तत्वों का आवर्त वर्गीकरण

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वर्गीकरण का आरम्भ

तत्वों के वर्गीकरण की आवश्यकता

आप दवाइयों की दुकान पर जाते होंगे : वहां कई सौ दवाइयां संग्रहित हैं। इसके बावजूद जब आप एक विशेष दवाई के लिये पूछते हैं तो वह आसानी से ढूंढ लेता है। यह कैसे संभव है? यह इसलिए है क्योंकि दवाओं को विभिन्न श्रेणीयों और उपश्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है और तदनुसार व्यवस्था की जाती है अत: उनका स्थान पता करना आसान हो जाता है। उन्नीसवीं सदी तक ज्ञात तत्वों की संख्या कम थी। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक 60 से अत्विाक तत्वों की खोज हो गई थी। उनसे बनने वाले यौगिकों की संख्या बहुत बड़ी थी। तत्वों की बढ़ती संख्या के साथ उनके गुणों का अलग-अलग अध्ययन करना अत्यन्त कठिन होता जा रहा था। अत: उनके वर्गीकरण की जरूरत महसूस की गई जिससे उनका व्यवस्थित अध्ययन आसानी से किया जा सके। इसके अलावा एक समूह के एक तत्व के गुणों के द्वारा उनके अन्य तत्वों के बारे में विचार पता चलता है।

वर्गीकरण का विकास

वैज्ञानिक बहुत कोशिशों के बाद विभिन्न तत्वों को समूहों में व्यवस्थित करने में सफल हो सकें। उन्होंने महसूस किया कि यद्यपि प्रत्येक तत्व एक दूसरे तत्व से भिन्न है ता भी कुछ तत्वों में कुछ समान्ता होती है। इसके अनुसार, एक समान तत्वों को समूहों में व्यवस्थित किया गया जिससे वर्गीकरण हुआ। विभिन्न वैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार के वर्गीकरण दिए। पहले वर्गीकरण में तत्वों को धातु और अधातु दो समूहों में रखा गया था। यह वर्गीकरण केवल एक सीमित उद्देश्य की पूर्ति करता है। मुख्यतया, क्योंकि कुछ तत्व जैसे जरमेनियम और एंटीमनी धातु और अधातु दोनों के गुणधर्म दर्शाती है। इन्हें किसी भी दो वर्गो में रखा जा सकता है। वैज्ञानिक एक तत्व के इन अभिलाणिकों को खोजने में लगे हुए थे जो कि कभी भी परिवर्तित नहीं होते है। 1815 विलियम प्राउस्ट के काम के पश्चात् यह पाया गया कि कुछ तत्वों के परमाणु द्रव्यमान स्थिर होते हैं इसलिए यह वर्गीकरण का संतोषजनक आधार हो सकता है। अब आप तत्वों के वर्गीकरण के चार मुख्य कोशिशों के बारे में सीकेगें। वे निम्न प्रकार है।
  1. डॉबेरीनर के ट्रायड
  2. न्यूलैंड का अष्टक नियम
  3. लोथर मेयर के वक्र
  4. मेन्डेलीफ के आवर्त नियम और आवर्त सारणी
  5. आधुनिक आवर्त सारणी

डॉबेरीनर के ट्रायड

1829 में जे. डब्ल्यू. डॉबेरीनर एक जर्मन रसायतिज्ञ ने तीन तत्वों का एक समूह बनाया और उसे ट्रायड (सारणी 6.1) का नाम दिया। ट्रायड के तीनों तत्वोंं के गुण एक समान थे उन्होंने एक नियम जिसे ‘डॉबेरीनर का ित्राक या ट्रायड नियम’ का प्रस्ताव दिया। इस नियम के अनुसार जब तत्वों को उनके बढ़ते परमाणु द्रव्यमान के क्रम में व्यवस्थित करते हैं तो बीच के परमणु का द्रव्यमान पहले और तीसरे तत्व के परमाणु द्रव्यमान के गणितीय औसत के बराबर था और उसके गुण भी उन दोनों के मध्यवर्ती थे।

न्यूलैण्ड का अष्टक नियम

1864 में एक अंग्रेजी रसायनिज्ञ जॉन एलेक्जैंडर न्यूलैंडस ने तत्वों को उनके परमाणु भार के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित किया। उन्होंने यह देखा कि हर आठवें तत्व के गुण पहले तत्व के गुणों के समान थे। न्यूलैण्ड ने इसे अष्टक के नियम का नाम दिया। यह नाम संगीत के सुर, जहां हर आठवां सुर पहले सुर की पुनरावृति जैसा कि नीचे दिखाया गया है, के साथ इसकी समानता के कारण किया था।

