भाषा विज्ञान किसे कहते हैं ? भाषा विज्ञान की परिभाषा

भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन जिस शास्त्र में किया जाता है, उसे भाषा का विज्ञान कहते हैं। अध्ययन के अनेक विषयों में से आजकल भाषा-विज्ञान को विशेष महत्व दिया जा रहा है। अपने वर्तमान स्वरूप में भाषा विज्ञान पश्चिमी विद्वानों के मस्तिष्क की देन कहा जाता है। अति प्राचीन काल से ही भाषा-सम्बन्धी अध्ययन की प्रवृत्ति संस्कृत-साहित्य में पाई जाती है। ‘शिक्षा’ नामक वेदांग में भाषा सम्बन्धी सूक्ष्म चर्चा उपलब्ध होती है। ध्वनियों के उच्चारण- अवयव, स्थान, प्रयत्न आदि का इन ग्रन्थों में विस्तृत वर्णन उपलब्ध है। ‘प्रातिशाख्य’ एवं निरूक्त में शब्दों की व्युत्पत्ति, धातु, उपसर्ग-प्रत्यय आदि विषयों पर वैज्ञानिक विश्लेषण भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन कहा जा सकता है। 

संस्कृत-साहित्य में दर्शन एवं साहित्यशास्त्राीय ग्रन्थों में भी हमें ‘शब्द’ ’अर्थ’, ‘रस’ ‘भाव’ के सूक्ष्म विवेचन के अन्तर्गत भाषा वैज्ञानिक चर्चाओं के ही संकेत प्राप्त होते हैं’ संस्कृत-साहित्य में यत्र-तत्र उपलब्ध होने वाली भाषा-विचार-विषयक सामग्री ही निश्चित रूप से वर्तमान भाषा-विज्ञान की आधारशिला कही जा सकती है। 

आधुनिक विषय के रूप में भाषा-विज्ञान का सूत्रपात यूरोप में सन 1786 ई0 में सर विलियम जोन्स नामक विद्वान द्वारा किया गया माना जाता है। संस्कृत भाषा के अध्ययन के प्रसंग में सर विलियम जोन्स ने ही सर्वप्रथम संस्कृत, ग्रीक और लैटिन भाषा का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए इस संभावना को व्यक्त किया था कि संभवतः इन तीनों भाषाओं के मूल में कोई एक भाषा रूप ही आधार बना हुआ है। अतः इन तीनों भाषाओं (संस्कृत, ग्रीक, और लैटिन) के बीच एक सूक्ष्म संबंध सूत्र अवश्य विद्यमान है। भाषाओं का इस प्रकार का तुलनात्मक अध्ययन ही आधुनकि भाषा-विज्ञान के क्षेत्र का पहला कदम बना।

भाषा विज्ञान के अनेक नाम 

भाषा-सम्बन्धी इस अध्ययन को यूरोप में आज तक अनेक नामों और संज्ञाओं से अभिहित किया जाता रहा है। सर्वप्रथम इस अध्ययन को फिलोलाॅजी शब्द के आगे विशेषण के रूप में एक शब्द जोड़ा गया- तब इसे ‘‘कम्पैरेटिव फिलोलाॅजी’’ कह कर पुकारा गया। उन्नीसवीं शताब्दी तक व्याकरण तथा भाषा-विषयक अध्ययन को प्रायः एक ही समझा जाता था। अतः इसे विद्वानों ने कम्पैरेटिव ग्रामर नाम भी दिया।

फ्रांस में इसको लैंगिस्तीक् (Linguistique)नाम दिया गया। फ्रांस में भाषा सम्बन्धी कार्य अधिक होने के कारण उन्नीसवीं सदी में सम्पूर्ण यूरोप में ही (Linguistique) अथवा "Linguistics" नाम ही प्रचलित रहा है। इसके अतिरिक्त साइंस आफ लैंग्वेज, ‘ग्लौटोलेजी’ आदि अन्य नाम भी इस विषय को प्रकट करने के लिए काम में आये। आज इन सभी नामों में से ‘‘लिंग्विस्टिक्स’’ या ‘‘फिलोलाॅज’’ मात्रा ही प्रयोग में लाए जाते हैं। 

