वैयक्तिक विक्रय का अर्थ

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वैयक्तिक विक्रय विक्रयकला से विस्तृत अवधारणा है। यह विपणन के अन्य तत्त्वों जैसे मूल्य निर्धारण, विज्ञापन, उत्पाद विकास तथा अनुसन्धान तथा वस्तुओं के भौतिक वितरण को लागू करने का एक साधन है। विक्रय कला वैयक्तिक विक्रय का एक पहलू है। यह वैयक्तिक विक्रय में प्रयोग की जाने वाली कला कौशल है। स्टिल एवं कनडिफ के अनुसार, “व्यक्तिगत विक्रय में प्रयोग की जाने वाली विभिन्न निपुणताओं में से विक्रयकला एक निपुणता है जिसे ग्राहक की व्यक्तिगत सेवा के लिए प्रयोग किया जाता है।” वस्तुत: विक्रयकला विक्रयकर्त्ता एवं ग्राहक के मध्य एक व्यक्तिगत सम्बन्ध स्थापित करता है। व्यक्तिगत विक्रय समस्त विपणन कार्यक्रम को संचालित करने में एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। विक्रय के अन्य तरीकों में से सर्वाधिक प्रभावशाली तरीका वैयक्तिक विक्रय है क्योंकि इसके अन्तर्गत समस्त प्रयत्न वास्तविक क्रेता तथा भावी क्रेता पर केन्द्रित किए जाते हैं। वैयक्तिक विक्रय में क्रेता-विक्रेता आमने-सामने होते हैं तथा वस्तु का प्रत्यक्ष प्रदर्शन किया जाता है। परिणामस्वरूप क्रेता अपनी शंकाओं तथा समस्याओं का समाधान प्रत्यक्ष रूप से विक्रेता से कर सकता है। इससे वस्तु की बिक्री अधिक होती है। इसी प्रकार क्रेताओं की रूचि, फैशन, आवश्यकताओं आदि की जानकारी संस्था के संबन्धित अधिकारियों को देता है। इसमें विक्रय नये तथा पुराने दोनों प्रकार के ग्राहकों को दिया जाता है।

इस प्रकार की विक्रय पद्धति में वस्तु के निर्माता द्वारा विक्रयकर्त्ताओं की नियुक्ति की जाती है। ये विक्रयकर्त्ता समय-समय पर सम्भावित ग्राहकों से सम्पर्क स्थापित करते हैं और उनको ग्राहक बना लेते हैं। यदि वस्तु छोटी है या उपभोग योग्य वस्तु है तो विक्रयकर्त्ता उसको अपने साथ एक गाड़ी में उचित प्रकार से रखकर सम्भावित ग्राहकों के यहाँ जाकर रूकता है, माल बेचता है और तुरन्त भुगतान ले लेता है। इस प्रणाली को घर-घर में विक्रय भी कहते हैं।

