उद्योगों का वर्गीकरण

अनुक्रम
भारत में आधुनिक औद्योगिक विकास का प्रारंभ मुंबई में प्रथम सूती कपड़े की मिल की स्थापना (1854) से हुआ। इस कारखाने की स्थापना में भारतीय पूँजी तथा भारतीय प्रबंधन ही मुख्य था। जूट उद्योग का प्रारंभ 1855 में कोलकाता के समीप हुगली घाटी में जूट मिल की स्थापना से हुआ जिसमें पूँजी एवं प्रबंध-नियन्त्रण दोनो विदेशी थे। कोयला खनन उद्योग सर्वप्रथम रानीगंज (पश्चिम बंगाल) में 1772 में शुरू हुआ। प्रथम रेलगाड़ी का प्रारंभ 1854 में हुआ। टाटा लौह-इस्पात कारखाना जमशेदपुर (झारखण्ड राज्य) में सन् 1907 में स्थापित किया गया। इनके बाद कई मझले तथा छोटी औद्योगिक इकाइयों जैसे सीमेन्ट, कांच, साबुन, रसायन, जूट, चीनी तथा कागज इत्यादि की स्थापना की गई। स्वतंत्राता पूर्व औद्योगिक उत्पादन न तो पर्याप्त थे और न ही उनमें विभिन्नता थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की अर्थव्यवस्था अविकसित थी, जिसमें कृषि का योगदान भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 60: से अधिक था तथा देश की अधिकांश निर्यात से आय कृषि से ही थी। स्वतंत्रता के 60 वर्षो के बाद भारत ने अब अग्रणी आर्थिक शक्ति बनने के संकेत दिए हैं।

भारत में औद्योगिक विकास को दो चरणो में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम चरण (1947.80) के दौरान सरकार ने क्रमिक रूप से अपना नियन्त्रण विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों पर बढ़ाया। द्वितीय चरण (1980.97) में विभिन्न उपायों द्वारा (1980.1992 के बीच) अर्थव्यवस्था में उदारीकरण लाया गया। इन उपायों द्वारा उदारीकरण तात्कालिक एवं अस्थाई रूप से किया गया था। अत: 1992 के पश्चात उदारीकरण की प्रक्रिया पर जोर दिया गया तथा उपागमों की प्रकृति में मौलिक भिन्नता भी लाई गई।

स्वतंत्रता के पश्चात भारत में व्यवस्थित रूप से विभिन्न पंचवष्र्ाीय योजनाओं के अन्तर्गत औद्योगिक योजनाओं को समाहित करते हुए कार्यान्वित किया गया और परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में भारी और मध्यम प्रकार की औद्योगिक इकाइयों की स्थापना की गई। देश की औद्योगिक विकास नीति में अधिक ध्यान देश में व्याप्त क्षेत्राीय असमानता एवं असंतुलन को हटाने में केन्द्रित किया गया था और विविधता को भी स्थान दिया गया। औद्योगिक विकास में आत्मनिर्भरता को प्राप्त करने के लिए भारतीय लोगों की क्षमता को प्रोत्साहित कर विकसित किया गया। इन्हीं सब प्रयासों के कारण भारत आज विनिर्माण के क्षेत्र में विकास कर पाया है। आज हम बहुत सी औद्योगिक वस्तुओं का निर्यात विभिन्न देशों को करते हैं।

विभिन्न लक्षणों के आधार पर उद्योगों को कई वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। उद्योगों को इन प्रमुख आधारों पर वर्गीकृत किया गया है-

कृषि आधारित उद्योग

वस्त्रा, चीनी, कागज एवं वनस्पति तेल उद्योग इत्यादि कृषि उपज पर आधारित उद्योग हैं। ये उद्योग कृषि उत्पादों को अपने कच्चे माल के रूप में प्रयोग करते हैं। संगठित औद्योगिक क्षेत्रा में वस्त्रा उद्योग सबसे बड़ा उद्योग है। इसके अन्तर्गत (i) सूती वस्त्र (ii) ऊनी वस्त्र (iii) रेशमी वस्त्र (iv) कृत्रिम रेशे वाले वस्त्र (v) जूट उद्योग आते हैं। कपड़ा उद्योग औद्योगिक क्षेत्रा का सबसे बड़ा घटक है। कुल औद्योगिक उत्पाद का पांचवा हिस्सा वस्त्रा उद्योग उत्पादन का है तथा विदेशी मुद्रा अर्जन में इसका एक तिहाई योगदान है। रोजगार उपलब्ध कराने में कृषि क्षेत्र के बाद इसी का स्थान है।