भारत में इन सभी यूरोपीय नामों के अतिरिक्त हिन्दी भाषा में जो नाम प्रयोग में लाए जाते हैं वे इस प्रकार हैं- ‘‘भाषा-शास्त्रा’’, ‘‘भाषा-तत्त्व’’, ‘‘भाषा-विज्ञान’’, तथा ‘‘तुलनात्मक भाषा-विज्ञान’’ आदि। इन सभी नामों में से सर्व प्रचलित नाम ‘‘भाषा-विज्ञान’’ है।

भाषा विज्ञान का अर्थ

‘‘भाषा-विज्ञान’’ नाम में दो पदों का प्रयोग हुआ है। ‘‘भाषा’’ तथा ‘‘विज्ञान’’। भाषा विज्ञान को समझने से पूर्व इन दोनों शब्दों से परिचित होना आवश्यक प्रतीत होता है। ‘भाषा’ शब्द संस्कृत की ‘‘भाष्’’ धातु से निष्पन्न हुआ है। जिसका अर्थ है-व्यक्त वाक् (व्यक्तायां वाचि)। ‘विज्ञान’ शब्द में ‘वि’ उपसर्ग तथा ‘ज्ञा’ धातु से ‘ल्युट्’ (अन) प्रत्यय लगाने पर बनता है। सामान्य रूप से ‘भाषा’ का अर्थ है ‘बोल चाल की भाषा या बोली’ तथा ‘विज्ञान’ का अर्थ है ‘विशेष ज्ञान’।

भाषा विज्ञान की परिभाषा

भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों ने समय-समय पर भाषा विज्ञान की परिभाषा की है।

डॉ. देवेन्द्र शर्मा - भाषा विज्ञान की भूमिका के पृष्ठ 176 पर भाषा विज्ञान की परिभाषा करते हुए लिखा है - ‘‘भाषा विज्ञान का सीधा अर्थ है भाषा का विज्ञान और विज्ञान का अर्थ है विशिष्ट ज्ञान। इस प्रकार भाषा का विशिष्ट ज्ञान भाषा विज्ञान कहलाएगा।’’

डॉ. भोलानाथ तिवारी - ‘‘भाषा विज्ञान वह विज्ञान है, जिसमें भाषा विशिष्ट, कई और सामान्य का समकालिक, ऐतिहासिक, तुलनात्मक और प्रयोगिक दृष्टि से अध्ययन और तद्विषयक सिद्धान्तों का निर्धारण किया जाता है।’’

डॉ. देवी शंकर - ‘‘भाषा विज्ञान को अर्थात् भाषा के विज्ञान को भाषिकी कहते हैं। भाषिकी में भाषा का वैज्ञानिक विवेचन किया जाता है।’’

डॉ. मंगल देव शास्त्री - ‘‘भाषा विज्ञान उस विज्ञान को कहते हैं, जिसमें सामान्यरूप से मानवीय भाषा का, किसी विशेष भाषा की रचना और इतिहास का और अन्तत: भाषाओं, प्रादेशिक भाषाओं या बोलियों के वर्गों की पारस्परिक समानताओं और विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है।’’

भाषा विज्ञान का क्षेत्र 

भाषा विज्ञान का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। इसका क्षेत्रा विश्व की समस्त भाषाओं तक फैला हुआ है। भाषा विज्ञान मानव मात्रा की भाषा से सम्बन्धित होता है इसलिए इसका विस्तार मानव के चिन्तन तक है। इसमें यदि साहित्यिक भाषाओं का अध्ययन किया जाता है, तो विभिन्न बोलियों का भी अध्ययन किया जाता है। वर्तमान समय में बोलियों का अध्ययन भाषा विज्ञान का महत्त्वपूर्ण अंग बन गया है इसमें भाषा विवेचनात्मक, विश्लेषणात्मक अध्ययन के साथ उत्पत्ति तथा विकास का भी अध्ययन किया जाता है।

भाषा विज्ञान में वर्तमान तथा अतीत से सम्बन्धित भाषाओं का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार कह सकते हैं कि इसमें एक तरफ उन भाषाओं का अध्ययन किया जाता है जो अब वाचिक रूप में प्रयुक्त नहीं होती हैं, उनका केवल साहित्य प्राप्त होता है। भाषा के विभिन्न कालों में भाषा विज्ञान का सम्बन्ध होता है। भाषा की विभिन्न इकाइयाँ-ध्वनि, वर्ण, शब्द, पद, वाक्य तथा अर्थ भाषा विज्ञान क्षेत्र के विभिन्न आयाम हैं।

