विक्रय कला का अर्थ एवं परिभाषा, प्रकृति एवं विशेषताएँ

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‘विक्रय-कला’ शब्द दो शब्दों के योग से बना है- (i) विक्रय और (ii) कला। विक्रय का अर्थ किसी वस्तु के स्वामित्व का हस्तान्तरण होने से है, अर्थात् ‘‘विक्रेता किसी मूल्य के प्रतिफल स्वरूप अपनी वस्तु के स्वामित्व का हस्तांतरण उस मूल्य देने वाले क्रेता को करता है जिसे हम ‘विक्रय’ कहते हैं।’’ अगर इसका व्यापक अर्थ लगाया जाये तब कहा जा सकता है कि वास्तव में आधुनिक समाज का प्रत्येक व्यक्ति एक विक्रेता ही है। कोई अपनी वस्तु का हस्तांतरण करता है, कोई अपनी कुशलता का विक्रय करता है और कोई अपने ज्ञान को बाँटता है। दूसरा शब्द है ‘कला’। इसका तात्पर्य किसी निश्चित उद्देश्य को वैज्ञानिक ढंग से प्राप्त करना है। इसलिए हम कह सकते हैं कि विक्रय-कला वह कला है जिसके द्वारा स्थायी ग्राहक बनाये जाते हैं तथा वस्तुओं के प्रति क्रेताओं का विश्वास उत्पन्न किया जाता है।

दूसरे शब्दों में ‘‘जिस व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक विधियों को अपनाकर विक्रेता अपने निश्चित उद्देश्य में सफलता प्राप्त कर सके वही ‘विक्रय-कला’ है।’’

 परिभाषाएँ

  1. श्री रिपले (Ripley) के अनुसार, ‘‘विक्रय-कला एक तरह की शक्ति है जिसके द्वारा बहुत-से व्यक्तियों को आपसी वस्तु को लाभ पर प्रसन्नतापूर्वक तथा स्थायी रूप से क्रय करने के लिए जोर दिया जाता है।’’
  2. श्री एच. डल्यू. हफ्टन (H. W. Houghton) के अनुसार, ‘‘विक्रय-कला व्यक्तिगत सेवा है जो वस्तुओं के बेचने के कार्य में समाज को प्रदान की जाती है। यह उस तरह की सेवा है जो उत्पादक और वस्तु-वितरकों तथा वस्तुओं के उपभोग करने वालों को आवश्यक है।’’
  3. श्री ह्वाइटहैड हैरोल्ड (Whithead Harold) के अनुसार, ‘‘विक्रय-कला वस्तुओं को प्रस्तुत करने तथा पेश करने की ऐसी कला है जिससे प्रभावित होकर सम्भावित ग्राहक उस वस्तु की आवश्यकता महसूस करने लगता है और तुरन्त पारस्परिक सन्तोषजनक खरीद हो जाती है।’’
  4. श्री मेजर एस. डब्लयू. स्कॉट (Scott. H. W. Major) के अनुसार, ‘‘विक्रेता की क्रियाओं का एक उद्देश्य यह भी कहा जाता है कि वह माल दिखाकर किसी वस्तु की आवश्यकता को बताते हुए उसके प्रति माँग उत्पन्न कर दे, हालाँकि इसके पहले उस व्यक्ति को वस्तु की आवश्यकता की कोई चेतना भी न थी।’’
ऊपर लिखी गई परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि विक्रय-कला एक तरह की प्रणाली है जिसकी मदद से वस्तुओं का विक्रय सरलतापूर्वक होता है और इससे दोनों पक्षों को पूर्ण रूप से सन्तोष प्राप्त होता है।

परिभाषाओं के विश्लेषण से यह बात स्पष्ट होती है कि विक्रय कला को विज्ञान न होकर दूसरों को प्रोत्साहित अथवा प्रभावित करने की ‘कला’, ‘शक्ति’, -योग्यता’ अथवा ‘गुण’ के रूप में परिभाषित किया गया है। अत: विक्रय कला में विज्ञान होने की तुलना में कला के गुण अधिक मौजूद होते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि विक्रय कला व्यक्तिगत योग्यता तथा चातुर्य है जिसके द्वारा विक्रेता सम्भावित ग्राहकों की इच्छाओं, आवश्यकताओं व क्रय समस्याओं की जानकारी लेकर उनकी पूर्ति के लिए उचित वस्तु व सेवा को प्रस्तुत करके उन्हें क्रय के लिए प्रेरित तथा प्रोत्साहित करता है ताकि उन्हें अधिक से अधिक सन्तुष्टि दी जा सके।