सूती कपड़ा उद्योग

भारत में औद्योगिक विकास का प्रारंभ 1854 में मुम्बई में आधुनिक सूती वस्त्रा कारखाने की स्थापना से हुआ। और तब से यह उद्योग उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त कर रहा है। वर्ष 1952 में इसकी कुल 378 औद्योगिक इकाइयाँ थीं जो मार्च 1998 में बढ़कर 1998 हो गई।

भारत की अर्थव्यवस्था में कपड़ा उद्योग का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। यह बहुत बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है। देश की कुल औद्योगिक श्रमिक संख्या का 1ध्5 वाँ हिस्सा कपड़ा उद्योग क्षेत्रा में लगा हुआ है।

(i) उत्पादन - वस्त्र निर्माण उद्योग के तीन क्षेत्रा हैं। (i) कपड़ा मिल क्षेत्रा (ii) हैन्डलूम (हथकरघा) एवं (iii) पावरलूम। सन् 1998-99 में कुल सूती वस्त्रा उत्पादन में बड़े कारखानों, हैडलूम तथा पावरलूम का भाग क्रमश: 5.4 प्रतिशत, 20.6 प्रतिशत एवं 74 प्रतिशत था। सन् 1950-51 में सूती वस्त्रों का उत्पादन 421 करोड़ वर्ग मीटर था जो 1998-99 में बढ़कर 1794.9 करोड़ वर्गमीटर तक पहुँच गया।
सूती धागे एवं कृित्राम धागों पर आधारित वस्त्रा उद्योग ने जबरदस्त उन्नति की है। दोनों प्रकार के धागों से निर्मित कपड़े की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 1960-61 में केवल 15 मीटर थी। 1995-96 में यह बढ़कर 28 मीटर प्रति व्यक्ति हो गयी। परिणामस्वरूप सूती धागों का सूती वस्त्रों एवं कृतिम धागों से निर्मित वस्त्रों का बड़े पैमाने पर निर्यात होने लगा। इनके निर्यात से हमने सन् 1995-96 में 2.6 अरब डालर की विदेशी मुद्रा अर्जित की।

(ii) वितरण - सूती वस्त्र उद्योग देश के सभी भागों मे फैला हुआ है। इस उद्योग के कारखाने भारत के विभिन्न भागों मे 88 से अधिक केन्दों में अवस्थित हैं। परन्तु अधिकतर सूती वस्त्रों के कारखाने आज भी उन क्षेत्रों में ही हैं जहाँ कपास का उत्पादन प्रमुख रूप से किया जाता है। ये क्षेत्रा उत्तरी भारत के विशाल मैदानी क्षेत्रा तथा भारतीय प्रायद्वीपीय पठारी भागों में स्थित हैं।

महाराष्ट्र राज्य सूती वस्त्रा उत्पादन में हमारे देश का अग्रणी राज्य है। मुम्बई सूती कपड़ों के कारखानों का प्रमुख केन्द्र है। क्योंकि लगभग आधे सूती कपड़े निर्माण करने वाले कारखानें मुम्बई में स्थित हैं। इसीलिए मुम्बई को कॉटन पोलिस ठीक ही कहा गया है। शोलापुर, कोल्हापुर, नागपुर, पुणे, औरंगाबाद एवं जलगाँव इत्यादि शहर भी महाराष्ट्र राज्य के सूती कपड़े निर्माण के महत्वपूर्ण स्थान है।

सूती वस्त्रा उत्पादन में गुजरात का देश में दूसरा स्थान है। अहमदाबाद इस राज्य का प्रमुख केन्द्र है। इसके अलावा सूरत, भड़ोच, वड़ोदरा, भावनगर एवं राजकोट राज्य के अन्य केन्द्र हैं।

