औद्योगिक नीति, 1980

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23 जुलाई, 1980 को कांग्रेस के पुन: सत्ता में आने के कुछ माह पश्चात् ही नयी औद्योगिक नीति की घोषणा की गयी। नया नीति प्रस्ताव मूलत: 1956 की औद्योगिक नीति प्रस्ताव के अधीन ही बनाया गया। नये नीति प्रस्ताव के प्रस्ताव में यह उल्लेख किया गया कि 1956 का औद्योगिक नीति प्रस्ताव हमारे देश की मूल्य व्यवस्था (Value System) को प्रतिबिम्बित करता है और 1956 के प्रस्ताव एवं नीति ने यह निर्णायक तौर से यह सिठ्ठ कर दिया है कि हमारे देश की व्यवस्था में ‘रचनात्मक लोच’ विद्यमान है तथा यह हमारे लिए भी उपयोगी सिठ्ठ हुई है।

औद्योगिक नीति, 1980 के प्रमुख उद्देश्य

नयी औद्योगिक नीति में कुछ ‘सामाजिक एवं आर्थिक’ उद्देश्यों का उल्लेख विशेष रूप से किया गया है। इन उद्देश्यों का मुख्य आधार देश का तीव्र एवं सन्तुलित औद्योगीकरण तथा देश के सभी लोगों को अधिकतम लाभ उपलब्ध कराना रहा है। इसके प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं-
  1. उद्योगों की संस्थापित क्षमता का अनुकूलतम उपयोग; 
  2. देश में उत्पादन को अधिकतम करना तथा उच्च्तर उत्पादकता को प्राप्त करना 
  3. उच्चतर रोजगार के अवसर उत्पन्न करना 
  4. औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े हुए क्षेत्रों को प्राथमिकता के आधार पर विकसित करते हुए प्रादेशिक असन्तुलन को दूर करना 
  5. कृषि पर आधारित उद्योगों को प्राथमिकता प्रदान करते हुए देश के कृषि आधार को मजबूत बनाना तथा अन्तर्क्षेत्राीय सम्बन्धों की क्रियाओं में संवर्ठ्ठन करना; 
  6. निर्यात सम्भावित उद्योगों की वृठ्ठि करना तथा ऐसे उद्योगों के विकास पर बल देना जिससे हमारे आयात कम हो सकें, जिससे हमारे देश में ही उन वस्तुओं का उत्पादन हो सके जिन्हें हम अभी तक विदेशों से आयात करते रहे हैं; 
  7. एक ऐसे ‘आर्थिक संघवाद’ का प्रवर्तन करना, जिसमें विनियोगों का समान विरतण हो तथा जिनका लाभ छोटी और बढ़ती हुई ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों की इकाइयों को मिल सके; 
  8. खराब किस्म की वस्तुओं और वस्तुओं के ऊँचे मूल्यों के सन्दर्भ में उपभोक्ताओं को संरक्षण प्रदान करना।

औद्योगिक नीति, 1980 की विशेषताएँ

औद्योगिक नीति में हमारी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक व्यवस्था पर एक नया एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया गया है। नयी नीति में वर्णित उछेश्यों को प्राप्त करने के लिए अनेक रचनात्मक कदम उठाये गये है।