निष्कर्ष (Conclusion) : ऊपर दी गई विभिन्न परिभाषाओं तथा विवेचन के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि विक्रय कला में निम्न तत्त्व होते हैं :
  1. ‘‘विक्रय कला क्रय कके लिए प्रोत्साहित करती है।’’
  2. ‘‘यह एक ऐसी ‘शक्ति अथवा योग्यता’ है जो व्यक्तियों को क्रय के लिए प्रभावित करती है।’’
  3. ‘‘यह अपने विचारों अथवा मतों को बेचने की कला है।’’
  4. ‘‘ग्राहकों की आवश्यकताएँ पूरी करने की कला है।’’
  5. ‘‘दूसरों की सेवा करने में वास्तविक रुचि।’’
  6. ‘‘क्रेताओं की समस्याओं को निपटाने की योग्यता।’’

विक्रय कला की प्रकृति एवं विशेषताएँ

विक्रय कला की प्रकृति का अध्ययन करने के लिए निम्न तत्त्वों को आधार के रूप में प्रयोग किया जा सकता है :
  1. विक्रय कला एक कला है (Salesmanship is an Art) : किसी भी कार्य को श्रेष्ठतम विधि से करना ही कला कहलाता है। कला वह कुशलता तथा योग्यता है जिससे किसी निर्धारित उद्देश्य को पाने की विधि का ज्ञान कराया जाता है। विक्रय कला यह जानकारी देती है कि ग्राहक के साथ कैसे व्यवहार किया जाये तथा उसे कैसे अधिकतम सन्तुष्टि प्रदान की जाये तथा कैसे उसे स्थायी ग्राहक बनाया जाये। विक्रय कला ही विक्रेता तथा क्रेता के मध्य सामंजस्य स्थापित करते हुए दोनों के हित व लाभ की दृष्टि से विक्रय विधि का ज्ञान कराती है। अत: इसके द्वारा विक्रय के कार्य को श्रेष्ठतम विधि से करना सिखाती है जिसके आधार पर यह कला के रूप में प्रतीत होती है।
  2. विक्रय कला एक विज्ञान है (Salesmanship is a Science) : किसी विषय का क्रमागत तथा विवेकपूर्ण अध्ययन विज्ञान कहलाता है। विक्रय कला में अध्ययन एवं विश्लेषण द्वारा निर्मित निश्चित नियमों तथा सिद्धान्तों का प्रयोग होता है। ये नियम तथा सिद्धान्त क्रेता, विक्रेता तथा वस्तु के सम्बन्ध में हर स्थान पर प्रभावशाली होने के कारण इसे विज्ञान के रूप में प्रकट करते हैं। अत: यह एक विज्ञान है जो ग्राहक के साथ किए गए व्यवहार के परिणाम को बोध कराते हैं।
  3. क्या विक्रय कला जन्म जात गुण है? (Is Salesmanship In-born Quality?) : पहले ऐसा माना जाता था कि विक्रय कला एक जन्म जात गुण है, किन्तु आज यह सिद्ध हो चुका है कि यह जन्म के साथ मिला हुआ एक गुण होते हुए, इसको सीखा भी जा सकता है। आज के युग में विक्रय कला के प्रयोग-सिद्ध सिद्धान्त हैं जिन्हें प्रशिक्षण प्रदान करके सफल विक्रेताओं को तैयार करने में कार्यरत् हैं। अत: यह केवल जन्म जात गुण न होकर इसे सीखा भी जा सकता है।
  4. व्यक्तिगत सेवा (It is a Personal Service) : विक्रय कला के द्वारा ग्राहकों से सीधा सम्बन्ध स्थापित करके विक्रेता द्वारा ग्राहकों को व्यक्तिगत सेवा प्रदान की जाती है। विक्रेता ग्राहकों की समस्याओं का अध्ययन करके वस्तुओं के गुणों तथा उपयोगिता के बारे में जानकारी देकर उसे ग्राहक द्वारा क्रय किये जाने में सहायता प्रदान करता है। विक्रय कला के माध्यम से ही विक्रेता क्रेताओं की शंकाएँ दूर करके वस्तु के प्रति आश्वस्त करता है। उसे वस्तु की उपयोग विधि बताता है तथा वस्तु का क्रियात्मक प्रदर्शन करके ग्राहकों को व्यक्तिगत रूप में सेवाएं अर्पित करता है।
  5. विक्रय कला एक पेशे के रूप में (Salesmanship as a Profession) : आधुनिक विक्रय कला एक पेशे के रूप में परिवर्तित होती जा रही है। किसी भी पेशे के सफल संचालन के लिए सैद्धान्तिक ज्ञान तथा अनुभव की आवश्यकता होती है। अत: एक सफल विक्रेता को भी विक्रय कला के सिद्धान्तों, विधियों आदि का ज्ञान होना आवश्यक है। इसके साथ-साथ क्रियात्मक ज्ञान तथा अनुभव से एक कुशल विक्रेता बना जा सकता है। पेशेवर विक्रेता सदा इस सिद्धान्त का पालन करता है-’’मैं अपने ग्राहकों के लिए क्या सेवा कर सकता हूँ?’’ विक्रेता द्वारा ग्राहकों की आवश्यकताओं तथा समस्याओं पर तुरन्त ध्यान दिया जाता है। किसी भी पेशे में सेवा तत्त्व का पाया जाना आवश्यक होता है। आधुनिक विक्रय कला में पेशेवर विक्रेता का कार्य केवल वस्तु के विक्रय पर समाप्त नहीं होता। विक्रय के बाद दी जाने वाली सेवाएँ उसे पेशे के रूप में प्रस्तुत करती हैं। पेशेवर विक्रय कला का अन्तिम उद्देश्य क्रेता में आस्था तथा विश्वास स्थापित करना है ताकि वह चिरस्थायी ग्राहक बन सके।
  6. विक्रय कला सार्वभौमिक है (Salesmanship is Universal) : विक्रय कला द्वारा अपनाये गए सिद्धान्त सभी जगहों तथा क्षेत्रों में समान रूप से लागू होते हैं। अब विक्रय कला का प्रयोग केवल विक्रय कार्य में ही नहीं होता बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इसका प्रयोग दिखाई देता है। आज विक्रय कला का प्रयोग, डॉक्टर, वकील, अध्यापक, अभिनेता, व्यापारी, कर्मचारी सभी अपने-अपने क्षेत्रों में कर रहे हैं। अत: यह एक सार्वभौमिक क्रिया है।
  7. विज्ञापन तथा विक्रय कला दोनों में भिन्नता है (Advertisement & Salesmanship are Different) : सामान्यत: विज्ञापन तथा विक्रयकला को समान अर्थ में लिया जाता है। किन्तु विज्ञापन तथा विक्रय कला दोनों भिन्न हैं। विज्ञापन जहाँ समाप्त होता है वहाँ से विक्रय कला प्रारम्भ होती है। विज्ञापन ग्राहकों को क्रेता तक लाने में सहायता करता है इसके बाद विक्रेता की विक्रय कला वस्तु के अन्तिम विक्रय को सम्भव बनाती है।