     1 2 3 4 5 6 7 8
     सा रे गा मा पा धा नी सा

न्यूलैण्ड के द्वारा किया गया तत्वों का वर्गीकरण सारणी  में दिखाया गया है। लीथियम (Li) से शुरू करके आठवां तत्व सोडियम (Na) है और इसके गुण लीथियम के समान हैं। इसी प्रकार बेरीलियम (Be), मैगनीशियम (Mg) और कैल्शियम (Ca) एक दूसरे के सदृश हैं। फ्लोरीन (F) और क्लोरीन (Cl) भी रासायनिक दृष्टि से एक समान हैं।
अष्टक नियम के अनुसार तत्वों की परमाणु भार के साथ व्यवस्था
  Li   Be   B   C   N   O   F
  (7)   (9)   (11)   (12)   (14)   (16)   (19)
  Na   Mg   Al   Si   P   S   Cl
  (23)   (24)   (27)   (28)   (31)   (32)   (35.5)
  K   Ca
  (39)   (40)

न्यूलैण्ड वर्गीकरण की विशेषतायें दो बिंदुओं में निहित है।
  1. परमाणु भार (द्रव्यमान) को वर्गीकरण का आधार बनाया गया था। 
  2. गुणों की आर्वत्तिका (एक निश्चित अंतराल के बाद गुणों की पुनरावृत्ति) को पहली बार मान्यता प्राप्त की गई थी।
अष्टक का नियम दो कारणों की वजह से विफल रहा
  1. यह उच्च परमाणु (भार) द्रव्यमान के तत्वों पर लागू नहीं था। अत: साठ से अधिक तत्व जो उस समय ज्ञात थे उनमें से वह केवल कुछ तत्वों को सही ढंग से व्यवस्थित कर सकता था।
  2. उत्कृष्ट गैसों की खोज के बाद यह पाया गया कि नौवें तत्व के गुण पहले तत्व के गुणों के समान थे आठवें तत्व के नहीं। इसके परिणामस्वरूप अष्टक के विचार को अस्वीकृत कर दिया गया।
तत्वों के वर्गीकरण के लिये परमाणु द्रव्यमान का उपयोग मौलिक गुणों के रूप में करने के लिये न्यूलैण्ड के मूल विचार का आगे दो वैज्ञानिक लोथर मेयर और डी. मेंडेलीफ ने समर्थन किया। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि उन दोनों ने उस समय ज्ञात सभी तत्वों को अपने काम में शामिल किया। हालांकि हम मेन्डेलीफ द्वारा प्रस्तावित वर्गीकरण की चर्चा करेंगे जो व्यापक रूप से स्वीकार की गई है और आधुनिक वर्गीकरण का आधार है।

मेन्डेलीफ का आवर्त नियम और आवर्त सारणी 

डी. मित्राी मेन्डेलीफ (इसके अलावा मेन्डेलीव या मेन्डेलेयेव के रूप में भी उच्चारण) एक रूसी रासायनिज्ञ ने उस समय ज्ञात सभी 63 तत्वों के और उनके यौगिकों के गुणों का अध्ययन किया। तत्वों की उनके बढ़ते परमाणु द्रव्यमान के क्रम में व्यवस्था करने पर उन्होंने पाया कि समान गुणों वाले तत्व एक नियमित अंतर पर आते हैं। 1869 में उन्होंने अपने अवलोकन को निम्नलिखित कथन जिसे ‘मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी’ कहा जाता है के रूप में प्रस्तुत किया। तत्वों के भौतिक और रासायनिक गुण उनके परमाणु द्रव्यमान के आवर्ती फलन होते हैं। आवर्ती फलन की एक निश्चित अंतराल के बाद पुनरावृत्ति होती है। मेन्डेलीफ ने तत्वों को एक सारणी के रूप में व्यवस्थित किया जिसे मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी के रूप में जाना जाता है।

मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी

मेन्डेलीफ ने तत्वों को उनके परमाणु भारों के बढ़ते हुये क्रम से क्षैतिज पंक्तियों में तब तक व्यवस्थित किया जब तक कि उनको एक तत्व जिसके गुण पहले तत्व के समान मिले। फिर उन्होंने इस तत्व को पहले तत्व के नीचे रखा और इस तरह तत्वों की दूसरी पंक्ति शुरू की। मेन्डेलीफ वर्गीकरण की सफलता का कारण उनके द्वारा तत्वों के परमाणु द्रव्यमान से अधिक जोर तत्वों के गुण पर देना था। कभी-कभी उनको ऐसा तत्व नहीं मिला जिसे एक विशेष स्थान पर रखा जा सके। इस स्थान को उन्होंने बाद में खोज किये गये तत्वों के लिये रिक्त छोड़ दिया। उन्होंने कुछ ऐसे तत्वों और उनके यौगिकों के गुणों के विषय में काफी सटीक भविष्यवाणी की। कुछ मामलों में कुछ तत्वों के क्रम को उलटना पड़ा। यदि उनके गुणों का बेहतर मिलान होता। इस तरह की कार्यवाही द्वारा उन्होंने सभी ज्ञात तत्वों को आवर्त सारणी में सारणी में दिखाये गये ढंग से व्यवस्थित किया।

मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी (1871)
मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी (1871)

मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी की मुख्य विशेषतायें

इस आवर्त सारणी की मुख्य विशेषतायें।
  1. तत्व, आवर्त सारणी में पंक्तियों और स्तंभों में व्यवस्थित होते हैं। 
  2. क्षैतिज पंक्तियों को आवर्त कहते हैं। आवर्त सारण में छ: आवर्त है ये संख्या 1 से 6 (अरबी अंक) तक दी गई है। चौथे, पांचवें एवं छठे आवर्त में प्रत्येक के दो श्रेणी हैं। 
  3. एक ही आवर्त के तत्वों के गुण नियमित रूप से क्रम से बदलते रहते हैं। (यानि वृद्धि या कमी दिखाते है) यदि बांयें से दायें ओर आगे बढ़ें तो।
  4. खड़े स्तंभों को समूह कहा जाता है। I से लेकर VIII (अरबी संख्या) तक 8 स्तंभ होते हैं। 
  5. वर्ग I से VII तक उपसमूह A और B में विभाजित हैं। हालांकि समूह VIII में प्रत्येक आवर्त में तीन तत्व शामिल है। 
  6. एक विशेष समूह में मौजूद सभी तत्व रासायनिक प्रकृति में समान हैं। वह ऊपर से नीचे तक भौतिक और रासायनिक गुणों में नियमित रूप से अनुक्रमण दिखाते हैं।

मेन्डेलीफ की आवर्त वर्गीकरण के गुण

  1. सभी तत्वों का वर्गीकरण : मेन्डेलीफ वर्गीकरण में सभी ज्ञात 63 तत्वों को उनके परमाणु द्रव्यमान के आधार पर सम्मिलित किया गया है। 
  2. परमाणु द्रव्यमान में सुधार : कुछ तत्वों जैसे बेरीलियम (Be), सोना (Au) और र्इण्डीयुम (In) के परमाणु द्रव्यमान में सुधार किया गया।
  3. नये तत्वों की भविष्यवाणी : जब भी मेन्डेलीफ ने आवर्त सारणी में तत्वों की व्यवस्था की और उम्मीद के अनुसार गुणों वाला तत्व न मिलने पर रिक्त स्थान बाद में खोजे जाने वाले अज्ञात तत्वों के लिये छोड़ दिया। उन्होंने ऐसे तत्वों और उनके यौगिकों के गुणों की भी भविष्यवाणी की। उदाहरण के लिये उन्होंने सिलिकान के नीचे खाली स्थान के लिये अज्ञात तत्व के अस्तित्व की भविष्यवाणी की जो आवर्त सारणी के एक ही वर्ग चतुर्थ बी का था। उन्होंने उसे ऐका-सिलिकान का नाम (अर्थात सिलिकान के नीचे स्थित) दिया। बाद में 1886 में जर्मनी के सीए विकलर ने इस तत्व की खोज की और इसे जरमेनियम का नाम दिया। इस तत्व के वास्तविक गुणों और भविष्यवाणी में उल्लेखनीय समानता थी। एका बोरोन (स्कैन्डियम) और एका एल्यूमिनियम (गैलियम) मेन्डेलीफ द्वारा अज्ञात तत्वों की भविष्यवाणी के दो उदाहरण है। 
  4. तत्वों की संयोजकता: मेन्डलीक के वर्गीकरण ने तत्वों की सयोजकता को समझने में सहायता की। तत्वों की सयोजकता समूह संख्या के द्वारा दी गई। उदाहरण के लिए समूह 1 के सभी तत्वों जैसे लीथियम हाइड्रोजनए सोडियमए पौटेशियमए रुबीडियमए सिजियम की संयोजकता एक होती है।

मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी के दोष

मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी एक महान सफलता थी परन्तु इसमें दोष थे
  1. हाइड्रोजन की स्थिति : IA वर्ग में हाइड्रोजन की क्षारक धातु के साथ स्थिति संदिग्ध है क्योंकि यह क्षारक धातु और हैलोजन (वर्ग VII A) दोनों के ही समान है। 
  2. समस्थानकों की स्थिति : एक तत्व के सभी समस्थानकों के परमाणुओं का द्रव्यमान भिन्न होता है। अत: उनमें से हर एक को अलग स्थान दिया जाना चाहिये। दूसरी ओर वह क्योंकि रसायन की दृष्टि से एक समान हैं। अत: उन्हें एक ही स्थान पर रखा जाना चाहिये। उदाहरण के लिए कार्बन के दो समस्थानिकों को 126 C ] 146 C प्रदर्शित किया गया है लेकिन एक ही स्थान पर रखा गया है। वास्तव में मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी (हालांकि सही ढंग से) में विभिन्न समस्थानकों को कोई स्थान नहीं दिया गया था। 
  3. तत्वों के विषम’ जोड़े : कुछ स्थानों पर अधिक परमाणु भार वाले तत्व को कम परमाणु भार वाले तत्व से उनके गुणों के कारण पहले रख दिया गया था। उदाहरण के लिये उच्च परमाणु द्रव्यमान (58.9) के साथ कोबाल्ट को कम परमाणु द्रव्यमान (58.7) निकल के पहले रखा गया था। अन्य ऐसे जोड़े हैं। (i) टेल्यूरीयम (127.6) को आयोडीन (129.6) से पहले रखा जाता है और (ii) आर्गन (39.9) को पोटेशियम (39.1) से पहले रखा जाता है। 
  4. रासायनिक असृदश तत्वों का समूहन : तांबे और चांदी जैसे तत्वों की क्षार धातु (लीथियम, सोडियम आदि) के साथ कोई समानता न होते हुये भी उनको एक साथ प् वर्ग में वर्गीकृत किया गया है।
  5. समान रासायनिक तत्वों का पृथक्करण : सोना और प्लेटिनम तत्व जो रासायनिक दृष्टि से समान हैं को अलग अलग वर्ग में रखा गया है। 6. इलेक्ट्रानिक व्यवस्था : यह तत्वों की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था की व्याख्या नहीं करता है।

आधुनिक आवर्त वर्गीकरण

हालांकि मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी में सभी तत्वों को शामिल किया गया था। परन्तु कमेन्डेलीफ की आवर्त सारणी (1871) स्थानों पर एक भारी तत्व को एक हल्के तत्व से पहले रखा जाता था। इस तरह के तत्वों के जोड़े (विषम जोड़े कहा जाता है) आवर्त नियम का उल्लंघन करते हैं। इसके अलावा इस आवर्त सारणी में एक तत्व के विभिन्न समस्थानकों के लिये कोमेन्डेलीफ की आवर्त सारणी (1871) स्थान नहीं था। इन सब कारणों की वजह से यह महसूस किया गया कि आवर्त सारणी में तत्वों की व्यवस्था परमाणु द्रव्यमान की तुलना में कुछ और मौलिक गुणों के आधार पर किया जाना चाहिये।

1913 में एक अंग्रेज भौतिक विज्ञान हेनरी मोसेले ने खोज की, कि परमाणु द्रव्यमान नहीं बल्कि परमाणु संख्या (क्रमांक) तत्वों का सबसे मौलिक गुण है।

एक तत्व का परमाणु क्रमांक (Z) उस परमाणु के नाभिक में प्रोटोनों की संख्या है। क्योंकि परमाणु विद्युत तटस्थ इकामेन्डेलीफ की आवर्त सारणी (1871) है उसके इलेक्ट्रान की संख्या भी उसके परमाणु क्रमांक के बराबर है। इस विकास के बाद आवर्त नियम में बदलाव और आवर्त सारणी में संशोधन की आवश्यकता महसूस की गमेन्डेलीफ की आवर्त सारणी (1871)।

आधुनिक आवर्त नियम

आधुनिक आवर्त नियम के अनुसार तत्वों के भौतिक व रासायनिक गुण उनके परमाणु क्रमाकों के आवर्ती फलन होते हैं।

सौभाग्य से संशोधित आवर्त नियम के बाद भी मेन्डेलीफ के वर्गीकरण में किसी प्रमुख संशोध् ान की आवश्यकता नहीं थी। वास्तव में परमाणु क्रमांक को वर्गीकरण का आधार मान लेने से प्रमुख विसंगतियां स्वचालित रूप से हट गमेन्डेलीफ की आवर्त सारणी (1871)। उदाहरण के लिये विसंगतियां जैसेकि विषम जोड़े और समस्थानकों का स्थान अर्थहीन हो गये।

आवर्त नियम में परिवर्तन के बाद, आवर्त सारणी में परिवर्तन का सुझाव दिया गया। अब हम अंत में उभरी, आधुनिक आवर्त सारणी के बारे में सीखेंगे।

