रामायण के संस्करण

By Bandey No comments
अनुक्रम

वाल्मीकि रामायण के उपलब्ध होने वाले पाठ एकरूप नहीं मिलते हैं, उसके चार संस्करण मुख्य रूप से उपलब्ध होते है। इन चारों के अतिरिक्त बड़ौदा से प्रकाशित रामायण का ‘आलोचनात्मक संस्करण’ आजकल विशेष रूप से प्रचलित है।

रामायण के संस्करण

ये संस्करण हैं-

  1. औदीच्य संस्करण
  2. गौड़ीय संस्करण
  3. दाक्षिणात्य संस्करण
  4. पश्चिमोत्तरीय संस्करण
  5. आलोचनात्मक संस्करण

औदीच्य संस्करण

यह संस्करण गुजराती प्रिंटिंग प्रेस, बम्बई एवं निर्णय सागर प्रेस, बम्बई से प्रकाशित हुआ है। इस पर नागेश भट्ट की ‘रामीया व्याख्या’ भी है छपी है।

गौड़ीय संस्करण

इस संस्करण को बंगाल संस्करण भी कहा जाता है। इसका सम्पादन ड़ाñ जी गोरेशिया ने 1848 ई. में पेरिस में किया तथा इसका पुन: प्रकाशन 1933 में कलकत्ता संस्कृत सीरीज से हुआ। तीसरा प्रकाशन में इण्डियन हेरीटेज ट्रस्ट मद्रास से हुआ है। डा. गोरेशिया ने इसका इटेलियन भाषा में अनुवाद भी किया है।

दाक्षिणात्य संस्करण

इसका पहला प्रकाशन तिलक, भूषण, शिरोमणि टीका सहित गुजराती प्रिन्टिंग प्रेस से 1912 से 1920 के बीच हुआ। दूसरा प्रकाशन निर्णय सागर प्रेस बम्बई से तिलक टीका सहित वासुदेव लक्ष्मण शास्त्राी पलसीकर ने 1930 में किया। तथा तीसरा प्रकाशन वेंकटेश्वर प्रैस बम्बई से 1935 में हुआ। इसको बम्बई-संस्करण के नाम से भी जाना जाता है। यह अन्य संस्करणों से अपेक्षाकृत अधिक प्रचलित एवं व्यापक है।

पश्चिमोत्तरीय संस्करण

पश्चिमोत्तरीय संस्करण को कश्मीर-संस्करण भी कहा जाता है। इसका प्रकाशन डीñएñवीñ कालेज लाहौर के अनुसन्धान कार्यालय सेण्1923 में हुआ था। अनेक विद्वानों यथा रामलभाया, वीñवीñ शास्त्राी आदि के द्वारा इसके विभिन्न काण्डों का सम्पादन हुआ है।

इन चारों संस्करणों के पाठों में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। कामिल बुल्के ने इन पाठान्तरों का कारण देते हुए कहा है कि वाल्मीकिकृत रामायण प्रारम्भ में मौखिक रूप से प्रचलित थी और बहुत काल बाद भिन्न-भिन्न परम्पराओं के आधार पर वर्तमान लिखित रूप बना। फिर भी कथानक के दृष्टिकोण से तीनों पाठों की तुलना करने पर यह सिद्ध होता है कि कथावस्तु में जो अंतर पाये जाते है, वे बहुत ही कम महत्त्वपूर्ण हैं।

तथापि चारों संस्करणों में से किस संस्करण में काव्य अधिक प्रामाणिक और मौलिक रूपेण सुरक्षित है, यह निर्णय करना कठिन है। श्लैगल ने बंगाली संस्करण को अधिक प्रामाणिक माना है। जबकि बोटलिंग के अनुसार इसका सर्वप्राचीन रूप बम्बई संस्करण में प्राप्त होता है। हरिवंश पुराण के सर्ग 237 में रामायण विषयक उल्लेख बंगाली संस्करण से अधिक मिलते हैं। आठवीं और नोंवी शताब्दी के सहित्य में रामायण-विषयक वर्णन बम्बई-संस्करण से अधिक सम्बन्ध रखते हैं। ग्यारहवीं शताब्दी के क्षेमेन्द्र की ‘रामायणमंजरी’ से कश्मीर-संस्करण की पूर्व सत्ता का आभास मिलता है। ग्यारहवीं शताब्दी के भोज के रामायण चम्पू का आधार बम्बई संस्करण रहा होगा। वास्तव मे इन संस्करणों के विभिन्न रूप अब से हजारों वर्ष पूर्व बन चुके थे और ये सब तब से उसी रूप मे चले आ रहे हैं। इन्होनें एक-दूसरे संस्करण को यथासंभव प्रभावित भी किया है।

आलोचनात्मक संस्करण

इन विभिन्न संस्करणों में प्रामाणिक संस्करण ज्ञात न होने के कारण तथा पाठों में काफी मतभेद होने के कारण, रामायण के पाठ को संशोधित करने का प्रयास किया गया तथा ओरियन्टल रिसर्च इंस्टीट्यूट, बड़ौदा से रामायण का एक संशोधित ‘आलोचनात्मक संस्करण’ निकाला गया। इसका सम्पादन डाñ जी. एच. भटट् और शाह द्वारा 1960 से 1975 के बीच हुआ। यह सात भागों में प्रकाशित हुआ है तथा आजकल शोध के क्षेत्रा मे यह संस्करण विशेष रूप से प्रचलित है। इसमें विभिन्न संस्करणों के पाठान्तरों में से संशोधित एवं प्रामाणिक पाठ को स्वीकार किया गया है तथा अन्य पाठों को पादटिप्पणी में दर्शाया गया है।

Leave a Reply