महासागर क्या है?

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सौरमंडल में हमारी पृथ्वी ही एक मात्र ग्रह है, जिस पर अत्यधिक मात्रा में जल है। इसीलिए इसे अक्सर ‘जलीय ग्रह’ कहा जाता है। पृथ्वी तल का लगभग 71 प्रतिशत भाग जल से घिरा हुआ है। महासागर एक विशाल और लगातार जल खण्ड है जो पृथ्वी के सभी भूखण्डों को चारों ओर से घेरे हुए है। दक्षिणी गोलार्द्ध के 4/5 तथा उत्तरी गोलार्द्ध के 3/5 भाग पर समुद्री जल है। इसमें विश्व के समूचे जल का 97.2 प्रतिशत जल है।

विश्व में चार मुख्य महासागर हैं - प्रशान्त महासागर, हिन्द महासागर, अटलांटिक महासागर तथा आर्कटिक महासागर। अन्य सभी समुद्र तथा अंत:स्थलीय समुद्र इन चारों मुख्य महासागरों के ही अंग हैं।

महासागरीय बेसिन के उच्चावच

महसागरीय जल के भीतर अनेक प्रकार की भूआकृतियाँ छिपी हुई हैं जो कि महाद्वीपों की भू-आकृतियों से काफी मिलती-जुलती हैं। महासागरीय जल के नीचे पर्वत, पठार, पहाड़ियाँ, खाइयाँ और गड्ढे हैं। महासागर के अधस्तल पर पाई जाने वाली ये आकृतियाँ अंत: समुद्री उच्चावच कहलाती हैं। महासागरों के बेसिनों को मोटे तौर पर चार भागों में बाँटा जाता है। ये हैं-
  1. महाद्वीपीय निमग्न तट;
  2. महाद्वीपीय ढाल;
  3. वितल मैदान;
  4. महासागरीय गभीर।

महाद्वीपीय निमग्न तट

महाद्वीपों से महासागरों को अलग करने वाली कोई स्पष्ट सीमा रेखा नहीं है। वास्तव में महाद्वीप तटरेखा पर एकाएक समाप्त नहीं हो जाते। उनका तट से समुद्र की ओर धीरे-धीरे ढाल बढ़ता जाता है और वे एक ऐसे बिन्दु पर पहुँचते है जहाँ पर ढाल बहुत अधिक तीव्र हो जाता है। महाद्वीप का यह उथला जलमग्न विस्तार, महाद्वीपीय निमग्न तट कहलाता है। महाद्वीपीय निमग्न तट के जल की गहराई 120 मीटर से 370 मीटर तक होती है। महाद्वीपीय निमग्न तट की चौड़ाई में काफी भिन्नता होती है। वह कुछ किलोमीटर से लेकर सौ किलोमीटर से भी अधिक हो सकती है। इस भिन्नता को भारतीय उपमहाद्वीप के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। भारत के पूर्वी तट का महाद्वीपीय निमग्न तट पश्चिमी तट के महाद्वीपीय निमग्न तट की अपेक्षा अधिक चौड़ा है। इसी प्रकार की भिन्नताएँ सम्पूर्ण विश्व में देखी जा सकती हैं। पश्चिमी यूरोप का महाद्वीपीय निमग्न तट 320 किलोमीटर तक फैला है। फ्लोरिडा के तट से इसकी चौड़ाई 240 किलोमीटर है। कुछ महाद्वीपों से विशेषकर जहाँ वलित पर्वत तट के समानान्तर या निकले होते हैं, ये महाद्वीपीय निमग्न तट या तो बहुत संकीर्ण होते हैं या होते ही नहीं हैं। ऐसा पूर्वी प्रशान्त महासागर में देखा जाता है।

अधिकतर महाद्वीपीय निमग्न तट स्थल के ही अंश माने जाते हैं। ये समुद्री जल स्तर के बढ़ जाने के कारण जलमग्न हो गए हैं। बहुत से विद्वान इनके निर्माण का कारण या तो लहरों से होने वाले अपरदन को मानते हैं या तटवर्ती वेदिका पर नदी के बहाव के साथ आई सामग्री के निक्षेप से स्थलखंड के विस्तार को मानते हैं। कभी कुछ तटवर्ती क्षेत्रा बर्फ की पर्त से आच्छादित थे और संभवत: वे हिमानी निक्षेप के कारण विकसित हुए हों।

महाद्वीपीय निमग्न तट मनुष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। सूर्य की रोशनी महाद्वीपीय निमग्न तट के छिछले जल में से होकर समुद्र तली तक पहुँचकर सूक्ष्म पौधों और जीवों की वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थिति उत्पन्न करती है। इन सूक्ष्म जीवों को प्लवक कहते हैं, ये प्लवक मछलियों का आहार हैं। महाद्वीपीय निमग्न तट मछलियों तथा खनिजों जिसमें रेत और कंकड़ पत्थर भी शामिल हैं, के स्रोत हैं। विश्व भर में प्राप्त अधिकतर खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस इन्हीं महाद्वीपीय निमग्न तटों से प्राप्त होती हैं। बम्बई हाई तथा गोदावरी बेसिन में खनिज तेल की नवीन खोज, खनिज तेल के लिए अपतट बेधन के उदाहरण हैं। प्रवाल भित्ति और जैव खंडज पदार्थ महाद्वीपीय निमग्न तटों पर सामान्य रूप से पाये जाते हैं।

महाद्वीपीय निमग्न तट की एक उल्लेखनीय विशेषता इसमें पाई जाने वाली अंत: समुद्री केनियन (महाखड्ड) हैं, जो महाद्वीपीय ढाल तक चली जाती हैं। समुद्र तल में बनी हुई ये केनियन तीव्र ढाल वाली घाटियों के समान हैं। गोदावरी नदी के मुहाने के सामने गोदावरी केनियन 502 मीटर गहरी है।

अंत: समुद्री केनियन के निर्माण का एक कारण समुद्री जल के नीचे होने वाले भूस्खलन है। महाद्वीपीय निमग्न तट पर इकट्ठा होने वाला तलछट तूफान या भूकम्प द्वारा हटा दिया जाता है। हटते हुए इन तलछटों के बल के कारण ढाल कटते रहते हैं और इसके परिणामस्वरूप अंत: समुद्री केनियन बन जाते है। महाद्वीपीय निमग्न तट साधारणत: उन राष्ट्रों की समुद्री जल सीमा बनाते हैं, जिनसे वे लगे हुए होते हैं।

महाद्वीपीय ढाल

महाद्वीपीय सीमांत का वह निरंतर ढलवा भाग जो कि महाद्वीपीय निमग्न तट से सागर की ओर वितल मैदान तक विस्तृत होता है, महाद्वीपीय ढाल के रूप में जाना जाता है। यह 2.50 के ढाल द्वारा वर्गीकृत किया जाता है। इसकी गहराई 180 मीटर से 360 मीटर तक होती है। कुछ स्थानों पर, जैसे फिलिपीन्स के तट के पास, महाद्वीपीय ढाल बहुत गहरा है।

महाद्वीपीय ढाल में मुख्यत: तीव्र ढाल और तट से दूरी के बढ़ जाने के कारण तलछट निक्षेप बहुत कम मिलता है। महाद्वीपीय निमग्न तट की तुलना में यहाँ समुद्री जीव भी बहुत कम मिलते हैं।