वैयैयक्तिक विक्रय की विशेषताएं

  1. व्यक्तिगत संबंध - इस विधि की यह विशेषता है कि इसमें विक्रयकर्ता तथा ग्राहक के मध्य सीधा संबंध स्थापित होता है। इसमें वस्तु का प्रत्यक्ष प्रदर्शन करके क्रेता की शंकाओं का तुरंत समाधान संभव होता है।
  2. समस्त प्रय्रयत्न वास्तविक तथा भावी क्रेता पर केद्रित - वैयक्तिक विक्रय का केंद्र बिन्दु वास्तविक तथा भावी क्रेता होता है। इस विधि में आमने-सामने होकर विक्रेता क्रेता की आवश्यकता, रूचि, व्यवहार आदि का अध्ययन करके उसे क्रय के लिए प्रेरित करता है। विक्रेता अपने विक्रय प्रयत्नों को इस प्रकार करता है कि क्रेता अपनी शंकाओं का समाधान करके तुरन्त क्रय के लिए तैयार हो जाए या भावी क्रय के लिए उत्प्रेरित हो जाये।
  3. संस्था की नीतियों तथा वस्तुओं के गुणों की जानकारी - इस विक्रय के अन्र्तगत विक्रेता केवल क्रेताओं की रूचि, फैशन, आवश्यकता आदि की जानकारी ही नहीं लेता है वरन् क्रेताओं को अपने उपक्रम की नीतियों तथा वस्तुओं की जानकारी भी देता है।
  4. शंकाओं का समाधान - इस विधि में क्रेता तथा विक्रेताओं के आमने-सामने होने से वस्तुओं का प्रत्यक्ष प्रदर्शन संभव होता है। परिणामस्वरूप क्रेता अपनी शंकाओं तथा समस्याओं का समाधान प्रत्यक्ष रूप से कर सकता है। इससे वस्तु की बिक्री अधिक संभव होती है।
  5. अधिक प्रभावशाली - विक्रय के अनेक तरीकों में से यह सबसे अधिक प्रभावशाली तरीका है क्योंकि इसके अन्र्तगत क्रेताओं का शंका समाधान तुरंत हो जाता है।
  6. लोचदार विक्रय व्यवस्था - यह विधि विक्रय व्यवस्था की बहुत अधिक लोचपूर्ण व्यवस्था है। इसमें विक्रेता क्रेता की आवश्यकताओं, उनके व्यवहारों तथा परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन कर सकता है। 
  7. संचार व्यवस्था के अवरोध नहीं - इस विधि में विक्रेता तथा क्रेता आमने-सामने होकर संवाद करते है। अत: कोई संचार व्यवस्था का अवरोध विक्रय के मामले में आड़े नहीं आता।
  8. लाभों में वृद्धि से विस्तार सम्भावनाएं - वैयक्तिक विक्रय से अधिक विक्रय संभव होता है जिसके परिणामस्वरूप लाभों में अभिवृद्धि होने से व्यवसाय के विस्तार की संभावनाएं बढ़ती हैं।
  9. ग्राहकों की सेवा - इस विधि में क्योंकि विक्रेता घर-घर जाकर क्रेता से संर्पक करता है इससे ग्राहकों की सेवा संभव होती है उन्हें विक्रेताओं से उचित मार्ग-दर्शन तथा क्रय निर्णयों के करने में सहायता प्राप्त होती है। विक्रय प्रक्रिया प्राय: वस्तुओं के विक्रय के लिए सभी विक्रयकर्ताओं द्वारा एक ही रास्ता अपनाया है; जैसे भावी ग्राहकों का पता लगाना व उनके बारे में जानकारी प्राप्त करना, फिर उनसे सम्पर्क स्थापित करना व वस्तु को उनके समक्ष करना, वस्तु की अच्छाइयों को बताना और यदि ग्राहकों द्वारा आपत्तियाँ उठाई जाती हैं तो उनका समाधान कर विक्रय करना। यदि वस्तु का विक्रय करना उस समय सम्भव न हो तो बाद में उसका अनुगमन करना। यह सभी विक्रय प्रक्रिया की अवस्थाएँ हैं। यह अवस्थाएँ एक-दूसरे में अन्तव्र्याप्त हैं तथा इनको अलग पहचानना कठिन है। साथ ही विक्रय प्रक्रिया की कितनी अवस्थाएँ होती हैं इस सम्बंध में विद्वान एक मत नहीं हैं।
आज के युग में ग्राहकों को राजा माना जाता है। इस युग में वस्तुएँ स्वत: नहीं बिकती हैं बल्कि उनको बेचने के लिए एक तरीका अपनाया जाता है इस तरीके को ही विक्रय प्रक्रिया कहा जाता है।