भाषा विज्ञान की अध्ययन पद्धतियां

भाषा विज्ञान की अध्ययन की पद्धतियां हैं -
  1. भाषा विज्ञान की वर्णनात्मक पद्धति
  2. भाषा विज्ञान की ऐतिहासिक पद्धति
  3. भाषा विज्ञान की तुलनात्मक पद्धति
  4. भाषा विज्ञान की प्रयोगात्मक पद्धति
  5. भाषा विज्ञान की संचनात्मक पद्धति

1. भाषा विज्ञान की वर्णनात्मक पद्धति

जब किसी भाषा के विशिष्ट काल का संगठनात्मक अध्ययन किया जाता है, तो उसे वर्णनात्मक अध्ययन कहते हैं। प्रसिद्ध विद्वान पाणिनी के अष्टाध्यायी में इसी प्रकार का भाषा - अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इसमें भाषा के संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया तथा विशेषण आदि की वर्णनात्मक समीक्षा करते हुए ध्वनि, शब्द, वाक्य आदि पर विचार किया जाता है। भाषा की सब इकाइयों पर अध्ययन करते हुए उनसे सम्बन्धित नियम निर्धारित किया जाता है। भाषा के सीमित काल का ही अध्ययन होता है, फिर भी इसका प्राचीन काल से विशेष महत्त्व रहा है। 

इस प्रकार के अध्ययन में भाषा के साधु - असाधु रूपों पर चिन्तन करते हुए उसके घ्वनि, शब्द आदि इकाइयोंरूपी शरीरांग के साथ उसकी अर्थरूपी आत्मा पर भी विचार किया जाता है। वर्तमान समय में वर्णनात्मक पद्धति के भाषा - अध्ययन की ओर विद्वानों का विशेष झुकाव दिखाई पड़ता है।

2. भाषा विज्ञान की ऐतिहासिक पद्धति

इस पद्धति में भाषा विशेष के काल-क्रमिक विकास का अध्ययन किया जाता है। यदि किसी विशेष भाषा के कालों के विवरणात्मक अध्ययन को कालक्रम से व्यवस्थित कर दिया जाए, तो ऐतिहासिक अध्ययन हो जाएगा।
भाषा - विकास या परिवर्तन की विभिन्न धाराओं का अध्ययन इसी पद्धति में होता है। भारतीय आर्य भाषाओं के विकास-क्रम में हिन्दी का अध्ययन करना चाहें तो इसी पद्धति से वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, भाषाओं पर विचार करते हुए हिन्दी भाषा का अध्ययन किया जाएगा। 

यदि हिन्दी शब्दों का उद्भव और विकास जानना चाहेंगे तो संस्कृत, पाली, प्राकृत और अपभ्रंश के साथ हिन्दी का कालक्रमिक अध्ययन करना होगा; यथा - कर्म (संस्कृत) झ कम्म (प्राकृत) झ काम (हिन्दी)। भाषा चिर परिवर्तनशील है। समय तथा स्थान परिवर्तन के साथ भाषा में परिवर्तन होना स्वभाविक ही है। समय-समय पर भाषा की ध्वनियों, शब्दों तथा वाक्यों में ही नहीं अर्थ में भी परिवर्तन होता रहता है। यह परिवर्तन हमें ऐतिहासिक पद्धति के अध्ययन से ही ज्ञात होता है।

3. भाषा विज्ञान की तुलनात्मक पद्धति

भाषा - अध्ययन की जिस पद्धति में दो या दो से अधिक भाषाओं की ध्वनियों, वर्णों, शब्दों, पदों, वाक्यों और अर्थों आदि की तुलना की जाती है, उसे भाषा - अध्ययन की तुलनात्मक पद्धति कहते हैं। इस अध्ययन के अन्तर्गत एक भाषा के विभिन्न कालों के रूपों का तुलनात्मक अध्ययन कर उसकी विकासात्मक स्थिति का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त करते हैं। एक भाषा की विभिन्न बोलियों की समता-विषमता जानने के लिए भी भाषा - अध्ययन की इस पद्धति से ही उभरा है। इसका प्रबल प्रमाण है कि प्रारम्भ में इसके लिए तुलनात्मक भाषा विज्ञान (Comparative Philology) नाम दिया गया था। यह भी सत्य है कि बिना तुलनात्मक अध्ययन - दृष्टिकोण अपनाए किसी नियम का निर्धारण अत्यन्त कठिन होता है। 

