वाक्य की परिभाषा एवं प्रकार

अनुक्रम
भाषा का मुख्य कार्य अभिव्यक्ति है। भाव की पूर्ण अभिव्यक्ति वाक्य के माध्यम से होती हैं। वाक्य के अभाव में भाव या विचार की स्थिति संदिग्ध हो जाएगी। वास्तव में भाव मन में अव्यक्त वाक्य के रूप में विद्यमान होते हैं, ध्वनि-प्रतीकों या लिपि-चिह्मों का आधार पाने पर वाक्य का व्यक्त रूप सामने आता है। इस प्रकार कह सकते हैं कि मनुष्य जो भी सोचता या अभिव्यक्त करता है, वह सब वाक्य के ही माध्यम से होता है। भावाभिव्यक्ति सन्दर्भ में वाक्य भाषा की सहज तथा प्रथम इकाई है।

वाक्य की परिभाषा

वाक्य की परिभाषा - समय-समय पर विभिन्न विद्वानों ने वाक्य की परिभाषा की है। कुछ प्रमुख भारतीय विद्वानों की परिभाषाएँ उद्धत हैं -

1. पंतजली ने महाभाष्य में वाक्य की परिभाषा इस प्रकार की है - ‘‘आख्यात साव्यकारक विशेषण वाक्यम्।’’ अर्थात् जहाँ क्रिया अव्यय, कारक तथा विशेषण पद एकत्रा हों, उसे वाक्य कहते हैं।

2. आचार्य विश्वनाथ ने साहित्य-दर्पण में लिखा है- ‘‘वाक्यं स्याद् योग्य ताकांक्षासक्तियुक्त: पदोच्चय:।’’ अर्थात् पदों का वह समूह जो योग्यता, आकांक्षा और आसक्ति से युक्त हो, उसे वाक्य कहते हैं।

3. डॉ. भोलानाथ ने भाषा विज्ञान में वाक्य की परिभाषा इस प्रकार की है ‘‘वाक्य भाषा की सहज इकाई है, जिसमें एक या अधिक शब्द हों, जो अर्थ की दृष्टि से पूर्ण हो या अपूर्ण व्याकरणिक दृष्टि से अपने विशिष्ट संदर्भ में अवश्य पूर्ण होती है, साथ ही परोक्ष रूप से कम से कम एक क्रिया का भाव अवश्य होता है।’’

4. हिन्दी के प्रसिद्ध वैयाकरण पं. कामताप्रसाद गुरू ने ‘हिन्दी व्याकरण’ में वाक्य की परिभाषा इस प्रकार दी है - ‘‘प्रत्येक पूर्ण विचार को वाक्य और प्रत्येक भावना को शब्द कहते हैं।’’

5. आचार्य देवेन्द्रनाथ के अनुसार, ‘‘भाषा की न्यूनतम पूर्ण सार्थक इकाई वाक्य है।’’ डॉ. देवेन्द्रनाथ ने ध्वनि, पद और वाक्य के आपसी सम्बन्धों को रेखांकित करते हुए कहा है - ‘‘वाक्य पूर्णत: मानसिक या मनोवैज्ञनिक तत्त्व है। उसमें पदों का प्रयोग भाव या विचार के अनुसार होता है। पद, ध्वनि और वाक्य के बीच की संयोजन कड़ी है, क्योंकि उसमें उच्चारण और सार्थकता दोनों का योग रहता है किन्तु न तो ध्वनि की तरह वह केवल उच्चारण है और न वाक्य की तरह पूर्णत: सार्थक।

6. डॉ. कपिलदेव द्विवेदी ने ध्वनि, पद वाक्य और वाक्य के सत्, चित् और आनन्द रूपों में स्वीकार करते हुए कहा है - ध्वनि, भाषा का शारीरिक तत्त्व, प्राकृतिक तत्त्व की प्रधानता के कारण प्रकृति के तुल्य ‘सत्’ है। पद में शारीरिक और मानसिक दोनों तत्त्व हैं, सत् के साथ चित् भी है, अत: आनन्द या ‘सच्चिदानन्द’ रूप है की पूर्ण प्रधानता के कारण अभिव्यक्ति रूप है, अत: आनन्द या ‘सच्चिदानन्द’ रूप है।

7. डॉ. जाल्मन दीमशित्स ने ‘हिन्दी व्याकरण’ में कहा है-’’वाक्य वाक्-क्रिया की एक समग्र इकाई के नाते वाक्य के लिए लाक्षणिक है, विधेयता, प्रकारता तथा अनुतान में पूणता।’’

8. अरस्तु के अनुसार ‘‘वाक्य सार्थक घ्वनियों का समूह है, जिससे किसी भाव की अभिव्यक्ति होती है। प्रत्येक वाक्य संज्ञा और क्रिया से बनता है, किन्तु क्रिया के बिना भी वाक्य रचना हो सकती है।