विक्रय प्रक्रिया की अवस्थाएँ 

1. एडविन चाल्र्स ग्रीफ (Edwin Charles Grief) ने अपनी पुस्तक .Modern Salesmanship : Principles and Problems. में पाँच अवस्थाएँ बतलायी हैं -
  1. ध्यानाकर्षण
  2. रूचि उत्पन्न करना
  3. इच्छा उत्पन्न करना
  4. विश्वास
  5. समापन
2. हरबर्ट एन. केसन (Herbert N. Cassan) ने अपनी पुस्तक .Up-to date Salesmanship. में 6 अवस्थाएँ बतलाई हैं। इन अवस्थाओं को बतलाने वाला फार्मूला .RIDSAC. के नाम से जाना जाता है :
  1. (R) = Reception (स्वागत करना),
  2. (I) = Inquiry (पूछताछ करना),
  3. (D) = Demonstration (प्रर्दशन करना),
  4. (S) = Selection (चुनाव करना),
  5. (A) = Addition (संवर्द्धन),
  6. (C) = Commendation (प्रशंसा एवं विदाई)
3. चाल्र्स एटकिन्सन किर्क पैैट्रिक (Charles Atkinson Kirkpatrick) के अनुसार :
  1. ग्राहक की पहचान (Know your Customer)
  2. वस्तु की पहचान (Know what you sell)
  3. बिक्री की योजना बनाना (Plan how you will sell)
  4. सूची बनाना (Setup a Schedule)
  5. योजना से कार्य करना (Work by Plan)
उपरोक्त विद्वानों द्वारा बताए गए विभिन्न विक्रय प्रक्रिया के तत्वों के आधार पर एक सर्वमान्य प्रक्रिया का निर्माण निम्न तत्वों से होता है :
  1. ध्यानाकर्षण - जब तक ग्राहक विक्रेता की दुकान के अंदर ना जाए, तब तक विक्रय का प्रश्न ही नहीं उठता। अत: विक्रयकर्ता का सबसे पहला प्रयास ग्राहक के ध्यान को आकर्षित करना है। ग्राहक का ध्यान आकर्षित करने के लिए विक्रयकर्ता को अपने व्यापार-गृह की बाहरी और आन्तरिक सजावट, रख-रखाव इत्यादि को आकर्षक एवं कलात्मक बनाना होगा।
  2. स्वागत करता - जैसे ही कोई ग्राहक दुकान में प्रवेश करे, मधुर शब्दों से उसका स्वागत किया जाना चाहिए। ग्राहक दुकानदार के लिए अतिथि है। अत: उसका पूरा अतिथि के सादृश स्वागत होना चाहिए। स्वागत के ये शब्द इस प्रकार हो सकते हैं- आइये बहिन जी, माता जी, भाई साहब, सर। इन शब्दों के बाद पुन: आदरपूर्वक पूछना चाहिए-” मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ? कौन-सी या किस प्रकार की वस्तु आप लेना पसन्द करेंगे?” इत्यादि शब्दों से ग्राहक के साथ बिक्री के लिए वार्तालाप प्रारम्भ करना चाहिए।
  3. अभिरूचि पैदा करना - ग्राहकों का ध्यान आकर्षित कर लेना एवं उनका स्वागत कर लेना ही पर्याप्त नहीं है वरन् सम्भावित ग्राहक की वस्तुओं की अभिरूचि पैदा करना भी जरूरी है। प्राय: क्रेता के मन में पहले से ही किसी विशेष वस्तु को क्रय करने की इच्छा होती है परंतु विशेष परिस्थितियों में उसकी रूचि अवरूद्ध हो जाती है। ऐसी परिस्थिति में विक्रयकर्ता ग्राहक की मन: स्थिति को देखकर अपने चातुर्य से ग्राहक के मन में किसी विशेष वस्तु के बारे में अभिरूचि पैदा करता है।
  4. खरीदने के लिए प्रेरित करना - ग्राहक में किसी वस्तु के प्रति रूचि उत्पन्न हो जाने के बाद ग्राहक को वस्तु खरीदने के लिए प्रेरित किया जाता है। इस कार्य को करने के लिए उसे भिन्न-भिन्न प्रलोभन दिये जाते हैं, जैसे-मुफत उपहार देना, विशेष छूट देना, बोनस देना इत्यादि। इस प्रकार की योजनाओं को जानकर ग्राहक वस्तु खरीदने के लिए तत्पर हो जाता है।
  5. विश्वास जगाना - ग्राहक जब वस्तु खरीदने के लिए लालायित हो जाता है, तब उसे विक्रय के लिए प्रेरित किया जाता है। ग्राहक जब वस्तु के गुणों, मूल्य इत्यादि के बारे में सन्तुष्ट हो जाता है, तभी वह उस वस्तु को खरीदना चाहता है। ग्राहक के मन में विश्वास जगाना विक्रय के लिए नितान्त आवश्यक है। बिना विश्वास जागे ग्राहक भी वस्तु लेने के लिए आतुर नहीं होगा।
  6. क्रय-इच्छा जागृत करना - जब ग्राहक पूर्ण रूप से सन्तुष्ट हो जाता है, तभी वह वस्तु को खरीदने की इच्छा प्रकट करता है। हरबर्ट कैसन महोदय ने ठीक ही कहा है कि वस्तु के सम्पूर्ण गुणों से परिचित होने पर उसका मूल्य नगण्य हो जाता है क्योंकि वस्तु अपने गुणों पर बिकती है, न कि अपने मूल्य पर।
  7. ब्रिक्र्री सम्पन्न करना - विक्रय-कला की अन्तिम सीढ़ी बिक्री सम्पन्न करना है। जब तक बिक्री सम्पन्न नहीं हो जाती, तब तक ग्राहक की मन:स्थिति के अनुसार कार्य करते रहना चाहिए क्योंकि कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि ग्राहक वस्तु खरीदते-खरीदते या मूल्य का भुगतान करते-करते रूक जाता है और बिना क्रय किये ही वापस चला जाता है। ऐसा इसलिए हो जाता है कि ग्राहक विक्रेता के आचरण, मूल्य एवं वस्तु के गुणों से संतुष्ट नहीं हो पाता है। अत: विक्रय सम्पन्न करने में विक्रयकर्ता को तत्परता से कार्य करना होता है।
  8. अन्तिम अभिवादन - वस्तु का विक्रय सम्पन्न हो जाने के बाद ग्राहक को हर दृष्टिकोंण से संतुष्ट करके पूर्ण सम्मान के साथ विदा कर देना चाहिए। विदा करते समय आदरसूचक शब्दों का प्रयोग करना चाहिए, जैसे-सेवा का अवसर देना। विक्रेता को यह नहीं भूलना चाहिए कि सन्तुष्ट ग्राहक चलता फिरता विज्ञापन होता है।