भाषा - परिवार के निर्धारण में भी तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक होता है। भाषा की सरसता, सरलता या विशेषताओं को स्पष्टरूप से रेखांकित करने के लिए तुलनात्मक अध्ययन सर्वाधिक उपयोगी होता है।

4. भाषा विज्ञान की प्रयोगात्मक पद्धति

भाषा - अध्ययन का महत्व दिन - प्रतिदिन बढ़ रहा है। इसे देखते हुए भाषा - अध्ययन की इस नई पद्धति का प्रारम्भ हुआ है। इसमें भाषा के जीवन्तरूप का व्यवहारिक ढंग से अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन किसी क्षेत्रा विशेष से जुड़ा होता है। इसलिए इसे क्षेत्राीय कार्य (Field Work) कहते हैं। इस पद्धति के अध्ययन में अध्येता को किसी क्षेत्रा विशेष में जाकर सम्बन्धित भाषा - भाषी से निकट सम्पर्क करना होता है। प्रायोगिक अध्ययन में किसी भाषा या बोली की ध्वनियों, शब्दों, वाक्यों के साथ बोलनेवाले की भाषा में प्रयुक्त मुहावरे, कहावतों आदि की प्रयोग-स्थिति भी अध्ययन किया जाता है। 

प्रयोगात्मक अध्ययन से ही विभिन्न बोलियों की सहजता, स्वाभाविकता तथा अभिव्यक्ति की स्पष्टता की बात सामने आ रही है जैसे-जैसे क्षेत्राीय भाषाओं के प्रयोग की बात जोर पकड़ रही है। वैसे - वैसे इस पद्धति के अध्ययन में गति आ रही है। वर्तमान समय में विभिन्न विद्वानों की भाषा-विशेषताओं को जानने के लिए भी प्रयोगात्मक पद्धति अपनायी जाती है। आधुनिक भाषा विज्ञान में प्रयोगात्मक पद्धति के अध्ययन का विशेष महत्त्व है।

5. भाषा विज्ञान की संचनात्मक पद्धति

जिस पद्धति में भाषा की संरचना के आधार पर अध्ययन किया जाए उसे भाषा - अध्ययन की संरचनात्मक पद्धति कहते हैं। भाषा - अध्ययन की यह पद्धति भाषा की विभिन्न इकाइयों के सूक्ष्म चिन्तन पर आधारित है। इसमें भाषा का विवेचन और विश्लेषण संगठनात्मक दृष्टिकोण से करते हैं। भाषा के संरचनात्मक अध्ययन में पारस्परिक सम्बद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है, वर्णनात्मक भाषा - अध्ययन में भी यत्र - तत्र संरचनात्मक रूप उभर आता है। 

वर्णनात्मक पद्धति और संरचनात्मक पद्धति के अध्ययन में विशिष्ट अन्तर यह है कि वर्णनात्मक पद्धति में भाषा की इकायों का अध्ययन एकाकी रूप में किया जाता है, जबकि संरचनात्मक अध्ययन में विभिन्न इकाइयों के पारम्परिक सम्बन्ध पर भी विचार किया जाता है, यथा - ‘‘काम’’ शब्द के संरचनात्मक अध्ययन में इसके विभिन्न ध्वनि - चिह्नों - क् + आ + म् + अ के लिखित तथा विभिन्न ध्वनियों क् + आ + म् के उच्चरित रूप पर चिन्तन करते हैं। 

इस प्रकार शब्द-संरचना के अध्ययन में उससे सम्बन्धित ध्वनियों के साथ वाक्यों में प्रयोग की स्थिति पर भी विचार करते हैं। इससे उक्त शब्द के लिखित तथा उच्चरित रूपों का सुस्पष्ट प्रमाण मिल जाता है। वर्तमान समय में भाषा-अध्ययन की संरचनात्मक पद्धति पर विशेष बल दिया जा रहा है।