सार्वजनिक क्षेत्र में सुधार 

इस नीति में यह उल्लेख किया गया है कि पिछले कुछ वर्षो मे ‘राजनीतिक शून्यता’ रहने के कारण यह एक दुर्भाग्यपूर्ण बात सामने आई है कि सार्वजनिक क्षेत्र में लोगों का विश्वास कम हुआ है। इसलिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात लोगों के विश्वास में अभिवृठ्ठि करने के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्र में कुशल प्रबन्ध व्यवस्था करना है। रोजगार एवं बचत में सार्वजनिक क्षेत्र के योगदान में वृद्धि हो, ऐसे कदम उठाना भी बहुत ज़रूरी हैं। कुल मिलाकर सार्वजनिक क्षेत्र की छवि सुधारने के लिए अग्रलिखित कदम उठाना आवश्यक समझा गया-
  1. सार्वजनिक क्षेत्र की सभी इकाइयों पर पृथक रूप से ध्यान रखा जायेगा तथा उनकी जाँच की जाएगी और जहाँ भी आवश्यक होगा, उनकी कुशलता को बढ़ाने के लिए सुधारात्मक उपाय किये जायेंगें;
  2. गतिशील एवं सक्षम प्रबन्ध उपलब्ध कराने तथा व्यवस्था की पुन: संरचना के द्वारा हानि में चल रहे उद्योगों को लाभप्रद स्थिति में लाने को प्राथमिकता दी जायेगी;
  3. सार्वजनिक क्षेत्र के मुख्य कार्यात्मक क्षेत्रों के लिए पेशेवर संवर्ग (Professional Cadres) तैयार करने तथा इसके विकास के लिए कदम उठाये जायेंगे।

निजी क्षेत्र का विकास 

मिश्रित अर्थव्यवस्था को बनाये रखना तथा 1956 की औद्योगिक नीति को आधार मानते हुए इस नीति में भी निजी क्षेत्र के विकास पर पूरा ध्यान रखा गया है। इस नीति में यह उल्लेख किया गया है कि राष्ट्रीय लक्ष्यों, उछेश्यों, नियोजन, एवं नीतियों में सामन्जस्य रखते हुए निजी क्षेत्र को विकास करने के पूर्ण अवसर दिये जायेगें। लेकिन यह अवश्य स्पष्ट कर दिया गया है कि कुछ ही हाथों में आर्थिक सत्ता व सम्पदा का संकेन्द्रण और एकाधिकारी प्रवृतियों का विकास करने की अनुमति नहीं होगी।

नीति प्रस्ताव में यह कहा गया है कि निजी क्षेत्र के उद्योगों को दी जाने वाली सुविधाएँ एवं छूट निष्पादमूलक होनी चाहिए। इसलिए इस कार्य के लिए आवर्ती मूल्यांकन किया जायेगा, जिसमें इस बात को विशेष रूप से देखा जायेगा कि दी गयी सुविधाओं का मूल लक्ष्यों की प्राप्ति में क्या योगदान एवं प्रभाव रहा है?

1975 में सरकार ने अतिरिक्त उत्पादन क्षमताओं, विनियोजन प्रक्रिया का उदार बनाने तथा अनुज्ञापित क्षमता से आधिक उत्पादन करने के सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिये थे। वास्तव में नवीन तकनीक एवं श्रम उत्पादकता में वृठ्ठि के साथ-साथ उत्पादन क्षमताओं में वृठ्ठि एवं विस्तार होता रहता है, इसलिए नयी नीति में यह उल्लेख किया गया है कि
  1. उद्योगों में बढ़ी हुई उत्पादन क्षमताओं को मान्यता दी जाये;
  2. मूलभूत, महत्वपूर्ण तथा रक्षा सम्बन्धी जैसे विशेष उद्योगों मे 5 प्रतिशत वार्षिक दर से (जो 5 वर्षो की अवधि में 25 प्रतिशत से अधिक न हो) स्वत: विस्तार की अनुमति प्रदान की जाये;
  3. निर्यात मूलक उद्योगों में उन्नत एवं विकसित तकनीक को अपनाया जाये;
  4. कुशलतापूर्ण संचालित उद्योगों से तकनीक का हस्तानतरण नयी क्रियाशील इकाइयों को किया जाए। ऐसी इकाइयाँ जिनमें शोध एवं विकास के सुसंगठित सम्भाग हैं, को उन्नत एवं विकसित तकनीक के निर्यात करने की अनुमति दी जाये;
  5. आधुनिकीकरण की योजनाओं को प्रत्येक उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार किया जाये, जिसमें निम्नांकित सभी पहलुओं को सम्मिलित किया जा सकता है- (अ) उद्योगों का उपयुक्त स्थानीकरण तथा ऊर्जा का अनुकूलतम उपयोग; (ब) उत्पादन लागत को न्यूनतम करने तथा दुर्लभ सामग्री के उपयोग की कुशलता में वृद्धि करने के लिए उत्पादन के आकार एवं स्तर तथा तकनीक को अपनाना;
  6. विभिन्न अनुज्ञापित एवं पंजीकृत विनियोजन योजनाओं की प्रगति पर एक समंक कोष (Data Bank) की स्थापना की जाये।

