कृषि अर्थशास्त्र क्या है ? अर्थ, परिभाषा एवं इसकी प्रकृति व क्षेत्र

कृषि अर्थशास्त्र क्या है

कृषि अर्थशास्त्र में मनुष्य धन कमाने और उसे व्यय करने की समस्त क्रियाओं से उत्पन्न समस्याओं का अध्ययन किया जाता है । कृषि अर्थशास्त्र व्यावहारिक विज्ञान और आदर्श विज्ञान के साथ-साथ कला भी है। कृषि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र होता है। कृषि क्षेत्र का विकास दूसरे क्षेत्र के विकास के लिए आवश्यक है। 

कृषि अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जिसमें अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों का प्रयोग कृषि क्षेत्र की विभिन्न समस्याओं का समाधान करने के लिए किया जाता है । कृषि अर्थशास्त्र मूल रूप से अर्थशास्त्र की ही एक शाखा है । 

सामान्य अर्थशास्त्र के लगभग सभी यन्त्रों का प्रयोग कृषि अर्थशास्त्र में होता है। उत्पादन उपभोग, वितरण, विपणन,वित्त, योजना एवं नीति निर्माण आदि कृषि अर्थशास्त्र की मुख्य शाखाएं है। कृषि क्षेत्र का हम ब्यष्टिगत तथा समष्टिगत दृष्टि से भी वर्णन किया जाता है। कृषि अर्थशास्त्र के अन्तर्गत कृषि समस्याएं तथा उनके समाधान के उपायों का अध्ययन किया जाता है। 

कृषि अर्थशास्त्र में किसान क्या पैदा करे, कितना पैदा करे, उसे कहां तथा किसके द्वारा बेचे, आय को बढ़ाने के लिए कौन सा सहायक धंधा अपनाएं अपनी पैदावार में किसकों कितना तथा किस प्रकार हिस्सा दे तथा किन-किन वस्तुओं का उपयोग करें आदि सभी समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।

कृषि अर्थशास्त्र का अर्थ

कृषि अर्थशास्त्र में कृषि तथा किसानों से सम्बन्धित आर्थिक समस्याओं का अध्ययन किया जाता है। अनेक विद्वानों ने कृषि अर्थशास्त्र की परिभाषा अपने-अपने ढंग से दी है इनमें से प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित है। प्रो. ग्रें के अनुसार ’’कृषि अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जिसमें सामान्य अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों एवं विधियों को कृषि व्यवसाय की विशिष्ट परिस्थितियों में लागू किया जाता है।’’ कृषि अर्थशास्त्र में कृषि तथा किसानों से सम्बन्धित आर्थिक समस्याओं का अध्ययन किया जाता है। 

कृषि अर्थशास्त्र की परिभाषा

अनेक विद्वानों ने कृषि अर्थशास्त्र की परिभाषा अपने-अपने ढंग से दी है इनमें से प्रमुख परिभाषाएँ है।

प्रो. ग्रें के अनुसार ‘‘कृषि अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जिसमें सामान्य अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों एवं विधियों को कृषि ब्यवसाय की विशिष्ट परिस्थितियों में लागू किया जाता है।’’

प्रो. जोजियर के अनुसार ‘‘कृषि अर्थशास्त्र कृषि विज्ञान की वह शाखा है जो कृषि साधनों के नियमन से सम्बन्ध रखता हुआ यह बताता है कि किसान किस प्रकार अपने व्यवसाय से लाभ उठाकर अपने को सुखी बना सकते है।’’

प्रो. हिबार्ड के अनुसार- ‘‘कृषि अर्थशास्त्र कृषि कार्य वाले मनुष्यों के धन कमाने और ब्यय करने की क्रियाओं से उत्पन्न पारस्परिक समस्याओं का अध्ययन करता है।’’

प्रो. हावार्ड के अनुसार ‘‘कृषि अर्थशास्त्र सामान्य अर्थशास्त्र के नियमों को कृषि कला व व्यापार पर लागू करने वाला शास्त्र है।’’

प्रो. टेलर के अनुसार, ‘‘कृषि अर्थशास्त्र उन सिद्धान्तों का विवेचन करता है जो कृषक की इन समस्याओं क्या उत्पादन किया जाय और कैसे उत्पादन किया जाए, क्या बेचा जाए और कैसे बेचा जाए को शासित करते है जिससे सम्पूर्ण समाज के हित के साथ-साथ किसानों को भी अधिक से अधिक लाभ हो ।’’

प्रो. एस. बी. के अनुसार, ‘‘ कृषि अर्थशास्त्र कृषि से संबंधित उन सिद्वान्तों एवं सूत्रों का अध्ययन है जिनकी सहायता से कम समयावधि में ही उन्नत खेती करके समृद्ध एवं सुखमय जीवन व्यतीत किया जा सकता है।’’