वाक्य के प्रकार

विभिन्न आधारों पर वाक्य के अनेक भेद बताए गये हैं-

  1. आकृति के आधार पर,
  2. संरचना के आधार पर,
  3. शैली के आधार पर,
  4. क्रिया के आधार पर तथा
  5. अर्थ के आधार

आकृति के आधार पर

वाक्यों की आकृति के आधार पर उनके दो भेद माने जाते हैं, अयोगात्मक तथा योगात्मक। आगे चलकर योगात्मक वाक्यों के भी तीन भेद हो जाते हैं, श्लिष्ट योगात्मक, अश्लिष्ट योगात्मक तथा प्रश्लिष्ट योगात्मक। इस प्रकार पद-विन्यास अथवा आकृति के आधार पर वाक्य के चार प्रकार हो जाते हैं- (अ) अयोगात्मक, (ब) श्लिष्ट योगात्मक, (स) अश्लिष्ट योगात्मक तथा (द) प्रश्लिष्ट योगात्मक वाक्य। इन्हें क्रमश: इस प्रकार देखा जा सकता है।

(अ) अयोगात्मक वाक्य-इन वाक्यों में सभी शब्दों की स्वतंत्र सत्ता होती है। यहाँ पदों की रचना प्रकृति-प्रत्यय के योग से नहीं की जाती। प्रत्येक शब्द का अपना निश्चित स्थान होता है और इसी आधार पर इनका व्याकरणिक सम्बन्ध जाना जाता है। चीनी भाषा अयोगात्मक वाक्यों के लिए प्रसिद्ध है। इस भाग में पदों का स्थान ही व्याकरणिक सम्बन्ध का बोध कराता है। यथा-

न्गो-ता-नी = मैं तुमको मारता हूँ।
नी-तान-न्गो = तुम मुझे मारते हो।

(ब) श्लिष्ट योगात्मक वाक्य-जहाँ पदों की रचना विभत्तिफयों की सहायता अथवा योग से की जाय, उन्हें श्लिष्ट योगात्मक वाक्य कहते हैं। यहाँ विभत्तिफ धातु के साथ इस प्रकार संश्लिष्ट हो जाती है कि दोनों का अस्तित्व अलग-अलग नहीं जान पड़ता है। प्रत्ययों का अस्तित्व एकदम समाप्त हो जाता है। उत्तफ विभत्तिफयाँ अन्तर्मुखी होती हैं। यथा-’’जैदुन अम्रन जरब अ’’ (जैद ने अमर को मारा) लेकिन संस्कृत की विभत्तिफयाँ बहिर्मुखी होती है। यथा ‘राघव: गृहं गच्छति’, ‘मोहन: मृगं पश्यति’ आदि।

(स) अश्लिष्ट योगात्मक वाक्य –जिन वाक्यों की रचना प्रत्ययों के योग से होती है, उन्हें अश्लिष्ट योगात्मक वाक्य कहते हैं। प्रत्यय पदों के पूर्व मध्य और अन्त में प्रयुत्तफ किये जाते हैं। तुर्की भाषा विशेषत: प्रत्यय प्रधान है। संस्कृत में प्रत्यय शब्द के अन्त में प्रयुक्त किये जाते हैं। कृत्रिम भाषा ‘एस्पैरेन्तो’ में भी प्रत्यय प्रधान भाषा के दर्शन यदा-कदा हो जाते हैं।

(द) प्रश्लिष्ट योगात्मक वाक्य-जब अनेक शब्दों के योग से एक ऐसा सामासिक पद बन जाय कि उसी से वाक्य का बोध होने लगे, तब वाक्य प्रश्लिष्ट योगात्मक कहलाता है। इन वाक्यों में कर्त्ता, कर्म, क्रिया सभी एक पद में इस प्रकार गुंथे हुए होते हैं कि, पूरा वाक्य एक शब्द प्रतीत होता है। दक्षिणी अमेरिका की चेराकी भाषा में इस प्रकार के वाक्य मिल जाते हैं। यथा- अमोखल = नाव, नातेन = लाओ, निन = हम इन शब्दों के मेल से बने वाक्य ‘नाधोलिनिन’ का अर्थ है-’’हमारे लिए एक नाव लाओ।’’

संरचना के आधार

वाक्य-रचना के आधार पर वाक्य के तीन भेद होते हैं। (क) साधारण अथवा सरल वाक्य (Simple sentence) (ख) संयुक्त वाक्य (Compoundsentence) तथा (ग) मिश्र तथा जटिल वाक्य (Complex sentence)।

(क) साधारण अथवा सरल वाक्य-जिस वाक्य में केवल एक कर्त्ता तथा एक क्रिया होती है, उसे साधारण अथवा सरल वाक्य कहते हैं। यथा राम वृक्ष पढ़ता है। मुरारी खेती करता है।

