मेंडलीफ का आवर्त नियम और आवर्त सारणी

तत्वों के वर्गीकरण की आवश्यकता

आप दवाइयों की दुकान पर जाते होंगे : वहां कई सौ दवाइयां संग्रहित हैं। इसके बावजूद जब आप एक विशेष दवाई के लिये पूछते हैं तो वह आसानी से ढूंढ लेता है। यह कैसे संभव है? यह इसलिए है क्योंकि दवाओं को विभिन्न श्रेणीयों और उपश्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है और तदनुसार व्यवस्था की जाती है अत: उनका स्थान पता करना आसान हो जाता है। उन्नीसवीं सदी तक ज्ञात तत्वों की संख्या कम थी। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक 60 से अत्विाक तत्वों की खोज हो गई थी। उनसे बनने वाले यौगिकों की संख्या बहुत बड़ी थी। तत्वों की बढ़ती संख्या के साथ उनके गुणों का अलग-अलग अध्ययन करना अत्यन्त कठिन होता जा रहा था। अत: उनके वर्गीकरण की जरूरत महसूस की गई जिससे उनका व्यवस्थित अध्ययन आसानी से किया जा सके। इसके अलावा एक समूह के एक तत्व के गुणों के द्वारा उनके अन्य तत्वों के बारे में विचार पता चलता है।

तत्वों का आवर्त वर्गीकरण का विकास

वैज्ञानिक बहुत कोशिशों के बाद विभिन्न तत्वों को समूहों में व्यवस्थित करने में सफल हो सकें। उन्होंने महसूस किया कि यद्यपि प्रत्येक तत्व एक दूसरे तत्व से भिन्न है ता भी कुछ तत्वों में कुछ समान्ता होती है। इसके अनुसार, एक समान तत्वों को समूहों में व्यवस्थित किया गया जिससे वर्गीकरण हुआ। विभिन्न वैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार के वर्गीकरण दिए। पहले वर्गीकरण में तत्वों को धातु और अधातु दो समूहों में रखा गया था। यह वर्गीकरण केवल एक सीमित उद्देश्य की पूर्ति करता है। मुख्यतया, क्योंकि कुछ तत्व जैसे जरमेनियम और एंटीमनी धातु और अधातु दोनों के गुणधर्म दर्शाती है। इन्हें किसी भी दो वर्गो में रखा जा सकता है। वैज्ञानिक एक तत्व के इन अभिलाणिकों को खोजने में लगे हुए थे जो कि कभी भी परिवर्तित नहीं होते है। 1815 विलियम प्राउस्ट के काम के पश्चात् यह पाया गया कि कुछ तत्वों के परमाणु द्रव्यमान स्थिर होते हैं इसलिए यह वर्गीकरण का संतोषजनक आधार हो सकता है। अब आप तत्वों के वर्गीकरण के चार मुख्य कोशिशों के बारे में सीकेगें। वे निम्न प्रकार है।
  1. डॉबेरीनर के ट्रायड
  2. न्यूलैंड का अष्टक नियम
  3. लोथर मेयर के वक्र
  4. मेंडलीफ के आवर्त नियम और आवर्त सारणी
  5. आधुनिक आवर्त सारणी

डॉबेरीनर के ट्रायड

1829 में जे. डब्ल्यू. डॉबेरीनर एक जर्मन रसायतिज्ञ ने तीन तत्वों का एक समूह बनाया और उसे ट्रायड (सारणी 6.1) का नाम दिया। ट्रायड के तीनों तत्वोंं के गुण एक समान थे उन्होंने एक नियम जिसे ‘डॉबेरीनर का ित्राक या ट्रायड नियम’ का प्रस्ताव दिया। इस नियम के अनुसार जब तत्वों को उनके बढ़ते परमाणु द्रव्यमान के क्रम में व्यवस्थित करते हैं तो बीच के परमणु का द्रव्यमान पहले और तीसरे तत्व के परमाणु द्रव्यमान के गणितीय औसत के बराबर था और उसके गुण भी उन दोनों के मध्यवर्ती थे।

