वाक्य की अवधारणा

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भाषा का मुख्य कार्य अभिव्यक्ति है। भाव की पूर्ण अभिव्यक्ति वाक्य के माध्यम से होती हैं। वाक्य के अभाव में भाव या विचार की स्थिति संदिग्ध हो जाएगी। वास्तव में भाव मन में अव्यक्त वाक्य के रूप में विद्यमान होते हैं, ध्वनि-प्रतीकों या लिपि-चिह्मों का आधार पाने पर वाक्य का व्यक्त रूप सामने आता है। इस प्रकार कह सकते हैं कि मनुष्य जो भी सोचता या अभिव्यक्त करता है, वह सब वाक्य के ही माध्यम से होता है। भावाभिव्यक्ति सन्दर्भ में वाक्य भाषा की सहज तथा प्रथम इकाई है।

वाक्य

परिभाषा - समय-समय पर विभिन्न विद्वानों ने वाक्य की परिभाषा की है। कुछ प्रमुख भारतीय विद्वानों की परिभाषाएँ उद्धत हैं -
  1. पंतजली ने महाभाष्य में वाक्य की परिभाषा इस प्रकार की है - ‘‘आख्यात साव्यकारक विशेषण वाक्यम्।’’ अर्थात् जहाँ क्रिया अव्यय, कारक तथा विशेषण पद एकत्रा हों, उसे वाक्य कहते हैं।
  2. आचार्य विश्वनाथ ने साहित्य-दर्पण में लिखा है- ‘‘वाक्यं स्याद् योग्य ताकांक्षासक्तियुक्त: पदोच्चय:।’’ अर्थात् पदों का वह समूह जो योग्यता, आकांक्षा और आसक्ति से युक्त हो, उसे वाक्य कहते हैं।
  3. डॉ. भोलानाथ ने भाषा विज्ञान में वाक्य की परिभाषा इस प्रकार की है ‘‘वाक्य भाषा की सहज इकाई है, जिसमें एक या अधिक शब्द हों, जो अर्थ की दृष्टि से पूर्ण हो या अपूर्ण व्याकरणिक दृष्टि से अपने विशिष्ट संदर्भ में अवश्य पूर्ण होती है, साथ ही परोक्ष रूप से कम से कम एक क्रिया का भाव अवश्य होता है।’’
  4. हिन्दी के प्रसिद्ध वैयाकरण पं. कामताप्रसाद गुरू ने ‘हिन्दी व्याकरण’ में वाक्य की परिभाषा इस प्रकार दी है - ‘‘प्रत्येक पूर्ण विचार को वाक्य और प्रत्येक भावना को शब्द कहते हैं।’’
  5. आचार्य देवेन्द्रनाथ के अनुसार, ‘‘भाषा की न्यूनतम पूर्ण सार्थक इकाई वाक्य है।’’ डॉ. देवेन्द्रनाथ ने ध्वनि, पद और वाक्य के आपसी सम्बन्धों को रेखांकित करते हुए कहा है - ‘‘वाक्य पूर्णत: मानसिक या मनोवैज्ञनिक तत्त्व है। उसमें पदों का प्रयोग भाव या विचार के अनुसार होता है। पद, ध्वनि और वाक्य के बीच की संयोजन कड़ी है, क्योंकि उसमें उच्चारण और सार्थकता दोनों का योग रहता है किन्तु न तो ध्वनि की तरह वह केवल उच्चारण है और न वाक्य की तरह पूर्णत: सार्थक।
  6. डॉ. कपिलदेव द्विवेदी ने ध्वनि, पद वाक्य और वाक्य के सत्, चित् और आनन्द रूपों में स्वीकार करते हुए कहा है - ध्वनि, भाषा का शारीरिक तत्त्व, प्राकृतिक तत्त्व की प्रधानता के कारण प्रकृति के तुल्य ‘सत्’ है। पद में शारीरिक और मानसिक दोनों तत्त्व हैं, सत् के साथ चित् भी है, अत: आनन्द या ‘सच्चिदानन्द’ रूप है की पूर्ण प्रधानता के कारण अभिव्यक्ति रूप है, अत: आनन्द या ‘सच्चिदानन्द’ रूप है।
  7. डॉ. जाल्मन दीमशित्स ने ‘हिन्दी व्याकरण’ में कहा है-’’वाक्य वाक्-क्रिया की एक समग्र इकाई के नाते वाक्य के लिए लाक्षणिक है, विधेयता, प्रकारता तथा अनुतान में पूणता।’’
  8. अरस्तु के अनुसार ‘‘वाक्य सार्थक घ्वनियों का समूह है, जिससे किसी भाव की अभिव्यक्ति होती है। प्रत्येक वाक्य संज्ञा और क्रिया से बनता है, किन्तु क्रिया के बिना भी वाक्य रचना हो सकती है।

भाषा की इकाई के रूप में वाक्य

भाषा की विभिन्न इकाइयों में वाक्य सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इकाई है। इसकी प्रमुखता को रेखांकित करने के लिए निम्नलिखित तथ्यों पर विचार किया जा सकता है-

भाषा की प्रथम इकाई

प्राचीन भारतीय भाषा-चिन्तन के आधार पर ध्वनि भाषा की लघुतम इकाई थी। आधुनिक भाषा-चिन्तन में भावाभिव्यक्ति को सर्वाधिक महत्त्व देने के कारण वाक्य भाषा की प्रथम इकाई सिद्ध हुआ है। भाषा को भावभिव्यक्ति का साधन कहते हैं, अत: उक्त विचार तर्कसंगत लगता है। बच्चा भाषा-प्रयोग के प्रारम्भिक चरण में वाक्य का ही प्रयोग करता है। ऐसे क्षण बच्चे के मन में विचार-प्रवाह चलता रहता है। प्रारम्भ में इस विचार-प्रवाह का वाक्यात्मक रूप मात्रा एक ध्वनि के रूप में प्रकट होता है। बच्चा अपने परिवेश के निकटस्थ व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा प्रयुक्त भाषा की बहु प्रयुक्त सरल ध्वनि को अपनाता है। हिन्दी भाषी क्षेत्रा का बच्चा आ, इ आदि स्वरों के पश्चात् प्राय: अल्पप्राण अघोष ओष्ठ्य या दन्त्य ‘‘प’’ और ‘‘त’’ का प्रयोग करता है। इन ध्वनियों का वाक्यात्मक रूप या अर्थ-ज्ञान प्रसंग के आधार पर जान सकते हैं; यथा-

बच्चे द्वारा प्रयुक्त ध्वनिसंदर्भ-विचारवाक्यात्मक रूप
‘‘आ’भूख लगने परआओ, भूख लगी है, दूध दे दो।
‘‘त’’आग के पास यह बहुत गर्म है।
‘‘प’’बिस्तर गीला करने पर बिस्तर गीला हो गया है।

यहाँ बच्चे की ध्वनि का वाक्यात्मक स्वरूप श्रोता की मानसिक परिकल्पना पर आधारित होता है। जो श्रोता ‘‘ध्वनि’’ के संदर्भ से पूरी तरह विज्ञ होता है। वह उसका वाक्यात्मक रूप पूरी तरह समझ जाता है। संदर्भ-ज्ञान के अभाव में बच्चे के मन का विचार या ध्वनि का वाक्यात्मक रूप समझना असम्भव हो सकता है। इस प्रकार वाक्य का यह रूप अस्पष्ट होता है, किन्तु संदर्भ से जुड़ जाने पर सहज ज्ञान हो सकता है।

बुद्धि-विकास क्रम में बच्चा भाषा-अर्जन के माध्यम से शब्दों का प्रयोग करने लगता है। उसके उच्चारण की विशेष प्रक्रिया में भी वाक्यात्मक रूप छिपा होता है, जो संदर्भ से पता लग जाता है; यथा-

बच्चे का वाक्यसंदर्भ-विशेषसामान्य वाक्य-रूप
‘‘पा’’प्यास की स्थिति पापा मुझे प्यास लगी है।
हप्पाभूख की स्थितिमुझे भूख लगी/मुझे खाना दे दो।
लोटी (रोटी) भूख की स्थिति मैं लोटी (रोटी) खाऊँगा।
आतीसामने हाथी होने पर आती (हाथी) है।

जब बालक एक-एक शब्द का शुद्ध उच्चारण करने लग जाता है, तो वाक्य का एकपदीप रूप सामने आ जाता है; यथा -


बच्चे का वाक्यसंदर्भ-विशेषसामान्य वाक्य-रूप
पानीप्यास, लगने पर मैं पानी पीऊँगा।
चाँदलेने की इच्छा परमैं चाँद लूँगा।
पापा साथ जाने की इच्छा परमैं पापा के साथ जाऊँगा।

