भाषा की संरचना एवं भाषिक आधार

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अनुक्रम

भाषा-संरचना का मूलाधार संरचनात्मक पद्धति है जिस प्रकार भवन रचना में ईट, सीमेंट, लोहा, शक्ति अर्थात् मजदूर और कारीगर की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार भाषा-संरचना में ध्वनि, शब्द, पद, वाक्य, प्रोक्ति और अर्थ की अपनी-अपनी भूमिका होती है।

भाषा की संरचना

ध्वनि -संरचना

सामान्यत: किन्हीं दो या दो से अधिक वस्तुओं के आपस में टकराने से वायु में कम्पन होता है। जब यह कम्पन कानों तक पहुँचता है, तो इसे ध्वनि कहते हैं। भाषा विज्ञान में मानव के मुखांगों से निकली ध्वनियों का अध्ययन किया जाता है। ध्वनि भाषा की लघुतम, स्वतंत्र और महत्त्वपूर्ण इकाई है। यदि सभी भाषा की ध्वनियों में सैद्धान्तिक रूप से कुछ समानताएँ होती हैं तो प्रत्येक भाषा की ध्वनियों में कुछ अपनी विशेषताएँ होती हैं।

(क) वर्गीकरण :-  भाषा-ध्वनियों का अध्ययन करते हैं, तो दो मुख्य वर्ग सामने आते हैं – स्वर और व्यंजन।

1. स्वर : भाषा में कुछ ऐसी ध्वनियाँ होती हैं जिनके उच्चारण में किसी प्रकार का अवरोध नहीं होता अर्थात् इनके उच्चारण में फेफड़े से आनेवाली वायु अबाध गति से बाहर आती है और इनका उच्चारण जितनी देर चाहें कर सकते हैं। विभिन्न भाषाओं में स्वर ध्वनियों की संख्या भिन्न-भिन्न होती है; यथा – वर्तमान समय में हिन्दी की स्वर ध्वनियाँ हैं – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ।अंग्रेजी में स्वरों की संख्या पाँच है – a, e, i, o, u.

विभिन्न भाषाओं में स्पष्ट-ध्वनियों के स्थान-व्यवस्था में भी भिन्नता है। किसी भाषा में समस्त ध्वनियाँ पूर्ववर्ती या परवर्ती एक स्थान पर व्यवस्थित होती हैं; तो किसी भाषा में व्यंजन ध्वनियों के मध्य व्यवस्थित होती है। हिन्दी की सभी स्वर ध्वनियाँ व्यंजन से पूर्व एक स्थान पर व्यवस्थित हैं – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ। अंग्रेजी में स्वरों की व्यवस्था व्यंजनों के मध्य है – abcde ……… hij…………nop…………..tuv…………z.

2. व्यंजन : जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वर ध्वनियों का सहयोग अनिवार्य हो और जिनके उच्चारण में फेफड़े से आनेवाली वायु मुख के किसी भाग में अल्पाधिक रूप से अवरुद्ध होने के कारण घर्षण के साथ बाहर आए, उन्हें व्यंजन ध्वनि कहते हैं। हिन्दी में व्यंजन ध्वनियों को स्वर के बाद स्थान दिया गया है जबकि अंग्रेजी में स्वर ध्वनि के साथ मिश्रित रूप में।

हिन्दी में कुछ व्यंजन ध्वनियों का प्रयोग स्वर के रूप में भी होता है। इन्हें अर्ध स्वर कहते हैं : यथा – य्, व्।

हिन्दी में महाप्राण ध्वनियों के लिए स्वतन्त्रा चिन्हों की व्यवस्था है; यथा – प्रत्येक वर्ग की दूसरी और चौथी ध्वनियाँ –

कवर्ग – ख, घ

चवर्ग – छ, झ

टवर्ग – ठ, द

तवर्ग – थ, ध

पवर्ग – फ, भ

(ख) बलाघात :- भाषा में विभिन्न ध्वनियों के एक साथ प्रयोग होने पर भी उनके उच्चारण में प्रयुक्त बल में पर्याप्त भिन्नता होती है। जब किसी ध्वनि पर अपेक्षाकृत अधिक दबाव होता है, तो उसे बलाघात कहते हैं; यथा – ‘आम’ शब्द में “आ” और “म” दो ध्वनियाँ हैं। “आ” पर ‘म’ की अपेक्षा अधिक बल दिया जाता है।

