि भारत का दूसरा सबसे बड़ा कोयला क्षेत्र है। इसका विस्तार
बर्दवान और पुरुलिया जिलों में फैला है। छत्तीसगढ़ में कोयला के निक्षेप बिलासपुर
तथा सरगुजा जिलों में मिलते हैं। मध्य प्रदेश में कोयले के निक्षेप सीधी, शहडोल एवं
छिंदवाड़ा जिलों में मिलते हैं। आंध्रप्रदेश में कोयले के निक्षेप आदिलाबाद, करीमनगर,
वारंगल, खम्मम तथा पश्चिम गोदावरी जिलों में मिलते हैं। उड़ीसा राज्य में तालचेर
कोयला क्षेत्र के अलावा सम्बलपुर और सुन्दरगढ़ जिलों में भी कोयला के निक्षेप प्राप्त
होते हैं। महाराष्ट्र में कोयला निक्षेप चन्द्रपुर, यवतमाल तथा नागपुर जिलों में मिलते
हैं।

भारत के कोयले के भण्डार क्षमता की तुलना में उसके लिग्नाइट (भूरा कोयला) के
भण्डार साधारण है। सबसे अधिक लिग्नाइट के भण्डार नेव्हेली (तमिलनाडु) में मिलते
हैं। इसके अलावा लिग्नाइट के महत्वपूर्ण निक्षेप राजस्थान, पाँडिचेरी, जम्मू-कश्मीर
राज्यों में भी मिलते हैं।

पेट्रोलियम

इसे प्राय: तरल सोना भी कहा जाता है। इसके पीछे पेट्रोलियम की बहुमुखी उपयोगिताएँ
हैं। हमारी कृषि, उद्योग तथा परिवहन तंत्रा कई रूपों में इस पर निर्भर है। कच्चा पेट्रोलियम
दहनशील हाइड्रोकार्बन का सम्मिश्रण है जोकि गैस, तरल या गैसीय रूपों में होता है।
उद्योगों में पेट्रोलियम उत्पादों का कृतिम पदार्थों व आवश्यक रसायनों के निर्माण के लिए
तेल व चिकनाई के युक्त पदार्थों के रूप में उपयोग किया जाता है। पेट्रोलियम के महत्वपूर्ण
उत्पादों में पेट्रोल, मिट्टी का तेल, डीजल हैं। साबुन, कृित्राम रेशा, प्लास्टिक एवं अन्यान्य
प्रसाधन उत्पाद हैं।

वितरण – पेट्रोलियम भं्रशों और अपनतियों में पाया जाता है। भारत में यह अवसादी शैल
संरचना में पाया जाता है। इस प्रकार के अधिकांश क्षेत्र असाम, गुजरात तथा पश्चिमी
तट के अपतटीय क्षेत्रों में पाए गए हैं।
अब तक भारत में पेट्रोलियम का उत्पादन असाम पट्टी, गुजरात-खम्बात की पट्टी तथा
बाम्बे-हाई में हो रहा है। असाम की पट्टी का विस्तार सुदूर उत्तर-पूर्वी छोर पर अवस्थित
देहाँग-बेसिन से लेकर पहाड़ियों के बाहरी छोर के साथ-साथ सूरमा-घाटी की पूर्वी
सीमा तक विस्तृत है। गुजरात-खम्बात पट्टी गुजरात के उत्तर में मेहसाना से लेकर
दक्षिण में रत्नागिरि (महाराष्ट्र) के महाद्वीपीय निमग्न तट तक फैली है। इसी के अन्तर्गत
बाम्बे हाई भी आता है जो भारत का सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पादक क्षेत्र है।

असाम में उत्पादक क्षेत्र लखीमपुर तथा शिवसागर जिलों में स्थित हैं। पेट्रोलियम के उत्पादन
के लिये खननकूप डिग्बोई, नहरकटिया, शिवसागर एवं रुद्र सागर के आसपास स्थित
हैं। इसी प्रकार गुजरात राज्य में तेल उत्पादक स्थान वड़ोदरा, भरोच, खेड़ा, मेहसाना
एवं सूरत जिलों में स्थित हैं। हाल ही में पेट्रोलियम के भण्डार की खोज राजस्थान के
बीकानेर जिलान्तर्गत बहुत बड़े क्षेत्र में तथा बाड़मेर एवं जैसलमेर क्षेत्रों में की गई है।
इसी प्रकार आन्ध्रप्रदेश के पूर्वी तटवर्ती गोदावरी डेल्टा तथा कृष्णा डेल्टा में अन्वेषण के
दौरान प्राकृतिक गैस मिली है।

पेट्रोलियम भण्डार के संभावित क्षेत्र बंगाल की खाड़ी, जिसका विस्तार पश्चिम बंगाल की
तटवर्ती रेखा के साथ-साथ उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु तथा अन्डमान व निकोबार
द्वीप समूह तक फैला है।