भाषा विज्ञान कला है या विज्ञान

भाषा विज्ञान जब अध्ययन के विषयों में बड़ी-बड़ी कक्षाओं के पाठ्यक्रमों के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया तो सर्वप्रथम यह एक स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न हुआ कि भाषा विज्ञान को कला के अन्तर्गत गिना जाए या विज्ञान में। अर्थात् भाषा विज्ञान कला है अथवा विज्ञान है। अध्ययन की प्रक्रिया एवं निष्कर्षों को लेकर निश्चय किया जाने लगा कि वस्तुतः उसे भौतिक विज्ञान, एवं रसायन विज्ञान आदि की भाँति विशुद्ध विज्ञान माना जाए अथवा चित्र, संगीत, मूर्ति, काव्य आदि कलाओं की भाँति कला के रूप में स्वीकार किया जाए।

भाषा-विज्ञान कला नहीं है

कला का सम्बन्ध मानव-जाति वस्तुओं या विषयों से होता है। यही कारण है कि कला व्यक्ति प्रधान या पूर्णतः वैयक्तिक होती है। व्यक्ति सापेक्ष होने के साथ-साथ किसी देश विशेष और काल-विशेष का भी कला पर प्रभाव रहता है। इसका अभिप्राय यह है कि किसी काल में कला के प्रति जो मूल्य रहते हैं उनमें कालान्तर में नये-नये परिवर्तन उपस्थित हो जाते हैं तथा वे किसी दूसरे देश में भी मान लिए जाएँ, यह भी आवश्यक नहीं है। एक व्यक्ति को किसी वस्तु में उच्च कलात्मक अभिव्यक्ति लग रही है। किन्तु दूसरे को वह इस प्रकार की न लग रही हो। अतः कला की धारणा प्रत्येक व्यक्ति की भिन्न-भिन्न हुआ करती है।

कला का सम्बन्ध मानव हृदय की रागात्मिक वृत्ति से होता है। उसमें व्यक्ति की सौन्दर्यानुभूति का पुट मिला रहता है। कला का उद्देश्य भी सौन्दर्यानुभूति कराना, या आनन्द प्रदान करना है, किसी वस्तु का तात्विक विश्लेषण करना नहीं।

कला के स्वरूप की इन सभी विशेषताओं की कसौटी पर परखने से ज्ञात होता है कि भाषा विज्ञान कला नहीं है। क्योंकि उसका सम्बन्ध हृदय की सरसता-वृत्ति से न होकर बुद्धि की तत्त्वग्राही दृष्टि से होता है। भाषा विज्ञान का उद्देश्य सौन्दर्यानुभूति कराना या मनोरंजन कराना भी नहीं है। वह तो हमारे बौद्धिक चिन्तन को प्रखर बनाता है। भाषा के अस्तित्व का तात्त्विक मूल्यांकन करता है। उसका दृष्टिकोण बुद्धिवादी है। भाषा विज्ञान के निष्कर्ष किसी व्यक्ति, राष्ट्र या काल के आधार पर परिवर्तित नहीं होते हैं तथा भाषा-विज्ञान के अध्ययन का मूल आधार जो भाषा है वह मानवकृत पदार्थ नहीं है। अतः भाषा-विज्ञान को हम कला के क्षेत्रा में नहीं गिन सकते। भाषाविज्ञान की उपयोगिता इसमें है कि वह भाषा सिखाने की कला का ज्ञान कराता है। इसी कारण स्वीट ने व्याकरण को भाषा को कला तथा विज्ञान दोनों कहा है। भाषा का शुद्ध उच्चारण, प्रभावशाली प्रयोग कला की कोटि में रखे जा सकते हैं।

भाषा-विज्ञान - विज्ञान है

भाषा विज्ञान को कला की सीमा में नहीं रखा जा सकता, यह निश्चय हो जाने पर यह प्रश्न उठता है कि क्या भाषा-विज्ञान, भौतिक-शास्त्र, रसायन-विज्ञान आदि विषयों की भाँति पूर्णतः विज्ञान है ?

