रोमन सभ्यता का इतिहास

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प्राचीन धारणाओं के अनुसार रोम की स्थापना रोमुलस तथा रमेस नामक दो जुडवां भाइयों ने की थी। रोमन कवि विरजिल (virgil) ने भी इससे मिलती-जुलती कहानी अपनी कविता इनीउहद (Aeneid) में बताई है कि ट्रोजन का नायक जब ट्राय (Troy) से विध्वंश होने के बाद अपने पिता को अपनी पीठ पर उठा कर ले गया तथा उसके बाद वह कई स्थानों पर गया और विजयें भी प्राप्त की। इसने इटली में एक कॉलोनी की स्थापना की जहां पर रोमुल्स तथा रेमस पैदा हुए। इनके ही नाम पर रोम का नामकरण हुआ। इउहद ने रोम को यूनानी तथा एशिया माइनर की सभ्यता से संबधित बताते हुए रोमनों को आश्वस्त किया कि वे भूमध्यसागरीय क्षेत्र में बाहर से आए हुए नही है।

रोमन साम्राज्य के अवशेष
रोमन साम्राज्य के अवशेष

जब यूनान में एंथेस पूरी तरह विकसित हो चुका था तब रोम इटली के पश्चिमी किनारे पर एक छोटा सा कस्बा था। 323 ई0पू0 में एलक्जैंडर के साम्राज्य विजय के समय में रोम एक शक्तिशाली नगर राज्य के रूप में उभर रहा था। यूनान में 2000 ई0पू0 में जब ऐचियन लोग आ रहे थे तभी अन्य इण्डों-यूरोपियनो ने इटली पर आक्रमण किया। इन में लातिनी टाइबर नदी के दक्षिणी क्षेत्र में बस गए तथा 750 ई0पू0 में इन्होंने पशुपालन जीवन का त्याग कर कृषि करना शुरू कर दिया और अपने छोटे-छोटे गांव बसाए जो बाद में बढ़कर रोम के शहरों में परिवर्तित हो गए।

रोम की भौगोलिक स्थिति :-

रोम प्रायद्वीप भूमध्यसागर में एक बूट के आकार का दिखाई देता है जिसकी नोक सिसली के द्वीप में प्रतीत होती है। इस बूटनुमा क्षेत्र के ऊपर अल्पस् पर्वत है, जो (Po) पो नामक नदी का पानी यहां के उतरी क्षेत्रों के कृषकों को सिचांई के लिए देता है तथा (Apennines) एपैनीन्ज पर्वत श्रृंखला समस्त इटली में फैली है। इन पर्वतों के कारण यह युनान के नगर राज्यों से पृथक होता है। इटली के पूर्वी क्षेत्र की जमीन उपजाऊ नही थी और ना ही अच्छी बन्दरगाहें थी। इस कारण यहां कम जनसंख्या थी। पश्चिमी क्षेत्र में बन्दरगाहों एवम् लंबी-2 नदियों के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना आसान था इसलिए यहां जनसंख्या अधिक थी। रोम ने इसी समुद्र और नदियों के सहारे व्यापार और अनेक विजयों में उपलब्धियां हासिल की। रोम इटली के पश्चिम के उपजाऊ प्रदेश में स्थित है तथा यहां पर स्थित सात पहाड़ों से प्राचीन रोमन निवासी अपने शत्रुओं को दूर से देखकर सुरक्षा का प्रबंध कर सकते थे। रोम समुद्र 25 किलोमीटर दूर था, इस कारण भी समुद्र के रास्ते इस पर इतनी आसानी से आक्रमण नही हो सकता था टाइबर नदी इन्हें भोजन तथा यातायात में सहायक थी तथा इस के मुख पर रोमनों में (Ostia) ओस्टिया नामक बन्दरगाह स्थापित की।

प्राचीन रोम :-

जिन Latin (लातिनी) लोगों ने रोम की स्थापना की वे कृषक और पशुपालक थे। प्रारंभ में ये कबीलाई लोग आपस में तथा अपने पडोसियों से लड़ते रहते थे। उनके इसी जीवन के लिए संघर्ष के प्राचीन काल से ही यहां के लोगों में कर्त्तव्य और अनुशासन तथा देशभक्ति की भावना उजागर हो गई। साथ ही दूसरे लोगों के सम्पर्क से रोमन संस्कृति का विकास हुआ। रोमनों ने फ्यूनिशिया तथा यूनान की उत्कर्ष सभ्यताओं से बहुत से नए विचार ग्रहण किए तथा सिसली और इटली में अपनी बस्तियां स्थापित की। यूनानियो से इन्होंने किले बंद शहर बनाने सीखे, अंगूर और अंजीर की कृषि का ज्ञान प्राप्त किया। एशिया माइनर से इटली आने वाले (Etruscans) इट्रुस्केन लोगों ने भी रोमनों पर अपना प्रभाव छोड़ा। 600 ई0पू0 के आसपास इन्होने टाइबर नदी को पार कर रोम पर अपना अधिपत्य जमा लिया तथा अगले 100 वर्षो तक इन्हीं विजेताओं से रोम के लोगों ने बहुत कुछ सीखा। । Alphabat वर्णमाला सीखी, इनके कला के नमूनों की नकल की तथा अपने देवों के अलावा उनके देवताओं की पूजा भी शुरू की। इन हमलावारों से इन्होंने वास्तुकला में मेहराब बनाना सीखा इसके अलावा दलदली भूमि को कृषि योग्य बनाना भी इन्हीं से सीखा। छठी शताब्दी ई0पू0 में इन विदेशियों की शक्ति सर्वोच्य पर थी, जब इन्होंने कार्थेज से समझौता किया ओर कोरसिका से ऐनानज को बाहर खेदड़ दिया। 535 ई0पू0 में (Alalia) एललिए पर भी इन्होंने विजय प्राप्त की।

एट्रस्स्केनों की हार :-

रोम चूंकि पहाड़ियों पर स्थित गांवो का समूह था। यहां के लोगों को एट्रस्केनों के आक्रमण और आधिपत्य को झेलना पड़ा। इन विदेशियों ने यद्यपि रेाम में काफी विकास किया लेकिन रोमन इन्हें पंसद नही करते थे इसलिए इन्होंने संगठित होकर इनके विरूद्ध विद्रोह कर दिया। विद्रोह के कारण एट्रस्केनों यह क्षेत्र छोड़ कर भाग गए। इनके जाने के बाद रोम में गणराज्य की स्थापना की गई।

रोम का प्रारंभिक गणराज्य :-

509 ई0पू0 में रोमनों ने एट्रस्केनो को हरा कर गणराज्य की स्थापना की। इसके बाद सम्पूर्ण इटली पर अपना आधिपत्य जमा लिया। 509 से 133 ई0पू0 के बीच रोम ने बहुत से युद्ध करके अपने राज्य का विस्तार किया। 390 ई0पू0 में gauls - गाल्ज ने रोम पर आक्रमण किया और यहां अधिकार कर लिया। रोमनों ने इन विजेताओं को भारी हर्जाना दे कर शांति खरीदनी पडी। इस हार के बाद रोमनों ने अपने शहरों की किलेबन्दी कर दी और अपनी सेना को संगठित किया। सेना को बढिया अस्त्र-शस्त्र मुहैया करवाए गए जिसमें लंबी तलवारें, भाले प्रमुख थे। सेना की प्रत्येक लीजनज में 3000 सैनिक थे। इन्हें छोटी-छोटी टुकडियों में बांटा गया था ताकि आपातकाल में शीघ्रता से इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जा सके। ये सैनिक इक्कठें तथा अलग-अलग यूनिटों में भी युद्ध करते थे।

सैमनाइटों पर विजय :-

चतुर्थ शताब्दी ई0पू0 में रोम का राज्य अजैनानज पर्वतों तक फैल चुका था तथा साथ ही उसने अपने पुराने सहयोगियों पर भी वर्चस्व स्थापित कर लिया था। इसी समय उन्हें (Campania) कैम्पानिया में रह रहे सैम्नाइटों से संघर्ष करना पडा। 340- 290 ई0पू0 के बीच रोमनों को उनसे तीन युद्ध करने पडे और रोम ने विजयी होकर समस्त इटली क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया तथा विदेशियों के विरूद्ध इटलियाई संघर्ष का नेता होने के कारण रोम सारे देश की एक छत्रा ताकत बन गया था। उसने सारे इटली का रामनीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी। इसके लिए उसने इटली के विभिन्न राज्यों मं आपसी फूट डलवा कर अपना प्रभुत्व कर लिया लेकिन उनके अंदरूनी मामलें में हस्तक्षेप नही किया। जिस राज्य ने रोम के प्रति द्वेष नही रखा उनसे अच्छा व्यवहार किया तथा धीरे-धीरे सभी राज्य रोम के प्रति वफादार हो गए।

राजनैतिक व्यवस्था :-

रोमवासियों को अपने पुराने अत्याचारी शासकों से नफरत थी इसलिए उन्होंने राजतंत्र के स्थान पर गणतंत्र सरकार की स्थापना की तथा सभी प्रकार की सावधानी रखी गई ताकि राज्य सत्ता एक व्यक्ति के हाथों में केन्द्रित न हो सके। यद्यपि सता अभी भी (Patricians) पेट्रिशियन (यानि कुलीन वर्ग) के ही हाथों में केन्द्रित थी। लेकिन सभी नागरिकों को वोट से अपना नेता चुनने का अधिकार था। ये चुने हुए नेता लोगों का प्रतिनिधित्व करते थे, तथा उनके नाम पर राज्य करते थे। रोम में 500 वर्षो तक गणतंत्र कायम रहा, इस बीच रोम विश्व शक्ति बन गया।

प्रांरभिक सरकार :-

प्रांरभिक गणतंत्र काल में (Patricians) कुलीन वर्ग के लोग सेनेट के द्वारा सरकार को चलाते थे। सेनेट के 300 पेट्रिशियन सदस्य थे जो उम्र भर इसके सदस्य रहते थे। ये गणतंत्र की आन्तरिक तथा विदेशी नीतियों का निर्धारण करते थे। प्रतिवर्ष सीनेट दो काउंसिलों (Consuls) का चुनाव करती थी। इसके दोनों सदस्य पेट्रिशियन वर्ग के ही होते थे। ये Counsul राज्य के सह शासक थे। इनका चुनाव एक वर्ष के लिए किया जाता था। ये कभी भी अधिक शक्तिशाली नही हो सकते थे। अपने एक वर्ष के कार्यकाल में ये राज्य के प्राशसनिक कार्य संभालते थे और युद्धों के दौरान सेना का नेतृत्व भी करते थे। दोनों Consuls को बराबर की शक्तियां एवम् अधिकार प्राप्त थे। दोनों Consuls एक-दूसरे के किसी भी काम को (Veto) वीटो भी कर सकते थे। यदि दोनो में इस तरह का कोई मतभेद हो जाता तो मामला सीनेट को सौंपा जाता था तथा कभी-कभी (Pro-Consuls) भी इनकी सहायता के लिए नियुक्त किए जाते थे। आपातकाल के दौरान इन Consuls के स्थान पर सीनेट (Dictator) (डिक्टेटर) की नियुक्ति भी कर सकती थी। इसे असीम शक्तियाँ प्राप्त थी। आपातकाल समाप्त होने पर यह 6 महीन की अवधि तक अपने पद पर रह सकता था। प्रत्येक Consul अपना कार्यकाल समाप्त होने पर सीनेट का सदस्य बन जाता था।

असैम्बली :-

सीनेट के अतिरिक्त एक प्रसिद्ध असैम्बली भी थी जिसमें प्लेबियन (आम लोग) चुनते थे। असैम्बली Consuls की नियुक्ति को स्वीकृति देती थी। परन्तु प्रारम्भिक रोमन गणतंत्र में असैम्बली को अधिक अधिकार प्राप्त नही थे और नला ही यह सीनेट के किसी फैसले को चुनौती दे सकती थी।