भाषा की सहज इकाई

वाक्य भाषा की मूल और महत्त्वपूर्ण इकाई है। वाक्य के सहज रूप को इसके ध्वनि से शब्द, पद और वाक्य तक के विस्तृत प्रयोग में देख सकते हैं। ‘‘आ’’ एक ध्वनि है, इसका प्रयोग शब्द और वाक्य के रूप में होता है; यथा-

ध्वनिशब्द रूपवाक्य रूप
आ (जाना)(तू) आ

 बच्चा प्राय: ‘‘आ’’ के प्रयोग से भाषा सीखना शुरू करता है। बोलचाल की भाषा में एकपदीय वाक्यों-आ, जा, खा आदि का बहुल प्रयोग सहजता से किया जाता है। मानव अपने विचारों को दूसरों तक पहुँचाना चाहता है। भाषा की इकाई जो भाव को पूर्णता से प्रकट कर दे, वह ही मनुष्य के लिए सहज होगी। इस प्रकार पूर्ण अर्थ या भाव की अभिव्यक्ति के आधार पर वाक्य भाषा की सहज इकाई है। चॉम्स्की ने मन में स्थित वाक्य के मौन रूप को आदर्श वाक्य की संज्ञा दी है।

सार्र्थकता

भाषा का मुख्य उद्देश्य भावाभिव्यक्ति है। वाक्य के अतिरिक्त भाषा की किसी भी इकाई-ध्वनि (स्वन) शब्द या पद में पूर्ण और निश्चित अर्थ अभिव्यक्ति की शक्ति नहीं है। क्, च्, त् आदि स्वतंत्र स्वनों में किसी पूर्ण भाव का ग्रहण सम्भव नहीं है। ‘‘मधुर’’ शब्द से उसके संज्ञा (मधुर गया) या विशेषण (मधुर फल) होने का ज्ञान नहीं होता है। संज्ञा होने पर मधुर क्या खाता है, कहीं जाता है, पढ़ता है या अन्य काई कार्य करता है, इसका ज्ञान नहीं होता है। इस प्रकार किसी भी शब्द से पूर्ण भाव प्रकट होना असम्भव है। पद में वाक्य रचना की व्याकरणिक योग्यता अवश्य होती है, किन्तु पूर्ण भावाभिव्यक्ति की शक्ति नहीं होती; यथा-विजय ने, सुरेन्द्र को, जा रहा है आदि से अर्थज्ञान सम्भव नहीं है।

विचारों की पूर्ण अभिव्यक्ति वाक्य द्वारा ही सम्भव है, अत: वाक्य भाषा की स्वतंत्र और सार्थक इकाई है; यथा-
  1. सदा सत्य बोलो
  2. जयशंकर प्रसाद महान कवि थे।
इन वाक्यों से पूर्ण भाव की अभिव्यक्ति होती है।

व्याकरणिक पूर्णता

वाक्य की व्याकरणिक पूर्णता अर्थ है-वाक्य में सभी शब्दों या पदों का अपेक्षित विधान-आधार पर प्रयोग होना; यथा-’’सुनीता आम खा रही है’’ वाक्य में कर्त्ता, कर्म और क्रिया पद प्रयुक्त है और सभी पद हिन्दी व्याकरण के वाक्य-सिद्धान्तानुसार व्यवस्थित हैं।

व्याकरणिक पूर्णता कभी-कभी विशेष संदर्भ से होती है। सामान्य बातचीत में और संवादात्मक शैली के लेखन में प्राय: एकपदीय वाक्यों का प्रयोग होता है। ऐसे वाक्यों का कुछ अंश लुप्त होता है। वाक्य का पूर्ववर्ती अथवा परवर्ती, कोई भी लुप्तांश हो सकता है; यथा -
रमेश - जाओ
मनोज - कौन यहाँ रहेगा।
रमेश - मैं।

यहाँ बातचीत में प्रयुक्त ‘‘जाओ’’ और ‘‘मैं’’ वाक्य है। श्रोता संदर्भ के अनुसार व्याकरणिक पूर्णता प्राप्त कर लेता है -
बातचीत का वाक्य      व्याकरणिक अनुभूत वाक्य
जाओ      (तुम) जाओ
मैं      मैं (यहाँ रहूँगा)।
बातचीत के संदर्भ में कभी-कभी पर्याप्त विस्तृत वाक्य एकपदीय रूप में प्रयुक्त होते हैं। संदर्भानुसार उनकी व्याकरणिक पूर्णता हो जाती है; यथा -
प्रभात - तुम कल सबेरे कहाँ जा रहे हो?
विभूति - हिसार और तुम कहाँ जा रहे हो?
प्रभात - कनराल।
विभूति - आशु तो दस दिन पूर्व करनाल पहुँच गया होगा?
प्रभात - हाँ।
यहाँ ‘‘हिसार’’, ‘‘करनाल’’ और ‘‘हाँ’’ एकपदीय वाक्य हैं। श्रोता इन एकपदीय वाक्यों को संदभानुसार इस प्रकार पूर्ण कर लेता है-
एकपदीय वाक्य      व्याकरणिक अनुभूत वाक्य
हिसार     मैं कल सबेरे हिसार जा रहा हूँ।
करनाल      मैं कल सबेरे करनाल जा रहा हूँ।
हाँ      हाँ! आशु दस दिन पूर्व ही करनाल पहुँच गया है।

वाक्य में प्रयुक्त या अप्रत्यक्ष रूप में एक क्रिया की अनिवार्यता

पूर्ण भावाभिव्यक्ति के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में कम से कम एक क्रिया का होना अनिवार्य है। भाषा की विभिन्न इकाइयों में वाक्य एकमात्रा ऐसी इकाई है जिसमें उक्त विशेषता निश्चित रूप से मिलती है। प्रत्यक्ष प्रयोग - वाक्य में क्रिया पदों का प्रयोग प्राय: प्रत्यक्ष रूप में होता है; यथा-एक क्रिया-प्रयोग-तुम जाओ। वह खाती है।
एकाधिक क्रियाओं का प्रयोग - उसने कहा कि तुम गाओ।
जब तुम आओग तब मैं चलूँगा।
अप्रत्यक्ष प्रयोग - संवादात्मक शैली के प्रयोग पर प्राय: क्रिया का अप्रत्यक्षर प्रयोग मिलता है। इस प्रकार के वाक्यों से भावाभिव्यक्ति या भाव-ग्रहण में कोई कठिनाई नहीं होती है, क्योंकि श्रोता या पाठक संदर्भानुसार वाक्य-पूर्ति कर लेता है; यथा -
प्रवीण - कौन गाएगा?
गुलशन - मैं।

यहाँ ‘‘मैं’’ के साथ ‘‘गाऊँगा’’ क्रिया का अप्रत्यक्ष प्रयोग है, जो प्रसंगानुसार ‘‘मैं गाऊँगा’’ पूरा कर लिया जाता है।

वाक्य उच्चारण एवं ग्रहण

भावाभिव्यक्ति की सहज किन्तु विस्तृत प्रक्रिया में वाक्य का ही सर्वाधिक महत्त्व है। वक्ता से श्रोता तक विचार पहुचाने में वाक्य सेतु का कार्य करता है। मनुष्य के मन में विभिन्न विचार वाक्य के रूप में स्थित होते हैं। मनुष्य भाव प्रकट करने के लिए क्रमश: भाषा, शब्द, पद और वाक्य का चयन करता है। उपयुक्त चयन के पश्चात् उच्चारण प्रक्रिया के साथ श्रोता क्रमश: ध्वनि, शब्द, पद और वाक्य को ग्रहण करता है। श्रोता के द्वारा वाक्य-चिन्तन के पश्चात् अर्थ-ग्रहण होता है। इस पूरी प्रक्रिया में वक्ता के विचार श्रोता द्वारा ग्रहण किए गए अर्थ तक वाक्य की बलवती भूमिका होती है। इस तथ्य को इस प्रकार रेखांकित कर सकते हैं -

वक्ता > विचार > भाषा > शब्द चयन > पद चयन > वाक्य चयन < उच्चारण > संवाहन
श्रोता ¬ अर्थ वाक्य विश्लेषण > वाक्य ग्रहण > शब्द ग्रहण > ध्वनि ग्रहण

