बौद्ध धर्म की उत्पति, शिक्षांए, सिंद्धात एवं पतन

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गौतम बुद्ध और बौद्ध धर्म की उत्पति

कौशल देश के उतर में कपिलवस्तु शाक्य क्षित्रयों का एक छोटा-सा गणराज्य था। यहाँ शुद्धोदन नामक एक राजा राज्य करते थे। 563 ई.पू. इन्ही शुद्धोदन की कोलियवंशीय पत्नी महामाया अथवा मायादेवी के गर्म से गौतम का जन्म हुआ था। यह जन्म नेपाल की तराई में स्थित लुम्बिनी वन में हुआ था जो कपिलवस्तु से लगभग 14 मील की दूरी पर है। कालान्तर में यहीं पर सम्राट अशोक ने एक स्तम्भ स्थापित करवाया था जिस पर आज भी ‘हिद बुझे जाते साक्यगुनिति हिद भगवा जातेति’ (यहां शाक्य मुनि बुद्ध उत्पन्न हुए थे यहां भगवान उत्पन्न हुए थे) पढा जा सकता है। जन्म के सातवें दिन इनकी माता का निधन हो गया एवं इनका पालन पोषण सौतेली मां गौतमी ने किया। इसी कारण ये गौतम कहलाए। बालक गौतम को देखकर कालदेव तथा ब्राह्यण कौण्डिन्य ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक चक्रवर्ती राजा अथवा सन्यासी होगा। बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया और बड़े होने पर एक क्षित्राय राजकुमार को दी जाने वाली शिक्षांए-पुस्तकीय ज्ञान, युद्ध प्रणाली, घुडसवारी, मतलयुद्ध, अस्त्र-शस्त्र प्रयोग आदि-उन्हें प्रदान की गई। किन्तु सिद्धार्थ अल्प आयु से ही चिंतनशील थे। वे जम्बू वृक्ष के नीचे प्राय: ध्यानमग्न बैठे रहते थे। गौतम के प्रकृत्या चिन्तनशील होने के कारण उनका इन सब सांसारिक विषयों में अनुरक्त न होता था। गौतम का प्रारम्भिक जीवन बड़ी सुख-समृद्धि के बीच बीता। उनके रहने के लिए तीन ऋतुओं के अनुरूप पृथक्-पृथक् तीन प्रासाद बनवाये गए थे जिनमें ऐश्वर्य की समस्त सामग्री एकत्रा की गई थी। इसी प्रकार राजकुमार के घूमने फिरने के लिए अनेक रम्य उपवनों का निर्माण हुआ था। जिनमें अति मनोहरी कुंज और निर्झरादिक थे। नृत्य, वाद्य, संगीत के सरस वातारण में सिद्धार्थ संसारिक दु:ख की कल्पना न कर सकेंगें, ऐसे पिता शुद्धोधन का विचार था। इसी विचार से 16 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ का विवाह यशोधरा (इनके अन्य नाम गोपा, बिंना तथा भद्रकच्छा भी उल्लिखित है) से कर दिया। इनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। किन्तु सिद्धार्थ प्रसन्न न हुए वरन् उसे मोह-बंधन मानकर ‘राहू’ कहा और उसका नाम राहूल रख दिया। ित्रापिटक में अनेक ऐसे दृश्यों और घटनाओं का उल्लेख है जिनसे गौतम के वैराग्य प्रधान स्वभाव को उद्धीपन मिला। कहते है कि नगर-दर्शन के हेतु भिन्न-भिन्न अवसरों पर बाहर जाते हुए गौतम को मार्ग में पहले जर्जर शरीर वृद्ध, फिर व्यथापूर्ण रोगी, फिर मृतक और सबसे बाद को वीतराग प्रसन्नचित सन्यासी के दर्शन हुए। राजप्रसाद के वैभवशाली-विलासमय जीवन से विषमता वाले ये दृश्यत्रामय निश्चय ही गौतम को सन्यास की ओर मोड़ने वाले थे।

