हड़प्पा सभ्यता की खोज, विस्तार, नगर योजना, लिपि एवं पतन

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हड़प्पा की सभ्यता, जिसे सिंधु घाटी की सभ्यता भी कहते हैं। हड़प्पा की सभ्यता की खोज 1920.22 में की गई थी, जब इसके दो बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थलों पर खुदाई की गई थी। ये स्थान थे, रावी नदी के किनारे बसा हड़प्पा और सिंधु नदी के किनारे बसा मोहनजोदड़ो। पहले स्थान की खुदाई की गई थी डी.आरसाहनी द्वारा और दूसरे की आर.डी. बनर्जी द्वारा। पुरातात्विक खोजों के आधार पर हड़प्पा की सभ्यता को 2600 ईसा पूर्व-1900 ईसा पूर्व के कालखंड के बीच माना गया है और ये विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। कई बार इसे ‘सिंधु घाटी सभ्यता’ भी कहा जाता है, क्योंकि प्रारंभ में इसकी जितनी भी बस्तियों की खोज हुई, वे सभी सिंधु नदी या इसकी सहयोगी नदियों के पास या इसके आसपास के मैदानों में स्थित थीं। परन्तु आजकल इसे हड़प्पा सभ्यता कहा जाता है, क्योंकि हड़प्पा ही वह पहला स्थान था, जिससे इस सभ्यता का अस्तित्व प्रकाश में आया। इसके अतिरिक्त, हाल ही के पुरातात्विक अन्वेषणों से ये संकेत मिलता है कि इस सभ्यता का विस्तार सिंधु नदी के पूरे के सुदूर विस्तार तक फैला हुआ था। इसीलिए, येी बेहतर है कि इस सभ्यता को हम हड़प्पा सभ्यता के नाम से ही पुकारें। ये भारत की प्रथम नागरिक सभ्यता है और विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताओं, जैसे मैसोपोटामिया और मिस्र की समकालीन है। हड़प्पाकालीन लोगों के जीवन और सभ्यता के संबंध में हमारी जानकारी सिर्फ पुरातात्विक खुदाइयों पर ही आधारित है, क्योंकि उस काल की लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। हड़प्पा सभ्यता का उद्भव अचानक नहीं हुआ। इसका विकास धीरे-धीरे नवपाषाण युग की ग्रामीण सभ्यता से हुआ। ऐसा विश्वास किया जाता है कि सिंधु नदी के उपजाऊ मैदानी क्षेत्रा से अधिकतम उपज लेने के लिए बेहतर तकनीकों के उपयोग के परिणामस्वरुप कृषि उत्पादन में व द्धि हुई होगी। इसके फलस्वरुप इतनी बढ़ती फसल पैदा हुई होगी, जिससे गैर-कृषि आबादी के लोगों और प्रशासकीय वर्ग इत्यादि के लिए, खाद्यों और उनके जीवन-यापन के लिए उत्पादन उपलब्ध हुआ होगा। इससे दूर-दराज के प्रदेशों के साथ विनिमय और व्यापारिक संबंध बढ़ाने में भी सहायता मिली होगी। इससे हड़प्पा के लोगों में समृद्धि आई होगी और वे शहर बसाने के योग्य बने होंगे।

2000 ईसा पूर्व के आसपास इस उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में अनेक प्रादेशिक सभ्यताओं का विकास हुआ और ये भी पत्थर और तांबे के औजारों के उपयोग पर ही आधारित थीं। ये ताम्र पाषाण सभ्यताएं, जो हड़प्पा सभ्यता के क्षेत्रा से बाहर थीं, अधिक सम द्ध और फली-फूलीं नहीं थी। बुनियादी तौर पर ये सभ्यताएं ग्रामीण प्रक ति की थीं। कालक्रमानुसार इन सभ्यताओं के उद्भव और विकास का काल 2000 ई.पू.-700 ई.पूके आसपास माना गया है। ये सभ्यताएं पश्चिमी और मध्य भारत में मिलीं और इन्हें गैर-हड़प्पा ताम्र पाषाण (चाल्कोलिथिक) सभ्यता के रुप में उल्लिखित किया गया है।

उद्भव और विस्तार

पुरातात्विक अवशेषों से पता चलता है कि हड़प्पा सभ्यता से पहले लोग छोटे-छोटे गांवों में रहते थे। समय बीतने के साथ-साथ छोटे कस्बे बने और इन कस्बों से हड़प्पा काल के दौरान पूर्ण विकसित शहरों का विकास हुआ। वास्तव में हड़प्पा काल की संपूर्ण अवधि को तीन चरणों में बांटा गया है (1) प्रारंभिक हड़प्पा काल (3500 ई.पू. से 2600 ई.पू.)। इस काल की विशेषता का उल्लेख मिलता है, इसके मिट्टी से बने ढांचों, प्रारंभिक व्यापार, कला और शिल्पों इत्यादि में, (2) परिपक्व हड़प्पा काल ;2600 ई.पू.-1900 ई.पू.) यह वह चरण है, जब हमें भट्ठे में पकी ईटों से बने ढांचों वाले भली-भांति विकसित शहर, स्वदेशी और विदेशी व्यापार और विविध प्रकार के शिल्प देखने को मिले और (3) उत्तर हड़प्पा काल (1900 ई.पू.-1400 ई.पू.)- यह पतन का काल था, जिसके दौरान शहर उजड़ने लगे थे और व्यापार समाप्त हो गया था, जिससे धीरे-धीरे शहरीकरण की मुख्य विशिष्टताएं लुप्त होती गई।

