ताम्र पाषाण काल की विशेषता

अनुक्रम
नवपाषाण काल में कृषि की शुरूआत के साथ ही मानव के जीवन में स्थायित्व आ गया था और साथ ही उसने पशुपालन की भी शुरूआत कर दी थी। इस काल का मानव अब खाद्य संग्रहकर्ता से खाद्य-उत्पादनकर्ता बन गया था। कृषि कर्म में प्राय: स्त्रियां संलिप्त रहती थी तथा शिकार मे पुरूष संलग्न थे। हांलाकि कृषिकर्म अभी विस्तृत पैमाने पर नही था। चाक पर निर्मित मृदभांडो की शुरूआत हो चुकी थी, लेकिन अधिकतर टोकरी पर बने, हाथ निर्मित और घुमावदार तरीके से बनाए जाते थे। यह कार्य इस काल के मानव में अन्य कार्यो के साथ ही किए। मिश्र में फायूम तथा मेरिमदे नामक स्थलों पर तरीके से कृषि करने के प्रमाण नवपाषाण में मिलने शुरू हुए। सिंचाई व्यवस्था की भी शुरूआत हो चुकी थी। लेकिन इन सभी उपलब्धियों के लिए किसी प्रकार के विशेषीकरण की अभी आवश्यकता नहीं थी।

कालान्तर में जब मानव स्थायी तौर पर बसने लगा तथा जनसंख्या की वृद्धि के कारण उनके भरण-पोषण के लिए जब अतिरिक्त अन्न की आवश्यकता पड़ी, तो इस जरूरत को पूरा करने के लिए नई तकनीक के विकास पर जोर दिया गया। तकनीकी क्षेत्र में यह परिवर्तन लाने में धातुओं के अविष्कार का बड़ा योगदान है। जिसके कारण उस समय के समाज में आमूल परिवर्तन आए। सर्वप्रथम मानव में जिस धातु का प्रयोग करना सीखा वह तांबा था। इसके पिछे कारण यह था कि तांबे तथा अन्य अलोह धातुओं को से निकालना आसान है। क्योंकि इनकी गलाने की मात्रा कम है। तांबे को प्रयोग में लाने के लिए उसे उसके धातुज्ञान का होना आवश्यक था। पहले उसे से अलग करना या इससे पूर्व उसे वैसे ही पीट-पीट कर द्वारा औजार बनाए जाने थे या तांबे को गलाकर धातु अलग करना इसे तरीका कहते है। इसके लिए पर्याप्त तापमान का होना आवश्यक है। यह समस्त कार्य एक विशेषज्ञ ही कर सकता है। इस प्रकार समाज के ऐसे निपुण वर्ग की उत्पति हुई जो अन्न उत्पादन की प्रक्रिया में नहीं लगा हुआ था। इस वर्ग की खाद्य जरूरतों की पूर्ति कृषक वर्ग करता था तथा कृषकों के लिए औजारों तथा अन्य वस्तुओं की पूर्ति यह कारीगर वर्ग करता था। दूसरे शब्दों में समाज के वे दोनों वर्ग एक-दूसरे पर आश्रित हो गए थे।

इस प्रकार इस काल में जब पाषाण के औजारों के साथ-साथ तांबे के औजारों का भी प्रयोग किया जाने लगा ता यह काल ताम्रपाषाण काल कहलाया। तांबे से निर्मित औजार पत्थरों के औजारों से ज्यादा प्रभावशाली थे, क्योकि ये उनकी अपेक्षा तीखे थे और इन्हें किसी भी आकार में आसानी से ढाला जा सकता था। दूसरा तांबे से औजारों का निर्माण करना भी आसान था क्योंकि इसे पिघलाना आसान था और बाद में इसे कोई भी आकार देना भी सरल था।

तांबे के ज्ञान तथा इसके औजारों के प्रयोग से समाज मे न केवल एक नए वर्ग का उदय हुआ हांलाकि इसके साथ ही नवपाषाणकालीन समाज की आत्म-निर्भर अर्थव्यवस्था के स्थान पर अतिरिक्त उत्पादन की अर्थिकता का उदय हुआ। क्योंकि समाज के इस विशेष कारीगर वर्ग को उसी अतिरिकत उत्पादन में से ही अनाज दिया जाता था। दूसरे, तांबा सभी स्थानों से मंगवाया जाता था। इस कारण इस काल में व्यापारिक गतिविधियों की भी शुरूआत हुई। प्रांरभ में यह विमिमय प्रणाली (वस्तुओं के आदान-प्रदान) पर आधारित था। वन गति-विधियों को बढ़ावा देने में घुम्मकड़ कबीलों या जातियों का विशेष योगदान रहा क्योंकि एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में घुमते रहने के कारण इन्हें विभिन्न प्रदेशों के प्राकृतिक संसाधनों की पूरी जानकारी रहती थी।