  1. पेट्रोलियम अपनतियों और भं्रशों में पाया जाता है। भारत में यह अवसादी
    शैल संरचना में पाया जाता है। ऐसे अधिकांश क्षेत्र असाम, गुजरात
    तथा पश्चिमी तटवर्ती क्षेत्र के सहारे समुद्र के महाद्वीपीय निमग्न तट
    पर मिलते हैं। 
  2. पेट्रोलियम के महत्वपूर्ण उत्पादों में पेट्रोल, डीजल, मिट्टी का तेल, साबुन,
    कृत्रिम रेशे, प्लास्टिक, विविध सौन्दर्य-प्रसाधन वस्तुएँ आदि हैं। 
  3. उद्योगों में पेट्रोलियम उत्पादों का कृित्राम पदार्थों व आवश्यक रसायनों
    के निर्माण के लिए तेल व चिकनाई युक्त पदार्थों के रूप में उपयोग
    किया जाता है।

भारत में तेलशोधक संयंत्र

कच्चा पेट्रोलियम जो जमीन के अन्दर से निकाला जाता है उसे सीधे उपयोग में लाने
के पहले प्राकृतिक अशुद्धियों से परिष्कृत करना पड़ता है। पेट्रोलियम का परिष्करण एक
जटिल रासायनिक अभियांित्राकीय प्रौद्योगिकी है। वर्तमान में लगभग 17 तेल शोधक संयंत्रा
भारत में स्थापित हैं जो सार्वजनिक क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं। केवल एक तेलशोधक संयंत्रा
रिलायंस इन्डस्ट्री द्वारा निजी क्षेत्र में संचालित है। सार्वजनिक क्षेत्र के तेल शोधक संयंत्रा,
डिगबोई, बोंगइगांव तथा नूनमाटी (तीनों संयंत्रा असाम में), मुम्बई में 2 इकाइयाँ (महाराष्ट्र),
विशाखापट्टनम (आंध्रप्रदेश), बरौनी (बिहार), कोयली (गुजरात), मथुरा (उत्तर प्रदेश),
पानीपत (हरियाणा), कोचीन (केरल), मेंगलोर (कर्नाटक) एवं चेन्नई (तमिलनाडु) में हैं।
जामनगर (गुजरात) में रिलायंस इन्डस्ट्रीज द्वारा निजी क्षेत्र में संचालित एकमात्रा
तेलशोधक संयंत्रा हैं।

इन तेल शोधक संयंत्रों को कच्चे तेल की आपूर्ति या तो जहाजों द्वारा अथवा पाइप लाइनों
के द्वारा की जाती है। यद्यपि पेट्रोलियम उत्पादन की वार्षिक दर बढ़ती नजर आती है,
किन्तु भारत को अपनी आवश्यकताओं की आपूर्ति पेट्रोलियम एवं पेट्रोलियम उत्पादों के
बाहर से आयात द्वारा करना पड़ता है।

  1. वर्तमान में भारत में 17 तेलशोधक संयंत्रा सार्वजनिक क्षेत्र के अन्तर्गत
    तथा 1 संयंत्रा निजी क्षेत्र में है।
  2. यद्यपि वार्षिक उत्पादन की गति बढ़ती नजर आ रही है तथापि अपनी
    आन्तरिक आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए भारत को पेट्रोलियम का
    आयात करना पड़ता है।

प्राकृतिक गैस

प्राकृतिक गैस अब वाणिज्यिक ऊर्जा के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में उभर कर आ रहा
है। प्राय: पेट्रोलियम उत्पादन में आनुषंगिक रूप में प्राकृतिक गैस के मिलने की संभावना
बनती ही है। प्रतिलभ्य भण्डार पर प्राकृतिक गैस का भारत में (1 अप्रैल 2001 के आंकलन
पर आधारित) भण्डार लगभग 638 अरब घनमीटर है। आशा की जाती है कि भविष्य में
कृष्णा, गोदावरी तथा महानदी घाटियों के क्षेत्रों में चल रहे अन्वेषणों से प्राकृतिक गैस
के अनेक भण्डारों के मिलने से इसकी मात्रा बढ़ेगी। वर्ष 2003.2004 में प्राकृतिक गैस
का भारत में उत्पादन करीब 31 अरब घनमीटर था। भारत में प्राकृतिक गैस प्राधिकरण
की स्थापना 1984 में की गई थी। इस प्राधिकरण का उद्देश्य प्राकृतिक गैसों का
संसाधन, परिवहन, वितरण एवं उसका सुव्यवस्थित विपणन कराना है। प्राधिकरण के
अधिकार एवं संचालन के अन्तर्गत 5ए340 कि.मी. लम्बी गैस पाइप लाइन देश में फैली
हुई है।

आण्विक खनिज

परमाणु शक्ति का उत्सर्जन इन खनिजों के अन्दर व्याप्त परमाणुओं के विखंडन या
विलयनीकरण से होता है। इन खनिजों के अंतर्गत यूरेनियम, थोरियम एवं रेडियम आते
हैं। भारत में विश्व का सबसे बड़ा भण्डार मोनाजाइट का है, जो थोरियम का स्रोत है।
इसके अलावा यूरेनियम के भण्डार हैं।