सरकार में परिवर्तन :-

परन्तु 509 ई0पू0 से 133 ई0पू0 तक रोम की सरकार को साम्राज्य विस्तार के कारण बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सर्वप्रथम तो एक बडे गणतंत्र का कार्य चलाने के लिए अधिक संख्या में अधिकारियों की आवश्यकता थी। दूसरे, Plebians (आम लोग) जिन्हें प्रारंभिक गणतंत्र में कोई अधिकार प्राप्त नही थे और ना ही वे किसी उच्च सरकारी पद प्राप्त कर सकते थे। इस काल में उन्होने रोम की सुरक्षा की अह्म भूमिका निभानी शुरू कर दी और बाद में उन्हें सेना में भी भर्ती किया जाने लगा। इस प्रकार उन्होने भी सरकार में अपनी अधिक भागीदारी के लिए अधिकार मांगने शुरू किए। इन चुनौतियों के कारण रोमन सरकार में धीरे-धीरे परिवर्तन करने शुरू किए। यद्यपि सीनेट की अपनी शक्ति और प्रतिष्ठा कायम रही लेकिन असैम्बली के स्थान पर एक असैम्बली ऑफ सेन्चुरी तथा असैम्बली ऑफ VªkbCt (Assembly of Centuries and Assembly of Tribes) का गठन हुआ। इनका गठन होनक के बाद प्लेबियन वर्ग के लोगों को भी राजनैतिक अधिकार प्राप्त होने लगे।

Assembly of Centuries :-

इस असैम्ब्ली में सारी रोमन सेना शामिल होती थी। साम्राज्य विस्तार के कारण बढ़ी हुई जरूरतों को पूरा करने के लिए सेना में प्लेबियन (आम लोगों) को भी भर्ती किया जाने लगा। इस प्रकार अब सेना में पेट्रिशियन (कुलीन वर्ग) के अतिरिक्त प्लेबियन (आम वर्ग) लोग भी शामिल होने लगे। यह असैम्बली कानून बनाती थी। तथा Consuls का चुनाव भी करती थी, जिन्हें पहले सीनेट चुनती थी। इसके अतिरिक्त यह अन्य अधिकारियों जैसे Praetors या जजों का भी चुनाव करती थी जो कानूनी मामलों का निपटारा करते थे। इसके अतिरिक्त censor को भी नियुक्त करती थी जिसका मुख्य कार्य टैक्स निर्धारण तथा वोट के लिए जनगणना करना होता था। इसके अलावा censor, moral code को भी लागू करता था। ये सभी अधिकारी पेट्रीशियन वर्ग के थे और इनका पद काल एक वर्ष के लिए होता था। बाद में ये सीनेट के सदस्य बन जाते थे।

Assembly of Tribes :-

प्लेबियन वर्ग के लोग इस असैम्बली के सदस्य होते थे। ये 10 Tribunes की नियुक्ति करते थे जो आम लोगों के हितों का ध्यान रखते थे। प्रारंभ में इन Tribunes की सरकार में कोई भूमिका नहीं थी। परन्तु जब प्लेबियन वर्ग के लोगों ने अपने अधिकार मांगने के लिए रोम के लिए युद्ध में भाग ना लेने की धमकी दी तो सीनेट ने इनकी कुछ मांगों पर विचार किया। इनमें इन Tribunes की law code (कानून संग्रह) की मांग थी जिसे स्वीकार किया गया। इसके लिए सीनेट ने रोम के कानूनों को लिखने के लिए एक आयोग की स्थापना की। इस प्रकार 451 ई0पू0 में 12 पत्थर की तख्तियों (Tablets) पर रोम की विधि संहिता लिखी गई जिसे Law of Twelve Tablets कहा जाता है। परन्तु इस विधि संहिता में भी पेट्रिशियन और प्लेबियन वर्ग के बीच काफी दूरी रखी गई। इसके अनुसार प्लेबियन ना तो Consuls हो सकते थे और ना ही सीनेट के सदस्य बन सकते थे और पेट्रिशयनों से शादी नहीं कर सकते थे। लेकिन इन सबके बावजूद सभी कानूनों, तथा उनकी अवहेलना पर सजा इत्यादि के प्रावधान लिखकर सभी नागरिकों को अनुचित व्यवहार से इन्होंने सुरक्षा प्रदान की। लेकिन प्लेबियन वर्ग का संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ था। वे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहे।

परिणामस्वरूप सर्वप्रथम पेट्रिशियन और प्लेबियन के बीच विवाह निषेध हटा दिए गए तथा कर्ज के बदले कर्जदार को दी जाने वाली सजा का प्रावधान ढीला कर दिया गया। Tribunes को उन सभी कानूनों को निषेध करने (veto) का अधिकार मिल गया जो आम लोगों के यानि प्लेबियन के विरूद्ध थे। इसके अतिरिक्त Assembly of Tribes को कानून बनाने का अधिकार मिल गया जिसे सीनेट से मंजूरी लेनी पड़ती थी लेकिन बाद में वह स्वतंत्र होकर कानून बनाने लगी। 367 ई0पू0 में दो Consules में से एक प्लेबिनयन वर्ग से लेना आवश्यक हो गया। प्लेबियनों के संघर्ष के परिणास्वरूप उन्हें काफी राजनैतिक अधिकार प्राप्त हुए तथा उच्च सरकारी पद प्राप्त किए एवम् उन्हें सीनेट की सदस्यता का भी अधिकार प्राप्त हो गया। लेकिन इतना होने के बाद भी सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त नही हो सके। केवल Tribunes ही आम लोगों के लिए आवाज उठाते थे।

सामाजिक जीवन :-

प्रारंभिक गणराज्य में रोम का समाज 2 वर्गो में बंटा हुआ था। प्रथम कुलीन वर्ग (Patricians) तथा दूसरा आम लोग (Plebians) थे।

कुलीन वर्ग :-

इस वर्ग के सदस्यों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी। परन्तु सीनेट और सरकार पर इसी वर्ग का नियंत्रण था। इस वर्ग में अल्पतंत्र, अमीर कृषक तथा उच्च वर्ग के लोग शामिल थे। इसी वर्ग से जुड़े लोग सीनेट के सदस्य तथा ब्वदेनसे बन सकते थे। प्रारंभ में रोम की सेना भी इसी वर्ग के सदस्य थे। परन्तु 390 ई0पू0 में Gauls ने जब रोम पर आक्रमण किया तब सीनेट ने रोम की सुरक्षा के लिए सभी नागरिकों को सेना और सुरक्षा का कार्य सौंपा। Patricians बिना वेतन के सैनिक गतिविधियों में हिस्सा लेते थे।

आम वर्ग :-

इस वर्ग में समाज के आम लोग जैसे: कृषक, व्यापारी, कारीगर और शिल्पी इत्यादि शामिल थे इन्हें प्लेबियन कहा जाता था। इन्हें कोई भी सरकारी पद प्राप्त नही था और ना ही ये सीनेट के सदस्य बन सकते थे। यद्यपि ये जमीन के मालिक हो सकते थे। प्रारंभ में इन्हें कोई राजनैतिक अधिकार प्राप्त नही था लेकिन बाद में इन्होंने संघर्ष करके कुछ अधिकार प्राप्त किए।

दास :-

रोमन समाज में सबसे निम्न स्थान दासों का था। दास अधिकतर युद्ध बंदी होते थे। लेकिन कर्ज अदा ना कर पाने के कारण भी बहुत से Plebians दास बना लिए गए थे। ये पेट्रिशयनों के खेतों में काम करते थे और उसके घरों में नौकरों की जगह कार्य करते थे। इन्हें ना तो रोम की नागरिकता प्राप्त थी एवम् ना कोई अधिकार इसलिए इनकी स्थिति काफी दयनीय थी।

आर्थिक जीवन :-

प्रांरभिक रोमन गणराज्य में आर्थिक विभिन्नता अधिक नही थी। पेट्रिशियन वर्ग के लोग भी सामान्यत: कृषि कर्म ही करते थे। यद्यपि उनके फार्म काफी बड़े-बड़े थे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण लूसियस क्युन्करियस सिनसिनाटस (Lucius Quinctius Cincinnatus) के उदाहरण से मिलता है। जो प्रांरभिक गणराज्य का ख्याति प्राप्त नायक था। रोमवासी उसे कर्म, कठिन परिश्रम, सादगी और निश्चल गणराज्य सेवा का प्रतीक मानते थे। 458 ई0पू0 में जब दुश्मनों ने रोमन के Consul तथा उसकी सेना को घेर लिया। तब 5 रोमन सैनिक छुप कर भागे और रोम वासियों को इसकी सूचना दी। इस पर सीनेट ने आपातकालीन मीटिंग की और 6 महीने के लिए एक डिक्टेटर नियुक्त किया। एक दूत जब सीनेट में डिक्टेटर की नियुक्ति का संदेश लेकर सिनसिनकास में पास गया तो वह रोमन सेना की मदद के लिए तुरंत पहुंचा और युद्ध में विजयी रहा और पुन: रोम पहुंचा। केवल 16 दिन तक डिक्टेटर के पद पर रहने के बाद उसने वह पद छोड़ दिया।

रोम की आर्थिकता का मुख्य आधार कृषि था। इस काल में बड़े-बड़े जमीदार पेट्रिशयन वर्ग के थे, जिनकी समाज में काफी प्रतिष्ठा थी। कृषकों के अतिरिक्त बुनकर, लुहार, बढई और मोची इत्यादि कुशलता से अपना कार्य करते थे और उसमें निपुण भी थे।

इस काल में व्यापार अधिक उन्नत नही था तथा व्यापार विनिमय प्रणाली (वस्तुओं का आदान-प्रदान) पर आधारित था। इसके साथ ही मुद्रा प्रणाली भी अस्तित्व में आई।

धर्म :-

प्रारंभ में रोमन बहुदेववादी थे। वे अपने अनेक देवी-देवताओं की पूजा व्यक्तिगत रूप से तथा सामाजिक समारोह के दौरान करते थे। प्रत्येक घर में एक मन्दिर होता था और इनका देवता इनके घर और खेतों का रक्षक होता था। प्रत्येक घर में चूल्हें की देवी वेस्ता की पूजा की जाती थी। प्रत्येक सार्वजनिक या धार्मिक समारोह किसी देव या देवी को अर्पित होता था। जैसे किसी भी समारोह की शुरूआत उनके जनुस (Janus) देवता से होती थी, इसकी पूजा वे प्रत्येक महीने और साल के प्रारंभ में करते थे। यही से साल के प्रथम महीने का नाम जनवरी पड़ा। इसके अतिरिक्त वे जूपिटर (रोम का रक्षक), जीनों (स्त्रियों का रक्षक), मिनर्वा (ज्ञान की देवी), मार्स (युद्ध का देव), लारेस (अपने पूर्वजों की आत्मा का देवता)। इत्यादि की पूजा करते थे। इनके अतिरिक्त रोमवासी यूनानी, इस्ट्रस्कनों इत्यादि के देवों की भी पूजा करते थे।

गणराज्यकाल में रोम का उत्कर्ष

चतुर्थ शताब्दी ई0पू0 तक रोम ने न केवल समस्त इटली पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया बल्कि रोम विश्व शक्ति के रूप में भी उभर कर सामने आया।

प्रांरभिक गणराज्य की स्थापना के 200 वर्षो के अन्दर रोम ने मध्य इटली तथा दूसरे लातिनी (Latin) शहरों पर अपना वर्चस्व स्थापित कर सेमनाइटों तथा इट्रस्कबों को पराजित करके 290 ई0पू0 में रोम इटली का प्रमुख राज्य बन गया था। परन्तु जब दक्षिण इटली के यूनानी शहरों को रोम से खतरा लगने लगा तो उन्होंने एपीरस (Epirus) के राजा पिहरूहस (Pyrrhus) की सहायता से रोमनों को दो युद्धों में हरा दिया। लेकिन इस युद्ध में उन्हें स्वंय काफी नुकसान भी झेलना पड़ा। Phrrhus ने स्वयं युद्ध के बाद घोषणा की थी कि एक और ऐसी विजय से वह हार जाएगा। 264 ई0पू0 तक रोम का समस्त इटली पर अधिकार कायम हो गया। उन्होंने लातिनी लोगों को रोम की नागरिकता भी प्रदान कर दी। इसके अलावा इन्हें वोट का भी अधिकार दिया गया। इस काल में सभी नगरों को रोम से जोड़ा गया जो कि सेना तथा व्यापार के लिए उपयोगी होने के साथ-2 इटली के लोगों के एकीकरण में भी सहायक हुई। नए विजित क्षेत्रों में रोमन सैनिकों एवम् किसानों को भूमि दी गई इस प्रकार रोम ने अपने तौर तरीके इन नए क्षेत्रों में फैलाए।

