पुराण के रचयिता, रचना काल एवं पुराणों की संख्या

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जिस प्रकार समग्र वेदों के मंत्रा अपनी मूलावस्था में अविभक्त रूप में एक ही साथ मिले-जुले थे, उसी प्रकार पुराण भी एक बृहत्संहिता के रूप में सम्मिलित थे। वेदों के चतुर्धा वर्गीकरण की भांति पुराणों का भी पंचम वेद के रूप में अलग विभाजन उनकी रचना के बहुत बाद हुआ और पुराण-गं्रथों का अध्ययन करने पर इस सत्य का भी स्पष्टकरण होता है कि वेद-वर्गयिता व्यास के उपाधिधारी ऋषि-महर्षि ही पुराणों के भी विभाजक थे।

व्यास या वेदव्यास एक पदवी या अधिकार का नाम था। जब भी जिन ऋषि-मुनियों ने वेद-संहिताओं का विभाजन या पुराणों का संक्षेप, संपादन अथवा प्रतिसंस्करण किया वे ही उस समय व्यास या वेदव्यास की उपाधि से सम्मानित किए गए। किसी समय वशिष्ठ और किसी समय पाराशर या शक्ति आदि भी व्यास कहे गये। इस अट्ठाईसवें कलियुग के व्यास कृष्णद्वैपायन थे। उनके द्वारा रचित या प्रकाशित ग्रन्थ ही आज पुराण नाम से प्रचलित हैं। संप्रति उपलब्ध होने वाले ब्रह्माण्ड, विष्णु और मत्स्य आदि पुराणों के अध्ययन से विदित होता है कि उनका प्रतिपाद्य विषय पांच अंशों में विभक्त है : सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित। ये पांच बातें पुराणों का प्रतिपाद्य विषय हैं।

पुराण-ग्रन्थों में प्रणयन या उनके प्रणेताओं के सम्बन्ध में ‘विष्णुपुराण’ में एक रोचक कथा वर्णित है, जिसके अनुसार भगवान् वेदव्यास ने आख्यान, उपाख्यान, गाथा और कल्पशुद्धि आदि के साथ-साथ पुराण-संहिता की भी रचना की थी और उसका अध्यापन अपने सुयोग्य सूतजातीय लोमहर्षण नामक शिष्य को कराया था। लोमहर्षण ने अपने कश्यपवंशीय तीन सुपात्रा शिष्यों-अकृतव्रण, सावर्णि एवं शांशपायन-को पुराणों का महान् ज्ञान दिया और इन तीनों के मूल संहिता के आधार पर तीन पुराण-संहितायें और तैयार की। आगे चलकर इन्हीं की शिष्य-परम्परा ने अष्टादश महापुराणों की तथा अनेक उपपुराणों की रचना की। ‘ब्रह्मपुराण’ इस प्रसंग में सबसे पहले रचा गया।

‘विष्णुपुराण’ के इस प्रसंग में दो प्रामाणिक बातों का पता चलता है। पहली बात तो यह कि वेदव्यास ने पुराण-संहिता का संग्रह कर उसको क्रमबद्ध किया और दूसरी बात यह कि उस संग्रहकार के बहुत बाद मेंं उसकी शिष्य-परम्परा ने अष्टादश महापुराणों या दूसरे उपपुराणों की रचना की। ‘मत्स्यपुराण’ के एक प्रसंग से विदित होता है कि आदि में केवल एक ही पुराण संहिता थी। संभवत:, ‘विष्णुपुराण’ के पूर्वोक्त वचनानुसार, व्यास ने उसी पुराण संहिता की दीक्षा लोमहर्षण को दी। इस बात का ‘शिवपुराण’ में भी विस्तार से वर्णन है। उसमें लिखा गया है कि कल्प के अन्त में केवल एक ही पुराण था, जिसे ब्रह्मा ने मुनियों को बताया। उसके बाद व्यास ने अनुमान लगाकर यह तय किया कि इतना बड़ा ग्रन्थ मनुष्यों की मेधा में न समा सकेगा। अत: उन्होंने उस चार लाख श्लोक परिमाण की बृहत्-संहिता को अठारह भागों में विभक्त किया। इन अठारह पुराणों का प्रवचन सत्यवती जी के पुत्रा व्यास ने ही किया। एक मूल-संहिता से अष्टादश पुराणों के विभाजन एवं प्रवचन की यही बात ‘देवीभागवत’, ‘वराहपुराण’, ‘पद्मपुराण’ आदि ग्रन्थों में भी एक-जेसे रूप में देखने को मिलती है।

