मैदान के प्रकार एवं मैदानों का आर्थिक महत्व

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धरातल पर पायी जाने वाली समस्त स्थलाकृतियों में मैदान सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं।
अति मंद ढाल वाली लगभग सपाट या लहरिया निम्न भूमि को मैदान कहते हैं। मैदान
धरातल के लगभग 55 प्रतिशत भाग पर फैले हुए हैं। संसार के अधिकांश मैदान नदियों
द्वारा लाई गई मिट्टी से बने हैं। मैदानों की औसत ऊँचाई लगभग 200 मीटर होती है।
नदियों के अलावा कुछ मैदानों का निर्माण वायु, ज्वालामुखी और हिमानी द्वारा भी होता
है।

मैदान के प्रकार

संरचनात्मक मैदान 

इन मैदानों का निर्माण मुख्यत: सागरीय तल अर्थात्
महाद्वीपीय निमग्न तट के उत्थान के कारण होता है। ऐसे मैदान प्राय: सभी
महाद्वीपों के किनारों पर मिलते हैं। मैक्सिको की खाड़ी के सहारे फैला संयुक्त
राज्य अमेरिका का दक्षिणी पूर्वी मैदान इसका उदाहरण है। भूमि के नीचे धंसने
के कारण भी संरचनात्मक मैदानों का निर्माण होता है। आस्ट्रेलिया के मध्यवर्ती
मैदान का निर्माण इसी प्रकार हुआ है।

अपरदन द्वारा बने मैदान 

पृथ्वी के धरातल पर निरन्तर अपरदन की प्रक्रिया
चलती रहती है, जिससे दीर्घकाल में पर्वत तथा पठार नदी, पवन और हिमानी
जैसे कारकों द्वारा घिस कर मैदानों में परिणत हो जाते हैं। इस प्रकार बने मैदान
पूर्णत: समतल नहीं होते। कठोर शैलों के टीले बीच-बीच में खड़े रहते हैं। उत्तरी
कनाडा एवं पश्चिमी साइबेरिया का मैदान अपरदन द्वारा बने मैदान हैं। अपरदन
द्वारा बने मैदानों को समप्राय भूमि/पेनीप्लेन भी कहते हैं।

निक्षेपण द्वारा बने मैदान 

ऐसे मैदानों का निर्माण नदी, हिमानी, पवन आदि
तथा संतुलन के कारकों द्वारा ढोये अवसादों से झील या समुद्र जैसे गर्तों के
भरने से होता है। जब मैदानों का निर्माण नदी द्वारा ढोये गये अवसादों के
निक्षेपण से होता है तो उसे नदीकृत या जलोढ़ मैदान कहते हैं। भारतीय
उपमहाद्वीप का सिन्धु-गंगा का मैदान, उत्तरी चीन में àाँगहो का मैदान, इटली
में पो नदी द्वारा बना लोम्बार्डी का मैदान और बाँग्लादेश का गंगा ब्रह्मपुत्रा का
डेल्टाई मैदान जलोढ़ मैदानों के विशिष्ट उदाहरण हैं। जब मैदानों का निर्माण
झील में अवसादों के निक्षेपण से होता है तो उसे सरोवरी या झील मैदान
कहते हैं। कश्मीर और मणिपुर की घाटियाँ भारत में सरोवरी मैदानों के
उदाहरण हैं।

जब मैदान का निर्माण हिमानी द्वारा ढोये पदार्थों के निक्षेपण से होता है तो उसे
हिमानी कृत या हिमोढ़ मैदान कहते हैं। कनाडा और उत्तरी-पश्चिमी यूरोप
के मैदान हिमानी कृत मैदानों के उदाहरण हैं।

जब निक्षेपण का प्रमुख कारक पवन होती है तो लोयस मैदान बनते हैं।
उत्तरी-पश्चिमी चीन के लोयस मैदान का निर्माण पवन द्वारा उड़ाकर लाये गए
सूक्ष्म धूल कण के निक्षेपण से हुआ है।

मैदानों का आर्थिक महत्व

मैदानों ने मानव जीवन को इस प्रकार से प्रभावित किया है:

  1. उपजाऊ मृदा – मैदानों की मृदा सबसे अधिक उपजाऊ तथा गहरी होती है।
    समतल होने के कारण सिंचाई के साधनों का पर्याप्त विकास हुआ है। इन दोनों
    के कारण मैदानों में कृषि सर्वाधिक विकसित है। इसीलिये मैदानों को ‘संसार
    का अन्न भंडार’ कहा जाता है।
  2. उद्योगों का विकास – समतल, उपजाऊ एवं सिंचाई की सुविधाओं के कारण
    मैदानों में कृषि प्रधान उद्योगों का विकास हुआ है। जिससे लोगों को रोजगार
    मिलता है तथा राष्ट्रीय उत्पादन तथा प्रति व्यक्ति आय बढ़ती है। अधिक
    जनसंख्या के कारण कृषि तथा उद्योगों के लिए सस्ते श्रमिक मिल जाते हैं।
    (3) यातायात की सुविधा – मैदानों का तल समतल होने के कारण यहाँ आवागमन
    के साधनों – रेलमार्गों, सड़को, हवाई अड्डों आदि का बनाना सुविधाजनक होता
    है।
  3. सभ्यताओं के केन्द्र – मैदान प्राचीन एवं आधुनिक सभ्यताओं के केन्द्र हैं। विश्व
    की प्रमुख नदी घाटी सभ्यताओं का उद्भव मैदानों में ही हुआ है। सिंधु घाटी की
    सभ्यता और नील घाटी सभ्यता इसके उदाहरण हैं।
  4. नगरों की सभ्यता – रेल, सड़क तथा नदियों द्वारा यातायात की सुविधाओं तथा
    कृषि और उद्योगों के विकास ने नगरों की स्थापना और विकास को प्रोत्साहित
    किया। मैदानों में विश्व के सबसे विकसित व्यापारिक नगर और पत्तन स्थित हैं।
    रोम, टोकियों, कोलकाता, यंगून (रंगून), कानपुर तथा पेरिस आदि नगर मैदानों में
    ही स्थित हैं।

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