परिवार की संरचना एवं कार्य

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परिवार की संरचना का प्रमुख आधार एक स्त्री और पुरुष के बीच के संबंध है जो विवाह द्वारा पति-पत्नी के संबंधों में बदल जाते हैं। परिवार की संरचना का दूसरा आधार परिवार के बच्चे हैं। संरचना का एक तीसरा आधार सामान्य निवास स्थान या घर है। इस भांति पति-पत्नी, बच्चे और सामान्य निवास परिवार की संरचना को बनाते है। इन तीन तत्वों से मिलकर साधारणतया केन्द्रीय परिवार की संरचना होती है। यहां यह बात उल्लेखनीय है कि ‘‘परिवार की संरचना का सम्बन्ध आर्थिक व्यवस्था से भी है। आज की नगरीय और औद्योगिक व्यवस्था पर इससे सम्बन्धित व्यवसाय पद्वति ने एकाकी तथा वैयक्तिक परिवार की संरचना को प्रोत्साहित किया है। जनजातीय, कृषक और ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में जहां परिवार आज भी उत्पादन की इकाई है - ज्यादातर सम्मिलित, विस्तृत तथा संयुक्त माता-पिता, पति के भाई तथा उनकी पत्नियां तथा बच्चे भी साथ रहते है। भारत की संयुक्त परिवार की प्रणाली इस तरह के परिवार का सर्वोत्तम उदाहरण है। परिवार की सरंचना मात्र इसके समूहगत स्वरूप, जिसमें पति-पत्नी, बच्चे तथा उनके संबंधी रहते हैं, से ही नहीं समझी जा सकती। परिवार एक संस्था के रूप में भावनात्मक सम्बन्धों, सामाजिक मूल्यों, रीति-रिवाजों तथा परम्पराओं से भी मिलकर बनता है। ये तत्व परिववार को स्थायित्व और निरन्तरता प्रदान करते हैं। इस दृष्टि से पारिवारिक संरचना का एक प्रमुख तत्व पारिवारिक, आर्थिक एवं जीवन-यापन के साधन भी है।’’

केन्द्रीय परिवार की संरचना

जिस प्रकार विवाव सर्वत्र पाया जाता है, वैसे ही केन्द्रीय परिवार भी। कई बार केन्द्रीय परिवार अन्य विस्तारित और जटिल परिवारों की संरचना भी करता है। केन्द्रीय परिवार की बहुत बड़ी विशेषता निकटाभिगमन निषेध है। प्रत्येक विवाहित व्यक्ति कम से कम दो केन्द्रीय परिवारों का सदस्य होता है। एक वह जिसमें कि वह जन्मा है, यह उसके जन्म का परिवार यान प्रशिक्षण का परिवावर है। इसी परिवार में उसे जीवन बिताने की शिक्षा-दीक्षा दी जाती है।

व्यक्ति का दूसरा परिवार वह है जिसे वह विवाह के बाद प्रारम्भ करता है, यह उसके स्वयं का परिवार है। इससे प्रजनन का परिवार कहते हैं। दोनों परिवार अर्थात् जनम का परिवार और प्रजनन का परिवार संरचना की दृष्टि से समान होते हैं, फिर भी इनमें अुतर की इस दृष्टि से है कि एक व्यक्ति इनमें से एक परिवार में पुत्र अथवा पुत्री के पद पर होता है और दूसरे में पति अथवा पत्नी के पद पर।

परिवार की सरंचना का दूसरा आधार निवास है। इसमें यह देखा जाता है कि पति, पत्नी कहां निवास करते हैं? ऐसे परिवार होते हैं जिनमें पत्नी, पति के यहां रहती है। इनको पितृस्थानीय परिवार कहते हैं? दूसरे केन्द्रीय परिवार वे होते हैं जिनमें पत्नी अपने पति के यहां रहती है और पति उसके यहां आता जाता रहता है ऐसे परिवार मातृ स्थानीय कहलाते हैं। केन्द्रीय परिवार वे होते हैं जिनमें पति-पत्नी और उनके प्रजजन की संतान रहती है। सामान्यतया केन्द्रीय परिवार में एक पति और एक पत्नी होती है लेकिन कभी-कभी जॉनसन कहते हैं कि केन्द्रीय परिवार में बहुपत्नी विवाह भी होते है।

विस्तारित परिवार की संरचना

इस परिवार की संरचा थोड़ी जटिल होती है। इसमें जन्म के परिवार और जनन के परिवार के सदस्य सम्मिलित होते हैं। अमेरिका और यूरोप में विस्तारित परिवार नहीं पाये जाते, लेकिन चीन जैसे देश में विस्तारित परिवार अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। विस्तारित परिवार में उम्र की दृष्टि से सबसे बड़ा पुरुष ही मुखिया होता है और उसका ज्येष्ठ पुत्र ही उत्तराधिकारी बनता है। सबसे बड़े भाई को विस्तारित परिवार में विशेष आदर दिया जात है। विस्तारित परिवार वस्तुतत: संयुक्त परिवार ही है लेकिन भारत में संयुक्त परिवारों का दर्जा विशेष है। अत: हम इसे पृथक संरचना के रूप में रखेंगे।