महाद्वीपीय ढाल के तल के साथ-साथ तलछट के निक्षेप होते हैं। तलछट के निक्षेपों का यह क्षेत्रा महाद्वीपीय उत्थान का निर्माण करता है। कुछ क्षेत्रों में यह उत्थान बहुत ही संकरा होता है, किन्तु कहीं-कहीं इसकी चौड़ाई 600 किलोमीटर तक जाती है।

वितल मैदान

वितल मैदान गहरे महासागरीय तल के अत्यन्त समतल तथा आकृति विहीन मैदान हैं। संभवत: यह विश्व के सबसे समतल क्षेत्रा हैं। वितल मैदान, 300 से 600 मीटर की गहराई पर महासागरीय तल के एक विस्तृत भाग मे फैले हुए है। यह पहले लक्षणहीन मैदान माने जाते थे, परन्तु आधुनिक यंत्रों से पता चला है कि ये भी उसी प्रकार से विषम हैं जिस प्रकार से महाद्वीपीय मैदान धरातल पर है। इनमें व्यापक रूप से समुद्री पठार, पहाड़ियाँ, गाईआट और समुद्री पर्वत हैं।

वितल मैदान का तल तलछट से भरा हुआ है। महाद्वीपों के निकटवर्ती वितल मैदान अधिकांशत: स्थल खंड से आए तलछट से भरे हुए हैं। लेकिन जिन समुद्रों में जीवों की अत्यधिक वृद्वि होती है उन पर तलछट की मोटी परत होती है और इस तलछट का निर्माण समुद्री जीवों के अस्थि-पंजरों से होता है। इन तलछटों को ऊज या सिंधुपंक कहते हैं। कुछ खुले समुद्रों में पर्याप्त मात्रा में जीव जन्तु नहीं होते इसलिए उनके अधस्तल पर ऊज नहीं बनता। इनमें जो तलछट भरा होता है, उसे लाल सिंधुपंक कहते हैं। इस लाल सिंधुपंक का निर्माण ज्वालामुखी के कारण होता है या पवन तथा नदियों के द्वारा लाए गए छोटे-छोटे कणों से होता है।

अंत: समुद्री पर्वत श्रेणी या कटक

महाद्वीपों पर विद्यमान विशाल पर्वत पद्धति समुद्र के जल के नीचे भी विद्यमान है। इन महासागरीय पर्वतों को अंत: समुद्री पर्वत श्रेणी कहते है। ये रेखीय मेखला के समान हैं, जो महासागरों के मध्य स्थित हैं। अत: इन्हें मध्य महासागरीय पर्वत श्रेणी भी कहते हैं। सभी मध्य महासागरीय पर्वत श्रेणी एक विश्वव्यापी व्यवस्था का निर्माण करती हैं ये एक महासागर से दूसरे महासागर के साथ परस्पर जुड़ी हुई हैं। ये पर्वत श्रेणियाँ कहीं-कहीं भ्रंशों द्वारा कट जाती हैं, जहाँ प्राय: भूकंप आते हैं। महासागरीय पर्वत श्रेणियों में ज्वालामुखी आम बात हैं, जिससे कई प्रकार के समुद्री धरातलीय लक्षणों का निर्माण होता है।

मध्यवर्ती अटलांटिक पर्वत श्रेणी सबसे बड़ी और अविच्छिन्न जलमग्न पर्वत श्रेणी है जो अटलांटिक महासागर के मध्य में उत्तर से दक्षिण तक जाती है। इसकी आकृति अंग्रेजी के अक्षर ‘एस’ के समान है। कुछ स्थानों पर इसकी चोटियाँ जल की सतह के ऊपर आ जाती हैं और द्वीपों का निर्माण करती हैं। बहुत से द्वीपों का उद्गम ज्वालामुखी के कारण होता है। पूर्वी प्रशांत महासागरीय कटक और कार्लबर्ग कटक कुछ महत्वपूर्ण अंत: समुद्री पर्वत श्रेणियाँ हैं।

समुद्री टीला और गाईऑट

समस्त समुद्री अधस्तल के ऊपर बिखरे हुए हजारों जलमग्न ज्वालामुखी हैं। इनके शीर्ष नुकीले होते हैं। इन्हें समुद्री टीला कहते हैं। कभी-कभी ये समुद्री टीले इक्के-दुक्के द्वीपों के रूप में समुद्री अधस्तल से ऊपर उठ जाते हैं। हवाई और ताहिती द्वीप ज्वालामुखी की अनावृत चोटियाँ हैं। समुद्रतल के ऊपर उठने वाले ज्वालामुखी की चोटी जब अपरदन द्वारा चौरस हो जाती है और पानी से ढक जाती है तो उसे गाईऑट (निमग्न द्वीप) कहते हैं।

महासागरीय गभीर

महासागरीय गभीर अधस्तल महासागर का सबसे गहरा भाग होता है। महासागरीय अधस्तल पर लम्बी, तीव्र ढाल वाली, संकरी और चौरस तल की खाइयाँ होती हैं। इन्हें सामान्यत: अंत: समुद्री गर्त कहते हैं। ये गर्त हमेशा महासागरों के बेसिनों के मध्य में नहीं होते जैसा कि सामान्यत: विश्वास किया जाता है; बल्कि उन महाद्वीपों के अत्यधिक निकट या सामानान्तर होते हैं जहाँ वलित पर्वत सीमा बनाते हैं। ये गर्त प्राय: ज्वालामुखी और भूकम्पीय हलचल वाले क्षेत्रों के निकट पाए जाते हैं। बड़े भूकम्पों और सुनामी की उत्पत्ति यहीं होती है। ये गर्त सभी प्रमुख महासागरों में पाए जाते हैं। प्रशान्त महासागर में इनकी संख्या सबसे अधिक है। प्रशान्त महासागर में स्थित मेरियाना गर्त विश्व में ज्ञात गर्तों में सबसे गहरा है। यह गर्त या खाई इतनी गहरी है कि इसमें अगर विश्व के सर्वोच्च पर्वत शिखर माऊँट एवरेस्ट को रख दें तब भी इसकी चोटी के ऊपर कुछ किलोमीटर समुद्री जल रहेगा।

महासागरीय जल की विशेषताएँ

तापमान और लवणता महासागरीय जल के दो ऐसे गुण हैं जो विशाल जलराशियों के संचरण को प्रभावित करते हैं। अत: महासागरीय जल के परिसंचरण के अध्ययन में महासारीय जल के तापमान, लवणता तथा घनत्व का विशेष महत्व है।