विक्रय कला के प्रकार एवं आधुनिक अवधारणा

विक्रयकर्त्ता के कार्यों की प्रकृति एवं विक्रय कार्य के प्रति उसके दृष्टिकोण के आधार पर विक्रय कला का निम्न 5 वर्गों में वर्गीकरण किया जा सकता है :

माँग पूर्ति विक्रय कला 

इस श्रेणी की विक्रयकला में विक्रयकर्त्ता द्वारा क्रेताओं को केवल उनके द्वारा मांगी गयी वस्तुयें प्रदान की जाती हैं। विक्रयकला का यह अत्यन्त प्रारभिक व प्राचीनतम स्वरूप है। परम्परागत वस्तुओं के विक्रय में आज भी विक्रयकला का यही स्वरूप देखा जा सकता है। दैनिक उपयोग की प्रमापित वस्तुओं में भी विक्रयकला का यही स्वरूप देखा जा सकता है। सीमित आपूर्ति वाली वस्तुएँ जिनमें क्रेता के बाजार की स्थितियाँ हो उनमें भी यही स्वरूप देखा जा सकता है। इस प्रकार की विक्रयकला में निम्न लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं :
  1. क्रेता द्वारा मांगे जाने पर केवल मांगी गयी वस्तु प्रस्तुत करना।
  2. क्रय-निर्णय व क्रय मात्र आदि में विक्रेता इस सम्बन्ध में कोई सुझाव या प्रेरणा आदि नहीं देता है।
  3. विक्रय कला का यह रूप परम्परागत वस्तुओं, दैनिक उपभोग व आम प्रचलन की प्रमापित वस्तुओं और सीमित आपूर्ति वाली वस्तुओं के संबंध में अपनाया जाता है।
  4. इसमें विक्रेता द्वारा उपयोग विधि का प्रदर्शन, व अन्य कोई सेवायें नहीं प्रदान की जाती हैं।
  5. नव प्रचलित, सुधरी हुई एवं टिकाऊ वस्तुओं के लिए अनुपयुक्त है।
  6. इसके अन्तर्गत विक्रयकर्त्ता किसी वस्तु के प्रति इच्छा या अनुराग उत्पन्न करने की चेष्टा नहीं करता है, न ही माँग सृजन का प्रयास करता है न अधिक मात्र में क्रय को प्रेरणा देता है तथा अन्य कोई विशिष्ट सहायता प्रदान नहीं करता है।

सृजनात्मक विक्रयकला 

किसी वस्तु या सेवा की माँग न भी हो तब भी माँग उत्पन्न कर वस्तु विक्रय में सफलता पाने के कारण इसे सृजनात्मक विक्रयकला कहते हैं। औद्योगिक क्रान्ति के फलवरूप बढ़े हुए उत्पादन के विक्रय हेतु माँग सृजन की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी जिससे अपनी वस्तुओं का अधिकतम विक्रय किया जा सके। अक्सर बेचने के उद्वेग या अति उत्साह में विक्रयकर्त्ता कभी-कभी यह देखना भी भूल जाता है कि माँग सृजन कर जो वस्तु वह क्रेता को बेच रहा है, उसकी क्रेता को वास्तव में अवश्यकता है भी या नहीं और वह प्रस्तावित वस्तु/सेवा क्रेता के लिये उपयुक्त व उपयोगी है अथवा नहीं। इससे उस विक्रयकर्त्ता व उसके उपक्रम के दीर्घकालिक हितों एवं अस्तित्व पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