संसार से गौतम का मन उचटता देख कर शुद्धोधन को चिन्ता हुई और उन्होंने एक बार फिर गौतम को विलासिता की ओर उन्मुख करने का प्रयास किया। एक रात वे अति सुन्दर वेश्याओं के मध्य अकेले छोड़ दिये गए। उन रमणियों ने अनेक हाव-भावों से गौतम को रिझाने का प्रयत्न किया। उन्मन गौतम के ऊपर उनका कोई प्रभाव न पड़ा और वे वही सो गए। गणिकाएं भी निट्रामग्न हो गई। राजकुमार गौतम की नींद सहसा टूटी तो साफ-श्रृंगार विहीन गणिकांए निद्रावस्था में उन्हें बड़ी विद्रूय तथा भयानक दिखाई दी। किसी के बाल बिखरे थे, कुछ लगभग निर्वस्त्र थी और उनमें से कुछ भयावह खर्राटे भर रही थी। गौतम में ससांर त्याग की भावना अब दृढ़ हो चुकी थी। अन्त में उन्होंने सांसरिक दु:खों से निवृति का मार्ग खोजने के लिए अपनी पत्नी तथा शिशु का सोते हुए ही छोड़ कर 29 वर्ष की अवस्था में गृहत्याग कर दिया इस घटना को बौद्ध साहित्य में महाभिनिष्कमण कहा जाता है।

सांसारिक दुख उन्मूलन के लिए ज्ञान की खोज की अभिलाषा में सिद्धार्थ अनेक आचार्यो के आश्रम में गए। इनमें एक थे आभार कालाम तथा दूसरे रूद्रक रामपुत्र। यहां सिद्धार्थ ने अनेक प्रकार के कठिन योगाभ्यास सीखें किन्तु उन्हें संतोष नही हुआ। गौतम उरूवेला पहुँचे। उन्हें वहां कौण्डिन्य आदि 5 ब्राह्यण मिले। तथा उन्होंने घोर तपस्या प्रारंभ की, अन्न-जल ग्रहण न्यूनतम कर दिया। वे सुख कर नर-कंकाल के समान हो गए किन्तु ज्ञान की प्राप्ति नही हुई। अत: उन्होंने इस कठिन तपस्या को त्याग दिया और सुजाता नामक कन्या के हाथो भोजन ग्रहण किया।

इस कारण इन 5 ब्राह्यणों ने इनका साथ छोड़ दिया। उखेला के बाद वे गया चले गए और उस स्थान पर एक वट वृक्ष (पीपल) के नीचे ध्यान लगाया। आठ दिन की समाधि के उपरान्त 35 वर्ष की आयु में वैसाखी मास की पूर्णिमा की राित्रा को उन्हें सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हुई। इससे वे बौद्ध (ज्ञानी) अर्थात बुद्ध कहलाए तथा गया ‘बौद्ध गया’ के रूप में विख्यात हो गया। ज्ञान-प्राप्ति के बाद उन्होंने पहला उपदेश ऋषिपतन (सारनाथ) में पांच शिष्यों को दिया जो ‘धर्म-चक्र परिवर्तन’ के नाम से जाना जाता है। यहीं पर प्रथम बुद्ध संघ की स्थापना हुई। सारनाथ के बाद वे मगध गए जहां के शासक बिम्बिसार ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। अजातशत्रु, कौशल नरेश प्रसेनचित, धनी व्यापारी अनाथपिड़क इत्यादि के अतिरिक्त बुद्धे पिता, मौसी, पत्नी व पुत्र ने भी इस धर्म को स्वीकार कर लिया। 40 वर्ष तक विभिन्न क्षेत्रों में प्रचार करते हुए, कुशीनगर में 80 वर्ष की अवस्था में उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ।

