कृषि विपणन का अर्थ

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सामान्यत: कृषि उपज के विपणन या बिक्री से तात्पर्य उन समस्त क्रियाओं से लगाया जाता है जिसके द्वारा कृषि उपज उपभोक्ताओं तक पहुँचती है। प्रो0 जोल एवं प्रो0 खुसरो के अनुसार ‘‘खाद्यान्न विपणन के अन्तर्गत उन क्रियाओं को शामिल किया जाता है जो खाद्यान्नों को उत्पादकों से उपभोक्ताओं तक पहुँचाने के लिए समय (भण्डारण), स्थान (परिवहन), स्वरूप (परिनिर्माण) एवं स्वामित्व परिवर्तन आदि विपणन प्रक्रिया के विभिन्न स्तरों पर की जाती है” कृषि पदार्थों की बिक्री में शािमल होनेवाली मुख्य क्रियाएं - एकत्राीकरण (Collection)] उनका श्रेणीकरण तथा प्रमाणीकरण (Grading and Standardisation), परिष्करण (Processing), संग्रहण एवं भण्डारण (Preservation and Storage),

कृषि विपणन के दोष

भारत में कृषि विपणन व्यवस्था अनेक प्रकार से सन्तोषजनक स्थिति में नहीं है फलस्वरूप किसानों को अपने फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। विपणन व्यवस्था के मुख्य दोष हैं:-

दोषपूर्ण संग्र्रहण व्यवस्था -

भारतीय कृषकों के पास ऐसी भण्डारण सुविधाओं का अभाव है जहां किसान अपनी उपज को कुछ समय के लिए सुरक्षित रख सके। गांवों में कृषि उपज खित्रायों, मिट्टी के बर्तनों तथा कच्चे कोठों में जमा की जाती है। ऐसे संग्रहण के प्राय 1.5% उपज सड़-गलकर नष्ट हो जाती है या चूहे कीटाणुओं द्वारा खा ली जाती है कभी-कभी तो इस प्रकार किसान की एक-तिहाई उपज नष्ट हो जाती है। ऐसी स्थिति में कृषक को अपनी उपज को शीघ्र बेचने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

श्रेणी विभाजन एवं प्रमाणीकरण का अभाव -

 भारतीय मण्डियों में जो कृषि उपज बिकने को आती है वे प्राय: प्रमाणित एवं श्रेणीकरण नहीं होता जो कि Îकृषक की अज्ञानता एवं उपज थोड़ी होने का परिणाम होता है। इसके फलस्वरूप किसान जान-बूझकर मिलावट करते हैं और उन्हें उपज का कम मूल्य मिलता है। इस स्थिति का लाभ बाजार में उपस्थित बेईमान व्यापारी, एजेन्ट और तौल करनेवाले उठाते हैं।

अल्पविकसित परिवहन व्यवस्था -

ग्रामीण कृषि में परिवहन व्यवस्था असंतोषजनक है। गाँव व शहरों को जोड़नेवाली अधिकांश सड़के कच्ची हैं जिन पर बरसात के मौसम में चलना बहुत ही कठिनाईपूर्ण होता है परिणामस्वरूप इन साधनों के अभाव में यातायात की लागत कृषि उपज के मूल्य का 20% हो जाती है, कई परिस्थितियों में कृषकों को गांवों में फसल कम कीमत पर बेचने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

मध्यस्थों की बड़ी संख्या -

भारत में कृषि उपज के विपणन में कृषकों एवं उपभोक्ताओं के बीच मध्यस्थों की एक लम्बी Üाृंखला है जिसमें साहूकार, फुटकर व्यापारी, आदि शामिल हैं। मध्यस्थों की अधिक संख्या के परिणामस्वरूप उपभोक्ताओं द्वारा दिए जानेवाला मूल्य का लगभग 50% ही मिल पाता है।

डी0एस0 सिन्धु के अनुसार किसानों को चावल की कीमत का केवल 53% प्राप्त होता है (31% हिस्सा मध्यस्थों का है, तथा 16% विपणन लागत है। जबकि गेहूँ की बिक्री से पचास पैसे ही प्राप्त होते हैं। अत: कृषि व्यापार का अधिकतर लाभ इन्हीं मध्यस्थों द्वारा ही हड़प लिया जाता है।