इस श्रेणी की विक्रयकला का जन्म विशेषत: औद्योगिक क्रान्ति के कारण हुआ। इससे उत्पादन में हुई भारी वृद्धि हुई बढ़े हुए उत्पादन को बेचने के लिए माँग सृजन को आवश्यक समझा गया। इसके संक्षिप्त लक्षण हैं :
  1. इस प्रकार मांग सृजन व मांग वृद्धि से विक्रय वृद्धि में सहायता करना।
  2. क्रेता को उसके द्वारा सोची गयी मात्र से अधिक मात्र में क्रय के लिये प्रेरित करना।
  3. अति उत्साह से गलत आश्वासनों के आधार पर गलत वस्तुयें बेच देने पर विक्रयकर्त्ता व उसके उपक्रम के दूरगामी हितों पर विपरीत असर पड़ता है जिससे अन्तत: हानि ही होती है। इसलिये मिथ्या सुझाव या परामर्श व मिथ्या आश्वासन देने से बचना चाहिये।
  4. इसमें सम्भावित क्रेताओं की पहचान कर प्रस्तावित वस्तु/सेवा के प्रति उनमें रुचि उत्पन कर उसके लिए मांग पैदा करना।
  5. विक्रयकला की इस अवधारणा के अन्तर्गत विक्रयकर्त्ता के पास जो भी वस्तुयें होती हैं उन्हें बेचने के वह सभी प्रयास करता है। ऐसा करने में वह कई क्रेताओं को उनके लिये अनुपयुक्त व अनुपयोगी वस्तुयें भी बेच देता है।

प्रतिस्पर्द्धात्मक विक्रयकला

प्रतिस्पर्द्धात्मक विक्रयकला का अर्थ, प्रतिस्पिर्द्धयों का बाजार अंश घटाकर अपना अंश बढ़ाने के वैयक्तिक विक्रय प्रयासों से है। स्पष्ट शब्दों में प्रतिस्पर्द्धात्मक विक्रयकला से आशय प्रतिस्पिर्द्धयों की विक्री घटाकर अपनी विक्रय वृद्धि करने से है। जबकि सृजनात्मक विक्रयकला में नवीन मांग का सृजन किया जाता है।

विक्रयकला का एक अन्य वर्गीकरण 

एक और अन्य प्रकार से भी विक्रयकला का वर्गीकरण किया जा सकता है, यथा-
  1. काउन्टर विक्रयकला (Counter Salesmanship)- इसके अन्तर्गत विक्रयकर्त्ता दुकान पर आने वाले क्रेताओं को उनकी आवश्यकतानुसार वस्तु विक्रय करता है। इसके अन्तर्गत क्रेता वस्तु क्रय हेतु विक्रयकर्त्ता के पास जाता है। क्रेता की इस पहल के पीछे विज्ञापन या विक्रय प्रवर्तन अभियान की प्रेरणा भी हो सकती है।
  2. भ्रमणात्मक विक्रयकला (Touring Salesmanship)- इसके अन्तर्गत विक्रयकर्त्ता स्वयं सम्भावित क्रेताओं का पता लगाकर उनसे सम्पर्क करके विक्रय के प्रयास करता है।
  3. प्रचारक विक्रयकला (Missionary-Salesmanship)- जब विक्रेता विक्रय की जाने वाली वस्तु का स्वयं प्रचार करके विक्रय करे उसे प्रचारक विक्रय कला कहेंगे।
  4. पेशेवर विक्रयकला अथवा विक्रयकला की आधुनिक अवधारणा (Professional Salesmanship or Modern Concept of Salesmanship)- उपक्रम के दीर्घकालिक अस्तित्व एवं विकास के लिए चाहे सृजनात्मक विक्रयकला का उपयोग किया जाये अथवा प्रतिस्पर्द्धात्मक वर्तमान व्यावसायिक मूल्यों के सन्दर्भ में दोनों ही अनुपयुक्त हैं। केवल पेशेवर विक्रयकला ही एक मात्र ऐसी अवधारणा है जो क्रेताओं के साथ विश्वासाश्रित व दीर्घकालिक सम्बन्धों का निर्माण कर सकती है। यही विक्रयकला की आधुनिक अवधारणा भी है।
  5. प्रचारक विक्रयकला (Missionary Salesmanship)- इस विक्रयकर्त्ता का उद्देश्य तत्काल कोई क्रयादेश प्राप्त करना न होकर क्रेताओं अथवा उनके परामर्शदाताओं में वस्तु का प्रचार करना होता है। जैसे :- एक पुस्तक विक्रेता अपने द्वारा छापी गई पुस्तक की विशेषताएँ बताते समय उसका कोई सीधा क्रयादेश न लेकर केवल उसका प्रचार करता है।