अभिहितान्वयवाद और अन्विताभिधानवाद 

वाक्य अध्ययन में मुख्यत: उसमें व्यवस्थित विभिन्न पदों के परस्पर संबंधों का अध्ययन किया जाता है। भाषा का ध्वन्यात्मक रूप उच्चारण प्रक्रिया में सामने आता है। इसमें ध्वनि उत्पादक अंगों की भूमिका होती है। जब विभिन्न ध्वनियों के समूह में सार्थकता का विकास होता है, तो शब्द की रचना होती है। शब्द भाषा की स्वतन्त्रा, लघुत्तम महत्त्वपूर्ण सार्थक इकाई है। यह सार्थकता मानसिक आधार पर विकसित होती है।शब्द जब व्याकरणिक योग्यता पा लेता है, तो उसे पद की संज्ञा दी जाती है। व्याकरणिक योग्यता का अर्थ है-वाक्य बनाने की क्षमता। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जब शब्द वाक्य में स्थान पा लेता है, तो उसे पद कहते हैं। जिस प्रकार अकेला व्यक्ति या भीड़ में अकेला व्यक्ति आम आदमी होता है, वह स्वतंत्र, विशिष्ट व्यक्तित्व सम्पन्न होते हुए भी अकेला होता है। किन्तु किसी सम्बन्धी या परिचित से मिलते ही पद पा लेता है; यथा-मनोज भीड़ में अकेला था, जैसे ही उसका बेटा मिला, वैसे ही वह ‘पिता’ के पद पर प्रतिष्ठित हो गया। इसी प्रकार शब्द को जैसे ही वाक्य में स्थान मिलता है वैसे ही पद बन जाता है।

पद-रचना में शारीरिक और मानसिक दोनों पक्ष काम करते हैं। पद का उच्चारणात्मक या लिखित रूप शारीरिक है, क्योंकि इसे सुन या देख सकते हैं। सार्थकता मानसिक पक्ष है, क्योंकि इन्हें इन्द्रियों से ग्रहन न करके मानसिक रूप से अनुभव किया जाता है।

पद यदि भाषा की व्याकरणिक योग्यता प्राप्त इकाई है, तो वाक्य भाषा की पूर्ण सार्थक इकाई है। पद-अध्ययन में पदों की रचना के अन्तर्गत इनमें विभिन्न व्याकरणिक कोटियाँ-लिंग, वचन, पुरुष, कारक और काल आदि के प्रयोग-पद्धति का अध्ययन किया जाता है, तो वाक्य में विभिन्न पदों की स्थिति, स्वरूप और योग का अध्ययन किया जाता है।

यह पूर्ण स्पष्ट तथ्य है कि वाक्य की पूर्णता पर ही पूर्ण अर्थ का ज्ञान संभव होता है। यथा-’वह अपने घर जा रहा है’ में ‘व’ ध्वनि, ‘व’ वर्ण ‘वह’ शब्द या वह (वाक्य-प्रयुक्त) पद, ‘वह अपने घर जा रहा है’ विभिन्न पद-पद्यांशों के प्रयोग से स्पष्ट अर्थ का बोध नहीं होता है। यदि इस रचना के अन्त में ‘था’ का प्रयोग कर दें ‘वह अपने घर जा रहा था’ तो भूतकालिक भाव प्रकट होगा; यदि ‘होगा’ का प्रयोग कर दें, तो रचना-’वह अपने घर जा रहा होगा’ भविष्यत् काल का भावबोध होगा। इस प्रकार ‘है’ के प्रयोग से ‘वह अपने घर जा रहा है’ वर्तमान काल का स्पष्ट भावबोध होता है।

वाक्य और पद दोनों भाषा की महत्त्वपूर्ण इकाइयाँ हैं। दोनों के स्वरूप और उपयोगिता से महत्त्व प्रतिपादित किया जा सकता है। दोनों इकाइयों के महत्त्व को तुलनात्मक दृष्टि से परखने के संदर्भ से दो सिद्धान्त सामने आये हैं। (1) अभिहितान्वयवाद, (2) अन्विताभिधानवाद।

अभिहितान्वयवाद

भावाभिव्यक्ति संदर्भ में पद को अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व देने के आधार पर अभिहितान्वयवाद सिद्धान्त का विकास हुआ है। पद को महत्त्व देने के आधार पर इसे पदवाद भी कह सकते हैं। इस वर्ग के विद्वानों की मान्यता है कि पदों के अन्वित प्रयोग में स्पष्ट अभिव्यक्ति और भाषा का भास्वर स्वरूप होता है। विभिन्न पदों में अन्विति और उसका प्रयोग-शक्ति विभक्तियुक्त शब्दों या पदों में होती है। पाणिनि ने ‘सुप्तिउड़न पदम्’ सूम से इस तथ्य को स्पष्ट किया है। सुप् (संज्ञा-विभक्ति) और विड्. (क्रिया विभक्ति) के योग से पद की रचना होती है। बिना पद बने शब्द का प्रयोग भाषा में संभव नहीं है। वाक्य-रचना में दो या दो से अधिक पदों की भूमिका होती है। इनमें पदों के आपस में जुड़ने या अन्विति का महत्त्व होता है; यथा -
(अ) वह गया।
(ब) वह जा रहा है।

प्रथम वाक्य में ‘वह’ सर्वनाम, एकवचन, अन्य पुरुष और पुल्लिंग (वैसे उभयलिंगी) व्याकरणिक योग्यता प्राप्त पद है। दूसरा एकवचन सर्वपुरुष, पुल्लिंग और भूतकालिक व्याकरणिक योग्यता प्राप्त पद है। इन दोनों पदों की अन्विति से पूर्ण अर्थ की अभिव्यक्ति और वाक्य-रचना हुई है।

इसी प्रकार दूसरे वाक्य में ‘वह’ पद के साथ ‘जा’ मूल क्रिया के साथ रहा (रहना) है। (होना) सहायक क्रियाओं से रचित ‘जा रहा है’ एक वचन है, अन्य पुरुष, पुल्लिंग और वर्तमान कालिक पद का प्रयोग हुआ है।

वाक्य से अधिक पद का महत्त्व स्पष्ट करते हुए कहा जा सकता है कि वाक्य चाहे एकपदीय हो या बहुपदीय, उसमें अन्विति अनिवार्य है। यह अन्वति पद की विशेषता है और यह ही भावाभिव्यक्ति का आधार है। उदाहरणार्थ -
(अ) विनोद - ‘‘तुम अपने पिताजी के साथ कल कहाँ जा रहे थे।’’
(ब) रमेश - ‘‘दिल्ली।’’

यहाँ प्रथम वाक्य कई पदों के योग से बने होने पर भी सभी में नियमानुसार अन्वति है, अर्थात् सभी पदों में ‘‘अनुकूल व्याकरणिक योग्यता है।

द्वितीय वाक्य एकपदीय है। इसमें भी परोक्ष रूप से व्याकरणिक योग्यता का आभास होना स्वाभाविक है। यदि एकपदीय वाक्य में व्याकरणिक योग्यता का अभाव हो जाए अर्थाभिव्यक्ति असंभव होगी। यहाँ ‘दिल्ली’ एकपदीय वाक्य संवादात्मक स्थिति में सामने आया है। इसी आधार पर एक पद से पूरा वाक्य (प्रयत्नलाघव आधार पर) प्रस्तुत किया जाता है-
(अ) विनोद - ‘‘तुम अपने पिताजी के साथ कल कहाँ जा रहे थे?’’
(ब) रमेश - ‘‘दिल्ली’’ (मैं अपने पिताजी के साथ कल दिल्ली जा रहा था।)

इस प्रकार पद के महत्त्व का स्पष्ट करते हुए कहा जा सकता है कि बह्म के रूप में महत्ता प्राप्त इकाई शब्द जब तक व्याकरणिक योग्यता प्राप्त कर पद नहीं बनता तब तक पूर्ण भावाभिव्यक्ति में प्रयुक्त नहीं हो पाता है।

पद के विविध रूपों में व्याकरणिक योग्यता और अन्य पदों से अन्विति से इसका महत्त्व स्पष्ट होता है। पद की संरचना को देखकर ज्ञात होता है। कि कुछ पद शून्य प्रत्यय आधार पर निर्मित होते हैं, यथा - ‘विनोद जा रहा है’ में ‘विनोद’ पद शून्य प्रत्यय आधारित है। अर्थात् शब्द के मूल रूप में ही वाक्य में प्रयुक्त है। ऊपर एकपदीय वाक्य ‘दिल्ली’ भी इसी प्रकार का है।

दूसरे प्रकार के पदों में इत्यादि का प्रयोग होता है; यथा- ‘वह कार से जा रहा है’ में ‘कार से’ में ‘से’ कारक चिह्न का प्रयोग है, तो ‘जा रहा है’ में ‘जा’ (जाना) मूल क्रिया के साथ ‘रहा’ और ‘है’ सहायक क्रियाओं का प्रयोग है।