प्रथम प्यूनिक युद्ध :-

कार्थेज अफ्रीका के उतरी किनारे पर स्थित है तथा ये लोग अच्छे नाविक थे तथा अटंलाटिक तथा भूमध्यसागर पर इनका एकाधिकार कायम था। इनके स्पेन, पुर्तगाल और सार्दमिया (Sardmia) द्वीपों से अच्छे संबध थे। रोम के विस्तार के कारण रोमन तथा कार्थेज का आपस में युद्ध शुरू हो गया। युद्ध का मुख्य कारण सिसली प्रदेश था। उधर रोम इसे अपने अधीन करना चाहता था। जब रोम ने दक्षिणी इटली के यूनानी नगरों को जीत लिया तो उनके और कार्थेज के व्यापारिक संबधं टकरा गए। इस प्रकार पश्चिमी भूमध्यसागरीय क्षेत्र पर अधिकार के लिए दोनों में युद्ध हुए जो 264-146 ई0पू0 के बीच चले। प्रांरभिक दोनों युद्धों में माइली का युद्ध 260 ई0पू0 तथा एक्नोमिस के युद्ध में रोम ने कार्थेज को हराया तथा सिसली में पर्लेमा (Palerma) को जीत लिया और बाद में कार्थेज पर सीधा हमला कर दिया। लेकिन कार्थेज ने स्पार्टा के जनरल की सहायता से रोम को हरा दिया। लेकिन शीघ्र ही रोम ने अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया। 241 ई0पू0 में रोम की सेना ने कार्थेज को ऐजियन (Aegean) द्वीप की लडाई में हरा दिया और सिसली में लिलीबकम पर अधिकार कर लिया तब कार्थेज ने सन्धि का प्रस्ताव रखा और सारे सिसली पर रोम का अधिकार मान लिया गया। इस तरह सिसली, सरदीमिया, तथा कोरसिका पर रोम का अधिकार हो गया और रोम एक शक्तिशाली समुद्री शक्ति बन गया। इसके बावजूद कार्थेज अभी भी काफी शक्तिशाली बना रहा।

द्वितीय प्यूमिक युद्ध :

प्रथम प्यूमिक युद्ध में अपने कई क्षेत्रें को हारने के बाद अब कार्थेज ने स्पेन पर अपना आधिपत्य बढ़ाना शुरू कर दिया। प्रथम प्यूमिक युद्ध के जनरल हमिल्कर तथा उसके बेटे हन्निबल ने यह कार्य पूर्ण किया और स्पेन को कार्थेज के अ अधीन कर लिया फिर उन्होंने रोम से पहली हार का बदला लेने की सोची। इसकी शुरूआत करते हुए कार्थेज ने स्पेन में रोम के सहायक नगर को जीत लिया इस तरह दोनों के बीच शुरू हुआ जो द्वितीय प्यूमिक युद्ध का कारण बना।

218 ई0पू0 में हन्निबल ने अल्पस पर्वत को पार करके अल्पाइन कबीलों को हराकर अपने 26000 सैनिकों के साथ इटली में प्रवेश किया। इसने दो युद्धों में रोमनों को हराया तथा रोम नगर को घेर लिया तथा 217 ई0पू0 में टामिसेन झील के समीप युद्ध में उन्हें हराया। कार्थेज जनरल ने मदान के राजा फिलिप से सन्धि कर ली लेकिन इसके बाद भी रोमन अगले 9 वर्षो तक उन्हें तंग करते रहे। रोमनों ने 212 ई0पू0 में Syracuse, 211 ई0पू0 में Capua, तथा 209 ई0पू0 Arenthian का जीत लिया। 208 ई0पू0 में हनीबल ने रोम को हराकर कोन्सुल मारिस्लुस (Consul Marcelles) को मार दिया, इसी बीच कार्थेज में हस्ड्रबल (Hasdrubal) को सेना के साथ सहायता के लिए भेजा। लेकिन इसकी सेना को रोमन नायक गौस क्लाडियस नीरों ने हरा दिया, जब यह समाचार दक्षिणी इटली में हनीबल के पास पहुंचा, तो इसी बीच रेाम ने उतरी अफ्रीका में स्वयं कार्थेज पर हमला कर दिया तो हनीबल को इटली छोड़कर वापिस कार्थेज की सुरक्षा के लिए आना पड़ा। 202 ई0पू0 में उसे रोम ने नायक सिपिओं (Scipio) ने हरा दिया। बाद में हनीबल ने आत्महत्या कर ली। कार्थेज ने रोम से सन्धि कर ली और स्पेन रोम को दे दिया इसके अलावा काफी धन भी हर्जानें के तौर पर दिया। यह भी तय हुआ कि कार्थेज रोम की अनुमति के बिना किसी युद्ध में हिस्सा नही लेगा। 150 ई0पू0 में कार्थेज ने संधि की अवहेलना करते हुए रोम की आज्ञा के बगैर नूमिडिया (Numidia) को युद्ध में हरा दिया, तो सीनेट ने कार्थेज युद्ध की घोषणा कर दी।

तीसरा प्यूनिक युद्ध केवल 3 साल तक चला (149-146 ई0पू0) यद्यपि कार्थेज की सेना बहादुरी से लड़ी, लेकिन हार गई। रोम ने कार्थेज पर अधिकार कर लिया और उसके शहरों को नष्ट कर दिया। इस क्षेत्र के ज्यादातर निवासी या तो मार दिए गए या दास बना लिए गए। इस तरह उतरी अफ्रीका का यह क्षेत्र रोमन साम्राज्य का हिस्सा बन गया।

कार्थेज की जीत के बाद रोम ने यूनानी नगर राज्यों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। मैसेत्रोन के फिलिप पंचम जिसने हनिबल का रोमनों के खिलाफ साथ दिया था। उसे सबक सिखाने का मौका तलाश किया गया। इसके लिए 146 ई0पू0 में राम ने कौरिन्थ को हराया और अगले 100 वर्षो में सभी यूनानी नगर राज्यों को रोमन साम्राज्य में मिला लिया। फिलिप को हराने के बाद बाकि यूनानी राज्यों को भी रोम में मिला लिया जैसे : क्रेट को 67 ई0पू0, फिलिसिया को 64 ई0पू0, साइप्रस को 58 ई0पू0 तथा मिस्र को 30 ई0ूप0 में जीत कर पूरे पश्चिमी यूरोप, एशिया मानइर, सीरिया इत्यादि को रोम साम्राज्य में मिला लिया गया।

प्यूनिक युद्धों का आर्थिक एवम् सामाजिक क्षेत्र पर प्रभाव :-

इन युद्धों के कारण रोम ने विश्व में साम्राज्य की स्थापना की। इसके साथ ही वे यूनानी सभ्यता के सम्पर्क में आए जिससे रोम ने काफी कुछ ग्रहण किया। विजय के पश्चात् इनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई जिस कारण सड़कों और नौसेना का विकास संभव हुआ इससे व्यापार और वाणिज्य को काफी बढ़ावा मिला। रोम के अमीर वर्ग विजित क्षेत्रों से काफी विलासिता की सामग्री आयात करवाने लगे। युद्धों के कारण नए क्षेत्रों से अनाज का आयात हुआ, काफी धन युद्ध की लूट तथा हर्जाने के रूप में रोम को प्राप्त हुआ। अनेक युद्ध बंदी दास के रूप में रोम लाए गए। इन तीनों चीजों के कारण रोम में अनेक परिवर्तन हुए। विजित क्षेत्रों से जबरन कर के रूप में अनाज को रोम लाया गया जिससे रोम में फालतू अनाज होने से उसकी कीमत गिर गई इस कारण छोटे किसानों को काफी नुकसान हुआ और वे कर्जदार बन गए। कर्ज चुकाने के लिए उन्हें अपनी जमीनें तक बेचनी पड़ी। इन युद्धों के कारण रोम में एक नए वर्ग का उदय हुआ। व्यापार का विस्तार होने से ये काफी धनी हो गए और इन्होंने छोटे-छोटे किसानों की भूमि खरीद कर बड़ी-बड़ी Estate स्थापित कर ली। इस भूमि पर दासों को, जो युद्ध बंदी रोम लाए गए थे। खेती के कार्य में लगाया गया। इस प्रकार सस्ते श्रम के कारण बड़े जमीदारों से छोटे किसान मुकाबला नही कर सके और इन्हें कृषि में नुकसान होने लगा। इस प्रकार हानि के कारण अधिकतर कृषक अपनी जमीन बेचने पर विवश हो गए। अधिकतर बेजमीन किसान रोम में बस गए तथा राज्य की ओर से इन्हें अनाज देना पड़ा। इस प्रकार समाज में अनेक समस्यांए पैदा हो गई क्योंकि अमीर और गरीब में दूरी बढ़ जाने से समाज में द्वेष फैल गया।

रोम गणराज्य का ह्रास :-

साम्राज्य प्रसार के कारण रोम में जो कठिनाइयां पैदा हुई उनके कारण 133-44 ई0पू0 के बीच रोम में संघर्ष शुरू हो गया। परिणामस्वरूप सीनेट एक शक्तिशाली संस्था के रूप में उभरी। दूसरी और सीनेट के सदस्य राज्य की समस्याओं से निपटने की अपेक्षा स्वयं में अधिक व्यस्त थे। इन परिस्थितियों में रोम के प्रसिद्ध नेताओं ने रोम में सुधार शुरूआत कर भूमिरहित गरीबों की सहायता की। 133 ई0पू0 में टाइबेरियस ग्राक्कस ने सर्वप्रथम प्लेबियनों के अधिकारों की बात कहीं क्योंकि रोम में पेट्रिशयन वर्ग ने कृषकों की भूमि पर अधिकार कर लिया था। टाबेरियसक ने जमीनों का आकार सीमित कर उन्हें बेरोजगार किसानों में बांटना शुरू किया, इससे रोम को अधिक सैनिक भी प्राप्त हुए क्योंकि इस काल में भूमि के स्वामी ही रोम की सेना में भर्ती हो सकते थे। 123 ई0पू0 में टाइबेरियस को ट्रिब्यून चुना गया तो उसने भूमिहीन कृषकों को दक्षिणी इटली तथा उतरी अफ्रीका में बसाने के लिए कदम उठाए और गरीबों को कम कीमत पर अनाज उपलब्ध करवाया। और उसने सभी इटली वासियों को रोम का नागरिक बना दिया। परन्तु इसे भी इसके 3000 साथियों के साथ मार दिया गया। अंत में सीनेट ने कुछ भूमि सुधार किए और अनाज की कीमत कम रखी। लेकिन फिर भी बैरोजगार सैनिकों तथा भूमिहीन किसानों की संख्या बढ़ती चली गई। अगले 100 वर्षो में सीनेट के अधिकतर सदस्य सुधारों के विरूद्ध थे। कुछ सदस्य ऐसे भी थे जो प्लेबियन वर्ग की मांगों को समर्थन करते थे।

रोम में 73 ई0पू0 में 70,000 दासों ने स्र्पाटकस (Spartacus) के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया इसे दबाने में रोम की सेना को एक वर्ष का समय लगा। इस दास विद्रोह के बाद पौम्पी तथा जूलियस सीजर में युद्ध शुरू हो गया था। पौम्पी को उसके दुश्मनों ने मिस्र में मार दिया तथा सीजर कुछ समय मिस्र में रहा जहां वह वहां की रानी कलियोपेट्रा के मोंह में फंस गया। 46 ई0पू0 में वह रोम आया तथा स्वयं को वहां का तानाशाह घोषित कर दिया। वह स्वयं शासक बनना चाहता था परन्तु 44 ई0पू0 में उसे मार दिया गया इसकी मृत्यु के बाद सत्ता मार्क एंथेनी के हाथों में आ गई तथा उन्होंने ब्रूटस, कैसिमस को पकड़ कर मार दिया। 37 ई0पू0 में Octavian रोम का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन गया।

सीजर के सुधार :-

जूलियस सीजर केवल एक अच्छा जनरल ही नहीं अपितु, एक अच्छा सुधारक और प्रशासक भी था। उसने रोमन समाज की विभिन्न कठिनाइयों को वास्तव में सुधारने की चेष्टा की और अपने सुधारों में उसने सभी का सहयोग लेने की भी चेष्टा़ की। सर्वप्रथम उसने आर्थिक समस्याओं की ओर ध्यान दिया। बेरोजगारी समाप्त करने के लिए उसने बहुत से सार्वजनिक कार्यो की शुरूआत की। जिनमें रोम को नालियों से पानी देने की सुविधा भी थी। इसने गरीबों को मुक्त तथा कम दरों पर अनाज दिया। टैक्स प्रणाली को व्यवस्थित किया। इसके अलावा रोम में नई कलोनियों को बसाने की आज्ञा दी। सीजर ने रोमन साम्राज्य में राजनैतिक स्थिरता लाने का भी प्रयास किया। उसने राज्यों में स्वतंत्र कमांड को समाप्त किया तथा उनकों (Legates) लगेटस द्वारा प्रबन्ध करना शुरू कर दिया जो उसके प्रति वफादार थे। उसने प्रांतों के गर्वनरों, की शक्तियां कम की इसके अतिरिक्त प्रांतों का स्तर भी बढाया और बाहर के लोगों को भी वहां की नागरिकता प्रदान की। सीजर ने सीेनेट में Gauls को भी भर्ती किया। उसने शहरों का भी सुधार किया। उसने सभी नगरों में समान प्रशासन व्यवस्था लागू की और रोम की तरह ही वहां सीनेट की स्थापना कर मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति की। उसने छोटे से छोटे इटालियन नगर को भी राजनैतिक स्तर पर रोम के नागरिक के समकक्ष कर दिया।