यूरेनियम

भारत में यूरेनियम आग्नेय एवं रूपान्तरित शैलों में अन्त:स्थापित होकर पाए जाते हैं।
ऐसे विशिष्ट खनिजयुक्त शैल झारखण्ड, राजस्थान, आन्ध्रप्रदेश तथा हिमालय के कुछ
भागों में पाए जाते हैं। केरल के तटवर्ती क्षेत्रों में काफी बड़ी मात्रा में यूरेनियम,
मोनाजाइट-बालुओं के ढेरों में उपलब्ध हैं।
वर्तमान में यूरेनियम का उत्पादन सिंहभूमि जिले (झारखण्ड) की जादूगुड़ा खदानों से
किया जा रहा है। भारत में यूरेनियम के भण्डार 5,000 से 10,000 मेगावाट बिजली उत्पादन
करने में सक्षम हैं।

थोरियम

थोरियम मुख्य रूप से मोनाजाइट बालू में मिलते हैं। केरल के पालघाट तथा कोल्लम
(क्विलोन) जिलों में पाए जाने बालुओं में विश्व का सर्वाधिक मोनाजाइट खनिज मिलता
है। आन्ध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में भी बालुओं में मोनाजाइट मिलता है।

  1. वर्तमान में यूरेनियम का उत्पादन जादूगुड़ा की खदानों से किया जा रहा है।
  2. थोरियम का प्रमुख स्रोत मोनाजाइट है जिसका भण्डारण विश्व में सबसे
    अधिक भारत देश में ही है।
  3. समुद्र तटीय बालू जिनमें मोनाजाइट मिलता है का केरल के पालघाट तथा
    कोल्लम जिलों में विशाल भण्डार हैं जो पूरे विश्व में सबसे अधिक है। 
  4. भारत में यूरेनियम झारखण्ड, राजस्थान, आन्ध्र प्रदेश व हिमालय के कुछ भागों
    में, आग्नेय व रूपान्तरित शैलों में पाये जाते हैं।

लौह खनिज

लौह खनिज वे कहलाते हैं जिनमें लौह तत्व काफी अधिक मात्रा में रहता है।

धात्विक लौह खनिज

धात्विक खनिजों के सकल उत्पादन मूल्य का तीन चौथाई हिस्सा लौह धातु के खनिजों
का होता है। खनिज र्इंधन के बाद सबसे महत्वपूर्ण खनिज वर्ग की सूची लौह धात्विक
खनिजों द्वारा ही निर्मित होती है। इस सूची में आने वाले धात्विक खनिजों में लोहा, मेंगनीज,
क्रोमाइट, पाइराइट इत्यादि हैं। ये धात्विक खनिज भारत में धातुकर्मीय उद्योगों के लिए
सृदृढ़ आधार प्रदान करते हैं-खासकर लौह, इस्पात एवं मिश्रधातु।

लौह अयस्क

भारत पूरे विश्व के गिने-चुने ऐसे देशों में से एक है जहाँ उत्तम कोटि के लौह-अयस्क
के विशाल भण्डार हैं। विश्व के सकल लौह अयस्क भण्डार का 20 प्रतिशत से
अधिक भण्डार भारत में है। भारत में मिलने वाले लौह अयस्कों में लौह धातु के अंश
60 प्रतिशत से कुछ ज्यादा है। इसलिए भारत के लौह अयस्क उच्च कोटि के माने जाते
हैं।

भारत में पाए जाने वाले लौह अयस्क तीन प्रकार के हैं- (i) हेमेटाइट, (ii) मेग्नेटाइट,
(iii) लिमोनाइट। हेमेटाइट नामक अयस्क में लोहे का अंश 68% तक होता है। इस अयस्क
का रंग लाल होता है। इसलिए प्राय: इसे ‘‘लाल अयस्क’’ के नाम से भी जाना जाता
है। इसके बाद दूसरे स्थान पर मेग्नेटाइट नामक लौह अयस्क आता है जिसका रंग काला
होता है, इसलिए इसे ‘‘काला अयस्क’’ भी कहते हैं। मेग्नेटाइट अयस्क की भण्डार
मात्रा तथा लौह धातु के प्रतिशत की दृष्टि से स्थान हेमेटाइट के बाद दूसरा है। इसमें
लौह धातु का भाग 60 प्रतिशत तक होता है। तीसरा लौह अयस्क ‘‘लिमोनाइट’’ कहलाता
है। जिसमें लौह धातु 35-40 प्रतिशत तक होता है। इसका रंग पीला होता है। चूँकि
हेमेटाइट तथा मेग्नेटाइट अयस्क के इतने विशाल भण्डार हैं अत: लिमोनाइट अयस्क
का दोहन भारत में फिलहाल नहीं हो रहा है।

लौह अयस्क का भारत में आकलित भण्डार करीब 12ए317 मिलियन टन हेमेटाइट का
है तथा शेष 540 मिलियन टन मेग्नेटाइट है। भण्डार की यह राशि पूरे विश्व में लौह
अयस्क के भण्डार की 1ध्4 आंकलित की गई है।