आइए सर्वप्रथम हम, हड़प्पा सभ्यता के भौगोलिक विस्तार का जायजा लेते हैं। पुरातात्विक खुदाइयों से पता चला है कि यह सभ्यता विस्त त क्षेत्रा में फैली हुई थी, जिसमें न सिर्फ भारत के आधुनिक राज्य, जैसे-राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश सम्मिलित थे, बल्कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कुछ भाग भी शामिल थे। इस सभ्यता के कुछ मुख्य स्थान हैं - जम्मू और कश्मीर में मांडा; अफगानिस्तान में शॉरतुलई; पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) में हड़प्प; सिंध में मोहनजोदड़ो और चन्हुदड़ो; राजस्थान में कालीबंगन; गुजरात में लोथल और धौलावीरा; हरियाणा में बनवाली और राखीगढ़ी; महाराष्ट्र में दाइमाबाद, जबकि मकरान तट (पाकिस्तान-ईरान की सीमा के पास) पर स्थित सुतकागेन्दारे हड़प्पा सभ्यता सुदूर पश्चिमी छोर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आलमग़ीर इसकी सुदूर पूर्वी सीमा है।

आबादियों के स्थान के संकेत मिलते हैं कि हड़प्पा कालीबंगन (घग्गर-हाकरा नदी के किनारे पर, जिसे आम तौर पर लुप्त नदी सरस्वती के साथ जोड़ा जाता है), मोहनजोदड़ो की धुरी, इस सभ्यता का प्रमुख स्थल था और अधिकांश आबादी इसी क्षेत्रा में स्थित थी। मिट्टी की किस्म, वातावरण और रहन-सहन की पद्धति के परिप्रेक्ष्य में इस क्षेत्र की कुछ सामान्य विशेषताएं थीं। यहां की भूमि समतल थी और सिंचाई और जल आपूर्ति के लिए मानसून और हिमालयी नदियों पर निर्भर थी। यहां की विशिष्ट भौगोलिक विशेषताएं और क षि पशुपालन संबंधी अर्थव्यवस्था इस क्षेत्रा के प्रमुख लक्षण थे।

हड़प्पा की शहरी आबादी के अतिरिक्त अनेक ऐसे स्थल थे, जहां पर पाषाण युग के शिकारी-संग्रहकर्ता या घुमन्तु चरवाहों वाले प्रागैतिहासिक काल के समुदायों के लोग भी साथ-साथ रहते थे। कुछ स्थल बंदरगाहों या व्यापारिक स्थलों के रुप में काम में लाए जाते थे। ध्यान देने योग्य बात है कि शहरीकरण को निर्धारित करने के प्रमुख कारक व्यापार, कर प्रणाली और लिपि इत्यादि होते हैं। शहरी सभ्यता कहलाए जाने के लिए हड़प्पा सभ्यता इन सभी मानकों पर खरी उतरती है।

नगर योजना

हड़प्पा सभ्यता की सबसे दिलचस्प विशिष्टता है, यहांँ की नगर योजना। इसमें अत्यधिक समरुपता देखने में आई है, यद्यपि कहीं-कहीं पर प्रादेशिक रुप से विविधताएं भी देखने में आती हैं। नगरों, गलियों, मकानों के ढांचों, ईटों के आकार और नालियों इत्यादि की योजना में एकरुपता दिखाई देती है। लगभग सभी मुख्य स्थलों (हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगन और अन्य), को दो भागों में विभाजित किया गया है-पश्चिम की ओर एक ऊंचे चबूतरे पर बना किला और आबादी के पूर्वी भाग में बना निचला नगर। किले में बड़े-बड़े ढांचे बने हुए हैं जो शायद शासकीय या धार्मिक अनुष्ठानों के केन्द्रों के रुप में कार्य करते होंगे। रिहायशी भवन निचले नगर में बने हुए हैं। सड़कों का ढांचा इस प्रकार बना था कि ये एक-दूसरे मार्ग को समकोण पर काटते हुए निकलते थे। इनसे शहर अनेक रिहायशी खंडों में बंट जाता है। मुख्य मार्ग को छोटी गलियों के साथ जोड़ा गया है। घरों के द्वार मुख्य मार्गों पर न होकर इन संकरी गलियों में खुलते थे। अधिकांश मकान भट्ठी में पकी ईटों से बने थे। बड़े घरों में कई कमरे होते थे, जिसमें एक चौकोर आंगन भी होता था। इन घरों में अपने निजी कुएं, रसोई घर और स्नानागार के चबूतरे होते थे। घरों के आकार में अंतर से ये संकेत मिलता है कि धनी लोग बड़े घरों में रहते थे और एक कमरे के घरों या बैरकों में संभवत: समाज के निर्धन वर्ग के लोग रहते होंगे। हड़प्पा काल के लोगों की जल निकासी व्यवस्था बहुत व्यवस्थित और विकसित थी। हर घर में, नालियां थीं, जो गली की नाली से जाकर मिलती थीं। ये नालियां ईटों से बने नरमोखों (मैनहोल्स) पर पत्थर की सिल्लियों से ढँकी होती थीं (जिन्हें सफाई के लिए हटाया जा सकता था) जिन्हें नियमित अंतराल पर गलियों के किनारे बनाया जाता था। इससे पता चलता है कि उन लोगों को सफाई विज्ञान की अच्छी जानकारी थी।