आवर्तिता का कारण

यदि धारक धातुओं के इलेक्ट्रानिक विन्यास पर विचार करें अर्थात प्रथम वर्ग तत्व जिनका परमाणु क्रमांक 3,11,10,37,55 और 87 यानि लीथियम, सोडियम, पोटेशियम, रयूबिडियम, सीजियम और फ्रेन्शियम है।

समूह 1 के तत्वों का इलेक्ट्रानिक विन्यास

तत्वइलेक्ट्रॉनिक विन्यास
3Li
11Na
19K
37Rb
55Cs
87Fr 1
2, 1
2, 8, 1
2, 8, 8, 1
2, 8, 18, 8, 1
2, 8, 18, 18, 8, 1
2, 8, 18, 32, 18, 8, 


इन सभी तत्वों के बाहरी कोश में एक इलेक्ट्रान है इसलिये इनके गुण एक समान हैं। ये
  1. यह अच्छे अपचायक है।
  2. एक संयोजी घनायन बनाते हैं।
  3. नरम धातु है
  4. अत्यधिक क्रियाशील है अत: संयुक्त अवस्था में मिलते हैं।
  5. लौ को रंग प्रदान करते है।
  6. हाइड्रोजन के साथ हाइड्राइड बनाते हैं।
  7. आक्सीजन के साथ क्षारीय आक्साइड बनाते हैं।पानी के साथ क्रिया करके धातु हाइड्रोक्साइड बनाकर हाइड्रोजन निकालते हैं। अत: यह देखा गया है कि समान इलेक्ट्रानिक विन्यास वाले तत्वों के गुण एक समान होते हैं। अत: आविर्त्तता का कारण समान इलेक्ट्रानिक विन्यास का पुनराकरण है।

आधुनिक आवर्त सारणी

आधुनिक आवर्त नियम पर आधारित आवर्त सारणी को आधुनिक आवर्त सारणी कहा जाता है। वर्तमान में स्वीकृत आधुनिक आवर्त सारणी, आवर्त सारणी की दीर्घ रूप है। यह मेन्डेलीफ सारणी का एक विस्तारित रूप है जिसमें उपवर्ग । और ठ को अलग किया गया है। आवर्त सारणी का दीर्घ रूप हमें यह कारण समझाने में सहायक है कि कुछ तत्व एक दूसरे समान क्यों हैं और तत्वों से इनके गुणधर्मो से क्यों भिन्न होते हैं। सारणी में तत्वों को उनके इलेक्ट्रोनिक संरचना (विन्यास) को ध्यान में रखकर व्यवस्थित किया गया है। सारणी 6.5 आपने देखा होगा कि इसको और पंक्ति में बांटा गया है। स्तम्भ समूह या परिवार और पंक्ति आवर्त को प्रदर्शित करते हैं।

अब हम आवर्त सारणी के दीर्घ रूप की मुख्य विशेषताओं के बारे में सीखेंगे जैसाकि सारणी में दिखाया गया है।

आधुनिक आवर्त सारणी

आधुनिक आवर्त सारणी

आवर्त सारणी के दीर्घ रूप की विशेषतायें

समूह 

आवर्त सारणी में 18 खड़े स्तम्भ हैं। प्रत्येक स्तम्भ को समूह कहा जाता है। समूह 1 से 18 तक क्रमित किया गया है। (अरबी अंकों में) ‘ लेकिन यह देखना चाहिए कि केवल सामान्य तत्वों के सयोजी कोश में अधिक से अधिक इलेक्ट्रॉन डाले जाते हैं। संक्रमण तत्वों में इलेक्ट्रॉन अपूर्ण आंतरिक कोश में डाले जाते हैं। एक समूह के सभी तत्वों के इलेक्ट्रानिक विन्यास समान होते है। और उनके संयोजी इलेक्ट्रॉन की संख्या भी समान होती है। समूह 1 में (क्षारक धातु) और वर्ग 17 में (हेलोजन) के तत्वों में आप देख सकते हैं कि जैसे-जैसे हम वर्ग में नीचे की ओर जाते हैं कोशों की संख्या बढ़ती जाती है। जैसा कि सारणी में दिखाया गया है।

वर्ग 1वर्ग 17
तत्व   इलेक्ट्रानिक विन्यास
Li   2,1
Na   2,8,1
K   2,8,8,1
Rb   2,8,18,8,1
तत्व   इलेक्ट्रानिक विन्यास
F   2,7
Cl   2,8,7
Br   2,8,8,7
I   2,8,18,18,7