अनेक विद्वानों की धारणा में भाषा विज्ञान विशुद्ध विज्ञान नहीं है। उनकी धारणा के अनुसार अभी भाषा विज्ञान के सभी प्रयोग पूर्णता को प्राप्त नहीं हुए हैं और उसके निष्कर्षों को इसीलिए अंतिम निष्कर्ष नहीं कहा जा सकता। इसके साथ ही भाषा विज्ञान के सभी निष्कर्ष विज्ञान की भाँति सार्वभौमिक और सार्वकालिक भी नहीं है।

जिस प्रकार गणित शास्त्र में 2+2 = 4 सार्वकालिक, विकल्परहित निष्कर्ष है जो सर्वत्रा स्वीकार किया जाता है, भाषा विज्ञान के पास इस प्रकार के विकल्प-रहित निर्विवाद निष्कर्ष नहीं है। विज्ञान में तथ्यों का संकलन और विश्लेषण होता है और ध्वनि के नियम अधिकांशतः विकल्परहित ही हैं, अतः कुछ विद्वानों के अनुसार भाषा विज्ञान को मानविकी (कला) एवं विज्ञान के मध्य में रखा जा सकता है।

विचार करने पर हम देखते हैं कि विज्ञान की आज की दु्रत प्रगति में प्रत्येक विशेष ज्ञान अपने आगामी ज्ञान के सामने पुराना और अवैज्ञानिक सिद्ध होता जा रहा है। नित्य नवीन आविष्कारों के आज के युग में वैज्ञानिक दृष्टि नित्य सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और नवीन से नव्यतर होती चली जा रही है। आज के विकसित ज्ञान-क्षेत्रा को देखते हुए कई वैज्ञानिक मान्यताएँ पुरानी और फीकी पड़ गई है। न्यूटन का प्रकाश सिद्धान्त भी अब सन्देह की दृष्टि से देखा जाने लगा है। इससे यह सिद्ध होता हो जाता है कि नूतन ज्ञान के प्रकाश में पुरातन ज्ञान भी विज्ञान के क्षेत्रा से बाहर कर दिया जाता है।

अतः विशुद्ध ज्ञान की दृष्टि से विचार करने पर भाषा विज्ञान को हम विज्ञान के ही सीमा-क्षेत्रा में पाते हैं। भाषा-विज्ञान निश्चय ही एक विज्ञान है जिसके अन्तर्गत हम भाषा का विशेष ज्ञान प्राप्त करते हैं। यह सही है कि अभी तक भाषा-विज्ञान का वैज्ञानिक स्तर पर पूर्णतः विकास नहीं हो पाया है। यही कारण है कि प्रसिद्ध ग्रिम-नियम के आगे चल कर ग्रासमान और वर्नर को उसमें सुधार करना पड़ा है। उक्त सुधारों से पूर्व ग्रिम का ध्वनि नियम निश्चित् नियम ही माना जाता था और सुधारों के बाद भी वह निश्चित् नियम ही माना जाता है। इस प्रकार नये ज्ञान के प्रकाश में पुराने सिद्धान्तों का खण्डन होने से विज्ञान का कोई विरोध नहीं है। वास्तव में यही शुद्ध विज्ञान है।

सन् 1930 के बाद जहाँ वर्णनात्मक भाषा विज्ञान को पुनः महत्त्व प्राप्त हुआ, वहाँ तब से लेकर आज तक द्रुत गति में विकास हुआ है। जब से ध्वनि के क्षेत्रा में यंत्रों की सहायता से नये-नये परीक्षण प्रारम्भ हुए हैं तथा प्राप्त निष्कर्ष पूरी तरह नियमित होने लगे हैं, तब से ही भाषा-विज्ञान धीरे-धीरे प्रगति करता हुआ विज्ञान की श्रेणी में माना जाने लगा है।

विज्ञान की एक बड़ी विशेषता है उसका प्रयोगात्मक होना। अमेरिकी विद्वान् बलूम फील्ड़ (सन् 1933 ई0) के बाद अमेरिकी भाषा विज्ञानियों ने ध्वनि-विज्ञान एवं रूप-विज्ञान आदि के साथ भाषा-विज्ञान की एक नवीन पद्धति के रूप में प्रायोगिक भाषा-विज्ञान का बड़ी तीव्रता के साथ विकास किया है। इस पद्धति के अन्तर्गत भाषा-विज्ञान प्रयोगशालाओं का विषय बनता जा रहा है और उसके लिए अनेक यंत्रों का अविष्कार हो गया है। यह देख कर निश्चित रूप में इस विषय को विज्ञान ही कहा जाएगा, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