हिन्दी ध्वनियों में बलाघात के विषय में यह ध्यातव्य है कि यह प्रभाव सदा स्वर पर ही होता है।

जब एक वाक्य में किसी शब्द की सभी ध्वनियाँ अन्य शब्दों की ध्वनियों की अपेक्षा अधिक सशक्त रूप से प्रयुक्त होती हैं, तो उसे शब्द बलाघात कहते हैं; यथा –

(क) मुझे एक रंगवाली कलम चाहिए।

(ख) मुझे एक रंगंगंगवाली कलम चाहिए।

यहाँ ‘क’ वाक्य में ‘एक’ शब्द की ध्वनियों पर बलाघात है, तो ‘ख’ वाक्य में ‘रंगवाली’ शब्द की ध्वनियों पर। इस प्रकार दोनों वाक्यों के अर्थ में भिन्नता आ गई है।

(ग) सन्धि: कभी-कभी दो भाषिक इकाइयाँ मिलकर एक हो जाती हैं, ऐसे ध्वनि परिवर्तन को सन्धि कहते हैं। प्रत्येक भाषा के सन्धि-नियमों की अपनी विशेषताएँ होती हैं। हिन्दी में कई प्रकार की सन्धियाँ मिलती हैं, यथा –

1. ह्रस्वीकरण : हिन्दी तद्भव शब्दों में यह प्रक्रिया मिलती है –

आप + ना   (अ > अ)   = अपना

आधा + खिला   (आ > अ) =   अधखिला

भीख + आरी   (ई > इ) =   भिखारी

2. दीघ्रीकरण :

मुख्य + अर्थ   (अ + अ = आ) =   मुख्यार्थ

कवि + इन्द्र   (इ + इ = ई) =   कवीन्द्र

3. घोषीकरण :

डाक + घर   (क > घ) =   डाकघर

धूप + बत्ती   (प > ब) =   धूपबत्ती

4. लोप:

घोड़ा + दौड़   (आ लोप) =   घुड़दौड़

पानी + घाट   (ई और आ लोप) =   पनघट

5.आगम :

मूसल + धार   (आ आगम) =   मूसलाधार

दीन + नाथ   (आ आगम) =   दीनानाथ

विश्व + मित्रा   (आ आगम) =   विश्वामित्र

शब्द-संरचना

भाषा की लघुतम, स्वतंत्रा और सार्थक इकाई को शब्द की संज्ञा दी जाती है। शब्द-संरचना का अध्ययन उपसर्ग, प्रत्यय, समास तथा पुनरुक्ति आदि रूपों से करते हैं।

उपसर्ग :- उपसर्ग वह भाषिक इकाई है, जो शब्द के पूर्व में प्रयुक्त होती है, किन्तु इसका स्वतंत्रा प्रयोग नहीं होता। ऐसी इकाई शब्द-संरचना का मुख्य आधार है। इसे मुख्यत: दो भागों में विभक्त कर सकते हैं।

प्रथम – अपनी भाषा के उपसर्ग; यथा – हिन्दी में उ, कु, स, सु आदि।

अ – धर्म > अधर्म,   दुर – दिन > दुर्दिन

स – जीव > सजीव,   सु – गंध >सुगंध

द्वितीय – दूसरी भाषा के उपसर्ग; यथा

बे –   बेकाम (फा. + हि.)

बे –   बेसिर (फा. + हि.)।

प्रत्यय – निज भाषा के प्रत्यय

कार   =   नाटककार, साहित्यकार, स्वर्णकार

आनी   =   सेठानी, जेठानी, देवरानी

ता   =   सफलता, असफलता, सुन्दरता

द्वितीय – कभी-कभी शब्द के साथ भिन्न भाषा के उपसर्ग प्रयुक्त होते हैं; यथा –

ई   =   डाक्टरी [ डॉक्टर (अंग्रेजी) + ई (हिन्दी प्रत्यय)]

दारी   =   वफादारी [वफा (अ.) + दार (फा.) ]

