भारोपीय भाषा परिवार का इतिहास, क्षेत्र एवं विशेषताएँ

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भारोपीय भाषा परिवार यूरोशिया खण्ड का सबसे प्रमुख परिवार है। इस परिवार में मुख्यत: भारत और यूरोप की भाषाएँ सम्मिलित हैं अत: इसका अंग्रेजी में Indo - European नाम दिया गया जिसका ही हिन्दी अनुवाद भारोपीय है। भारोपीय भाषा नाम की कोई भाषा हमें उपलब्ध नहीं है। न ही इस भाषा के वास्तविक स्वरूप का ही ज्ञान है। न हीे यह ज्ञान है कि भारोपीय भाषा जैसी कोई भाषा यदि रही है तो वह किस क्षेत्र में बोली जाती थी। लगभग सभी विद्वान् इस बात से सहमत हैं कि कोई प्राचीन भाषा थी जिससे संस्कृत, ग्रीक, लैटिन और उनसे विकसित हुई भारतीय और यूरोपीय भाषाएँ सम्बन्धित हैं। इन सभी भाषाओं के समन्वित स्वरूप की कल्पना करके भारोपीय भाषा की कल्पना की गई है।

नामकरण

इस कल्पित भाषा का नाम ‘भारोपीय भाषा’ आज लगभग सर्वमान्य है और प्रचलित है। परन्तु प्रारम्भ में इसके नामकरण के विषय में अनेक मतभेद रहे हैं। डा. कर्णसिंह ने इन मतों का संकलन इस प्रकार किया हैं विश्व के भाषा-परिवारों में भारोपीय भाषा-परिवार सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। भारतीय भाषाओं (विशेषत: संस्कृत) के पाठकों के लिए तो इसका महत्त्व निर्विवाद ही है, क्योंकि भारतीय भाषाएँ इसी परिवार की हैं। इस परिवार की अन्य भाषाएँ भी महत्त्वपूर्ण ही है। डॉ. मंगलदेव शास्त्राी के अनुसार- “भारत-यूरोपीय (भारोपीय) भाषा-परिवार से आशय उन समस्त भाषाओं से है, जो उस प्राचीन भारत-यूरोपीय मूलभाषा से निकलती हैं। ‘भारत-यूरोपीय’ शब्द के प्रयोग से यही अभिप्राय है कि इस भाषा-परिवार के, भारत से लेकर यूरोप तक के, भौगोलिक विस्तार की ओर ध्यान दिलाया जा सके।”