बौद्ध धर्म की शिक्षांए तथा सिंद्धात

बुद्ध के महापरिनिर्वाण के तुरंत बाद ही बौद्ध धर्म की पहली संगीति हुई। इसका उद्देश्य बुद्ध वचनों को सुरक्षित करना था। बौद्ध धर्म के बारे में हमें विशाद ज्ञान पालि ित्रापिटक से ही प्राप्त होता है। मूल बौद्ध धर्म कोई पृथक् दर्शन नही है क्योंकि महात्मा बुद्ध ने सतासंबधी किसी प्रश्न पर कभी अपना विचार प्रकट नही किया। वे इस प्रकार के प्रश्नों पर होने वाद-विवादों को अनावश्यक समझते थे। अपने समय के तार्किकों के वाद-विवाद के पचड़े को देख कर महात्मा बुद्ध ने स्वंय अपने अनुयायियों से कहा था कि भिक्षुको! इसे कहते है मतों में जा पड़ना, मतों की गहनता, मतों का कान्तार, मतों का दिखावा तथा मतों का बन्धन। इन मतों के बंधन में बधा हुआ आदमी जिसने सदधर्म को नही सुना वह जन्म, बुढापें तथा मृत्यु से मुक्त नही होता। शोक से रोने-पीटने से, पीड़ित होने से चिन्तित, होने से भी वह मुक्त नही होता। मैं कहता हूँ कि वह दु:ख से पार नही होता। अत: आज जो कुछ भी बौद्ध दर्शन के नाम से प्रख्यात हैं वह बुद्ध की मृत्यु के पश्चात् का विकास है। वह विशुद्ध मौलिक बौद्ध धर्म के अन्तर्गत नही आता।

बौद्ध धर्म का मूलाधार ‘चार आर्य सत्य’ है। इस धर्म के सारे सिंद्धात तथा बाद में विकसित विभिन्न दार्शनिक मत-वादों के ये ही आधार है।
  1. जीवन में दु:ख सत्य है। एवं क्षणिक सुखों को सुख मानना भी अदूरदर्शिता है।
  2. दुख समुदाय-दु:ख का कारण तृष्णा है, इन्द्रियों को जो वस्तुएं प्रिय लगती है, उनकों प्राप्त करने की इच्छा तृष्णा है।
  3. दु:ख निरोध-दु:खों से मुक्त होने के लिए उसके कारण क निवारण आवश्यक है। अर्थात् तृष्णा पर विषय पाकर दु:खों से मुक्ति पाई जा सकती है।
  4. दु:ख निरोध-प्रतिपदा (दु:ख निवारक मार्ग) अर्थात् अष्टांगिक मार्ग। दु:खों के निवारण एवं तृष्णा पर नियंत्रण पाने तथा निर्वाण प्राप्त करने का मार्ग अष्ट मार्ग (मध्य मार्ग) है।
बुद्ध के अनुसार जन्म भी दु:ख है, जरा (वृद्धावस्था) भी दु:ख है, व्याधि भी दु:ख है, अप्रिय मिलन भी दु:ख है, प्रिय वियोग भी दु:ख है। संसार को दु:खमय देखकर ही बुद्ध ने कहा था ‘सब्बं दु:ख’ अर्थात् सभी वस्तुएं दु:खमय है।
अष्टांगिक मार्ग में सिद्धान्त समहित है।
  1. साम्यक् दष्टि : इसका अर्थ है इच्छा के कारण ही इस संसार में दु:ख व्यापक है। इच्छा का परित्याग ही मुक्ति का मार्ग है।