वर्ग 1 के सभी तत्वों में संयोजी इलेक्ट्रॉन 1 है। स्प के दो कोशों में इलेक्ट्रॉन है, सोडियम में तीन में, ज्ञ में चार में। जबकि त्इ में 5 कोशों में इलेक्ट्रॉन है। इसी प्रकार वर्ग 17 के सभी तत्वों में संयोजी इलेक्ट्रॉन 7 है लेकिन कोशों की संख्या फ्लोरीन में 2 से बढ़ कर आयोडीन में 5 हो गर्इ है।

आवर्त 

आवर्त सारणी में 7 क्षैतिज पंक्तियां है। प्रत्येक पंक्ति को आवर्त कहते हैं। आवर्त में तत्वों की परमाणु संख्या लगातार है। आवर्त को 1-7 तक क्रम में रखा गया है। (अरबी संख्या में)

प्रत्येक आवर्त में एक नया कोश भरना शुरू होता है। आवर्त संख्या कोश जिसमें इलेक्ट्रॉन भरते हैं उसकी भी संख्या होती है। उदाहरण के लिये 3तक आवर्त के तत्वों में तीसरा कोश (ड कोश), जैसे ही बायें से दायें चलते हैं तो वह भरना शुरू होता है। इस आवर्त का पहला तत्व सोडियम (2, 8, 1) में संयोजी कोश में केवल एक इलेक्ट्रॉन है जबकि इस वर्ग के अंतिम तत्व आर्गन (2, 8, 8) में संयोजी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन है। तीसरे कोश का धीरे-धीरे भरना नीचे देखा जा सकता है।

तत्व Na Mg Al Si P SCl Ar
इलेक्ट्रानिक विन्यास 2,8,1 2,8,2 2,8,3 2,8,4 2,8,5 2,8,62,8,7  2,8,8
  1. पहला आवर्त सबसे होता है। इसमें केवल 2 तत्व शामिल है। हाइड्रोजन और हीलियम
  2. दूसरा और तीसरा आवर्त छोटे आवर्त कहलाते हैं प्रत्येक में 8 तत्व है।
  3. चौथा और पांचवा लंबे आवर्त हैं प्रत्येक में 18 तत्व शामिल है।
  4. छठा और सातवां आवर्त बहुत ही लंबे आवर्त हैं। प्रत्येक में 32 तत्व शामिल है।

तत्वों के प्रकार

मुख्य वर्ग तत्व 

आवर्त सारणी के वर्ग एक और दो में बाई और मौजूद तत्वों और वर्ग 13 व 17 में दाई ओर मौजूद तत्वों को सामान्य, विशिष्ट या मुख्य वर्ग तत्व कहा जाता है। उनका बाह्मी कोश अधूरा होता है।

उत्कृष्ट गैस 

आवर्त सारणी के वर्ग 18 के परम दाई ओर उत्कृष्ट गैस (निष्क्रिय गैस) मौजूद हैं। उनके सबसे बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन होते हैं। हीलियम में 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं। (उनका अष्टक पूरा होता है)
इनके मुख्य विशेषतायें है।
  1. सबसे बाहरी कोश में आठ इलेक्ट्रॉन होते हैं। (हीलियम के अतिरिक्त जिसमें 2 इलेक्ट्रान मौजूद है)
  2. उनकी संयोजन क्षमता या संयोजकता शून्य है।
  3. ये प्रक्रिया में भाग नहीं लेते अत: निष्क्रिय हैं।
  4. सभी सदस्य गैस हैं।

संक्रमण तत्व 

आवर्त सारणी (वर्ग 3 से 12) के बीच ब्लाक में संक्रमण के तत्व शामिल हैं। उनके दो सबसे बाहरी कोश अधूरे हैं।
क्योंकि यह तत्व अत्यधिक विद्युत घनात्मक तत्व से अत्यधिक विद्युत ऋणात्मक तत्व में परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करते हैं अत: इनको संक्रमण तत्व का नाम दिया गया है। उनकी महत्वपूर्ण विशेषतायें हैं।
  1. यह सभी तत्व धातु हैं और इनका गलनांक और क्वथनांक उच्च होता है। 
  2. वह उष्मा और विद्युत के सुचालक हैं।
  3. इनमें से कुछ तत्व चुंबक की ओर आकर्षित होते हैं।
  4. इनमें से अधिकांश तत्व उत्प्रेरक के रूप में उपयोग किये जाते हैं।
  5. ये विभिन्न संयोजकता दिखाते हैं।