इन सब एक-जैसे पुराण-प्रसंगों से यह निष्कर्ष निकलता है कि ब्रह्मा ने वेदों की ही भांति पुराणविद्या का स्मरण किया और तब परम्परया वह ज्ञान व्यास तक पहुचा। व्यास ने लोक में पुराण-विद्या का महान् ज्ञान प्रकाशित किया। ऋषियों ने बृहद् पुराण-संहिता के पहले तो तीन भाग किए और बाद में अठारह। बार-बार उनकी कथाओं में उलट-फेर होता गया, अत: उनकी कथाओं में न्यूनाधिक्य, मत-वैभिन्न्य, सम्प्रदाय-पक्षपात और प्रक्षेप आदि जुड़ते गये। किन्तु प्रश्न हो सकता है कि यदि पुराण भी वेदों जितने सनातन हैं तो वैदिक संहिताएं भी तो अनेक ऋषि-मुनियों के हाथ से होकर आज हम तक पहुंची है। फिर उनके संशोधन, परिवर्तन, परिवर्द्धन की बात तो किसी से नहीं कही ? उसका कारण यह था कि वेदों के पद, क्रम, घन, जटा, माला आदि पाठ तथा पातिशाख्य, चरणव्यूह, निरुक्त, शिक्षा और कल्प आदि शास्त्रा ऐसे कवच थे कि जिनमें आबद्ध होकर उनमें उलट-फेर आदि की कोई संभावना ही नहीं हुई, और इसीलिए भविष्य में भी ऐसी कोई आशंका नहीं है। यही कारण है कि जहां वेदमन्त्रों की गति-संगति एक-जैसी है, वहां पुराणों की अनेक बातों में एक-जैसी गति और संगति स्थापित करने में कठिनाई होती है। अष्टादश महापुराणों के अध्ययन से विदित होता है कि उनका विषय, उनकी निर्माण-शैली और यहां तक कि उनकी पाठविधि आदि बहुत-सारी बातों में एकता है, जिससे उनका एक ही मूल उद्गम मानने में बहुत बाधा नहीं पड़ती है। पुराणों में आज जो वर्तमान वैभिन्न्य दिखाई देता है, उसका कारण उनके प्रवर्तक विभिन्न सम्प्रदाय के थे। पुराणों में इस परिवर्तन और परिवर्द्धन के कारण भी वही सम्प्रदाय थे। पुराणों के जो पांच लक्षण विष्णु, ब्रह्माण्ड और मत्स्य के अनुसार ऊपर गिनाए गए हैं, ठीक उतनी बातों का प्रतिपादन उनमें नहीं होता है। उनमें बहुत सारे प्रसंग ऐसे भी हैं जो बहुत बाद की परिस्थितियों एवं बहुत बाद के सम्प्रदायों से सम्बन्धित हैं। ब्राºम, शैव, वैष्णव और भागवत प्रभृति सम्प्रदाय बहुत पुराने नहीं हैं; किन्तु ‘ब्रह्मपुराण’, ‘शिवपुराण’, ‘विष्णुपुराण’ और भागवत पुराणों का नामकरण उक्त सम्प्रदायों के ही कारण हुआ प्रतीत होता है।