(ख) संयुक्त वाक्य-कुछ सरल वाक्यों अथवा सरल एवं मिश्र वाक्यों अथवा मिश्र एवं मिश्र वाक्यों को परस्पर जोड़ने से संयुक्त वाक्य बनता है। इसे बिना किसी बाधा के तोड़कर खण्डों अथवा विभागों में विभक्त कर सकते हैं। यथा ‘तुम जाओ और अपने पिताजी से कहना’। इस वाक्य में दो सरल वाक्य हैं-’तुम जाओ’। ‘अपने पिताजी से कहना’। इन दोनों वाक्यों को ‘और’ से जोड़कर संयुक्त वाक्य बनाया गया है। आगे एक मिश्र और सरल वाक्य को जोड़कर बने संयुक्त वाक्य का उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है-’’मैं तुम्हारे पास आऊँगा, क्योंकि तुमसे एक जरूरी काम है, पर तुरन्त लौट भी जाऊँगा।

(ग) मिश्र वाक्य-जिस वाक्य में दो वाक्य खण्ड जुड़े हों तथा एक वाक्य दूसरे पर पूरी तरह निर्भर करता हो, वह मिश्र वाक्य कहलाता है। मिश्र वाक्य संयुक्त वाक्य से पूरी तरह भिन्न होता है, क्योंकि मिश्र वाक्य में प्रथम वाक्यांश के बाद दूसरे की आकांक्षा बनी रहती है, जबकि संयुक्त वाक्य के प्रत्येक अंश में पृथक-पृथक आकांक्षा की पूर्ति हो जाती है। मिश्र वाक्य के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-उसने कहा कि मैं जाऊँगा। भैंस भीग रही है, क्योंकि वर्षा हो रही है। अध्यापक मेहनत से पढ़ा रहे हैं, क्योंकि बच्चों की परीक्षा सन्निकट है।

शैली के आधार पर

शैली का आशय यहाँ रचना-शैली से है। शैली के आधार पर वाक्य के तीन प्रकार बताये गये हैं। (अ) शिथिल वाक्य, (ब) समीकृत वाक्य तथा (स) आवर्तक वाक्य

(अ) शिथिल वाक्य-जब कोई लेखक अथवा वत्तफा बिना अलंकार का सहारा लिए किसी बात को सीधे-सादे ढंग से कहे तो उसे शिथिल वाक्य कहते हैं। यथा-’राम, सीता और लक्ष्मण जंगल में जा रहे थे। राम आगे, सीता बीच में तथा लक्ष्मण सबसे पीछे थे। कुछ दूर आगे जाने पर सीता को प्यास और थकान महसूस हुई। उन्होंने राम से पूछा-आप पर्णकुटी कहाँ बनायेंगे।

(ब) समीकृत वाक्य-साम्य मूलक अथवा वैषम्यमूलक संगति के द्वारा वत्तफा जब अपने भावों को व्यत्तफ करता है, तब उसे समीकृत वाक्य कहते हैं। समीकृत वाक्य के उदाहरण हैं, ‘जैसा देश वैसा भेष’। ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ आदि। विषमीकृत वाक्य के उदाहरण हैं, ‘एक तो चोरी, दूसरे सीना जोरी’। ‘कहाँ राजा भोज कहाँ गंगु तेली’ आदि।

(स) आवर्तक वाक्य-श्रोता अथवा पाठक के मन में जिज्ञासा या उत्सुकता पैदा करने के बाद जो वाक्य वत्तफा अथवा लेखक द्वारा प्रयुक्त किये जाते हैं, उन्हें आवर्तक वाक्य कहते हैं। आवर्तक वाक्य का उदाहरण दीजिए।

क्रिया के आधार पर

क्रिया पद के आधार पर भी वाक्य दो प्रकार के होते हैं। (अ) क्रिया युक्त तथा (ब) क्रियापद हीन।

(अ) क्रियापद युक्त वाक्य-जिन वाक्यों में क्रिया का प्रयोग हुआ रहता है, वे क्रियापदयुत्तफ वाक्य कहलाते हैं। अधिकतर वाक्य क्रियापद युत्तफ ही होते हैं। यथा-राम ने रावण को मारा। सुकुल विद्यालय जाता है आदि।

(ब) क्रियापद हीन वाक्य-यदि कोई क्रिया वाक्य के अभाव में भी सम्यक् अर्थ की अभिव्यक्ति दे, तो वह क्रियापद हीन वाक्य कहलाता है, यथा-

प्रमोद-अरे कहाँ से?
महेन्द्र-तुम्हारे यहाँ से।
प्रमोद-कहो, क्यों, कैसे?
महेन्द्र-वैसे ही।

‘आम के आम गुठलियों के दाम ‘मुहावरा भी इसके अन्तर्गत समझा जायेगा।

अर्थ के आधार पर

इस आधार पर वाक्य के नौ भेद किये जाते हैं, यथा-

  1. विधि वाक्य- वह पढ़ता है।
  2. निषेध वाक्य- वह नहीं पढ़ता है।
  3. आज्ञार्थक वाक्य- अब तुम पढ़ो।
  4. इच्छार्थक वाक्य- भगवान तुम्हें सकुशल रखें।
  5. सम्भावनार्थक वाक्य- शायद आज धूप निकले।
  6. संदेहार्थक वाक्य- मोहन आ रहा होगा।
  7. प्रश्नार्थक वाक्य- क्या तुम कल जाने वाले हो?
  8. संकेतार्थक वाक्य- वह मेरा पैसा दे देता तो मैं पुस्तक खरीदता।
  9. विस्मयादि बोधक वाक्य- अरे! अभी तुम यहीं हो।