  2. सम्यक् संकल्प : यह लिप्सा और विलासिता से छुटकारा दिलाता है। इसका उद्देश्य मानवता को प्यार करना ओर दूसरों को प्रसन्न रखना है।
  3. सम्यक् वाचन : मनुष्य को झूठ, निन्दा व अप्रिय वचन नही बोलने चाहिए तथा वाणी मृदु होनी चाहिए। 
  4. सम्यक् कर्म : मनुष्य को हिसां के कर्म पूर्ण रूप से संयमशाील होने चाहिए जिसमें अहिसां व इन्द्रिया सयंम के अतिरिक्त, कर्म, दान, सदाचार, दया इत्यादि का समावेश होना चाहिए।
  5. सम्यक् जीविका : अर्थात् आदमी को ईमानदारी से अर्जित साधनों द्वारा जीवन-यापन करना चाहिए। 
  6. सम्यक् प्रयास: इससे तात्पर्य है कि किसी की भी बुरे विचारों से छुटकारा पाने के लिए इन्द्रियों पर नियंत्रण होना चाहिए। कोई भी मानसिक अभ्यास के द्वारा अपनी इच्छाओं एवं मोह को नष्ट कर सकता है।
  7. सम्यक् स्मृति : इसका अर्थ है कि शरीर नश्वर है और सत्य का ध्यान करने से ही सांसारिक बुराईयों से छुटकारा पाया जा सकता है।
  8. सम्यक् समधि : इसका अनुसरण करने से शान्ति प्राप्त होगी। ध्यान से ही वास्तविक सत्य प्राप्त किया जा सकता है।
बौद्ध मत ने कर्म के सिद्धांत पर बल दिया। वर्तमान का निर्णय भूतकाल के कार्य करते है। किसी व्यक्ति की इस जीवन और अगले जीवन की दशा उसके कर्मो पर निर्भर करती है। प्रत्येक व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता है अपने कर्मो को भोगने के लिए हम बार-बार जन्म लेते है। अगर कोई व्यक्ति किसी भी तरह का पाप नही करता है तो उसका पुनर्जन्म नही होगा। इस प्रकार बुद्ध के उपदेशों का अनिवार्य तत्व या सार ‘कर्म दर्शन’ है। बुद्ध के निर्वाण का प्रचार किया। उनके अनुसार यदि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अन्तिम उद्देश्य है। इसका तात्पर्य है सभी इच्छाओं से छुटकारा, दु:खों का अन्त जिससे अन्तत: पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती है। इच्छाओं की समाप्ति की प्रक्रिया के द्वारा कोई भी ‘निर्वान’ पा सकता है। इसलिए, बुद्ध ने उपदेश दिया कि इच्छा को समाप्त करना ही वास्तविक समस्या है। पूजा और बलि इच्छा को समाप्त नही कर सकेंगें। इस प्रकार, वैदिक धर्म में होने वाले अनुष्ठानों एवं यज्ञों के विपरित बुद्ध ने व्यक्तिगत नैतिकता पर बल दिया।