इस प्रकार विभिन्न पदों के योग से ही वाक्य-रचना संभव होने के आधार पर पद को अधिक महत्त्व दिया गया है।

अन्वितामिधानवाद

भाषा में वाक्य को सर्वाधिक महत्त्व देने के आधार पर अन्वितामिधानवाद सामने आया है। इसी आधार पर इसे ‘वाक्यवाद’ की भी संज्ञा दे सकते हैं। इस मान्यता के समर्थक भावाभिव्यक्ति में पद की अलग सत्ता ही नहीं मानते हैं। आधुनिक भाषाविद् वाक्यवाद के ही समर्थक हैं संस्कृत के चर्चित भाषाविद् ‘भतृहरि’ ने वाक्य को महत्त्व देते हुए लिखा है-

पदे न वर्णा विद्यन्ते वर्णेष्वयवा न च।
वाक्यात् पदानामत्यन्त प्रविवेका न कश्चन।
-वाक्यपदीय (ब्रह्मकाण्ड-73)

अर्थात् जिस प्रकार वर्णों में अवयव नहीं होते हैं, पदों में वर्ण नहीं होते हैं, उसी प्रकार वाक्य में पद नहीं होते हैं। इस आधार पर यह स्पष्ट किया गया है कि वाक्य की ही सत्ता वास्तविक है, शेष वर्ण और पद काल्पनिक या अवास्तविक हैं।

इस सिद्धान्त की उत्पत्ति भाषा के उद्देश्य, पूर्ण भावाभिव्यक्ति के आधार पर हुई है। यह निर्विवाद सत्य है कि पूर्ण भावभिव्यक्ति वाक्य के आधार पर संभव है, भाषा की अन्य किसी इकाई से पूर्ण भाव प्रकट होना असंभव है; यथा -
‘ग’ (ध्वनि)
‘ग’ (वर्ण या अक्षर)
‘गोपाल’ (शब्द)
‘गोपाल घर’ (दो पद)
‘गोपाल घर जा’ (अधूरा वाक्य)
‘गोपाल घर जा रहा’ (वाक्य)

वाक्य रचना की सामान्य प्रक्रिया में ध्वनि, वर्ण, शब्द, पद और पदों के समूह से पूर्ण अर्थ तब तक नहीं प्रकट होता जब तक ‘जा रहा है’ क्रिया पद की समामिका क्रिया ‘है’ का प्रयोग नहीं होता है। समापिका क्रिया ‘है’ प्रयोग से वाक्य पूरा हुआ और पूर्ण अर्थ प्रकट होता है।

वाक्य के विभाजन से पद का स्वरूप सामने आता है, किन्तु पूर्ण सार्थकता का भाव पद से प्रकट होना असंभव है। वाक्य में विभिन्न पदों की अनुकूल अन्विति होती है। यह वाक्य की एक प्रमुख विशेषता है। अन्वितामिधानवाद के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए कह सकते हैं कि भाषा की प्रथम इकाई वाक्य है। भाषा की विभिन्न इकाइयों ध्वनि, वर्ण, अक्षर, शब्द, पद और वाक्य में प्रथम इकाई वाक्य ही है। इसका सबल प्रमाण यह है कि बच्चा जब प्रारंभ में भाषा का प्रयोग करता है तो वाक्य का ही प्रयोग करता है। प्रथम दृष्टि में उसका उच्चारण ध्वनि होता है, किन्तु चिन्तन करने पर पूर्ण सार्थक इकाई वाक्य के रूप में सामने आता है।

बच्चे द्वारा उच्चारणसंदर्भपूर्ण रूप
प् गुब्बारे देख हाथ उठाकर (पूर्ण सार्थक अभिव्यक्ति गुब्बारा दो)
आती (अशुद्ध शब्द)हाथी पर कुछ लोगों को बैठा
देखकर हाथ उठाकर बोलने पर

(हाथी पर बैठूँगा।)
टॉफी (शब्द)टॉफी को ललचाई आँखों से
देखकर
(मुझे टॉफी दे दो।)
घोड़े पर (पद)घोड़े पर बच्चा बैठा देखकर (घोड़े पर बैठा दो।)

 एक पदीय वाक्य को भ्रमवंश पद वर्ग में चर्चा करना उचित नहीं है। संवादात्मक संदर्भों में एकपदीय वाक्य पूर्ण सार्थक होते हैं। पूर्ण प्रसंगानुसार श्रोता या पाठक को स्वत: पूर्ण अर्थ की अभिव्यक्ति होती है; यथा-
मनोहर - ‘‘तुम कल लखनऊ जा रही हो?’’
शीला - ‘‘हाँ।’’

यहाँ ‘हाँ’ एकपदीय वाक्य की प्रसंग आधार पर अभिव्यक्ति होती है-’’हाँ ! मैं लखनऊ जा रही हूँ।’’ आधुनिक भाषा-विज्ञान में पूर्ण सार्थक इकाई के रूप में वाक्य को मान्यता मिलने का कारण इसे अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व प्राप्त है। यह सच है कि भाषा की उद्देश्यपूर्ण भावाभिव्यक्ति है। इसलिए वाक्य का महत्त्व स्वत: स्पष्ट है।

भाषा की समस्त इकाइयों का अपना-अपना महत्त्व है। इनमें से किसी भी इकाई की अपेक्षा नहीं कर सकते हैं। ध्वनि यदि भाषा की लघुत्तम इकाई है, तो शब्द की सार्थकता उसकी पहचान है। इसी प्रकार यदि पद व्याकरणिक योग्यता प्रापत भाषा की प्रमुख इकाई, तो पूर्ण सार्थकता वाक्य की अपनी पहचान है। वाक्य-रचना में पद की बलवती भूमिका है तो पूर्ण सार्थकता की दृष्टि से वाक्य सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इकाई है।

निकटस्थ अवयव

निकटस्थ अवयक के लिए ‘‘सन्निहित अवयव’’ नाम भी प्रयुक्त होता है। वाक्य की रचना एक या एकाधिक पदों में होती है। वाक्य में एकाधिक पद प्रयुक्त हों, तो अर्थज्ञान के लिए उनसे सम्बन्धित दो बातों पर ध्यान देते हैं।
  1. वाक्य में प्रयुक्त शब्द किन वर्गों के हैं।
  2. वाक्य में शब्दों के क्रमों का विवेचन।
शब्द या पद के निकटस्थ अवयय जानने के लिए उसके यथासम्भव खण्ड करते हैं। यदि शब्द के दो खण्ड हों, तो निकटस्थ अवयव की पहचान सरल होती है। इसमें एक दूसरे की निकटता स्वयं सिद्ध है; यथा - सफलता = सफल + ता। यदि पद के तीन खण्ड हो सकते हैं, तो उनकी आपसी निकटता विचारणीय है; यथा-अभारतीय = अ + भारत + ईय। यहाँ भारत के साथ उपसर्ग ‘अ’ और प्रत्यय ‘ईय’ प्रयुक्त है। इनके क्रमिक प्रयोग से इनकी निकटता का ज्ञान होगा। ‘भारत’ के साथ ‘ईय’ प्रत्यय का प्रारम्भिक प्रयोग सम्भव है- भारत + ईय ¾ भारतीय, किन्तु ‘‘भारत’’ के साथ उपसर्ग ‘अ’ का प्रारम्भिक प्रयोग सम्भव नहीं है। ‘भारतीय’ संरचना के बाद ‘अ’ का प्रयोग सम्भव है। इस प्रकार भारत और ईय निकटस्थ अवयव हैं -

भारत      ईय         अ  भारत   ईय


वाक्य के संदर्भ में विभिन्न पदों की निकटता विशेष महत्त्वपूर्ण होती है। उदाहरणार्थ- उसने भागते हुए चोर को पकड़ लिया।

इस वाक्य में ‘भागते हुए’ पद की भिन्न-भिन्न स्थितियों के कारण अर्थ भिन्नता आ गई है। यदि ‘भागते हुए’ पद विशेषण के रूप में प्रयुक्त है, तो ‘चोर’ पद का निकटस्थ अवयव होगा। इससे अर्थबोध होगा कि ‘चोर भाग रहा था’। यदि ‘भागते हुए’ क्रिया विशेषण है (पकड़ लिया की विशेषता प्रकट कर रहा है), तो उसने का निकटस्थ अवयव होगा। इसका अर्थ होगा - ‘‘उसने भागकर पकड़ लिया।’’ निकटस्थ अवयव विशेषण करते समय मुख्यत: दो बातों का ध्यान रखना चाहिए -
  1. निकटस्थ अवयव - विश्लेषण अर्थ के अनुकूल हो।
  2. निकटस्थ अवयव - विश्लेषण भाषा की व्यवस्था के अनुकूल हो।
वाक्य के निकटस्थ अवयव को रेखांकन से भी प्रकट कर सकते हैं; यथा-’’मेरा पत्रा तुम्हें मिल गया होगा’’ का रेखांकन इस प्रकार होगा-