ताम्रपाषाणीय युग में धातु ज्ञान के अतिरिक्त और भी बहुत चीजों का अविष्कार हुआ जैसे कुम्हार की भट्टियां, और चाक इत्यादि। सिचालक नामक स्थान से कुम्हार की अनेक भट्टियां उत्खनन में प्राप्त हुई है। जिनमें हवा पंहुचाने का विशेष प्रबन्ध था जिससे तापमान नियंित्रात किया जा सके यानि तापमान को आवश्कतानुसार घटाया और बढ़ाया जा सके। इससे बर्तनों को अच्छी तरह पकाया जा सका। इस कार्य को भी निपुण व्यक्ति या वर्ग ही सम्पन्न कर सकता था साधारण व्यक्ति नही। इसलिए मृदभांडो का निर्माण करने वाला एक अन्य वर्ग (कुम्हार वर्ग) भी इस काल में अस्तित्व में आया, जो अन्य अत्पादन गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेता था।

इस काल में चूंकि कृषि से अधिक अन्न उत्पादन की आवश्यकता थी तो इसके लिए भी कृषि में नए-नए तरिकों का अविष्कार हुआ। अभी तक कृषि का कार्य अधिकतर स्त्रियां ही करती थी परन्तु अन्न उत्पादन की मांग में वृद्धि होने के कारण मानव ने बैलों द्वारा हल खींच कर खेती करना आंरभ कर दिया। इस प्रकार उसने पशु शक्ति को काबू कर अपना प्रभुत्व भी बढ़ा लिया। इस काल के मानव ने व्यक्तिगत संपति की अवधारणा को अपना लिया। जिसके पास ज्यादा धन उसका ज्यादा महत्व। इसके साथ-साथ ईटों के घर बनाना,मुंद्राक का प्रचलन भी इस काल में शुरू हुआ जो व्यक्तिगत संपति तथा शक्ति का घोतक था।

इस प्रकार हम देखते हैं कि ताम्रपाषाण युग विशेषीकरण का काल था। इसके अतिरिक्त पहिए वाली गाड़ी की शुरूआत हो गई जिससे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना आसान हो गया।

क्षेत्र विभाजन 

ताम्रपाषाण युग के प्रांरभिक प्रमाण हमें मिश्र, एशिया माइनर में सीरिया, फिलिस्तीन, असीरिया, इरान, इराक, अफगानिस्तान तथा उतर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप में मिलते है। यूरोप, चीन तथा अन्य क्षेत्रों पर यह काल हजारदेा हजार बाद शुरू हुआ। प्रांरभिक क्षेत्र का बहुत सारा भाग पर्वतों और रेगिस्तानों से घिरा हुआ है, जिसके बीच नदी घाटियां हैं जैसे: नील, दजला-फरात, मिश्र और सिन्ध इत्यादि।

सर्वप्रथम मैसोपोटामिया की हुस्न संस्कृति में तांबा निकालने तथा उसका प्रयोग करने के प्रमाण मिले है कार्बन विधि के आधार पर इनका काल निर्धारण 5010 ई0पू0 से 5080 ई0पू0 निर्धारित किया गया। इस संस्कृति के लाग मृदभांडो को चाक पर बनाकर भट्टियों मे अच्छी तरह पकाते थे, जिन पर लेप करके चित्रकारी की जाती थी। इसके अतिरिक्त अनेक मिट्टी की स्त्राी आकृतियां तथा जंगली और पालतु पशुओं की आकृतियां भी मिली है। अनातोलिया के कई स्थलों से इस प्रकार के प्रमाण मिलते हैं। इराक में हलफ नामक स्थान से भी इस प्रकार के प्रमाण मिले हैं यहां से मोहरों के आकार के पैंडेंट भी मिले है जिन पर ज्यामितिय डिजाइन बने है विश्व की यह प्राचीनतम मोहर है जिससे स्वामित्व की अवधारणा का प्रांरभ माना जाता है।