महासागरीय जल का तापमान

महासागरीय जल के तापमान में भी स्थलीय धरातल के समान विविधता पाई जाती है। विभिन्न अक्षांशों पर विभिन्न ऋतुओं में प्राप्त ऊर्जा की मात्रा में विविधता सूर्यातप पर निर्भर करती है। सामान्यत: विषुवत वृत्त के समीप जल सबसे अधिक गर्म रहता और इसका तापमान ध्रुवों की ओर क्रमश: घटता जाता है। उष्ण कटिबन्धीय सागरों में वार्षिक औसत तापमान लगभग 270 सेल्सियस या इससे कुछ अधिक होता है, लेकिन ध्रुवों की ओर यह घटता जाता है। ध्रुवों पर वार्षिक औसत तापमान लगभग -1ण्80 सेल्सियस पाया जाता है। धु्रवों की ओर महासागरीय जल के तापमान का घटना अथवा विषुवत वृत्त की ओर इसके तापमान का बढ़ना एक समान नहीं होता; क्योंकि उष्ण कटिबन्धीय सागरों से गर्म जल उच्च अक्षांशों की ओर चला जाता है अथवा इसके विपरीत हो जाता है। इसके फलस्वरूप समुद्री जल के स्थानीय तापमान में वृद्धि या कमी हो जाती है। कभी-कभी ठण्डा निम्न स्तरीय जल ऊपर उठने से भी उष्ण और उपोष्ण कटिबन्धीय सागर के स्थानीय जल के तापमान को कम कर देता है।

सबसे अधिक तापमान स्थल से घिरे हुए उष्ण कटिबन्धीय सागरों में होता है, उदाहरण के लिए लाल सागर। आर्कटिक महासागर और अंटार्कटिक महासागर का जल इतना ठंडा होता है कि सैकड़ों मीटर की गहराई तक वह स्थाई रूप से जमा रहता है। ग्रीष्म ऋतु में बर्फ बड़े-बड़े हिस्सों में टूटकर हिमखंड़ों के रूप में आस-पास के सागरों में तैरने लगते हैं। इनके फलस्वरूप आस-पास के उन हिममुक्त सागरों के सतही जल का भी तापमान घट जाता है।

तापमान के उध्र्वाधर वितरण में भी विविधता पाई जाती है। गहराई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटता जाता है। यह इसलिए होता है; क्योंकि महासागरीय जल का ऊपरी भाग अधिकतम सूर्यातप प्राप्त करता है। सूर्य की किरणें जैसे-जैसे अन्दर प्रवेश करती हैं, प्रकीर्णन, परावर्तन तथा विसरण के कारण उनकी शक्ति घटती जाती है। हालांकि तापमान की यह Ðास दर सभी गहराइयों पर एक समान नहीं होती। लगभग 100 मीटर की गहराई तक जल का तापमान लगभग सतह के तापमान के बराबर रहता है। जबकि सतह से 1800 मीटर की गहराई पर तापमान लगभ 150 सेल्सियस से घटकर 20 सेल्सियस रह जाता है। 1800 मीटर से 4000 मीटर की गहराई पर तापमान घटकर 20 सेल्सियस से 1.60 सेल्सियस रह जाता है।

महासागरीय जल के गर्म होने की मुख्य प्रक्रियाएँ हैं -
  1. सौर विकिरण का अवशोषण,
  2. पृथ्वी के आंतरिक भाग से महासागरीय वितल द्वारा ऊष्मा का संवहन। 
महासागरीय जल के ठंडे होने की मुख्य प्रक्रियाएँ हैं -
  1. समुद्री सतह से ऊष्मा का विकिरण,
  2. वाष्पीकरण।

महासागरीय जल की लवणता

लवणता महासागरीय जल का एक विशेष गुण है। जब हम लवणता की बात करते हैं तो हमारा संकेत केवल साधारण नमक या सोडियम क्लोराइड से ही नहीं होता, बल्कि दूसरे कई अन्य लवणों से भी होता है। इन लवणों में प्रमुख हैं सोडियम क्लोराइड तथा मेग्नीशियम क्लोराइड जो महासागरीय जल में क्रमश: 77.7 प्रतिशत एवं 10.9 प्रतिशत पाए जाते हैं। महासागरीय जल के स्वतंत्रा परिसंचरण के कारण इसमें विभिन्न लवणों का सापेक्षिक अनुपात सभी महासागरों में और यहाँ तक कि काफी गहराई पर भी लगभग स्थिर रहता है। लेकिन महासागरीय जल की लवणता में अलग अलग सागरों में अवश्य अन्तर होता है।

अनेक रासायानिक यौगिकों के जल में घुल जाने से ही महासागरीय जल में लवणता उत्पन्न होती है। 1000 ग्राम समुद्री जल के वाष्पीकृत हो जाने के बाद बचे हुए ठोस पदार्थ का भार ग्राम में लवणता के रूप में परिभाषित किया जाता है। अगर उस ठोस पदार्थ का भार 35 ग्राम है (और यह सामान्यत: इस संख्या के निकट ही होता है।) तो लवणता को व्यक्त किया जायेगा 35:0 (35 ग्राम प्रति हजार ग्राम) अर्थात प्रति 1000 ग्राम समुद्री जल में औसत लवणता 35 ग्राम होगी। लवणता को प्रतिशत में व्यक्त न करके प्रति हजार में व्यक्त करते हैं।

बाल्टिक सागर में, जहाँ नदियों का ताजा जल सागर में गिरता है, वहाँ लवणता की मात्रा 7:0 है और यह कभी-कभी 2:0 तक गिर जाती है। लेकिन वाष्पीकरण और शुष्क जलवायु के कारण लाल सागर में लवणता 41 से 42:0 तक होती है। स्थल से घिरे हुए सागरों जैसे केस्पियन सागर और जोर्डन के मृत सागर में लवणता बहुत अधिक क्रमश: 180:0 तथा 250:0 तक होती है। विभिन्न सागरों एवं महासागरों में लवणता मेंं अन्तर के मुख्य कारण हैं -
  1. वाष्पीकरण की दर,
  2. नदियों तथा हिमखंडों के फलस्वरूप ताजे जल की आपूर्ति,
  3. महासागरीय जलों का आपस में मिलना।

महासागरीय जल में गति

महासागरों का जल सदा गतिशील रहता है। महासागरीय जल में मुख्यत: तीन प्रकार की गतियाँ होती हैं - तरंगे, ज्वार भाटा तथा धाराएं।

तरंगे

तरंगें जल तल के ऊपर उठने व नीचे गिरने के कारण होने वाली दोलनी गति है। वास्तव में तरंग में प्रत्येक जलकण की गति गोलाकार होती है। तरंगों की तुलना गेहूँ के लहराते हुए खेतों से की जा सकती है। जब किसी खेत में तेज पवन बहती है तो तरंगों जैसी गति उसकी सतह पर दिखाई देती है। लेकिन तरंग के चले जाने के बाद गेहूँ की बालियाँ अपनी मूल स्थिति में लौट आती हैं। ठीक वैसे ही तरंगों में भी जल कण तरंग के चले जाने के बाद अपनी मूल स्थिति में लौट आते हैं।