मेरा - पत्र - तुम्हें  -मिल  -गया  - होगा

अर्थ - बोध की दृष्टि से वाक्य के निकटस्थ अवयवों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इनकी उन्नति से ही उपयुक्त अर्थ का बोध सम्भव है। वाक्य में निकटस्थ अवयवों की व्यवस्था मुख्यत: पदक्रम, विशेषण-विशेष्य, योग्यता और बलाघात आदि के आधार पर की जाती है। वाक्य के ‘‘निकटस्थ अवयव’’ को इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं। ‘‘अर्थ की दृष्टि से वाक्य में प्रयुक्त जो पद एक-दूसरे के निकट होते हैं, उन्हें वाक्य के निकटस्थ अवयव कहते हैं।’’
  1. पद क्रम - वाक्य की सार्थकता पदक्रम पर आधारित होती है। वाक्य के पदक्रम को उपयुक्त रूप में रखने पर वाक्य के निकटस्थ अवयवों की व्यवस्था बिगड़ जाती है; यथा-रूमा पत्रा ने रजनीश को लिखा। यहाँ हिन्दी पदक्रम के अनुसार कर्ता, कर्म क्रिया का क्रमश: प्रयोग होना चाहिए। उक्त वाक्य में ‘रूमा ने’ कर्ता, ‘पत्रा’ कर्म और ‘लिखा’ क्रिया पद का क्रमश: प्रयोग न होने से अशुद्ध वाक्य-रूप हुआ। इसका शुद्ध पद क्रम है-’’रूमा ने रजनीश को पत्रा लिखा’’ इसमें ‘पत्रा’ और ‘लिखा’ दोनों निकटस्थ अवयव हैं, जो शुद्ध पदक्रम में एक-दूसरे के निकट आ गए। 
  2. विशेषण-विशेष्य - भाषा में विशेष्य का एक साथ प्रयोग होता है। इस प्रकार दोनों शब्दों के वाक्य में एक साथ प्रयोग से उनकी निकटता और उनके निकटस्थ अवयव होने की बात भी सिद्ध होती है; यथा-यह सुन्दर फूल है। यहाँ ‘सुन्दर’ विशेषण और ‘फूल’ वाक्य में निकटस्थ अवयव हैं। हिन्दी में कभी एक विशेष्य के साथ एक विशेषण प्रयुक्त होता है, तो कभी दो विशेष्य के साथ एक ही विशेषण शब्द प्रयुक्त होता है; यथा-’’सुन्दर फूल है’’, ‘‘सुन्दर फूल और फल है।’’ यहाँ विशेषण-विशेष्य के अनुसार निकटस्थ अवयव इस प्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं- सुन्दर फूल है। सुन्दर फूल और फल है।
  3. योग्यता - वाक्य के पदों में परस्पर अन्वय की योग्यता होनी चाहिए। जब वाक्य के अवयव अर्थ की दृष्टि से ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेते हैं, तब वाक्य के निकटस्थ अवयव अपने सही रूप में व्यवस्थित होते हैं। यदि वाक्य में यह योग्यता न होगी, तो उसके निकटस्थ अवयव भी बिखरे हुए होंगे; यथा - ‘‘सफाई कर्मचारी को दस पैसे देकर जरूर जाएँ।’’ इस वाक्य में अन्वय की योग्यता न होने के कारण ‘जरूर’ और ‘देकर’ निकटस्थ अवयव बिखर गए, इससे विपरीत अर्थ की अभिव्यक्ति होती है। मूल अर्थ का सम्बन्ध पैसे जरूर देने से था, योग्यता अभाव से निकटस्थ अवयव के अनुसार वाक्य होगा-सफाई कर्मचारी को दस पैसे देकर जाएँ। इसी प्रकार ‘‘उसने एक दोहे की पुस्तक दी’’ में निकटस्थ अवयव ठीक नहीं हैं। एक दोहे की पुस्तक नहीं हो सकती। पुस्तक का निकटस्थ अवयव एक है-उसने दोहे की एक पुस्तक दी।
  4. बलाघात - वाक्य के किसी पद विशेष पर पड़ने वाले बलाघात के आधार पर भी वाक्य के निकटस्थ अवयव का निर्धारण सम्भव है। निकटस्थ अवयव के निर्धारण से सही अर्थ की अभिव्यक्ति होती है; यथा  जाओ मत बैठो। जाओ मत बैठो निश्चित और सीमित पदों में इस वाक्य में निकटस्थ अवयव के बदलने पर अर्थ भिन्न हो जाता है। प्रथम वाक्य में ‘जाओ’ और ‘मत’ निकटस्थ अवयव हैं, जिससे ‘न जाने’ और बैठने की बात प्रकट होती है, जब ‘मत’ और ‘बैठो’ निकटस्थ अवयव होते हैं, तो ‘न बैठने’ और ‘चले जाने’ का भाव प्रकट होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि बलाघात के आधार पर निकटस्थ अवयव का निर्धारण सम्भव होता है।
  5. अनुवाद - एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करने के लिए दोनों भाषाओं की वाक्य संरचना और उनके निकटस्थ अवयव का ज्ञान अनिवार्य होता है। यदि हिन्दी वाक्य ‘‘मैं आम खा रहा हूँ’’ का अंग्रेजी अनुवाद करना हो, तो अंग्रेजी वाक्य के निकटस्थ अवयवों का ज्ञान अनिवार्य है। ऐसा न होने पर वाक्य का अनुवाद अशुद्ध हो सकता है - I mango eating am - इसका शुद्ध रूप होगा - I am eating mango. मुहावरे, कहावतो के प्रयोग तथा भावानुवाद में निकटस्थ अवयव का ज्ञान अनिवार्य है; यथा- हिन्दी अंग्रेजी उसको बुखार चढ़ा है - He is laid up with fever. मैं कोई कसर बाकी नहीं रखूँगी - I will leave no stone unturned.

निकटस्थ अवयव अध्ययन की उपयोगिता

निकटस्थ अवयव के ज्ञान से वाक्य का शुद्ध उच्चारण सम्भव होता है। इसके ज्ञान के अभाव में वाक्य का शुद्ध अर्थ ग्रहण भी असम्भव हो सकता है; यथा- ‘‘रोको मत जाने दो’’ वाक्य के उच्चारण में यदि उपयुक्त निकटस्थ अवयव का आधार नहीं होगा तो सुनने वाले को ‘‘रोको मत जाने दो’’ का ‘‘रोको मत’’, ‘‘जाने दो’’ का आभास हो सकता है, और ‘‘रोको मत, जाने दो का ‘‘रोको, मत जाने दो’’ का आभास हो सकता है। निकटस्थ अवयव के ज्ञान से वाक्य के शुद्ध पदक्रम-प्रयोग का मार्ग खुलता है; यथा-मैं घर जा रहा हूँ वाक्य में यदि क्रिया को आधार बनाकर निकटस्थ अवयव विश्लेषण करें, तो दाहिने से बाएँ रेखांकन करते हैं- मैं घर जा रहा हूँ।

निकटस्थ अवयव के अध्ययन से वाक्य के विभिन्न पदों के सम्बन्धों की गहराई का ज्ञान होता है; यथा -
उस के लड़कों का घर है।

इस वाक्य में ‘उस’ और ‘के’, ‘लड़कों’ और ‘का’ के स्थिति के अनुसार निकट सम्बन्ध है अत: इसे सन्निहित घटक कहते हैं। जो स्थिति की दृष्टि से एक-दूसरे से अलग, किन्तु आपस में सम्बन्धित हों, उन्हें असन्नत घटक कहते हैं; यथा - ‘उस’ और ‘लड़कों’।