न्यूलैण्ड का अष्टक नियम

1864 में एक अंग्रेजी रसायनिज्ञ जॉन एलेक्जैंडर न्यूलैंडस ने तत्वों को उनके परमाणु भार के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित किया। उन्होंने यह देखा कि हर आठवें तत्व के गुण पहले तत्व के गुणों के समान थे। न्यूलैण्ड ने इसे अष्टक के नियम का नाम दिया। यह नाम संगीत के सुर, जहां हर आठवां सुर पहले सुर की पुनरावृति जैसा कि नीचे दिखाया गया है, के साथ इसकी समानता के कारण किया था।

     1 2 3 4 5 6 7 8
     सा रे गा मा पा धा नी सा

न्यूलैण्ड के द्वारा किया गया तत्वों का वर्गीकरण सारणी  में दिखाया गया है। लीथियम (Li) से शुरू करके आठवां तत्व सोडियम (Na) है और इसके गुण लीथियम के समान हैं। इसी प्रकार बेरीलियम (Be), मैगनीशियम (Mg) और कैल्शियम (Ca) एक दूसरे के सदृश हैं। फ्लोरीन (F) और क्लोरीन (Cl) भी रासायनिक दृष्टि से एक समान हैं।
अष्टक नियम के अनुसार तत्वों की परमाणु भार के साथ व्यवस्था
  Li   Be   B   C   N   O   F
  (7)   (9)   (11)   (12)   (14)   (16)   (19)
  Na   Mg   Al   Si   P   S   Cl
  (23)   (24)   (27)   (28)   (31)   (32)   (35.5)
  K   Ca
  (39)   (40)

न्यूलैण्ड वर्गीकरण की विशेषतायें दो बिंदुओं में निहित है।
  1. परमाणु भार (द्रव्यमान) को वर्गीकरण का आधार बनाया गया था। 
  2. गुणों की आर्वत्तिका (एक निश्चित अंतराल के बाद गुणों की पुनरावृत्ति) को पहली बार मान्यता प्राप्त की गई थी।
अष्टक का नियम दो कारणों की वजह से विफल रहा
  1. यह उच्च परमाणु (भार) द्रव्यमान के तत्वों पर लागू नहीं था। अत: साठ से अधिक तत्व जो उस समय ज्ञात थे उनमें से वह केवल कुछ तत्वों को सही ढंग से व्यवस्थित कर सकता था।
  2. उत्कृष्ट गैसों की खोज के बाद यह पाया गया कि नौवें तत्व के गुण पहले तत्व के गुणों के समान थे आठवें तत्व के नहीं। इसके परिणामस्वरूप अष्टक के विचार को अस्वीकृत कर दिया गया।
तत्वों के वर्गीकरण के लिये परमाणु द्रव्यमान का उपयोग मौलिक गुणों के रूप में करने के लिये न्यूलैण्ड के मूल विचार का आगे दो वैज्ञानिक लोथर मेयर और डी. मेंडेलीफ ने समर्थन किया। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि उन दोनों ने उस समय ज्ञात सभी तत्वों को अपने काम में शामिल किया। हालांकि हम मेंडलीफ द्वारा प्रस्तावित वर्गीकरण की चर्चा करेंगे जो व्यापक रूप से स्वीकार की गई है और आधुनिक वर्गीकरण का आधार है।

मेंडलीफ का आवर्त नियम और आवर्त सारणी 

डी. मित्राी मेंडलीफ (इसके अलावा मेन्डेलीव या मेन्डेलेयेव के रूप में भी उच्चारण) एक रूसी रासायनिज्ञ ने उस समय ज्ञात सभी 63 तत्वों के और उनके यौगिकों के गुणों का अध्ययन किया। तत्वों की उनके बढ़ते परमाणु द्रव्यमान के क्रम में व्यवस्था करने पर उन्होंने पाया कि समान गुणों वाले तत्व एक नियमित अंतर पर आते हैं। 1869 में उन्होंने अपने अवलोकन को निम्नलिखित कथन जिसे ‘मेंडलीफ की आवर्त सारणी’ कहा जाता है के रूप में प्रस्तुत किया। तत्वों के भौतिक और रासायनिक गुण उनके परमाणु द्रव्यमान के आवर्ती फलन होते हैं। आवर्ती फलन की एक निश्चित अंतराल के बाद पुनरावृत्ति होती है। मेंडलीफ ने तत्वों को एक सारणी के रूप में व्यवस्थित किया जिसे मेंडलीफ की आवर्त सारणी के रूप में जाना जाता है।

