कृषि विपणन का अर्थ, परिभाषा, उद्देश्य, दोष

कृषि विपणन का अर्थ

राष्ट्रीय कृषि आयोग के अनुसार कृषि विपणन एक प्रक्रिया है, जो विक्रय योग्य क्षेत्र समुदाय के लिये उत्पादन के निर्णय से प्रारंभ होती है और तकनीकी, आर्थिक विचार, फसल की कटाई पूर्व व बाद की क्रियाओं, एकत्रीकरण, श्रेणीकरण, भण्डारण, परिवहन व वितरण पर आधारित कार्यात्मक और संस्थागत प्रणाली की विपणन संरचना के सभी उद्यानिकी फसलों का पहलुओं को शामिल करती है। कृषि उपज के विपणन या बिक्री से तात्पर्य उन समस्त क्रियाओं से लगाया जाता है जिसके द्वारा कृषि उपज उपभोक्ताओं तक पहुँचती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् तीन प्रमुख कार्यों के जुड़ाव को निम्नानुसार परिभाषित करती है:-
  1. एकत्रीकरण 
  2. उपभोग की तैयारी और 
  3. वितरण

कृषि विपणन की परिभाषा

प्रो0 जोल एवं प्रो0 खुसरो के अनुसार ‘‘खाद्यान्न विपणन के अन्तर्गत उन क्रियाओं को शामिल किया जाता है जो खाद्यान्नों को उत्पादकों से उपभोक्ताओं तक पहुँचाने के लिए समय (भण्डारण), स्थान (परिवहन), स्वरूप (परिनिर्माण) एवं स्वामित्व परिवर्तन आदि विपणन प्रक्रिया के विभिन्न स्तरों पर की जाती है” कृषि पदार्थों की बिक्री में शािमल होनेवाली मुख्य क्रियाएं - एकत्रीकरण उनका श्रेणीकरण तथा प्रमाणीकरण परिष्करण संग्रहण एवं भण्डारण।

कृषि विपणन के उद्देश्य

प्रभावी विपणन के उद्देश्य नीचे बताये गये हैं
  1. प्राथमिक उत्पादक को श्रेष्ठ संभावित मुनाफा प्राप्त करने योग्य बनाना;
  2. किसान को प्रोत्साहित मूल्य पर उत्पाद बेचने योग्य बनाने सभी उत्पाद को उठाने की सुविधायें प्रदान करना; और
  3. खेत में उत्पन्न सभी उत्पादों को उपभोक्ता के लिये उत्पाद की गुणवत्ता को बिगाडे़ बिना उचित मूल्य पर उपलब्ध कराना।

कृषि विपणन के दोष

भारत में कृषि विपणन व्यवस्था अनेक प्रकार से सन्तोषजनक स्थिति में नहीं है किसानों को अपने फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। कृषि विपणन व्यवस्था के मुख्य दोष हैं:-
  1. दोषपूर्ण संग्रहण व्यवस्था - भारतीय कृषकों के पास ऐसी भण्डारण सुविधाओं का अभाव है जहां किसान अपनी उपज को कुछ समय के लिए सुरक्षित रख सके। 
  2. प्रमाणीकरण का अभाव -  भारतीय मण्डियों में जो कृषि उपज बिकने को आती है वे प्राय: प्रमाणित एवं श्रेणीकरण नहीं होता जो कि कृषक की अज्ञानता एवं उपज थोड़ी होने का परिणाम होता है। इसके फलस्वरूप किसान जान-बूझकर मिलावट करते हैं और उन्हें उपज का कम मूल्य मिलता है।
  3. परिवहन व्यवस्था - ग्रामीण कृषि में परिवहन व्यवस्था असंतोषजनक है। गाँव व शहरों को जोड़नेवाली अधिकांश सड़के कच्ची हैं जिन पर बरसात के मौसम में चलना बहुत ही कठिनाई पूर्ण होता है इन साधनों के अभाव में यातायात की लागत कृषि उपज के मूल्य का 20% हो जाती है, कई परिस्थितियों में कृषकों को गांवों में फसल कम कीमत पर बेचने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
  4. मध्यस्थों की बड़ी संख्या - भारत में कृषि उपज के विपणन में कृषकों एवं उपभोक्ताओं के बीच मध्यस्थों की एक लम्बी श्रृंखला है जिसमें साहूकार, फुटकर व्यापारी, आदि शामिल हैं। 
  5. मण्डियों मे कपट - इन मण्डियों में आढ़तिए और दलाल किसान की अज्ञानता का लाभ उठाकर उसके साथ विविध प्रकार से कपट करते हैं। तराजू और बाटों की गड़बड़ी, प्रामाणिक वजनों का प्रयोग न करना, उपज का एक अंश नमूने के रूप में लेकर वापिस न करना, कपड़े के नीचे से हाथ के इशारों से मूल्य निर्धारित करना, तुलाई, आढ़त, बोराबन्दी प्याऊ आदि के लिए अनुचित कटौती करना मण्डियों की कुछ प्रचलित कपटपूर्ण रीतियाँ हैं।
  6. मूल्य जानकारी का अभाव -  किसानों के लिए विभिन्न मण्डियों में समय-समय पर प्रचलित मूल्यों के विषय में सही सूचना प्राप्त कर पाना सम्भव नहीं होता क्योंकि गाँवों में समाचार पत्र व पत्रिकाएँ नहीं पहुँच पाती। साथ ही अधिकांश किसान अनपढ़ भी होते हैं। अत: किसान को अपनी उपज का वही मूल्य स्वीकार करना पड़ता है जो मूल्य उसे स्थानीय व्यापारी बताते हैं।
  7. विपणन हेतु वित्त का अभाव -  विपणन क्रिया के लिए वित्त की आवश्यकता होती है सहकारी समितियों से उपलब्ध वित्त का लाभ बड़े किसानों को ही हो सकता है। छोटा किसान अब भी वित्त के लिए व्यापारी-महाजन के पास जब पहुँचता है तो वह किसान को मंडी में अपना अनाज बेचने के लिए हतोत्साहित करता है और स्वयं ही उसे खरीद लेता है।
  8. विवशता पूर्ण बिक्री - भारत का औसत किसान इतना गरीब और ऋणग्रस्त है कि उसमें अच्छी कीमतों के लिए प्रतीक्षा करने की क्षमता ही नहीं है। उसे ऋण-भार से मुक्ति पाने के लिए फसल तैयार होते ही अपनी फालतू उपज ग्रामीण साहूकार या व्याारी के हाथों बेचनी पड़ती है। 

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