इस परिवार के नाम के सम्बन्ध में बहुत विवाद रहा है तथा समय-समय पर अनेक नाम सामने आये हैं, जैसे-
  1. इण्डो-जर्मनिक।
  2. इण्डो-कैल्टिक।
  3. संस्कृत।
  4. जैफ़ाइट या जफ़ेटिक।
  5. काकेशियन।
  6. आर्य,
  7. इण्डो-योरोपियन (भारोपीय)।
  8. इण्डो-हित्ताइत (भारत-हित्ती)।
यहाँ इन पर क्रमश:, संक्षेप में, विचार किया जा रहा है-
  1. इण्डो-जर्मनिक: यह नाम जर्मन-भाषावैज्ञानिकों, विशेषत:, ‘मैक्समूलर’ का दिया हुआ है, जर्मन देश में आज भी यह प्रचलित है। यह नाम इसलिए सुझया गया था, क्योंकि इस परिवार की पूर्वी सीमा पर भारत की भाषाएँ तथा पश्चिमी सीमा पर जर्मनिक भाषाएँ बोली जाती हैं। अत: भौगोलिक दृष्टि तथा जर्मन देश को महत्त्व देने की दृष्टि से यही नाम जर्मनी विद्वानों ने उपयुक्त समझा। किन्तु यूरोप के दूसरे देशों के विद्वानों को यह नाम मान्य नहीं हुआ। उसके दो कारण थे, एक तो इसी परिवार की कैल्टिक शाखा की भाषाएँ, उपर्युक्त भौगोलिक सीमा के पश्चिम में रह जाती थीं; दूसरे, प्रथम महायुद्ध के उपरान्त जर्मनी के प्रति शेष यूरोप में द्वेष की भावना अधिक थी। अत:, इस परिवार के नाम में जर्मनी के नाम को महत्त्व देना अन्य यूरोपीय विद्वानों को सह्य नहीं हो सका।
  2. इण्डो-कैल्टिक: जैसा ऊपर कहा जा चुका है, यह नाम भौगोलिक सीमा-विस्तार की दृष्टि से यद्यपि इण्डो-जर्मनिक नाम की अपेक्षा कुछ विद्वानों के लिए सार्थक था, तथाकथित केवल भौगोलिक सार्थकता ही पर्याप्त नहीं समझी गयी और यह नाम भी प्रचलित नहीं हो सका।
  3. संस्कृत: इस परिवार की भाषाओं में संस्कृत भाषा महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि इसी के अध्ययन द्वारा तुलनात्मक भाषाविज्ञान की नींव पड़ी थी। साथ ही, तब कुछ विद्वानों का यह भी विचार था कि इस परिवार की मूलभाषा भी संस्कृत ही है। किन्तु, यह नाम भी एकांगी अनुभव किया गया; क्योंकि, एक तो संस्कृत के समकक्ष ही अन्य ‘ग्रीक’, ‘लैटिन’ आदि भाषाएँ भी इसी परिवार की है। दूसरे, संस्कृत इस परिवार की मूलभाषा नहीं थी। अत: यह नाम भी मान्यता प्राप्त नहीं कर सका।
  4. जैफाइट या जफ़ेटिक: बाइबिल में हजरत ‘नूह’ के एक पुत्रा ‘जेफ़ेट के नाम पर मनुष्य जाति के एक वर्ग को जफ़ेटिक नाम दिया गया है। इसी जातीय आधार पर कुछ विद्वानों ने इस भाषा-परिवार को भी सैमिटिक-हैमिटिक की भाँति ही जफ़ैटिक कहना चाहा, किन्तु चूँकि कुछ जफ़ैटिक लोग भारोपीय परिवार से भिé परिवारों की भी भाषाएँ बोलते हैं, अत: अवैज्ञानिक होने के कारण यह नाम भी उपयुक्त नहीं समझा गया।
  5. काकेशियन: ‘काकेशस’ प्रदेश के आधार पर इस परिवार को ‘काकेशियन’ भी कहा गया, किन्तु एक अन्य समूह की भाषाओं को ‘काकेशस’ कहे जाने तथा भारोपीय समूह की विशेषताओं से उसकी विशेषताओं के भिé होने के कारण यह भी भ्रमात्मक सिद्ध हुआ।
  6. आर्य: पहले समझा जाता था, कि भारोपीय परिवार की भाषाओं को बोलने वाले सभी लोग आर्य हैं, अत: इस परिवार को ‘आर्य’ नाम देना उचित माना गया। किन्तु एक तो इस परिवार की भाषाओं को बालने वाले सभी आर्य नहीं हैं, दूसरे ‘आर्य’ नाम की ‘भारोपीय परिवार’ की एक शाखा है, जो भारत तथा ईरान के भाषाओं के लिए बहुत प्रसिद्ध है। अत: पूरे परिवार को ‘आर्य’ कहना ठीक नहीं समझा गया। यद्यपि ‘मैक्समूलर’ तथा जैसपर्सन’ ने इसे फिर भी ‘आर्य’ नाम से ही अभिहित किया है। किन्तु, मुख्य रूप से भारतीय परिवार की ‘भारत-ईरानी शाखा को ही विद्वानों ने ‘आर्य शाखा’ कहा है।
  7. इण्डो-योरोपियन या भारोपीय: यद्यपि यही नाम आजकल अधिक प्रचलित है, तथापि डॉ. भोलानाथ तिवारी1 इस नाम को भी ठीक नहीं मानते हैं। उनके अनुसार यह नाम जिसे भौगोलिक आधार पर रक्खा गया है, वह आधार भी इससे ठीक-ठीक प्रकट नहीं होता है। स्पष्ट ही इस परिवार की भाषाएँ केवल भारत-योरोप में न बोली जाकर अमरीका, आस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के भी अनेक भागों में बोली जाती है, जैसे अंगे्रजी, फ्रेंच आदि। अत: डॉ. तिवारी के अनुसार यह नाम भी मान्य नहीं होना चाहिए।
  8. विरोस्: यह नाम डॉ. भोलानाथ तिवारी द्वारा प्रस्तावित है। उनका तर्क है कि भाषा-विज्ञानविद ने तुलनात्मक अध्ययन (संस्कृत वीर, लैटिन Uir, Vir, प्राचीन आइरी Fer, जर्मनिक Wer आदि) के आधार पर मूल भारोपीय या भारतहित्तीय भाषा के एक शब्द Wiros का पुनर्निमाण किया है और उन मूल लोगों को भी इसी विरोस् शब्द से पुकारा है। यदि हम उन मूल लोगों को ‘विरोस्’ कह रहे हैं तो उसी आधार पर उस मूल भाषा के परिवार के लिए ‘विरोस् परिवार (Wiros family) का प्रयोग कर सकते हैं।
  9. इण्डो-हिट्टाइट (भारत-हितो): वैज्ञानिक दृष्टि से यह नाम सर्वथा उपयुक्त है, क्योंकि अब यह ज्ञात हो चुका है कि ‘हित्ती’ भाषा भारोपीय भाषा की एक पुत्राी नहीं, अपितु भारोपीय की सहोदरा है। अत: अब ‘हित्ती’ को भारोपीय भाषा परिवार की एक शाखा नहीं माना जा सकता। ऐसी दशा में ‘भारत-हित्ती’ नाम ही इस परिवार के लिए सवो्रन्युक्त है, और यह पर्याप्त प्रचलित भी हो गया है।
  10. भारोपीय-एनाटोलियन: डॉ. भोलानाथ तिवारी ने ही भारोपीय परिवार के लिए यह नाम भी प्रस्तुत किया है। जहाँ बोलने वालों के आधार पर उन्होंने इसे ‘विरोस् परिवार’ कहना उपयुक्त समझा है, वहाँ इस परिवार की मूल दो शाखाओं- भारोपीय तथा एनाटलियन के आधार पर वे इसे ‘भारोपीय-एनाटोलिअन’ या ‘भारत-एनाटोलिअन’ कहना अधिक वैज्ञानिक मानते हैं।
संक्षेप में, ऊपर भारोपीय परिवार के दस नामों का परिचय दिया गया है। इनमें से कुछ नामों का आधार भौगोलिक है, जैसे ‘इण्डो-जर्मनिक’, - इण्डो-क्ैल्टिक’ ‘इण्डो-योरोपीय’, ‘इण्डो-हिट्टाइत’ काकेशियन’ आदि। कुछ नामों का आधार प्रमुख भाषा है, जैसे- संस्कृत। कुछ नामों का आधार जातीय है, जैसे- ‘जफ़ाइट, ‘आर्य’ आदि।