मेंडलीफ की आवर्त सारणी

मेंडलीफ ने तत्वों को उनके परमाणु भारों के बढ़ते हुये क्रम से क्षैतिज पंक्तियों में तब तक व्यवस्थित किया जब तक कि उनको एक तत्व जिसके गुण पहले तत्व के समान मिले। फिर उन्होंने इस तत्व को पहले तत्व के नीचे रखा और इस तरह तत्वों की दूसरी पंक्ति शुरू की। मेंडलीफ वर्गीकरण की सफलता का कारण उनके द्वारा तत्वों के परमाणु द्रव्यमान से अधिक जोर तत्वों के गुण पर देना था। कभी-कभी उनको ऐसा तत्व नहीं मिला जिसे एक विशेष स्थान पर रखा जा सके। इस स्थान को उन्होंने बाद में खोज किये गये तत्वों के लिये रिक्त छोड़ दिया। उन्होंने कुछ ऐसे तत्वों और उनके यौगिकों के गुणों के विषय में काफी सटीक भविष्यवाणी की। कुछ मामलों में कुछ तत्वों के क्रम को उलटना पड़ा। यदि उनके गुणों का बेहतर मिलान होता। इस तरह की कार्यवाही द्वारा उन्होंने सभी ज्ञात तत्वों को आवर्त सारणी में सारणी में दिखाये गये ढंग से व्यवस्थित किया।

मेंडलीफ की आवर्त सारणी (1871)
मेंडलीफ की आवर्त सारणी (1871)

मेंडलीफ की आवर्त सारणी की मुख्य विशेषतायें

इस आवर्त सारणी की मुख्य विशेषतायें।
  1. तत्व, आवर्त सारणी में पंक्तियों और स्तंभों में व्यवस्थित होते हैं। 
  2. क्षैतिज पंक्तियों को आवर्त कहते हैं। आवर्त सारण में छ: आवर्त है ये संख्या 1 से 6 (अरबी अंक) तक दी गई है। चौथे, पांचवें एवं छठे आवर्त में प्रत्येक के दो श्रेणी हैं। 
  3. एक ही आवर्त के तत्वों के गुण नियमित रूप से क्रम से बदलते रहते हैं। (यानि वृद्धि या कमी दिखाते है) यदि बांयें से दायें ओर आगे बढ़ें तो।
  4. खड़े स्तंभों को समूह कहा जाता है। I से लेकर VIII (अरबी संख्या) तक 8 स्तंभ होते हैं। 
  5. वर्ग I से VII तक उपसमूह A और B में विभाजित हैं। हालांकि समूह VIII में प्रत्येक आवर्त में तीन तत्व शामिल है। 
  6. एक विशेष समूह में मौजूद सभी तत्व रासायनिक प्रकृति में समान हैं। वह ऊपर से नीचे तक भौतिक और रासायनिक गुणों में नियमित रूप से अनुक्रमण दिखाते हैं।