पुराणों का रचना काल

लगभग 600 ई0 पू0 से लेकर 200 ई0 तक भारत की ये आठ शताब्दियां असाधारण बौद्धिक विकास और विचार-स्वातन्.त्रय की महत्त्वपूर्ण शताब्दियां रही हैं। जैन-बौद्ध और हिन्दू-दर्शनों के निर्माण का युग यही था। बौद्धों के ‘जातक’ और ‘अवदान’ जैसे लोकप्रिय गाथा-ग्रन्थों का निर्माण इसी युग में हुआ। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के अन्तिम संस्कारणों का समय भी यही था। नन्द राजाओं और चन्द्रगुप्त मौर्य (321-296 ई0 पू0) के कारण जैनधर्म खूब फला-फूला और उसका प्रभूत साहित्य लिखा गया। सम्राट अशोक (292-230 ई0 पू0) का आश्रय पाकर बौद्धधर्म और बौद्ध-साहित्य ने अभूतपूर्व प्रगति की। अनेक लोकप्रिय धर्म-ग्रन्थों, विचार-प्रधान दर्शन-ग्रन्थों और संस्कृत के काव्य-नाटकों के निर्माण का सूत्रापात इसी युग में हुआ।

600 ई0 पू0 में ब्राह्मण धर्म की संकीर्णतावादी कर्मकाण्ड-प्रवृत्ति के विरोध में जैन और बौद्धों ने जिस अलग धार्मिक परम्परा की प्रतिष्ठा की, उसके मूल में नांिस्तकवाद था। जैन-बौद्धों की निराकार-भावना समाज में अधिक दिनों तक न टिक सकी। जनसाधारण उनके दुरूह ग्रन्थ पन्थ के किनाराकशी करने लगा। धारणा, ध्यान, समाधि, गृहत्याग, उपासना और दु:खवाद समाज के आकर्षण के लिए लोकप्रिय सिद्ध न होने के कारण समाज, ब्राह्मणधर्म की सुगम पद्धति की ओर सहसा ही मुड़ गया। भागवत-धर्म और शैव-धर्म ने निरीश्वरवादी जैनों और बौद्धों को सर्वथा निस्तेज बना दिया। यह सब पौराणिक धर्म की प्रतिष्ठा के फलस्वरूप हुआ और लगभग यह स्थिति दूसरी शताब्दी ई0 तक अक्षुण्ण बनी रही।

छठी शताब्दी ई0 पूर्व से लेकर दूसरी शताब्दी के अन्त तक जैन-बौद्ध धर्मों की ब्राह्मणधर्म के साथ निरन्तर लड़ाइयां होती रहीं, किन्तु इस बीच ब्राह्मणधर्म ने अपना परिष्कार करने के बाद जो नया स्वरूप धारण किया, उसके सम्मुख उसके उक्त प्रतिद्वन्द्वी धर्म पराभूत हो गये। अपने प्रतिद्वन्द्वी धर्मों को परास्त कर ब्राह्मणधर्म तीसरी शताब्दी ईस्वी से निरन्तर उत्कर्ष की ओर अग्रसर होता गया और उसकी यह उत्कर्ष की स्थिति लगभग 12वीं शताब्दी तक अक्षुण्ण बनी रही। यही पुराणों के निर्माण और अन्तिम संस्करण का समय था।

पुराणों की रचना एक समय की नहीं है, लगभग श्रुतिकाल से लेकर बारहवीं शताब्दी तक निरन्तर उनकी रचना, संक्षिप्त संस्करण, सम्पादन ओर संकलन होता गया। विद्वानों की राय है कि गुप्त-शासन की सर्वथा अनुकूल परिस्थितियों को पाकर उस समय पुराणों का एक संस्करण हुआ। ‘स्कन्दपुराण’ के सम्बन्ध में विद्वानों की यहां तक धारणा है कि उसका नामकरण गुप्त सम्राट् स्कन्दगुप्त के नाम से हुआ। ‘वायु’, ‘भविष्यत्’, ‘विष्णु’ और भागवत’ पुराणों में गुप्तवंश का पर्याप्त उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि गुप्त-युग में उनका संस्कार अवश्य हुआ।

डॉ0 जयसवाल के मतानुसार कांचनका (राजस्थान) के अन्तिक शासकों-पुष्यमित्रा और वसुमित्रा-का समय 399 ई0 ही पुराणों की रचना का समाप्ति-युग था। उनमें जो संशोधन-परिष्करण होते गये, उनकी अवधि पांचवीं शताब्दी के भी आगे तक पहुंचती है।