तरंग के दो मुख्य भाग होते हैं। तरंग के ऊपरी उठे भाग को तरंग-श्रृंग कहते हैं। दो तरंग-श्रृंगों के बीच के निचले भाग को तरंग-गर्त कहते हैं। तरंग-श्रृंग तथा तरंग-गर्त के मध्य की ऊध्र्वाधर दूरी को तरंग की ऊँचाई कहते हैं। दो तरंग-श्रृंगों अथवा दो तरंग-गर्तों के बीच की क्षैतिज दूरी को तरंग-दैध्र्य या तरंग की लम्बाई कहते हैं। किसी भी निश्चित स्थान पर दो लगातार श्रृंगों के गुजरने के बीच की अवधि को तरंग का आवर्त-काल कहते हैं। तेज गति वाली तरंगों का आवर्त-काल छोटा होता है, जबकि धीमी गति वाली तरंगों का आवर्त-काल लम्बा होता है
तरंगों के आकार और बल तीन कारकों पर निर्भर करते हैं :
  1. पवन की गति,
  2. पवनो के बहने की अवधि,
  3. खुले समुद्र में पवन के निर्विघ्न बहने की दूरी।
तरंगे अपरदन का एक मुख्य कारण हैं। भूकम्प, तूफान तथा ज्वालामुखी से उत्पन्न तरंगें प्रलयकारी होती हैं तथा समुद्रतटीय क्षेत्रों में बहुत विनाश करती हैं। ये तरंगें ऊर्जा के स्रोत भी है। इसलिए इस ऊर्जा का उपयोग करने का प्रयत्न किया जा रहा है।

ज्वार-भाटा

समस्त विश्व में समुद्र तल के साथ-साथ समुद्री जल विभिन्न स्थानों पर विभिन्न दर से ऊपर उठता है। समुद्री जल की सतह में यह परिवर्तन घंटे दर घंटे तथा दिन प्रतिदिन होता है। उठते हुए समुद्री जलस्तर के समय, धरातल की ओर बढ़ते हुए जल के प्रवाह को ज्वार या ज्वारीय बाढ़ कहते हैं। कुछ घटों के पश्चात गिरते हुए समुद्री जलस्तर के समय, ज्वारीय जल वापिस चला जाता है। यह भाटा कहलाता है। ज्वारीय बाढ़ उच्च ज्वार है तथा भाटा निम्न ज्वार है। वास्तव में ज्वार-भाटा सबसे बड़ी तरंगे हैं जो महासागरीय जल को गतिशील रखती हैं। नियमित रूप से प्रतिदिन एक निश्चित अन्तराल पर दो बार समुद्री जल ऊपर उठता है और दो बार नीचे बैठता है। महीने में दो बार उच्च ज्वार या ज्वारीय बाढ़ औसत से ऊँचा होता है और भाटा नीचा होता है। ठीक इसी प्रकार से महीने में दो बार ज्वारीय बाढ़ औसत से नीचा होता है और भाटा नीचा होता है।

दो उच्च ज्वारों के बीच अथवा दो निम्न ज्वारों के बीच नियमित अन्तर 12 घंटे 25 मिनट का होता है - न कि ठीक 12 घंटे का। दिन (24 घंटें में) में उच्च ज्वार पिछले दिन की तुलना में 51 मिनट देर से आता है। यह इसलिए होता है; क्योंकि प्रतिदिन चन्द्रमा के निकलने और छिपने में 51 मिनट का विलम्ब हो जाता है। प्रत्येक दिन घूर्णन करती हुई पृथ्वी को उसी देशान्तर को ठीक चन्द्रमा के नीचे लाने में 24 घन्टे 50 मिनट लगते हैं। किसी तट पर ज्वार के आने का समय इन उदाहरणों से स्पष्ट हो जायेगा।
  1. उच्च ज्वार 6.00 पूर्वाह्न
  2. निम्न ज्वार12.13 अपराह्न
  3. उच्च ज्वार 06.25 अपराह्न
  4. निम्न ज्वार12.38 पूर्वाह्न
  5. उच्च ज्वार 06.51 पूर्वाह्न
ज्वार के समय तथा आकार में परिवर्तन के लिए निम्न कारक उत्तरदायी हैं-
  1. सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी की एक दूसरे के संबंध में स्थिति शायद कभी भी एक सरल रेखा में होती हो।
  2. पृथ्वी से सूर्य तथा चन्द्रमा की दूरी स्थिर नहीं होती।
  3. हमारा ग्लोब पूरी तरह से जल से ढका हुआ नहीं है।
  4. तट की आकृति ज्वार के आने में मदद या बाधा बन सकती है। 
इन सबके बावजूद किसी भी तट पर ज्वार एक दूसरे के बाद बड़ी नियमितता के साथ उत्पन्न होते हैं। वे कौन सी शक्तियाँ हैं जो ज्वार-भाटा उत्पन्न करती हैं? पृथ्वी आकर्षित करती है और सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहीय समूहों से प्रभावित होती है। यह शक्ति गुरूत्वाकर्षण है। यह सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी के बीच कार्य करती है। यह महासागरीय जल को गतिशील करके उसमें ज्वारीय धाराएँ उत्पन्न कर देती है। ज्वार-भाटा इस प्रकार गुरूत्वाकर्षण बल के प्रभाव का उदाहरण हैं।

चन्द्रमा और सूर्य दोनों अपने गुरूत्वाकर्षण बल से पृथ्वी को प्रभावित करते हैं। सूर्य चन्द्रमा से आकार में बड़ा होते हुए भी वह चन्द्रमा की तुलना में पृथ्वी से अधिक दूर है। इस कारण चन्द्रमा की गुरूत्वाकर्षण शक्ति सूर्य की तुलना में पृथ्वी पर अधिक प्रभावशाली है। जल तरल होने के कारण चलायमान है। इसलिए पृथ्वी का पानी वाला भाग जब चन्द्रमा के सामने पड़ता है तो चन्द्रमा की गुरूत्वाकर्षण शक्ति के कारण इसमेंजवारीय उभार उत्पन्न हो जाता है। ऐसा ही एक निम्न ज्वारीय उभार पृथ्वी के दूसरी ओर चन्द्रमा से दूर होता है। यह उभार काफी नीचा होता है; क्योंकि यहाँ पर चन्द्रमा का आकर्षण सबसे कम होता है।

वृहत् और लघु ज्वार

चन्द्रमा पृथ्वी के अधिक पास है, इसलिए यह सूर्य की अपेक्षा पृथ्वी पर दुगना गुरूत्वाकर्षण बल डालता है। अमावस्या तथा पूर्णिमा के दिन, जब सूर्य तथा चन्द्रमा एक सीधी रेखा में होते हैं, तो दोनों ही एक ही समय में तथा एक ही दिशा में अपनी गुरूत्वाकर्षण शक्ति का प्रभाव डालते हैं। इनकी संयुक्त शक्ति से जल का उतार-चढ़ाव साधारण उतार-चढ़ाव की अपेक्षा अधिक होता है। इसे वृहत् ज्वार-भाटा कहते हैं। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की अष्ठमी के दिन सूर्य और चन्द्रमा की गुरूत्वाकर्षण शक्ति समकोण पर होती है। इस स्थिति में दोनों का खिंचाव एक ही दिशा में न होकर एक दूसरे के विरुद्ध होता है। दूसरे शब्दों में सूर्य तथा चन्द्रमा एक दूसरे की गुरूत्वाकर्षण शक्ति को कम कर देते हैं। इसके परिणामस्वरूप इन दोनों दिनों में जल का उतार-चढ़ाव साधारण उतार-चढ़ाव की अपेक्षा कम होता है। इसे लघु ज्वार-भाटा कहते हैं।

