निबंध का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, अंग, विशेषताएँ

निबंध से तात्पर्य उस रचना से है, जिसे अच्छी तरह से बाँधा जाता है या जिसमें विचारों अथवा घटनाओं को सही क्रम देकर, गूँथ कर लिखा जाता है। निबंध गद्य में लिखा जाता है। उपन्यास, कहानी, संस्मरण आदि के समान यह भी गद्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा है। निबंध आकार में छोटा भी हो सकता है और बड़ा भी। दो-तीन पृष्ठों के निबंध भी लिखे जाते हैं और पच्चीस-तीस पृष्ठों के भी। आपको सामान्यत: तीन-चार पृष्ठों के निबंध लिखने का अभ्यास करना चाहिए। निबंध का विषय कुछ भी हो सकता है। आप किसी भी वस्तु, घटना, विचार अथवा भाव पर निबंध लिख सकते हैं। 

निबंध का अर्थ (meaning of essay)

‘निबंध’ शब्द का साधारण शब्दों में अर्थ है- ‘‘बन्धन में बँधी हुई वस्तु।’’ ‘निबंध’ शब्द से निगूढ बन्धन का बोध होता है। यह मूलत: संस्कृत का शब्द है, जो कि हिन्दी में लिया गया है। धात्वर्थ की दृष्टि से इसकी निम्न व्युत्पत्तियाँ हैं - 
  1. नि + बन्ध् + ल्युट् (निबन्ध्यते अस्मिन् इति) जिसमें विचार बाँधा अथवा गूँथा जाता है, ऐसी रचना। 
  2. नि + बन्ध् + घा् - निश्चितार्थेन विषयम् अधिकृत्य बंधनम् अर्थात् किसी विषय पर विचारों को सूत्रबद्ध करना। 
  3. नि + बन्ध् + अच् - निम्बवृक्ष: नीम का वृक्ष और उसके सेवन से कुष्ठ रोग रोधक है- जटावर। 
उपर्युक्त प्रथम दो व्युत्पत्तियों का अर्थ है- बाँधना, एकत्र करना अथवा संगठित करना। प्राचीन काल में प्रेस अथवा मुद्रणालय नहीं थे। उस समय ऋषि-मुनि अपने विचार भोज-पत्रों पर लिखते थे, तथा इन भोज-पत्रों का संग्रह कर बाँधने एवं कसने की क्रिया ‘निबंध’ कहलाती थी।

निबंध की परिभाषा (definition of essay)

विचारकों द्वारा अनेकानेक परिभाषाएँ दी गई हैं, जिनका समुचित अध्ययनोपरांत ‘निबंध’ का वास्तविक एवं सारगर्भित अर्थ ज्ञात होता है। 

बाबू गुलाब राय के अनुसार-’’निबंध का आकार सीमित होता है, उसमें निजीपन होता है, स्वच्छ और सजीव होता है।’’

डॉ. जयनाथ नलिन द्वारा अपेक्षाकृत संक्षिप्त परिभाषा दी गई है- ‘‘किसी विषय पर स्वाधीन चिंतन और निश्छल अनुभूतियों का सरस, सजीव और मर्यादित गद्यात्मक-प्रकाशन ही ‘निबंध’ है।’’ 

डॉ. लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय ने निबंध के तत्त्व को ध्यान में रखते हुए कहा है कि- ‘‘निबंध से तात्पर्य सच्चे साहित्यिक निबन्धों से है, जिसमें लेखक अपने-आपको प्रकट करता है, विषय को नहीं। विषय तो केवल बहाना मात्र होता है।’’ 

डॉ. जगन्नाथ प्रसाद शर्मा के अनुसार - ‘‘तर्क और पूर्णता का अधिक विचार न रखने वाला गद्य-रचना का वह प्रकार ‘निबंध’ कहलाता है, जिसमें किसी विषय अथवा विषयांश का लघु-विस्तार में स्वच्छन्दता एवं आत्मीयपूर्ण ढंग से ऐसा कथन हो कि उसमें लेखक का व्यक्तित्व झलक उठे।’’

