पर्वत के प्रकार एवं पर्वतों का आर्थिक महत्व

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धरातल पर विद्यमान तीन विस्तृत स्थलरूप पर्वत, पठार और मैदान हैं जो भूपर्पटी के विरूपण का परिणाम हैं। इनमें से पर्वत सबसे रहस्यमयी रचना है। पर्वतों द्वारा पृथ्वीकी सम्पूर्ण सतह का 27 प्रतिशत भाग घिरा हुआ है। पर्वत पृथ्वी की सतह के ऊपर उठे हुये वे भाग हैं, जो आसपास की भूमि से बहुत ऊँचे हैं। परन्तु धरातल के सभी ऊपर उठे हुये भाग पर्वत नहीं कहलाते। किसी भी स्थलरूप को पहचानने के लिये ऊँचाई और ढाल दोनों को सम्मिलित किया जाता है। इस नाते तिब्बत की ऊपर उठी हुई भूमि पर्वत नहीं कहलाती यद्यपि उसकी ऊँचाई समुद्र तल से 4500 मीटर है।यह ध्यान रखने योग्य बात है कि एक पर्वत श्रेणी के बनने में लाखों वर्ष लगते हैं। इस लम्बी अवधि में आन्तरिक बल भूमि को ऊपर उठाने में व्यस्त रहते हैं तो इसके विपरीतबाह्य बल इस ऊपर उठी भूमि को काटने-छाँटने या अपरदित करने में जुटे रहते हैं। माउन्ट एवरेस्ट जैसे ऊँचे एक पर्वत शिखर का निर्माण तब ही हो पाता है जबआन्तरिक बलों का पर्वत निर्माणकारी या जमीन को ऊपर उठाने वाला कार्य बाह्य बलोंके अपरदन कार्य की अपेक्षा अधिक द्रुत गति से होता है। अत: पर्वतधरातल के ऊपर उठे हुए वे भू-भाग हैं, जिनके ढाल तीव्र होते हैं और समुद्र तल सेलगभग 1000 मीटर से अधिक ऊँचे होते हैं। पर्वतों की समुद्र की सतह से सामान्य ऊँचाई हजार मीटर से अधिक मानी जाती है। स्थानीय उच्चावच लक्षणों में पर्वत ही एक ऐसा स्थलरूप है, जिसके उच्चतम और निम्नतम भागों के बीच सर्वाधिक अन्तर होता है।

पर्वत के प्रकार

निर्माण क्रिया के आधार पर पर्वतों को चार भागों में वर्गीकृत किया जाता है:

  1. वलित पर्वत,
  2. खंड पर्वत,
  3. ज्वालामुखी पर्वत और
  4. अवशिष्ट पर्वत

वलित पर्वत

पृथ्वी की आन्तरिक हलचलोंके कारण परतदार शैलों में वलन पड़ते हैं। वलित परतदार शैलों के ऊपर उठनेके परिणामस्वरूप बनी पर्वत श्रेणियों को वलित पर्वत कहते हैं। वलित परतदारशैलों पर लाखों वर्षों तक आन्तरिक क्षैतिज संपीडन-बल लगे रहते हैं तो वे मुड़जाती हैं और उनमें उद्वलन तथा नतवलन पड़ जाते हैं। कालान्तर में येअपनतियों और अभिनतियों के रूप में विकसित हो जाते हैं। इस प्रकार कीहलचलें समय-समय पर होती रहती हैं और जब वलित शैलें बहुत ऊँचाई प्राप्तकर लेती हैं तो वलित पर्वतों का जन्म होता है।

एशिया के हिमालय, यूरोप के आल्प्स, उत्तर अमरीका के रॉकी और दक्षिणअमरीका के एंडीज संसार के प्रमुख वलित पर्वत हैं (चित्रा 7.1)। इन पर्वतों कानिर्माण अत्यन्त आधुनिक पर्वत निर्माणकारी युग में हुआ है, अत: ये सभी नवीनवलित पर्वतों के नाम से जाने जाते हैं। इनमें से कुछ पर्वत श्रेणियाँ जैसेहिमालय पर्वत अब भी ऊपर उठ रहे हैं।

खंड पर्वत

खंड पर्वत का निर्माण भी पृथ्वी की आन्तरिक हलचलों के कारणहोता है। जब परतदार शैलों पर तनाव-बल लगते हैं तो उनमें दरार या भ्रंशपड़ जाते हैं। जब लगभग दो समान्तर भ्रंशों के बीच की भूमि आसपास की भूमिकी तुलना में काफी ऊपर उठ जाती है तो उस ऊपर उठी भूमि को खंड पर्वतया भ्रंशोत्थ पर्वत या भ्रंश-खंड पर्वत कहते हैं। खंड पर्वत का निर्माण उसपरिस्थिति में भी होता है, जब दोनों भ्रंशों के बाहर की भूमि नीचे बैठ जाती हैऔर भं्रशों के बीच की भूमि उठी रह जाती है। खंड पर्वत को होस्र्ट भी कहतेहैं।