सीमाएँ - जब एक वाक्य के स्थान पर अन्य वाक्य स्थापना कर दें, तो निकटस्थ अवयव समान होंगे, कहा नहीं जा सकता है; यथा -
  1. अशोक प्रदीप को मूर्ख लगता है।
  2. अशोक प्रदीप को मूर्ख समझता है।
दोनों वाक्य समान लगते हैं, किन्तु पहले वाक्य में अशोक मूर्ख है, तो दूसरे वाक्य में प्रदीप। इसी प्रकार एक अन्य उदाहरण -
  1. मैंने तुम्हें काम करने का आदेश दिया।
  2. मैंने तुम्हें काम करने का वचन दिया।
एक से अधिक अर्थ देने वाले वाक्यों का विश्लेषण भी कई प्रकार से होता है; यथा-
  1. शुद्ध गाय का दूध शुद्ध गाय का दूध
  2. प्राचीन रेवड़ी की दुकान प्राचीन रेवड़ी की दुकान
इन दोनों वाक्यों में पूर्व रेखांकन ‘शुद्ध दूध’ और ‘प्राचीन दुकान’ का बोध होता है, तो उत्तरवर्ती रेखांकन से ‘शुद्ध गाय’ और ‘प्राचीन रेवड़ी’ का।

वाक्य की गहन संरचना और बाह्य संरचना

वाक्य भाषा की सहज इकाई है। वाक्य में शब्द किसी न किसी रूप में अवश्य जुड़े होते हैं। वाक्य की इस व्यवस्था को केन्द्रिक रूप कहते हैं। पदों के आधार पर हुई वाक्य की समस्त रचनाओं को गहन और बाह्य दो संरचना-भागों में विभक्त करते हैं। ये व्यवस्थाएँ सभी भाषाओं में मिलती हैं।

गहन और बाह्य कल्पना नई नहीं है। संस्कृत व्याकरण के सामाजिक संदर्भ में ऐसी रचनाएँ स्पष्ट रूप से मिलती हैं। इनसे सम्बन्धित रचना-प्रक्रिया को समास-विग्रह से समझ सकते हैं। ‘पीताम्बर’ शब्द के दो विग्रह सम्भव हैं। प्रथम, पीत अम्बर (पीला कपड़ा) कर्मधारण समास। यह गहन संरचना है। द्वितीय, वह जो पीत अम्बर (पीला कपड़ा) धारण करता है। अर्थात् कृष्ण-बहुब्रीहि समास। इसमें दोनों पदों से भिन्न (बाहर से) अर्थ लगाया गया है। अत: बाह्य रचना है।

गहन संरचना

इसको अन्त: केन्द्रिक, अन्त: मुखी संरचना भी कहते हैं। अंग्रेजी में इसके लिए (Deep Structure) नाम भी चलता है। वाक्य के घटक शब्दों या अनुक्रमिक रूप से लघुत्तर घटकों में से किसी एक से समानाथ्री या निकट समानाथ्री होना गहन रचना है, अर्थात् जब किसी वाक्य का पद-समूह उतना ही काम करता है जितना कि वाक्य के एक या अधिक निकटस्थ अवयव करते हैं, तो उसे गहन (वाक्य) रचना कहेंगे। ऐसे वाक्यों का केन्द्र वाक्य के मध्य होता है; यथा -

‘‘यह फूल है’’ और ‘‘यह सुन्दर फूल है’’ दोनों वाक्य स्तर की दृष्टि से समान हैं। इस प्रकार ‘सुन्दर फूल’ के स्थान पर ‘फूल’ का प्रयोग हो सकता है, जिसे रचना केन्द्र मान सकते हैं। यहाँ ‘सुन्दर’ और ‘फूल’ दो पदों से बने पद-समूह का गठन मात्रा एक पद ‘फूल’ के समान है। अत: यह वाक्य गहन होगा। गहन वाक्यों को दो भागों में विभक्त कर सकते हैं -
  1. आश्रित - जब किसी वाक्य में एक पद मुख्य (केन्द्र) हो और दूसरा पद किसी न किसी प्रकार उसकी विशेषता प्रकट करता हो; यथा-’’यह सुन्दर लता है’’, ‘‘वह बड़ा वृक्ष है।’’ इन वाक्यों में ‘लता’ और ‘वृक्ष’ केन्द्र हैं, उनके साथ प्रयुक्त पद ‘सुन्दर’ और ‘बड़ा’ विशेषण हैं, जिनसे वाक्य-केन्द्र की विशेषता प्रकट होती हैं। ऐसे वाक्यों का भाषा में विशेष महत्त्व है।
  2. समानाधिकरण - जब गहन वाक्यों में दो पद और, तथा, व आदि संयोजक शब्दों में से किसी एक से जुड़े हों तो योजक समानाधिकरण गहन रचना कहेंगे; यथा-’’फूल और फल लाए हो’’, ‘‘शेर और भालू भाग रहे हैं।’’
जब गहन वाक्य का एक पद दूसरे पद की व्याख्या करता है, तो उसे व्याख्यात्मक समानाधिकरण वाक्य कहेंगे; यथा - ‘‘वे देवराज प्रयाग गए हैं’’, ‘‘तुम देवाधिदेव इन्द्र की पूजा करो।’’ गहन वाक्यों को पदों की व्यवस्था के अनुसार निम्नलिखित वर्गों में विभक्त कर सकते हैं -
  1. विशेषण + संज्ञा श्वेत वस्त्रा, काली कलम।
  2. क्रिया विशेषण + क्रिया खूब दौड़े, खूब गाया।
  3. क्रिया विशेषण + विशेषण अति सुन्दर, बहुत अच्छा।
  4. संज्ञा + विशेषण उपवाक्य - पुष्प, जो खिल गया था। फल जो अधपका था।
  5. सर्वनाम + विशेषण उपवाक्य - वह, जो भागा जा रहा था।
  6. सर्वनाम + पूर्व सर्गात्मक वाक्यांश - वे नाव पर, वह छत पर।
  7. क्रिया + क्रिया विशेषण + उपवाक्य - जाओ, जहाँ कार खड़ी है। गया, जहाँ फूल खिले हैं।
  8. संज्ञा + संयोजक + संज्ञा - विजय और वेद जी हैं। प्रशांत और मयंक गए।

बाह्य संरचना

इसे बहिष्केन्द्रिक, बहिर्मुखी संरचना भी कहते हैं। वाक्य के घटक शब्दों या अनुक्रमिक रूप से लघुत्तर घटकों में से किसी एक से समानाथ्री या निकट समानाथ्री न हों, अर्थात् जब वाक्य का अंश अपने निकटतम अवयव के अनुरूप कार्य न कर सके तो बाह्य संरचना होती है; यथा- ‘‘कलम से लिखो’’ वाक्य में ‘कलम से’ कार्य न तो मात्रा ‘कलम से’ पूरा होता है और न ही ‘से’। यहाँ ‘कलम’ और ‘से’ दोनों का प्रयोग की अनिवार्यता अनुभव होती है। यदि इनमें से किसी एक को छोड़ दें, तो वाक्य अपूर्ण रहेगा। इस प्रकार यह कह सकते हैं कि ‘कलम’ और ‘स’ अत: यह बाह्य संरचना है।
बाह्य संरचना के रूपों को ध्यान में रखकर निम्नलिखित वर्ग बना सकते हैं -
  1. संज्ञा/सर्वनाम + परसर्ग - स्नेह ने उस को
  2. विशेषण + संज्ञा (दोनों मिलकर) (विशेष अर्थ की अभिव्यक्ति करें) - लम्बोदर (लम्बा + उदर झ गणेश)(नील + कंठ झ शिव)
विधेयेयात्मक -
  1. कर्ता + कर्म + सकर्मक क्रिया - राधा पानी पीती है। शशांक अंगूर देखता है।
  2. कर्ता + अकर्मक क्रिया - वृद्ध सोता है, वह दौड़ता है।
  3. कर्ता + पूरक + योजी क्रिया - सागर चालक है।
हिन्दी में बाह्य संरचना, ऐसे सामाजिक शब्दों में देख सकते हैं, जिनका न तो पूर्व पद प्रधान होता है, और न ही उत्तर पद। इसमें अन्य पद की प्रधानता होती है अर्थात् ऐसे शब्दों का अर्थ बाहरी तल से किया जाता है; यथा-लम्बोदार-(लम्बा उदर)। जब लम्बा और उदर दोनों पद गौण होते हैं, तो इसका अर्थ होता है-’’लम्बा है उदर जिसका अर्थात् गणेश जी।’’ इस विशेष अर्थ की अनुभूति के लिए दोनों पदों की अनिवार्यता स्वयं सिद्ध है। इसी प्रकार नीलकंठ, पीताम्बर, दशानन आदि में बाह्य संरचना है।

हिन्दी में ऐसे वाक्य प्रस्तुत होते हैं, जिनका अर्थ व्यंजना या लक्षणा शब्द-शक्ति से निकालते हैं। यहाँ अर्थ किसी शब्द या पद में निहित न होकर वाक्य के बाहरी तल से प्रकट होता है; यथा-
मेरा घर नदी पर है। (नदी के तट पर है।)
मेरा स्कूल सड़क पर है। (सड़क के किनारे है।)