डॉ. ओंकारनाथ शर्मा ‘निबंध’ को परिभाषित करते हुए कहते हैं- ‘‘निबंध वह लघु, मर्यादित साहित्यिक विधा है, जिसमें निबंधकार विषयानुसार अपने हृदय-स्थित भावों, अनुभूतियों तथा विचारों का कलात्मक-चित्रण वैयक्तिकता के साथ प्रदर्शित करता है।’’

‘‘हिन्दी साहित्य कोष’’ में ‘निबंध’ को इस प्रकार परिभाषित किया गया है- ‘‘यह किसी विषय या वस्तु पर उसके स्वरूप, प्रकृति, गुण-दोष आदि की दृष्टि से लेखक की गद्यात्मकअभिव्यक्ति है।’’

निबंध के प्रकार (type of essay)

हम यहाँ तीन प्रकार के निबंध पर विचार करेंगे।
  1. वर्णनात्मक निबंध (descriptive essay)
  2. विचारात्मक निबंध (reflective essay)
  3. भावात्मक निबंध (emotional essay)।

1. वर्णनात्मक निबंध (descriptive essay)

वर्णनात्मक निबंध में किसी वस्तु, घटना, प्रदेश आदि का वर्णन किया जाता है। उदाहरण के लिए, होली, दीपावली, यात्रा, दर्शनीय स्थल या किसी खेल के विषय पर जब हम निबंध लिखेंगे, तो उसमें विषय का वर्णन किया जाएगा। इस प्रकार के निबंधों में घटनाओं का एक क्रम होता है। इनमें साधारण बातें अधिक होती हैं। ये सूचनात्मक होते हैं तथा इन्हें लिखना अपेक्षाकृत सरल होता है।

2. विचारात्मक निबंध (reflective essay)

विचारात्मक निबंध लिखने के लिए चिंतन-मनन की अधिक आवश्यकता होती है। इनमें बुद्धि-तत्त्व प्रधान होता है तथा ये प्राय: किसी व्यक्तिगत, सामाजिक या राजनीतिक समस्या पर लिखे जाते हैं। ‘दूरदर्शन का जीवन पर प्रभाव’, ‘दहेज-प्रथा’, ‘प्रजातंत्र’ आदि किसी भी विषय पर विचारात्मक निबंध लिखा जा सकता है। इसमें विषय के अच्छे-बुरे पहलुओं पर विचार किया जाता है, तर्क दिए जाते हैं तथा कभी-कभी समस्या को हल करने के सुझाव भी दिए जाते हैं।

3. भावात्मक निबंध (emotional essay)

या भाव-प्रधान निबंध में आप विषय के प्रति अपनी भावनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। इनमें कल्पना की प्रधानता रहती है, तर्क की बहुत अधिक गुंजाइश नहीं होती। उदाहरण के लिए ‘मित्रता’, ‘बुढ़ापा’, ‘यदि मैं अध्यापक होता’ आदि विषयों पर निबंध लिखते समय आप अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त कर सकते हैं। भाव की तीव्रता होने के कारण इन निबंधों में एक प्रकार की आत्मीयता या अपनापन रहता है। यह अपनापन ही इस प्रकार के निबंधों की विशेषता है। इसी प्रकार निबंध को विषय-वस्तु के आधार पर भी अनेक वर्गों में बाँट सकते हैं। जैसे -
  1. सामाजिक निबंध
  2. सांस्कृतिक निबंध
  3. देश-प्रेम/राष्ट्रीय चेतना परक निबंध
  4. विज्ञान, तकनीक एवं प्रौद्योगिकी परक निबंध
  5. व्यायाम एवं खेल संबंधी निबंध
  6. शिक्षा एवं ज्ञान विषयक निबंध
  7. राजनीतिक निबंध
  8. प्रेरक व्यक्तित्त्व
  9. सूक्तिपरक निबंध
  10. मनोरंजन के साधन
  11. भाषा, साहित्य एवं प्रभाव परक-निबंध, आदि