हड़प्पा के नगरों के कुछ मुख्य ढांचों के अवशेष

मोहनजोदड़ो का ‘विशाल स्नानागार’ एक बहुत ही प्रमुख स्थल है ।इसके चारों ओर बरामदे बने हैं और उत्तरी और दक्षिणी, दोनों छोरों पर सीढ़ियां बनी हैं। स्नानागार के फर्श पर बिटूमन कोयले का पलस्तर किया गया था ताकि पानी का रिसाव न हो। साथ के एक कमरे से पानी की आपूर्ति होती थी और पानी की निकासी के लिए नाली थी। स्नानागार के चारों ओर किनारे पर कुछ कमरे बने थे, जो शायद कपड़े बदलने के काम में आते होंगे। विद्वानों का मत है कि ‘विशाल स्नानागार’ धार्मिक क्रियाओं के लिए स्नान के लिए उपयोग में लाया जाता था। ‘विशाल स्नानागार’ के पश्चिम की ओर अन्न भंडारण के लिए एक धान्य कोठार स्थित थी। इसमें अन्न के भंडारण के लिए ईटों से बने कई चौकोर खंड बने थे। हड़प्पा में भी एक कोठार मिला है। इसमें ईटों से बने गोल चबूतरों की पंक्ति: हैं, जो शायद अन्न की कुटाई के लिए उपयोग में लाए जाते होंगे। इसकी जानकारी यह से प्राप्त गेहूं और जौ के भूसों के छिलकों से मिली है।

मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार
मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार

लोथल में ईटों से बना एक ढांचा मिला है, जिसे गोदीबाड़ा माना जाता है, जहां जहाजों के लंगर डाले जाते होंगे और ये माल के उतारने-चढ़ाने के काम में आता होगा । इससे ये संकेत मिलता है कि लोथल हड़प्पा के लोगों के लिए एक प्रमुख बंदरगाह और व्यापारिक केंद्र था।

लोथल का गोदी बाड़ा
लोथल का गोदी बाड़ा

कृषि

हड़प्पा सभ्यता की समृद्धि इसकी फली-फूली विकसित आर्थिक गतिविधियों पर आधारित थी, जैसे कृषि, कला, शिल्प और व्यापार। सिंधु नदी की उपजाऊ कछार भूमि ने यहां की अत्यधिक कृषि उपज में अपना भारी योगदान किया। इससे, हड़प्पा के लोगों को आन्तरिक और बाह्य दोनों स्तरों पर और उद्योगों को विकसित करने में भी सहायता मिली। कृषि के साथ-साथ पशु-पालन हड़प्पा की अर्थव्यवस्था का आधार था। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और लोथल जैसे स्थानों पर मिले कोठार, अन्न भंडारण के काम में लिए जाते थे। कृषि के कामों में प्रयुक्त औजारों के संबंध में हमारे पास कोई स्पष्ट साक्ष्य नहीं हैं। फिर भी कालीबांगन के एक खेत में हल चलाने या जुताई के कुछ चिह्न देखने में आए हैं। इससे संकेत मिलता है कि हल से खेती होती थी।

हरियाणा के हिसार जिले में बनवाली से मिट्टी से बने हल के मिलने की सूचना मिली है। कुओं से पानी निकालकर छोटे पैमाने पर और नदियों के पानी का नहरों के जरिये रुख मोड़कर खेतों की सिंचाई की जाती थी। मुख्य खाद्य फसलों में गेहूं, जौ, तिल, सरसों, मटर और राई इत्यादि शामिल थी। लोथल और रंगपुर में मिट्टी के बर्तनों में चावल की भूसी के बचे हुए कणों से वहां चावल की बड़ी खेती के साक्ष्य भी मिले हैं। कपास यहां की एक अन्य प्रमुख फसल थी। मोहनजोदड़ो में बुने हुए कपड़े का एक टुकड़ा प्राप्त हुआ है। अनाजों के अतिरिक्त मछली और पशुओं का मांस भी हड़प्पा के लोगों के आहार का हिस्सा था।