वाक्य की संरचना

 पदों के आधार पर हुई वाक्य की समस्त रचनाओं को गहन और बाह्य दो संरचना-भागों में विभक्त करते हैं। ये व्यवस्थाएँ सभी भाषाओं में मिलती हैं। गहन और बाह्य कल्पना नई नहीं है। 

गहन संरचना

इसको अन्त: केन्द्रिक, अन्त: मुखी संरचना भी कहते हैं। अंग्रेजी में इसके लिए (Deep Structure) नाम भी चलता है। वाक्य के घटक शब्दों या अनुक्रमिक रूप से लघुत्तर घटकों में से किसी एक से समानाथ्री या निकट समानाथ्री होना गहन रचना है, अर्थात् जब किसी वाक्य का पद-समूह उतना ही काम करता है जितना कि वाक्य के एक या अधिक निकटस्थ अवयव करते हैं, तो उसे गहन (वाक्य) रचना कहेंगे। ऐसे वाक्यों का केन्द्र वाक्य के मध्य होता है; यथा -

‘‘यह फूल है’’ और ‘‘यह सुन्दर फूल है’’ दोनों वाक्य स्तर की दृष्टि से समान हैं। इस प्रकार ‘सुन्दर फूल’ के स्थान पर ‘फूल’ का प्रयोग हो सकता है, जिसे रचना केन्द्र मान सकते हैं। यहाँ ‘सुन्दर’ और ‘फूल’ दो पदों से बने पद-समूह का गठन मात्रा एक पद ‘फूल’ के समान है। अत: यह वाक्य गहन होगा। गहन वाक्यों को दो भागों में विभक्त कर सकते हैं -
  1. आश्रित - जब किसी वाक्य में एक पद मुख्य (केन्द्र) हो और दूसरा पद किसी न किसी प्रकार उसकी विशेषता प्रकट करता हो; यथा-’’यह सुन्दर लता है’’, ‘‘वह बड़ा वृक्ष है।’’ इन वाक्यों में ‘लता’ और ‘वृक्ष’ केन्द्र हैं, उनके साथ प्रयुक्त पद ‘सुन्दर’ और ‘बड़ा’ विशेषण हैं, जिनसे वाक्य-केन्द्र की विशेषता प्रकट होती हैं। ऐसे वाक्यों का भाषा में विशेष महत्त्व है।
  2. समानाधिकरण - जब गहन वाक्यों में दो पद और, तथा, व आदि संयोजक शब्दों में से किसी एक से जुड़े हों तो योजक समानाधिकरण गहन रचना कहेंगे; यथा-’’फूल और फल लाए हो’’, ‘‘शेर और भालू भाग रहे हैं।’’
जब गहन वाक्य का एक पद दूसरे पद की व्याख्या करता है, तो उसे व्याख्यात्मक समानाधिकरण वाक्य कहेंगे; यथा - ‘‘वे देवराज प्रयाग गए हैं’’, ‘‘तुम देवाधिदेव इन्द्र की पूजा करो।’’ गहन वाक्यों को पदों की व्यवस्था के अनुसार निम्नलिखित वर्गों में विभक्त कर सकते हैं -
  1. विशेषण + संज्ञा श्वेत वस्त्रा, काली कलम।
  2. क्रिया विशेषण + क्रिया खूब दौड़े, खूब गाया।
  3. क्रिया विशेषण + विशेषण अति सुन्दर, बहुत अच्छा।
  4. संज्ञा + विशेषण उपवाक्य - पुष्प, जो खिल गया था। फल जो अधपका था।
  5. सर्वनाम + विशेषण उपवाक्य - वह, जो भागा जा रहा था।
  6. सर्वनाम + पूर्व सर्गात्मक वाक्यांश - वे नाव पर, वह छत पर।
  7. क्रिया + क्रिया विशेषण + उपवाक्य - जाओ, जहाँ कार खड़ी है। गया, जहाँ फूल खिले हैं।
  8. संज्ञा + संयोजक + संज्ञा - विजय और वेद जी हैं। प्रशांत और मयंक गए।