लघु उद्योगों का विकास  

ऐसे क्षेत्र जिन्हें औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा घोषित किया जाये, वहाँ एक केन्द्रक संयन्त्रा (Nucleus Plant) लगाने का सरकार का विचार हैं ऐसे केन्द्रक संयन्त्रा छोटे उद्योगों की वस्तुओं को एकत्रा करने, जोड़ने, विनियोजन एवं रोजगार का एक वृहत् आधार प्रदान करने तथा औद्योगीकरण को गति प्रदान करने में सहायक होंगे। पिछड़े औद्योगिक क्षेत्रों तथा एवं इसके सहायक उद्योगों के विकास पर इस प्रकार से ध्यान दिया जायेगा कि कुछ वर्षो में वृहत् एवं लघु उद्योगों के कृित्राम विभाजन को समाप्त किया जा सकेगा। लघु उद्योगों के विकास तथा उनकी विकास प्रक्रिया में तीव्रता लाने के उछेश्य से यह निश्चित किया गया है कि -
  1. सूक्ष्म क्षेत्र की इकाइयों (Tiny Sector) में विनियोजन की सीमा एक लाख से बढ़ाकर दो लाख रूपये की जाये;
  2. लघु उद्योगों मे विनियोजन की सीमा को 10 लाख से बढ़ाकर 20 लाख रूपये किया जाये
  3. सहायक उद्योगों में विनियोजन की सीमा को 15 लाख से बढ़ाकर 25 लाख रूपये किया जाये।
लघु उद्योगों की सहायता एवं विकास करने की दृष्टि से कुछ आवश्यक सामग्रियों के लिए ‘बफर स्टॉक’ के निर्माण की योजना है। इस कार्य के लिए राज्यों के लघु उद्योग विकास निगमों तथा केन्द्र स्तर पर राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम की सेवाओं का उपयोग भी किया जायेगा। आवश्यक सामग्री सम्बन्धी राज्यों की विशेष आवश्यकताओं को केन्द्र द्वारा प्राथमिकता दी जायेगी।

रूग्ण इकाइयों की दशा में सुधार

इस औद्योगिक नीति में करूण औद्योगिक इकाइयों की दशा में सुधार करने के लिए निम्नलिलिखत उपाय सुझाये गये हैं-
  1. ऐसी स्थिति में जहाँ जान-बूझकर कुप्रबन्ध या वित्तीय अनियमितता पायी जाती है, वहाँ सख्ती से काम लिया जायेगा;
  2.  ऐसी व्यवस्था बनाई जाये जिसके द्वारा इकाइयों की रूग्णता के संकेत समय से पूर्व प्राप्त किय जा सकें;
  3. ऐसी रूग्ण इकाइयाँ जिनमें सुधार की सम्भावना है, को स्वस्थ बड़ी इकाइयों के संयोजन में प्रोत्साहन एवं सहायता दी जायेगी। लेकिन स्वस्थ इकाइयाँ ऐसी स्थिति में हो कि वे रूग्ण इकाइयों को सुव्यवस्थित कर सकें तथा उनको लाभदेयता की स्थिति में ला सके;
  4. रूग्ण इकाइयों का सरकार द्वारा अधिग्रहण केवल उन्हीं अपवादजनक परिस्थितियों में किया जायेगा जहाँ उनके सुधार के लिए कोई अन्य विकल्प उपयुक्त नहीं समझा जायेगा।