बुद्ध ने न ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारा और न ही नकारा। वह व्यक्ति और उसके कार्यो के विषय में अधिक चिन्तित थे। बौद्ध मत ने आत्मा के अस्तित्व को भी स्वीकार नही किया। बौद्ध धर्म मूलत: अनीश्वरवादी है। सृष्टि का कारण ईश्वर को नही माना गया है। तर्क यह है कि यदि ईश्वर को संसार का रचियता माना जाए तो उसे दु:ख को उत्पन्न करने वाला भी मानना पड़ेगा। वास्तव में बुद्ध ने ईश्वर के स्थान पर मानव प्रतिष्ठा पर बल दिया। महात्मा बुद्ध के अनुसार मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वंय है तथा उसे कर्मो का फल मिलता है। इसी आधार पर उसके भविष्य के जन्मों का निर्धारण भी होता है। उनके चिन्तन में आत्मा के अस्तित्व को नकारा गया है। वे स्पष्ट करते है कि जन्म आत्मा का नही होता बल्कि अनित्य मानव अंहकार का होता है, जिसका आधार मनुष्य के कर्म होते है।

महात्मा बुद्ध ने अपने चिन्तन में नैतिकता, मातृभाव व आत्मशुद्धि को संयुक्त रूप से रखा है एवं स्पष्ट किया है कि नैतिकता इसांन व पशु में अन्तर करती है जिससे मातृभाव बढ़ता है जो कि मानव समाज की एक आवश्यकता भी है। यह तभी संभव है जबकि व्यक्ति आत्मशुद्धि पर बल दे। महात्मा बुद्ध ने नैतिकता पर बल देते हुए आचरण के बारे में दस बाते अपनाने का सुझाव दिया जिसे दस शील कहा जाता है। अंहिसा, झूठ का परित्याग, चोरी न करना, वस्तुओं का सग्रंह न करना, भोग विलासी न बनना, सुगन्धित पदार्थो का परित्याग, सबकी भलाई करना, किसी से घृणा न करना, मन को शुद्ध रखना, नशे का सेवन न करना। उनके इस उपदेश का सार बहुजन हितात व बहुजन सुखाय पर आधारित है महात्मा बुद्ध ने समाज में प्रचलित सभी प्रकार के मिथ्या-आडम्बरों का विरोध किया। उनके अनुसार यज्ञ-बलि, तपस्या, मूर्ति-पूजा इत्यादि का खण्डन किया इसके अलावा उतरवैदिक काल में समाज को जिन चार वर्गो में विभाजित किया था, बुद्ध उसमें विश्वास व्यक्त करते है। इससे समाज में भेदभाव को बढ़ावा मिला। बुद्ध के अनुसार शूद्र व ब्राह्यण दोनों के लिए समान रूप से अष्ट-मार्ग का सिद्धांत निर्वाण का मार्ग है। कोई भी व्यक्ति जन्म के आधार पर छोटा अथवा बड़ा नही होता अपितु उसके कर्म इसका आधार होते है। महात्मा बुद्ध के चिंतन में विश्व के लिए नई व महत्वूपर्ण बात क्षणिकवाद का सिद्धान्त है। जिसके अनुसार संसार की सभी वस्तुएं क्षणिक (नश्वर) व निरन्तर परिवर्तनशील है। वे केवल प्रवाह रूप से स्थाई दिखती है, जैसे नदी का पानी सदैव बहाव में होता है।, परन्तु किनारे से देखने वाले व्यक्ति को वह स्थिर दिखाई देता है। इसी प्रकार संसार भी हर क्षण परिवर्तनशील है। परन्तु हमें क्षण भर में हो रहे परिवर्तन का आभास नही होता है। मनुष्य पदार्थो को स्थायी समझकर अपनी लालसा का हिस्सा बनाने की भूल कर बैठता है अत: मनुष्य को प्रकृति मे चल रहे क्षणिक परिवर्तन को समझकर व्यर्थ की उलझनों में नही फँसना चाहिए।

बौद्ध मत का विकास

बुद्ध के जीवन काल में ही बड़ी संख्या में लोगो ने बौद्ध मत को स्वीकार कर लिया था। उदाहरण के लिए मगध, कौशल और कौसम्बी की जनता ने बौद्ध मत को स्वीकार किया। शाक्य, वज्जि और मल्ल जनपदों की जनता ने भी इसका अनुसरण किया। अशोक एवं कनिष्क ने बौद्ध मत को राज्य धर्म बनाया और यह मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और श्रीलंका में फैल गया। बौद्ध धर्म जनता के बड़े हिस्सों में लोकप्रिय होने के अनेक कारण थे। व्यावहारिक नैतिकता पर बल देना, मानव जाति की सहज स्वीकृत समाधान और साधारण दर्शन ने जनता को बौद्ध मत की और आकर्षित किया। बौद्ध धर्म उस समय के अनुकूल था। लोहे के व्यापक प्रयोग ने कृषि अर्थव्यवस्था को विकसित किया। कृषि विकास ने पशुधन संरक्षण की आवश्यकता को जन्म दिया। बौद्ध धर्म अपने अहिंसा के सिद्धान्त द्वारा इस आवश्यकता को पूरा करता था।