वितरण – वैसे तो भारत में लौह अयस्क प्राय: सभी राज्यों में पाए जाते हैं। परन्तु भारत के कुल
भण्डार का 96 प्रतिशत उड़ीसा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक एवं गोवा राज्यों में सीमित
हैं। इतना ही नहीं लौह अयस्क का 95% उत्पादन भी इन्हीं राज्यों से होता है। शेष 3%
लौह अयस्क का उत्पादन तमिलनाडु, महाराष्ट्र एवं आन्ध्र प्रदेश से होता है।
उड़ीसा एवं झारखण्ड में भारत के उच्च श्रेणी के कुल लौह अयस्क का 50% भाग विद्यमान
है। उड़ीसा में लौह अयस्क सुन्दरगढ़, मयूरभंज एवं क्योंझर जिलों में तथा झारखण्ड
में सिंहभूम जिले मिलता है।
छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश में देश के कुल लौह अयस्क भण्डार का 25% विद्यमान है। इसी
प्रकार देश के कुल लौह अयस्क उत्पादन का 20.25% भी छत्तीसगढ़ एवं
मध्य प्रदेश राज्यों से होता है। इन अयस्क के भण्डार बैलाडिला की पहाड़ियों में स्थित
है। इसी प्रकार से अरिडोंगरी (बस्तर जिला) तथा दल्ली-राजहरा के पहाड़ी क्षेत्रों (दुर्ग
जिला) में पाए जाते हैं।

गोवा में लौह अयस्क यद्यपि अच्छे दर्जे का नहीं है फिर भी देश के कुल उत्पादन में
गोवा में मिलने वाले लौह अयस्कों का योगदान महत्वपूर्ण है। गोवा में लौह अयस्क की
खदान सीढ़ीदार, खुले व सुव्यवस्थित होते हैं तथा उत्खनन एवं उत्खनित अयस्कों को
बाहर जमीन सतह पर फेंकने की प्रणाली पूरी तरह यांित्राकीय इंजीनियरिंग द्वारा संचालित
होती हैं। लगभग पूरा लौह अयस्क गोवा के मरमगाओ बन्दरगाह से जापान को निर्यात
कर दिये जाता है। कर्नाटक में सबसे मशहूर लौह अयस्क के निक्षेप साँडूर-होसपेट क्षेत्र
(बेल्लारी जिले), चिकमंगलूर जिले के बाबाबूदन के पहाड़ी क्षेत्र तथा शिमोगा एवं चित्रादुर्ग
जिलों में पाए जाते हैं।

आन्ध्रप्रदेश में लौह अयस्क के निक्षेप अनन्तपुर, खम्मम, कृष्णा, करनूल, कुडप्पा तथा नेल्लूर
जिलों में बिखरे एवं छिटपुट रूप में पाए जाते हैं। कुछ निक्षेप इसी रूप में तमिलनाडु,
महाराष्ट्र एवं राजस्थान में भी मिलते हैं।

सकल विश्व व्यापार में भारत का योगदान में 7 से 8 प्रतिशत है। अब लौह अयस्कों के
निक्षेपों का विकास निर्यात को विशेष ध्यान में रखकर किया जाता है। जैसे बैलाडिला
एवं राजहरा (छत्तीसगढ़) के लौह अयस्कों के निक्षेपों तथा उड़ीसा के किरुबुरू खदानों
से लौह अयस्कों का उत्पादन सीधे निर्यात के लिए किया जाता है। जापान, रोमानिया
एवं चेकोस्लावाकिया एवं पोलेण्ड देश भारत के लौह अयस्कों का आयात करते हैं। भारत
से इन अयस्कों का निर्यात हल्दिया, पारादीप, मरमगाओ, मंगलोर एवं विशाखापट्टनम
बन्दरगाहों से होता हैं।

  1. भारत में विश्व के सकल भण्डार का 20 प्रतिशत लौह अयस्क विद्यमान है।
    लौह अयस्क के निक्षेप प्राय: सभी राज्यों में मिलते हैं। भारत के कुल भण्डार
    का 36 प्रतिशत लौह अयस्क उड़ीसा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक एवं गोवा
    राज्यों में है। 
  2. छत्तीसगढ़ में बैलाडिला एवं राजहरा की खदानें तथा उड़ीसा की किरूबुरू
    खदान में उत्खनन का कार्य निर्यात को लक्ष्य बनाकर किया जा रहा है।

मेंगनीज अयस्क

मेंगनीज अयस्क के उत्पादन में भारत का स्थान विश्वस्तर पर रूस एवं दक्षिण अफ्रीका
के बाद तीसरा है। भारत के सकल मेंगनीज अयस्क उत्पादन का लगभग एक चौथाई
भाग निर्यात किया जाता है।