उद्योग और शिल्प

हड़प्पा के लोग लोहे के अतिरिक्त लगभग सभी प्रकार की धातुओं से परिचित थे। वे सोने और चांदी की वस्तुएँ बनाते थे। सोने की वस्तुओं में मोती, बाजूबंद, सुइयां और अन्य गहने शामिल थे। परन्तु सोने से ज्यादा चांदी का उपयोग अधिक प्रचलन में था। बहुत बड़ी संख्या में चांदी के गहने, तश्तरियां इत्यादि प्राप्त हुई हैं। तांबे के औजार और अस्त्र-शस्त्र भी बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं। सामान्य औजारों में कुल्हाड़ी, आरी, छैनी, चाकू, भाले की नोकें और तीरों के शीर्ष इत्यादि शामिल हैं। ध्यान देने की बात है कि हड़प्पा के लोगों द्वारा बनाए गए शस्त्र ज्यादातर सुरक्षात्मक प्रकृति के थे, क्योंकि तलवार जैसे शस्त्रों के मिलने के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं। पत्थर के औजारों का भी आम तौर पर उपयोग होता था। तांबा, राजस्थान में खेतड़ी नामक स्थान से आता था। सोना हिमालयी नदियों की तराई और दक्षिण भारत से आता था, और चांदी मैसोपोटामिया से। हमें कांसे के उपयोग के प्रमाण भी मिले हैं परन्तु बहुत ही सीमित स्तर पर। इस संबंध में सबसे प्रसिद्ध नमूना है मोहनजोदड़ो से मिली कांसे से बनी ‘नृत्यांगना का एक मूर्ति चित्र। ये नग्न नारी की एक मूर्ति है, जिसका एक हाथ नितम्ब पर है दूसरा नृत्य की मुद्रा में हवा में झूल रहा है। इसने बहुत सारी चूड़ियांँ पहन रखी हैं।

मोहनजोदड़ो में मिली नर्तकी का मूर्ति
मोहनजोदड़ो में मिली नर्तकी का मूर्ति

मनके बनाने की कला भी प्रमुख शिल्पकारी थी। बहुमूल्य पत्थरों और रत्नों से मोती बनाए जाते थे जैसे गोमेद (अगेट) और कॉर्नेलियन। मोती बनाने के लिए स्टिएटाइट का उपयोग होता था। चन्हुदड़ों और लोथल में मोती बनाने वालों की दुकानों के साक्ष्य मिले हैं। सोने और चांदी के मनके भी प्राप्त हुए हैं। हाथी दांत की नक्काशी और मोति:, बाजूबंद और अन्य सजावटी सामनों पर मीनाकारी का काम भी चलन में था। अत: हम कह सकते हैं कि हड़प्पा के लोगों को अनेक कलाओं और शिल्पकारी के कामों में दक्षता प्राप्त थी।

हड़प्पा काल की कलाकृतियां में एक प्रसिद्ध कलात्मक मूर्ति है मोहनजोदड़ो में मिली दाढ़ी वाले पुरुष की पत्थर से बनी एक मूर्ति । इसकी आंखें अधमुंदी हैं जैसे कि ये ध्यान मगन मुद्रा में है।

इसके बाएँ कंधे पर कशीदाकारी किया गया दुशाला है। कुछ विद्वानों के मत में ये किसी प्रचारक का धड़ हो सकता है।

हड़प्पा के अनेक स्थलों से पुरुषों और महिलाओं की बहुत बड़ी संख्या में मिट्टी की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं । महिलाओं की मूर्तियों की संख्या पुरुषों की मूर्तियों से अधिक है और ऐसा माना जाता है कि ये मातहश्देवी की पूजा के संबंध में प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। इसके अतिरिक्त पक्षियों, बंदरों, कुत्तों, भेड़ों, पालतू पशुओं, कूबड़ सहित और कूबड़-रहित बैलों के, अनेक प्रकार के मूर्तियों के नमूने प्राप्त हुए हैं। फिर भी, इस संबंध में सबसे उल्लेखनीय नमूने हैं-पकी मिट्टी की बनी गाड़ियां।

दाढ़ी वाले पुरूष की पत्थर  की मूर्ति
दाढ़ी वाले पुरूष की पत्थर की मूर्ति

मिट्टी के बर्तन बनाना भी हड़प्पा काल के लोगों का एक प्रमुख उद्योग था। ये मुख्य रुप से चाक-पहिये पर बनाए जाते थे और इन पर लाल रंग करने के बाद काले रंग से सजावट की जाती थी। ये विभिन्न आकारों और शक्लों में पाए गए हैं। चित्रकारी के नमूनों में अलग-अलग मोटाई की आड़ी लकीरेंं, पत्तों के नमूने, पाम और पीपल के पेड़, पक्षी, मछलियां और पशु इत्यादि के चित्र भी मिट्टी के बर्तनों पर बनाए गए हैं। हड़प्पा के लोग विभिन्न प्रकार की मुहरें बनाते थे। विभिन्न स्थानों से लगभग दो हजार से भी ज्यादा मुहरें प्राप्त हुई हैं। ये मुहरें आम तौर पर चौकोर शक्ल में थीं और सेलखड़ी से बनी थीं। ध्यान देने की बात है कि इन मुहरों पर अनेक पशुओं के चित्र थे परन्तु किसी भी मुहर पर घोड़े का चित्र नहीं था। इससे हमारे विद्वान ये तर्क करते रहे हैं कि हड़प्पा के लोग घोड़े से परिचित नहीं थे। यद्यपि ऐसे विद्वान भी हैं जो इस मत से सहमत नहीं हैं।