बाह्य संरचना

इसे बहिष्केन्द्रिक, बहिर्मुखी संरचना भी कहते हैं। वाक्य के घटक शब्दों या अनुक्रमिक रूप से लघुत्तर घटकों में से किसी एक से समानाथ्री या निकट समानाथ्री न हों, अर्थात् जब वाक्य का अंश अपने निकटतम अवयव के अनुरूप कार्य न कर सके तो बाह्य संरचना होती है; यथा- ‘‘कलम से लिखो’’ वाक्य में ‘कलम से’ कार्य न तो मात्रा ‘कलम से’ पूरा होता है और न ही ‘से’। यहाँ ‘कलम’ और ‘से’ दोनों का प्रयोग की अनिवार्यता अनुभव होती है। यदि इनमें से किसी एक को छोड़ दें, तो वाक्य अपूर्ण रहेगा। इस प्रकार यह कह सकते हैं कि ‘कलम’ और ‘स’ अत: यह बाह्य संरचना है। बाह्य संरचना के रूपों को ध्यान में रखकर निम्नलिखित वर्ग बना सकते हैं -
  1. संज्ञा/सर्वनाम + परसर्ग - स्नेह ने उस को
  2. विशेषण + संज्ञा (दोनों मिलकर) (विशेष अर्थ की अभिव्यक्ति करें) - लम्बोदर (लम्बा + उदर झ गणेश)(नील + कंठ झ शिव)
विधेयेयात्मक -
  1. कर्ता + कर्म + सकर्मक क्रिया - राधा पानी पीती है। शशांक अंगूर देखता है।
  2. कर्ता + अकर्मक क्रिया - वृद्ध सोता है, वह दौड़ता है।
  3. कर्ता + पूरक + योजी क्रिया - सागर चालक है।
हिन्दी में बाह्य संरचना, ऐसे सामाजिक शब्दों में देख सकते हैं, जिनका न तो पूर्व पद प्रधान होता है, और न ही उत्तर पद। इसमें अन्य पद की प्रधानता होती है अर्थात् ऐसे शब्दों का अर्थ बाहरी तल से किया जाता है; यथा-लम्बोदार-(लम्बा उदर)। जब लम्बा और उदर दोनों पद गौण होते हैं, तो इसका अर्थ होता है-’’लम्बा है उदर जिसका अर्थात् गणेश जी।’’ इस विशेष अर्थ की अनुभूति के लिए दोनों पदों की अनिवार्यता स्वयं सिद्ध है। इसी प्रकार नीलकंठ, पीताम्बर, दशानन आदि में बाह्य संरचना है।

हिन्दी में ऐसे वाक्य प्रस्तुत होते हैं, जिनका अर्थ व्यंजना या लक्षणा शब्द-शक्ति से निकालते हैं। यहाँ अर्थ किसी शब्द या पद में निहित न होकर वाक्य के बाहरी तल से प्रकट होता है; यथा-
मेरा घर नदी पर है। (नदी के तट पर है।)
मेरा स्कूल सड़क पर है। (सड़क के किनारे है।)

सभी भाषाओं में गहन रचना बाह्य रचना से अधिक होती है, किन्तु सीमित प्रयोग होने पर भी बाह्य रचना का अपना महत्त्व है।

गहन संरचना का मूलाधार है। गहन संरचना अर्थ अभिव्यक्ति करती है, तो बाह्य संरचना उसे विशेष रूप देती है। बाह्य संरचना से अभिधा, लक्षणा तथा व्यंजना शब्द शक्तियों के माध्यम से कई अर्थ निकाले जाते हैं; यथा- ‘‘अँधेरा हो गया’’ वाक्य से संदर्भ-अनुसार कई अर्थ निकलते हैं-दिन समाप्त के संदर्भ में ‘रात्राी’, आदमी के सामने विषम परिस्थिति हो तो उसके लिए कुछ भी समझ में न आना’’ आदि। इसी प्रकार ‘घण्टी बजने’ के अनेक अर्थ हैं; यथा-स्कूल जाते बच्चे के लिए पढ़ाई का समय, पढ़ते समय से छुट्टी का समय, मन्दिर में पूजा का समय, मरणासन्न व्यक्ति के लिए मौत।

प्रत्येक भाषा में गहन तथा बाह्य संरचना भिन्न-भिन्न प्रकार से होती है। अंगेजी में I ran (मैं दौड़ा) बाह्य संरचना है। सर्वनाम और क्रिया के आधार पर बने इस वाक्य के मात्रा क्रिया या मात्रा सर्वनाम पद से भाव-अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है। अंगे्रजी में भी हिन्दी के समान केवल क्रिया-पद से बाह्य समानाथ्री वाक्य बनाते हैं, किन्तु संदर्भ आधार मिलाने पर ही ऐसा सम्भव होता है। यह स्थिति सामान्यत: बातचीत में होती है; यथा-
"What are you doing there?"
"Reading"

वाक्य की आथ्री-संरचना को बाह्य संरचना से सम्बन्धित मान सकते हैं। यह अर्थ की अभिव्यक्ति करती है। गहन संरचना में व्याकरणिक घटक भी आते हैं। इससे स्पष्ट है कि गहन संरचना में भाषा के आधारभूत वाक्य होते हैं, बाह्य संरचना विशेष भावाभिव्यक्ति का आधार है।