लौह एवं इस्पात के निर्माण में मेंगनीज अयस्क एक महत्वपूर्ण अवयव है। मेंगनीज की
उपयोगिता शुष्क बैटरियों के निर्माण में, फोटोग्राफी में, चमड़ा और माचिस उद्योगों में
महत्वपूर्ण होती है। भारत में सकल मेंगनीज अयस्क के लगभग 85 प्रतिशत भाग की खपत
धातुकर्मीय उद्योगों में हो जाती है।

वितरण – मेंगनीज उत्पादन के प्रमुख खेत्रा उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश
के अन्तर्गत आते हैं। भारत के 78 प्रतिशत से ज्यादा मेंगनीज अयस्क के भण्डार महाराष्ट्र
के नागपुर तथा भण्डारा जिलों से लेकर मध्य प्रदेश के बालाघाट एवं छिन्दवाड़ा जिलों
तक फैली पट्टी में मिलते हैं। परन्तु ये दोनों राज्य सकल उत्पादन में क्रमश: 12 एवं
14 प्रतिशत का ही योगदान देते हैं। शेष 22 प्रतिशत मेंगनीज भण्डार का वितरण उड़ीसा,
कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, गोवा एवं आन्ध्र प्रदेश के अन्तर्गत अवस्थित निक्षेपों में है।
उड़ीसा भारत में मेंगनीज अयस्क के उत्पादन में शीर्ष पर है जहाँ भारत के कुल उत्पादन
का 37 प्रतिशत उत्पादन होता है। इस राज्य में उपलब्ध मेंगनीज अयस्क के निक्षेप भारत
के कुल भण्डार का 12 प्रतिशत है। मेंगनीज की प्रमुख खदानें सुन्दरगढ़, रायगढ़, बोलांगीर,
क्योंझर, जाजपुर एवं मयूरभंज जिलों में है।
कर्नाटक में मेंगनीज अयस्क के निक्षेप शिमोगा, चित्रादुर्ग, तुमकूर तथा बेल्लारी जिलों में
हैं। छुटपुट निक्षेप बीजापुर, चिकमंगलूर एवं धारवाड़ जिलों में पाए गए हैं। यद्यपि कर्नाटक
में मेंगनीज अयस्क के भण्डार काफी कम हैं (भारत के कुल भण्डार का 6 प्रतिशत) फिर
भी अयस्क का उत्पादन कर्नाटक में भारत के मेंगनीज उत्पादन का 26 प्रतिशत होता
है।

आन्ध्र प्रदेश में मेंगनीज का उत्पादन भारत के कुल उत्पादन का 8 प्रतिशत होता है जो
काफी अच्छा है। यद्यपि यहाँ मेंगनीज अयस्क के निक्षेप काफी कम है। गोवा, झारखण्ड
एवं गुजरात में भी मेंगनीज अयस्क के निक्षेप पाए जाते हैं।

  1. विश्व में मेंगनीज अयस्क के उत्पादन करने वाले देशों में भारत का
    स्थान तीसरा है। 
  2. मेंगनीज उत्पादन का 85 प्रतिशत उपयोग देश के अन्दर स्थापित
    धातुकर्मीय उद्योगों में हो जाता है। 
  3. उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं
    आन्ध्र प्रदेश में हैं।

धात्विक अलौह खनिज

अलौह खनिज वे होते हैं जिनमें लोहा का अंश नहीं होता। इनके अन्तर्गत धात्विक खनिजों
में शामिल हैं-सोना, चाँदी, ताम्बा, टिन, सीसा, जस्ता इत्यादि। ये सभी धात्विक खनिज
काफी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनसे उपलब्ध धातु दैनिक जीवन में बहुत काम में आती
है। वैसे भारत इन खनिजों की उपलब्धि एवं भण्डार के मामले में काफी कमजोर तथा
अभावग्रस्त है।

बॉक्साइट

यह एक अलौह खनिज निक्षेप है जिससे अल्यूमिनियम नामक धातु निकाली जाती है।
भारत में बॉक्साइट खनिज के इतने निक्षेपों के भण्डार हैं कि भारत अल्यूमिनियम के
मामले में आत्म निर्भर रह सकता है। अल्यूमिनियम धातु, जो बॉक्साट खनिज से निकाला
जाता है, का बहुमुखी उपयोग वायुयान निर्माण, विद्युत उपकरणों के निर्माण, बिजली
के घरेलू उपयोगी सामान बनाने में, घरेलू साज-सज्जा के सामान के निर्माण में होता
है। बाक्साइट का उपयोग सफेद सीमेन्ट के निर्माण में तथा कुछ रासायनिक वस्तुएं
बनाने में भी होता है। भारत में सभी प्रकार के बाक्साइट का अनुमानित भण्डार 3037
मिलियन टन है।