पशु की मिट्टी की मूर्तियां
पशु की मिट्टी की मूर्तियां
मानव की मिट्टी की मूर्तियां
मानव की मिट्टी की मूर्तियां 

विभिन्न प्रकार के पशुओं के अतिरिक्त, हड़प्पा की मुहरों पर हड़प्पाकाल की लिपि के कुछ चिन्ह भी बने हैं परन्तु अभी तक इस लिपि को पढ़ा नहीं जा सका है। सबसे प्रसिद्ध मुहर वह है, जिस पर सींगों वाले एक पुरुष-देव का चित्र बनाया गया है। इसके तीन सिर हैं और ये पद्मासन की मुद्रा में बैठा है और ये चारों तरफ से हाथी, बाघ, गैंडा और एक भैंस जैसे जानवरों से घिरा है। अनेक विद्वान इसे भगवान पशुपति (पशुओं के देवता) का प्राचीन रुप मानते हैं परन्तु कुछ विद्वानों का इस विचार से मतभेद है।

व्यापार

हड़प्पा के लोगों की नगरीय अर्थव्यवस्था की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी, उनका आंतरिक (देश के अंदर) और बाह्य (विदेशों में) दोनों तरह का व्यापारिक तंत्रा जाल (नेटवर्क)। नगर की आबादी अपने खाद्यों और अन्य जरुरी चीजों के लिए अपने आसपास के गावों पर निर्भर थी। इसलिए गांवों-शहरों (ग्रामीण-नगरों) के परस्पर संबंध विकसित हुए। इसी प्रकार शहरों के शिल्पकारों को अपनी चीजें बेचने के लिए बाजारों की जरुरत थी। इससे शहरों के बीच परस्पर संपर्क स्थापित हुए। व्यापारियों ने विदेशी भूभागों, विशेष रुप से मैसोपोटामिया के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किए, जहां इन चीजों की अधिक मांग की। ध्यान देने की बात है कि शिल्पकारों को अपनी चीजें बनाने के लिए अनेक प्रकार की धातुओं और बहुमूल्य रत्नों की जरुरत पड़ती थी परन्तु स्थानीय रुप से उपलब्ध न होने के कारण इन चीजों को बाहर से मंगवाना पड़ता था। अपने उद्गम स्थल से दूर इस कच्चे माल की दूसरे स्थानों पर उपस्थिति से स्वाभाविक रुप में ये संकेत मिलता है कि ये वस्तुएं निश्चित तौर पर उन स्थानों पर वस्तुओं के विनियम की प्रक्रिया के माध्यम से ही वहां पहुंची होंगी। इस प्रकार राजस्थान में तांबे की बहुतायत होने के कारण हड़प्पा के लोग यहां खेतड़ी स्थित तांबे की खानों से मुख्यत: तांबा प्राप्त करते थे। कर्नाटक में कोलार स्थित सोने की खानों और हिमालयी नदियों के तराई के क्षेत्रों से संभवत: सोने की पूर्ति होती थी। चांदी का स्रोत शायद राजस्थान की ज्वार स्थित खानें रही होंगी। ऐसा विश्वास किया जाता है कि चांदी संभवत: हड़प्पा की वस्तुओं के विनियम के बदले में मैसोपोटामिया से भी प्राप्त की जाती थी। मोती बनाने के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले बहुमूल्य रत्न नील वैदूर्य मणि का स्रोत अफगानिस्तान के उत्तर-पूर्व मे बदकशान खानों में स्थित था। फीरोज़ा और हरिताश्म शायद मध्य एशिया से लाए जाते थे। गोमेद, स्फटिक और कार्नेलियन की आपूर्ति पश्चिमी भारत से होती थी। सीप-शंख इत्यादि गुजरात और इसके आसपास के तटीय क्षेत्रों से आते होंगे। अच्छे किस्म की इमारती लकड़ी और अन्य वनोत्पाद शायद जम्मू जैसे उत्तरी क्षेत्रों से आते होंगे। हड़प्पा के लोग मैसोपोटामिया के साथ विदेश-व्यापार भी करते थे। ये व्यापार मुख्य रुप से फारस की खाड़ी में स्थित ओमान और बहरीन के जरिये होता था। हड़पा के क्षेत्रों में मिले मोति, मुहरों, पांसे की गोटियों जैसी कलाकृतियां इत्यादि की मौजूदगी से इसकी पुष्टि होती है। यद्यपि उन क्षेत्रों की कलाकृति हड़प्पा के स्थलों में बहुत ही कम स्थानों पर मिली हैं, परन्तु पश्चिमी एशिया या पारसी मूल की एक मुहर लोथल में प्राप्त हुई है, जिससे इस संबंध की पुष्टि होती है। सूसा, उर और मैसोपोटामिया के नगरों से लगभग दो दर्जन हड़प्पा की मुहरें मिली हैं। मुहरों के अतिरिक्त हड़पा मूल की जो अन्य कलाकृति वहां मिली हैं, उनमें मिट्टी के बर्तन, उत्कीर्ण कार्य किए गए कार्नेलियन के मोती और पांसे शामिल हैं।