ची    =   संदूकची [संदूक (अ.) + ची (तु.) ]

दार  =   जड़दार [जड़ (हिन्दी) + दार (फा.) ]

समास :- समास में दो शब्द जुड़कर एक सामासिक शब्द का रूप धारण कर लेते हैं। ऐसे रूप को समस्त पद या सामासिक पद कहते हैं; यथा –

घोड़ों की दौड़   >   घुड़दौड़

अर्थ संदर्भ से सामासिक शब्दों को दो वर्गों में विभक्त कर सकते हैं –

प्रथम वर्ग में उन सामासिक शब्दों को रख सकते हैं जिनके अर्थ वही रह जाते हैं जो समास के पूर्व होते हैं; यथा –

माता और पिता   =   माता-पिता

राजा और रानी   =   राजा-रानी।

दूसरे वर्ग में उन सामासिक शब्दों को रख सकते हैं, जिनके अर्थ में भिन्नता आ जाती है; यथा –

जल और वायु   =   जलवायु

यहाँ विग्रह में पानी और हवा का ज्ञान होता है, सामासिक रूप में विशेष अर्थ वातावरण का ज्ञान होता है।

पद संरचना

जब शब्द वाक्य निर्माणार्थ निर्धारित व्याकरणिक क्षमता प्राप्त कर लेता है, तो उसे पद की संज्ञा दी जाती है। पद संरचना में शब्दों के विभिन्न व्याकरणिक रूपों का अध्ययन किया जाता है। रूप संरचना, संज्ञा, सर्वमान, क्रिया आदि विभिन्न धरातलों पर करते हैं। संज्ञा के रूप संरचना में मुख्यत: वचन पर चिन्तन करते हैं; यथा –

लड़का > लड़के, लड़कों

गुड़िया > गुड़ियाँ, गुड़ियो, गुड़ियों।

इस प्रकार विभिन्न प्रत्ययों के योग से पद संरचना होती है।

सर्वनाम के साथ विभिन्न कारक चिह्नों के योग से पद संरचना सामने आती है; यथा –

तुम > तुमने, तुमसे, तुममें, तुमको आदि।

आप > आपने, आपसे, आपमें, आपको आदि।

क्रिया पद की संरचना में भी प्रत्यय की विशेष भूमिका होती है; यथा –

चलना > चलें, चलो, चलूँगा, चलिएगा, चलोगी आदि।

दौड़ना > दौड़े, दौड़ो, दौडूँगा, दौड़िएगा, दौड़ोगी आदि।

यदा-कदा संयुक्त क्रिया के प्रयोग-आधार पर क्रिया-पद की विशेष संरचना होती है; यथा –

आना > आ जाओ

मारना > मार डाला, मार दिया

खाना > खा लिया, खा डाला

कांपना > काँप उठा, काँप गया

वाक्य संरचना

भाषा की स्वतंत्रा, पूर्ण सार्थक सहज इकाई को वाक्य कहते हैं। वाक्य में प्रत्यक्ष या परोक्षरूप से कम से कम एक क्रिया का होना अनिवार्य है। वाक्य संरचना में मुख्यत: उद्देश्य तथा विधेय दो भाग होते हैं; यथा – “उदित जा रहा है” में “उदित” उद्देश्य और “जा रहा है” विधेय है। वाक्य में उद्देश्य छिपा भी हो सकता है; यथा –

जाओ > (तुम) जाओ।

खाइए > (आप) खाइए।

वाक्य की स्पष्ट संरचना का भावाभिव्यक्ति में विशेष महत्त्व होता है; यथा –

रोको मत जाने दो, रोको मत जाने दो।

यहाँ प्रथम वाक्य संरचना में ‘न रोको’ की भावाभिव्यक्ति है, तो दूसरी वाक्य संरचना में ‘रोकने’ की। वाक्य को संरचनात्मक आधार पर सरल, संयुक्त और मिश्र वर्गों में विभक्त कर सकते हैं। एक प्रकार के वाक्य को दूसरे प्रकार के वाक्य में परिवर्तित कर सकते हैं; यथा – निषेधात्मक वाक्य निर्माण प्रक्रिया –