वाक्य रूपान्तरण के नियम

इसे वाक्य-परिवर्तन की दिशाएं भी कहते हैं। मानवीय भाषा की प्रमुख विशेषता है-उत्पादकता। मनुष्य एक ही भाव को अनेक रूपों में प्रस्तुत कर सकता है। इसी से भाषा में गतिशीलता है। विश्व की समस्त भाषाओं में सतत परिवर्तन चलता रहता है। यह परिवर्तन भाषा की विभिन्न इकाइयों के माध्यम से स्पष्ट होता है।  भाषा-परिवर्तन में वाक्य-परिवर्तन की विशेष भूमिका होती है। वाक्य के संरचनात्मक परिवर्तन से उसके प्रयोग में भी परिवर्तन होता रहता है। जब भाव की अभिव्यक्ति नए वाक्य-रूपों में और आकर्षक रूप में करने का प्रयत्न किया जाता है, तो वाक्य में परिवर्तन हो जाता है। हिन्दी वाक्यों में रूपान्तरण को मुख्यत: दो वर्गों में विभक्त करते हैं - 
  1. साधारण रूपान्तरण, 
  2. साधारणीकृत रूपान्तरण।
1. साधारण रूपान्तरण - हिन्दी व्याकरण के नियमों के आधार पर निषेधात्मक, प्रश्नवाचक, विस्मयादिबोधक तथा वाच्यात्मक वाक्य रूपान्तरण इसके अन्तर्गत आते हैं। वाक्य रूपान्तरण में अर्थ पूर्ववत् रहना चाहिए; यथा - निषेधेधात्मक - वह अच्छा लड़का है - वह बुरा लड़का नहीं है। प्रश्नवाचक - यहाँ सब की मौत होगी - यहाँ किसी की मौत नहीं होगी? विस्मयादिबोधक - बहुत सुहाना मौसम है - क्या सुहाना मौसम है! वाच्य - मैं पुस्तक पढ़ता हूँ। - मेरे द्वारा पुस्तक पढ़ी जाती है।

2. साधरणीकृत रूपान्तरण - जब जटिल वाक्य को साधारण या सरल वाक्य में परिवर्ततन करते हैं, तो साधारणीकृत रूपान्तरण होता है। इस रूपान्तरण में दोनों उपवाक्यों को एक कर एक ही क्रिया का प्रयोग करते हैं; यथा - तुम्हारी जेब में कलम है। कलम मेरी है। झ तुम्हारी जेब में मेरी कलम है। बच्चा रो रहा है। बच्चा उठाओ। झ रोते हुए बच्चे को उठाओ। मिश्र वाक्य रूपान्तरण के लिए जैसे........जब.......तब........, ज्यों ही........त्यों ही, आदि का प्रयोग करते हैं। वाक्य के रूपान्तरण नियमों के साथ रूपान्तरण की कुछ प्रमुख दिशाएँ इस प्रकार हैं-

1. पदक्रम में परिवर्तन - भाषा में नवीनता लोने के लिए वाक्य के पदक्रम में परिवर्तन करते हैं। काव्य-रचना में यह प्रक्रिया पहले से चली आ रही है, किन्तु वर्तमान समय के गद्य-लेखन और बोल-चाल में भी यह प्रवृति सशक्त रूप में सामने आ रही है। पहले विशेष्य के पूर्व विशेषण का प्रयोग होता था, किन्तु अब विशेष्य का प्रयोग विशेषण से पहले होने लगा है; यथा- ऐतिहासिक तथ्य, उत्तम बातें, दिव्य भवन आदि के स्थान पर ‘तथ्य ऐतिहासिक’, ‘बातें उत्तम’, ‘भवन दिव्य’ का प्रयोग होने लगा है। सामान्यत: हिन्दी में नियमानुसार कर्ता, कर्म और क्रिया का क्रमश: प्रयोग होता है, किन्तु वर्तमान समय की विशेष स्थिति में इसके विपरीत प्रयोग प्रचलित हो गए हैं; यथा - पहले के वाक्यों ‘वह दिल्ली का राज था’, ‘उसके पास पिस्तौल थी’, ‘एक दिन की बात है’ का आज प्रयोग इस प्रकार होता है-’दिल्ली का राजा था वह’, ‘पिस्तौल थी उसके पास’, ‘बात एक दिन की है’।

2. अन्वय में परिवर्तन - संस्कृत भाषा में विशेष्य और विशेषण की अन्विति पर ध्यान देना आवश्यक है; यथा-विद्वान पुरुष:, विदुषी नारी, शोभन: बालक:, शोभना बाला। हिन्दी में पहले संस्कृत के ही समान पूजनीय पिता जी, पूजनीय माता जी, पूज्य भ्राता जी, पूज्य भाभी जी का प्रयोग होता था, किन्तु वर्तमान समय में दोनों ही लिंगों में एक ही शब्द का प्रयोग चलने लगा है; यथा-पूजनीय पिता जी, पूजनीय माता जी, पूज्यनीय भ्राता जी, पूज्यनीय भाभी जी आदि। संस्कृत के क्रिया पदों में लिंग-भेद नहीं होता है; यथा-’श्याम: पठती’, ‘सविता पठति’। हिन्दी में क्रिया-पद लिंग के अनुसार प्रयुक्त कतरे हैं; यथा-’श्याम पढ़ता है’। ‘सविता पढ़ती है’। 