ज्वार-भाटा के प्रभाव

ज्वार-भाटा उत्पन्न होना एक विश्वव्यापी घटना है। ज्वार-भाटा मनुष्य के लिए ऐतिहासिक काल से बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। ज्वार-भाटा पत्तन को समुद्र से जोड़ते हैं। विश्व के कुछ प्रमुख पत्तन जैसे टेम्स नदी पर लन्दन तथा हुगली नदी पर कोलकाता समुद्र तट से दूर स्थित हैं। ज्वारीय जल इन नदियों में आकर इनमें निक्षेपित तलछट को साफ कर देता है और डेल्टा के विकास को धीमा कर देता है। यह नदियों के ऊपरी मार्ग को भी गहरा कर देता है, जिससे समुद्री जहाज सुरक्षित पत्तन तक पहुँच जाते हैं। कुछ स्थानों पर ज्वारीय बल का प्रयोग विद्युत उत्पादन के स्रोत के रूप में भी किया गया है।

धाराएँ

महासागरीय धारा एक सुस्पष्ट और निश्चित दिशा में काफी लंबी दूरी तक क्षैतिज रूप से बहने वाली महासागरीय जल की एक राशि को कहते हैं। ये नियमित रूप से समुद्र में बहती हैं। धारा की औसत गति 3.2 किलोमीटर से 10 किलोमीटर प्रति घंटा होती है। अधिक गति वाली महासागरीय धाराओं को स्ट्रीम कहते हैं तथा कम गति वाली धाराओं को ड्रिफ्ट कहते हैं। महासागरीय जल धाराओं को मोटे तौर पर दो वर्गों में बाँटा जा सकता है-
  1. वे जल धाराएँ जो विषुवतीय क्षेत्रों से ध्रुवों की ओर बहती हैं तथा जिनका सतही तापमान अधिक होता है, गर्म जल धाराएं कहलाती हैं।
  2. वे जल धाराएँ जो धु्रवीय क्षेत्रा से विषुवतीय क्षेत्रों की ओर बहती हैं तथा जिनका सतही तापमान कम होता है, ठंडी जल धाराएं कहलाती हैं। 
महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति तथा उनके परिसंचरण की प्रकृति इन कारकों पर निर्भर करती हैं-

घनत्व में अन्तर

समुद्री जल का घनत्व हर स्थान पर अलग-अलग होता है। समुद्री जल का यह घनत्व उसके तापमान और लवणता के औसत पर निर्भर करता है। जब जल का तापमान अधिक होता है तो उसका घनत्व कम होता है। इसलिए विषुवतीय क्षेत्रा का कम घनत्व वाला जल धु्रवों की ओर बहता है और धु्रवीय प्रदेशों का अधिक घनत्व वाला ठंडा जल विषुवतीय क्षेत्रों की ओर बहता है। इस प्रकार से ठंडी जल धाराएँ हमेशा धु्रवीय क्षेत्रों से विषुवतीय क्षेत्रों की ओर तथा गर्म जल धाराएँ विषुवतीय क्षेत्रों से धु्रवीय प्रदेशों की ओर बहती है।
महासागरीय जल की लवणता में अन्तर से भी धाराएं उत्पन्न होती हैं। यदि जल में लवणता अधिक है, तो उस जल का घनत्व बढ़ जाता है तथा जल नीचे बैठ जाता है। इसलिए कम लवणता वाला जल अधिक लवणता वाले जल के ऊपर बहता है, जबकि उसके नीचे अधिक लवणता वाला जल कम घनत्व वाले जल की ओर बहता है। लवणता में अन्तर से बनने वाली जल धाराएं कम लवणता वाले अटलांटिक महासागर तथा अधिक लवणता वाले भूमध्य सागर के बीच पायी जाती है।

पृथ्वी की घूर्णन गति

पृथ्वी की घूर्णन गति उत्तरी गोलार्द्ध में हवा को दार्इं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में हवा को बांर्इं ओर मोड़ देती है। इसी प्रकार महासागरीय जल भी कोरिओलिस बल से प्रभावित होता है और धाराएँ फैरेल के नियम का अनुसरण करती हैं। अत: उत्तरी गोलार्द्ध में सभी महासागरीय धाराएँ दक्षिणावर्त दिशा या घड़ी की सुइयों के घूमने की दिशा में बहती हैं और दक्षिणी गोलार्द्ध में ये धाराएँ वामावर्त दिशा या घड़ी की सुइयों के घूमने की उल्टी दिशा में बहती हैं।

भूमंडलीय पवनें

भूमंडलीय पवनें जैसे व्यापारिक पवनें एवं पछुआ पवनें, महासागरीय जल को लगातार प्रवाहित करती रहती हैं। अगर हम भूमंडलीय पवनों की तुलना महासागरीय जल धाराओं से करें तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि जल धाराएँ भूमंडलीय पवनों की मुख्य दिशा का अनुसरण करती हैं। निम्न अक्षांशों वाले क्षेत्रों में अर्थात व्यापारिक पवनों के क्षेत्रा में जल धाराओं के प्रवाह की दिशा मानसूनी पवनों की दिशा में परिवर्तन के साथ बदल जाती है।

अटलांटिक महासागर की धाराएँ

विषुवत रेखा के उत्तर व दक्षिण दिशा में, पश्चिम की ओर प्रवाहित होने वाली दो धाराएँ हैं उत्तर एवं दक्षिण विषुवतीय धारा। इन दोनों विषुवतीय धाराओं के बीच पश्चिम सेपूर्व की ओर विरूद्ध विषुवतीय धारा बहती है। (चित्रा संख्या 8.10 में देखिए) यह विरूद्ध धारा उत्तरी तथा दक्षिणी विषुवतीय धाराओं द्वारा महासागर के पूर्व में हटाए गये जल की आपूर्ति करती है।

ब्राजील के साओ रौक अन्तरीप के निकट दक्षिणी विषुवतीय धारा दो शाखाओं में बँट जाती है। इसकी उत्तरी शाखा उत्तरी विषुवतीय धारा में मिल जाती है। इस सम्मिलित धारा का कुछ भाग कैरेबियन सागर तथा मैक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करता है तथा शेष भाग वेस्ट इंडीज द्वीप समूह के पूर्वी किनारे पर अन्टाईल्स धारा के रूप में बहती हुई गुजरती है। जो शाखा मेक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करती है, वह फ्लोरिडा जलडमरूमध्य से निकलकर अन्टाईल्स की धारा में मिल जाती है। यह सम्मिलित धारा संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी पूर्वी तट के सहारे बहने लगती है। इसे हटेरस अन्तरीप तथा फ्लोरिडा धारा कहते हैं। हटेरस अन्तरीप से न्यू फाउण्डलैंड के समीप स्थित ग्रेंड बैंक तक इस धारा को गल्फ स्ट्रीम कहते हैं। ग्रेंड बैंक से गल्फ स्ट्रीम पछुआ पवनों और पृथ्वी की घूर्णन गति के सम्मिलित प्रभाव के कारण पूर्व की ओर मुड़ जाती है। यह अटलांटिक महासागर को पूर्व की ओर बहते हुए पार करती है। इसे उत्तरी अटलांटिक अपवाह कहते हैं।