वैयैयक्तिक विक्रय के लाभ 

  1. भावी ग्राहकों का पता लगाया जा सकता है।
  2. क्रेताओं की शंकाओं का समाधान उचित रूप से किया जा सकता है।
  3. ग्राहक के समक्ष वस्तु का प्रत्यक्ष प्रदर्शन किया जाता है और वस्तु प्रयोग का उचित अवसर प्रदान किया जाता है जो वस्तु विक्रय की संभावनाएँ बढ़ाता है।
  4. वैयक्तिक विक्रय, क्रेता एवम् विक्रेता के मध्य समय सांमजस्य स्थापित करता है।
  5. वैयक्तिक विक्रय, क्रेता एवम् उत्पादक के मध्य संचार माध्यम का कार्य करता है।
  6. वैयक्तिक विक्रय द्वारा गैर-विक्रय कार्य जैसे बाजार अनुसंधान, आंकड़ों का एकीकरण एवम् ग्राहकों की शिकायतों का निवारण आदि भी संभव है।

वैयैयक्तिक विक्रय की हानियाँ या सीमाएँ

  1. इस विधि का सबसे बड़ा दोष यह है कि यह विधि बहुत खर्चीली है। यह वस्तु की विक्रय लागत को बहुत अधिक बढ़ा देती है।
  2. इस विधि को सफल बनाने के लिए कुशल एवम् अनुभवी विक्रयकर्त्ताओं की बहुत आवश्यकता होती है। ऐसे प्रशिक्षित विक्रयकर्त्ताओं की कमी बहुत बड़ी समस्या है।
  3. इस विधि में विक्रयकर्त्ता क्रेता के पास उस समय उपस्थित नहीं हो पाता जब वह वस्तु क्रय सम्बन्धी वास्तविक निर्णय लेता है।

वैयैयक्तिक विक्रय का स्वभाव अथवा कार्य

  1. बिक्री करना - वैयक्तिक विक्रय का यह मुख्य कार्य है जिसको एक विक्रयकर्ता को करना पड़ता है। विक्रय नये व पुराने दोनों प्रकार के ग्राहकों को किया जाता है। नये ग्राहकों के आदेश नये आदेश व पुराने ग्राहकों के आदेश पुन: आदेश कहलाते हैं।
  2. ग्राहकों की सेवा करना - वैयक्तिक विक्रय का दूसरा कार्य ग्राहकों की सेवा करना है। इसके लिए वह प्रर्दशन करता है व ग्राहकों को उचित सलाह देता है।
  3. बिक्री का रिकार्ड रखना - यह बिक्री का रिकार्ड रखता है अर्थात् बिक्री किसको व किस मात्रा में व कब की गयी है इसका लेखा रखता है। यदि वह विक्रयकर्त्ता यात्री विक्रयकर्त्ता है तो इसको अपनी रिपोर्ट भी विक्रय कार्यालय को भेजनी पड़ती है। इस रिपोर्ट में बहुत-सी बातें होती हैं।
  4. प्रशासनिक कार्य - इसको अपने अल्पकालिक व दीर्घकालिक प्रोग्राम बनाने पड़ते हैं। यह अपने नये साथी विक्रयकर्त्ताओं को अपने साथ प्रशिक्षण देता है। यह बाजार परिस्थिति का अध्ययन कर प्रबन्ध को अपने सुझाव देता है।
  5. अपनी एवं संस्था की ख्याति में वृद्धि करना - विक्रयकर्त्ता अन्य बहुत-से कार्य और करता है जिनसे उसकी व संस्था की ख्याति बढ़ती है; जैसे, फुटकर विक्रेताओं की माल को प्रदर्शित करने में सहायता करना उनकी लगातार सेवा करते रहना, आदि।