ज्वालामुखी पर्वत

हमने पिछले पाठ में पढ़ा है कि पृथ्वी का आन्तरिक भाग याभूगर्भ बहुत गर्म है। भूगर्भ के गहरे भागों में अत्याधिक तापमान के कारण ठोसशैलें द्रव-मैग्मा में बदल जाती हैं। जब यह पिघला शैल-पदार्थ ज्वालामुखी केउद्गार में भूगर्भ से धरातल पर आता है तो वह मुख के चारों ओर इकट्ठा होजाता है और जमकर शंकु का रूप धारण कर सकता है। ज्वालामुखी के प्रत्येकउद्गार के साथ इस शंकु की ऊँचाई बढ़ती जाती है और इस प्रकार वह पर्वतका रूप ले लेता है। पर्वत, जो ज्वालामुखी से निकले पदार्थों के जमा होने से बनेहैं उन्हें ज्वालामुखी पर्वत या संग्रहित पर्वत कहते हैं। (देखें चित्रा 7.3द्ध हवाईद्वीपों का मोनालुआ; म्यानमार (बर्मा) का माउन्ट पोपा, इटली का विसूवियस,इक्वेडोर का कोटोपैक्सी तथा जापान का फ्यूजीयामा ज्वालामुखी पर्वतों केउदाहरण हैं।

अवशिष्ट पर्वत

अपक्षय तथा अपरदन के विभिन्न कारक – नदियाँ, पवन,हिमानी आदि धरातल पर निरन्तर कार्य करते रहते हैं। वे भूपर्पटी की ऊपरीसतह को कमजोर करने के साथ उसे काटते-छाँटते रहते हैं। जैसे ही धरातलपर किसी-पर्वत श्रेणी का उद्भव होता है तो क्रमण के कारक अपरदन द्वाराउसे नीचा करना शुरू कर देते हैं। अपरदन कार्य शैलों की बनावट पर बहुतनिर्भर करता है। हजारों वर्षों के बाद मुलायम शैलें कट कर बह जाती हैं तथाकठोर शैलों से बने भूभाग उच्च भूखण्डों के रूप में ही खड़े रहते हैं। इन्हें हीअवशिष्ट पर्वत कहते हैं।

पर्वतों का आर्थिक महत्व

पर्वत हमारे लिए इस प्रकार से उपयोगी हैं-

  1. संसाधनों के भण्डार – पर्वत प्राकृतिक सम्पदा के भंडार हैं। संयुक्त राज्यअमेरिका की अप्लेशियन पर्वतमाला कोयले और चूना पत्थर के लिए प्रसिद्ध है।पर्वतों पर उगने वाले कई प्रकार के वनों में हमें विभिन्न उद्योगों के लिए इमारतीलकड़ी, लाख, गोंद, जड़ी बूटियाँ तथा कागज उद्योगों के लिए लकड़ी प्राप्त होतीहैं। पर्वतीय ढलानों पर चाय तथा फलों की कृषि का विकास हुआ है।
  2. जल विद्युत उत्पादन – पर्वतीय प्रदेशों में बहने वाली नदियों के जल प्रपातों द्वाराजल विद्युत उत्पन्न की जाती है। कोयले की कमी वाले पर्वतीय देशों जैसे-जापान,इटली और स्विटजरलैण्ड में जल विद्युत का बहुत महत्व है।
  3. जल के असीम भंडार – ऊँचे हिमाच्छादित या भारी वर्षा वाले पर्वतों से निकलनेवाली सदा वाहिनी नदियाँ जल के भंडार हैं। उनसे नहरें निकाल कर खेतों कीसिंचाई की जाती है, जिससे विभिन्न फसलों का अधिक उत्पादन होता है।
  4. उपजाऊ मैदानों के निर्माण में सहायक – ऊँचे पर्वतों से निकलने वाली नदियाँकटाव द्वारा मिट्टी बहाकर निचली घाटियों में जमा करती हैं, जिससे उपजाऊमैदानों का निर्माण होता है। उत्तरी भारत का विशाल मैदान गंगा, सतलुज औरब्रह्मपुत्रा नदियों की ही देन है।
  5. राजनीतिक सीमायें – पर्वत दो देशों के बीच राजनीतिक सीमायें बनाते हैं तथाकुछ हद तक आपसी आक्रमण से बचाते हैं। हिमालय पर्वतमाला भारत और चीनके बीच राजनीतिक सीमा बनाये हुए हैं।
  6. जलवायु पर प्रभाव – पर्वतों पर नीचे तापमान पाये जाते हैं। पर्वत दो प्रदेशों केबीच जलवायु विभाजक का कार्य करते हैं। उदाहरण के लिये हिमालय पर्वतमालामध्य एशिया से आने वाली अति शीत पवनों को भारत में आने से रोकती है। वहदक्षिण-पश्चिम मानसून पवनों को भी रोककर उन्हें दक्षिणी ढलानों पर वर्षा करनेको बाध्य करती है।
  7. पर्यटन केन्द्र – प्राकृतिक सौन्दर्य के केन्द्र तथा स्वास्थ्यवर्धक स्थान होने केकारण बहुत से पर्वतीय स्थल पर्यटन केन्द्रों के रूप में विकसित हो जाते हैं। ऐसेस्थानों पर पर्यटन एवं होटल व्यवसाय विकसित हो जाते हैं। भारत के शिमला,नैनीताल, मसूरी तथा श्रीनगर पर्वतीय नगरों के उदाहरण हैं। ये सारी दुनिया केसैलानियों को आकर्षित करते हैं।

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