संयुक्त परिवार की संरचना

हमारे देश में संयुक्त परिवार, परिवार की एक विशेष संरचना है। आई.पी. देसाई का कहना है कि हमारे यहा ं परिवार का अर्थ ही संयुक्त परिवार है यहाँ तो उपनिवेश का काल मे अङ्ग्रेजो ने परिवार के आगे संयुक्त लगा दिया। अन्यथा पौराणिक और महाकाव्यों के विवरण में हमें संयुक्त पद का प्रयोग नहीं मिलता। इस देश में तो परिवार विस्तारित या संयुक्त ही रहे है। यह अवश्य है कि औद्योगीकरण, व्यक्तिवाद और नगरीकरण ने संयुक्त परिवारों को विघटित कर दिया है। संयुक्त परिवार में प्रजनन के परिवार के अतिरिक्त जन्म का परिवार भी सम्मिलित होता है। इसका मतलब हुआ कि इस परिवार में माता-पिता के अतिरिक्त दादा-दादी भी होते हैं। दादा और दादी परिवार के अविवाहित सदस्य और इसी भांति जनन के परिवार में भाई-बहिन मिलाकर संयुक्त परिवार बनाते हैं। ईरावती कर्वे ने संयुक्त परिवार के जो लक्षण बताये हैं, वे इस प्रकार है :
  1. एक से अधिक सदस्य
  2. एक ही छत के नीचे निवास
  3. सामान्य अर्थ व्यवस्था
  4. एक ही देवी यानी कुल देवता की पूजा
  5. दो से अधिक पीढ़ियाँ।
कहते हैं कि परिवार को एक सूत्र में बांधे रखने का काम सामूहिक सम्पति करती है। आई.पीदेसाई महुआ के क्षेत्रीय कार्य के आधार पर संयुक्त परिवार की विशेषता सामूहिक सम्पति नहीं मानते। वे कहते हैं कि संयुक्त परिवार की संरचना का आधार सामाजिक सम्बन्ध है। ऐसे लोग जो रक्त सम्बन्धी यानि पीढ़ी में आते हैं और एक ही छत के नीचे नहीं रहते, एक ही चूल्हे से नहीं खाते, वे भी संयुक्त परिवार के सदस्य है। वास्तव में कापड़िया, ईरावती, कर्वे और आई.पीदेसाई सभी इस तथ्य से सहमत है कि संयुक्त परिवार में दो या दो से अधिक पीढ़ियां होती है, सामान्य सम्पति होती है और सम्बन्धोंं की घनिष्ठता और गहनता होती है।

एम.एन. श्रीनिवास ने संयुक्त परिवार की संरचना को अपनी पुस्तक रिलिजन एंड सोसायटी अमांग दी कूग्र्ज ऑफ साउथ इण्डिया में विस्तृत रूप में रखा है। कूर्ग समाज में संयुकत परिवार को ओक्का कहते हैं। ओक्का के सदस्य जन्म से होते है। यह सदस्य यानी पुत्र सम्बन्धी होते है। पूर्वजों की सम्पति पर ओक्का के पुत्रों का अधिकार होता है। जिस तरह के संयुक्त परिवार को श्रीनिवास ने कूर्ग लोगों में पाया है वह आज तीव्रता से बदल रहा है। वास्तविकता यह है कि सामाजिक परिवर्तन के इस दौर में संयुक्त परिवर्तन के इस दौर में संयुक्त परिवार की संरचना शीघ्रता से बदल रही है।

जब हम विश्लेषणात्मक दृष्टि से केन्द्रीय, विस्तारित और संयुक्त परिवार को देखते है तो कतिपय संरचनात्मक विशेषताएं स्पष्ट हो जाती है।