तमिलनाडु दक्षिण भारत में सूती वस्त्रा उत्पादन में एक महत्वपूर्ण राज्य के रूप में उभरा है। कोयम्बटूर इस राज्य का सबसे महत्वपूर्ण सूती वस्त्रा उद्योग का केन्द्र है। इसके अलावा तिरूनलवेली, चेन्नई, मदुरै, तिरूचनापल्ली, सालेम एवं तंजौर राज्य के अन्य महत्वपूर्ण केन्द्र है।

कर्नाटक राज्य में सूती वस्त्रा उद्योग बेंगलुरू, मैसूर, बेलगाम और गुलबर्गा नगरों में केन्द्रित है। उत्तर प्रदेश में सूती वस्त्रा उद्योग कानपुर, इटावा, मोदीनगर, वाराणसी, हाथरस शहरों में केन्द्रित हैं। मध्य प्रदेश में सूती वस्त्रा उद्योग इंदौर और ग्वालियर शहरों में केंद्रित है। पश्चिम बंगाल के अन्तर्गत हावड़ा, सेरामपुर, मुख्रशदाबाद जैसे बड़े शहरों में सूती वस्त्रा उद्योग स्थित है।

इसके अलावा राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और आँध्र प्रदेश राज्य भी सूती वस्त्रा उत्पादन में योगदान देते हैं।

अहमदाबाद-मुम्बई-पुणे क्षेत्रा में सूती वस्त्रा उद्योगों के संकेन्द्रित होने के प्रमुख कारक हैं -
  1. कच्चे माल की उपलब्धता - इस क्षेत्रा में कपास का उत्पादन काफी मात्रा में किया जाता है।
  2. पूँजी की उपलब्धता-पूँजी निवेश के लिए मुम्बई, पुणे, अहमदाबाद ऐसे स्थान हैं जहाँ आसानी से उद्योग में पूँजी लगाने की सुविधा उपलब्ध है।
  3. परिवहन के साधन - यह क्षेत्रा देश के अन्य भागों से सड़क और रेलमार्ग द्वारा अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। अत: उत्पादित वस्तुओं का परिवहन आसान है। 
  4. बाजार की निकटता - वस्त्र उत्पादों को बेचने के लिए महाराष्ट्र और गुजरात में बहुत बड़ा बाजार उपलब्ध है। विकसित परिवहन के साधनों द्वारा वस्त्रा उत्पादों को देश के अन्य बाजारों एवं विदेशी बाजारों तक भेजने में आसानी रहती है। आजकल सूती वस्त्रा उद्योग के संकेन्द्रण के लिए बाजार एक महत्वपूर्ण कारक बन गया है।
  5. पत्तनों की निकटता - मुम्बई पत्तन द्वारा विदेशों से मशीनरी तथा अच्छी किस्म की कपास को आयात करने और तैयार माल को निर्यात करने में आसानी रहती है।
  6. सस्ते श्रमिक - सस्ते एवं कुशल श्रमिक आसपास के क्षेत्रों से आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।
  7. ऊर्जा की उपलब्धता - यहाँ सस्ती एवं पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा आसानी से उपलब्ध हो जाती है।

चीनी उद्योग

भारत के कृषि आधारित उद्योगों में चीनी उद्योग का दूसरा स्थान है। अगर हम गुड़, खांडसारी और चीनी तीनों के उत्पादन को जोड़कर देखें तो भारत विश्व में चीनी उत्पादों का सबसे बड़ा उत्पादक बन जाएगा। सन् 2003 में हमारे देश में लगभग 453 चीनी के कारखाने थे। इस उद्योग में लगभग 2ण्5 लाख लोग लगे हुए हैं।

(i) उत्पादन - चीनी उत्पादन का सीधा सम्बन्ध गन्ने के उत्पादन से है। चीनी के उत्पादन में उतार-चढ़ाव गन्ने के उत्पादन के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करता है। सन् 1950.51 में चीनी का कुल उत्पादन 11.3 लाख टन था। 2002.2003 मे यह बढ़कर 201.32 लाख टन हो गया। परन्तु 2003.2004 में यह घटकर 138 लाख टन रह गया।