सीजर ने कैलंडर में भी सुधार किया। इसके द्वारा बनाया गया कलैंडर 1522 तक यूरोप में तथा 1917 तक रूस में चलता रहा।

रोमन गणराज्य में सामाजिक स्थिति :-

प्रांरभिक गणराज्य में जब रोम काफी छोटा था उस समय समाज के दोनों वर्गो प्लेबियन और पेट्रिशियन के बीच काफी अंतर नही था। क्योंकि दोनों वर्गो के पास जमीन थी। लेकिन पेट्रिशियन वर्ग आम वर्ग से थोड़ा अभिजात वर्ग था। लेकिन बाद में स्थिति बदल गई। जैसे रोम एक विश्व शक्ति बन गया तथा सीनेट के सदस्यों के स्तर में वृद्धि हुई। वे अब बड़ी-2 जमीनों के मालिक बन गए और उस जमीन पर अनेक दास उनके लिए कार्य करते थे। सीनेट के सदस्य काफी समृद्धशाली थे। इनके बच्चों को पढ़ाने के लिए यूनानी अध्यापक नियुक्त किए जाते थे। दूसरी तरफ प्लेबियन वर्ग के लोगों की स्थिति काफी निम्न होती गई। पहले दो प्यूनिक युद्धों मे हनीबल की सेना ने उन्हें लूट कर बर्बाद कर दिया। दूसरे जब किसी नागरिक कृषक को युद्धों के दौरान विदेश भेजा जाता था तो वह जाते समय अपनी जमीन बेच जाता था। युद्ध समाप्ती के बाद वापिसी पर वह अपने शहर में बेरोजगारों की श्रेणी में शामिल होता और उसे बाकि जीवन राज्य से प्राप्त होने वाले अनाज पर निर्भर रहना पड़ता। इस प्रकार रोमन गणराज्य में बहुत से नागरिकों को सरकार की और से आर्थिक मदद की जाती थी। रोम में इस तरह के लोगों की संख्या लाखों में थी।

स्त्रियों की स्थिति :-

रोमन समाज की समृद्धि के कारण स्त्रियों की स्थिति में सुधार हुआ। घरों में काम करने के लिए अनेक दास होते थे, उनके बच्चों को यूनानी अध्यापक पढ़ाते थे। रोम की औरतें काफी फैशन करती थी रोम में दूर-दराज के क्षेत्रों से विलासिता की वस्तुंए मगंवाई जाती थी। जैसे भारत तथा चीन से रेशमी वस्त्र आयात होते थे। घरों में खाना बनाने के लिए रसोइए रखे जाते थे। इनके घरों में भोजन ग्रीक बर्तनों या ग्रीक शहरों से लूटे चांदी के बर्तनों में परोसा जाता था। इस काल में घरों में लोग पुरानी वस्तुएं भी सजावट के तौर पर इस्तेमाल करने लगे थे।

दास :-

इस काल में रोम में दासों की बड़ी संख्या रोम में लाई गई। रोम में दासों का आपस में युद्ध करवा कर रोमवासी अपना मंनोरजन करते थे। इनके लिए रोम में अनेक अखाड़े बनाए गए। दासों से अनेक कार्य करवाए गए जैसे कृषि, सड़के,, नदियों और खानें इत्यादि खोदने का कार्य करवाया जाता था और उनसे अच्छा व्यवहार नही किया जाता था। इस कारण दास हमेशा विद्रोह के लिए तैयार रहते थे। 73 ई0पू0 में 70,000 दासों में Spartacus के नेतृत्व में विद्रोह भी कर दिया।

आर्थिक स्थिति :-

कृषि :-

प्रारंभिक गणराज्य में कृषि लोगों का मुख्य व्यवसाय था। यद्यपि उन्होंने कृषि के तरीके और तकनीकी विकास में कुछ भी नया नही किया था। उनके औजार इत्यादि काफी प्राचीन विकास थे इनकी फसल काटने की दरातियां भी ठीक नही थी। अनाज को फर्शो पर कूट कर निकालते थे। परन्तु उन्होंने कृषि की फसलों को बदल-बदल कर बीज बोना शुरू कर दिया। कृषि में अधिकतर जौ, ज्वार, बाजरा और गेंहू की खेती करते थे। रोम में पेट्रिशियन वर्ग के लोग अपने घरों में बड़े-बड़े बगीचों का निर्माण करते थे। उनमें फलदार पौधे लगाए जाते थे। रोम वासियों ने यूनानी लोगों से अंगूर, अंजीर और सरसों की खेती करते थे। कृषि के लिए विजित क्षेत्रों को आबाद किया गया, जहां से कर के रूप में अनाज रोम में लाया जाता था। जो कि दासों द्वारा कृषि करने के कारण सस्ता था, इस कारण रोम में भी अन्न के भाव गिरने से कृषि लाभप्रद नहीं रही। किसानों ने खेतों में फसल बोने की अपेक्षा चारागाह बना दिया कुछ कृषकों ने अपना कर्ज उतारने के लिए अपनी भूमि बेच दी। इस प्रकार अमीर लोगों ने उनसे जमीनें खरीदकर म्ेजंजमे स्थापित कर लिए।

व्यापार :-

प्रारंभिक रोम गणराज्य में व्यापार उन्नत नहीं था। परन्तु बाद में साम्राज्य विस्तार के कारण रोम की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और व्यापार में तेजी आई। जिस कारण रोम में एक मध्य वर्ग का उदय हुआ जो काफी अमीर था। इस काल में सीनेट के सदस्यों की स्थिति में सुधार हुआ। उन्होंने अपने लिए विलासिता पूर्ण वस्तुएं मंगवानी शुरू की। इस काल में सिक्कों के प्रचलन के कारण व्यापार को पहल की अपेक्षा बढ़ावा मिला। रोम द्वारा सिसली पर आद्धिपत्य स्थापित करने के पश्चात् समुद्री व्यापार में काफी वृद्धि हुई और व्यापारिक गतिविधियाँ रोम के उपनिवेशों और भारत में भी होने लगी तथा रोम राज्य को अपने उपनिवेशों तथा युद्ध में पराजित प्रदेशों से हर्जाने के तौर पर कर एवं अन्न की काफी प्राप्ति होती थी। जिस कारण रेाम की आय में वृद्धि हुई।

प्रान्तीय प्रशासन :-

गणतंत्र काल में रोम ने अनेक नए क्षेत्रों को विजित कर अपने साम्राज्य में मिलाया जिनमें स्पेन, उत्तरी अफ्रीका तथा यूनानी राज्य प्रमुख थे। इन प्रान्तों का प्रशासन सुचारू रूप से चलाने के लिए ब्वदेनसे सीनेट की स्वीकृति से गर्वनरों की नियुक्ति करते थे इनकी नियुक्ति एक वर्ष के लिए की जाती थी। लेकिन बाद में इनकी अवधि तीन वर्ष कर दी गई अवधि बढ़ाने के पीछे प्रान्तों की स्थिति को सुव्यवस्थित करना था। लेकिन वास्तव में गर्वनरों ने प्रान्तों की स्थिति सुधारने की अपेक्षा इन्हें धन अर्जित का साधन बना लिया। गर्वनर केवल इस बात का ध्यान रखते थे कि प्रान्तों में आपसी लडाई से शान्ति भंग न हो। इस काल में बड़े प्रान्तों के गर्वनरों ने रोम राज्य को कर के रूप में पैसा और अनाज भी दिया बल्कि सैनिक सेवांए बन्द कर दी। गर्वनरो को कर इक्कठा करने की एवज में उसका एक भाग मिलता था। प्रजा भी इन्हें भेंट के रूप में पैसा या विभिन्न चीजें देती थी। इसके अतिरिक्त इन्हें कानूनी मुकदमों से भी आय होती है।

रोमगणराज्य का प्रशासन :-

सीनेट :-

इस काल में भी सीनेट सबसे महत्वपूर्ण संस्था थी। पेट्रिशियन वर्ग के लोग इसके सदस्य होते थे। सीनेट का मुख्य उतरदायित्व था गणराज्य के लिए Consuls की नियुक्ति करना, मजिस्ट्रेट की नियुक्ति, सलाह देना इसके अलावा वित प्रबन्धन का कार्य भी सीनेट का था। साम्राज्य विस्तार के बाद प्रांतों के गर्वनरों की नियुक्ति, जनरलों की नियुक्ति करने के अधिकार भी इनके कार्यक्षेत्र में आ गए। इस कारण सीनेट तथा कॉन्सल में टकराव की स्थिति आ गई। इस काल में कई Consul को जैसे टिबेरियस और ग्रक्कस आदि ने इस संघर्ष में अपनी जान भी गवानी पड़ी। जनरल मारियस ने अपनी सेना के बल पर सीेनेट में अपना प्रभुत्व जमाया। लेकिन बाद के जनरलो ने सीनेट को एक व्यर्थ की संस्था कहा। जैसे जूल्यिस सीजर ने कहा लेकिन सीनेट के सदस्यों ने उसकी हत्या करवा दी।

असैम्बली :-

जब राम गणराज्य का क्षेत्र काफी छोटा था तब नागरिक तथा असैम्बली का महत्व था। परन्तु साम्राज्य विस्तार के बाद इनके महत्व में कमी आई। पहले मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति लोगों की असैम्बली करती थी लेकिन अब यह कार्य सीनेट करने लगी। मजिस्ट्रेट अपने कार्यकाल के बाद सीनेट के सदस्य बन जाते थे। मजिस्ट्रेटों के अतिरिक्त Tribune का कार्य भी Consuls पर नियंत्रण रखना और आम लोगों के हितों का ख्याल रखना था।

प्रांतीय गर्वनरों और अन्य उच्च अधिकारियों के कारण वहां भ्रष्टाचार फैलना शुरू हो गया। सिसली के गर्वनर Verrace ने 73 ई0पू0 में भ्रष्टाचार से काफी धन कमाया जिसका 2/3 हिस्सा उसने रोम में जजों और वकीलों को खरीदने में खर्च किया। क्योंकि यदि उसे पद से हटाने की प्रक्रिया चले तो वे उसकी सहायता करें। इस तरह अन्य गर्वनर भी जूरी के सदस्यों को पैसे से प्रभावित करते थे।

नगर प्रबंध:-

रोम ने यूनानी विजित ऋप्रदेशों से सद्व्यवहार किया। प्रत्येक यूनानी नगर राज्य को उनकी प्रशासनिक स्वतंत्रता प्रदान की गई। केवल अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में विदेशी नीति संबधी कार्य रखें। प्रत्येक नगर का अपना न्यायालय और मजिस्ट्रेट था। इस काल में विभिन्न नगर प्रसिद्धी के केन्द्र बने जैसे एफसिस और डायना देवताओं की पूजा को केन्द्र, और एंथेस ज्ञान का केन्द्र बना और प्राचीन विश्वविधालय का रूप लिया।