वैयैयक्तिक विक्रयकर्त्ता के प्रकार

आदेश प्राप्त करने वाले विक्रयकर्त्ता -

 एक विक्रयकर्त्ता को अपने ऊपर पूर्ण विश्वास होना चाहिए। वह ईमानदार, परिश्रमी, प्रभावी व्यक्तित्व एवं साहसी, चतुर तथा नम्र होना चाहिए। ऐसे विक्रयकर्त्ता संभावित क्रेताओं का पता लगाकर अपनी विक्रयकला से प्रभावित करके वस्तुओं का आदेश प्राप्त करने में सफल होते हैं। इस प्रकार के विक्रयकर्त्ता तीन प्रकार के होते हैं
  1. निर्माता के लिए आदेश प्राप्तकर्त्ता - इनका प्रमुख कार्य औद्योगिक तथा कच्चे माल की खरीद करने वाली संस्थाओं से सम्पर्क करके अपने निर्माताओं के लिए भारी आदेश प्राप्त करना है।
  2. थोक विक्रेताओं के लिए आदेश प्राप्तकर्त्ता - इस प्रकार के विक्रयकर्त्ता अपने थोक व्यापारियों के लिए घूम-घूमकर फुटकर विक्रेताओं से आदेश प्राप्त करते हैं।
  3. फुटकर विक्रेताओं के लिए आदेश प्राप्तकर्त्ता - ये विक्रयकर्त्ता अपने फुटकर विक्रेताओं के लिए क्रेताओं के घर-घर घूम कर उपभोक्ताओं को समझाकर अपने फुटकर विक्रेताओं के लिए आदेश प्राप्त करते हैं।

आदेश लेने वाले विक्रयकर्त्ता - 

जब किसी वस्तु की मांग विज्ञापन, विक्रय प्रवर्तन या अन्य किसी प्रकार से बन गई है तो उस वस्तु के आदेश लेने वाले यही विक्रयकर्त्ता होते हैं। व्यक्तिक विक्रय का अधिकांश विक्रय यही लोग करते हैं। ये विक्रयपूर्ण करते हैं। कभी-कभी यही लोग माल की तुरंत सुपुर्दगी करके उसका भुगतान भी ले लेते हैं। यह भी तीन प्रकार के होते हैं - (i) निर्माता के, (ii) थोक व्यापारी के, व (iii) फुटकर विक्रेता के। 3. सहायता देने वाले विक्रयकर्त्ता - इस प्रकार के विक्रयकर्त्ता किसी के लिए भी माल का न आदेश लेते हैं और न विक्रय कार्य करते हैं। अपितु सामान्य रूप से ये विक्रयकर्त्ता वस्तु की बिक्री में निर्माता की सहायता करते हैं। ये अपने क्षेत्र के विक्रयकर्त्ता होते हैं। यह विक्रयकर्त्ता दो प्रकार के होते हैं -
  1. मिशनरी विक्रयकर्त्ता - यह विक्रयकर्त्ता वस्तु के निर्माता तथा थोक एवं फुटकर व्यापारियों के बीच संचार माध्यम का कार्य करता है। यह वस्तुओं की मांग का सृजन करके संस्था की ख्याति में चार-चाँद लगाता है।
  2. यांत्रिक विशेषज्ञ विक्रयकर्त्ता - यह विक्रयकर्त्ता उच्च शिक्षा प्राप्त इंजीनियर यानि यांत्रिक विशेषज्ञ विक्रयकर्त्ता होते हैं। इन विशेषज्ञों को उन क्रेताओं/उपभोक्ताओं के पास भेजा जाता है जिनको वस्तु विशेष के प्रति शिकायत, कठिनाई तथा समस्या होती है। यह विशेषज्ञ ऐसे क्रेता/उपभोक्ताओं की समस्याओं को दूर करके वस्तु के प्रति विश्वास एवं संतुष्टि प्रदान करते हैं।

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