यद्यपि अपने मूल अर्थ में ‘पुराण’ शब्द ‘वेद’ की तरह एक व्यापक-विषय का सूचक है और हमें इस दृष्टि से यह भी मानना पड़ेगा कि ‘वेदसंहिता’ की भांति एक ‘पुराण-संहिता’ भी विद्यमान थी; जिसका वर्गीकरण वैदिक संहिताओं के वर्गीकरण के साथ ही उन्हीं ‘व्यास’ पदवी वाले महर्षियों ने किया, पुराणों के विवरण की पूर्वसीमा का जो उल्लेख वैदिक साहित्य तक में मिलता है, उसका लक्ष्य उसी ‘पुराण संहिता’ से है। कुछ प्रामाणिक उल्लेखों के आधार पर हम पुराण-साहित्य के निर्माण की पूर्व और उत्तर सीमाओं की जानकारी नीचे लिखे आधारों पर प्राप्त कर सकते हैं।
  1. आचार्य शंकर और कुमारिल भट्ट ने अपने ग्रन्थों में पुराणों की पर्याप्त चर्चाएं की हैं। कथाकार बाणभट्ट (700 ई0) ने ‘हर्षचरित’ में स्पष्ट किया है कि उन्होंने अपने जन्म-स्थान में ‘वायुपुराण’ का पारायण सुना था। ‘कादम्बरी’ में भी उन्होंने इस व’ायुपुराण’ का उल्लेख किया है। ‘पुराणेषु वायुप्रलपितम्’।
  2. ‘विष्णुपुराण’ में मौर्य-साम्राज्य का, ‘मत्स्यपुराण’ में दक्षिणात्य आन्ध्र राजाओं का और ‘वायुपुराण’ में गुप्त-वंश का जो अविकल उल्लेख मिलता है, उनसे इन पुराणों के तत्कालीन अस्तित्व का सहज में ही अनुमान लगाया जा सकता है।
  3. ‘महाभारत’ में कतिपय पुराणों के उपाख्यानों का ज्यों-का-त्यों वर्णन मिलता है। ‘महाभारत’ या ‘जयकथा’ के प्रवक्ता लोमहर्षण के पुत्रा उग्रश्रवा सूत पुराणों के पूर्ण पण्डित थे। शौनक ऋषि ने एक बार उनसे प्रार्थना की थी कि वे अपने पिता से पुराणों के सम्बन्ध में प्राप्त ज्ञान को उन्हें सुनायें। ऋष्यÜाृंग का एक आख्यान ‘पद्मपुराण’ और ‘महाभारत’ दोनों में मिलता है। दोनों ग्रन्थों के आख्यानों का तुलनात्मक अध्ययन करने के पश्चात् डॉ0 लूडर्स ने यह सिद्ध किया कि ‘पद्मपुराण’ का आख्यान प्राचीन है।
  4.  कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्रा’ पुराणों के अस्तित्व से पर्याप्त प्रभावित जान पड़ता है। राजकुमारों के लिए पुराणों के ज्ञान की आवश्यकता, पुराणविद् को राज्याश्रय का अधिकार आदि बातों से ज्ञात होता है कि कौटिल्य पुराणों के उपयोगी ज्ञान के पारंगत विद्वान् थे।
  5. सूत्रा-ग्रन्थों में एक ओर तो प्राचीनतम ‘पुराण-संहिता’ के अस्तित्व का पता चलता है और दूसरी ओर उनमें उपलब्ध पुराण-ग्रन्थों के उद्धरण मिलते हैं।
  6. उपनिषद्-ग्रन्थों में वेदों के साथ इतिहास-पुराण का भी उल्लेख किया गया है और उनको पंचम वेद के रूप में स्वीकार किया गया है तथा यह भी स्पष्ट किया गया है कि इतिहास एवं पुराण का अस्तित्व, तब सर्वथा पृथक् था।
इस प्रकार लगभग 12वीं शताब्दी ई0 से लेकर मौर्यवंश (374-190 ई0 पू0), आन्ध्रवंश (212 ई0 पू0 से 338 ई0 पू0), गुप्तवंश (275-510 ई0), ‘महाभारत’ (500 ई0 पू0), अर्थशास्त्रा (300 ई0 पू0), ‘कल्पसूत्रा’ (700 ई0 पू0), उपनिषद् (1000 ई0 पू0) और वैदिक संहिताओं (2500 ई0 पू0) तक पुराणों के प्राचीनतम और आधुनिक स्वरूपों की समर्थ चर्चाएं विद्यमान होने के कारण उनकी पूर्व-सीमा वैदिक युग और उत्तर-सीमा गुप्त-साम्राज्य तक निर्धारित की जा सकती है। पुराणों के सम्बन्ध में पार्जिटर महोदय ने एक पुस्तक लिखी है, जिसका नाम है ‘एशियेण्ट इंडियन हिस्टॉरिकल ट्रेडिशन्स’। यह पुस्तक उनके पुराण-साहित्य और भारतीय परम्पराओं के प्रति गम्भीर ज्ञान का परिचय देती है। इसमें उन्होंने पुराणों के सम्बन्ध में प्रचलित भ्रान्त धारणाओं का निराकरण करने के साथ-साथ पुराणों की महत्ता पर प्रकाश डाला है। उन्होंने वेदों को भी पुराणों की भांति विरुदावली कहा है। जिस प्रकार राजवंशों की विरुदावली पुराणों में वर्णित है, उसी प्रकार ऋषिवंशों की विरुदावली के परिचायक ग्रन्थ ‘वेद’ हैं।