गौतम बुद्ध के व्यक्तित्व ने भी बौद्ध धर्म को लोकप्रिय बनाया। उनकी बौद्धिकता ने शिक्षित वर्ग को उनके आकर्षक व्यक्तित्व व त्यागमय जीवन ने साधारण जन को अपनी तरफ आकर्षित किया। भिक्षुओं ने बौद्ध मत के विचारों को व्यक्त करने के लिए उस समय की लोकप्रिय भाषा पाली में किया। संस्कृत भाषा के प्रयोग करने के कारण ब्राह्यण धर्म सीमा में बंध गया था। क्योंकि संस्कृत भाषा उस समय की जन-भाषा नही थी। अत् बौद्ध धर्म का विस्तार तेजी से हुआ। राजाओं के द्वारा संरक्षण प्रदान किये जाने के कारण बौद्ध धर्म का विस्तार तेजी से हुआ। उदाहरण के लिए ऐसी धारणा है कि अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संगमित्रा को श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए भेजा। उसने बहुत से बौद्ध विहारों को स्थापित किया और संघ के लिए उदार भाव से दान आदि भी दिया।

बौद्ध धर्म ने भारतीय संस्कृति को जीवन के सभी क्षेत्रों में सम्पन्न बनाया। धर्म के क्षेत्र में उसने मूर्ति पूजा को लोकप्रिय बनाया तथा सगठित जीवन को आरम्भ किया। नारी तथा शूद्रों पर जो धार्मिक अपात्राता की भावना थी, उसे समाप्त कर सामाजिक समता का संदेश दिया गया। बौद्ध धर्म ने शिक्षा को सार्वलौकिक बनाया, विवेकवाद का प्रसार किया तथा नालन्दा, विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों को जन्म दिया। साहित्य के क्षेत्र में ज्ञान-विज्ञान व दर्शन को नागार्जुन, वसुमित्र, अश्वघोष, पाश्र्वनाथ जैसे विद्वानों ने सम्पन्न बनाया। कला के क्षेत्र में सांची, भारहुत, बौद्ध गया, अमरावती के स्तूप बौद्ध स्थापत्य के श्रेष्ठ उदाहरण है। मूर्तिकला के क्षेत्र में गांधार शैली, मथुरा शैली तथा सारनाथ शैली का विकास हुआ। अजन्ता व बाध गुफा चित्रों का चित्रण करने में बौद्ध धर्म व बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित विषयों को लिया गया। त्राूटिरहित रेखांकन, सशक्त अभिव्यक्ति तथा रंगों का सुन्दर समन्वय बौद्ध चित्रकला की मुख्य विशेषतांए है।

बौद्ध साहित्य

इस साहित्य को तीन भागों में बांटा गया है :-
  1. सुत्त-पिटक : इसके पांच काय है जिनमें धार्मिक सम्भाषण तथा बुद्ध के संवाद संकलित है। पांचवे निकाय में जातक कथायें (बुद्ध के जन्म से सम्बद्ध कहानियां) है।
  2. विनय पिटक : इसमें भिक्षु-भिक्षुणियों के संघ, उनके दैनिक जीवन संबधी नियमों का वर्णन किया गया है। इस पिटक के तीन भाग है। सुप्तविभाग, खन्दका एवं परिवार पाठ।
  3. अभिधम्म-पिटक : इसक सात भाग है। इसमें बुद्ध के दार्शनिक विचारों का विवरण है इसकों प्रश्न-उत्तर के रूप में लिया गया है।
इसके अलावा दापवंश तथा महावंश-इसमें तत्कालीन भारत की सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक दशा तथा श्रीलंका के राजवंशो का वर्णन किया गया है। दोनों ग्रथों की रचना श्रीलंका में पाली भाषा में की गई थी। मिलिन्दपन्ह नामक ग्रंथ में यूनानी शासक मिलिन्द तथा बौद्ध भिक्षु नागसेन में दार्शनिक विषय को लेकर हुए वाद-विवाद का वर्णन किया गया है बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाएं तथा बुद्धकालीन धार्मिक, सामाजिक तथा आर्थिक जीवन का उल्लेख जातक कथाओं में किया गया है। यह पाली भाषा में लिखी गई है। संस्कृत में लिखित ग्रंथ महावस्तु में बुद्ध की अद्भूत शक्ति तथा बोधिसत्व की प्रतिष्ठा वर्णन किया गया है।