उत्तरी अटलांटिक अपवाह महासागर के पूर्वी भाग में पहुँचकर दो भागों में बंट जाता है। इसकी उत्तरी शाखा उत्तरी अटलांटिक अपवाह के रूप में बहती रहती है। यह ब्रिटिश द्वीप समूह पहुँचकर वहाँ से नार्वे के तट के साथ बहते हुए यह नार्वे धारा के रूप में जानी जाती है। वहाँ से यह आर्कटिक महासागर में प्रवेश कर जाती है। दक्षिणी शाखा स्पेन तथा एजोर्स द्वीप के मध्य से दक्षिण की ओर बहती है। यहाँ इसे केनारी धारा कहते हैं। यह एक ठंडी जलधारा है। केनारी धारा अंत में उत्तरी विषुवतीय धारा में मिल जाती है। उत्तरी अटलांटिक महासागर में धाराओं के चक्र के बीच में सारगेसो समुद्र का शांत क्षेत्रा है जो अत्याधिक समुद्री शैवालों से भरा हुआ है। ये समुद्री शैवाल जो भूरे रंग के हैं, सरगैसम के नाम से जाने जाते हैं।

उत्तरी अटलांटिक महासागर में धाराओं के दक्षिणावर्ती परिसंचरण के अतिरिक्त दो ठंडी धारायें भी इस महासागर में बहती हैं। ये हैं - पूर्वी ग्रीनलैंड धारा तथा लेब्राडोर धारा। ये धाराएँ आर्कटिक महासागर से अटलांटिक महासागर में बहती है। लेब्राडोर धारा कनाडा के पूर्वी तट पर दक्षिण की ओर बहती हुई गर्म गल्फ स्ट्रीम धारा से मिलती है। (चित्रा संख्या 8.10 को देखिए) भिन्न तापमान वाली इन दो धाराओं (एक ठंडी तथा दूसरी गर्म) के संगम से न्यू फाउंडलैण्ड के चारो ओर कोहरे का निर्माण होता है और इसे संसार का सबसे अधिक महत्वपूर्ण मत्स्य ग्रहण क्षेत्रा बनाता है। पूर्वी ग्रीनलैंड धारा आइसलैंड और ग्रीनलैंड के बीच बहती है तथा संगम स्थल पर उत्तरी अटलांटिक अपवाह के तापमान को कम कर देती है।

हम पहले ही पढ़ चुके हैं कि दक्षिणी विषुवतीय धारा ब्राजील के साओ रोक अन्तरीप के निकट दो शाखाओं में बंट जाती है। इसकी उत्तरी शाखा उत्तरी विषुवतीय धारा से मिल जाती है और दक्षिणी शाखा दक्षिण की ओर मुड़कर दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तट के साथ-साथ बहती है। इसे ब्राजील धारा कहते हैं। लगभग 350 दक्षिणी अक्षांश पर ब्राजील धारा को पछुआ पवनें तथा पृथ्वी की घूर्णन गति पूर्व की ओर मोड़ देती है, जहाँ यह पश्चिमी पवन अपवाह में मिल जाती है। आशा अन्तरीप के निकट दक्षिण अटलांटिक धारा उत्तर की ओर मुड़ जाती है। यह एक ठंडी जलधारा है और इसे बैंगुएला धारा कहते हैं। अन्त में यह दक्षिणी विषुवतीय धारा से मिलकर धाराओं के चक्र को पूरा करती है। एक और ठंडी जल धारा दक्षिणी अमरीका के दक्षिण-पूर्वी तट के सहारे दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है, जिसे फाकलैंड धारा कहते हैं।

प्रशान्त महासागर की धाराएँ

यह देखा जा सकता है कि प्रशान्त महासागर में भी धाराओं का एक वृहद् चक्रीय तंत्रा पाया जाता है, जो कि उत्तरी गोलार्द्ध में दक्षिणावर्त (घड़ी की सुई की दिशा में) व दक्षिणी गोलार्द्ध में वामावर्त (घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में) है।

प्रशान्त महासागर के विषुवतीय भाग में दो विषुवतीय धाराएँ मध्य अमेरिका के तट से महासागर के आर-पार बहती हैं। इन दोनों-उत्तरी विषुवतीय धारा तथा दक्षिणी विषुवतीय धारा के बीच पश्चिम से पूर्व की ओर एक विरूद्ध विषुवतीय धारा बहती है। उत्तरी विषुवतीय धारा उत्तर की ओर मुड़ती है और क्यूरो-सिवो धारा के नाम से फिलीपीन द्वीप समूह, ताईवान तथा जापान के तटों के साथ-साथ बहती है। जापान के दक्षिणी-पूर्वी तट पर यह धारा पछुआ पवनों की चपेट में आकर महासागर के आर-पार पश्चिम से पूर्व दिशा में उत्तरी प्रशांत धारा के नाम से बहती है। उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट पर पहुँचकर यह धारा दो शाखाओं में बंट जाती है। इसकी उत्तरी शाखा ब्रिटिश कोलंबिया तथा अलास्का के तटों के साथ वामवर्ती दिशा में बहती है तथा अलास्का धारा के नाम से जानी जाती है। इस धारा का गर्म जल शीत ऋतु में अलास्का तट को बर्फ मुक्त रखता है। उत्तरी प्रशांत महासागरीय धारा की दूसरी शाखा कैलीफोर्निया तट के साथ दक्षिण की ओर बहती है। यह ठंडी जलधारा है और इसे कैलीफोर्निया धारा कहते हैं। अंत में यह धारा उत्तरी विषुवतीय धारा में मिलकर अपना चक्र पूरा करती है। प्रशांत महासागर के उत्तरी भाग में दो ठंडी जल धाराएँ भी बहती है। ये हैं- ओया शिओ धारा और आखोटस्क धारा। ठंडी ओया-शिओ धारा कमचटका प्रायद्वीप के तट के साथ बहती है। दूसरी ठंडी धारा ओखोटस्क धारा है जो सखालीन के पास बहती हुई होकेडो द्वीप के निकट ओया-शिओ धारा में मिल जाती है। ओया-शिओ धारा अंत में क्यूरो-सिवो धारा में मिल जाती है और उत्तरी प्रशांत महासागरीय धारा के गर्म जल के नीचे डूब जाती है। दक्षिणी प्रशांत महासागर में दक्षिणी विषुवतीय धारा पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और पूर्वी आस्ट्रेलियाई धारा के नाम से दक्षिण की ओर मुड़ जाती हैं। आगे चलकर यह तस्मानिया के निकट ठंडी दक्षिणी प्रशांत महासागरीय धारा में मिल जाती है जो पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। दक्षिण अमेरिका के दक्षिण-पश्चिम तट पर पहुँचकर यह उत्तर की ओर मुड़ जाती है। इसे पेरू धारा कहते हैं। यह एक ठंडी जलधारा है। अन्त में यह दक्षिणी विषुवतीय धारा में मिलकर एक चक्र पूरा करती है। पेरू धारा का ठंडा जल ही चिली एवं पेरू के तटों को वर्षा विहीन बनाने के लिए कुछ हद तक उत्तरदायी है।