अपने सन्तुलित एवं गम्भीर अध्ययन के आधार पर पार्जिटर महोदय का कथन है कि पुराण मूल रूप में ईस्वी सन् की प्रारम्भिक शताब्दियों के बाद के नहीं हो सकते हैं। पुराणों में ‘अग्निपुराण’ सबसे प्राचीन है। ‘अग्निपुराण’ का समय इतिहासकारों ने चौथी शताब्दी या इससे पहले का बताया है। पुराण-ग्रन्थों की रचना के सम्बन्ध में लोकमान्य तिलक का मत है कि उनका समय ईस्वी सन् दूसरे शतक के बाद का कदाचित् नहीं हो सकता है।

‘अग्निपुराण’ की रचना के सम्बन्ध में विद्वान् एकमत नहीं हैं। श्रीयुत सुशील कुमार दे के मतानुसार ‘अग्निपुराण’ का अलंकार प्रकरण, दण्डी और भामह के पश्चात् और ‘ध्वन्यालोक’ के कृतिकार श्री आनन्दवर्धन से पहले ईसा की नवम शताब्दी के लगभग रचा गया। श्री पी0वी0 काणे साहब ‘अग्निपुराण’ को 700 ई0 पू0 के बाद और उसके काव्य-शास्त्रा विषयक अंश की रचना 900 ई0 के बाद की स्वीकार करते हैं। इन दोनों विद्वानों की स्थापनाओं का विधिवत् खण्डन करके श्री कन्हैयालाल पोद्दार ने अपना सप्रमाण मंतव्य दिया है कि ‘अग्निपुराण’ के काव्य-प्रकरण का ध्यान देकर अध्ययन करने से यह निर्विवाद विदित हो सकता है कि वह वर्णन भामह, दण्डी, उद्भट और ध्वनिकार आदि सभी प्राचीन साहित्याचार्यों से विलक्षण है और वह काव्य के विकास-क्रम के आधार पर ‘नाटîशास्त्रा’ के पश्चात् और भामहादि के पूर्व का मध्यकालीन रूप है।

डॉ0 हजारा ने पुराण-साहित्य पर खोजपूर्ण कार्य किया है और उनके ऐतिहासिक स्तर पर गम्भीर प्रकाश डाला है। उन्होंने कालक्रम से प्राचीनतम महापुराणों में ‘मार्कण्डेय’, ‘ब्रह्माण्ड’, ‘विष्णु’, ‘मत्स्य’, ‘भागवत’, एवं ‘कूर्म’ की गणना की है।