पशुपति की मुहर
पशुपति की मुहर

मैसोपोटामिया से मिले शिलालेखों से हमें हड़प्पा के साथ मैसोपोटामिया के संपर्क के संबंध में हमें बहुमूल्य सूचना मिलती है। इन शिलालेखों से दिलमुन, मगन और मेलुलूह के साथ व्यापार के संकेत मिलते हैं। विद्वानों ने मेलुलूह के हड़प्पा के क्षेत्रा के साथ, मगन के मकरान तट के साथ और दिलमुन के बहरीन के साथ संपर्कों की पहचान की है। इनसे संकेत मिलते हैं कि मैसोपोटामिया मेलुलूह से तांबा, कार्जेलियन, हाथी दांत, सीपियां, वैदूर्य मणि, मोती और आबनूस आयात करता था। मैसोपोटामिया से हड़प्पा को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में शामिल थे तैयार कपड़े, ऊन, इत्र, चमड़े की वस्तुएं और चांदी। चांदी के अतिरिक्त ये सभी वस्तुएं नाशवान हैं। ये मुख्य कारण रहा होगा, जिसकी वजह से हड़प्पा के स्थलों पर हमें इन वस्तुओं के अवशेष नहीं मिलते।

सामाजिक विशिष्टताएं

ऐसा लगता है कि हड़प्पा के लोगों का समाज मात सत्तात्मक प्रकृति का था। इस मत का आधार है मात देवी की लोकप्रियता जैसा कि पंजाब और सिंध प्रदेशों में बड़ी संख्या में मिली पक्की मिट्टी की बनी नारी मूर्तियां से भी संकेत मिलता है। क्योंकि हड़प्पा की लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है, इसलिए हमें इस संबंध में मिली सीमित सूचनाओं पर ही संतुष्ट रहना होगा।

हड़प्पा के समाज में विविध व्यवसायों से जुड़े लोग शामिल थे। इनमें पुजारी, योद्धा, किसान, व्यापारी और कारीगर (राजगीर, बुनकर, सुनार, कुम्हार इत्यादि) शामिल थे। हड़प्पा और लोथल जैसे स्थानों पर मिले मकानों के ढांचों से पता चलता है कि विभिन्न वर्गों के लोगों द्वारा आवास के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के भवनों का उपयोग किया जाता था। हड़प्पा के कोठार के पास बने कारीगरों के घरों से इस वर्ग के कारीगरों की उपस्थिति के संबंध में पुष्टि होती है। इसी प्रकार, लोथल में तांबे का काम करने वाले कारीगरों और मोती बनाने वाले कामगारों की कार्यशालाओं और उनके लिए आवासीय घरों के मिलने के भी प्रमाण मिले हैं। वास्तव में, हम ये कह सकते हैं कि जो लोग बड़े घरों में रहते थे, वे धनी वर्ग से थे और जो कारीगरों के क्वार्टरों जैसी कोठरियों (बैरकों) में रहते थे, वे मजदूर वर्ग से संबंधित थे।

उनकी वेशभूषा के ढंग के संबंध में हमारी सीमित जानकारी उस काल के दौरान मिली पक्की मिट्टी और पत्थर की बनी महिलाओं की मूर्तियों पर आधारित है। पुरुषों को अधिकतर जिस पहनावे में दर्शाया गया है, उसमें नीचे के आधे भाग में चारों ओर एक धोती-सी बंधी है, जिसका एक सिरा बाएं कंधे और दाएं बाजू के नीचे हैं। एक अन्य पोशाक है चोगे (ढीला कपड़ा) की तरह का परिधान, जिससे शरीर के निचले भाग को ढँका गया है। वे लोग सूती और ऊनी कपड़े उपयोग में लाते थे। मोहनजोदड़ो में बुनाई किया गया एक कपड़ा मिला है। अनेक स्थानों पर मिली तकलियों और सुइयों से ये साक्ष्य मिलता है कि उस समय कताई और बुनाई का प्रचलन था।

हड़प्पा के लोगों को सजने-संवरने का शौक था। विभिन्न स्थलों पर मिली पुरुषों और महिलाओं की मूर्तियों से बाल संवारने के प्रमाण मिलते हैं। पुरुष और महिलाएं अपने बाल अलग-अलग तरीके से संवारते थे। लोग आभूषण पहनने के भी शौकीन थे। इनमें मुख्य तौर पर स्त्राी और पुरुष दोनों द्वारा उपयोग किए जाने वाले नेकलेस, बाजूबंद, कानों के बूंदे, मोती-मनकें, चूड़ियां इत्यादि शामिल थीं। ऐसा लगता है कि धनी लोग सोने, चांदी और बहुमूल्य रत्नों से बने गहने पहनते थे, जबकि निर्धन लोगों को पकी मिट्टी के गहनों से ही संतुष्ट होना पड़ता था।