आतंरिक संक्रमण तत्व या दुर्लभ पृथ्वी तत्व 

दुर्लभ पृथ्वी तत्वों को अलग से मुख्य आवर्त सारणी के नीचे दिखाया गया है। यहां 14 तत्वों प्रत्येक की दो श्रृंखला है। प्रथम श्रृंखला में 58 से 71 (Ce से Lu) तक के तत्व जिन्हें लैंथे नाइड (लैंथेनोयड भी कहा जाता है) कहा जाता है, शामिल हैं। इन सबको तत्व 57 लैंथेनम (La) के साथ उसी स्थान (वर्ग 3 आवर्त 6) पर रखा गया है। क्योंकि इनकी आपस में बहुत समानता है। केवल सुविधा के लिये ये अलग से मुख्य आवर्त सारणी के नीचे दिखाया जाता है। 14 दुलर्भ पृथ्वी तत्व की दूसरी श्रेणी के तत्वों को एक्टिनाइड (इक्टिनोयड भी कहते हैं) कहा जाता है। इसमें 90 से 103 (th से Lr) तक के तत्व शामिल हैं। और ये सभी तत्व 89 एक्टिनियम (Ac) के साथ रखे जाते हें। लेकिन सुविधा के कारण ये मुख्य आवर्त सारणी के नीचे दिखाए जाते हैं।

सभी दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (लैंथेनाइड व एक्टिनाइड) में सबसे बाहरी तीन कोश अधूर होते हैं। इसलिये इन्हें आंतरिक संक्रमण तत्व कहते हैं। यहां दिलचस्प यह है कि तत्व लैंथेनस लैथेनाइड नहीं है और तत्व एक्टिनियम एक्टिनाइड नहीं है।

धातु 

धातु आवर्त सारणी के बायें हाथ की ओर मौजूद हैं। प्रबल धातु तत्व, क्षारक धातु (Li, Na, K, Rb, Cs, Fr) और क्षारीय पृथ्वी तत्व (Be, Mg, Ca, Sr, Ba, Ra) वर्ग एक और दो में क्रमश: शामिल है।

अधातु 

अधातु आवर्त सारणी के दायें हाथ की ओर मौजूद हैं। प्रबल अधातु तत्व यानि हेलोजन (F, Cl, Br, I, At) और चाकोजेंस (O, S, Se, Te, Po) वर्ग 17 और 16 में क्रमश: शामिल है।

उपधातु 

उपधातुयें (वह तत्व जो दोनों धातु और अधातु के मिश्रित गुण दिखाते है) वर्ग 12 (वोरान) से 16 (पोलोनियम) के लिये नीचे जा रही तिरछी रेखा के साथ मौजूद है।

आधुनिक आवर्त सारणी के गुण

  1. समस्थानकों का स्थान : एक तत्व के सभी समस्थानिकों के परमाणु द्रव्यमान एक समान होने के कारण ये आवर्त सारणी में एक ही स्थान पर मौजूद हैं।
  2. विषम जोड़े : इन सभी जोड़ों की विसंगतियां गायब हो जाती है जब वर्गीकरण के लिये परमाणु क्रमाक को आधार बनाया जाता है। उदाहरण के लिये कोबाल्ट (परमाणु संख्या 27) स्वाभाविक रूप से उसका परमाणु द्रव्यमान निकैल की तुलना में थोड़ा अधिक है।
  3. इलेक्ट्रानिक विन्यास : तत्वों का यह वर्गीकरण इलेक्ट्रानिक संरचना के अनुसार है अर्थात इलैक्ट्रानिक संरचना की एक निश्चित शैली वाले तत्वों को एक ही वर्ग में या आवर्त सारणी के एक ही भाग में रखा जाता है। यह तत्वों के गुणों को उनके इलेक्ट्रानिक विन्यास से संबंधित करता है। यह बात अगले भाग में सविस्तार सीखेंगे। 
  4. धातुओं और अधातुओं का पृथक्करण : यह प्रबल धातु तत्वों को अधातु तत्व से अलग होता है।
  5. संक्रमण धातुओं की स्थिति : यह संक्रमण धातुओं की स्थिति काफी स्पष्ट करता है।
  6. तत्वों के गुण : यह विभिन्न प्रकार के तत्वों के गुणों में मौजूद मतभेद, प्रवृत्तियां और परिवर्तन को दिखाता है।
  7. यह आवर्त सारणी सरल सुव्यवस्थित है और विभिन्नों विधि धातुओं के गुणधर्मो को याद रखने का आसान विधि है।