(क) वह योग्य है > वह अयोग्य नहीं।

(ख) तुम यहाँ से जाओ > तुम यहाँ न रुको।

प्रोक्ति-संरचना

भाषा की महत्तम इकाई प्रोक्ति है। ध्वनि यदि भाषा की लघुत्तम इकाई है, तो प्रोक्ति महत्तम और पूर्ण अभिव्यक्ति करनेवाली इकाई है। वाक्य के द्वारा प्रोक्ति के समकक्ष अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है; यथा –

  1. नितिन अच्छा लड़का है।
  2. नितिन एम.ए. का छात्र है।
  3. नितिन नियमित परिश्रम करता है।
  4. नितिन को परीक्षा में प्रथम स्थान मिला

यहाँ नितिन के विषय में चार वाक्य दिए गए हैं। आपसी सम्बन्धों के अभाव में यहाँ पूर्ण, स्पष्ट और सहज अभिव्यक्ति नहीं है। प्रोक्ति का रूप आते ही भावाभिव्यक्ति स्पष्ट हो जाती है – “नितिन अच्छा लड़का है। नियमित परिश्रम करने के कारण उसे एम.ए. की परीक्षा में प्रथम स्थान मिला।” यह एक लघु प्रोक्ति है। प्रोक्ति का स्वरूप तो उपन्यास या महाकाव्य के प्रथम शब्द से अन्तिम शब्द तक विस्तृत हा े सकता है। आचार्य विश्वनाथ ने ‘साहित्य दर्पण’ में महाकाव्य की कल्पना की है। उन्होंने लिखा है – “वाक्योच्चयो महावाक्यम्” वाक्यों का उच्चय (उव् + चय) एक-दूसरे के ऊपर सदा रूप महाकाव्य है। इस प्रकार विभिन्न वाक्यों के एक-दूसरे के साथ समाहित होने के स्वरूप को वाक्य कहते हैं।

वाक्य या प्रोक्ति के विभिन्न घटकरूपी वाक्य भिन्न-भिन्न अर्थ रखते हुए भी परस्पर मिलते हुए भी एक समग्रता बोधक अर्थ की अभिव्यक्ति करते हैं। इस प्रकार वाक्य से कहीं विस्तृत अर्थ और संरचना का ज्ञान होता है। इस प्रक्रिया से जुड़े विभिन्न वाक्यों का समूह विशेष भाव और संरचना संदर्भ में भाषा की महत्तम इकाई का बोध कराता है। आचार्य विश्वनाथ ने इसे ‘महावाक्य’ कहा तो डॉ. रामचन्द्र वर्मा इसे ‘वाक्यबन्ध’ नाम अभिहित किया है। उनकी धारणा है कि यदि पद से विभिन्न पदों के योग पर पदबन्ध बनाता है तो वाक्य को विभिन्न वाक्यों के योग से वाक्यबन्ध बनना चाहिए।

डॉ. भोलानाथ ने आचार्य विश्वनाथ के नाम पर सहमति व्यक्त करते हुए लिखा, “यह अजीब-सी बात है कि अपनी परम्परा के इस पुराने शब्द महाकाव्य को छोड़कर आज हमने इस अर्थ में एक नया शब्द ‘प्रोक्ति’ बनाया है और स्वीकार किया है। ऐसा करके हमने “अपनी परम्परा के प्रति बहुत न्याय नहीं किया है।”

डॉ. रामचन्द्र वर्मा ने प्रोक्ति को इस प्रकार परिभाषित किया है, “अर्थ की दृष्टि से परिपूर्ण वाक्यों की सुसंबद्ध इकाई का नाम प्रोक्ति है।”

प्रोक्ति की संरचना, आन्तरिक अर्थ-संदर्भ और अभिव्यक्ति को ध्यान में रखकर इसे इन तत्त्व-रूपों में देख सकते हैं –

  1. एकाधिकवाक्य।
  2. आन्तरिक सुसंबद्धता या संबद्धता।
  3. तत्त्व-सरणि: वक्ता, श्रोता, वक्तव्य, संदर्भ, शैली प्रकार।
  4. संप्रेषणीयता।
  5. संरचना और संप्रेषणीयता में एक इकाई स्वरूप।

