भाषा विज्ञान की परिभाषा, स्वरूप एवं व्याप्ति

In this page:


भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन को भाषा विज्ञान कहते हैं। प्राचीन काल में भाषा विषयक अध्ययन निरुक्त्त, शब्दानुशासन, निर्वसन-शास्त्र, व्याकरण और प्रतिशाख्य आदि में होता रहा है। आधुनिक भाषा विज्ञान की प्रक्रिया शुरू हुए दो शताब्दी हो चुकी है। भाषा विज्ञान के लिए समय-समय पर अनेक नाम दिए गए हैं। सर्वप्रथप इसके तुलनात्मक अध्ययन को देखते हुए इसे कम्पेरेटिव ग्रामर (Comparative Grammar) कहा गया। कुछ समय पश्चात् यह देखा गया कि इसमें केवल व्याकरण का ही तुलनात्मक अध्ययन न होकर भाषा के अन्य पक्षों का भी तुलनात्मक अध्ययन होता है, तो इसके स्थान पर कम्पेरेटिव फिलोलोजी (Comparative Philology) नाम रखा गया। कुछ समय तक यह नाम चलता रहा फिर यह अनुभव किया गया कि ऐसे अध्ययन में सदा ही तुलनात्मक दृष्टिकोण रहता है इसलिए तुलानात्मक भाव की स्वत: अभिव्यक्ति के कारण फिलोलोजी (Philology) नाम चलने लग गया। इसमें भाषा विज्ञान सर्वाधिक प्रचलित शब्द है। वर्तमान समय की प्रयोग-स्थिति में भाषा विज्ञान शब्द लिंग्विस्टिक्स का समानाथ्र्ाी बन गया है। भाषा विज्ञान सर्वाधिक प्रचलित होने के साथ सहज रूप में भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन का भाव प्रकट करता है।

भाषा विज्ञान की परिभाषा

भाषा के क्रमबद्ध तथा सुसंगठित अध्ययन को भाषा विज्ञान कहते हैं। इसमें मानव-मुखोच्चरित और लिखित भाषा- रूपों का अध्ययन किया जाता है। भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों ने समय-समय पर भाषा विज्ञान की परिभाषा की है।

डॉ. देवेन्द्र शर्मा ने भाषा विज्ञान की भूमिका के पृष्ठ 176 पर भाषा विज्ञान की परिभाषा करते हुए लिखा है - ‘‘भाषा विज्ञान का सीधा अर्थ है भाषा का विज्ञान और विज्ञान का अर्थ है विशिष्ट ज्ञान। इस प्रकार भाषा का विशिष्ट ज्ञान भाषा विज्ञान कहलाएगा।’’

डॉ. भोलानाथ तिवारी ने भाषा विज्ञान क े पृ. 7 पर भाषा विज्ञान की परिभाषा इस प्रकार की है - ‘‘भाषा विज्ञान वह विज्ञान है, जिसमें भाषा विशिष्ट, कई और सामान्य का समकालिक, ऐतिहासिक, तुलनात्मक और प्रयोगिक दृष्टि से अध्ययन और तद्विषयक सिद्धान्तों का निर्धारण किया जाता है।’’

डॉ. देवी शंकर ने भाषा और भाषिकी के पृ. 129 पर भाषिकी शब्द को महत्त्व देते हुए लिखा है - ‘‘भाषा विज्ञान को अर्थात् भाषा के विज्ञान को भाषिकी कहते हैं। भाषिकी में भाषा का वैज्ञानिक विवेचन किया जाता है।’’

डॉ. मंगल देव शास्त्री ने तुलनात्मक भाषा शास्त्र के पृ. 3 पर लिखा है - ‘‘भाषा विज्ञान उस विज्ञान को कहते हैं, जिसमें सामान्यरूप से मानवीय भाषा का, किसी विशेष भाषा की रचना और इतिहास का और अन्तत: भाषाओं, प्रादेशिक भाषाओं या बोलियों के वर्गो की पारस्परिक समानताओं और विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है।’’

इस प्रकार भाषा विज्ञान की परिभाषा के संदर्भ में दिए गए भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों के प्रत्येक मन्तव्य का अपना महत्त्व है। भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन की दिशाएँ भिन्न हो सकती हैं, किन्तु वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना अनिवार्य है।