वस्तुत:, इनमें से कोई भी नाम पूर्णतया उपयुक्त नहीं है। डा. कर्णसिंह बोलने वालों की जाति के आधार पर इस परिवार का नाम ‘विरोस् परिवार’ ही उपयुक्त मानते हैं। यदि भारोपीय नाम की भाँति ही दो मूल शाखाओं के आधार पर इसका नामकरण करना हो, तो फिर ‘इण्डो-योरोपियन’ या ‘इण्डो-हिट्टाइट’ की अपेक्षा ‘भारोपीय-एनाटोलिअन’ या ‘भारत-एनाटोलिअन’ नाम को ही हमें स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि इस परिवार की भारोपीय (’सतम्’ तथ ‘केन्तुम’् वर्गों की भाषाएँ) तथा एनाटोलिअन जिसमें लीडियन, लीसियन हीरोग्लाफिक, फ्लेइक, लूवियन तथा हित्ती या हिट्टाइट भाषाएँ) दो ही मूल शाखाएँ हैं। अत: यह नाम पूर्णतया वैज्ञानिक है। फिर भी अभी तक ‘इण्डो-योरोपिअन’ नाम की तुलना में कोई भी नाम प्रचलित नहीं हो सका है। सम्भव है, कुछ समय बाद ऐसा हो सके कि भाषा-विज्ञानविद् इस परिवार को ‘विरोस्’ या भारत-एनाटोलियन’ नाम से पुकारना अधिक उपुयक्त समझें, किन्तु जब तब ऐसा हो, तब तक इस परिवार को -इण्डो-योरोपिअन परिवार या ‘भारोपीय परिवार’ कहना ही अधिक उपयुक्त है।