अर्थ -संरचना

ध्वनि, शब्द, पद और वाक्य आदि भाषा की शारीरिक इकाइयाँ हैं, तो अर्थ भाषा की आत्मा है। अर्थ को मुख्यत: सात वर्गों में विभक्त कर सकते हैं –

(क) मुख्यार्थ – पानी, गाय, विद्यालय आदि।

(ख) लक्ष्यार्थ – वह तो गधा है।

(ग) व्यंजनार्थ – यहाँ परम्परा से अर्थ जोड़ते हैं, यथा – गंगा जल (पवित्राता का प्रतीक)

(घ) सामाजिक – “VYou”B शब्द के लिए हिन्दी में विभिन्न संदर्भों के लिए तू, तुम और आपका प्रयोग करते हैं।

तू – (छोटे के लिए, गुस्से में) तू जा, तू खा।

तुम – (बराबर के लिए) तुम चलो, तुम लिखो।

आप – (आदर सूचक, बड़ों के लिए) आप चलिए, आप लिखिए।

(ड़) बलात्मक – प्रमोद रोटी खाएगा, रोटी खाएगा प्रमोद।

(च) शैलीय अर्थ – (हिन्दुस्तानी, उर्दू, हिन्दी शैली) आप बैठिए, आप तशरीफ रखिए, आप विराजिए।

पर्यायता : कुछ शब्दों को पर्यायी या समानाथ्र्ाी शब्द कहते हैं। वास्तव में पर्यायी शब्दों के दो वर्ग हैं –

(क) पूर्ण पर्यायी : Dog > कुत्ता, Man > आदमी।

(ख) आंंशिक पर्यायी : भीगा-गीला, छोटा-नाटा, सुन्दर-अच्छा, बढ़िया-स्वादिष्ट।

विलोम : विलोम अर्थ अभिव्यक्ति हेतु मूल यौगिक रूपों में शब्दों का निर्माण करता है।

मूल: जड़-चेतन, सुख-दु:ख, दिन-रात आदि।

यौगिक : इसमें कभी उपसर्ग लगाते हैं कभी प्रत्यय;

यथा – शुभ-अशुभ, उचित-अनुचित (उपसर्ग-आधार), कृतज्ञ-कृतघ्न (प्रत्यय-आधार)

अर्थ-संरचना में समास की भी विशेष भूमिका होती है; यथा –

दुआ-बद्दुआ, स्वदेश-परदेश (विदेश)

स्वतंत्र-परतंत्र, बुद्धिमान-बुद्धिहीन

इसी प्रकार अनेकाथ्री शब्दों की संरचना में भी विविधता देखी जा सकती है, जो भाषा-संरचना का महत्त्वपूर्ण अंश है।

भाषिक-आधार

भाषा के तीन आधार यहाँ दिए जा रहे हैं। पहला मानसिक आधार (Intellectual basis), दूसरा भौतिक आधार (physical basis), सामाजिक आधार (Social basis)।

मानसिक आधार

भाषा की आत्मा है तो भौतिक आधार उसका शरीर। मानसिक आधार या आत्मा से आशय हे, वे विचार या भाव जिनकी अभिव्यक्ति के लिए वक्ता भाषा का प्रयोग करता है और भाषा के भौतिक आधार के सहारे श्रोता जिनको ग्रहण करता है। भौतिक आधार या शरीर से आश्य है-भाषा में प्रयुक्त ध्वनियाँ (वर्ण, सुर और स्वराघात आदि) जो भावों और विचारों की वाहिका है, जिनका आधार लेकर वक्ता अपने विचारों या भावों को व्यक्त करता है ओर जिनका आधार लेकर श्रोता विचारों या भावों को ग्रहण करता है। उदाहरणार्थ, हम ‘सुन्दर’ शब्द लें। इसका एक अर्थ है। इसके उच्चारण करने वाले के मस्तिष्क में वह अर्थ होगा और सुनने वाला भी इसे सुनकर अपने मस्तिष्क में उस अर्थ को ग्रहण कर लेगा। यही अर्थ ‘सुन्दर’ की आत्मा है। दूसरे शब्दों में यही है मानसिक पक्ष।