पहले दो पुराणों को उन्होंने ‘विष्णुपुराण’ से पहले का रचा माना है। शेष पुराणों में ‘विष्णु’ 400 ई0। ‘वायु’ 500 ई0। ‘भागवत’ 600-700 ई0 और ‘कूर्म’ 700 ई0 में रचे गये। उन्होंने ‘हरिवंश’ का रचनाकाल भी 400 ई0 सिद्ध किया है। उनके मतानुसार ‘अग्निपुराण’ की रचना यद्यपि 800 ई0 में हुई, किन्तु उसकी कुछ सामग्री इससे पहले की और कुछ इससे बाद की है। यद्यपि मूल ‘नारदीय पुराण’, संप्रति अप्राप्य है, तथापि प्रचलित ‘नारदीय पुराण’ की रचना दसवीं शताब्दी में हो चुकी थी और बाद में उसका कलेवर प्रक्षेपों से बढ़ता गया। इसी प्रकार ‘ब्रह्मपुराण’ की कुछ सामग्री बहुत बाद की होते हुए भी उसकी रचना दसवीं शताब्दी में हो चुकी थी। ‘स्कन्द-पुराण’ की कुछ सामग्री आठवीं शताब्दी में और अधिकांश उसके बाद निर्मित हुई। ‘गरुड़पुराण’ की रचना दसवीं शताब्दी में हुई। इसी प्रकार ‘पदम्पुराण’ की रचना 1200-1500 ई0 के बीच हुई। ‘ब्रह्मवैवर्तपुराण’ की रचना यद्यपि 700 ई0 पू0 हो चुकी थी तथापि उसका वर्तमान रूप सोलहवीं शताब्दी ई0 का है।

‘विष्णुधर्मोत्तर-पुराण’ का संभावित काल बूलर ने सातवीं शताब्दी बताया है, जो कि काश्मीर में रचा गया। इसी प्रकार ‘नृसिंहपुराण’ की रचना 400-500 ई0 के बीच हुई। ‘ब्रह्मपुराण’ की एक हस्तलिखित प्रति 1646 वि0 की उपलब्ध है। इस दृष्टि से इसका रचनाकाल कम-से-कम 14वीं-15वीं शताब्दी में होना चाहिए।

पुराण-ग्रन्थों की रचना के सम्बन्ध में इतनी ही सूचनाएं उपलब्ध हैं। अन्यत्रा भी पुराणों के ऐतिहासिक स्तर पर कुछ विचार-सामग्री देखने को मिलती है; किन्तु उनमें कल्पना की प्रचुरता है।

पुराणों की संख्या

पुराण और उपपुराण के नाम से दो प्रकार के पौराणिक ग्रन्थ हैं। ‘देवीभागवत’ में पुराणों के आद्य अक्षर के अनुसार 18 प्रकार कहे गये हैं। मकारादि से दो-मत्स्य तथा मार्कण्डेय पुराण भकारादि से दो-भागवत तथा भविष्य। ब्र अक्षर से तीन-ब्रह्म, ब्रह्मवैवर्त्त तथा ब्रह्माण्ड पुराण। व अक्षर से चार-वामन, विष्णु, वायु तथा वाराह पुराण। अ, ना, पद्म, लिं, ग, क, स्क के अनुसार-अग्नि, नारद, पद्म, लिंग, गरुड, कूर्म तथा स्कन्द पुराण।

मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रायं वचतुष्टयम्।
अनापद् लिड़्ग-कू-स्कानि पुराणानि पृथक् पृथक्।

विष्णु तथा भागवत में एक विशेष क्रम से ये ही नाम प्राप्त होते हैं- ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव, भागवत, नारदीय, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड तथा ब्रह्माण्ड
  • ब्रह्म - 10 हजार श्लोक भागवत - 18 हजार श्लोक
  • पद्म - 55 हजार श्लोक नारद - 25 हजार श्लोक
  • विष्णु - 23 हजार श्लोक वाराह - 24 हजार श्लोक
  • मार्कण्डेय- 9 हजार श्लोक स्कन्द - 81 हजार श्लोक
  • अग्नि - 15 हजार 4 सौ श्लोक वामन - 10 हजार श्लोक
  • भविष्य - 14 हजार 5 सौ श्लोक कूर्म - 17 हजार श्लोक
  • ब्रह्मवैवर्त्त - 18 हजार श्लोक मत्स्य - 14 हजार श्लोक
  • लिड़्ग - 11 हजार श्लोक गरुड - 19 हजार श्लोक
  • वायु - 11 हजार श्लोक ब्रह्माण्ड - 12 हजार श्लोक

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