मेंडलीफ की आवर्त वर्गीकरण के गुण -

  1. सभी तत्वों का वर्गीकरण : मेंडलीफ वर्गीकरण में सभी ज्ञात 63 तत्वों को उनके परमाणु द्रव्यमान के आधार पर सम्मिलित किया गया है। 
  2. परमाणु द्रव्यमान में सुधार : कुछ तत्वों जैसे बेरीलियम (Be), सोना (Au) और र्इण्डीयुम (In) के परमाणु द्रव्यमान में सुधार किया गया।
  3. नये तत्वों की भविष्यवाणी : जब भी मेंडलीफ ने आवर्त सारणी में तत्वों की व्यवस्था की और उम्मीद के अनुसार गुणों वाला तत्व न मिलने पर रिक्त स्थान बाद में खोजे जाने वाले अज्ञात तत्वों के लिये छोड़ दिया। उन्होंने ऐसे तत्वों और उनके यौगिकों के गुणों की भी भविष्यवाणी की। उदाहरण के लिये उन्होंने सिलिकान के नीचे खाली स्थान के लिये अज्ञात तत्व के अस्तित्व की भविष्यवाणी की जो आवर्त सारणी के एक ही वर्ग चतुर्थ बी का था। उन्होंने उसे ऐका-सिलिकान का नाम (अर्थात सिलिकान के नीचे स्थित) दिया। बाद में 1886 में जर्मनी के सीए विकलर ने इस तत्व की खोज की और इसे जरमेनियम का नाम दिया। इस तत्व के वास्तविक गुणों और भविष्यवाणी में उल्लेखनीय समानता थी। एका बोरोन (स्कैन्डियम) और एका एल्यूमिनियम (गैलियम) मेंडलीफ द्वारा अज्ञात तत्वों की भविष्यवाणी के दो उदाहरण है। 
  4. तत्वों की संयोजकता: मेन्डलीक के वर्गीकरण ने तत्वों की सयोजकता को समझने में सहायता की। तत्वों की सयोजकता समूह संख्या के द्वारा दी गई। उदाहरण के लिए समूह 1 के सभी तत्वों जैसे लीथियम हाइड्रोजनए सोडियमए पौटेशियमए रुबीडियमए सिजियम की संयोजकता एक होती है।

मेंडलीफ की आवर्त सारणी के दोष -

मेंडलीफ की आवर्त सारणी एक महान सफलता थी परन्तु इसमें दोष थे
  1. हाइड्रोजन की स्थिति : IA वर्ग में हाइड्रोजन की क्षारक धातु के साथ स्थिति संदिग्ध है क्योंकि यह क्षारक धातु और हैलोजन (वर्ग VII A) दोनों के ही समान है। 
  2. समस्थानकों की स्थिति : एक तत्व के सभी समस्थानकों के परमाणुओं का द्रव्यमान भिन्न होता है। अत: उनमें से हर एक को अलग स्थान दिया जाना चाहिये। दूसरी ओर वह क्योंकि रसायन की दृष्टि से एक समान हैं। अत: उन्हें एक ही स्थान पर रखा जाना चाहिये। उदाहरण के लिए कार्बन के दो समस्थानिकों को 126 C ] 146 C प्रदर्शित किया गया है लेकिन एक ही स्थान पर रखा गया है। वास्तव में मेंडलीफ की आवर्त सारणी (हालांकि सही ढंग से) में विभिन्न समस्थानकों को कोई स्थान नहीं दिया गया था। 
  3. तत्वों के विषम’ जोड़े : कुछ स्थानों पर अधिक परमाणु भार वाले तत्व को कम परमाणु भार वाले तत्व से उनके गुणों के कारण पहले रख दिया गया था। उदाहरण के लिये उच्च परमाणु द्रव्यमान (58.9) के साथ कोबाल्ट को कम परमाणु द्रव्यमान (58.7) निकल के पहले रखा गया था। अन्य ऐसे जोड़े हैं। (i) टेल्यूरीयम (127.6) को आयोडीन (129.6) से पहले रखा जाता है और (ii) आर्गन (39.9) को पोटेशियम (39.1) से पहले रखा जाता है। 
  4. रासायनिक असृदश तत्वों का समूहन : तांबे और चांदी जैसे तत्वों की क्षार धातु (लीथियम, सोडियम आदि) के साथ कोई समानता न होते हुये भी उनको एक साथ प् वर्ग में वर्गीकृत किया गया है।
  5. समान रासायनिक तत्वों का पृथक्करण : सोना और प्लेटिनम तत्व जो रासायनिक दृष्टि से समान हैं को अलग अलग वर्ग में रखा गया है। 6. इलेक्ट्रानिक व्यवस्था : यह तत्वों की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था की व्याख्या नहीं करता है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

Post a Comment

Previous Post Next Post