परिवार के कार्य 

परिवार के प्रकार्य की परिवार की संरचना पर निर्भर करते हैं और इसी तरह स्वयं समाज की प्रकृति भी परिवार के प्रकार्यों को निर्धारित करती है। आदिम समाज में परिवार के जो प्रकार्या होते हैं वे निश्चित रूप से औद्योगिक समाज के परिवारों से भिन्न होते हैं। आदिम समाज के परिवार में श्रम विभाजन बहुत थोड़ा होता है। स्त्रियां भी आदमियों की तरह खेत-खलिहान में काम करती है। पुरुष और स्त्री के कार्यों का विभाजन भी अधिक वृहद नहीं होता। पुरुषों की भूमिकाओं को स्त्रियां कर लेती है और स्त्रियों की भूमिकाओं को पुरुष। कई समाजशास्त्रियों का कहना है कि औद्योगिक समाज में परिवार के प्रकार्य श्र्ाीधता से समाप्त हो रहे है। अब उत्पादन, शिक्षा, लोक कल्याण, आदि कार्य जो परिवार करता था औपचारिक संगठन करने लग गये हैं। टेलकट पारसंस का तर्क है कि आज समाज स्तरीय बड़े-बड़े कार्य सरकार करने लग गये है या संगठन और इस भांति परिवार अपेन अधिकांश कार्यों से मुक्त हो गये है। लेकिन इसका तात्पर्य नहीं है कि परिवार का महत्व कम हो रहा है। वास्तविकता तो यह है कि परिवार भी अपने कार्यों में विशिष्ट हो गया है। इसका बहुत बड़ा कार्य तो परिवार के सदस्यों के व्यक्तित्व का निर्माण करना है। यह परिवार ही है जो अपने सदस्यों को बाहरी दुनिया की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार करता है। इस संदर्भ में पारसंस लिखते हैं : पहले की अपेक्षा आज परिवार अधिक विशिष्ट हो गया है; लेकिन किसी भी तरह से इसका महत्व कम नहीं हुआ है। इसका कारण यह है कि अपने कतिपय कार्यों के लिए आज भी परिवार स्वतन्त्र है। इस भांति यद्यपि परिवार के कुछ कार्य उसके हाथ से निकल गये है, फिर भी शेष कार्यों के क्षेत्र में वह महत्वपूर्ण हो गया है। पारसंस की तरह डेनिस का भी तर्क है कि दफ्तरशाही एजेन्सियों ने आज परिवार के कई कार्य अपने हाथों में ले लिये हैं। फिर भी निश्चित रूप से कुछ कार्य ऐसे है जिन्हें परिवार ही कर सकता है। कोई भी औपचारिक संगठन बच्चों का प्रजनन नहीं कर सकता। यह कार्य तो परिवार का ही है। इसी भांति बच्चों का समाजीकरण भी परिवार ही करता है।

 मुरडॉक ने जिन 250 समाजों के परिवार का अध्ययन किया है उनके अनुसार अब भी परिवार (1) यौनगत, (2) प्रजननात्मक, (3) आर्थिक, और (4) शैक्षणिक कार्य करते है। मुरडॉक का निदर्शन बहुत विशाल था जिसमें सभी प्रकार के समाजों का प्रतिनिधित्व हो जाता था। परिवार के ये चार कार्यविधि की दृष्टि से इसी कारण महत्वपूर्ण है।

गुडे ने परिवार के जिन कार्यों का उल्लेख किया है उनमें (1) बच्चों का प्रजनन, (2) पारिवारिक सदस्यों का भौतिक अनुरक्षण; (3) बच्चों एवं व्यस्कों के सामाजिक स्थान का निर्धारण; (4) समाजीकरण एवं भावनात्मक सहारा; और (5) सामाजिक नियंत्रण सम्मिलित है। सत्यमित्र दुबे और दिनेश शर्मा ने परिवार के इन प्रकार्यों को समाज के लिए महत्वपूर्ण समझा है :

जैवकीय  

परिवार का बहुत महत्वपूर्ण कार्य यौन संतुष्टि देना है। मनुष्य में यौन की जो भूख होती है वह परिवार में पति-पत्नी की हैसयित से पूरी होती है। यह सही है कि बिना परिवार बनाये भी यौन संतुष्टि हो सकती है लेकिन इस आवश्यकता की पूर्ति को सामजिक स्वीकृति समाज ही देता है। जैवकीय कार्यों के अन्तर्गत ही हम बच्चों का प्रजनन सम्मिलित करते हैं। प्रजनन द्वारा ही मानव जाति की एक पीढ़ी को दूसरी पीढ़ी तक गुजरते हुए जीवित रहती है। प्रजनन के साथ मनुष्य की अनेक मनोवृत्तियां हुड़ी हैं जिनमें संतान के रूप में वंशज का संतोष प्रमुख है। उसके द्वारा व्यक्ति सम्पत्ति के लिए उत्तराधिकारी प्राप्त करता है तथा वंशज के रूप में अपनी स्मृति और धरोहर की रक्षा करता है। परिवार का तीसरा जैवकीय कार्य प्रजजन द्वारा मानव जाति के अस्तित्व की रक्षा है।

सामाजिक 

परिवार के कुछ सामाजिक प्रकार्य भी हैं। यह बच्चों का पालन पोषण करता है और उनके समाजीकरण में सहायता देता है। बच्चे परिवार के बीच में ही विकसित होते हैं। वे परिवार में ही भाषा, रीति-रिवाज, परम्परा तथा आचार को सीखते हैं। परिवार का महत्वपूर्ण योगदान इसके सदस्यों के समाजीकरण तथा उनके व्यवहारों के नियमन एवं सामाजिक नियंत्रण में है।

मनोवैज्ञानिक 

परिवार अपने सदस्यों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की भी पूर्ति करता है। यह परिवार ही है जिसमें व्यक्तियों को साहचर्य, प्रेम, सहानुभूति और मानसिक संबल प्राप्त होता है।

आर्थिक 

परिवार का सबसे बड़ा आधार आर्थिक है। कृषि प्रधान समाजों में तो परिवार ही उत्पादन की इकाई होती है। पारिवारिक व्यवस्था जैसे कृषि, दस्तकारी, गृह उद्योग, पशुपालन, शिकार आदि कार्यों में परिवार के सभी सदस्य समान रूप से योग देते हैं।

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