विक्रयकला के उद्देश्य

विक्रयकला का प्रमुख उद्देश्य भावी ग्राहक को प्रस्तावित वस्तु/सेवा की जानकारी देकर उसकी शंकाओं का समाधान करके उसे खरीदने के लिए प्रेरित करना है। एच. डब्ल्यू. हाटन के शब्दों में ‘‘विक्रयकला वाणिज्य का आधार है जिसका प्रथम एवं अन्तिम उद्देश्य वस्तुओं एवं सेवाओं का विपणन है जो क्रेता एवं विक्रेता दोनों के ही पारस्परिक लाभ एवं स्थायी सन्तोष के लिए होता है।’’ विक्रयकला के विस्तृत उद्देश्य हैं :
  1. वस्तुओं का वैयक्तिक प्रदर्शन।
  2. क्रेताओं की शंकाओं का समाधान करना।
  3. विक्रय वृद्धि।
  4. विक्रय हेतु प्रस्तावित वस्तुओं के उपयोग विधि की जानकारी क्रेताओं को देना।
  5. सम्भावित क्रेताओं को वस्तुओं एवं सेवाओं की जानकारी देना।
  6. प्रतिस्पिर्द्धयों के आरोपों का निवारण।

विक्रयकला का क्षेत्र

विक्रयकला का क्षेत्र दिन प्रतिदिन विस्तृत होता जा रहा है। इसका क्षेत्र वस्तु विक्रय तक सीमित न रहकर विपणन के अन्य कार्यों में भी फैलता जा रहा है। विक्रय कला के क्षेत्र के विस्तृत होने के अनेक कारण हैं जैसे कि बाजारों का विस्तार होता जा रहा है, क्रेताओं की आवश्यकताओं तथा विभिन्न प्रकार के उत्पादों में वृद्धि हुई है तथा उपभोकताओं के भी विभिन्न प्रकार देखने को मिलते हैं। अत: विक्रय कला के क्षेत्र का अध्ययन निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है -
  1. व्यापार तथा विक्रयकला - विक्रय कला ही व्यापार की सफलता का आधार होता है। विक्रयकला थोक-विक्रय, फुटकर विक्रय, काउन्टर पर विक्रय, बाजारों में भ्रमण करके विक्रय तथा पेशेवर परामर्शदाताओं आदि का सहयोग प्राप्त करने में सहायता करती है। उचित तर्कों के आधार पर सोची गई मात्र में अधिक क्रय की प्रेरणा देकर विक्रय कला के माध्यम से विक्रय में वृद्धि करते हैं तथा अपेक्षाकृत बड़े क्रयादेश प्राप्त करने में सहायक बने हैं। विक्रयकला के अन्तर्गत विक्रय उपरान्त सेवाएं भी प्रदान की जाती हैं जिससे व्यापार को बढ़ाने में सहायता प्राप्त होती है।
  2. वाणिज्यिक संगठन एवं विक्रय कला - व्यापार तथा व्यापार की सहायक क्रियाएं जैसे बैंकों, बीमा कम्पनियों, यातायात सेवाएं तथा भण्डारण सुविधाएं प्रदान करने वाली संस्थाओं के कार्यों में भी विक्रय कला की आवश्यकता होती है। विक्रय कला के माध्यम से ही यातायात सेवाएं तथा भण्डारण सुविधा देने वाली संस्थायें अधिक से अधिक व्यवयाय कर पाती हैं। अत: विक्रय कला के क्षेत्र से ऊपर वर्णित व्यावसायिक संगठनों की क्रियाएं भी अछूती नहीं हैं।