इस काल के मानव ने उबेद नामक स्थान पर दलदली भूमि को कृषि योग्य बनाया और नहरों का निर्माण किया। ये तांबे की कुल्हाडियों का प्रयोग करते थे। तथा यहां बडे़-बडे़ सार्वजनिक भवनों के निर्माण की शुरूआत 4015 ई0पू0 में हुई। कथान के समीप िस्चालक में सर्वप्रथम तांबे को पीटकर उसे ढालने के बाद, सूए तथा पिन इत्यादि का निर्माण शुरू हुआ तथा पकी मिट्टी के मृदभांडो का भी विकास हुआ।

सामाजिक स्थित

यद्यपि इस काल में लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था लेकिन इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के शिल्प उद्योग भी अस्तित्व में आ गए थे। जैसे: धातु विशेषज्ञ, कुम्हार, कारीगर इत्यादि। इस प्रकार प्रत्येक वर्ग की कार्य निपुणता इस काल में देखने को मिलती है। समाज के विभिन्न वर्ग एक-दूसरे पर आश्रित थे। हल्फ तथा उवेद में िस्यालक की भाँति ही प्रत्येक वर्ग का प्रत्येक काम के लिए विशेषिकरण देखने को मिलता है। परन्तु 10 उवेद में उतर काल में इन लोगों ने इसी क्षेत्र में अत्यधिक विकास किया जिसकी भरपाई कृषकों द्वारा अतिरिक्त उत्पादन करके की गई। यहां भी पितृसतात्मक समाज देखने को मिलता है। इसी प्रकार टेप गावरा में भी अलग-अलग वर्गो की विशेष कार्य में निपुणता देखने को मिलती है। यहां बाहर की जातियों के आने से जनसंख्या बढ़ गई थी जिससे अतिरिक्त उत्पादन की आवश्यकता पड़ी। जोकि इस समय की सबसे महत्वपूर्ण की सबसे महत्वपूर्ण ेपजम है में भी समाज का वर्गीकरण देखने को मिलता है। इनमें किसान कुम्हार, बढ़ई, जुलाहा मिस्त्राी शिल्पी आदि देखने को मिलते है। यहां पर घुम्मकड़ कबीलों के भी प्रमाण मिलते है। इसके साथ-साथ यहाँ दासों के प्रमाण तथा निवास स्थान की स्थिति के आधार पर जैसे सरदार प्राय: केंद्रीय स्थल पर रहते थे। जारमो तथा हुस्न में कुम्हारों का कार्य घुम्मकड़ कबीलों द्वारा किया जाता था। यहां पर कुम्हारों के प्रशिक्षण के कार्य में शिक्षा पुत्र का या शिषय को दी जाती थी। यहां लोगों के स्थानतरंण के प्रमाण मिलते है। ये लोग प्राय: व्यापार विनिमय द्वारा ही अपनी आवश्कताओं की पूर्ति कर लेते थें। इनका मुख्य व्यवसाय कृषि था। इसी प्रकार जैतून, नामागजा मे भी इसी प्रकार के प्रमाण देखने को मिलते है।भारतीय स्थलों में इनाम गांव प्रमुख है जो कृषि पर ही आधारित ग्रामिण व्यवस्था में रहते थे। यहां पर जातीयता के प्रमाण सरदार के घर के प्रमाण बस्ती के केंद्र में होने से मिलते है। यहां पर अन्न संग्रह के लिए भी स्थान मिले हैं।