निबंध के अंग (parts of essay)

निबंध के तीन प्रमुख अंग होते हैं :
  1. भूमिका
  2. विषय-वस्तु
  3. उपसंहार

1. भूमिका 

भूमिका को प्रस्तावना भी कहते हैं। इसमें निबंध के विषय को स्पष्ट किया जाता है। भूमिका रोचक होगी, तभी पाठक निबंध पढ़ने के लिए उत्सुक होंगे। सवाल यह आता है कि निबंध की भूमिका कैसे लिखी जाए ? निबंध की शुरुआत किसी लेखक, कवि, चिंतक या राजनीतिज्ञ के कथन से की जा सकती है। यह सही है कि सुप्रसिद्ध कथन से निबंध प्रारंभ करने से पाठक के मन-मस्तिष्क पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। दूसरा प्रकार है कि किसी घटना के उल्लेख से निबंध प्रारंभ किया जाए। भूमिका में हाल ही में घटी किसी घटना से विषय को जोड़कर भी परिवेश का निर्माण किया जा सकता है। एक और पद्धति भी है।

2. विषय-वस्तु 

विषय-वस्तु निबंध का मुख्य भाग है। इसमें विषय का परिचय दिया जाता है, उसका रूप स्पष्ट किया जाता है। विषय का एक ही केंंद्रीय भाव होता है, उसका विस्तार करने की आवश्यकता होती है। विषय के विभिन्न पक्ष होते हैं। पक्ष-विपक्ष में तर्क देकर विषय-वस्तु को गहराई से समझाया जाता है। कुछ विषय ऐसे होते हैं, जिनसे प्राप्त होने वाले लाभ या हानि का उल्लेख भी किया जा सकता है, जैसे विज्ञान के लाभ और हानि। आवश्यकता पड़ने पर उसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए उसे अपनाने की बात भी की जा सकती है, जैसे समाचार-पत्र पढ़ना। किसी चीज की बुराइयों का संकेत करते हुए उसे त्यागने पर बल दिया जा सकता है, जैसे-दहेज़-प्रथा। 

निबंध की विशेषताएँ (Features of the essay)

निबंध की निम्नलिखित विशेषताएँ कही जा सकती हैं - 

(1) संक्षिप्तता - संक्षिप्तता को निबंध का आवश्यक धर्म माना गया है। एक निबंधकार की सफलता तब प्रदर्शित होती है जब वह अपने विषय का उद्घाटन ‘निबंध’ में संक्षिप्तता एवं लघुता के साथ करता है। अनावश्यक विस्तार एवं व्यापक विवेचन निबंध को बोझिल बनाता है। निबंध का आकार सीमित होता है, किन्तु यहाँ लघु आकार अथवा संक्षिप्तता से तात्पर्य है कि निबंधकार अपने-आप में स्वतंत्र होकर, चिंतन तथा मन की अनिवार्यताओं का ग्रहण कर विवेच्य पक्षों एवं बिन्दुओं को गंभीरतापूर्वक यथासंभव संक्षेप में प्रस्तुत करता है। 

(2) वैयक्तिकता - स्वभावत: ‘निबंध’ में निबंधकार का व्यक्तित्व प्रतिबिंबित होता है। निबंधकार की रुचियों, मन: स्थितियों, विचारधारा तथा दृष्टिकोण का प्रभाव अभिन्न रूप से निबंध में रहता है और यही विशेषता ‘वैयक्तिकता’ की ओर संकेत करती है। निबंध के जनक ‘मोन्तेन’ द्वारा वैयक्तिकता-रहित निबंध के अस्तित्व की कल्पना मात्र को भी स्वीकार नहीं किया गया। साथ ही व्यक्तित्व के इसी महत्त्व के कारण हड़सन ने भी निबंध में वैयक्तिकता की अनिवार्यता का प्रतिपादन किया है। अत: यह निबंध की परमावश्यक विशेषता है। 