सैनिक प्रबंध :-

द्वितीय प्यूनिक युद्ध से पूर्व रोम की सेना स्वतंत्र कृषकों से बनी थी। जो अपने स्तर के आधार पर युद्धों में हिस्सा लेते थे। इस प्रकार की सेना प्रारंभिक गणराज्य के लिए तो उचित थी। लेकिन बाद में जब रोम ने अपने प्रदेशों का विस्तार कर स्पेन, उतरी अफ्रीका यूनानी प्रदेशों में जाकर युद्ध किया तो स्वतंत्र नागरिकों की संख्या कम हो गई। ब्वदेनस मारियस ने वेतन वाले सैनिकों की भर्ती शुरू कर दी। पहले स्वतंत्र नागरिक रोम की रक्षा अवैतनिक और अपने गौरव के लिए करते थे। लेकिन इस काल में सैनिकों को वतेन के अलावा उन्हें ट्रेनिंग भी दी जाने लगी। सैनिकों को सीनेट के प्रति वफादारी की शपथ लेनी पड़ती थी। परन्तु जनरलों द्वारा उन्हें सेना में भर्ती किए जाने के बाद वे उनकी शपथ लेने लगे। सैनिक अब युद्ध अधिकतर जनरलों के लिए करने लगे। इस प्रकार अलग-2 जनरलों ने अपने Legions की मदद से रोम गणराज्य में अपना प्रभुत्व फैलाने की कोशिश की। जिसका परिणाम यह हुआ कि जनरल आपस में ही युद्ध करने लगे जैसे पौम्पी और सीजर इत्यादि। विभिन्न जनरलों के आपसी युद्धों के कारण ही रोमन गणराज्य का अंत हुआ और एक साम्राज्य की स्थापना हुई।

रोमन साम्राज्य

सीजर ने अपनी मृत्यु से पूर्व अपने 18 वर्षीया भतीजे आक्टेवियन को अपना उतराधिकारी नियुक्त किया। इसकी मृत्यु के बाद रोम में 13 वर्ष तक अराजकता की स्थिति बनी रही। आक्टेवियन ने सीजर के दो सहोगियों मार्क एॅन्थनी तथा मार्क्स लेपिडस के सहयोग से रोम का प्रशासन संभाला। इसने सर्वप्रथम विद्रोहीयों और “ाड़यंत्र कारियों के विरूद्ध कार्यवाही शुरू की और विद्रोहीयों के नेता ब्रटूस तथा कैसियस को मौत के घाट उतार दिया गया। परन्तु शीघ्र ही एन्थनी और आक्टेवियन के बीच संघर्ष शुरू हो गया। एन्थनी ने मिश्र की रानी केलियोपेट्रो से संधि कर ली। इस बात पर आक्टेवियन ने उनके विरूद्ध युद्ध छेड़ दिया और 31 ई0पू0 में इन दौनों की संयुक्त सेना को नौसैनिक युद्ध में एक्टियम (Actium) नामक स्थान पर हरा दिया। एन्थनी और क्ेलियोपेट्रा मिश्र भाग गए जब आक्टेवियन की सेना वहां पहुंची तो उन्होनें आत्महत्या कर ली। अगले वर्ष मिश्र को भी रोमन साम्राज्य का हिस्सा बना लिया गया।

रोम वापिस पंहुचने पर ऑक्टेवियन ने घोषणा की कि वह गणतन्त्रा को पुन: स्थापित करेगा। लेकिन उसने इटली के आधे साम्राज्य पर सीनेट को प्रशासनिक भार सौंपा तथा आधे साम्राज्य पर स्वयं शासन करने लगा। उसने स्वयं को प्रिंसेप अथवा राज्य का प्रथम नागरिक घोषित किया। इस काल से 284 ई0 तक का युग प्रिंसिपेट के नाम से भी जाना जाता है।

अगस्तस का काल:

अगस्तस ने रोम पर 40 वर्षो तक शासन किया। इसके एवम् इसके उतराधिकारियों के काल में रोम विध्वंसकारी युद्धों से छुटकारा पाकर शक्ति के युग में आ गया जिसे Pay Romane या रोमन शक्ति कहा जाता है। इसके शासनकाल मे रोम गणतन्त्रा से निकल कर साम्राज्य बन गया। सीनेट ने इसे Imperator (एम्पीरेटर) की उपाधि दी या रोम की सेना का सेनापति। उसने यद्यपि सीनेट, जो कि गणतंत्र प्रणाली का एक अंग थी उसे उसी स्वरूप में रखा लेकिन उसकी शक्तियों को कम कर दिया तथा स्वयं एक सम्राट की तरह शासन करने लगा। इसने 27 ई0पू0 से 14 ई0पू0 तक राज्य किया तथा रोमन साम्राज्य मे अनेक सुधार कर उसे सदृढ़ता प्रदान की।

सैनिक सुधार :

सर्वप्रथम इसने रोम की सेना में सुधार किए। रोमन सेना को इसने अनुशासित और व्यवहारिक बना दिया जो सम्राट के प्रति वफादार रहे। इसने भूतपूर्व सैनिकों को प्रान्तों में बसाने की प्रक्रिया शुरू की ताकि स्थानीय सुरक्षा मजबूत हो सके। इसके अतिरिक्त इसने सेना के पूर्व सैनिकों को रोम की नागरिकता प्रदान की। इसकी स्थाई सेना मे तीन लाख सैनिक थे। जिन्हें साम्राज्य के महत्वपूर्ण स्थानों पर तैनात किया।

प्रान्तो का संगठन:

आगस्तस्य ने रोमन साम्राज्य की प्रान्तीय शासन प्रणाली को संगठित किया और उन पर केन्द्र का नियन्त्राण कठोर कर दिया। सीजर की भाँति इसने भी प्रांतों के नागरिको को रोम की नागरिकता प्रदान की ताकि वे रोम साम्राज्य का हिस्सा समझ सके। इसके अलावा उन्हें सरकारी पद प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया। कर वसूलने की प्रणाली में भी सुधार किया गया एवम् इन्हें वसूलने के लिय योग्य अधिरियों की नियुक्ति की गई। इस प्रकार अराजकता को समाप्त करने की कोशिश की गई। इन सुधारों से रोम में राष्ट्रीयता और एकता की भावना का संचार हुआ।

अन्य सुधार:

इसमें अतिरिक्त अगस्तस ने प्रशासन के लिए एक सुव्यवस्थित सिविल सेवा का गठन किया। राज्य के महत्वपूर्ण पद केवल योग्य व्यक्तियों को दिए गए। कर्मचारियों को राज्य की ओर से वेतन मिलता था। इसने रोम मे जनगणना की शुरूआत की ताकि कर निर्धारित करने में सुविधा हो तथा कर उचित लगाए जा सके। इसने सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए अनेक कानून बनाए जिन्हें जुलियन कानून (Julian Laws) के नाम से जाना जाता है। ये कानून सदाचार, शालीनता, वैवाहिक जीवन, शुद्र व्यवहार और निष्ठा पर जोर देते थे। समाज के विकास के लिए उसने शिक्षा प्रसार पर बल दिया। इसके काल में नई अदालतों की स्थापना हुई तथा न्यायिक व्यवस्था में सुधार किया गया। इसने डाक प्रणाली की शुरूआत करके प्रांतों तथा रोम के बीच सीधा संपर्क स्थापित किया।

आर्थिक सुधार:-

देश में हुए विभिन्न प्रशासनिक सुधारों के कारण शांति कायम हुई, और व्यापार में बढ़ोतरी हुई, जिस कारण साम्राज्य में आर्थिक प्रगति हुई। व्यापार की प्रगति के लिए अगस्तस ने भूमध्य सागरीय समुद्री लुटेरों से व्यापारियों की सुरक्षा के लिए सैनिक सुरक्षा सख्त कर दी। स्थल मार्ग पर भी सैनिक व्यापारियों की सुरक्षा करते थे। इस काल में साम्राज्य की ओर से व्यापारियों को दूर-दराज के देशों से व्यापारिक संबंध स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। इसने रोमन सिक्कों मे भी सुधार किया जिस कारण व्यापार में वृद्धि हुई।

अगस्तस के काल में रोम एक अन्तर्राष्ट्रीय नगर बन गया। इसने रोम को सुन्दर बनाने के लिए विशेष कार्य सम्पन्न किए। इसने स्वयं कहा है कि रोम पहले धूप में सूखी इंटों से बना था मैनें इसे संगमरमर के कपडे़ पहना दिए है।

अगस्तस के उतराधिकारी:-

अगस्तस ने सम्राट के पद को वंशानुगत बनाने की चेष्टा की। चूंकि इसका स्वयं कोई पुत्र नहीं था। इसलिए इसने परिवार के सदस्यों को वरीयता के अनुसार अपना उतराधिकारी नियुक्त किया। लेकिन उसका प्रिय भतीजा और दामाद जल्दी मर गए तथा तब उसने अपनी पुत्री के बच्चों को अपना उतराधिकारी बनाया। परन्तु अंत में उसे अपने Stepson (Tiberius)- टिबेरियस को अपना उतराधिकारी नियुक्त किया जो 14.37 ई0 तक राज्य करता रहा। वह एक अत्याचारी शासक था। इसके बाद कलिगुला शासक बना उसे पागल कहा जाता था फिर Claudius (क्लाडियस) था जिसने ब्रिटेन को विजित किया इसके बाद नीरो शासक बना जो सनकी शासक के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इसने सर्वप्रथम अपने योग्य सलाहकारों को हटा दिया, अपनी माता की हत्या कर दी और अपने सभी रिश्तेदारों को मरवा दिया जिनसे उसे प्रतिद्वंदी होने का खतरा था। इस प्रकार उसने अपने वंश को ही समाप्त कर दिया। इसने राज्य का सारा धन व्यक्तिगत कार्यो पर खर्च कर दिया। इसलिए वह रोम की प्रजा में बहुत अलोकप्रिय हो गया। 64 ई0 मे जब रोम आग में झुलस रहा था तो नीरो आराम से शराब पी रहा था। इस कारण रोम मे अराजकता की स्थिति फैल गई। Gaul (गॉल) तथा स्पेन में रोमन सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। 68 ई0 में नीरो को आत्म हत्या करनी पड़ी। इसके बाद रोम सैनिकों में स्पेन, प्रक्टोरियन गाडर्ज तथा राइन क्षेत्र मे भी गृह युद्ध शुरू हो गया। इस प्रकार इस अराजकता की स्थिति में रोम मे एक वर्ष में 4 शासक हुए। अंत में Vespassian (वेस्पस्यिन) योग्य शासक सिद्ध हुआ। इसने रोम की खोई प्रतिष्ठा को पुन: स्थापित किया। लेकिन इसका छोटा भाई डोनिश्यिन दूसरा नीरो सिद्ध हुआ और उसकी मृत्यु के पश्चात् इस पूरे राजवंश का अंत हो गया।

सीनेट द्वारा नियुक्त सम्राट :-

डोमिश्यिन की मृत्यु के बाद सम्राट का चुनाव जनता ने रोमन सीनेट पर छोड़ दिया। सीनेट द्वारा शासकों की नियुक्ति 180 ई0 तक चली। प्रथम शासक ने केवल 2 वर्ष तक राज्य किया इसके पश्चात् 98 ई0 में Trajan (ट्राजन) सम्राट बना जो कि एक स्पैनिश सैनिक था तथा राइन सेनाओं का कंमाडर था। इसी के काल मे रोम साम्राज्यसबसे विशाल था। Hadrian (हैड्रियन) 117.137 ई0 तक शासक बना रहा। इसके काल में उतरी आयरलैंड तथा इंग्लैंड के बीच एक दिवार बनाई गई जिसे हैड्रियन दिवार कहते है। इसके अवशेष आज भी बचे हुए है। इसने रोम में कानूनों का निर्माण कराकर स्त्रियों और बच्चों को सुरक्षा दी और दासों से बुरा बर्ताव बन्द करवाया। प्रत्येक प्रांत में वहीं के नागरिकों को सेना में भर्ती किया गया ताकि वे अपनी मातृभूमि की रक्षाकर सके।

Marcus Auralius (मार्क्स आरेलियस) ने 161-180 ई0 तक राज्य किया वह एक दार्शनिक राजा था। परन्तु उसे जर्मनी कबीलों से पूर्वी सीमा पर लड़ना पड़ा। अंत में उसने जर्मनों को अपने यहां बसने की आज्ञा दे दी। मृत्यु से पूर्व उसने अपने पुत्र (Commodus) कोमोडस को अपना उतराधिकारी नियुक्त किया। उनके काल से ही रोम का पतन आरंभ हो गया।

रोम का शांति काल :-

27 ई0पू0 तथा 180 ई0 के बीच के काल में एक स्थाई स्थिर सरकार के कारण रोम में शांति का काल था, तो रोमन साम्राज्य का विस्तार भी हुआ। इसके अतिरिक्त समृद्धि के साथ-साथ रोम विश्व शक्ति बन गया। रोमनवासी रोम को ही सभ्य मानते थे। उनका यह भी विचार था कि रोम अमर है या सदा ही रहेगा।