बौद्ध-संघ

संघ बौद्ध मत की धार्मिक व्यवस्था थी। यह अच्छी प्रकार से संगठित एवं शक्तिशाली संस्था थी और इसने बौद्धमत को लोकप्रिय बनाया 15 वर्ष से अधिक आयु वाले सभी नागरिकों के लिए इसकी सदस्यता खुली थी चाहे वे किसी भी जाति के हो।

अपराधी, कृष्ठ रोगी तथा संक्रामक रोग से पीड़ित लोगों को संघ की सदस्यता नही दी जाती थी। प्रारम्भ में गौतम बुद्ध महिलाओं को संघ की सदस्यता नही दी जाती थी। प्रारम्भ में गौतम बुद्ध महिलाओं को संघ का सदस्य बनाने के पक्ष में नही थे। लेकिन उनके मुख्य शिष्य आनन्द एवं उनकी धाय मां महाप्रजापति गौतमी के लगातार निवेदन करने पर उन्होंने उनकों संघ में प्रवेश दिया।

भिक्षुओं को प्रवेश लेने पर विधिपूर्वक अपना मुंडन कराना एवं पीले वस्त्र या गेरूए रंग का लिबास पहनना पड़ता था। भिक्षुओं से आशा की जाती थी कि वे नित्य बौद्ध मत के प्रचार के लिए जायेंगे और भिक्षा प्राप्त करेगें। वर्षा ऋतु के चार महीनों में वे एक निश्चित बिस्तर लगाने तथा समाधि करते थे। इसका आश्रय या ‘वशा’ कहा जाता था। संघ लोगों को शिक्षा देने का काम भी करता था। ब्राह्यणवाद के विपरीत बौद्ध मत में समाज के सभी लोग शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। स्वाभाचिक रूप से जिन लोगों को ब्राह्यणों ने शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार से वंचित कर दिया था। उनको बौद्ध मत में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हो गया और इस प्रकार शिक्षा समाज के काफी तबकों में फैल गई। संघ का संचालन जनंताित्राक सिद्धांतों के अनुसार होता था और अपने सदस्यों को अनुशासित करने की शक्ति भी इसी में निहित थी। यहां पर भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों के लिए एक आचार-संहिता थी और वे इसका पालन करते थे। गलती करने वाले सदस्य को संघ दंडित कर सकता था।

बौद्ध मत की सभायें (बौद्ध संगीति)

अनुश्रुतियों के अनुसार बुद्ध की मृत्यु के थोड़े समय बाद 483 ई.पू. में राजगृह के पास सप्तपर्णि गुफा में बौद्ध मत की प्रथम सभा हुई इस सभा की अध्यक्षता महाकस्यप ने की, इसमें 500 बौद्ध भिक्षुओं ने भाग लिया। इस संगीति का आयोजन तत्कालीन मगध नरेश अजातशत्राु के सरंक्षण में हुआ। बुद्ध की शिक्षा को पिटकों में विभाजित किया गया, जिनके नाम इस प्रकार है -विनय पिटक और सुत्क पिटक। विन्य पिटक की रचना उपाली के नेतृत्व में की गई और सुत्तपिटक की रचना आनन्द के नेतृत्व में की गई।

दूसरी बौद्ध संगीति, बौद्ध भिक्षुओं में उत्पन्न आपसी मतभेद को दूर करने के लिए 300 ई.पू. में वैशाली में कालाशेक के शाशनकाल में हुई। इसमें लगभग 700 भिक्षुओं ने भाग लिया। पाटलीपुत्र तथा वैशाली के भिक्षुओं ने कुछ नियमों का निर्धारण किया परन्तु इन नियमों को कौशाम्बी व अवन्ति के भिक्षुओं के द्वारा बुद्ध की शिक्षा के प्रतिकूल घोषित कर दिया गया। दोनों विरोधी गुटों के बीच कोई भी समझौता कराने में सभा असफल रही। बौद्ध धर्म का विभाजन स्थायी तौर पर दो बौद्ध सम्प्रदायों-स्थविरवादी व महांसधिक में हो गया। पहले सम्प्रदाय ने विनय-पिटक में वर्णित रूढ़िवादी विचारों को अपनाया और दूसरे में नये नियमों का समर्थन किया और फिर उनमें परिवर्तन हुए।