वितरण – बॉक्साइट के निक्षेपों का वितरण देश के अनेक क्षेत्रों में है। परन्तु विपुल राशि में इसके
भण्डार महाराष्ट्र, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा
एवं उत्तर प्रदेश में अवस्थित हैं।
झारखण्ड में भारत के सकल बॉक्साइट भण्डार का 13 प्रतिशत भाग तथा उत्पादन में
देश के कुल उत्पादन का 37 प्रतिशत भाग मिलता है। बॉक्साइट के महत्वपूर्ण निक्षेप
इस राज्य के पालामू, राँची एवं लोहरदरगा जिलों में अवस्थित हैं।
गुजरात में बॉक्साइट अयस्क के निक्षेपों की भण्डारण राशि देश के कुल भण्डार के 12
प्रतिशत भाग के बराबर तथा इतनी ही प्रतिशत की भागीदारी उत्पादन के मामले में है।
बॉक्साइट के निक्षेप इस राज्य के भावनगर, जूनागढ़ तथा अमरेली जिलों में अवस्थित
हैं।

मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ को मिलाकर देखा जाए तो देश के कुल बॉक्साइट भण्डार
के 22 प्रतिशत भाग तथा उत्पादन में देश के कुल उत्पादन का 25 प्रतिशत भाग इन
दोनों राज्यों के निक्षेपों से प्राप्त होते हैं। इन राज्यों में बॉक्साइट के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं-
अमरकंटक पठार में सरगुजा, रायगढ़ एवं बिलासपुर जिले; मैकल पर्वत श्रृंखला के अन्तर्गत
बिलासपुर, दुर्ग, (दोनों छत्तीसगढ़) एवं मण्डला, शहडोल व बालाघाट जिले (मध्यप्रदेश)
तथा कटनी जिला (मध्यप्रदेश) सम्मिलित हैं।

महाराष्ट्र में बॉक्साइट अयस्क के निक्षेप तथा उत्पादन अपेक्षाकृत कम है। देश के कुल
उत्पादन का 18 प्रतिशत भाग का उत्पादन यहां होता है, परन्तु निक्षेपों का कुल भण्डार
देश के कुल भण्डार के 22 प्रतिशत भाग के बराबर है। बाक्साइट के महत्वपूर्ण निक्षेप
कोल्हापुर, रायगढ़, थाणे, सतारा एवं रत्नागिरी जिलों में अवस्थित हैं।

कर्नाटक के बेलगाम जिले के उत्तर-पश्चिमी भूभाग में बॉक्साइट के निक्षेप मिलते हैं।
देश के पूर्वी घाट क्षेत्रों में बाक्साइट के विशाल निक्षेप अवस्थित हैं। इस घाट क्षेत्र में
उड़ीसा तथा आन्ध्र प्रदेश के क्षेत्र आते हैं।

अन्य क्षेत्रों में जैसे तमिलनाडु के सालेम, नीलगिरी तथा मदुरै जिलों में; उत्तर प्रदेश के
बाँदा जिले में बॉक्साइट अयस्क के महत्वूपर्ण निक्षेप मिलते हैं।

भारत विभिन्न देशों को बाक्साइट का निर्यात करता है। प्रमुख आयातक देश हैं-इटली,
यूनाइटेड किंगडम, पश्चिम जर्मनी एवं जापान।

  1. बाक्साइट अयस्क से अल्यूमिनियम धातु निकाली जाती है। 
  2. बाक्साइट अयस्क का उपयोग सफेद सीमेन्ट तथा कुछ रसायनों के
    निर्माण में भी होता है। 
  3. बाक्साइट निक्षेप के विशाल भण्डार झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश,
    महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा और उत्तर प्रदेश में मिलते हैं।

अधात्विक खनिज

भारत में अधात्विक खनिजों की संख्या बहुत अधिक है किंतु इनमें से कुछ ही खनिजों
का व्यापारिक एवं वाणिज्यिक दृष्टि से महत्व है। ये हैं- चूना पत्थर, डोलोमाइट, अभ्रक,
कायनाइट, सिलिमनाइट, जिप्सम एवं फास्फेट। इन खनिजों का उपयोग विभिन्न उद्योगों
में जैसे सीमेन्ट, उर्वरक, रिफ्रैक्टरीज तथा बिजली के अनेक उपकरणों एवं सामानों के
निर्माण में होता है।

अभ्रक

भारत पूरे विश्व में शीट अभ्रक का अग्रणी उत्पादक देश है। अब तक इलेक्ट्रिकल एवं
इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों में अभ्रक अपरिहार्य रूप से उपयोग में आते रहे हैं। परन्तु जब से
इसका कृित्राम रूप से संश्लेषित विकल्प आ गया, अभ्रक खनिज का उत्पादन एवं निर्यात
दोनों कम हो गया है।

वितरण – भारत में यद्यपि अभ्रक का वितरण बहुत विस्तृत है, किन्तु उत्पादन की दृष्टि से महत्वपूर्ण
निक्षेप तीन प्रमुख पट्टियों में सीमित हैं। ये तीनों पट्टियां बिहार, झारखण्ड, आन्ध्र प्रदेश
एवं राजस्थान राज्यों के अन्तर्गत आती हैं।