स्नोड ग्राँस एवं वालास के अनुसार, ‘‘कृषि अर्थशास्त्र को सामाजिक विज्ञान का एक ब्यावहारिक पहलू माना जा सकता है जिसमें कृषि सम्बन्धित समस्याओं के समस्त पहलूओं की और ध्यान दिया जाता है।’’

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि कृषि अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जिसमें अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों का प्रयोग कृषि क्षेत्र की विभिन्न समस्याओं का समाधान करने के लिए किया जाता है । 

कृषि अर्थशास्त्र मूल रूप से अर्थशास्त्र की ही एक शाखा है । कृषि अर्थशास्त्र में कृषि से मनुष्य को धन कमाने और उसे व्यय करने की समस्त क्रियाओं से उत्पन्न समस्याओं का अध्ययन किया जाता है ।

कृषि अर्थशास्त्र की प्रकृति

कृषि अर्थशास्त्र में सामान्य अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता है। प्रथम प्रश्न जो संबंधित है वह कृषि अर्थशास्त्र के क्षेत्र से है। कृषि अर्थशास्त्र के अधिकतर सिद्धान्त सामान्य अर्थशास्त्र से लिए गये है, तथा कृषि अर्थशास्त्र की मुख्य साखाएं सामान्य अर्थशास्त्र के समान है, लेकिन तब यह प्रश्न उठता है कि यदि सामान्य अर्थशास्त्र के सिद्धान्त कृषि अर्थशास्त्र के सिद्धान्त से अलग नही है तो कृषि अर्थशास्त्र को अलग से अध्ययन की आवश्यकता क्यों है। इसका कारण यह है कि कृषि अर्थशास्त्र में सामान्य अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों का प्रयोग प्रत्यक्ष रूप से नही करते है, बल्कि सामान्य अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों में सुधार करके, कृषि क्षेत्र की विशेषताओं तथा स्थितियों के अनुसार इसका प्रयोग करते है।

1. क्या कृषि अर्थशास्त्र व्यावहारिक विज्ञान है

कृषि अर्थशास्त्र व्यावहारिक विज्ञान के नाते वस्तु स्थिति हमारे सम्मुख रखता है । यह कारण तथा परिणाम के संबंध को बताता है । उत्पादन के क्षेत्र में यह हमें बताता है कि किसी भूमि के टुकडे़ पर ज्यों-ज्यों श्रम तथा पूँजी की इकाइयां बढ़ाते है त्यों-त्यों प्रत्येक अगली इकाई  का उत्पादन घटता जाता है । इस प्रवृत्ति को घटते प्रतिफल का नियम कहते है।

कुछ अर्थशास्त्री कृषि अर्थशास्त्री को व्यावहारिक विज्ञान कहते है। जैसा कि एस.बी. की परिभाषा से स्पष्ट है कि कृषि अर्थशास्त्र एक व्यावहारिक विज्ञान है तथा यह कृषि से संबंधित आर्थिक समस्याओं का पहचान करना, अध्ययन करना, समस्याओं का वर्गीकरण करना आदि समस्याओं के समाधान से संबंधित है।

ग्रे के अनुसार- कृषि अर्थशास्त्र एक विज्ञान है, जिसमें अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों एवं उपायों को कृषि उद्योग की विशेष दशाओं में प्रयोग करते है । जबकि ब्लैक इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं है। जैसा कि हम जानते है कि विशुद्ध विज्ञान का प्रयोग विशेष स्थिति में होता है। उदाहरण के लिए इंजीनियरिग एक व्यावहारिक विज्ञान है, यह सुझाव देता है कि भौतिक विज्ञान तथा अन्य विज्ञानों का प्रयोग एक निश्चित स्थिति में किस प्रकार किया जाता है।

2. कृषि अर्थशास्त्र विज्ञान तथा कला दोनों है

जैसा कि बताया जा चुका है कि कृषि अर्थशास्त्र को व्यावहारिक विज्ञान नहीं कहना चाहिए बल्कि यह विशुद्ध विज्ञान का एक विशेष रूप है। विज्ञान की तरह कृषि अर्थशास्त्र भी विभिन्न आर्थिक चरो के बींच कारण तथा परिणाम संबंध किस प्रकार का है। यदि यह संबंध पाया जाता है तो हम इसका प्रयोग हम विभिन्न आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए करते है। कृषि अर्थशास्त्र एक कला भी है। यह हमें उन उपायों तथा विधियों को बताता है जिन्हें अपनाकर कृषि उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है तथा राष्ट्रीय आय में वृद्धि की जा सकती है। दूसरे हमें यह बताता है कि किसान को, महाजन के चंगुल से छुड़ाने के लिए सहकारी समितियों का गठन करना चाहिए । तीसरें कृषि मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने के लिए यह कृषि मजदूरों की संघ बनाने की सलाह देता है । चौथे किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य दिलवाने के लिए यह कृषि विपणन समितियों का गठन करने को कहता है।