भौतिक आधार

मानसिक पक्ष सूक्ष्म है, अत: उसे किसी स्थूल का सहारा लेना पड़ता है। यह स्थूल हैं स् + उ + न् + द् अ+ र्। सुन्दर के भाव या विचार को व्यक्त करने के लिए वक्ता इन ध्वनि-समूहों का सहारा लेता है, और इन्हें सुनकर श्रोता ‘सुन्दर’ अर्थ ग्रहण करता है, अतएव ये ध्वनियाँ उस अर्थ की वाहिका, शरीर या भौतिक आधार हैं। भौतिक आधार तत्वत: अभिव्यक्ति का साधन है, और मानसिक आधार साध्य। दोनों के मिलने से भाषा बनती है। कभी-कभी इन्हीं को क्रमश: बाह्य भाषा (outer speech) तथा आन्तरिक भाषा (inner speech) भी कहा गया है। प्रथम को समझने के लिए शरीर विज्ञान तथा भौतिकशास्त्र की सहायता लेनी पड़ती है, और दूसरे को समझने के लिए शरीर विज्ञान तथा भौतिकशास्त्र की सहायता लेनी पड़ती है, और दूसरे को समझने के लिए मनोविज्ञान की।

कुछ लोग वक्ता और श्रोता के मानसिक व्यापार को भी भाषा का मानसिक आधार मानते हैं और इसी प्रकार बोलने और सुनने की प्रक्रिया बोलने और सुनने की प्रक्रिया को भी भौतिक आधार। एक दृष्टि से यह भी ठीक है। यों तो उच्चारणावयवों एवं ध्वनि ले जाने वाली तरंगों को भी भौतिक आधार तथा मस्तिष्क को मानसिक आधार माना जा सकता है, किन्तु परंपरागत रूप में भाषाविज्ञान में केवल ध्वनियाँ, जो बोली और सुनी जाती हैं, भौतिक आधार मानी जाती हैं, और विचार, जो वक्ता द्वारा अभिव्यक्त किये जाते हैं और श्रोता द्वारा ग्रहण किये जाते हैं, मानसिक आधार माने जाते हैं।

सामाजिक आधार

मनुष्य एक सामाजिक प्रणी है। समाज में रहते हुए उसे अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। एक-दूसरे के साथ विचारों का आदान-प्रदान करने के लिए, एक-दूसरे को अपनी आवश्यकताएँ बताने के लिए और उन को पूरा करने के लिएऋ वह जिस माध्यम का प्रयोग करते हैं वह भाषा ही है। यही समाजिक-प्रवृत्ति ‘भाषा’ का सामाजिक आधार है। बच्चा अपने माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों से भाषा सीखता है। यदि इस के स्थान पर किसी बालक को जन्म के उपरान्त समाज से अलग रखा जाये, उससे खाने-पीने के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का सम्पर्क स्थापित न किया जाए तो वह भाषा के अस्तित्व से अनभिज्ञ रहेगा। समाज एक ऐसा स्थान है जहाँ मनुष्य का मानिसक विकास होता है। जैसे समाज होता है उस की भाषा भी वैसी होती है। किसी भी व्यक्ति का कि वह किस क्षेत्र अथवा समाज से सम्बंध्ति है? इसका अन्दाजा उसकी भाषा तथा बोलचाल के लहजे से लगाया जा सकता है। भाषा की प्रकृति अनुकरणात्मक होती है जिससे सम्पर्क पैदा होता है, जो भाषा को सामाजिक आधार प्रदान करता है।

यह तीनों आधार भाषा में अपनी-अपनी ठोस एवं सक्रिय भूमिका रखते हैं, इनमें से एक की कमी भाषा को अपंग कर जाती है। यदि अध्यापक को इस का ज्ञान होगा तभी वह व्यक्तिगत विभिन्नताओं को ध्यान में रख कर विचारों और भावों को आदान-प्रदान हेतु अवसर जुटाकर इनके सुदृढ़ योगदान से भाषा में प्रभावोत्पादकता, शुद्धता तथा सुचारुता उत्पन्न कर सकता है।

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Sk

Jan 1, 2020, 1:55 pm Reply

Likewise

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