(ii) वितरण - चीनी के अधिकांश कारखाने छ: राज्यों में ही संकेन्द्रित हैं। ये राज्य हैं-उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश। उत्तर प्रदेश - चीनी उत्पादन में उत्तर प्रदेश का महत्वपूर्ण स्थान है। यहाँ पर चीनी के कारखाने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद और बुलन्दशहर जिलों में संकेन्द्रित हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में देवरिया, बस्ती, गोंडा और गोरखपुर जिले चीनी उद्योग के महत्वपूर्ण केन्द्र हैं। उत्तर प्रदेश में गन्ने की कृषि के अंतर्गत सबसे अधिक क्षेत्रा है। लेकिन यह राज्य 2003.2004 में भारत के कुल चीनी उत्पादन का केवल एक-तिहाई भाग का ही उत्पादन कर सका। यहाँ पर गन्ने का प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम है और गन्ने में चीनी का अंश भी कम है। महाराष्ट्र - भारत के प्रायद्वीपीय क्षेत्रा में महाराष्ट्र एक महत्वपूर्ण चीनी उत्पादक राज्य है। यहाँ चीनी का उत्पादन देश के सकल उत्पादन के एक चौथाई अँश के बराबर होता है। महाराष्ट्र राज्य में चीनी उत्पादन के प्रमुख केन्द्र नासिक, पुणे, सतारा, साँगली, कोल्हापुर और शोलापुर हैं। आन्ध्र प्रदेश- पूर्वी एवं पश्चिमी गोदावरी, विशाखापट्टनम, निजामाबाद, मेडक एवं चित्तूर जिले इस राज्य के चीनी उत्पादन के केन्द्र हैं। तमिलनाडु - इस राज्य के उत्तरी तथा दक्षिणी आरकोट, मदुरै, कोयम्बटूर और ित्राचरापल्ली चीनी-उत्पादन के महत्वपूर्ण जिले हैं। कर्नाटक- यह भी एक महत्वपूर्ण चीनी उत्पादक राज्य है। इस राज्य के बेलगाम, मान्डया, बीजापुर, बेलारी, शिमोगा तथा चित्रादुर्ग जिले चीनी उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं। बिहार, गुजरात, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान अन्य राज्य हैं जहाँ चीनी मिले अवस्थित हैं।

चीनी-उद्योग के स्थानीयकरण के कारक हैं-
  1. चीनी निर्माण में गन्ना ही प्रमुख कच्चामाल होता है। अत: चीनी मिलों की स्थापना गन्ना-उत्पादन क्षेत्रा में ही हो सकती है। गन्ने की फसल कटने के बाद ना तो गोदामों में रखी जा सकती है और न ही उसे कटने के बाद खेत में अधिक समय तक छोड़ा जा सकता है क्योंकि वे जल्दी से सूखने लगते है। इसलिए फसलों की कटाई के बाद गन्नों को तुरन्त चीनी मिलों को भेजना आवश्यक है। 
  2. गन्नों का परिवहन भी महँगा होता है। आमतौर पर गन्नों को बैलगाड़ियों में लादकर समीपस्थ चीनी मिल को भेजा जाता है। इनसे सामान्यत: 25.30 किमी. तक की दूरी तय की जा सकती है। अब गन्नों को चीनी मिल तक पहुँचाने के लिए ट्रेक्टर ट्राली और ट्रकों का प्रयोग भी किया जाने लगा है। इन उपरोक्त दो कारको के अलावा पूँजी की उपलब्धि, विपणन की सुविधा, सहज और सस्ते मजदूरों का मिलना और सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा की उपलब्धता इत्यादि कारक है जो चीनी-मिलों के स्थानीयकरण को प्रभावित एवं नियिन्त्रत करते है।
उत्तरी भारत के क्षेत्रों से चीनी उद्योग के भारत के प्रायद्वीपीय क्षेत्रा में स्थानांतरित होने के कारण पिछले कुछ समय से चीनी उद्योग का क्रमिक रूप से धीरे-धीरे उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों से हटकर भारतीय प्रायद्वीप के राज्यों में हस्तांतरण हो रहा है। इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण है-
  1. प्राय द्वीपीय भारत में गन्ने की फसल का प्रति हेक्टेयर उत्पादन उत्तर भारतीय क्षेत्रा से अधिक है। वास्तविकता तो यह है कि उष्ण-कटिबंधीय जलवायु गन्ने की पैदावार के लिए बहुत अनुकूल होती है। 
  2. शर्करा (सुक्रोज) की मात्रा, जो गन्ने की मिठास को नियंित्रात करती है, उष्ण- कटिबंधीय क्षेत्रा की फसल में अपेक्षाकृत अधिक होती है।
  3. गन्ना पेरने की अवधि दक्षिण भारत में उत्तर भारत की अपेक्षा ज्यादा लम्बी होती है।
  4. दक्षिण भारत में अधिकांश चीनी मिलों में आधुनिक उपकरण प्रयोग में लिए जाते हैं।
  5. दक्षिण भारत में चीनी उद्योग की अधिकांश मिलों का स्वामित्व सहकारिता क्षेत्रा के अन्तर्गत है, जहाँ मुनाफा को अधिक से अधिक करने का न तो लक्ष्य होता है और न ही प्रवृत्ति।