इस काल में विशेषकर अगस्तस ने रोम का न केवल विस्तार किया बल्कि रोम शहर को बहुत सुंदर बनाया। इस काल में इसकी जनसंख्या दस लाख तक पंहुच गई थी, न केवल रोम के प्रांतों से बल्कि बाहर के देशों से लोग यहाँ व्यापार, शिक्षा, मनोरंजन के लिए आते थे तथा उनके साथ ही उनके विचारो का भी यहां आगमन हुआ। यूनानी सभ्यता और संस्कृति से स्वंय रोम की संस्कृति का भी विकास हुआ। रोम इस काल का अकेला ऐसा शहर था, जहां पक्की मिट्टी की पाइयों से शहर में आजकल जैसी पानी की व्यवस्था की गई थी। रोम की विभिन्न प्रांतों और अन्य शहरों से जोड़ा गया, यहीं से एक कहावत बनी कि (All the roads lead to Rome) सभी सड़के रोम को जाती है।

इस काल में दूर प्रदेशों से व्यापारिक संबंध स्थापित किए गए। विभिन्न प्रदेशों के व्यापारी यहां की मण्डियों में अपना सामान बेचने लगे। व्यापार के विस्तार के कारण रोमवासियों का जीवन स्तर काफी ऊंचा हो गया था। लेकिन रोम में एक ओर जहां लोग समृद्धशाली जीवन व्यतीत कर रहे थे वहीं दूसरी ओर निम्न वर्ग की दशा दयनीय थी। रोम में बेरोजगार भी बड़ी संख्या में थे जिनकी संख्या लाखों में थी।

सामाजिक स्थिति:-

रोम में हुई समृद्धि का असर सभी नागरिको पर नहीं पड़ा इसलिए धन/समृद्धि के आधार पर रोम में वर्ग विभाजित समाज बन गया। जैसे गणतंत्र काल मे रोम में अल्पतंत्रा (Aristocracy) का प्रभुत्व था लेकिन बाद में व्यापारिक उन्नति के कारण एक नए प्रभावशाली व्यापारी वर्ग का उदय हुआ। शासकों ने इन्हीं अमीर व्यापारी वर्ग के लोगों को उच्च पदों पर नियुक्त किया। दूसरी ओर निम्न वर्ग में गरीब नागरिक, दुकानदार और बाजारों में कार्य करके जीवन जी रहे थे। इस काल में बहुत से बेरोजगार थे, जो सरकार पर आश्रित थे। इसी प्रकार की व्यवस्था रोम के प्रांतों में भी लागू थी। शहरों से बाहर अधिकतर छोटे कृषक थे, जो दूसरों की जमीन पर खेती करते थे। बड़े-2 जमींदारों ने अपनी Estates स्थापित कर ली थी जिन्हें (Latifundia) कहा जाता था जिन पर अधिकतर दास खेती करते थे। ये अपने मालिक की सम्पति माने जाते थे। कुछ पढ़े लिखे दास अमीरों के बच्चों को शिक्षा देने का भी कार्य करते थे। यद्यपि युद्धों के कारण इस काल में दासों की संख्या में कमी हुई लेकिन दासता उसी प्रकार चलती रही। दास-प्रथा के कारण छोटे कारीगर और व्यापारियों को नुकसान हुआ क्योंकि अब इनके स्थान पर दासों से काम लिया जाने लगा। इस काल में लोगों ने विलासिता पूर्ण जीवन व्यतीत करना शुरू किया तथा मेहनत का कार्य ेवल दासों के जिम्मे ही रह गया।

रोम शान्ति (Pax Romania) के काल की समृद्धि के कारण कुछ समय के लिए कठिनाईयाँ दूर हो गई। जबकि युद्धों के कारण तथा लूट और हर्जाने से मिलने वाला पैसा बन्द हो गया तो सरकार को कर बढ़ाने पड़े। राज्य का खर्च कम करने के लिए शासकों ने सैनिकों की संख्या में कटोती कर दी जिससे सुरक्षा पर प्रतिकूल असर पड़ा और रोमन सुरक्षा प्रणाली कमजोर होने लगी। इस काल में व्यापार में हुई वृद्धि का राम पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा क्योंकि रोम में अधिकतर आयात की जाने वाली वस्तुएं विलासिता पूर्ण थी। जिस कारण रोम का बहुत सा धन बाहर देशों में जा रहा था। इस व्यवस्था से दुखी होकर एक रोमन लेखक ने रोम से बाहर जाने वाले धन पर रोष व्यक्त किया था। इस काल में होने वाले व्यापार का सन्तुलन रोम के पक्ष में नहीें था क्योंकि बहुत सा सोना था सोने के सिक्के भारत तथा अन्य दूसरे देशों में जा रहा था। इस कारण रोम में सोने के सिक्कों की कमी हो गर्इं। इसकी पूर्ति के लिए नए सिक्कों की ढलाई की गई जिसमें सोने में मिलावट की गई। इसे व्यापारी सोने के सिक्कों के बराबर नहीं मानते थे। इस प्रकार एक वस्तु के लिए पहले की अपेक्षा अब ज्यादा सिक्के देने पड़े जिससे मुद्रा स्फीति बढ़ गई तथा यह रोम के लिए भारी समस्या बन गई।

साम्राज्य का हास्य:-

रोम में उत्तराधिकार सम्बन्धि कोई नियम नहीं था। सामान्यत: सम्राट अपने पुत्र या दत्तक पुत्र को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करता था। जिसे सिनेट स्वीकृति देती थी। परन्तु मार्क्स ओरिलियस की मृत्यु के पश्चात उत्तराधिकार का यह नियम भी समाप्त हो गया। इस काल में सत्ता प्राप्ति के लिए राम के जनरलों के बीच गृह युद्ध शुरू हो गया। तथा 234-284 ई0 के बीच 50 वर्षो में यहाँ 26 शासकों ने शासन किया। इनमें से कुछ शासक तो केवल कुछ महीने ही राज्य कर पाए। इस काल में सभी सम्राटों का अन्त हिंसक हुआ। इस प्रकार रोम की प्रभुसत्ता का हास्य होना शुरू हुआ जिसे राज्य में अराजकता बढ़ी। जिसका सरकारी और प्रशासनिक कुशलता पर बुरा प्रभाव पड़ा। राज्य में शुरू हुए विभिन्न गृह युद्धों के कारण व्यापार और वाणिज्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा। इस कारण राज्य की आय में कमी आई। इस कमी को पूरा करने के लिए शासकों ने अधिकतर तांबे पर चढे सोने के पानी वाले सिक्के चलाए। जिस कारण वेतन और कीमतें बढ गई तथा मुद्रा स्फीति भी बढ़ गई। रोम में इन बदली हुई परिस्थितियों के कारण शहरों का भी विनाश हुआ। रोम पर विदेशियों ने आक्रमण करने शुरू कर दिए। इसी लिए बहुत से किसानों ने अपनी जमीनें अमीरों को बेच दी। हालांकि छोटे कृषक या (Coloni) अपने खेतों पर खेती करते रहे। सीमान्त प्रदेशों में भी अमीर लोगों ने अपनी बड़ी-बड़ी Estates बना ली।

जनरल डायक्लेशिप को 284 ई0 में सेना ने अपना सम्राट घोषित किया। इसमें सेना में सदृढ़ता प्रदान करने के लिए अनेक कठोर कदम बनाए। जिसके तहत इसने केन्द्रीयकरण प्रशासनिक एकरूपता के अलावा प्रांतों में शक्ति उपविभाजन जैसे कदम उठाए। इसने राजनैतिक और सैनिक का विभाजन किया और समाज में स्त्राीकरण निर्धारित कर समाज में अनुशासन की स्थापना की इसने नगरों तथा गांवों दोनों पर कर लगाए। जिस कारण गांव के गरीब लोग सर्फ बन कर रह गए। जबकि शहरी कारीगर और शिल्पियों ने स्वयं को संगंठित कर लिया। इसने न्यायालयों में नई व्यवस्था प्रारम्भ की तथा इसने दैतीय सिद्धान्तों पर आधारित साम्राज्य की स्थापना की। राज्य को इसने बड़े नौकरशाही ढांचे में लाने की कोशिश की।

साम्राज्य विभाजन

अपनी प्रशासनिक नीतियों को लागू करने के बाद डायक्लेशियन ने महसूस किया कि अलग-अलग प्रान्तों की सुरक्षा की जिम्मेदारी एक व्यक्ति द्वारा पूरी नहीं की जा सकती है। इसीलिए इसने साम्राज्य को दो भागों में बांट दिया जिसमें एक में सम्राट शासन करने लगे दूसरे में (Maximianus) मैक्सिमायनस। इसने इन दोनों की सहायता दो युवक करेंगे जिन्हें सीजर कहा गया। जब राजा को 20 वर्ष बाद त्याग पत्र देगा तो ये युवक उनके उत्तराधिकारी के रूप में राज्य करेंगे। को 305 ई0 में डायक्लेशियन को बीमारी के कारण सत्ता छोड़नी पड़ी जिस कारण राज्य में दोबारा गृह युद्ध छिड़ गया। 312 को इस युद्ध में विजयी को Constantine शासक बना। उसने पूर्वी और पश्चिमी दोनों भागों को अपने नियंत्रण में कर लिया तथा (Byzantium) को अपनी राजधानी बनाया। इस कारण रोम शहर का महत्व कम हो गया।

सुधार :-

कान्सनटाइन एक महान प्रशासक था। इसने अपने साम्राज्य के वित्तिय प्रबन्धन में मूलभूत परिवर्तन किए। इस काल में बड़े-2 जमीदारों को कर संग्रह कर्ता और भर्ती अधिकारी के रूप में कार्य करने पड़े। इस काल में कृषक अपनी भूमि से बंध गए। स्वतन्त्रा व्यापारिक श्रेणियों को वंशानुगत जातियों में परिवर्तित कर दिया गया। इनकी भी राज्य के प्रति कई जिम्मेदारियाँ थी। सम्राट द्वारा राजधानी परिवर्तन करने का एक कारण यह भी था कि रोम में अधिकतर Pagans (पगन) या गैर ईसाई रहते थे। इसीलिए उसने एक नए ईसाई शहर को अपनी राजधानी बनाया और खुद भी ईसाई बन गया।

कान्सनटाइन के उत्तराधिकारी :-

337 ई0 में अपनी मृत्यु से पूर्व इसने राज्य को अपने तीनों पुत्रों में बॉट दिया। अचानक इसी समय Gauls ने रोम पर आक्रमण कर दिया । परन्तु जुलियन ने उन्हें हरा दिया और खुद सम्राट बन गया। इसने दोबारा गैर ईसाई धर्म शुरू किया। लेकिन वह उसे क्रियान्वित करने से पूर्व ही मर गया। इसके पुत्र ने सन्धि के तहत पर्सिया को वे सभी क्षेत्र लौटा दिये जिन्हें रोमनों ने जीता था। 364 ई0 में पुन: साम्राज्य को उसके दो भाईयों में बांट दिया गया। एक रोम में तथा दूसरा कान्सन्टेतपोल में राज्य करने लगा।

रोम का पतन:-

370 ई0 के पश्चात रोम के पतन की शुरूआत हो गई और इस काल में अनेक विदेशी आक्रमणकारियों ने रोम पर आक्रमण करने शुरू कर दिए। सर्वप्रथम Goths (गोथों) ने 378 ई0 में रोमनों को एडरियनपोल में हरा कर सम्राट Valus को मार दिया। लेकिन रोम के पूर्वी क्षेत्र को सम्राट थियोडोस्थिस ने आक्रमणकारियों से बचा लिया। लेकिन 395 ई0में इसकी मृत्यु के पश्चात इसका अल्पव्यस्क पुत्र इसका सम्राट बना। 410 ई0 में गोत नेता Alaric ने रोम पर आक्रमण कर इसे तहस-नहस कर दिया। 451 ई0 में हुणों ने एट्टिला के नेतृत्व में रोम पर आक्रमण कर दिया। प्रारम्भ में तो रोमनो ने इन्हें फ्रांस में Chalonoas में रोक दिया। परन्तु अगले ही वर्ष हूणों ने समस्त इटली पर अधिकार कर उसे तहस-नहस कर दिया रोम पर आक्रमण करने वाले टंदकंसे वंडाल आखरी आक्रमणकारी थे, इन्होने रोम पर आक्रमण करके लूटपाट की और प्रदेशों को तहस-नहस कर दिया। 430 ई0 में इन्होने कार्थेज तक को नष्ट कर दिया। उनके इन्ही कारनामों के कारण ही अंग्रेजी शब्द Vandalism का नामकरण हुआ। पश्चिमी रोम के आखरी शासक Romulous Angustulus को Odovacar ने हरा कर रोम साम्राज का अंत कर दिया।