  3. उद्योग एवं विक्रय कला - उद्योगों को थोक व फुटकर विक्रेताओं की प्राप्ति, उनसे लगातार सम्पर्क, क्रय आदेशों की प्राप्ति आदि कार्यों के लिए विक्रयकला का सहारा लेना पड़ता है। औद्योगिक उत्पादों के क्रेताओं के विशेषज्ञ परामर्शदाताओं से सम्पर्क रखकर अपने उत्पादों के पक्ष में परामर्श दिलाने हेतु भी विक्रय कला की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त अन्य औद्योगिक क्रेताओं व बड़े संस्थागत क्रेताओं के क्रयादेश प्राप्त करने के लिए भी औद्योगिक संस्थाओं को विक्रयकला का प्रयोग करना पड़ता है।
  4. सेवा संस्थान तथा विक्रयकला - कुछ संस्थाएं सेवा प्रदान करने का कार्य करती हैं जैसे परिवहन सेवाएं, विद्युत आपूर्ति करने वाली संस्थाएं, भण्डारण सेवाएं प्रदान करने वाली संस्थायें। इनको भी बड़े-बड़े आदेश प्राप्त करने के लिए विक्रयकला का प्रयोग करना पड़ता है।
  5. गैर व्यावसायिक संगठनों में विक्रयकला - ऐसे संगठन जो गैर व्यावसायिक कार्यों में संगल्गन हैं उन्हें भी विक्रयकला को प्रयोग करना पड़ता है जैसे पेशेवर संस्थायें चार्ट्रड एकाउन्टेंन्टस की फर्मे, लागत लेखांकक, चिकित्सक फर्मे, अधिवक्ता आदि के कार्य। ये संस्थायें बड़े-बड़े प्रतिष्ठानों का कार्य प्राप्त करने के लिए इनको भी विक्रय कला को अपनाना पड़ता है। धार्मिक उद्देश्यों से जुड़े मठाधीश विविध प्रलोभनों व लुभावने वक्तव्यों व लेखों के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों को अपने साथ जोड़ते हैं तथा आर्थिक अंशदान आदि को प्राप्त करते हैं।
  6. व्यावासायिक उपक्रमों के विक्रय के बाद के कार्यों में विक्रयकला - विक्रय पूर्व की कई क्रियाएं भी विक्रय कला के विक्रय क्षेत्र में आती हैं। विक्रय कला के क्षेत्र में विक्रेताओं का चयन, प्रशिक्षण तथा उन्हें उचित विधि से पारिश्रमिक प्रदान करने सम्बन्धी क्रियाएं भी विक्रयकला के क्षेत्र माना जा सकता है। विक्रय नियेाजन एवं नियन्त्रण भी विक्रयकला के क्षेत्र में शामिल किया जाता है। इनके अतिरिक्त विक्रय के बाद क्रेता को यह बताया जाता है कि उसका उपयोग किस प्रकार करना है। वस्तु खराब होने पर उन्हें उसके रख रखाव के तरीके से भी अवगत कराया जाता है। विक्रयकला के सम्बन्ध में नये विचार कुछ विद्वान विक्रय कला को पेशेवर विक्रयकला (Professional Salesmanship) भी कहने लगे हैं। उनका विचार है कि ‘वर्तमान विक्रय कला पेशेवर विक्रय है।’ (Modern salesmanship is professional selling) जिसमें क्रेता विक्रयकर्त्ता के सम्बन्ध में पेशे व सलाह पर आधारित है। जिस तरह एक डॉक्टर मरीज को देखकर उचित दवा देता है। उसी तरह एक विक्रयकर्त्ता अपने ग्राहक की आवश्यकता का अध्ययन करता है और फिर उसे उचित वस्तु या सेवा प्रदान करता है।