खनिज आधारित उद्योग

वे उद्योग जिनमें खनिजों को कच्चे माल के रूप में उपयोग में लाया जाता है खनिज आधारित उद्योग कहलाते हैं। इन उद्योगों में लोहा एवं इस्पात उद्योग सबसे महत्वपूर्ण है। इन्जीनियरिंग, सीमेन्ट, रासायनिक एवं उर्वरक उद्योग भी खनिज आधारित उद्योग के उदाहरण हैं।

लोहा एवं इस्पात उद्योग

यह एक आधारभूत उद्योग हैं क्योंकि इस के उत्पाद बहुत से उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त होते हैं।

भारत में यद्यपि लौह इस्पात के निर्माण की औद्योगिक क्रियाएँ बहुत पुराने समय से चली आ रही हैं किन्तु आधुनिक लौह इस्पात उद्योग की शुरूवात 1817 में बंगाल के कुल्टी नामक स्थान पर बंगाल लोहा एवं इस्पात कारखाने की स्थापना से हुई। टाटा लोहा एवं इस्पात कम्पनी की स्थापना जमशेदपुर में 1907 में हुई। इसके पश्चात् भारतीय लोहा एवं इस्पात सयंत्रा की स्थापना 1919 में बर्नपुर में हुई। इन तीनो संयत्रों की स्थापना निजी क्षेत्रा के अंतर्गत हुई थी। सार्वजनिक क्षेत्रा के अंतर्गत प्रथम लोहा तथा इस्पात का संयत्रा जिसे अब ‘‘विश्वेसरैया लोहा एवं इस्पात कम्पनी’’ के नाम से जाना जाता है, की स्थापना भद्रावती में सन् 1923 में हुई थी।

स्वतंत्राता के पश्चात् लोहा एवं इस्पात उद्योग में तीव्रता से प्रगति हुई। सभी वर्तमान इकाइयों की उत्पादन क्षमता में वृद्धि हुई। तीन नए एकीकृत संयत्रों की स्थापना क्रमश: राउरकेला (उड़ीसा), भिलाई (छत्तीसगढ़) तथा दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल) में की गई। बोकारो इस्पात संयन्त्रा की स्थापना सार्वजनिक क्षेत्रा के अनतर्गत सन 1964 में की गई। बोकारो तथा भिलाई स्थित सयंन्त्रो की स्थापना भूतपूर्व सोवियत संघ के सहयोग से की गई। इसी प्रकार दुर्गापुर लोहा एवं इस्पात संयन्त्रा की स्थापना यूनाइटेड किंगडम के सहयोग से तथा राऊरकेला सयंत्रा जर्मनी के सहयोग से स्थापित किए गए। इसके पश्चात विशाखापट्टनम और सलेम संयंत्रो की स्थापना हुई। स्वतंत्राता के समय भारत सीमित मात्रा में कच्चे लोहे तथा इस्पात का निर्माण करता था। सन् 1950.51 में भारत में इस्पात का उत्पादन केवल 10 लाख टन था जो 1998–99 में बढ़ते-बढ़ते 238 लाख टन तक पहुँच गया।

भारत के प्रमुख लौह तथा इस्पात सयंन्त्रा झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्यो में अवस्थित हैं। इसके अलावा भारत में 200 लघु इस्पात सयंत्रा हैं जिनकी क्षमता 62 लाख टन प्रति वर्ष है। लघु इस्पात संयन्त्रों में इस्पात बनाने के लिए स्क्रेप या स्पॉन्ज लोहे का प्रयोग किया जाता है। ये सारी छोटी इकाइयाँ देश में लोहा तथा इस्पात उद्योग के महत्वपूर्ण घटक हैं।