(3) रोचकता व आकर्षण - निबंध की लोकप्रियता हेतु उसमें रोचकता तथा आकर्षण का समन्वय अत्यावश्यक है। आमोद-प्रमोद, हास-परिहास तथा भावात्मकता का समुचित निवेश निबंध में रोचकता व आकर्षण का आश्रय-स्थल 55 है। साथ ही भाषा एवं शैली के उत्कृष्ट प्रयोग - बिन्दु यथा- सहज एवं स्वाभाविक अलंकरण, लोकोक्तियों तथा मुहावरों का प्रयोग, शब्द-शक्तियों का चमत्कृति एवं कलात्मकता के साथ सम्मिश्रण तथा उत्कृष्ट शब्दावली द्वारा निबंधकार की नैसर्गिक प्रतिभा उजागर होती है। साथ ही इससे निबंध में रोचकता व आकर्षण का परिदर्शन भी होता है। 

(4) मौलिकता - विचार तथा शैली में विशिष्ट प्रयोग साहित्य में ‘मौलिकता’ की ओर इंगित करते हैं। निबंधकार प्राचीन एवं शास्त्रीय-परम्परा से विचार करता हुआ भी वण्र्य-विषयवस्तु का सहज-विश्लेषण मौलिकता के साथ करता है। सर्वथा विविधता एवं नवीनता का ग्रहण किए हुए निबंधकार कलात्मक अभिव्यंजनापूर्ण अपनी प्रस्तुति सहृदय-पाठक के समक्ष देता है। 

(5) स्वात्मपूर्णता - निबंध में किसी एक विषय अथवा विषयांश का प्रस्तुतीकरण होता है तथापि वह केन्द्रित विषय अपने-आप में पूर्णता को व्यक्त करता है। इस सन्दर्भ में डॉ. जयनाथ ‘नलिन’ का वक्तव्य प्रासंगिक है- ‘‘निबंध में प्रबन्ध की पूर्णता क्यों तलाश करते हो? उसके अपने स्वरूप के साथ उसकी अपनी पूर्णता है। कहानी में क्या उपन्यास की पूर्णता खोजेंगे? निबंध में तारतम्य, सन्तुलन और पूर्णता सभी कुछ रहेगा, नहीं तो इसका स्वरूप खण्डित हो जाएगा।’’

(6) प्रभावोत्पादकता - सामान्यत: ‘निबंध’ में हृदय और मस्तिष्क दोनों को प्रभावित करने का सामथ्र्य होना चाहिए। वस्तुत: विनोद-मात्र का साधन न होकर, उसमें गम्भीर-चिन्तन एवं नवीन दृष्टि का समन्वय भी होना चाहिए। पाश्चात्य विचारक ‘प्रीस्टले’ के अनुसार अच्छा निबंध वही है, जो साधारण बातचीत जैसा प्रकट हो। परन्तु यहाँ यह कहना उपयुक्त होगा कि निबंध में कथ्य एवं वण्र्य विषय का प्रस्तुतीकरण सहज, सरल, किंचित् विनोदपूर्ण तथा गाम्भीर्य के साथ किया जाना चाहिए। 

(7) सरसता - निबंध का कोर्इ निश्चित विषय नहीं होता है। सभी प्रकार के विषय निबंध के लिए उपयुक्त हो सकते हैं, किन्तु शैली की रमणीयता और सरसता निबंध का अनिवार्य अंग है। जैसे - ‘‘निबंध में साहित्यिकता के साथ विचारों की आनन्दमयी स्थिति अनिवार्य है।’’ निबंध में निबंधकार अनुभूतियों एवं भावनाओं के आश्रय से किंचित् कल्पना करता हुआ आत्माभिव्यंजना के द्वारा प्रत्येक विषय को यथारुचि सरस तथा रमणीय बना देता है। भावात्मक-निबन्धों में तो सरसता तथा चित्त-द्रवीभूतता का प्राधान्य होता ही है, अत: यहाँ ‘सरसता’ को निबंध का प्राणतत्त्व कहा जा सकता है। 