भारोपीय भाषा का क्षेत्र

भारोपीय भाषा का मूल क्षेत्र कौन सा था, इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। इस सम्बन्ध में प्रमुख मत हैं-
  1. भारोपीय भाषा का मूल क्षेत्र भारत था।
  2. मूल क्षेत्र भारत के बाहर एशिया में कहीं था।
  3. मूल क्षेत्र यूरोप में कहीं था।
  4. मूल क्षेत्र एशिया और यूरोप के संधिस्थल पर कहीं था।
भारत को मूलक्षेत्र मानने वाले विद्वानों का प्रमुख तर्क यह है कि भारत के प्राचीनतम साहित्य ऋग्वेद आदि में आर्यों का कहीं बाहर से आने का उल्लेख नहीं है। यदि आर्य भारत से बाहर किसी प्रदेश से आये होते हो ऋग्वेद में वहाँ के स्थान, नदी, पर्वत आदि का नाम अवश्य मिलता परन्तु ऋग्वेद में भारतीय नदियों और पर्वतों का उल्लेख है। ऋग्वेद भारोपीय भाषा का प्राचीनतम प्रतिनिधि ग्रन्थ है। भाषावैज्ञानिक तथ्यों से यह सिद्ध है कि भारोपीय भाषा, ऋग्वेद की भाषा के ही निकट रही होगी। ऋग्वेद और भारोपीय भाषा में काल की दृष्टि से अधिक अन्तर नहीं रहा होगा। इसलिए ऋग्वेद की भाषा बोलने वाले यदि कहीं बाहर के होते तो वहाँ के क्षेत्र का वर्णन अवश्य मिलता। परन्तु ऐसा कुछ भी उल्लेख नहीं मिलता। इसलिए आर्यों का मूल निवास भारत ही था।