बिहार और झारखण्ड में उत्तम कोटि के रूबी अभ्रक का उत्पादन होता है। बिहार, झारखण्ड
के मिले जुले भूभाग में अभ्रक खनिज की निक्षेप पट्टी का विस्तार पश्चिम में गया जिला
से हजारीबाग, मुँगेर होते हुए पूर्व में भागलपुर जिले तक फैला हुआ है। इस पट्टी के बाहरी
क्षेत्र में धनबाद, पालामू, राँची एवं सिंहभूमि जिलों में भी अभ्रक के भण्डार मिलते हैं। बिहार,
झारखण्ड मिलाकर भारत के कुल अभ्रक उत्पादन का 80 प्रतिशत भाग उत्पादित करते
हैं। आन्ध्रप्रदेश में अभ्रक की पट्टी नैलूर जिले में ही सीमित है। राजस्थान देश का तीसरा
प्रमुख अभ्रक उत्पादक राज्य है। इस राज्य में अभ्रक खनिज से सम्पन्न पट्टी का विस्तार
जयपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा, अजमेर और किशनगढ़ जिलों में फैला है। यहाँ अभ्रक की
गुणवत्ता अच्छी नहीं है। इन तीन प्रमुख पट्टियों के अलावा अभ्रक के निक्षेप केरल, तमिलनाडु
एवं मध्य प्रदेश में भी मिलते हैं।

भारत में अभ्रक खनिज का उत्खनन निर्यात के लिय होता रहा है। भारत के अभ्रक का
आयात प्रमुख रूप से (कुल निर्यात का 50 प्रतिशत भाग) संयुक्त राज्य अमेरिका करता
रहा।

चूना पत्थर

इस खनिज का उपयोग कई प्रकार के उद्योगों में होता है। सीमेन्ट उद्योग भारत के 76
प्रतिशत चूने पत्थर के खपत का प्रमुख स्रोत है। चूने के पत्थर की खपत लौह इस्पात
उद्योग में 16 प्रतिशत और रासायनिक उद्योगों में 4 प्रतिशत होती है। शेष 4 प्रतिशत
उर्वरक, कागज, शक्कर, फेरो-मेंगनीज उद्योगों में खप जाता है।

मध्यप्रदेश में चूना पत्थर के कुल भण्डार का 35 प्रतिशत अंश पाया जाता है। दूसरे
उत्पादक राज्य में छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु,
महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा, बिहार, झारखण्ड, उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश है।
शेष चूना पत्थर के भण्डार के अंश असम, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, केरल एवं मेघालय
राज्यों में है। कर्नाटक में कुल भण्डार का 10 प्रतिशत उत्पादन होता है। इस खनिज
के निक्षेप कर्नाटक में बीजापुर, बेलगाम और शिमोगा जिलों में मिलते हैं।

आन्ध्र प्रदेश में इसके निक्षेप विशाखापट्टनम, गुन्टूर, कृष्णा, करीमनगर, एवं आदिलाबाद
जिलों में मिलते हैं। उड़ीसा के सुन्दरगढ़ जिले, बिहार के रोहतास जिले तथा झारखण्ड
के पालामू जिले में भी चूने के पत्थर के भण्डार हैं।

  1. भारत संसार का अग्रणी अभ्रक उत्पादक देश है। 
  2. अभ्रक का उपयोग इलेक्ट्रिकल तथा इलेक्ट्रोनिक उद्योगों में होता
    है। 
  3. अभ्रक यद्यपि पूरे देश में वितरित है किन्तु निर्यात के लिये उपयोगी
    निक्षेप बिहार, झारखण्ड, आन्ध्रप्रदेश तथा राजस्थान में मिलते हैं। 
  4. चूना-पत्थर सबसे अधिक मध्य प्रदेश में मिलता है, इसके बाद कर्नाटक
    आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा, बिहार, झारखण्ड तथा मेघालय में मिलता है।

खनिज उत्खनन की समस्याएँ

खनिज उत्खनन से कई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इनमें से प्रमुख समस्याएँ
इस प्रकार हैं-

खनिजों का तीव्रता से समापन

खनिजों के अंनियंित्रात दोहन से बहुत से महत्वपूर्ण खनिज पूर्ण समाप्ति के करीब पहुंचने
वाले हैं। अत: इनके संरक्षण तथा न्यायसंगत एवं विवेकपूर्ण उपयोग की अत्यन्त आवश्यकता
है।