आजकल जबकि समाज-विज्ञान, मनोविज्ञान आदि शास्त्राीय विषयों के लिए जहाँ विज्ञान शब्द का प्रयोग करने की परम्परा चल पड़ी है तब शुद्ध कारण-कार्य परम्परा पर आधारित भाषा विज्ञान को विज्ञान कहना किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं ठहराया जा सकता।

भाषा विज्ञान के अध्ययन से लाभ

भाषा विज्ञान के अध्ययन से हमें अनेक लाभ होते हैं, जैसे-
  1. अपनी चिर-परिचित भाषा के विषय में जिज्ञासा की तृप्ति या शंकाओं का निर्मूलन।
  2. ऐतिहासिक तथा प्रागैतिहासिक संस्कृति का परिचय।
  3. किसी जाति या सम्पूर्ण मानवता के मानसिक विकास का परिचय।
  4. प्राचीन साहित्य का अर्थ, उच्चारण एवं प्रयोग सम्बन्धी अनेक समस्याओं का समाधान।
  5. विश्व के लिए एक भाषा का विकास।
  6. विदेशी भाषाओं को सीखने में सहायता।
  7. अनुवाद करने वाली तथा स्वयं टाइप करने वाली एवं इसी प्रकार की मशीनों के विकास और निर्माण में सहायता।
  8. भाषा, लिपि आदि में सरलता, शुद्धता आदि की दृष्टि से परिवर्तन-परिवर्द्धन में सहायता।
निष्कर्षतः इन सभी लाभों की दृष्टि से आज के युग में भाषा-विज्ञान को एक अत्यन्त उपयोगी विषय माना जा रहा है औरउसके अध्ययन के क्षेत्र में नित्य नवीन विकास हो रहा है।

साहित्य और भाषा-विज्ञान में संबंध 

भाषा के प्रचलित वर्तमान स्वरूप को छोड़ कर शेष सारी अध्ययन सामग्री भाषा-विज्ञान को साहित्य से ही उपलब्ध होती है। यदि आज हमारे सामने संस्कृत, ग्रीक और अवेस्ता साहित्य न होता तो भाषा-विज्ञान कभी यह जानने में सफल न होता कि ये तीनों भाषाएँ किसी एक मूल भाषा से निकली हैं। इसी प्रकार आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक का हिन्दी साहित्य हमारे सामने न होता तो भाषा-विज्ञान हिन्दी भाषा के ऐतिहासिक विकास का अध्ययन किस प्रकार कर पाता। 

भाषा-विज्ञान किसी प्रकार से भी भाषा का अध्ययन करें उसे पग-पग पर साहित्य की सहायता लेनी पड़ती है। बुन्देलखण्ड के नटखट बालकों के मुंह से यह सुन कर- 
ओना मासी धम 
बाप पढ़े ना हम 
व्याकरण कहता है कि यह क्या बला है, प्राचीन साहित्य का अध्ययन ही उसे बतलाएगा कि शाकटायन के प्रथम सूत्रा ‘ऊँ नमः सिद्धम्’ का ही यह बिगड़ा हुआ रूप है। साहित्य भी भाषा-विज्ञान की सहायता से अपनी अनेक समस्याओं का समाधान खोजने में सफल हो जाता है। 

डाॅ. वासुदेव शरण ने भाषा-विज्ञान के सिद्धान्तों के आधार पर जायसीकृत ‘पद्मावत’ के बहुत से शब्दों को उनके मूल रूपों से जोड़ कर उनके अथोर् को स्पष्ट किया है। साथ ही शुद्ध पाठ के निर्धारण में भी इससे पर्याप्त सहायता ली है। अतः साहित्य और भाषा-विज्ञान दोनों एक दूसरे के सहायक हैं।

भाषा विज्ञान के प्रमुख अंग

  1. ध्वनिविज्ञान
  2. पदविज्ञान ...
  3. वाक्यविज्ञान ...
  4. अर्थविज्ञान ...
  5. प्रोक्तिविज्ञान

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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