सभी भाषाओं में गहन रचना बाह्य रचना से अधिक होती है, किन्तु सीमित प्रयोग होने पर भी बाह्य रचना का अपना महत्त्व है।

गहन संरचना का मूलाधार है। गहन संरचना अर्थ अभिव्यक्ति करती है, तो बाह्य संरचना उसे विशेष रूप देती है। बाह्य संरचना से अभिधा, लक्षणा तथा व्यंजना शब्द शक्तियों के माध्यम से कई अर्थ निकाले जाते हैं; यथा- ‘‘अँधेरा हो गया’’ वाक्य से संदर्भ-अनुसार कई अर्थ निकलते हैं-दिन समाप्त के संदर्भ में ‘रात्राी’, आदमी के सामने विषम परिस्थिति हो तो उसके लिए कुछ भी समझ में न आना’’ आदि। इसी प्रकार ‘घण्टी बजने’ के अनेक अर्थ हैं; यथा-स्कूल जाते बच्चे के लिए पढ़ाई का समय, पढ़ते समय से छुट्टी का समय, मन्दिर में पूजा का समय, मरणासन्न व्यक्ति के लिए मौत।

प्रत्येक भाषा में गहन तथा बाह्य संरचना भिन्न-भिन्न प्रकार से होती है। अंगेजी में I ran (मैं दौड़ा) बाह्य संरचना है। सर्वनाम और क्रिया के आधार पर बने इस वाक्य के मात्रा क्रिया या मात्रा सर्वनाम पद से भाव-अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है। अंगे्रजी में भी हिन्दी के समान केवल क्रिया-पद से बाह्य समानाथ्री वाक्य बनाते हैं, किन्तु संदर्भ आधार मिलाने पर ही ऐसा सम्भव होता है। यह स्थिति सामान्यत: बातचीत में होती है; यथा-
"What are you doing there?"
"Reading"

वाक्य की आथ्री-संरचना को बाह्य संरचना से सम्बन्धित मान सकते हैं। यह अर्थ की अभिव्यक्ति करती है। गहन संरचना में व्याकरणिक घटक भी आते हैं। इससे स्पष्ट है कि गहन संरचना में भाषा के आधारभूत वाक्य होते हैं, बाह्य संरचना विशेष भावाभिव्यक्ति का आधार है।

वाक्य-रूपान्तरण के नियम

इसे वाक्य-परिवर्तन की दिशाएं भी कहते हैं। मानवीय भाषा की प्रमुख विशेषता है-उत्पादकता। मनुष्य एक ही भाव को अनेक रूपों में प्रस्तुत कर सकता है। इसी से भाषा में गतिशीलता है। विश्व की समस्त भाषाओं में सतत परिवर्तन चलता रहता है। यह परिवर्तन भाषा की विभिन्न इकाइयों के माध्यम से स्पष्ट होता है। भाषा-परिवर्तन में वाक्य-परिवर्तन की विशेष भूमिका होती है। वाक्य के संरचनात्मक परिवर्तन से उसके प्रयोग में भी परिवर्तन होता रहता है। जब भाव की अभिव्यक्ति नए वाक्य-रूपों में और आकर्षक रूप में करने का प्रयत्न किया जाता है, तो वाक्य में परिवर्तन हो जाता है। हिन्दी वाक्यों में रूपान्तरण को मुख्यत: दो वर्गों में विभक्त करते हैं -
साधारण रूपान्तरण, साधारणीकृत रूपान्तरण।

साधारण रूपान्तरण - 

हिन्दी व्याकरण के नियमों के आधार पर निषेधात्मक, प्रश्नवाचक, विस्मयादिबोधक तथा वाच्यात्मक वाक्य रूपान्तरण इसके अन्तर्गत आते हैं। वाक्य रूपान्तरण में अर्थ पूर्ववत् रहना चाहिए; यथा -
निषेधेधात्मक - वह अच्छा लड़का है - वह बुरा लड़का नहीं है।
प्रश्नवाचक - यहाँ सब की मौत होगी - यहाँ किसी की मौत नहीं होगी?
विस्मयादिबोधक - बहुत सुहाना मौसम है - क्या सुहाना मौसम है!
वाच्य - मैं पुस्तक पढ़ता हूँ। - मेरे द्वारा पुस्तक पढ़ी जाती है।

साधरणीकृत रूपान्तरण - 

जब जटिल वाक्य को साधारण या सरल वाक्य में परिवर्ततन करते हैं, तो साधारणीकृत रूपान्तरण होता है। इस रूपान्तरण में दोनों उपवाक्यों को एक कर एक ही क्रिया का प्रयोग करते हैं; यथा -
तुम्हारी जेब में कलम है। कलम मेरी है। झ तुम्हारी जेब में मेरी कलम है।
बच्चा रो रहा है। बच्चा उठाओ। झ रोते हुए बच्चे को उठाओ।
मिश्र वाक्य रूपान्तरण के लिए जैसे........जब.......तब........, ज्यों ही........त्यों ही, आदि का प्रयोग करते हैं। वाक्य के रूपान्तरण नियमों के साथ रूपान्तरण की कुछ प्रमुख दिशाएँ इस प्रकार हैं-
  1. पदक्रम में परिवर्तन - भाषा में नवीनता लोने के लिए वाक्य के पदक्रम में परिवर्तन करते हैं। काव्य-रचना में यह प्रक्रिया पहले से चली आ रही है, किन्तु वर्तमान समय के गद्य-लेखन और बोल-चाल में भी यह प्रवृति सशक्त रूप में सामने आ रही है। पहले विशेष्य के पूर्व विशेषण का प्रयोग होता था, किन्तु अब विशेष्य का प्रयोग विशेषण से पहले होने लगा है; यथा- ऐतिहासिक तथ्य, उत्तम बातें, दिव्य भवन आदि के स्थान पर ‘तथ्य ऐतिहासिक’, ‘बातें उत्तम’, ‘भवन दिव्य’ का प्रयोग होने लगा है। सामान्यत: हिन्दी में नियमानुसार कर्ता, कर्म और क्रिया का क्रमश: प्रयोग होता है, किन्तु वर्तमान समय की विशेष स्थिति में इसके विपरीत प्रयोग प्रचलित हो गए हैं; यथा - पहले के वाक्यों ‘वह दिल्ली का राज था’, ‘उसके पास पिस्तौल थी’, ‘एक दिन की बात है’ का आज प्रयोग इस प्रकार होता है-’दिल्ली का राजा था वह’, ‘पिस्तौल थी उसके पास’, ‘बात एक दिन की है’।
  2. अन्वय में परिवर्तन - संस्कृत भाषा में विशेष्य और विशेषण की अन्विति पर ध्यान देना आवश्यक है; यथा-विद्वान पुरुष:, विदुषी नारी, शोभन: बालक:, शोभना बाला। हिन्दी में पहले संस्कृत के ही समान पूजनीय पिता जी, पूजनीय माता जी, पूज्य भ्राता जी, पूज्य भाभी जी का प्रयोग होता था, किन्तु वर्तमान समय में दोनों ही लिंगों में एक ही शब्द का प्रयोग चलने लगा है; यथा-पूजनीय पिता जी, पूजनीय माता जी, पूज्यनीय भ्राता जी, पूज्यनीय भाभी जी आदि। संस्कृत के क्रिया पदों में लिंग-भेद नहीं होता है; यथा-’श्याम: पठती’, ‘सविता पठति’। हिन्दी में क्रिया-पद लिंग के अनुसार प्रयुक्त कतरे हैं; यथा-’श्याम पढ़ता है’। ‘सविता पढ़ती है’। 
  3. अधिक पद-प्रयोग - वर्तमान समय में हिन्दी के वाक्यों में अतिरिक्त पदों का प्रयोग होने लगा है। बोल-चाल में ऐसे प्रयोग पर्याप्त रूप से मिलते हैं। व्याकरण की दृष्टि से दूसरे वाक्य अशुद्ध हैं, किन्तु प्रयोग मिलते हैं - शुद्ध घी झ विशुद्ध घी झ बिल्कुल विशुद्ध घी तुम मुझसे क्या कह रहे हो झ तुम मेरे से क्या कह रहे हो? अपर्णा लिखती और पढ़ती है झ अपर्णा लिखती है और पढ़ती है। आज सोमवार है झ आज सोमवार का दिन है।
  4. आदरार्थ परिवर्तन - संस्कृत और हिन्दी भाषाओं में आदर देने के लिए एकवचन कर्ता के साथ बहुवचन क्रिया और सर्वनाम आदि का प्रयोग किया जाता है; यथा--
    1. क: अत्रा भवन्त:।
    2. पिता जी आज शिमला जा रहे हैं।
    3. मेरे गुरू जी आज पानीपत आ रहे हैं।
    4. दशरथ के पुत्रा श्री रामचन्द्र जी अयोध्या के राजा थे।
  5. पद या प्रत्यय-लोप - विभिन्न भाषाओं में कभी-कभी मुख-सुख या प्रयन्नलाघव के कारण पद या प्रत्यय का लोप हो जाता है। इस प्रकार वाक्य में परिवर्तन होता है; यथा -
    1. त्वं गच्छ > गच्छ, त्वं पठ > पठ
    2. अहं गच्छामी > गच्छामी, अहं पठामी > पठामी।
    3. हिन्दी की बोल-चाल और लिखित भाषा में ऐसे प्रयोग मिलते हैं; यथा -
    4. मैंने पुस्तक रख ली है झ मैंने पुस्तक रख ली।
    5. मैं नही जा रहा हूँ झ मैं नहीं जा रहा।
    6. आँखों से देखी घटना बताता हूँ झ आँखों देखी घटना बताता हूँ।
  6. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कथन - हिन्दी में प्रत्यक्ष कथन के अप्रत्यक्ष रूप में परिवर्तन की प्रक्रिया अब बदल चुकी है। वाक्य का यह परिवर्तित रूप अंग्रेजी के प्रभाव से सामने आया है, यथा-’रमेश ने कहा कि मैं तुम्हारे पास आऊँगा’ वाक्य का प्रयोग इस प्रकार होता है- ‘रमेश ने कहा कि वह मेरे पास आएगा।’ इसी प्रकार ‘महेश ने कहा कि मैं पढ़ रहा हूँ’ वाक्य का अब प्रयोग इस प्रकार होता है-’महेश ने कहा कि वह पढ़ रहा था’
  7. कोष्ठक-प्रयोग - वाक्य के किसी तथ्य को स्पष्ट करने के लिए कोष्ठक में उपवाक्य का प्रयोग किया जाता है। इससे भी वाक्य की रचना में भिन्नता आ जाती है; यथा- ‘गुरू जी ने (सर पर हाथ रखकर) आश्रीवाद दिया’, ‘वह उन दिनों (दिल्ली-स्थित) जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था’, ‘उसने जब मुझसे (रोते हुए) कहा, तो मुझे दया आ गई।’
  8. कारक-स्थान पर अल्प विराम-प्रयोग - हिन्दी वाक्य-संरचना पर अंगे्रजी वाक्य संरचना का विशेष प्रभाव पड़ा है। हिन्दी वाक्यों में कारक-लोप और उनके स्थान पर अल्पविराम का प्रयोग अंग्रेजी-प्रभाव की देन है; यथा - हिन्दी विभाग के अध्यक्ष आ रहे हैं। झ अध्यक्ष, हिन्दी विभाग के आ रहे हैं। हिन्दी मंच के अध्यक्ष हैं। झ अध्यक्ष, हिन्दी मंच हैं।