पारिस्थितिकीय समस्याएँ

खनिजों के उत्खनन ने कई गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं को प्रस्तुत किया है। सबसे
प्रमुख समस्या कृषि भूमि के काफी बड़े-बड़े क्षेत्र खनन क्रियाओं से प्रभावित तथा कृषि
भूमि पर खनन से निकाले अनुपयोगी पत्थरों को अधिभार स्वरूप फैला देने पर पूर्णत:
अकृष्य एवं अनुपयुक्त हो गए। इसके अतिरिक्त खदानों में कार्य प्रारंभ कने से पूर्व
अधोसंरचना बनाने में प्राकृतिक वानस्पतिक सम्पदाओं का विनाश हो जाता है। इससे
उत्पन्न कई समस्याएँ जैसे बार-बार बाढ़ प्रभावित होना, अपवाह क्षेत्र में अवरोध उत्पन्न
होने से पानी का इधर-उधर जमाव मच्छरों का आश्रय स्थान बनते हैं, जिससे मलेरिया
जैसे संक्रामक बीमारियां फैलने की प्रबल संभावनाएं बनती हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में खनन कार्य
से भूस्खलन बार-बार होता है जिससे जीव-जन्तु, पशु-सम्पदा तथा मानवों की जान-माल
की हानि होती है। कई खदानों में, खनन श्रमिकों को बहुत ही खतरनाक माहौल में काम
करना पड़ता है। कोयले की खदानों में आग लगने से अथवा पानी भर जाने से सैकड़ों
श्रमिकों को जान गंवानी पड़ती है। कई खदानों में कभी-कभी विषैली गैस अचानक मिल
जाने से कई श्रमिक मर जाते हैं।

प्रदूषण

बहुत से खनिज उत्पादक क्षेत्रों की गतिविधियों से जल तथा वायु का प्रदूषण आसपास
के क्षेत्रों में फैल जाता है जिससे कई प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी आपदाएँ उत्पन्न हो
जाती हैं।

सामाजिक समस्याएँ

खनिजों की नई खोजों से स्थानीय लोगों का विस्थापन होता है। चूंकि बहुत से जनजातीय
क्षेत्रों में खनिजों की प्रचुरता पाई जाती है, अत: उनके विकास एवं दोहन होने पर
सर्वाधिक प्रभाव जनजातियों पर पड़ता है। इन क्षेत्रों के औद्योगीकरण से इन जनजातियों
की आर्थिक स्थिति, इनके जीवन मूल्यों एवं जीवनयापन करने के तौर-तरीकों पर बहुत
बुरा प्रभाव पड़ता है।

संसाधनों का संरक्षण

घटते साधनों की दुनिया में यह परम आवश्यक है कि खनिज संसाधनों का न्यायसंगत
उपभोग वर्तमान पीढ़ी द्वारा किया जाये ताकि भावी पीढ़ी प्राकृतिक उपहारों से वंचित
न हो जाये। इसलिये संसाधन की उपलब्धियों की पूर्ण सुरक्षा अति आवश्यक है।
खनिज संसाधनों का संरक्षण निम्नलिखित युक्तिसंगत उपायों द्वारा संभव है-

पुनरोद्धार

जहाँ तक सम्भव हो सभी प्रकार से प्रयास किया जाना चाहिये जिनसे विभिन्न
खनिजों का पुनरोद्धार हो सके। सुदूर-संवेदन प्रविधियों के प्रयोग से नए-नए
क्षेत्रों में खनिज-निक्षेपों के पाए जाने की संभावनाओं की पहचान की जा सकती
है।

पुन: चक्रण

इस प्रक्रिया से तात्पर्य उत्पादन प्रक्रिया में खनिजों के पुन: उपयोग से है। यथा
(i) अनुपयोगी कागज, चिथड़ों, उपयोग की हुई बोतलें, टीन, प्लास्टिक के कचरों
का पुन: चक्रण कर कागज, समाचार पत्रा के कागज, प्लास्टिक व कांच के बर्तन,
डिब्बा बनाने के लिए टन आदि का उत्पादन किया जा सकता है। यह प्रक्रिया
जल एवं विद्युत की खपत को प्रभावी तरीके से कम करती है। ऐसे कदम वन
संपदा के कम होने की प्रक्रिया को धीमा कर सकते हैं। (ii) पुरानी मशीनों, वाहनों,
औद्योगिक उपकरणों के उपयोग के बाद इन्हें कास्ट व लोहे में परिवर्तित कर इनसे
नए उत्पाद बनाए जाते हैं।

प्रतिस्थापन

प्रौद्योगिकी के बढ़ते विचार से तथा नई जरूरतों के बढ़ने से खनिजों के उपयोग
में कई परिवर्तन आए हैं। जैसे पेट्रो-रासायनिक उद्योग से उत्पन्न प्लास्टिक ने
पारम्परिक पीतल या मिट्टी के घड़ों को प्रतिस्थापित कर अपनी जगह बना ली। यहां
तक कि अब आटोमोबाइल उद्योग में कार, स्कूटर के ढ़ाचे में प्रयुक्त इस्पात की
जगह प्लास्टिक ने ले रखी है। ताँबे की पाइप की जगह प्लास्टिक पाइप उपयोग
में आने लगी।

अधिक कौशलयुक्त उपयोग

खनिजों को लंबी अवधि तक संरक्षण करने से खनिजों के अधिक कौशलयुक्त उपयोग
बहुत मददगार साबित हुए हैं। इसलिये आजकल खनिज संसाधनों का बड़ी कुशलता
से उपयोग होने लगा है। बतौर उदाहरण आज बाजार में ज्यादा शक्तिशाली
इंजीनियरिंग तथा निर्माण प्रक्रियाओं से मोटरगाड़ियाँ अधिक क्षमता एवं गति वाली
मिलनी लगी हैं।

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