धार्मिक विश्वास और रीतियां

हड़प्पा के लोगों के धार्मिक विश्वासों और रीति-रिवाजों के संबंध में हमारी जानकारी, अधिकतर हमें उपलब्ध
 मूर्तियों पर आधारित है। हड़प्पा के लोगों के धर्म को आम तौर पर जीवोपासक यानी पेड़ों व पत्थरों के उपासक के रुप में जाना गया है । हड़प्पा के विभिन्न स्थलों पर मिली पकी मिट्टी की असंख्य मणि मूर्तियों को मात देवी की उपासना के साथ जोड़कर देखा जाता है। इनमें से अधिकांश मूर्तियों में महिलाओं ने चौड़ी-सी करधनी, बाघ की खाल का कपड़ा और गले में हार पहन रखा है। वे पंखे के आकार का शिरोवस्त्रा पहने हुए हैं। कुछ मूर्तियों में महिला को गोद में एक शिशु लिए दिखाया गया है तो एक मूर्ति में एक महिला के गर्भ से एक पौधा उगता हुआ दर्शाया गया है। दूसरी मूर्ति शायद भू-देवी की प्रतीक है। बहुत से विद्वान मानते हैं कि हड़प्पा वासी लिंग (पुरुष यौनांग) और योनि (महिला यौनांग) के उपासक थे, परन्तु कुछ इस मत से असहमत हैं।

हड़प्पावासियों का पुरुष देवता में आस्था का साक्ष्य मिलता है। एक मुहर पर बनी एक आक ति से, जिसमें एक पुरुष के सिर पर भैंसे के सींग वाला मुकुट है, जो यौगिक मुद्रा में बैठा है और इसके आसपास कई पशु हैं। अनेक विद्वान इसे भगवान पशुपति (पशुओं के देवता) या ‘आदि शिव’ के रुप में देखते हैं। यद्यपि कुछ विद्वानों का इससे मतभेद है। एक अन्य मुहर में एक सींगों वाले देवता की आक ति है, जिसके बाल हवा में उड़ते हुए हैं और वह नग्न है और पीपल के पेड़ की शाखाओं के बीच खड़ा है, एक उपासक घुटनों के बल उसके समक्ष बैठा है। इससे पेड़ों की उपासना का पता चलता है। हड़प्पावासियों में पशुओं की उपासना के प्रचलन का भी प्रमाण मिलता है।

ई.पू. के मध्य देखने में आया। आबादी के क्षेत्रा भी सिकुड़ने लगे थे। उदाहरणत:, उत्तर काल की अवधि के दौरान हड़प्पा, जो मूल रुप से 85 हैक्टेयर के क्षेत्रा में फैला था। इस काल में सिर्फ तीन हैक्टेयर की आबादी में सिकुड़ कर रह गया था। ऐसा लगता है कि यहां की आबादी किन्हीं दूसरे क्षेत्रों में स्थानांतरित हो गई थी। इसका संकेत मिलता है कालीबंगन और लोथल जैसे कुछ स्थानों से अग्नि की उपासना के भी कुछ साक्ष्य मिले हैं। कालीबंगन में ईटों से बने अनेक चबूतरों की पंक्तियों और उन पर बने गड्ढ़ों में राख और पशुओं की हड्डियां भी मिली हैं। अनेक विद्वान इन्हें हवन कुंड मानते हैं। इससे यह भी प्रदर्शित होता है कि विभिन्न क्षेत्रों के हड़प्पावासियों में भिन्न-भिन्न धार्मिक रीति-रिवाज प्रचलित थे, क्योंकि हड़प्पा या मोहनजोदड़ो में किसी भी हवन कुंड के होने के प्रमाण नहीं मिले हैं। दफन के रीति-रिवाज और इनसे संबंधित धार्मिक कर्मकांड, किसी भी सभ्यता के धर्म का बहुत ही महत्त्वपूर्ण पहलू होते हैं। तथापि इस संदर्भ में हड़प्पा-कालीन स्थलों पर मिले मिश्र पिरामिडों जैसी इमारतों या मैसोपोटामिया स्थित दर में बनी शाही कब्रगाहों की तरह की कोई भी इमारत नहीं मिली है।

मोहनजोदडो कि मात देवी
मोहनजोदडो कि मात देवी

शवों को प्राय: उत्तर-दक्षिण दिशा में लिटाया जाता था, जिसमें सिर उत्तर की ओर और पांव दक्षिण की ओर होते थे। मृतकों को, अलग-अलग संख्या में, उनके साथ मिट्टी के बर्तन रखकर दफनाया जाता था। कुछ कब्रों में शवों के साथ चूड़ियां, मोती, तांबे के दर्पण मोहनजोदड़ों से मिला प्रतीकात्मक पीपल-वक्ष  मोहनजोदड़ों की मात देवी  मोहनजोदड़ों में मिली कूबड़ वाले बैल की मुहर इत्यादि जैसी वस्तुएं रखकर दफनाया जाता था। इससे यह भी संकेत मिलता है कि हड़प्पावासी पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे। लोथल में तीन ऐसी कब्रें मिली हैं, जिनमें महिला और पुरुष को इकट्ठे दफनाया गया है। कालीबंगन में प्रतीकात्मक रूप से दफनाने का एक साक्ष्य मिला है। यानी एक कब्र मिली है, जिसमें बर्तन रखे हैं, परन्तु कोई हड्डियां या कंकाल नहीं है। रीति-रिवाजों में पाई गई इन विविधताओं से पता चलता है कि हड़प्पा सभ्यता में संभवत: भिन्न-भिन्न प्रकार के धार्मिक विश्वास प्रचलन में थे।