परन्तु भारत को मूल स्थान मानने वाले विद्वानों में इस विषय में सहमति नहीं है कि भारोपीय भाषा का भारत में मूल क्षेत्र कौन सा था। एल. डी. कल्ला के अनुसार यह क्षेत्र कश्मीर या हिमालय में था। डा. गंगानाथ झा के अनुसार मूल स्थान ब्रह्मर्षि देश था। कुछ विद्वान् मुलतान को ही मूल स्थान मानते हैं। अविनाशचन्द्र दास हिमालय को आर्यों का मूल स्थान मानते हैं। परन्तु अधिकांश विद्वान् पाश्चात्य विद्वानों का अनुसरण करते हुए भारत को आर्यों का मूल स्थान नहीं मानते हें। उनके प्रमुख तर्क ये हैं-
  1. भारोपीय परिवार की अधिकांश भाषाएं भारत के आस पास न होकर यूरोप में या एशिया और यूरोप के संधिस्थल पर हैं। अत: सम्भावना यही है कि यूरोप की ओर से एक शाखा भारत में आकर बस गई और बाकी लोग वहीं आस पास रह गए।
  2. भारत में सभी भाषाएँ भारोपीय परिवार की नहीं हैं। दक्षिण भारत की भाषाएं द्रविड परिवार की हैं। कुछ भाषाएं मुण्डा परिवार की हैं। उत्तर में ब्राहुई परिवार की हैं।
  3. सिन्धु घाटी की सभ्यता ऋग्वैदिक काल से पूर्व की है और वहाँ की भाषा संस्कृत न होकर कोई दूसरी ही है जो सम्भवत: द्रविड़ परिवार की है। अत: सम्भावना यह है कि सिन्धु घाटी में पहले द्रविड़ बसते थे जिन्हें आर्यों ने खदेड़ कर दक्षिण की ओर जाने को विवश कर दिया।
  4. मूल भारोपीय भाषा संस्कृत की तुलना में लिथुअनियन या हित्ती आदि के अधिक निकट थीं। ऊपर दिए गए तर्क अत्यन्त दुर्बल और कल्पनाओं पर आधारित हैं। कोई भी तर्क ऐसा नहीं जो आर्यों को भारत से बाहर का सिद्ध कर सके। यह कहना कि भारोपीय परिवार की भाषाएँ भारत के आसपास न होकर यूरोप या एशिया में है, बिल्कुल सिद्ध नहीं करता कि भारत की ओर से आर्य लोग पश्चिम की ओर नहीं जा सकते। सभी विद्वान् आर्यों का एक परिवार मानते हैं परन्तु आर्य शब्द का प्रयोग भारत में ही मिलता है। यदि आर्यों का मूलस्थान भारत से बाहर होता तो वहाँ भी इस शब्द का प्रयोग मिलता। सिन्धुघाटी की सभ्यता को ऋग्वेद से पूर्व का मानना अभी प्रमाणित नहीं हो सका है। यह कहना कि सिन्धु घाटी के लोगों की भाषा द्रविड़ परिवार की थी पूर्णत: कल्पना पर आधारित है क्योंकि सिन्धु घाटी की लिपि अभी तक पढ़ी ही नहीं जा सकी है। भारोपीय भाषा को संस्कृत के निकट न मानकर लिथुआन्यिन या हित्तौ को निकट मानना भी कल्पना पर आधारित है। भारोपीय भाषा का वास्तविक स्वरूप क्या था यह अभी तक ज्ञात नहीं है। यूरोप की भाषाओं और संस्कृत भाषा के समन्वित रूप के आधार पर भारोपीय भाषा की कल्पना की गई है।
अत: इस विषय को अभी तक अनिणरी मानना ही युक्तिसंगत है। इस विषय पर अधिक गहराई से विचार किया जाए तो भारत का क्षेत्र हीं भारोपीय भाषा का क्षेत्र सम्भव है। परन्तु यहाँ इस विषय पर विचार करना अभीष्ट नहीं है। विद्वानों ने अब तक जो सम्भावनाएँष्व्यक्त की हैं विद्यार्थियों के ज्ञान के लिए उसे प्रस्तुत करना ही उचित है। भारत से बाहर भारोपीय भाषा का कौन सा क्षेत्र था इस विषय में विभिन्न विद्वानों के मत डा. भोला नाथ तिवारी ने संकलित किए है। जो इस प्रकार है-
  1. यों इस प्रश्न पर थोड़े विस्तार से विचार करने का प्रथम प्रयास एडल्फ पिक्टेट ने किया था, किन्तु गहराई और वैज्ञानिकता की दृष्टि से इस प्रसंग में प्रथम नाम प्राय: मैक्समूलर का लिया जाता है। मै क्समूलर के निष्कर्ष के अनुसार मूल स्थान पामीर का प्लेटो तथा उसके पास मध्य एशिया में था। कुछ अन्य विद्वान् भी मध्य एशिया के पक्ष में रहे हैं।