घर निर्माण 

इस काल में लोग मुख्यत: स्थायी रूप से कच्ची इंटो या सूर्य की रोशनी में सुखाई इंटो के बने घरों में रहते थे। िस्चालन में लोग गांवों में रहते थे जो खंडहरों के ऊपर बसाए जाते थे। यहां पर घर खांचे में तली सूर्य की धूप में पकी ईटों से बनाए जाते थे और इसी प्रकार के प्रमाण जारसो और हुस्न से भी मिलते है। परन्तु यहाँ पर कुछ घरों में पत्थरों के भी दीवारों के प्रमाण मिलते है। इसके विपरीत हल्फ में घरों के प्रमाण जमीन के नीचे मिलते है जिनके छोटे कमरे होते थे। ये लोग चूने से निर्मित फर्श तथा दीवारों पर प्लास्टर करते थे। परन्तु टेप गवारा में छोटे नगर मिलते है जहाँ पर स्मारक स्थाप्तय के घर मिलते है। यहां पर मंदिर के प्रमाण मिलते हैं जो केन्द्रीय स्थान पर बने होते थे जो भटठे से पक्की ईटों के बने थे। यहां पर अनेक कमरों के होने के प्रमाण मिलते है। इसके विपरीत जैतु में बड़ी-बड़ी बिस्त्यों के प्रमाण मिलते है जहाँ पर 18 कमरों या अधिक कमरों वाले घरों के प्रमाण मिलते है। यहाँ दीवारो पर ज्यामितिय डिजाइन मिलते है। जैतून और नामागज़ा में घरों के छोटे होने के प्रमाण मिलते है। जहाँ उच्च स्तर की बस्ती भी मिलते है। इसके विपरीत इनामगाँव में चूल्हों सहित बड़ी-बडी कच्ची मिट्टी के मकान और गोलाकाट गढ़ढो के मकान मिले है। यहां पर एक घर ऐसा मिला है जहाँ पर चार कमरे आयताकार एवं एक कमरा वर्गाकार है। यहां पर अन्न संग्रह तथा राजस्व के एग्रीकरण के लिए अलग से व्यवस्था देखने को मिलती है।

औजार 

इस समय जो सबसे अधिक एवं महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिलता है वह है इस काल के औजारों में आया परिवर्तन, क्योंकि अब तांबे को विभिन्न आकृतियों में सुगमता से ढाल कर तथा पीटकर अधिक प्रभावशाली तथा मजबूत औजार बनाए जाते थे। हल्फ में तांबे के साथ पत्थरों तथा हड्डियों से बनाए गए औजारों के भी प्रमाण मिलते है। तांबे के औजारों में मुख्यत: चाकू तथा छुरी प्राप्त हुए हैं। स्थ्ल में युद्ध होने के प्रमाण मिलते है क्योंकि यहाँ पर मछली पकड़ने का कांटा, बरछी, तलवार जोकि तेज धार वाले तांबे से बनाए गए औजार थे। ये औजार एक बार टूटने पर दोबारा ढाले जा सकते थे। इस प्रकार सभी स्थलों से प्राप्त औजारों में अधिकता तांबे के औजारों की मिलती है।

कला 

इस काल के मृंदभाडो में विशेष रूप से परिवर्तन देखने को मिलते हैं। सभी स्थलों पर तेज गति से घूमने वाले चाक पर बनाई गई मृदभांड़ के प्रमाण मिलते हैं। टेप गवारा में कुम्हार द्वारा पहिए पर सुंदर कलश के बारे में प्रमाण मिलते हैं। यहाँ पर शिल्पी के बारे में भी प्रमाण मिलते हैं। यहाँ पर चरखें व तकलियाँ मिली है जिनसे इनके सूत कातने तथा वस्त्र निर्माण के प्रमाण मिलते है। ये चाको पर मृदभांड भी बनाते थे। इन्होंने कला के क्षेत्र में विशेषीकरण प्राप्त था। इसलिए विभिन्न स्थलों से जैसे टेपगावरा इत्यादि में उसकी अलग बस्ती के प्रमाण मिलते हैं। इसके साथ-साथ अन्ऊ से हमें नाव बनाने के प्रमाण मिले है जो पाल की नाव होती थी। यहीं पर ऊनी वस्त्र, कॉटन के वस्त्र, चटाइयों के भी प्रमाण मिलते है। तथा ये काफी अच्छे डिजाइन की मिलती है। यहाँ पर हाथी दाँत से वस्तुएं चूना तथा टेराकोट की मूर्तियां भी प्राप्त होती है। इसी तरह लगभग सभी स्थलों पर बैलगाड़ियों के प्रमाण मिलते है। इनामगांव के शिल्पकार अधिक कुशल थे। यहां से विशेषत: कार्नेलियन, स्टेटाइट, क्वार्टज, क्रिस्टल जैसे महंगे पत्थरों के मोती मिलते है।