लोहा तथा इस्पात उद्योग के अधिकांश सयंन्त्रा भारत के छोटा नागपुर पठार पर अथवा उसके आसपास इसलिए स्थापित हुए हैं, क्योंकि इसी क्षेत्रा में लौह अयस्क, कोयला, मेंगनीज, चूने का पत्थर, डोलोमाइट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के विपुल निक्षेप मिलते हैं।

पेट्रो-रसायन उद्योग

भारत में पेट्रोरसायन उद्योग तेजी से वृद्धि करता हुआ उद्योग है। इस उद्योग ने देश के पूरे उद्योग जगत में एक क्राँति ला दी है क्योंकि इसके उत्पाद परम्परागत कच्चे माल जैसे लकड़ी, काँच एवं धातु को प्रतिस्थापित करने में अधिक सस्ते और उपयोगी पाए जाते हैं। लोगों की विभिन्न आवश्यकताओं की पूख्रत करने वाले इस पेट्रो-रसायन के उत्पाद लोगों को सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। पेट्रो-रसायन को पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस से प्राप्त किया जाता है। हम पेट्रो-रसायन से निर्मित विभिन्न वस्तुओं का प्रयोग सुबह से शाम तक करते हैं। टूथ-ब्रश, टूथ-पेस्ट, कंघी, बालो में लगाने वाले हेयर पिन, साबुन रखने के डिब्बे, प्लास्टिक मग, सिंथेटिक कपड़े, रेडियो और टी.वी. कवर, बाल पॉइन्टपेन, इलेक्ट्रिक स्विच, डिटर्जेंट पाउडर, लिपस्टिक, कीड़े मारने की दवाइयाँ, प्लास्टिक थैलियाँ, फोम के गद्दे तथा चादरें इत्यादि असंख्य वस्तुएँ पेट्रो-रसायन से ही बनती हैं।

भारतीय पेट्रो-रसायन निगम ने वड़ोदरा (गुजरात) के समीप एक वृहद पेट्रोकेमिकल काम्पलेक्स को स्थापित किया है जिसमे विभिन्न प्रकार के पदार्थ बनाए जाते हैं। वड़ोदरा के अलावा गुजरात राज्य में गन्धार एवं हजीरा केन्द्र भी स्थापित किए गए हैं। अन्य राज्यो में महाराष्ट्र (नागाथोन केन्द्र) में पेट्रो रसायन उद्योग स्थापित है। भारत पेट्रो रसायन पदार्थो के निर्माण मे पूर्णत: आत्म निर्भर है।

कच्चे तेल को परिष्कृत किए बगैर कोई खास महत्व नहीं है। परन्तु जब उसे परिष्कृत किया जाता है तब वह खनिज तेल पेट्रोल के रूप में बहुत मूल्यवान बन जाता है। तेल के परिष्करण करते समय हजारों किस्म के पदार्थ मिलते हैं- जैसे मिट्टी का तेल, पेट्रोल, डीजल, लुब्रीकेन्टस और वे पदार्थ जो पेट्रो-रसायन उद्योग में कच्चे माल के रूप में उपयोग में आते हैं।

भारत में इस समय 18 तेल परिष्करण शालाएँ है। इन तेल परिष्करण शालाओं की अवस्थिति इस प्रकार हैं- डिगबोई, बोंगइगांव, नूना माटी (तीनो असम राज्य में), मुम्बई (महाराष्ट्र) में दो इकाइयाँ हैं, विशाखापट्टनम (आन्ध्र प्रदेश), बरौनी (बिहार राज्य), कोयाली (गुजरात), मथुरा (उत्तर प्रदेश), पानीपत (हरियाणा), कोच्चि (केरल), मँगलोर (कर्नाटक) और चेन्नई (तमिलनाडु)। जामनगर (गुजरात) में स्थित परिष्करणशाला एकमात्रा संयंत्रा है जो निजी क्षेत्रा के अन्तर्गत आता है तथा यह रिलायन्स उद्योग लि. द्वारा लगाया गया है।
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