  2. स्कैण्डेनेवियन भाषाओं के विद्वान् डा. लैथम ने स्कैण्डेनेवियन भाषा को प्रमुख आधार मान कर 1860 के लगभग इस प्रश्न पर विचार किया और मध्य एशिया वाले मत का विरोध करते हुए मूल स्थान को यूरोप में माना। इनके अनुसार यूरोप में भी मूल स्थान के स्कैण्डेनेविया में होने की संभावना अधिक है। पेन्का  जाति-विज्ञान के आधार पर भी लगभग इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं।
  3. इटेलियन मानवशास्त्रावेत्ता सेर्जी (Sergi) ने एशिया माइनर के पठार में मूल स्थान का अनुमान लगाया है। हित्ती भाषा के अभिलेखों से इनके मत की पुष्टि होती है।
  4. लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने प्रमुखत: ज्योतिष तथा क्रौल के हिंद युग सिद्धान्त आदि के आधार पर ऋग्वेद की ऋचाओं के सहारे ‘आर्कटिक होम इन वेदाज’ में उत्तरी धु्रव के पास मूल स्थान माना है।
  5. भारतीय विद्वान सरदेसाई रूस में बालकल झील के पास मूल निवास मानते हैं। उनके अनुसार वहाँ आज भी ‘सात नदियों का देश’ (सप्त सिंधु) नामक प्रान्त है।
  6. डॉ. गाइल्ज ने ‘कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑव् इंडिया’ में इस बात पर विचार किया है और वह हंगरी में कारपेथिन पर्वत के आस-पास मूल स्थान मानते हैं।
  7. हर्ट के अनुसार पोलैण्ड में विश्चुला नदी के किनारे आदिस्थान था। पश्चिमी तट पर केंतुम भाषाओं के बोलने वाले रहते थे और पूर्वी तट पर सतम् भाषा के बोलने वाले। पूर्ती तुर्किस्तान में ‘तोखारी’ नामक केंतुम् भाषा के मिलने के बाद अब यह मत प्राय: निराधार हो गया है।
  8. जातीय मानवविज्ञान के आधार पर यूनानी पौराणिक कथाओं का वर्णन करके कुछ विद्वानों ने जर्मनी को मूल स्थान माना था। मिट्टी के बर्तनों की डिजाइन के आधार पर भी कुछ लोग इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे ।
  9. नेहरिंग (Nehring) ने मिट्टी के बर्तनों के अवशेषों के अलावा दक्षिणी रूस को मूल स्थान माना है।
  10. इतिहासपूर्व पुरातत्व के आधार पर मच (Much) तथा कुछ अन्य विद्वानों ने पश्चिमी बाल्टिक किनारे को मूल स्थान माना है।
  11. तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान के आधार पर विद्वान् इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि लिथुवानियन भाषा ही मूल भारोपीय के सबसे निकट है। इस आधार पर कुछ लोग ‘लिथुवानिया’ को भी मूल स्थान मानने के पक्ष में हैं। किंतु अब इस बात के प्रमाण भी पाये गये हैं कि पहले लिथुवानिया और पूरब में था।
  12. प्राचीन भारतीय परम्परा के अनुसार तिब्बत (ित्राविष्टप) में सृष्टि का आरम्भ हुआ, अत: वहीं आर्यों का मूल स्थान था। 
  13. स्लाव भाषाओं के विद्वान् प्रो. श्रेडर ने प्रमुखत: स्लाव भाषाओं का आधार लेते हुए दक्षिणी रूस में वोल्गा नदी के मुहाने और कैस्पियन सागर के उत्तरी किनारे के पास के प्रदेश को मूल स्थान माना है। यह मत काफी दिनों तक मान्य रहा है।
  14. डॉ. ब्रान्देनश्ताइन ने (1936) तुलनात्मक और एतिहासिक अर्थ विज्ञान के आधार पर मध्य एशिया वाले मत को पुन:स्थापित किया है और यूराल पर्वत माला के दक्षिण में स्थित प्रदेश को मूलस्थान सिद्ध किया है।
इनके अतिरिकत बाल्टिक सागर के दक्षिणी पूर्वी तट, मेसोपोटामिया या दज़ला-फ़रात के किनारे, दक्षिणी-पश्चिमी या उत्तरी रूस, प्रशिया, डैन्यूब नदी के किनारे, रूसी तुर्किस्तान आदि कई अन्य प्रदेशों के मूल स्थान होने के पक्ष में भी मत प्रकट किये गये हैं। उपर्युक्त मतों में गाइल्ज, श्रेडर तथा ब्रान्देन्श्ताइन के मत अपेक्षाकृत अधिक प्रचलित और प्रसिद्ध रहे हैं। आगे प्रथम और अन्तिम पर थोड़ा और विचार किया जायगा।