(8) स्वच्छन्दता - निबंध में निबंधकार एक उपदेशक अथवा उपदेष्टा नहीं होता है। वह अपने कल्पना-जनित वाहन पर आरूढ़ होकर उन्मुक्त विचरण करता है। फिर चाहे वह निबंध का विषय चयन हो, विषयानुकूल उद्धरण-प्रयोग हो अथवा प्रसंग-योजना आदि निर्माण हो। निबंधकार लोक-जीवन, संस्कृति, साहित्य, धर्म, प्रकृति, राजनीति, आदि सृष्टि के समस्त क्षेत्रों में से किसी भी विषय का चयन कर सकता है। वास्तव में कल्पना का आकर्षक एवं उन्मुक्त प्रयोग ‘ललित-निबन्धों’ का आधार तत्त्व होता है। अत: स्वच्छन्दता अथवा उन्मुक्तता के सोद्देश्यपूर्ण विषयबद्ध व कुशल प्रयोग से निबंध की यही विशेषता इसमें जीवंतता और रसवत्ता को प्रदान करती हुर्इ विदग्ध बनाती है। 

(9) सुसंगठितता - ‘निबंध’ का अर्थ ही है- ‘अच्छी तरह बंधा हुआ।’ यह कसावट तभी संभव हो सकती है, जब निबंध आकार में सीमित और संक्षिप्त हो, साथ ही उसमें विचारों की गूढ़ परम्परा का सन्निवेश सुसंगठित रूप में हो। विचार, भाव एवं कल्पना - नामक तत्त्वों के यथाप्रसंग समायोजन से ही कसावट संभव है। निबंध में विषयान्तर तत्त्वों या प्रसंगों के अत्यधिक प्रयोग से निबंध की कसावट में ह्रास होता है। अत: निबंध कसावटयुक्त, सुसंगठित एवं Üाृंखलाबद्ध विचारधारा का व्यवस्थित प्रकाशन है। संभवत: इसी तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का यह मत द्रष्टव्य है- ‘‘निबंध विचारों की गूढ़-गुम्फित परम्परा, जिसमें एक-एक पैराग्राफ में विचार दबा-दबा कर कसे गए हों..’’।

(10) कलात्मक-गद्यात्मकता - यहाँ कलात्मकता का अभिप्राय कलापूर्ण गद्य-शैली के प्रयोग से है। इस विशेषता का दर्शन ‘निबंध’ में पूर्णत: होता है, क्योंकि इसमें भाषा की शक्ति का पूर्ण विकास देखा जा सकता है। निबंध की भाषा-शैली में सूत्रात्मकता, अलंकारिकता, लाक्षणिकता आदि विशिष्टताओं का समन्वय होता 57 है। यहाँ आकर्षक, परिष्कृत एवं लालित्य गुण से समन्वित शैली निबंध के अभिव्यक्ति पक्ष को सुदृढ़ करते हुए कलात्मक गद्य को सुसम्पन्न बनाती है। अत: अन्य विशेषताओं की भाँति यह विशेषता भी ‘निबंध’ में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। उपर्युक्त समग्र विशेषताओं का समन्वय आधुनिक-निबंध विधा में दृष्टिगोचर होता है। इस विशेषताओं से युक्त ‘निबंध’ गुणात्मक होते हैं। गुणात्मक होने से पठनीय हो जाते हैं और पठनीय होने से पाठक के ज्ञान में विस्तार होता है। फलस्वरूप पाठक में चेतना जागृत होती है तथा चेतना-जागरण से वैयक्तिक तथा सामाजिक-उन्नयन सुनिश्चित होता है। अत: इन सभी विशेषताओं के यथासम्भव चातुर्यपूर्ण प्रयोग किये जाने से ‘निबंध’ साहित्य की वह विधा बन जाता है, जिससे व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की प्रगति में सहायता प्राप्त होती है।

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