विक्रयकला का महत्त्व

विक्रयकला आर्थिक विकास का एक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ है। क्योंकि विक्रयकला वाणिज्य की आधारशिला है। अत: इसे आर्थिक विकास का आधार माना जा सकता है। विक्रयकला के इस महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत विवेचित किया जा सकता है -
  1. वस्तुुओं की मांग में वृद्धि (Increase in Demand)- विक्रयकला के माध्यम से विविध वस्तुओं के प्रति ग्राहकों में इच्छा जागृत की जाती है, और उसे प्रभावी मांग में परिणित किया जाता है। इस प्रकार समाज में उत्पादन वृद्धि को प्रोत्साहन मिलता है और रोजगार विस्तार होता है।
  2. उपक्रम के उत्पादन में वृद्धि (Increase in Production)- विक्रयकला से बढ़ी मांग की पूर्ति हेतु अधिक उत्पादन करना पड़ता है। उत्पादन वृद्धि से बड़े स्तर पर उत्पादन के लाभ मिलते हैं, प्रति इकाई लाकत कम आती है, अधिक लोगों को रोजगार प्राप्त होता है व राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है।
  3. नई वस्तुुओं के निर्माण को प्रोत्साहन (Promotes New Products)- विक्रयकला के माध्यम से नई-नई वस्तुओं का विक्रय आसान हो जाता है। इसलिए उत्पादक नई-नई वस्तुओं का विकास व निर्माण करता रहता है। आधुनिक प्रौद्योगिकी के प्रयोग से अनेक नई वस्तुओं का निर्माण करने पर इन नवीन वस्तुओं को जन समूह में प्रचलित करने के लिए विक्रयकला की सर्वाधिक आवश्यकता पड़ती है।
  4. जीवन स्तर में सुधार (Increases Standard of Living)- उपरोक्त विवरणानुसार विक्रयकला से मांग बढ़ती है जिससे उत्पादन बढ़ता है, वस्तुओं के प्रति इकाई लागत कम हो जाती है और रोजगार का विस्तार होता है तो समाज सदस्यों की आय व क्रय शक्ति भी बढ़ जाती है। इस अतिरिक्त क्रय शक्ति का प्रयोग वे नयी वस्तुओं के उपभोग में करते हैं। अतएव जिस वस्तु का प्रयोग वह क्रय शक्ति के अभाव में नहीं कर पा रहा था, बढ़ी हुई क्रय शक्ति से वह ऐसा कर सकता है। थाम्पसन के अनुसार, ‘‘आज जो हम उच्च जीवन-स्तर बिता रहे हैं वह एक सीमा तक विक्रयकला की ही देन है।’’
  5. व्यवसाय का विस्तार (Expansion of Business)- विक्रयकला वस्तुओं या सेवाओं की मांग में वृद्धि करती है, जिसे पूरा करने के लिए अधिक उत्पादन की आवश्यकता होती है। अधिक उत्पादन से उत्पादन साधनों का अनुकूलतम एवं अधिकतम उपयोग सम्भव होता है जो अन्तत: व्यवसाय का विस्तार, विविधीकरण, उत्पादन वृद्धि, नये बाजारों में प्रवेश नयी वस्तुओं के उत्पादन आदि को सम्भव बनाता है।
  6. व्यापार चक्रों से सुरक्षा (Safety from Trade Cycles)- विक्रयकला से उपभोग व उत्पादन का क्रय स्थापित करके व्यापार चक्रों के मन्दी के दौरों से व उससे होने वाली हानियों से बचा जा सकता है। विक्रयकला व्यक्तियों के मन में वस्तुओं को खरीदने व उपभोग करने की प्रेरणा देती है। इससे लोगों की आय का उपयोग विविध वस्तुओं को खरीदने में होता है, जिससे उत्पादन वृद्धि की प्रेरणा मिलती है। उपभोग व उत्पादन में अनवरत वृद्धि होते रहने से व्यापार चक्रों से बचा जा सकता है।
  7. प्रतिस्पर्द्धात्मक क्षमता का विकास (To Develop Competitive Strength)- वर्तमान कड़ी स्पर्द्धा के दौर में प्रभावी विक्रयकला से ही व्यवसायी अपने उत्पादों का विक्रय कर सकते हैं। इस प्रकार उपक्रम के अस्तित्व रक्षा व विकास के लिए विक्रयकला अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
  8. अधिक लाभ (More Profits)- विक्रयकला से विक्रय वृद्धि होती है व अधिक विक्रय से अधिक लाभ प्राप्त होता है। व्यापारी कम मूल्य पर भी अधिक मात्र में विक्रय करके अधिक लाभ कमा सकते हैं।
  9. क्रेताओं के ज्ञान में वृद्धि (Increases Knowledge of Customers)- विक्रयकला से क्रेताओं के ज्ञान में भी वृद्धि होती है। विक्रयकर्त्ता द्वारा क्रेताओं को नयी-नयी वस्तुओं उनकी तकनीकी विशेषताओं व उपयोगिताओं की जानकारी दी जाती है। उन्हें समकालीन आधुनिक वस्तुओं की किस्म, मूल्य, गुण व दोषों व उनके प्रयोग आदि की जानकारी मिलती है।
  10. क्रेताओं को क्रय निर्णर्यय में मार्ग दर्शन (Guidance to Buying Decisions)- किसी ग्राहक के लिए कौन-सा उत्पाद व उसका कौन-सा प्रतिरूप (Model) उपयुक्त रहेगा। यह निर्णय करने में भी विक्रयकर्त्ता, अपने ज्ञान व अनुभव से सहायता करता है।