3. आदर्श विज्ञान 

कृषि अर्थशास्त्र हमारे सामने आदर्श भी प्रस्तुत करता है अर्थात यह अच्छे/बुरे तथा उचित /अनुचित का भी विचार करता है। यह इस प्रश्न का भी उत्तर देता है कि क्या होना चाहिए । उदाहरण के लिए कृषि अर्थशास्त्र बताता है कि भारत में अन्य देशों की अपेक्षा प्रति हेक्टेअर उत्पादन बहुत कम है अत: उसे बढ़ाना चाहिए । दूसरे कृषि श्रमिकों की मजदूरी व कार्यक्षमता भी अन्य देशों की अपेक्षा बहुत कम है जिसे बढाना चाहिए । तीसरे भारत में कृषि मजदूरों के कार्य करने के घण्टे बहुत अधिक है जिन्हें सीमित करना चाहिए । चौथे महाजन किसान से ऊची ब्याज दर वसूल करते है जिसे कम करना चाहिए । इस प्रकार हम कह सकते है कि कृषि अर्थशास्त्र व्यावहारिक विज्ञान और आदर्श विज्ञान के साथ-साथ कला भी है।

कृषि अर्थशास्त्र का क्षेत्र

उपरोक्त परिभाषाएं कृषि अर्थशास्त्र के क्षेत्र को इंगित करती है। सामान्य अर्थशास्त्र के सिद्धान्त और कृषि अर्थशास्त्र के सिद्धान्त में मूल रूप से कोई  अन्तर नहीं है। सामान्य अर्थशास्त्र के लगभग सभी यन्त्रों का प्रयोग कृषि अर्थशास्त्र में होता है। उत्पादन उपभोग, वितरण, विपणन,वित्त, योजना एवं नीति निर्माण आदि कृषि अर्थशास्त्र की मुख्य शाखाएं है। कृषि क्षेत्र का ब्यश्टिगत तथा समष्टिगत दृष्टि से भी वर्णन किया जाता है। कृषि अर्थशास्त्र के अन्तर्गत कृषि समस्याएं तथा उनके समाधान के उपायों का अध्ययन किया जाता है। प्रो. केस के अनुसार, ‘‘कृषि अर्थशास्त्र के अन्तर्गत कार्य प्रबन्ध, विपणन, सहकारिता, भू-धारण पद्धतियां, ग्रामीण कृषि साख, कृषि नीति, कृषि मूल्यों का विष्लेशण तथा इतिहास आदि को सम्मिलित किया जाता है। कृषि अर्थशास्त्र में हम न केवल आर्थिक तथ्यों का ही अध्ययन करते है, बल्कि कृषि समस्याओं के समाधान के लिए व्यावहारिक सुझाव भी प्रस्तुत करते है।

अन्य शब्दों में हम कह सकते है कि कृषि अर्थशास्त्र में किसान क्या पैदा करे, कितना पैदा करे, उसे कहां तथा किसके द्वारा बेचे, आय को बढ़ाने के लिए कौन सा सहायक धंधा अपनाएं, अपनी पैदावार में किसकों कितना तथा किस प्रकार हिस्सा दे तथा किन-किन वस्तुओं का उपयोग करें आदि सभी समस्याओं का अध्ययन किया जाता है। आज कृषि अर्थशास्त्र की विषय सामग्री ब्यक्तिगत स्तर पर कार्य संगठन एवं प्रबन्ध तक ब्यापक हो गयी है। दूसरे कृषि अर्थशास्त्र का विकास होने के साथ-साथ कृषि उत्पादन में नई -नई संभावनाएं पैदा हो गयी है। 

कृषि अर्थशास्त्र किसानों के लिए इस नये ज्ञान को आसान बनाकर उनमें प्रेरणा का संचार करता है। तीसरे कृषि अर्थशास्त्र, कृषि अनुसंधान तथा तकनीकि विकास को प्रोत्साहन देता है। चौथे अन्तर्राष्ट्रीय ब्यापार में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान हो जाने के कारण कृषि उत्पादों का ब्यवस्थित ढंग से उत्पादन और वितरण करने के उद्देश्य से आजकल भिन्न राष्ट्रो के बीच सहयोग में वृद्धि हो रही है। अत: कृषि अर्थशास्त्र अन्तर्गर्राष्ट्रीय स्तर के समझौते करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

सन्दर्भ -
  1. R.K Lekhi and Joginder Singh, “Technological Possibilities of Agricaltural Development in India”
  2. S.S. china “Agricultural Economics and India Agriculture”
  3. C.P. Dutt and B.M. Pugh, “Principles and Practices of Crop Production”
  4. Naidu and Narsinham, “Economics of Indian Agriculture” Vol. 1
  5. R.D. Tiwari, “Indian Agriculture”

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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