भाषाश्रयी या भाषा पर आधारित प्रागैतिहासिक खोज के अध्याय में हम देखेंगे कि एक परिवार के भाषाओं के शब्द-भंडारों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि मूल भाषा (जिससे वे सभी भाषाएँ निकली है) के शब्द-भंडार में कौन-कौन से शब्द थे। शब्दों का निर्णय होने पर इस बात का पता चल जायेगा कि लोग किन-किन पेड़ों, अéों और जानवरों आदि से परिचित थे। फिर अéों और जानवरों आदि के आधार पर इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है। उनका स्थान कहाँ थी। इसी पद्धति पर उपर्युक्त तीनों विद्वानों ने अपने निष्कर्ष निकाले हैं।

गाइल्ज़ 

भारोपीय परिवार की भाषाओं के शब्द-समूह के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर गाइल्ज़ ने आदि भाषा के शब्द-समूह के सम्बन्ध में जो निष्कर्ष निकाले हें, उससे पता लगाया है कि लोग बैल, गाय, भेड़, घोड़ा, कुत्ता, सूअर, भेड़िया, भालू, चूहा तथा हिरन से परिचित थे, किन्तु हाथी, गदहा, शेर, चीते तथा ऊँट आदि नहीं जानते थे। पक्षियों में हंस तथा बत्तख से परिचित थे। पेड़ों में विलो (willow) या वेतस, बर्च (birch) बर्ज तथा बीच (beech) से परिचित होने की संभावना है। ये खानाबदोश नहीं थे और एक जगह रहकर ख्ेाती आदि करते थे। गाइल्ज़ के अनुसार ये सभी बातें उस पुराकाल में हंगरी में कारपेथियन्ज, आस्ट्रिया, आल्प्ज आदि के बीच के समशीतोष्ण क्षेत्र में सम्भव हैं, और वही मूल स्थान है।

श्रेडर 

श्रेडर लगभग इसी पद्धति से अपने निष्कर्ष पर पहुंचे थे। ब्रान्देश्ताइन के मत के बावजूद कुछ लोग अब भी इसे अधिक प्रमाणिक मानते हैं।

ब्रान्देश्ताइऩ 

डॉ. सुनीतिकुमार चटर्जी तथा अन्य कई विद्वान अब ब्रान्देन्श्ताइन के पक्ष में हैं। यों बटकृष्ण घोष तथा नेहरिंग आदि लोग इनकी बहुत सी बातें नहीं मानते। नेहरिंग ने तो अपनी किसी आगामी पुस्तक में ब्रान्देन्श्ताइन की मान्यताओं का व्यवस्थित रूप से खंडन करने का वादा भी किया था, यद्यपि अभीतक इस प्रकार की कोई चीज दिखाई नहीं पड़ी।

ब्रान्देन्श्ताइन ने उपर्युक्त बातों के अतिरिक्त भाषा-विज्ञान की एक शाखा अर्थ-विज्ञान की विशेष रूप से सहायता ली है। इनके अनुसार शब्दों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर ऐसा पता चलता है कि पहले ये लोग किसी एक स्थान में अविभक्त रूप से रहते थे। बाद में भारत-ईरानी लोग इनसे निकल कर अलग चले गये और इस प्रकार ये दो भागों में विभक्त हो गये। इस विभाजन के बाद मूल शाखा (भारत-ईरानियों के अतिरिक्त) भी अपने पुराने स्थान पर न रुककर किसी नये स्थान पर चली गई।

अविभक्त भारोपीय ‘पूर्व भारोपीय’, और भारत-ईरानियों के जाने के बाद बचे लोग ‘परभारोपीय’ कहे जा सकते हैं। ब्रान्देन्श्ताइन के अनुसर मूल शब्द-समूह की दृष्टि से भारत-ईरानी में अर्थ-विकास का अपेक्षाकृत पुराना स्तर मिलता है और शेष ‘परभारोपीय’ में बाद का। इसी आधार पर इन दो वगोर्ऋं की कल्पना की गई है। उदाहरणार्थ पूर्व भारोपीय में पत्थर के लिए ‘हूमत या ‘हूमतंन शब्द था। संस्कृत में यही ग्रावन् (सोमरस निचोड़ने का पत्थर) है, किन्तु ‘परभारोपीय’ से निकली भाषा में ‘चôी का पत्थर’ या ‘हाथ चôी’ आदि अर्थों में विकसित मिलता है। (......अंगे्रजी Cweorn, अंगे्रजी queen, डच Kweern तथा डैनिश Kylen आदि)। पर ‘भारोपीय’ के नए स्थान पर जाने का अनुमान इस आधार पर लगा होता है ‘पूर्व भारोपीय’ की तुलना में शब्द-समूह और उसके अर्थ में थोड़ी भिéता है। यह पता चलता है कि ‘पर’ के शब्द-समूह का विकास ‘पूर्व’ के स्थान पर न होकर नवीन क्षेत्र में हुआ है।