आर्थिक स्थिति

इनके आर्थिक जीवन में मुख्यत: व्यापार कृषि तथा पशुओं के बारे मे जानकारी मिलती है।

कृषि

ताम्राष्मीय काल की लगभग सभी स्थलों की अर्थ व्यवस्था कृषि पर निर्भर थी। कुछ स्थलों पर अतिरिक्त उत्पादन के लिए विभिन्न उपायों का प्रयोग किया गया जैसे उवेद में दलदली भूमि से पानी निकाल कर उसे कृषि योग्य बनाया जाता था तथा अतिरिक्त पानी का प्रयोग सिंचाई के लिए किया जाता था। टेप गवाया जारमो हुस्न, तथा िस्यालक में सिंचाई के प्रमाण मिलती हैं। ये प्राय: कृषि को जोतने के लिए पशुओं का प्रयोग करते थे। िस्यालंक से बाहर की प्रजातियों के पौधें के प्रमाण मिले हैं। इनकी मुख्य फसले जो, गेहँू, बाजरा, मसूर थी इसके अलावा कुछ स्थलों पर सब्जियों के उत्पादन के प्रमाण मिलते है। कुछ स्थलों जैसे इनामं गांव से सूत के भी प्रमाण मिले है। यंहा पर अन्ऊ में तिलहन के प्रमाण मिले है। नामगजा में इन सभी के साथ-2 उडद तथा मूंग के भी प्रमाण मिलते है। िस्यालक में सिचांई के चश्मों का प्रयोग किया जाता था पंरतु टेप गयाना में चरागाहों की अधिकता मिलती है।

क्योंकि इस काल में कृषि करने के लिए बधिय कर जूले (Yole) की साथ बैलों का प्रयोग कृषि में करने लग गए थे इस लिए इन पशुओं को विशेष बाडों में राव अच्छी तरह खिलाया मिलाया जाता था इन का गोबर इक्कठा कर खेतों में खाद के रूप प्रयोगो कर अधिक फसल ऊगाई जाने लगी।

पशुपालन 

काफी मात्रा में पशुओं का पालतू बनाया जाना नवपाषाण में ही गया था पंरतु अब यह और भी अधिक देखने को मिलता है। िस्यालक में गाय, भेड़, बकरी, इत्यादि को पालतू बनाया जाना देखने को मिलता जिनका प्रयोग दूध एवं मांस के लिए किया जाता था। हल्फ में बैल तथा ऊंट को भी पालने के प्रमाण मिलते है जिनकी सहायता से कृषि की जाती थी। उबेद में भेड़ बकरी, सुअर, घोडा, ऊँट, बैल इत्यादि के पालतू बनाने के प्रमाण मिलते हैं। तेप गावरा में भी इन सभी पशुओं के पालतू बनाने के प्रमाण मिलते है। पंरतु onagar का प्रयोग यहां भारवाहक के रूप में किया जाता था परन्तु अन्ऊ में घोड़े के हड्डियों के प्रमाण मिलते है। ये इसका प्रयोग मांँस, दूध तथा भारवाहक के रूप मिलते है यहां ऊँट का प्रयोग मरूस्थल को पार करने के लिए किया जाता था। जारमो और हुस्न में पशुओं का प्रयोग खादप्राप्ति के लिए किया जाता था तथा बैल से हल जलवाने के भी प्रमाण मिलते है। जैतून में मछली के शिकार के प्रमाण मिलते है। नामताजा में पशुओं का प्रयोग रहट से पानी खीचने के लिए किया जाता था। हल जोतने में घास लाने के लिए इस काल में बैलों को बघिया करने का काम शुरू किया गया तथा जूलो (Yoke) का प्रयोग इस काल में ही हुआ और भार वाहक के रूप में बैलों का प्रयोग देा तथा चार पहिए की कैडट (Wheeled) ढकी हुई गाडियों में किया जाने लगा।