दास-प्रथा :

रोमन साम्राज्य की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था दास-प्रथा थी, जिसने इस साम्राज्य को बनाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा रोम साम्राज्य के पतन में भी इसका काफी योगदान रहा। रोम में अनेक युद्धबंदियों को दास कार्यो में लगाया गया। सम्राट ऑगस्त के शासन काल में शांति व्यवस्था के कारण दासों की संख्या में कमी आई क्योंकि शांति के कारण कम युद्ध हुए और कम संख्या में दास रोम आए, न ही इस काल में दास क्रय-विक्रय द्वारा रोम लाए गए। रोमन साम्राज्य मे दास प्रथा का काफी महत्व रहा। रोम के अतिरिक्त अन्य सभ्यताओं और संस्कृतियों में भी यह प्रथा प्रचलित थी। यूनानी दार्शनिकों एवम् लोगों ने प्रत्येक संभव विषय के बारे में प्रश्न उठाए है लेकिन दास प्रथा नजरअंदाज किया गया। अरस्तु ने भी इस प्रथा का विरोध नही किया, उसके अनुसार दास को अपने मालिक की आज्ञा माननी चाहिए यही उसके हित में है। यहां तक कि दासों ने स्वयं भी जो विद्रोह किए वे इस प्रथा के विरोध में नहीं बल्कि स्वयं की आजादी मात्रा के लिए। रोम के प्रसिद्ध कानूनविदों के अनुसार प्राकृतिक कानून के तहत सभी स्वतंत्र पैदा हुए है लेकिन इसके साथ इस बात का भी समर्थन किया कि दासता राष्ट्र के कानून के हित में है। रोमन दार्शनिकों ने भी दासों की स्थिति के लिए स्वयं उन्हें जिम्मेदार ठहराया। ईसाइयत के अनुसार भी दास राज्य धर्म था, उसने भी इसे समाप्त करने की कोशिश नही की। बल्कि स्वयं चर्च ने अपने लिए अनेक दास रखे। साम्राज्य के क्षय होने के साथ-साथ दासता में भी कमी आने लगी क्योंकि आर्थिक कारणों से बहुत से स्वतंत्र नागरिक भी दास बनने पर मजबूर हो गए।

इस काल में दास माता से पैदा हुआ शिशु भी दासता अपनाने के लिए विवश था। इनके अलावा युद्धों में हारे सैनिक, अपहृर्त नागरिक तथा स्वतंत्र नागरिक भी दास बनाए जा सकते थे। तृतीय शताब्दी के मध्य में रोम के दूसरे देशों से हुए अनेक युद्धों के कारण बहुत से युद्ध बंदी दास बनाए गए। 167 ई.पू0 के एक अभियान में रोम में 1,50,000 (डेढ लाख) युद्ध बंदियों को ऐपिरस (Epirus) में दास बनाया। क्रय-विक्रय द्वारा भी दासों को रोम लाया गया। इस काल में दासों की सबसे बड़ी मंडी डलोस (Delos) थी, यहाँ पर कई बार तो मात्रा एक दिन में 20,000 (बीस हजार) दासों तक का क्रय-विक्रय (व्यापार) होता था। सिसिरों के समय रोम में दास काफी सस्ते थे और इस काल में साम्राज्य की आर्थिकता इन्हीं पर निर्भर थी। नीरो के शासनकाल में सीनेट के एक सदस्य के घर 400 दास कार्यरत थे और इतने ही दास उसके खेतों में कार्य करते थे। अगस्तस ने एक सूचना जारी कर दासों की अधिकतम संख्या 100 निर्धारित कर दी थी इसलिए उसके काल में प्रति स्वतन्त्रा नागरिक की तुलना में तीन दास थे।

रोमन साम्राज्य में दूसरे देशों के भी अनेक दास थे। इनमें उतर के सेल्ट तथा जर्मन तथा पूर्व के एशियन थे। इसके अतिरिक्त रोमन साम्राज्य के विभिन्न प्रांतों के भी दास थे। इन्हें ना केवल कठिन कार्यो में लगाया जाता था। बल्कि इन्हें बेड़ियों से भी बाँधा जाता था ताकि वे भाग ना सके। इसी कारण बहुत से दास कम उम्र में ही लंगडे़ हो जाते थे। इस काल में कई मालिकों ने अपने दासों को टे्रंनिग देकर सक्रेटरी, अंकाउटेंट तथा डाक्टर तक बना लिया था। इसी प्रकार के एक शिक्षित दास ने Atticus के छापेखाने में सिसरों के कार्यो की नकल की तथा Arretium (ऐरेटियम) के सुन्दर मृदभांडों का निमार्ण दासों द्वारा किया जाता था। ये मृदभांड विदेशों में निर्यात किए जाते थे। इसके अलावा बहुत से दास स्वर्णकार के रूप में गहने बनाते थे। लैम्प, पाइप तथा कांच से निर्मित अनेक वस्तुएँ बनाते थे। इन्हीं में से अधिकतर दास तो अपने मालिकों को पैसे देकर अपनी स्वतंत्रता भी खरीद लेते थे।

रोमन कानून के अनुसार दास मालिक की सम्पति थे। वेरो (Varro) ने दासों को कृषि उपकरणों के समक्ष रखा था उसके अनुसार ये उपकरण (articulate) बोलने वाले, (Inarticulali) ना बोलने वाले तथा (Mute) थे। दास को खरीदा, बेचा तथा किराए पर दिया जा सकता है। उसकी सम्पति तथा कमाई पर मालिक का हक था। दास माता की सन्तान भी मालिक की ही सम्पति होती थी। दास को मालिक की इच्छानुसार कपड़ा, खाना तथा सजा दी जाती थी।

अपराधिक मामलों में दास को स्वतंत्र नागरिक की अपेक्षा कठोर दण्ड का प्रावधान था। यदि वह किसी अपराध का गवाह है तो उसे प्रमाण देने होते थे। यदि दास राज्य के विरूद्ध, विद्रोह करने वाले के विरूद्ध कार्य करता तो राज्य उसे स्वतंत्र कर देता था। मालिक भी दासों को स्वतंत्र कर सकते थे। दास को वस्त्र और भोजन उपलब्ध करवाना मालिक का कर्तव्य था। सेटो (Ceto) ने उन्हें उतनी गेहूॅ देने को कहा जितनी एक सैनिक को दी जाती थी। इसके अतिरिक्त उस थोड़ी शराब, तेल, मछली, नमक देने के अलावा वर्ष में एक बार पैंट, कमीज, जूते तथ कम्बल भी दिए जाते थे। हांलाकि मालिक दास को मृत्युदंड भी दे सकता था, परन्तु कोई भी मालिक अपनी सम्पति स्वयं बरबाद नही करता था। वेरो (Vero) का कहना है कि मालिक को दास को मारने की बजाय उपर्युक्त गालियों से ही काम चलाना चाहिए। कई मालिक दासों को वेतन भी देते थे। यदि कोई मालिक बिना उतराधिकारी के मर जाए या वह अपनी वसीयत में दास को स्वतंत्र करने की बात लिखे तो दास स्वतत्रा हो सकता था। मालिक अपनी मर्जी से खुश होकर भी दास को स्वतंत्रता दे देता था। इसके अलावा यदि दास अपने मालिक की जान बचाए या कोई दासी अपने मालिक से पुत्र को जन्म दे तो मालिक उसे स्वतंत्र कर सकता था।

सामान्यत: वही दास स्वतंत्र होते थे जो मालिक के घर या नजदीक कार्य करते थे। खेतों में कार्य करने वाले दास अधिकतर बेड़ियों मे ही जकड़े रहते थे। इन फार्मो के मालिक दासों से अपेक्षाकृत अधिक कार्य करवाते थे। रोम मे प्रथम शताब्दी मे यह कानून बना कि अकारण यदि कोई मालिक दास को मार दे तो वह अपराध है, यदि किसी दास को भूखा रखा जाता है तो वह सम्राट से शरण ले सकता था तथा उसका यह अधिकार है कि वह दूसरे मालिक को बेच दिया जाए। परन्तु वास्तव में दास वध करने वाले मालिक को सजा नहीं होती थी। केवल मानवता ही दासों से अच्छे व्यवहार का कारण नही थी, परन्तु जैसे एन्टोनिनस पीयुस (Antoninus Pius) ने कहा है कि यह स्वयं मालिक के हित में है ताकि दास विद्रोह ना करे। प्रदेश में दास हमेशा विद्रोह करने के लिए तैयार रहते थे। Posidonius (पोसीडोनुस) नामक दार्शनिक ने लिखा है कि सिसली में 134.32 ई0पू0 में जो दास विद्रोह हुआ, उसका मुख्य कारण उनसे दुव्र्यवहार था। इसके अतिरिक्त रोम मे अनेक दास विद्रोह हुए जिनमें प्रमुख था प्रथम शताब्दी का विद्रोह। इस विद्रोह में 70,000 दासो ने Spartacus (स्पार्टाकस) के नेतृत्व में विद्रोह किया तथा इस विद्रोह को दबाने के लिए रोमन सेना को पूरा एक वर्ष लगा।

Principate (प्रिंसीपेट) काल में दासों से पहले काल की अपेक्षा सद्व्यवहार किया जाता था। दासों द्वारा किए गए अनेक विद्रोहों के कारण ही एक रोमन कहावत है कि सभी दास दुश्मन हैं। दास अपने मालिक की हत्या करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। अगस्तस के काम मे बनाए गए एक कानून के अनुसार यदि मालिक की हत्या हो गई तो उसके घर में रहने वाले सभी दासों को मृत्युदण्ड दिया जाता था। एक बार एक दास लड़की की मालकिन की हत्या हुई तो वह इतनी भयभीत थी कि शोर नहीें मचा सकी इस पर Hardirian (हडरियन) ने आज्ञा दी कि उसे मृत्युदण्ड दिया जाए। क्योंकि उसने मालकिन की रक्षा के लिए शोर नहीं मचाया।

रोम में दास स्वयं को स्वतंत्र भी करा सकते थे। वास्तव में दासता रोम साम्राज्य का अभिन्न अंग थी। लेकिन दासों के अधिकार काफी सीमित थे। दास को सैनिक गतिविधियों में हिस्सा लेने का अधिकार नही था न ही वह राज्य या नगरपरिषद् के कार्य करने के लिए स्वंत्रात था। बाद के काल में अनेक दास आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो कर अमीर बन गए थे। दास राज्य और राजनैतिक गतिविधियों में हिस्सा ना ले पाने के कारण व्यापारिक गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे। इससे बहुत से स्वतंत्र हुए दास अमीर बन गए। कुछ दास तो शिक्षा ग्रहण करके काफी तरक्की कर गए तथा अपने बच्चों को भी अच्छी शिक्षा प्रदान करने में सक्षम बने। इस काल मे रोम का प्रसिद्ध कवि (Horace) होंरेस इसी तरीके से स्वतंत्र हुए एक दास का पुत्र था। बाद में नीरों के काल में तो यहाँ तक आक्षेप लगाया जाने लगा कि अधिकतर सेनेटरों की रगों में दासों का खून बह रहा है, लगभग एक शताब्दी बाद ऐसे ही एक दास माक्र्स हेल्वियस पैट्रिऋनैक्स (Marcus Helivivs Pertinax) ने सैनिक और प्रशासनिक योग्यता के कारण 193 ई. में स्वयं को रोम का सम्राट घोषित कर दिया था।

कुछ दास एवम् स्वतंत्रता प्राप्त दास शासकों के काफी करीब भी थे और अच्छा जीवन व्यतीत करते थे। Tiberias (ताइबेरियस) के काल मे एक दास जो कि Gaul (गॉल) में कर वसूली के बाद रोम वापिस आया तो अपने साथ 16 दास और लाया था। इनमें से दो दास उसकी तश्तरी उठाने वाले थे। ये रोम के दासों की सुदृढ़ आर्थिक स्थिति को दर्शाता है। कुछ स्वतंत्र हुए दास काफी धनाढ़य थे, तथा रोम में वास्तविक राज्य कर रहे थें इनमें Felix नामक दास मुख्य था जो पहले एक प्रांत का गवर्नर भी रह चुका था।

हांलाकि रोमन साम्राज्य के निर्माण में दासों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसके बावजूद रोमन साम्राज्य के तकनीकी विकास में ये बाघा सिद्ध हुए। दासता के कारण रोमवासी आलसी हो गए और प्रत्येक कार्य के लिए वे उन्हीं पर निर्भर हो गए। इसलिए कोई नया अविष्कार नहीे हो पाया जिस कारण रोम वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र में पिछड़ गया जो बाद मे रोम साम्राज्य के पतन का एक मुख्य कारण भी बना।