भाषा विज्ञान की व्याप्ति

भाषा विज्ञान का क्षेत्रा अत्यन्त विस्तृत है। इसका क्षेत्रा विश्व की समस्त भाषाओं तक फैला हुआ है। भाषा विज्ञान मानव मात्रा की भाषा से सम्बन्धित होता है इसलिए इसका विस्तार मानव के चिन्तन तक है। इसमें यदि साहित्यिक भाषाओं का अध्ययन किया जाता है, तो विभिन्न बोलियों का भी अध्ययन किया जाता है। वर्तमान समय में बोलियों का अध्ययन भाषा विज्ञान का महत्त्वपूर्ण अंग बन गया है इसमें भाषा विवेचनात्मक, विश्लेषणात्मक अध्ययन के साथ उत्पत्ति तथा विकास का भी अध्ययन किया जाता है।

भाषा विज्ञान में वर्तमान तथा अतीत से सम्बन्धित भाषाओं का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार कह सकते हैं कि इसमें एक तरफ उन भाषाओं का अध्ययन किया जाता है जो अब वाचिक रूप में प्रयुक्त नहीं होती हैं, उनका केवल साहित्य प्राप्त होता है। भाषा के विभिन्न कालों में भाषा विज्ञान का सम्बन्ध होता है। भाषा की विभिन्न इकाइयाँ-ध्वनि, वर्ण, शब्द, पद, वाक्य तथा अर्थ भाषा विज्ञान क्षेत्रा के विभिन्न आयाम हैं।

भाषा विज्ञान की अध्ययन की दिशाएँ

इसे भाषा विज्ञान अध्ययन की प्रणालियाँ भी कहते हैं। भाषा विज्ञान में एक भाषा, दो भाषाओं अथवा विविध भाषाओं का विशिष्ट अध्ययन करते हैं। भाषा के उच्चरित या लिखित अथवा दोनों स्वरूपों पर चिन्तन किया जाता है। भाषा विज्ञान - अध्ययन की प्रणालियाँ हैं -

वर्णनात्मक पद्धति

जब किसी भाषा के विशिष्ट काल का संगठनात्मक अध्ययन किया जाता है, तो उसे वर्णनात्मक अध्ययन कहते हैं। प्रसिद्ध विद्वान पाणिनी के अष्टाध्यायी में इसी प्रकार का भाषा - अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इसमें भाषा के संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया तथा विशेषण आदि की वर्णनात्मक समीक्षा करते हुए ध्वनि, शब्द, वाक्य आदि पर विचार किया जाता है। भाषा की सब इकाइयों पर अध्ययन करते हुए उनसे सम्बन्धित नियम निर्धारित किया जाता है। भाषा के सीमित काल का ही अध्ययन होता है, फिर भी इसका प्राचीन काल से विशेष महत्त्व रहा है। इस प्रकार के अध्ययन में भाषा के साधु - असाधु रूपों पर चिन्तन करते हुए उसके घ्वनि, शब्द आदि इकाइयोंरूपी शरीरांग के साथ उसकी अर्थरूपी आत्मा पर भी विचार किया जाता है। वर्तमान समय में वर्णनात्मक पद्धति के भाषा - अध्ययन की ओर विद्वानों का विशेष झुकाव दिखाई पड़ता है।

ऐतिहासिक अध्ययन

इस पद्धति में भाषा विशेष के काल-क्रमिक विकास का अध्ययन किया जाता है। यदि किसी विशेष भाषा के कालों के विवरणात्मक अध्ययन को कालक्रम से व्यवस्थित कर दिया जाए, तो ऐतिहासिक अध्ययन हो जाएगा।
भाषा - विकास या परिवर्तन की विभिन्न धाराओं का अध्ययन इसी पद्धति में होता है। भारतीय आर्य भाषाओं के विकास-क्रम में हिन्दी का अध्ययन करना चाहें तो इसी पद्धति से वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, भाषाओं पर विचार करते हुए हिन्दी भाषा का अध्ययन किया जाएगा। यदि हिन्दी शब्दों का उद्भव और विकास जानना चाहेंगे तो संस्कृत, पाली, प्राकृत और अपभ्रंश के साथ हिन्दी का कालक्रमिक अध्ययन करना होगा; यथा - कर्म (संस्कृत) झ कम्म (प्राकृत) झ काम (हिन्दी)। भाषा चिर परिवर्तनशील है। समय तथा स्थान परिवर्तन के साथ भाषा में परिवर्तन होना स्वभाविक ही है। समय-समय पर भाषा की ध्वनियों, शब्दों तथा वाक्यों में ही नहीं अर्थ में भी परिवर्तन होता रहता है। यह परिवर्तन हमें ऐतिहासिक पद्धति के अध्ययन से ही ज्ञात होता है।