हिन्द महासागर धाराएँ

हिन्द महासागर की धाराओं के परिसंचरण का प्रतिरूप अटलांटिक महासागर एवं प्रशांत महासागर की धाराओं से भिन्न है। क्योंकि हिन्द महासागर उत्तर में पूर्वत: स्थल से घिरा है। इसके दक्षिणी भाग में धाराओं के परिसंचरण का सामान्य प्रतिरूप वामवर्ती है जैसा कि अन्य महासागरों में है। लेकिन इसके उत्तरी भाग में धाराएँ शीतु ऋतु एवं ग्रीष्म ऋतु में स्पष्ट रूप से अपनी दिशाएँ पूर्णतया बदल लेती हैं। ये धाराएँ पूर्णत: बदलते हुए मानसूनी मौसम के प्रभाव में हैं। इसलिए शीत ऋतु एवं ग्रीष्म ऋतु में धाराएँ उलट जाती है अर्थात उत्तरी-पूर्वी मानसून के दौरान इनकी दिशा दक्षिण-पश्चिम की ओर होती है, दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान उत्तर-पूर्व की ओर तथा संक्रमण काल में अस्थिर होती है।

शीत ऋतु में श्रीलंका बंगाल की खाड़ी की धाराओं को अरब सागर से धाराओं को अलग कर देता है। श्रीलंका के ठीक दक्षिण में उत्तरी विषुवतीय धारा और दक्षिणी विषुवतीय धारा पश्चिम की ओर बहती है। उत्तरी विषुवतीय धारा और दक्षिणी विषुवतीय धारा के मध्य एक विरूद्ध विषुवतीय धारा पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। इस समय इसके उत्तरी भाग में बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के जल को उत्तरी पूर्वीमानसून प्रभावित करता है तथा उन्हें वामवर्ती दिशा में प्रवाह के लिए प्रेरित करती है। इस जलधारा को उत्तरी-पूर्वी मानसूनी अपवाह कहते है। ग्रीष्म ऋतु में वही उत्तरी भाग दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के प्रभाव में आ जाता है। बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर का जल पूर्व की ओर बहने लगता है। इस समय जल का परिसंचरण दक्षिणवर्ती या घड़ी की सुइयों की अनुकूल दिशा में होता है। इस धारा को दक्षिण-पश्चिम मानसून अपवाह कहते हैं। सामान्यत: ग्रीष्म ऋतु की धाराएँ शीत ऋतु की धाराओं से अधिक नियमित हैं।

हिन्द महासागर के दक्षिणी भाग में विषुवतीय धारा पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है। अफ्रीका के मोजेंबिक तट के निकट यह धारा दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। इस धारा का एक भाग अफ्रीका की मुख्य भूमि और मेडागास्कर द्वीप के मध्य बहता है। इसे गर्म मोजांबिक धारा कहते हैं। दक्षिण की ओर बढ़ने पर यह दक्षिणी विषुवतीय धारा की उस शाखा से मिल जाती है जो मेडागास्कर के तट के साथ बहती है। इस संगम के बाद इसे अगुल्हास धारा कहते हैं। इसके बाद यह पूर्व की ओर मुड़ जाती है और पश्चिमी पवन अपवाह में मिल जाती है।

पश्चिमी पवन अपवाह उच्च अक्षांशों में महासागर के आर-पार पश्चिम से पूर्व दिशा में बहता हुआ आस्ट्रेलिया के दक्षिणी तट तक पहुँचता है। इस धारा की एक शाखा उत्तर की ओर मुड़कर आस्ट्रेलिया के पश्चिम तट के साथ-साथ बहने लगती है। इसे पश्चिमी आस्ट्रेलियाई धारा कहते हैं। यह ठंडी जलधारा हैं। अंत में पश्चिमी आस्ट्रेलियाई धारा दक्षिणी विषुवतीय धारा से मिलकर चक्र पूरा करती है।

महासागरीय धाराओं के प्रभाव

जलवायु पर प्रभाव

महासागरीय धाराएँ तापमान, दाब, वायु एवं वर्षण के वितरण को नज़दीकी से प्रभावित करती हैं, जिसका प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समाज एवं अर्थव्यवस्था, विशेषत: तटीय प्रदेशों में रहने वालों पर पड़ता है। सागरीय धाराओं के कुछ प्रमुख प्रभाव इस प्रकार हैं-
जलधाराएँ अधिक तापमान वाले क्षेत्रों से कम तापमान वाले क्षेत्रों की ओर तथा इसके विपरीत कम तापमान वाले क्षेत्रों से अधिक तापमान वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ती हैं। जब ये धाराएँ एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बहती हैं तो ये उन क्षेत्रों के तापमान को प्रभावित करती हैं। किसी भी जलराशि के तापमान का प्रभाव उसके ऊपर की वायु पर पड़ता है। इसी कारण विषुवतीय क्षेत्रों से उच्च अक्षांशों वाले ठंडे क्षेत्रों की ओर बहने वाली जलधाराएँ उन क्षेत्रों की वायु के तापमान को बढ़ा देती है। उदाहरणार्थ, गर्म उत्तरी अटलांटिक अपवाह जो उत्तर की ओर यूरोप के पश्चिम तट की ओर बहती है। यह ब्रिटेन और नार्वे के तट पर शीत ऋतु में भी बर्फ नहीं जमने देती। जलधाराओं का जलवायु पर प्रभाव और अधिक स्पष्ट हो जाता है, जब आप समान अक्षांशों पर स्थित ब्रिटिश द्वीप समूह की शीत ऋतु की तुलना कनाडा के उत्तरी पूर्वी तट की शीत ऋतु से करते हैं। कनाडा का उत्तरी-पूर्वी तट लेब्राडोर की ठंडी धारा के प्रभाव में आ जाता है। इसलिए यह शीत ऋतु में बर्फ से ढका रहता है।

जब ठंडी और गर्म जलधाराएँ आपस में मिलती है तो ये कोहरा उत्पन्न कर देती हैं। उदाहरण के लिए, जब गल्फ स्ट्रीम की धारा न्यूफाउंडलैंड के निकट लेब्राडोर की धारा से मिलती है तो कोहरा उत्पन्न हो जाता है। ये तूफान आने के लिए भी अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं। न्यूफाउंडलैड में हरीकेन और जापान में टाइफून आने का कारण शायद गर्म और ठंडी धाराओं का मिलन है।

समुद्री जीवन का प्रभाव

तापमान का समुद्री जीवन पर भी बहुत प्रभाव पड़ता है। ये समुद्री वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं के प्रकार को निर्धारित करती हैं। जहाँ गर्म और ठंडी जल धाराएँ मिलती हैं, वे विश्व के अत्याधिक महत्वपूर्ण मत्स्य ग्रहण क्षेत्रा हैं। धाराओं के रूप में महासागरीय जल के संचरण के कारण समुद्री जीव-जन्तु पूरे महासागर में फैल जाते हैं।

व्यापार पर प्रभाव

जलधाराओं का व्यापार पर भी प्रभाव पड़ता है। उच्च अक्षांशों में स्थित पत्तनों और बन्दरगाहों में जो गर्म, जल धाराओं के प्रभाव में होते हैं, बर्फ नहीं जमती और वहाँ पूरे वर्ष व्यापारिक गतिविधियाँ चलती रहती हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर-पश्चिमी यूरोप के पत्तन पूरे वर्ष खुले रहते हैं, जबकि कनाडा का क्यूबैक पत्तन शीत ऋतु में बर्फ से ढक जाता है।

मनुष्य के लिए महासागरों का महत्व

हम सभी इस तथ्य से अच्छी तरह से परिचित हैं कि पृथ्वी के धरातल का 71 प्रतिशत भाग सागर और महासागरों से घिरा हुआ है। महासागर हमारे पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण भाग हैं और ये मनुष्य तथा उसके कार्यकलापों पर पूर्ण प्रभाव डालते हैं।