रोम का पतन

रोम एक बहुत बडा साम्राज्य था जिसमें इंग्लैड, स्पेन पुर्तगाल, जमर्नी, ग्रीस, एशिया, माइनर, मिश्र तथा उत्तरी अफ्रीका का बडा क्षेत्र जिसमें कार्थेज इत्यादि थे यह साम्राज्य एक ही दिन में बन कर खडा नही हो गया तथा न ही इसका पतन एक ही दिन में हुआ बल्कि इसके पतन में एक लम्बी अवधि लगी न ही कोई एक कारण ऐसा है जिसे हम इसके पतन का जिम्मेवार ठहरा सके निम्नलिखित कारणों के सामुहिक प्रभाव के कारण इतने बड़े साम्राज्य का पतन हुआ।

विदेशी आक्रमण :-

पैम्स रोमाना (Pax Romana) जो रोमन शान्ति के काल में रोमन की सेनाओं को अक्सर जर्मन कबीलों से जूझना पडा था जो कि राइन (Rhine) तथा डेन्यूब (Denube) नदियों के उत्तर में रहते थे इनके भिन्न-2 कबीलें थे जिनके बारे में रोमन इतिहासकार टैसीटस Tacitus ने काफी वृतान्त दिया था इन की बढती हुए आबादी के कारण नए क्षेत्रों पर कब्जा करने के लिए ये रोग की ओर आकर्षित हुए यहां की समृद्धि तथा सुहाना गर्म मौसम भी उन्हें भा गया। उघर रोम अपने आन्तरिक युद्धों के कारण काफी कमजोर हो चुका था तथा रोम की सीमान्त सेनांए इन्हें रोकने में असमर्थ हो गई।

जब जर्मन के बालर्र रोम में पहुँचने लगे उसी समय चतुर्थ सदी में हुणों में मध्य ऐशिया से आकार पूर्वी यूरोप में जर्मन कबीलों पर आक्रमण कर दिया तथा काले सागर के उत्तर में रहने वाले ओस्ट्रोगोथ (Ostrogoth) कबीले को हरा दिया हारके ेडर से एक अन्य कबीलें विसीगोथ (Visigoth) ने रोमन साम्राज्य में शरण ली। 376 ई0 में इन्हें डेन्युब नदी पार कर उनके साम्राज्य में आने की आज्ञा दी। परन्तु दो वर्ष बाद ही रोम की सेना को इन विसीगोथों के विरूद्ध अभियान करना पड़ा। परन्तु रोम की सेनाओं को इन्होंने एड्रियनपोल के युद्ध में हरा दिया इस युद्ध के बाद हर्मन लोग हूणों से बचने के लिए रोम में घुस आए तथा उन्होंने रोमन शहरों में लूटपाट मचा दी। 410 ई0 में विसीगोथ जनरल एलारिक (Alaric) ने इसी पर आक्रमण कर रोम को जीत लिया। रोमनों ने उन से सन्धि कर उन्हें दक्षिणी गाल (Gaul) तथा स्पेन दे दिया।

इसी बीच हूणों ने पूर्वी यूरोप के क्षेत्र जीत लिए जिनमें आज रोमानिया, हंगरी, पोलैंड, चैकोस्लोवाकिया इत्यादि है जब उन्होंने अपने नेता एट्टिला के नेतृत्व में राइन नदी पार कर ली तो रोम ने कुछ जर्मन कबीलों के साथ एक संध बना 451 में ट्रोयेज (Troyes) की लडाई में हूणों को वापिस होने पर मजबूर किया। इस युद्ध के कुछ वर्ष बाद हूण नेता की मृत्यु हो गई तब कभी जाकर बचा खुचा रोमन साम्राज्य चैन ले सका। परन्तु 412 ई में दूसरी ओर एक अन्य जर्मन कबीला वन्डाल (Vandal) गाल (Gaul) होते हुए स्पने पहुँच गया उसके बाद 430 ई0 में उसने कार्थेज पर आक्रमण कर दिया उसके बाद 455 ई में रोम को तहस नहस कर दिया दूसरी ओर रोम की सीमान्त सेनाए बरगुण्डरीयनों (Burgun drians), फ्रैकों (Franks) तथा बाद में लोम्बाडों (Lombards) को पश्चिमी यूरोप के रोमन साम्राज्य के नगरों को जीतने से नहीं रोक सकी। 476 ई0 में एक मामूली से जर्मन नेता ओडोसर (odocer) में रोम पर कब्जा कर अपने आप को इटली का राजा घोषित कर दिया।

राजनैतिक कारण :-

रोम के पतन में बहुत से राजनैतिक कारणों का भी हाथ है रोम के नागरिकों में धीरे-2 सरकार के प्रति जिम्मेवारी की भावना समाप्त होने लगी। वे यह सोचने लगे एक सम्राट ही उनकी जरूरतों की देखमाल करें तथा सरकार चलाना उसी का काम है रोम के 65 सम्राटों में कुछ एक को छोड कर अधिकतर क्रूर तथा अत्याचारी थे राज्य में उतराधिकार का कोई पक्का नियम नहीं था अगस्तस न वंशानुगत प्रणाली स्थापित करने की चेष्टा की परन्तु चार ही राजाओं के बाद वीरों के काल में आन्तरिक कलह के कारण जब उसे आत्महत्या करनी पड़ी तो सेना की सहायता से राजाओं की नियुक्ति होने लगी 117 ई0 में सीनेट द्वारा ट्रामन की नियुक्ति के बाद इसी द्वारा 193 ई0 तक साम्राटों की नियुक्ति होती रही। उसके बाद अपने सेनाओं के बल पर साम्राट बने जिनमें कई सम्राट काफी क्रूर थे इस तरह के राजाओं के होने के कारण जनता में रोष उत्पन्न हो गया तथा विद्रोह होने लगे। साम्राज्य मे विभिन्न राष्ट्रीयताओं एवं जातियों के लोग मौका पड़ते विद्रोह करने लगे। रिबेरियस के काल में ब्रिटेन तथा स्पेन में विद्रोह हो गए। इससे साम्राज्य ने विकेन्द्रीयकरण के तत्व मजबूत होते चले गए तथा साम्राज्य कमजोर होता चला गया।

प्राशसनिक दोषों के कारण भी साम्राज्य कमजोर हो गया। शासन तन्त्रा काफी खर्चीला हो गया तथा अधिकारी भ्रष्ट अयोग्य तथा घूसखोर हो गए। लगान वसूली में वे कृषकों को तंग करने लगे इस कारण जन विरोध उतपन्न हो गया प्रान्तिय शासकों की महत्वाकांक्षा एवं स्वतन्त्रता के प्रति आकर्षण ने उन्हें साम्राज्य के प्रति निष्ठारवान नही होने दिया तथा वे आपसी झगडे़ एवं साम्राज्य को कमजोर कर विद्रोह करने लगे।

साम्राज्य की विशालता भी पतन का एक कारण बनी क्योंकि इतने बडे़ साम्राज्य का एकजुट रखना कठिन था। यद्यपि अगस्तस तथा मार्कस ओरियस हेडरियन इत्यादि सम्राट इसे सुरक्षित रखने में सफल हुए परन्तु कमजोर एवं अयोग्य शासक यह काम नहीं कर सके। जब सम्राट थिओडीयस न रोमन साम्राज्य का विभाजन अपने दो पुत्रों के बीच कर पूर्वी तथा पश्चिम रोम साम्राज्य बनाए तो यह भी समा्रज्य के विघटन का कारण बना। सम्राट कान्सटेटाइन ने जब रोम की राजधानी बनाई तो यह भी साम्राजय के विघटन का कारण बना। सम्राट कान्सटेटाइन ने जब रोम की राजधानी बनाई तो पश्चिमी रोमन क्षेत्र असुरक्षित हो गए तथा वहां बबर्र जातियों के आक्रमण शुरू हो गए। जब 476 ई0 में पश्चिमी रोमन साम्राज्य का अन्त हो गयां सेना के संगठन में कमी तथा नौ सेना का आभाव भी रोम की शक्ति को दुर्बल करने में उत्तरदायी रहे रोमन सेना में विभिन्न राष्ट्रीयताओं के सैनिक होने से उनकी रोम के प्रति निष्ठा की कमी थी दूसरी ओर बर्बर जातियां अपने जनरल के प्रति वफादार तथा उस की जीत के लिए लड़ती थी इसलिए वे विजयी रहे।

आर्थिक कारण :

इतने बडे़ रोमन साम्राज्य को चलाने के लिए बहुत धन की आवश्यकता थी जिसका अधिक हिस्सा पूर्व क्षेत्रों से आता था जब पूर्वी रोमन साम्राज्य अलग हो गया तो वहां से पैसा आना बन्द हो गया इसी ओर रोमन सेनाओं ने लूट कर धन रोम लाना बन्द कर दिया। आन्तरिक युद्धों तथा बाहरी आक्रमणों के कारण व्यापार तथा कृषि को क्षति पहुँची जिससे कर संग्रह में कठिनाई आई राजकोष की पूर्ति के लिए प्रजा पर अनुचित कर लगाने पडे़ तथा कर की वसूली के लिए ठेका प्रणाली अपनाने ेसे गरिबों पर अत्याचार होने लगे, जिससे लोगों की राज्य के प्रति निष्ठा नहीं रही जनसमर्थन तथा सहयोग के आभाव में कोई साम्राज्य टिक नही सकता इसके अतिरिक्त राज्य ने सिक्को के प्रचलन को अधिक करने के लिए सिक्को में मिलावट कर अधिक सिक्के चलाए, जिसके कारण मुद्रास्फीति बढ़ गई जो कीमतों में वृद्धि का कारण बनी जिनसे रोम की जनता पर भार बढ गया। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में रोम के अधिक सिक्कों को भुगतान करना पड़ा तथा व्यापार में क्षति हो गई इससे न केवल समृद्धि पर फर्क पड़ा बल्कि बेरोजगारी भी बढ़ी रोम में लाखों बेरोजगारों को राज्य की ओर से अनाज तथा अन्य सहायता देनी पड़ी जिससे रोम के संसाधनों में भारी कमी आ गई तथा साम्राज्य स्थिर नही रह सका।

सामाजिक कारण :

रोम के तत्कालीन इतिहासकारों का कथन है कि नागरिकों की रोम के प्रति निष्ठा तथा रोम के नागरिक होने की प्रतिष्ठा, जो एक समय में रोम को एकीकृत रखने का एक महत्वपूर्ण कारण बनी उसमे धीरे-धीरे कमी आने लगी। अब बहुत से लोग ये समझने लगे कि उनके रोम के प्रति कोई कर्त्तव्य नही हैं तथा न ही सरकार में उनकी कोई भागीदारी है। क्योंकि अब उसमें रोमनों के अतिरिक्त अन्य राष्टऋ्रीयताओं एवं जातियों के लोग भी थे जिनकी रोम के प्रति निष्ठा नही थी। यही हाल रोम के सैनिकों का भी रहा। रोम के नागरिक काफी आलसी तथा रोम के प्रति वैराग्य की भावना आ गई, मेहनत करना व केवल दासों का ही काम मानने लगे। सभी कामों के लिए वे दासों पर ही आश्रित रहने लगे तथा स्वयं अपना समय खेल तमाशों एवं उत्सवो में ही गुजारने लगे। दासों की लड़ाईयों, दासों के जंगली जानवरो से मुकाबले करवाने, दासो से बढ़ते अत्याचारों के कारण दास विद्रोह पर उतारू होने लगे तथा रोमन सेनाओं को इनका दमन करना पड़ा। जिस तरह रोम को बनाने मे दासों का महत्वपूर्ण योगदान रहा उसी प्रकार दासों के कारण ही साम्राज्य का क्षय होना भी प्रारम्भ हो गया। इस तरह हम देखते है कि किसी एक कारण से रोम का अन्त नहीं हुआ बल्कि बहुत से कारणों के इकठठे होने के कारण धीर-धीरे रोम के साम्राज्य पतन हुआ परन्तु इतना सब कुछ हाने के बावजूद भी यह साम्राज्य एक लंबे काल तक चलता रहा। इसके पतन के तत्कालीन कारण बने बर्बर जातियों के रोम पर आक्रमण जिससे रोमन साम्राज्य धाराशायी हो गया।

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