गुणों में आवर्त प्रवृति

हमने पिछले अनुभाग में आवर्त सारणी के दीर्घ रूप की मुख्य विशेषताओं का अध्ययन किया है। हम जानते हैं कि यह वर्ग और आवर्त से बनी है। आइये उनके दो महत्वपूर्ण विशेषतायें दोहरायें।
  1. किसी भी वर्ग में भरे हुये कोशों की संख्या बढ़ जाती है। किसी भी वर्ग के तत्वों के संयोजी इलेक्ट्रानों की संख्या एक समान होती है लेकिन वह उच्च कोश जो सबसे दूर है उसमें मौजूद होते हैं। इस कारण से उनमें और नाभिक के बीच आकर्षण का बल घट जाता है।
  2. एक दिये गये आवर्त में संयोजी इलेक्ट्रान की संख्या और नाभिक का आवेश बायें से दायें बढ़ जाता है। इसके कारण उनमें आकर्षण का बल बढ़ जाता है। ऊपर दिये गये परिवर्तन से तत्वों के गुण प्रभावित होते है। जिसके कारण वर्ग और आवर्त में धीरे-धीरे विविधता होती है। और परमाणु क्रमांक के कुछ अंतराल के बाद स्वयं पुनरावृत्ति करते हैं। अब हम आवर्त सारणी के ऐसे दो गुणों की विविधताओं पर चर्चा करेंगे।

परमाणु का आकार

एक पृथक परमाणु के नाभिक केंद्र से उसके सबसे बाहरी कोश की दूरी को परमाणु आकार कहते हैं। इसे परमाणु की ित्राज्या भी कहा जाता है। यह पिक्टीमीटर में मापा जाता है। Pm. (1 pm = 10–12m) परमाणु का आकार एक महत्वपुर्ण गुणधर्म है क्योंकि अन्य दूसरे गुणधर्म इनसे संम्बधित होती है।

आवर्त सारणी में परमाणु आाकर में विविधता

आवर्त सारणी के आवर्त में बायें से दायें की ओर परमाणु का आकार घटता जाता है लेकिन वर्ग में ऊपर से नीचे बढ़ता जाता है।

आवर्त में परमाणु संख्या और इसलिए नाभिक पर धनात्मक आवेश क्रमिक बढ़ता है इसके परिणाम स्वरूप इलेक्ट्रॉनों का मजबुती से आकर्षण होता है और ये नाभिक के अधिक पास आ जाते है। इससे आवर्त में परमाणु आकार बायें से दायें धटता है।

समूह में जैसे नीचे की ओर जाते हैं परमाणु में नए कोश शामिल हो जाते हैं जो कि नाभिक से अधिक दूर होते हैं। अत: इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर हो जाते हैं। इससे समूह में परमाणु आकार उपर नीचे बढ़ता है।

धातु और अधातु विशेषतायें

एक तत्व की इलेक्ट्रॉन खोने की प्रवृति से धनायन बनता है जो कि वैदयुत धनात्मक या धात्विक लक्षण कहलाता है। क्षारीय धातु अधिक वैदयुत धनात्मक होती है। एक तत्व की इलेक्ट्रान ग्रहण करने की प्रवृति से ऋणायन बनता है जो कि तत्व का वैदयुत ऋणात्मक या अधातु लक्षण कहलाता है।

एक वर्ग में धात्विक गुणों में विविधता

किसी वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर धात्विक गुण बढ़ता है। क्योंकि आयनीकरण ऊर्जा कम हो जाती है। इसके कारण घन विद्युती लक्षण और धात्विक प्रकृति बढ़ जाती है। यह विविधता वर्ग 14 के तत्वों में सर्वश्रेष्ठ, नीचे दिखाये गये रूप में देखी जा सकती है।

वर्ग 14 के तत्वों के धात्विक लक्षण

तत्वप्रकृति
C
Si
Ge
Sn
Pb
अधातु
उपधातु
उपधातु
धातु
 धातु

आवर्त में धात्विक गुणों में विविधता

किसी आवर्त में बायें से दांये आगे जाने पर धात्विक गुण घटता है। क्योंकि आवर्त में आयनीकरण ऊर्जा बढ़ती है। जिसके कारण धन विद्युती लक्षण और धात्विक प्रकृति घटती है। यह विविधता 3rd आवर्त के तत्वों में नीचे दिखाये गये रूप में देखी जा सकती है।

आवर्त 3 के तत्वों के धात्विक लक्षण

तत्व Na Mg  AlSi P Cl
प्रकृतिधातुधातुधातु उपधातु अधातुअधातुअधातु

इस अनुभाग में आपने आवर्त सारणी के कुछ गुणों की भिन्नता के विषय में सीखा है। आवर्त सारणी की कुछ महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों एक सामान्य तरीके से नीचे दिये गये रूप में संक्षेप में समझा जा सकता है।

वगों और आवर्त में विभिन्न आवर्त गुणों की विविधता

गुण

एक आवर्त में
(बांयें से दांयें)
एक आवर्त में
 (ऊपर से नीचे)
परमाणु संख्या
परमाणु आकार
धात्विक लक्षण
अधात्विक लक्षण
बढ़ती है
घटता है
घटता है
बढ़ता है
बढ़ती है
बढ़ती है
बढ़ता है
घटता है  


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