मोहनजोदडो में मिली कूबड वाले बैल की मोहर
मोहनजोदडो में मिली कूबड वाले बैल की मोहर

लिपि

हड़प्पावासी शिक्षित थे। हड़प्पा की मुद्राओं पर अनेक प्रकार के चिह्न या आक तियां बनी हैं। हाल ही में किए गए अध्ययनों से यह संकेत मिले हैं कि हड़प्पा की लिपि में लगभग 400 चिह्न हैं और इसे दाई से बाई ओर को लिखा जाता है। परन्तु अभी तक इस लिपि को पढ़ा नहीं जा सका है। ऐसा समझा जाता है कि ये अपने भावों को सीधे व्यक्त करने के लिए किसी भावचित्र यानी चित्रकति, चिह्न या अक्षर का प्रयोग करते थे। हमें उनकी भाषा की कोई जानकारी नहीं है, परन्तु कुछ विद्वानों को विश्वास है कि वे ‘ब्राहुई’ भाषा बोलते थे, जिस बोली को पाकिस्तान के बलूची लोग आज भी बोलते हैं। तथापि अभी इस बारे में साफ़ तौर से कुछ नहीं कहा जा सकता।

हड़प्पा सभ्यता का पतन

हड़प्पा की सभ्यता 1900 ई.पू. तक फलती-फूलती रही। इस सभ्यता के बाद की अवधि को नगरी सभ्यता के बाद के चरण (उत्तरवर्ती हड़प्पावासी काल) के रूप में जाना जाता है। इस काल की विशेषता को इस प्रकार रेखांकित किया गया कि इसमें नगर-योजन, लेखन कला, माप-तोलों में एकरूपता, मिट्टी के बर्तनों में समानता इत्यादि जैसे मुख्य लक्षण धीरे-धीरे लुप्त होने लगे थे। यह अधोपतन 1900 ई.पू. -1400 ई.पू. के मध्य देखने में आया। आबादी क्षेत्रा भी सिकुड़ने लगे थे। उदाहरणत:, उत्तर काल की अवधि के दौरान हड़प्पा, जो मूल रूप से 85 हैक्टेयर के क्षेत्रा में फैला था। इस काल में सिर्फ तीन हैक्टेयर की आबादी में सिकुड़ कर रह गया था। ऐसा लगता है कि यहां की आबादी किन्हीं दूसरे क्षेत्रों में स्थानांतरित हो गई थी। इसका संकेत मिलता है उत्तर हड़प्पा काल में गुजरात, पूर्वी पंजाब, हरियाणा और अपर-दोआब क्षेत्रों के बाहरी क्षेत्रों में पाई गई नई बस्तियों की अनेक स्थापनाएं।

आपको हैरानी होगी कि हड़प्पा सभ्यता का अंत कैसे हुआ। इस संबंध में विद्वानों के अनेक मत हैं।
  1. कुछ विद्वानों का सुझाव है कि बाढ़ और भूकंप जैसी प्राक तिक आपदाओं ने इस सभ्यता को खत्म किया होगा। ऐसा विश्वास किया जाता है कि भूकंप के परिणामस्वरुप सिंधु नदी के निचले मैदानी, बाढ़ वाले क्षेत्रों का स्तर ऊंचा उठ गया होगा। इससे समुद्र की तरफ जाने को नदी के तल मार्ग में रुकावट आ गई होगी, जिससे मोहनजोदड़ो नगर डूब गया होगा। परन्तु इससे केवल मोहनजोदड़ो के खत्म होने का उल्लेख मिलता है न कि पूरी सभ्यता का।
  2. कुछ विद्वानों के मतानुसार घग्गर-हाकरा नदी के मार्ग में परिवर्तन आने के कारण शुष्क बंजर धरती बढ़ती गई होगी, जिसकी वजह से पतन हुआ। इस सिद्धांत के अनुसार 2000 ई.पू. के आसपास बंजरता की परिस्थिति बढ़ती गई, इससे क षि उत्पादन पर प्रभाव पड़ा होगा, जिससे इसका लोप हुआ।
  3. पतन के कारणों में, आर्यों के आक्रमण के सिद्धांत का भी उल्लेख किया गया है, लेकिन आंकड़ों के आलोचनात्मक व गंभीर विश्लेषण के आधार पर अब इस मत को पूरी तरह नकार दिया गया है।
इस प्रकार कोई भी एक अकेला ऐसा कारण नहीं है, जिससे संपूर्ण सभ्यता के विनाश का पता लग सके। ज्यादा से ज्यादा इनसे सिर्फ कुछ शिष्ट स्थलों या क्षेत्रों के नष्ट होने के संबंध में ही पता चल सकता है। अत: प्रत्येक सिद्धांत की आलोचना हुई। फिर भी, पुरातात्विक साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि हड़प्पा सभ्यता का पतन अचानक नहीं हुआ, बल्कि धीरे-धीरे हुआ और अंत में ये सभ्यता अन्य सभ्यताओं में घुलती- मिलती चली गई।

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