व्यवसाय का सामाजिक उत्तरदायित्व

 यह औद्योगिक नीति कुछ विशेष सन्दर्भो में व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व को महत्त्वपूर्ण मानती है। नीति में स्पष्ट किया गया है कि जहाँ एक ओर सरकार उद्योगों के विकास और संवर्ठ्ठन के लिए पूर्ण प्रयास करेगी तथा उद्योगों को सहायता प्रदान करेगी, वहीं दूसरी और उद्योगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे कुछ सन्दर्भो में अपने सामाजिक दायित्व का निर्वाह करें, जिससे
  1. आपूर्ति रेखा (Supply Line) को ठीक बनाये रखा जा सके;
  2. सट्टे व जमाखोरी से बचा जा सके;
  3. उपभोक्ता के हितों की रक्षा की जा सके।
इसके साथ ही वे अपनी क्रियाओं का संचालन इस ढंग से करें कि देश में उत्पादन के स्तर को अधिकतम किया जा सके।

मधुर औद्योगिक सम्बन्ध 

विगत तीन वर्षो (1977-1980) में बिगड़ते हुए औद्येगिक सम्बन्धों ने अर्थव्यवस्था के कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों को विपरीत रूप से प्रभावित किया है तथा इसके परिणामस्वरूप औद्योगिक उत्पादन में गिरावट आयी है। श्रमिकों के हितों तथा कल्याण को सरकार अत्यधिक महत्व देती है, लेकिन यह भी मानती है कि अर्थव्यवस्था के विकास के लिए प्रबन्ध एवं श्रमिकों, दोनों का सहयोग बहुत जरूरी है। सरकार का यह विचार है कि ित्रापक्षीय श्रम कॉन्फेन्स को पुन: जागृत किया जाये, जिससे दोनों पक्षों का पूरा सहयोग प्राप्त किया जा सके तथा देश में औद्योगिक शन्ति बनाये रखने में और उत्पादन वृठ्ठि में सफलता प्राप्त की जा सके।

विनियोजन का वातावरण

औद्योगिक विकास एक अन्तर्क्षेत्रीय संकल्पना है। इसका अभिप्राय न केवल उत्पादन क्रियाओं से ही है, बल्कि यह आधारभूत ढाँचे के विकास, अनुज्ञापन एवं निगम नीतियाँ, औद्योगिक सम्बन्ध एवं प्रबन्ध, वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास तथा वृहत् सामाजिक-आर्थिक नीतियों से सम्बठ्ठ है। इसलिए औद्योगिक नीति के क्रियान्वयन में प्रभावी समन्वय आवश्यक है तथा यह भी जरूरी है कि केन्द्र तथा राज्य के विभिन्न स्तरों पर निष्पादन-नियन्त्राण किस प्रकार किया जाता है। इसकी अन्तिम सफलता इस बात निर्भर करेगी कि उद्योगों को समाज से किस सीमा तक सहायता एवं सहयोग प्राप्त होता है। इन सब घटकों की अन्तर्क्रियाएँ ही मिल कर किसी देश में विनियोजन के वातावरण का निर्माण कर सकती है।

क्षेत्रीय असंतुलन में सुधार

सरकार पिछड़े हुए क्षेत्रों को विकसित करने हेतु वहाँ उद्योगों की स्थापना पर अधिक ध्यान देगी तथा ऐसे क्षेत्रों मे विशेष सुविधाएँ उपलब्ध करायेगी। आवश्यकतानुसार इन सुविधाओं में परिवर्तन किया जा सकेगा। इन क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना हेतु वित्तीय सहायता, अनुदान एवं अन्य विशेष सुविधाएँ प्रदान की जायेंगी।

