वर्षा जल संग्रहण क्या है, वर्षा जल संग्रहण की विधियाँ

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वर्षा जल संग्रहण का सामान्य अर्थ वर्षा के जल को एकित्रात करने से है। विशेष अर्थों में यह भूमिगत जल के पुनर्भरण बढ़ाने की तकनीक है। इस तकनीक में जल को बिना प्रदूषित किए स्थानीय रूप से वर्षा जल को एकत्रित करके जल को भूमिगत किया जाता है। इससे स्थानीय घरेलू मांग को, अभाव वाले दिनों में पूरा किया जा सकता है। अब प्रश्न उठता है कि आखिर हमारे लिए जल संग्रहण क्यों आवश्यक है? इसके लिए मुख्यत: तीन कारक उत्तरदाई हैं-
  1. पृष्ठीय जल का अभाव
  2. भूमिगत जल पर निर्भरता का बढ़ना और
  3. तेजी से नगरीकरण का होना।

नगरीय परिदृश्य -

किसी क्षेत्र में प्राप्त वर्षा की कुल मात्रा को ‘वर्षा जल निधि’ कहते हैं। वर्षा जल निधि के प्रभावी ढंग से किए गए संग्रहण को ‘संभाव्य जल संग्रहण’ कहते हैं। जरा सोचिए! आपके मकान की छत का क्षेत्रफल 100 वर्गमीटर है और क्षेत्र की औसत वार्षिक वर्ष 60 सें.मी. है। यह मान लिया जाए कि छत का पानी न तो बहा है, न रिसा है और न ही उड़ा है तो ऐसी स्थिति में छत पर 60 सें.मी. पानी खड़ा मिलेगा।

जल का आयतन = छत के क्षेत्रफल x वार्षिक वर्षा की मात्रा
                         = 100x60 सें.मी. = 100 x -6 = 60 घन मीटर

अर्थात् एक परिवार एक वर्ष में 60000 लीटर जल का संचय कर सकता है। इससे परिवार की जल सम्बन्धी सभी आवश्यकताऐं पूरी की जा सकती हैं। औसतन एक व्यक्ति को प्रतिदिन पीने के लिए 10 लीटर जल की आवश्यकता होती है। यदि आपका परिवार 6 सदस्यों का है तो वर्ष में पीने के लिए 6x10x365=21900 लीटर पानी चाहिए। शेष 60000-21900=38100 लीटर जल शुष्क मौसम में प्रयोग किया जा सकता है।

ग्रामीण परिदृश्य - 

भारत में जल संग्रहण की परम्परा अति प्राचीन है; परन्तु जल संग्रहण की आज जैसी सार्थकता पहले कभी नहीं देखी गई और न अनुभव की गई। जल के अभाव वाले क्षेत्रों में आज भी लोग पुराने तरीकों को अपना कर अपना काम चलाने का प्रयास करते हैं। आज भी इसमें कुओं, तालाबों, जोहड़ों को गहरा करना, समय-समय पर उनकी सफाई करना शामिल है। वर्षा की कमी वाले क्षेत्रों में बावड़ी जल संग्रहण की महत्वपूर्ण परंपरागत विधि है। अब तो जल संग्रहण की नई तकनीकों को अपना कर हम अधिक सुरक्षित स्थिति में हो सकते हैं तनिक सोचिए! भारत के सभी 587000 गाँव अपने 2000 लाख हेक्टेयर क्षेत्र के वर्षा जल के संग्रह में जुट जाएं तो अपार जल राशि उपलब्ध हो सकेगी। औसतन एक गाँव 37500 लाख घन मीटर वर्षा जलनिधि की परिधि में आता है। इस गणना से पता चलता है कि वर्षा जल संग्रहण की संमाव्यता विशाल है।

वर्षा जल संग्रहण की विधियाँ

वर्षा जल के संग्रहण के लिए विभिन्न विधियों को आवश्यकता, सुविधा तथा परिस्थिति के अनुसार अपनाया जा सकता है। विधियाँ विशेष उल्लेखनीय है -
  1. गड्ढे या गर्तिका बनाना : छिछले जलाभृत क्षेत्रों में जल के पुनर्भरण के लिए छोटे-छोटे गड्ढे बनाकर जल का संग्रहण किया जा सकता है। इन गड्ढे को 1-2 मीटर चौड़ा तथा 2-3 मीटर गहरा बनाया जा सकता है। इनकी आकृति किसी भी प्रकार की हो सकती है। इन गड्ढे को कंकड़, बजरी, बालू आदि से भर दिया जाता है। इससे वर्षा जल का रिसाव सहज होता रहता है।
  2. खाइयाँ बनाना - निचले भागों में जहाँ सरंध्र शैले पाई जाती हैं, उन भागों में 0.5 से 1 मीटर चौड़ी, 1 से 1.5 मीटर गहरी तथा 10 से 15 मीटर लम्बी खाई बनाकर उन्हें बालू बजरी आदि से भर दिया जाता है। खाइयों को सामान्यत: भूमि के ढाल के समानांतर बनाना चाहिए।
  3. कुओं का उपयोग - पहले से सूखे, बंद पड़े, काम में न आने वाले कुओं का वर्षा जल संग्रहण के लिए उपयोग किया जा सकता है।
  4. हैंडपम्प - भूमिगत जलाभाव क्षेत्रों में वर्षा के इकट्ठे किए गए जल को चालू हैण्ड पम्पों के द्वारा फिल्टर की मदद से भूमिगत किया जा सकता है।

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