वाक्य परिवर्तन के कारण

भाषा की विभिन्न इकाइयों में परिवर्तन का क्रम चलता रहता है। वाक्य की संरचना में भी परिवर्तन चलता रहता है, इन परिवर्तनों के मुख्य कारण हैं -

मुख-सुख

मनुष्य थोड़े परिश्रम से अधिक से अधिक कार्य करना चाहता है, उसे ही मुख-सुख या प्रयत्नलाघव कहते हैं। इसी प्रयत्न में मनुष्य छोटे-छोटे वाक्य से विस्तृत भाव प्रकट करना चाहता है। इस प्रकार कभी वाक्य के पद या प्रत्यय का लोप होता है, तो कभी पदक्रम में परिवर्तन हो जाता है। यह वाक्य-परिवर्तन का प्रमुख कारण है।

अन्य भाषा-प्रभाव

विभिन्न भाषाओं के प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव से वाक्य में परिवर्तन होता रहता है। जब कोई व्यक्ति अपनी भाषा के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा का प्रयोग करता है, तो उस भाषा की वाक्य रचना के अनुसार वह अपनी भाषा से भी वाक्य बनाने लगता है। संस्कृत में ‘अर्थ’ और ‘इति’ के प्रयोग आधार पर रचना की जाती थी। अब उसके स्थान पर उद्धरण चिह्न का प्रयोग किया जाता है; यथा-’’अहं आगमिष्यामि’’। हिन्दी वाक्य-रचना पर अंग्रेजी और फारसी का प्रबल प्रभाव है। लम्बे वाक्यों में ऐसी रचना मिलती है; यथा -
‘संगीता ने कहा है मैं जाऊँगी झ ‘संगीता ने कहा कि वह जाएगी’।
अंग्रेजी प्रभाव के कारण हिन्दी में ऐसी रचना मिलती है।

स्पष्टता

हम अपनी बात करने के लिए वाक्य में कुछ न कुछ परिवर्तन कर लेते हैं। परिवर्तन की इस प्रक्रिया में कभी एक ही वाक्य में कई उपवाक्य आ जाते हैं, तो कभी वाक्य के किसी पद के साथ कोष्ठक में स्पष्टतासूचक शब्द प्रयोग करते हैं।

बलाघात

वक्ता जब वाक्य के किसी पदविशेष पर बल देना चाहता है, तो उस पर बलाघात की स्थिति होती है। इस प्रक्रिया के कारण वाक्य-गठन में परिवर्तन होता है; यथा-
सुरेन्द्र घर जा रहा है। (सामान्य वाक्य)
घर जा रहा है सुरेन्द्र। (यहाँ ‘घर’ शब्द का बल दिया गया है)
जा रहा है घर, सुरेन्द्र। (यहाँ ‘जा रहा है’ पर बलाघात है)
वक्ता वाक्य के जिस अंश पर बल देना चाहता है, उसे वाक्य में सबसे पहले रखता है।

विभक्तियों का घिसना

प्राचीन भाषाओं संयोगात्मक रूप में थी। विकास-क्रम में उनका रूप वियोगात्मक हो गया है। विभक्तियों और प्रत्ययों का कार्य परसर्गों तथा सहायक क्रियाओं से लिया जाता है। इस प्रकार वाक्य में परिवर्तन हो जाता है। संयोगात्मक भाषा के वाक्य के पदक्रम में परिवर्तन कर सकते हैं, किन्तु वियोगात्मक भाषा का पदक्रम स्थिर होता है।

मानसिक स्थिति

वाक्य-संरचना पर वक्ता और लेखक की मन:स्थिति का विशेष प्रभाव पड़ता है। शान्त या सामान्य मन:स्थिति में अलंकृत भाषा का प्रयोग होता है, तो दु:ख, शोकादि के अवसर पर छोटे-छोटे, सरल वाक्यों का। इस प्रकार मन:स्थिति के कारण वाक्य में परिवर्तन होना स्वाभाविक है।

नवीनता

मनुष्यता स्वभाव से ही नवीनता प्रेमी है। इस प्रवृति के कारण वाक्य में भी परिवर्तन हो जाता है। आजकल हिन्दी में यह प्रवृति विशेष रूप से चल पड़ी है; यथा-’एक कबाड़ी की दुकान’ का ‘दुकान एक कबाड़ी की’, ‘दाम सौ रुपए मात्रा’ का ‘दाम मात्रा सौ रुपए’ प्रयोग होने लग गया है।

भावुकता

भावुकता के कारण भी वाक्य में परिवर्तन होता है। जब वक्ता या लेखक विशेष भाव-प्रवाह में बोलता या लिखता है, तो उसके वाक्य में कर्ताद्व कर्म और क्रिया की सैद्धान्तिक व्यवस्था न होकर विचित्रा-सी संरचना होती है; यथा -
वाह रे माधुर्य! वाह रे लज्जा! धिक् बेहया! आदि

अज्ञानता

अज्ञानता के कारण भी वाक्य में परिवर्तन हो जाता है; यथा-
बाजार खुल रहा है झ बाजार खुल रही है।
ट्रक जा रहा है झ ट्रक जा रही है।
वह रिक्शा से घर जा रहा है झ वह रिक्शा से जा रही है।

परम्परा प्रभाव

हिन्दी का उद्भाव संस्कृत भाषा से हुआ है। हिन्दी में संस्कृत के परम्परागत गुण हैं। वर्तमान समय में हिन्दी प्रयोग में पर्याप्त नवीनता आ रही है, किन्तु हम किसी न किसी रूप में परम्परा से जुड़े हैं। आदर-संदर्भ में एकवचन कर्ता के साथ क्रिया तथा सर्वनाम आदि का बहुवचन रूप में प्रयुक्त होता है।

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