ग्रामीण उद्योगों का विकास 

ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने हेतु हाथ-करघा, हस्तकला, खादी एवं अन्य ग्रामीण उद्योगों की स्थापना पर जोर दिया गया। इससे गाँवों में रोजगार के अवसरों तथा आय में वृठ्ठि करके गाँवों में विकास की दर को तीव्र किया जा सकेगा। ग्रामीण तथा शहरी दानों ही क्षेत्रों में विनियोग को प्रोत्साहित करके उच्च उत्पादन एवं उच्च रोजगार के आदर्श को प्राप्त किया जायेगा।

निर्यातोन्मुखी उद्योगों को प्रोत्साहन

 इस औद्योगिक नीति के अन्तर्गत सरकार ने निर्यात बढ़ाने वाली इकाइयों को बढ़ावा देने का निश्चय किया। अत: ऐसे उद्योगों को विशेष सुविधाएँ देने, विस्तार हेतु सहानुभूतिपूर्वक विचार करने, उत्पादन की उच्च तकनीक उपलब्ध कराने आदि पर विशेष बल दिया गया। साथ ही, आयात प्रतिस्थापना (Import Substitution) उद्योगों को भी प्रोत्साहन व संरक्षण दिया जायेगा। इससे देश का भुगतान सन्तुलन अनुकूल हो सकेगा व विदेशी मुद्रा का अर्जन सम्भव हो सकेगा।

टेक्नालॉजी एवं आधुनिकीकरण 

नई औद्योगिक नीति में इस बात का उल्लेख किया गया कि सम्पूर्ण औद्योगिक व्यवस्था का आधुनिकीकरण किया जायेगा। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए टैक्नालॉजी का विकास किया जायेगा। इसके अतिरिक्त औद्योगिक एवं अनुसन्धान संस्थाओं को टेक्नालॉजी आयात करने की सुविधा भी दी जायेगी।

औद्योगिक नीति की समीक्षा

जुलाई 1980 में घोषित औद्योगिक नीति देश की छठी पंचवष्र्ाीय योजना के प्रथम वर्ष की देन है। छठी योजना के पहले तीन वर्षो पर इस औद्योगिक नीति का प्रभाव हमारे देश में हुए औद्योगिक उत्पादन से कर सकते हैं। 1980-81 में औद्योगिक उत्पादन में 4 प्रतिशत वृठ्ठि हुई जो 19़81-82 में बढ़कर 8.6 प्रतिशत तक पहुँच गयी। लेकिन 1982-83 में 4.5 वृठ्ठि ही हो जायी। 1982-83 में कुल मिलाकर वृठ्ठि दर में कमी आने का कारण उन कुछ उद्योगों के उत्पादन की गति धीमी रहना है, जिन्होंने 1981-802 में बहुत अधिक उत्पादन किया था। मुम्बई के कपड़ा उद्योगों में लम्बे समय तक हड़ताल रहने के कारण भी औद्योगिक उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ा। लघु उद्योग और ग्रामोद्योगों सहित विकेन्द्रीकृत क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई। औद्योगिक निवेश में निरन्तर वृठ्ठि बनी रही।

सार्वजनिक क्षेत्र में कार्य में उल्लेखनीय सुधार हुआ। वर्ष 1981-82 के दौरान शुठ्ठ लाभ 485 करोड़ था, जबकि वर्ष 1981-82 में 203 करोड़ रूपये और वर्ष 1979-80 में 74 करोड़ का घाटा हुआ था। वर्ष 1982.83 के पहले छ: महीनों में सार्वजनिक उद्योग के उत्पादन में 8ण्9 प्रतिशत वृद्धि हुई और 73 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हुआ, जबकि पिछले वर्ष की अवधि में शुद्ध लाभ 48 करोड़ रुपये रहा था।