तुलनात्मक पद्धति

भाषा - अध्ययन की जिस पद्धति में दो या दो से अधिक भाषाओं की ध्वनियों, वर्णों, शब्दों, पदों, वाक्यों और अर्थों आदि की तुलना की जाती है, उसे भाषा - अध्ययन की तुलनात्मक पद्धति कहते हैं। इस अध्ययन के अन्तर्गत एक भाषा के विभिन्न कालों के रूपों का तुलनात्मक अध्ययन कर उसकी विकासात्मक स्थिति का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त करते हैं। एक भाषा की विभिन्न बोलियों की समता-विषमता जानने के लिए भी भाषा - अध्ययन की इस पद्धति से ही उभरा है। इसका प्रबल प्रमाण है कि प्रारम्भ में इसके लिए तुलनात्मक भाषा विज्ञान (Comparative Philology) नाम दिया गया था। यह भी सत्य है कि बिना तुलनात्मक अध्ययन - दृष्टिकोण अपनाए किसी नियम का निर्धारण अत्यन्त कठिन होता है। भाषा - परिवार के निर्धारण में भी तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक होता है। भाषा की सरसता, सरलता या विशेषताओं को स्पष्टरूप से रेखांकित करने के लिए तुलनात्मक अध्ययन सर्वाधिक उपयोगी होता है।

प्रयोगात्मक पद्धति

भाषा - अध्ययन का महत्त्व दिन - प्रतिदिन बढ़ रहा है। इसे देखते हुए भाषा - अध्ययन की इस नई पद्धति का प्रारम्भ हुआ है। इसमें भाषा के जीवन्तरूप का व्यवहारिक ढंग से अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन किसी क्षेत्रा विशेष से जुड़ा होता है। इसलिए इसे क्षेत्राीय कार्य (Field Work) कहते हैं। इस पद्धति के अध्ययन में अध्येता को किसी क्षेत्रा विशेष में जाकर सम्बन्धित भाषा - भाषी से निकट सम्पर्क करना होता है। प्रायोगिक अध्ययन में किसी भाषा या बोली की ध्वनियों, शब्दों, वाक्यों के साथ बोलनेवाले की भाषा में प्रयुक्त मुहावरे, कहावतों आदि की प्रयोग-स्थिति भी अध्ययन किया जाता है। प्रयोगात्मक अध्ययन से ही विभिन्न बोलियों की सहजता, स्वाभाविकता तथा अभिव्यक्ति की स्पष्टता की बात सामने आ रही है जैसे-जैसे क्षेत्राीय भाषाओं के प्रयोग की बात जोर पकड़ रही है। वैसे - वैसे इस पद्धति के अध्ययन में गति आ रही है। वर्तमान समय में विभिन्न विद्वानों की भाषा-विशेषताओं को जानने के लिए भी प्रयोगात्मक पद्धति अपनायी जाती है। आधुनिक भाषा विज्ञान में प्रयोगात्मक पद्धति के अध्ययन का विशेष महत्त्व है।

संचनात्मक पद्धति

जिस पद्धति में भाषा की संरचना के आधार पर अध्ययन किया जाए उसे भाषा - अध्ययन की संरचनात्मक पद्धति कहते हैं। भाषा - अध्ययन की यह पद्धति भाषा की विभिन्न इकाइयों के सूक्ष्म चिन्तन पर आधारित है। इसमें भाषा का विवेचन और विश्लेषण संगठनात्मक दृष्टिकोण से करते हैं। भाषा के संरचनात्मक अध्ययन में पारस्परिक सम्बद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है, वर्णनात्मक भाषा - अध्ययन में भी यत्रा - तत्रा संरचनात्मक रूप उभर आता है। वर्णनात्मक पद्धति और संरचनात्मक पद्धति के अध्ययन में विशिष्ट अन्तर यह है कि वर्णनात्मक पद्धति में भाषा की इकायों का अध्ययन एकाकी रूप में किया जाता है, जबकि संरचनात्मक अध्ययन में विभिन्न इकाइयों के पारम्परिक सम्बन्ध पर भी विचार किया जाता है, यथा - ‘‘काम’’ शब्द के संरचनात्मक अध्ययन में इसके विभिन्न ध्वनि - चिह्नों - क् + आ + म् + अ के लिखित तथा विभिन्न ध्वनियों क् + आ + म् के उच्चरित रूप पर चिन्तन करते हैं। इस प्रकार शब्द-संरचना के अध्ययन में उससे सम्बन्धित ध्वनियों के साथ वाक्यों में प्रयोग की स्थिति पर भी विचार करते हैं। इससे उक्त शब्द के लिखित तथा उच्चरित रूपों का सुस्पष्ट प्रमाण मिल जाता है। वर्तमान समय में भाषा-अध्ययन की संरचनात्मक पद्धति पर विशेष बल दिया जा रहा है।

Comments