तीसरी सभा का अयोजन अशोक के शासनकाल में मोग्गालिपुतित्स्स की अध्यक्षता में 247 ई.पू. में पाटली पुत्र में हुआ। इस संगीति में लगभग 1000 भिक्षुओं ने भाग लिया। इस सभा में सिद्धांतों को दार्शनिक विवेचना को संकलित किया गया तथा इसको अभिध्म्भ-पिटक के नाम से जाना जाता है। इस सभा में बौद्धमत का असंतुष्टों एवं नये परिवर्तनों से मुक्त कराने का प्रयास किया गया।

चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन कश्मीर के निकट कुण्डमावन ने कनिष्क के शासनकाल में हुआ। वसुमित्र इस सभा के अध्यक्ष व अश्वघोष उपाध्यक्ष थे। संगीति में उतरी भारत के हीनयान सम्प्रदाय को मानने वाले एकित्रात हुए। तीन पिटकों पर तीन टीकाओं (भाष्यों) इसने उन विवादग्रस्त मतभेद वाले प्रश्नों का निबटारा किया जो श्रावस्तीवासियों एवं कश्मीर तथा गन्धार के प्रचारकों के मध्य उत्पन्न हो गए थे।

बौद्ध धर्म के सम्प्रदाय

वैशाली में आयोजित दूसरी सीमा में बौद्ध धर्म दो सम्प्रदायों में विभाजित हो गया- स्थरिवरवादी व महांसाधिक। स्थविरवादी धीरे-धीरे ग्यारह सम्प्रदायों और महासांधिक सात सम्प्रदायों में बंट गए। ये 18 सम्प्रदाय ‘हीनयान’ मत में संगठित हुए। स्थविरवादी कठोर भिक्षुक जीवन और मूल निदेशक कड़े अनुशासिकत नियमों का अनुसरण करते थे। वह समूह जिसने संशोधित नियमों का माना, वह महासंधिक कहलाया।
महायान सम्प्रदाय का विकास चौथी बौद्ध सभा के बाद हुआ। हीनयान सम्प्रदाय जो बुद्ध की रूढ़िवादी शिक्षा में विश्वास करता था, का जिस गुट ने विरोध किया और जिन्होंने नये विचारों को स्वीकार किया, वे लोग ‘महायान’ सम्प्रदाय के समर्थक कहलाये। उन्होंने बुद्ध की प्रतिमा बनाई और ईश्वर की भांति उसकी पूजा की।

बौद्ध धर्म का पतन 

बौद्ध धर्म का उद्भव व विकास ब्राह्यण वर्ग में प्रचलित दुर्गुणों की प्रतिक्रिया का परिणाम था। इसी कारण लोग इस धर्म को त्यागकर इसमें आ गए। समय के साथ-साथ धीरे-धीरे वे सारे दोष इस धर्म में भी आ गए एवं यह धर्म अपनी लोकप्रियता खोने लगा। महात्मा बुद्ध की प्रतिमाएं बनाना, तंत्र-मंत्र के धर्म में प्रवेश ने इस धर्म के आकर्षण को खो दिया। शंकराचार्य व कुमारित्न भट्ट जैसे विद्वानों के प्रयासों से ब्राह्यण धर्म फिर से लोकप्रियता अर्जित करने लगा राजकीय सरंक्षण के अभाव, बौद्ध धर्म के विभाजन के कारण भी यह मत पतन की ओर अग्रसर हो चला।

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