इस औद्योगिक नीति का उद्देश्य प्रमुख क्षेत्रों में आन्तरिक संसाधन बढ़ाना, क्षेत्रीय असन्तुलन दूर करना, त्वरित अनुसन्धान और विकास, संस्थापित क्षमता का बेहतर उपयोग, निर्यात के लिए अधिक मात्रा में माल का उत्पादन करना तथा रोजगार के अधिक अवसर पैदा करना है। औद्योगिक उत्पादन को वांछित दिशा देने के लिए 3 वर्षो के दौरान अनेक उपाय किये गये हैं। लेकिन फिर भी उद्योगों के अनेक क्षेत्रों में आधुनिकीकरण और उनमें अधिक कुशलता के साथ उत्पादन किये जाने की तत्काल आवश्यकता है, ताकि औसत लागत और मूल्यों में कमी लायी जा सके। क्षमता के बेहतर उपयोग के माध्यम से औद्योगिक उत्पादों की कीमतों में कमी लाने के लिए फालतू और अनुत्पादक खर्चो को समाप्त कर लागत व्यय को घटाने और ज्यादा पूँजी निवेश के माध्यम से अधिक आन्तरिक संसाधन जुटाने हेतु ठोस प्रयास किये जाने जरूरी हैं। इस नीति में सामाजिक-आर्थिक उछेश्यों का उल्लेख इसे ज्यादा आकर्षक बना देता है, लेकिन देखना यह है कि इन उछेश्यों को प्राप्त करने में कहाँ तक सफलता मिलती है? नीति में अनेक स्थानों पर समयवठ्ठ कार्यक्रम का उल्लेख किया गया है, लेकिन उनका वास्तविक स्वरूप कहीं दिखायी नहीं देता है। देश के औद्योगिक विकास में उप-ढाँचे सम्बन्धी (Infrastructural) संकट रहा है। यह एक सराहनीय कदम हैं कि इस नीति में उप-ढाँचे के क्षेत्र में निष्पादन में सुधार करने को अति आवश्यक माना गया है।

औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र के महत्वपूर्ण कार्यो का उल्लेख है तथा यह भी कि गैर-कांग्रेसी काल में लोगों का इसमें विश्वास कम हो गया था। आगे आने वाले काल में इस वक्तव्य की सत्यता को और अधिक जाँचा जा सकेगा। सार्वजनिक क्षेत्र में सुधारात्मक कदमों की बात करना प्रशंसनीय दिशा बोध है।

लघु, सूक्ष्म एवं सहायक उद्योगों में विनियोजन की सीमा में वृठ्ठि करना न्यायोचित एवं पूर्ण औचित्यपूर्ण है, क्योंकि कीमतों में वृठ्ठि ने इसे आवश्यक बना दिया था।

अनुज्ञापित क्षमता से अधिक की क्षमताओं को नियमित करना तथा स्वत: विस्तार की सुविधा प्रदान करना कुछ अनिवार्य वस्तुओं के उत्पादन में न्यूनतम लागत पर वृठ्ठि करने तक तो श्रेष्ठ रहेगा, लेकिन इसके दुरूपयोग की पूरी सम्भावनाएँ हैं।

औद्योगिक नीति में जिन अनेक महत्वपूर्ण बातों का समावेश किया गया है और जिनका वर्णन हम पहले कर चुके हैं, उनसे औद्योगिक विकास में आशाएँ जागृत होती हैं। लेकिन देखना यह है कि इन्हें किस प्रकार, किन प्राथमिकताओं के आधार पर और किसी सीमा तक क्रियान्वित किया जाता है। क्योंकि विगत 35 वर्षो में (1948 की औद्योगिक नीति से लेकर 1983 तक) हमने यह देखा है कि देश की अर्थव्यवस्था की धीमी प्रगति का कारण नीतियों के दोषों की अपेक्षा नीतियों का अनुपयुक्त एवं अकुशल क्रियान्वयन रहा है।

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