3. अधिक पद-प्रयोग - वर्तमान समय में हिन्दी के वाक्यों में अतिरिक्त पदों का प्रयोग होने लगा है। बोल-चाल में ऐसे प्रयोग पर्याप्त रूप से मिलते हैं। व्याकरण की दृष्टि से दूसरे वाक्य अशुद्ध हैं, किन्तु प्रयोग मिलते हैं - शुद्ध घी झ विशुद्ध घी झ बिल्कुल विशुद्ध घी तुम मुझसे क्या कह रहे हो झ तुम मेरे से क्या कह रहे हो? अपर्णा लिखती और पढ़ती है झ अपर्णा लिखती है और पढ़ती है। आज सोमवार है झ आज सोमवार का दिन है।

4. आदरार्थ परिवर्तन - संस्कृत और हिन्दी भाषाओं में आदर देने के लिए एकवचन कर्ता के साथ बहुवचन क्रिया और सर्वनाम आदि का प्रयोग किया जाता है; यथा--
  1. क: अत्रा भवन्त:।
  2. पिता जी आज शिमला जा रहे हैं।
  3. मेरे गुरू जी आज पानीपत आ रहे हैं।
  4. दशरथ के पुत्रा श्री रामचन्द्र जी अयोध्या के राजा थे।
5. पद या प्रत्यय-लोप - विभिन्न भाषाओं में कभी-कभी मुख-सुख या प्रयन्नलाघव के कारण पद या प्रत्यय का लोप हो जाता है। इस प्रकार वाक्य में परिवर्तन होता है; यथा -
  1. त्वं गच्छ > गच्छ, त्वं पठ > पठ
  2. अहं गच्छामी > गच्छामी, अहं पठामी > पठामी।
  3. हिन्दी की बोल-चाल और लिखित भाषा में ऐसे प्रयोग मिलते हैं; यथा -
  4. मैंने पुस्तक रख ली है झ मैंने पुस्तक रख ली।
  5. मैं नही जा रहा हूँ झ मैं नहीं जा रहा।
  6. आँखों से देखी घटना बताता हूँ झ आँखों देखी घटना बताता हूँ।
6. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कथन - हिन्दी में प्रत्यक्ष कथन के अप्रत्यक्ष रूप में परिवर्तन की प्रक्रिया अब बदल चुकी है। वाक्य का यह परिवर्तित रूप अंग्रेजी के प्रभाव से सामने आया है, यथा-’रमेश ने कहा कि मैं तुम्हारे पास आऊँगा’ वाक्य का प्रयोग इस प्रकार होता है- ‘रमेश ने कहा कि वह मेरे पास आएगा।’ इसी प्रकार ‘महेश ने कहा कि मैं पढ़ रहा हूँ’ वाक्य का अब प्रयोग इस प्रकार होता है-’महेश ने कहा कि वह पढ़ रहा था’

7. कोष्ठक-प्रयोग - वाक्य के किसी तथ्य को स्पष्ट करने के लिए कोष्ठक में उपवाक्य का प्रयोग किया जाता है। इससे भी वाक्य की रचना में भिन्नता आ जाती है; यथा- ‘गुरू जी ने (सर पर हाथ रखकर) आश्रीवाद दिया’, ‘वह उन दिनों (दिल्ली-स्थित) जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था’, ‘उसने जब मुझसे (रोते हुए) कहा, तो मुझे दया आ गई।’

8. कारक-स्थान पर अल्प विराम-प्रयोग - हिन्दी वाक्य-संरचना पर अंगे्रजी वाक्य संरचना का विशेष प्रभाव पड़ा है। हिन्दी वाक्यों में कारक-लोप और उनके स्थान पर अल्पविराम का प्रयोग अंग्रेजी-प्रभाव की देन है; यथा - हिन्दी विभाग के अध्यक्ष आ रहे हैं। झ अध्यक्ष, हिन्दी विभाग के आ रहे हैं। हिन्दी मंच के अध्यक्ष हैं। झ अध्यक्ष, हिन्दी मंच हैं।

वाक्य परिवर्तन के कारण

भाषा की विभिन्न इकाइयों में परिवर्तन का क्रम चलता रहता है। वाक्य की संरचना में भी परिवर्तन चलता रहता है, इन परिवर्तनों के मुख्य कारण हैं -

1. मुख-सुख - मनुष्य थोड़े परिश्रम से अधिक से अधिक कार्य करना चाहता है, उसे ही मुख-सुख या प्रयत्नलाघव कहते हैं। इसी प्रयत्न में मनुष्य छोटे-छोटे वाक्य से विस्तृत भाव प्रकट करना चाहता है। इस प्रकार कभी वाक्य के पद या प्रत्यय का लोप होता है, तो कभी पदक्रम में परिवर्तन हो जाता है। यह वाक्य-परिवर्तन का प्रमुख कारण है।