विक्रयकला के आवश्यक तत्त्व

विक्रयकला में सफलता पाने के लिए विक्रेताओं में कुछ योग्यताओं तथा तत्वों का होना आवश्यक है। ये तत्त्व हैं :
  1. विक्रयकर्त्ता का प्रभावी व्यक्तित्व (Effective Personality of Salesman)- विक्रयकर्त्ता की सफलता के लिए सबस प्रमुख तत्त्व विक्रयकर्त्ता का प्रभावी व्यक्तिव होना है। अपने व्यक्तिगत गुणों के आधार पर वे ग्राहक के साथ बातचीत करते समय उसे प्रभावित करते हैं। उसके शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक एवं व्यावसायिक गुण जितने उत्कृष्ट होते हैं, उतना ही वह ग्राहक को प्रभावित कर सकेगा। जिस विक्रयकर्त्ता में जितने अधिकाधिक गुण पाये जाते हैं वह विक्रयकर्त्ता उतना ही अधिक सफल माना जाता है।
  2. संस्था के बारे में ज्ञान (Knowledge of the Institute)- विक्रेताओं की अपनी संस्था के बारे में भी पूरा-पूरा ज्ञान होना चाहिए जिससे कि ग्राहकों द्वारा पूछताछ करने पर वह उनको सही उत्तर दे सके। इसके लिए उसको संस्था के इतिहास, अन्य वस्तुओं, सभी संयन्त्रों व शाखाओं के स्थान, उच्च प्रबन्धक के नाम एवं पते, संस्था की प्रबन्धकीय वितरण, अनुसन्धान एवं विकास नीतियाँ एवं विधियां, सामाजिक उद्देश्यों, विशेष सेवाएं एवं सुविधाओं आदि के बारे में जानकारी होनी चाहिए। इनसे वह उपक्रम की अच्छी साख स्थापित कर सकता है।
  3. वस्तओं का विस्तृत ज्ञान (Perfect Knowledge of Products)- विक्रयकला में सफलता के लिए व्यक्तिगत गुणों के साथ-साथ वस्तुओं का विस्तृत ज्ञान भी आवश्यक है जैसे प्रतियोगी वस्तुओं की विभिन्न किस्मों, रंग, रूप, डिजायन, मूल्य तकनीकी व अन्य विशेषताओं, वस्तु के उत्पादन मेंं प्रयोग आने वाला कच्चा माल, उत्पादन का तरीका, माल की पूर्ति, वस्तु का पैकिंग आदि का ज्ञान होना चाहिये। ऐसे ज्ञान के आधार पर वह अपने ग्राहकों को तुलनात्मक लाभों एवं कमियों को बताकर प्रभावित करने में विक्रेता सफल हो सकता है।
  4. ग्राहकों की जानकारी (Knowledge of Customers)- विक्रयकला में सफलता के लिए आवश्यक है कि विक्रयकर्त्ता को ग्राहकों व उनकी रुचियों, पसंद, नापसंद, क्रय-क्षमता, क्रय आधार सामान्य प्रकृति आदि का भी ज्ञान हो। सफलता के लिए विक्रयकर्त्ता को उनके स्वभाव को ध्यान में रखकर बात करनी चाहिए। इसी प्रकार क्रेता के उद्देश्यों का भी एक विक्रयकर्त्ता द्वारा ध्यान में रखकर उनके अनुरूप वस्तु दिखानी व वार्ता करनी चाहिए। इस प्रकार ग्राहकों के स्वभाव एवं क्रय उद्देश्यों आदि का ज्ञान होने से उनके साथ उचित रूप से व्यवहार कर विक्रय में सफलता अर्जित की जा सकती है।
  5. विक्रय प्रक्रिया की जानकारी व उसमें दक्षता (Knowledge of the Selling Process & Profeciency in it)- विक्रयकला में सफलता के लिए विक्रय विधि का भी ज्ञान होना चाहिए। विक्रयकला के विविध प्रकारों के अन्तर्गत भिन्न-भिन्न विक्रय प्रक्रिया अपनायी जाती है। विक्रेता को इस प्रक्रिया की जानकारी होनी चाहिए तभी वह दक्षता व प्रभावशीलता से कार्य कर सकेगा।

विक्रयकला की सीमाएँ

  1. वस्तु की खराब किस्म (Bad Quality opf Product)- वस्तु की किस्म खराब है तो विक्रयकला भी अल्प प्रभावी रहेगी। ऐसी दशा में प्रारम्भ में चाहे वस्तुयें बेची जा सकती हों, लेकिन दीर्घकाल में उस वस्तु का विक्रय सम्भव नहीं है। इस प्रकार वस्तु की खराब किस्म विक्रय कला की सीमा को बांध देती है।
  2. वस्तु का अभाव (Scarcity of Goods)- यदि बाजार में वस्तु की माँग अधिक है तथा पूर्ति कम है तो वस्तु स्वयं ही बिक जायेगी जिसमें विक्रयकला का कोई महत्त्व नहीं होगा।
  3. उच्च मूल्य (High Price)- यदि वस्तु का मूल्य क्रेता की क्रय क्षमता से बाहर है तो विक्रय कला भी वस्तु के लिए मांग उत्पन्न नहीं कर सकती।
  4. एकाधिकार (Monopoly)- यदि बाजार में किसी वस्तु का एक ही उत्पादक व विक्रेता है तो उसका बाजार पर एकाधिकार हो जाता है ऐसी स्थिति में बिना विक्रयकला के ही वस्तु बिक जायेगी।
  5. व्ययशीलता (Expensive)- क्रेताओं की संख्या अधिक होने पर वैयक्तिक विक्रय बहुत खर्चीला साबित होता है। 
  6. कुशल विक्रयकर्त्ताओं की कमी।
  7. असंख्य क्रेताओं से सम्पर्क में कठिनाई- विक्रयकला क्रेता तथा ग्राहक की व्यक्तिगत भेंट पर आधारित है। यदि क्रेताओं की संख्या बहुत अधिक और व्यापक है तो विक्रेता को सभी के पास नहीं भेजा जा सकता। 
  8. आन्दोलनात्मक कार्यवाहियों की दशा में मानवीय सम्बन्धों के प्रबन्ध की समस्या भी विक्रय कला को प्रभावहीन करती है।

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