 मण्डियों मे कपटपूर्ण रीतियाँ -

इन मण्डियों में आढ़तिए और दलाल किसान की अज्ञानता का लाभ उठाकर उसके साथ विविध प्रकार से कपट करते हैं। तराजू और बाटों की गड़बड़ी, प्रामाणिक वजनों का प्रयोग न करना, उपज का एक अंश नमूने के रूप में लेकर वापिस न करना, कपड़े के नीचे से हाथ के इशारों से मूल्य निर्धारित करना, तुलाई, आढ़त, बोराबन्दी प्याऊ आदि के लिए अनुचित कटौती करना मण्डियों की कुछ प्रचलित कपटपूर्ण रीतियाँ हैं।

मूल्य संबंधी जानकारी का अभाव -

 किसानों के लिए विभिन्न मण्डियों में समय-समय पर प्रचलित मूल्यों के विषय में सही सूचना प्राप्त कर पाना सम्भव नहीं होता क्योंकि गाँवों में समाचार पत्रा व पित्राकाएँ नहीं पहुँच पाती। साथ ही अधिकाँश किसान अनपढ़ भी होते हैं। अत: किसान को अपनी उपज का वही मूल्य स्वीकार करना पड़ता है जो मूल्य उसे स्थानीय व्यापारी बताते हैं।

विपणन हेतु वित्त का अभाव -

 विपणन क्रिया के लिए वित्त की आवश्यकता होती है सहकारी समितियों से उपलब्ध वित्त का लाभ बड़े किसानों को ही हो सकता है। छोटा किसान अब भी वित्त के लिए व्यापारी-महाजन के पास जब पहुँचता है तो वह किसान को मंडी में अपना अनाज बेचने के लिए हतोत्साहित करता है और स्वयं ही उसे खरीद लेता है।

प्रतिकूूल परिस्थितियों में विपणन -

जमींदारी उन्मूलन से पहले लगान की रकम का भुगतान करने के लिए कृषक को अपनी उपज का एक बड़ा भाग फसल आने के बाद तुरन्त बाद ही बेचना पड़ता था। परन्तु जमींदारी उन्मूलन के बाद किसानों में एक सम्पन्न वर्ग पैदा हो गया जो भूमि का स्वामी है तथा उससे अपनी उपज को कम दामों पर बेचने की विवशता भी नहीं होती। दूसरी ओर छोटा किसान भी है जिनके पास पाँच एकड़ से कम भूमि है तथा इनमें सम्पन्न किसान की तरह, बिक्री योग्य आधिक्य को उचित कीमतों के इन्तजार में संग्रह करने का सामथ्र्य नहीं होता। अत: परिणामस्वरूप इन्हें अपनी उपज, ऋण वापस करने या लगान चुकाने के लिए फसल के तुरन्त बाद ही बेचनी पड़ती है।

विवशतापूर्ण बिक्री -

भारत का औसत किसान इतना गरीब और ऋणग्रस्त है कि उसमें अच्छी कीमतों के लिए प्रतीक्षा करने की क्षमता ही नहीं है। उसे ऋण-भार से मुक्ति पाने के लिए फसल तैयार होते ही अपनी फालतू उपज ग्रामीण साहूकार या व्याारी के हाथों बेचनी पड़ती है। अन्य शब्दों में व्यापारी को अपने उत्पादन का बहुत ही प्रतिकूल बाजार में प्रतिकूल समय पर प्रतिकूल दरों पर बेचना पड़ता है।

संगठन का अभाव -

भारतीय कृषक देश के दर-दर स्थानों पर फैले हुए हैं। और वे आर्थिक तथा सामाजिक दृष्टि से पिछड़े हुए भी हैं। परिणामस्वरूप वे किसी शक्तिशाली संगठन का निर्माण नहीं कर पाए हैं। अत: फसल बेचते समय व्यापारी उसको दबा लेते हैं। और कम मूल्य पर उपज बेचने को बाध्य करते हैं।

इसके अतिरिक्त भारतीय कृषक सीधा-सादा है तथा रूढ़िवादी और अन्धविश्वासी भी है। यही कारण है कि व्यापारी द्वारा ठगा जाता है। उनको अनेक तरह से समझाकर गाँव में बेचने के लिए बाध्य किया जाता है।

अत: भारत की वर्तमान कृषि उपज की विपणन, व्यवस्था को भूमि संबंधों से स्वतन्त्रा रूप से देख सकना संभव नहीं है। बाजारों के नियन्त्राण, आकाशवाणी द्वारा भावों के प्रसारण, यातायात व्यवस्था में सुधार आदि से पूँजीवादी ढंग से खेती करनेवाले किसानों को तो लाभ हुआ है और वे अपने ‘‘विपणन आधिक्य’’ का उचित मूल्य पाने में सफल हुए हैं परन्तु इन सबका लाभ मध्यम श्रेणी के और छोटे किसानों को अपेक्षाकृत बहुत कम मिल पाता है।

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