2. अन्य भाषा-प्रभाव - विभिन्न भाषाओं के प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव से वाक्य में परिवर्तन होता रहता है। जब कोई व्यक्ति अपनी भाषा के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा का प्रयोग करता है, तो उस भाषा की वाक्य रचना के अनुसार वह अपनी भाषा से भी वाक्य बनाने लगता है। संस्कृत में ‘अर्थ’ और ‘इति’ के प्रयोग आधार पर रचना की जाती थी। अब उसके स्थान पर उद्धरण चिह्न का प्रयोग किया जाता है; यथा-’’अहं आगमिष्यामि’’। हिन्दी वाक्य-रचना पर अंग्रेजी और फारसी का प्रबल प्रभाव है। लम्बे वाक्यों में ऐसी रचना मिलती है; यथा - ‘संगीता ने कहा है मैं जाऊँगी झ ‘संगीता ने कहा कि वह जाएगी’। अंग्रेजी प्रभाव के कारण हिन्दी में ऐसी रचना मिलती है।

3. स्पष्टता - हम अपनी बात करने के लिए वाक्य में कुछ न कुछ परिवर्तन कर लेते हैं। परिवर्तन की इस प्रक्रिया में कभी एक ही वाक्य में कई उपवाक्य आ जाते हैं, तो कभी वाक्य के किसी पद के साथ कोष्ठक में स्पष्टतासूचक शब्द प्रयोग करते हैं।

4. बलाघात - वक्ता जब वाक्य के किसी पदविशेष पर बल देना चाहता है, तो उस पर बलाघात की स्थिति होती है। इस प्रक्रिया के कारण वाक्य-गठन में परिवर्तन होता है; यथा-

सुरेन्द्र घर जा रहा है। (सामान्य वाक्य)
घर जा रहा है सुरेन्द्र। (यहाँ ‘घर’ शब्द का बल दिया गया है)
जा रहा है घर, सुरेन्द्र। (यहाँ ‘जा रहा है’ पर बलाघात है)
वक्ता वाक्य के जिस अंश पर बल देना चाहता है, उसे वाक्य में सबसे पहले रखता है।

5. विभक्तियों का घिसना प्राचीन भाषाओं संयोगात्मक रूप में थी। विकास-क्रम में उनका रूप वियोगात्मक हो गया है। विभक्तियों और प्रत्ययों का कार्य परसर्गों तथा सहायक क्रियाओं से लिया जाता है। इस प्रकार वाक्य में परिवर्तन हो जाता है। संयोगात्मक भाषा के वाक्य के पदक्रम में परिवर्तन कर सकते हैं, किन्तु वियोगात्मक भाषा का पदक्रम स्थिर होता है।

6. मानसिक स्थिति - वाक्य-संरचना पर वक्ता और लेखक की मन:स्थिति का विशेष प्रभाव पड़ता है। शान्त या सामान्य मन:स्थिति में अलंकृत भाषा का प्रयोग होता है, तो दु:ख, शोकादि के अवसर पर छोटे-छोटे, सरल वाक्यों का। इस प्रकार मन:स्थिति के कारण वाक्य में परिवर्तन होना स्वाभाविक है।

7. नवीनता मनुष्यता स्वभाव से ही नवीनता प्रेमी है। इस प्रवृति के कारण वाक्य में भी परिवर्तन हो जाता है। आजकल हिन्दी में यह प्रवृति विशेष रूप से चल पड़ी है; यथा-’एक कबाड़ी की दुकान’ का ‘दुकान एक कबाड़ी की’, ‘दाम सौ रुपए मात्रा’ का ‘दाम मात्रा सौ रुपए’ प्रयोग होने लग गया है।

8. भावुकता भावुकता के कारण भी वाक्य में परिवर्तन होता है। जब वक्ता या लेखक विशेष भाव-प्रवाह में बोलता या लिखता है, तो उसके वाक्य में कर्ताद्व कर्म और क्रिया की सैद्धान्तिक व्यवस्था न होकर विचित्रा-सी संरचना होती है; यथा - वाह रे माधुर्य! वाह रे लज्जा! धिक् बेहया! आदि

9. अज्ञानता - अज्ञानता के कारण भी वाक्य में परिवर्तन हो जाता है; यथा- बाजार खुल रहा है झ बाजार खुल रही है। ट्रक जा रहा है झ ट्रक जा रही है। वह रिक्शा से घर जा रहा है झ वह रिक्शा से जा रही है।

10. परम्परा प्रभाव हिन्दी का उद्भाव संस्कृत भाषा से हुआ है। हिन्दी में संस्कृत के परम्परागत गुण हैं। वर्तमान समय में हिन्दी प्रयोग में पर्याप्त नवीनता आ रही है, किन्तु हम किसी न किसी रूप में परम्परा से जुड़े हैं। आदर-संदर्भ में एकवचन कर्ता के साथ क्रिया तथा सर्वनाम आदि का बहुवचन रूप में प्रयुक्त होता है।

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