महासागर जलवायु के संशोधक के रूप में

महासागरों का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है-जलवायु को संशोधित या परिवर्तित करना। ;पद्ध महासागरों की अथाह जलराशि बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा का संग्रह करती है। इसी कारण महासागरों को ‘‘सौर ऊर्जा का बचत बैंक’’ कहा जाता है। ये अधिक सूर्यातप वाले मौसम में इस ऊर्जा को जमा कर लेते हैं और आवश्यकता वाले मौसम में उसका भुगतान करते हैं। महासागरों का विशाल गहरा जल पृथ्वी के धरातल की अपेक्षा धीरे-धीरे ऊष्मा अवशोषित करता है और धीरे-धीरे ही विकरित करता है। सूर्यातप की एक ही समान मात्रा जलीय धरातल की अपेक्षा स्थलीय धरातल को शीघ्रता से और अधिक गर्म कर देती है। जलीय और स्थलीय तापमान में अन्तर के कारण ही समुद्रतटीय क्षेत्रों और आन्तरिक स्थलीय क्षेत्रों में तापमान में अन्तर होता है।
  1. महासागर वायुमंडल को जलवाष्प प्रदान करते हैं। ये पृथ्वी पर कुल वर्षण के लिए मूल स्रोत हैं। ये पृथ्वी पर स्वच्छ जल का भी मुख्य स्रोत हैं। 
  2. महासागरीय जल धाराएँ पृथ्वी के धरातल पर महत्वपूर्ण तापमान नियंत्रक है। जल धाराएँ निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों में ऊष्मा के विनिमय में सहायता करती हैं। इस तरह से ये विश्व में ऊर्जा के संतुलन को बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। स्थानीय स्तर पर गर्म महासागरीय धाराएँ उच्च अक्षांशों के तटवर्ती क्षेत्रों की जलवायु को मृदुल बना देती है, जबकि ठंडी धाराएँ उष्णकटिबन्धीय मरूस्थल के तटवर्ती क्षेत्रों के तापमान को कम कर देती हैं।
  3. महासागर पृथ्वी पर वायुदाब और प्रचलित पवन तंत्रा के वितरण को भी बहुत सीमा तक नियंित्रत करते हैं। महासागरीय धरातल पर उच्च दाब के छ: या छ: से अधिक स्थाई केन्द्र हैं। यही केन्द्र भूमंडलीय पवन तंत्रा को नियंित्रत करते हैं। ये भूमंडलीय पवनें पृथ्वी के धरातल पर वर्षा की मात्रा और उसके वितरण को नियंित्रत करती हैं। पछुआ पवनें गर्म उत्तरी अटलांटिक अपवाह से आर्द्रता ग्रहण करके पश्चिमी यूरोप के तटवर्ती क्षेत्रों में वर्षा करती है।

महासागर तथा संसाधन

मानव के लिए महासागर खाद्य-पदार्थ तथा अन्य मूल्यवान वस्तुओं के लिए हमेशा से बड़े स्रोत रहे हैं। समुद्री पौधे और जीव जन्तु मिलकर एक विशाल संसाधन हैं, जिनसे मनुष्य को खाद्य सामग्री, कृषि के लिए उर्वरक तथा कई उद्योगों के लिए कच्चा माल प्राप्त होता है। मछली और अन्य समुद्री जीव जन्तु मनुष्य के भोजन का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। मानव समाज की उन्नति तथा बढ़ती जनसंख्या के कारण मनुष्य की महासागरों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। पूरे संसार में आज मछली मनुष्य के भोजन के कुल जन्तु प्रोटीन का 10 प्रतिशत भाग प्रदान करती है।

महासागर और खनिज संसाधन

महासागर अनेक उपयोगी धात्विक तथा अधात्विक खनिजों के भंडार हैं। महाद्वीपीय निमग्न तट के खनिज तेल भंडार महासागरों में पाए जाने वाले सभी खनिजों से महत्वपूर्ण हैं। आज ऊर्जा के भूखे विश्व में, खनिज तेल की सबसे अधिक माँग है। खनिज तेल के विशाल भंडार उत्तरी सागर, दक्षिणी कैलीफोर्निया के तट पर, भूमध्यसागर, फारस की खाड़ी, और अरब सागर में बम्बई हाई में पाए गए हैं। साधारण नमक (सोडियम क्लोराइड) समुद्र के जल से ही प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त मैग्नेशियम एवं ब्रोमीन बहुत समय से समुद्र के जल से प्राप्त किये जाते रहे हैं। समुद्र के जल में सभी प्रकार के धात्विक खनिज जाते हैं। लेकिन समुद्र के जल और तलछट में जिंक, ताँबा, चाँदी और सोना काफी मात्रा में पाया जाता है। ये धातुयें मुख्य रूप से महासागरीय पहाड़ी के ज्वालामुखी क्षेत्रों में पायी जाती हैं। इन खनिजों को समुद्री जल से निकालने की तकनीक अभी तक पूरी तरह से विकसित नहीं हुई है। महासागरों के अधस्तल में पाए जाने वाले मुख्य खनिज मेंगनीज़ और फॉसफोराइट हैं।

महासागर और ऊर्जा

महासागर में ऊर्जा संसाधन विभिन्न रूपों में पाए जाते हैं जैसे ज्वारीय ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा तथा महासागरीय जल के तापमान से प्राप्त ऊर्जा। 12 वीं शताब्दी में भी ज्वारीय ऊर्जा का उपयोग किया जाता था। उस समय गेहूँ पीसने के लिए ज्वारीय जल से चलने वाली चक्की का प्रयोग किया जाता था। आजकल विद्युत केन्द्रों में इस ज्वारीय शक्ति के प्रयोग करने के प्रयत्न किए जा रहे हैं। किन्तु ज्वारीय शक्ति के प्रयोग में कुछ समस्याएँ भी हैं। जैसे ज्वार-भाटा का क्रम नियमित नहीं है। फिर भी रूस, फ्रांस और जापान में ज्वारीय शक्ति के कुछ केन्द्र सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं।

महासागरों में भूतापीय ऊर्जा उन स्थानों से प्राप्त की जा सकती है जो सक्रिय ज्वालामुखी के क्षेत्रा हैं। तटीय क्षेत्रों में विद्युत उत्पादन के लिए भूतापीय ऊर्जा का भविष्य में व्यापक उपयोग संभव है। भूतापीय ऊर्जा का विकास संयुक्त राज्य अमेरिका, मेक्सिको तथा न्यूजीलैंड में कर लिया गया है।

महासागरीय परिवहन तथा व्यापार

कुछ वर्ष पहले तक महासागर महाद्वीपों को एक दूसरे से पृथक करने वाले अवरोध माने जाते थे; लेकिन अब ये उनके बीच परस्पर संबंध की कड़ी समझे जाते हैं। वे कम कीमत पर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए प्राकृतिक मार्ग उपलब्ध कराते हैं। वे भारी वस्तुओं को लाने ले जाने में सहायता करते हैं। जल उत्प्लावक होता है और इसे कम प्रेरक शक्ति की आवश्यकता होती है। अत: महासागर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए वरदान सिद्ध हुए हैं।

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