व्यापार

ताम्राष्मीय काल में व्यापार का अत्यधिक प्रचलन देखने को मिलता है। लगभग सभी स्थलों पर अतिरिक्त उत्पादन किया जाता था जिसका मुख्य उद्धेश्य व्यापार करना था। िस्चालक में सोने को आयात किया जाता था जिसे उत्तरी अफगानिस्तान से मंगाया जाता था। यहां पर पैडेंट मोहर की प्राप्ति हुई है, जो कि नितिसम्पति तथा व्यापार के होने का प्रमाण देती है। इसके साथ-साथ मुहरे भी प्राप्त हुई हैं। हल्फ में कुछ मुहरे मिली है जिन पर ज्यामितिय चित्र मिले है, जिससे यहां पर व्यापार होता था। इसके प्रमाण मिलते हैं। यहां पर फारस की पहाड़ियों से शंख के तथा आर्मेनिया से ज्वाला कांच के आयात के प्रमाण मिलते है। यहां पर वान झील के पास हलाफिरएन् औधोगिक समुदाय के प्रमाण मिलते हैं जेा मुख्यत: उत्पन्न का कार्य करते थे। उबेद में ताबीज रूपी मोहरे मिली है जिन के पिछे के भाग में लूप तथा दूसरी तरफ ज्योमित आकृति के स्थान पर जानवरों की मूर्तियां अकिंत थी जिनसे इनके व्यापार का प्रमाण मिलते है। टेप ग्वारा में अफगानिस्तान से वैदयत, सुमैर से छोटी वस्तुएं भी प्राप्त करते थे। यहां पर दक्षिण से आयातित वस्तुएँ भी प्राप्त होती है। अन्ऊ में भी इस समय की कुछ मोहरें मिली है, जारमोहुस्न में तांबा हर जगह नहीं मिलता यहां पर खनन का कार्य किया जाता था। इन सभी पत्थरों तथा धातुओं के आपात करने के लिए कृषि उपजों को दिया जाता था। जिन्हें इन लोगों को जरूरत से अधिक उपजाना पड़ता था ताकि वस्तु विनियम के आधार पर व्यापार में इन्हें प्रयुक्त किया जा सके। नामागाजाा में बैल गाडियों का प्रयोग व्यापार के लिए किया जाता था। हयूक में Stampseats मिलती है जो पकी मिट्टी की बनी हुई थी।

धर्म

यहां पर लगभग सभी स्थलों से लोगों की धार्मिक आस्था का पता चलता है हल्फ में मन्दिरों के प्रमाण मिले है जिसका निर्माण ग्रामवासियों के सहयोग से होता था यहां लोग मृतकों का संस्कार एक विशेष विधि द्वारा करते थे। अत: उबेद से मृवको को मुड़ी हुई अवस्था में दफनाने का प्रमाण तथा गेरू से उनके शरीर पर लेप किया जाता था। उवेद में मातृदेवी की पूजा के प्रमाण मिले है। यहां पर मृतकों के साथ खाने पीने की चीजे, ऑगन में दबाते थे। यहां पर बैल की भी पूजा की जाती थी। टेप गावरा में मन्दिरों के अवशेष मिले है यहां पर भी मातृदेवी की पूजा की जाती थी। यहां पर प्राय: शवों को जलाया जाता था। अन्ऊ में भी लोग धार्मिक प्रवृति रखते थे। पूरे विधि-विधान से कर के तांबे की कुछ वस्तुएँ रखकर घर के आगंन में मृतकों को दबाते थे। ऐसा ही जारमो हुस्न में देखने को मिलता है। परन्तु इनामगांव में ये लोग विशेष रूप से उतर दक्षिण की ओर गाडते थे। यहां पर सभी स्थानों से किसी अराध्य देवी की पूजा के प्रमाण मिलते हैं।

इस प्रकार ताम्रपाषाणीय युग जिसने नवपाषाण संस्कृति का स्थान लिया, समाज में अब आत्म-निर्भर अर्धव्यवस्था का स्थान अतिरिक्त उत्पादन प्रणाली ने ले लिया। इस प्रक्रिया में विशेषज्ञों का योगदान काफी रहा इन विशेष वर्गो में कारीगर धातुकार, कुम्हार इत्यादि शामिल थे। धातु प्रचलन में आने से पाषाण उपकरणों की संख्या में कमी आई। इसके बाद के काल में तेा धीरे-धीरे पाषाण उपकरण प्राय: लुप्त से हो गए। तांबे धातु के ज्ञान से ही धीरे-धीरे मिश्रित धातुओं को बनाने की कला का विकास हुआ। कांलान्तर में तांबे और टीन को मिलाकर कांस्य धातु का निर्माण किया गया, जिस काल में संस्कृति के स्थान पर सभ्यताओं का विकास हुआ। इसके अतिरिक्त इस काल में शुरू हुई सिंचाई व्यवस्था, मुद्राकों का प्रचलन बड़े-बडे़ सार्वजनिक भवनों और मम्यिरों के निर्माण इत्यादि ने सभ्यताओं के विकास में अपना एक अनुठा योगदान दिया।

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