निष्कर्ष यह है कि ‘पूर्व भारोपीय’ किसी अपेक्षया सूखे क्षेत्र में पहाड़ में रहते थे। हरे-भरे जंगलों से दूर थे। वेतस, भूर्ज, बजराँठ तथा कुछ अन्य वृक्षों का उन्हें पता था। गाय, भेड़, बकरी, कुत्ता, भेड़िया, लोमड़ी, खरगोश, चूहा, ऊदबिलाव आदि से भी वे परिचित थे। ब्रान्देन्श्ताइन के अनुसारी मूल स्थान यूराल पर्वत के दक्षिण-पूर्व में स्थिति किरगीज़ का मैदान था। बाद में भारत के अलग (पूरब की ओर) चले जोन के बाद शेष लोग (परभारोपीय) किसी नीचे दलदली क्षेत्र में गये। यहाँ पुल आदि के भाव से इनका परिचय हुआ और नये पेड़ आदि भी इन्हें मिले। ब्रान्देन्श्ताइन के अनुसार यह दूसरा स्थान यूराल पर्वतमाला के पूरब में था।

इस प्रश्न का बहुत निश्चय के साथ दो-टूक उत्तर देना कठिन है। इसी के कारण भी यह समस्या उलझी रही, और रहेगी। भारतीय लोगों ने साहित्य को आधार माना और निष्कर्षत: भारत को आदि स्थान कहा। प्रेा. श्रेडर स्लाव भाषाओं के विद्वान् थे, उन्होंने अपने अध्ययन में स्लाव उदाहरणों को प्रधानता दी। अत: वे स्लाव क्षेत्र को ही मूल स्थान सिद्ध कर सके। स्कैंडेनेवियन भाषाओं के विद्वान् लैधम ने स्कैंडेनेविया को सिद्ध किया। जब तक इस मोह से ऊपर उठकर सभी विद्वान् निष्पक्ष रूप में कार्य करते हुए एक या लगभग एक मत पर नहीं पहुंचते अन्तिम समय सत्य पर पहुंचना कठिन है। यों तब तक के लिए ब्रान्देन्श्ताइन को स्वीकार किया जा सकता है। (परिवार के भारत-हित्ती’ वाले रूप को स्वीकार करने में इसमें सम्भवत: कुछ परिवर्तन भी अपेक्षित होगा।)

मूल भारोपीय भाषा का स्वरूप

यद्यपि मूल भारोपीय भाषा का क्या स्वरूप था यह निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है क्योंकि उस प्रकार की कोई भाषा हमें प्राप्त नहीं हुई हैं। परन्तु इस परिवार की सभी प्रमुख भाषाओं की विशेषताओं के आधार पर एक ऐसी मूल भाषा की कल्पना की गई है जिससे इस परिवार की भाषाओं का विकास हुआ है।

भारोपीय परिवार की मुख्य विशेषताएँ

  1. अपने मूल रूप की दृष्टि से यह परिवार श्लिष्ट-योगात्मक कहा जा सकता है। 
  2. इसमें योग (प्रत्यय का प्रकृति से या सम्बन्धत्व का अर्थतत्व से) प्राय: सेमेटिक या हैमिटिक परिवार-सा अन्तर्मुखी न होकर बहिर्मुखी होता है।
  3. जो प्रत्यय जोड़े जाते हैं, उनके स्वतंत्रा अर्थ का पता नहीं है। एक-दो के विषय में (जैसे अंग्रेजी का ly (Manly) विद्वानों ने कुछ अनुमान लगाया है पर शेष संदिग्ध हैं। पर अनुमान ऐसा है कि अन्य भाषाओं के प्रत्ययों की भाँति भारोपीय प्रत्यय भी सभी स्वतंत्रा शब्द थे, उनका अर्थ था, कालान्तर में धीरे-धीरे ध्वनि-परिवर्तन के चक्र में जोड़ने से उनका आधुनिक रूप मात्रा शेष रह गया।
  4. इस परिवार की भाषाएँ आरम्भ में योगात्मक थीं, पर धीरे-धीरे दो-एक को छोड़ कर सभी वियोगात्मक हो गई, जिसके फलस्वरूप, परसर्ग तथा सहायक क्रिया आदि की आवश्यकता पड़ती है। साथ ही कुछ भाषाएँ स्थान-प्रधान (Positional) हो गई हैं। जैसे ‘राम मोहन को कहता है’ में ‘राम’ के स्थान पर और ‘मोहन’ को ‘राम’ के स्थान पर कर देने से अर्थ परिवर्तित हो जायेगा पर संस्कृत आदि प्राचीन भाषाओं में यह बात नहीं थी।
  5. धातुएँ अधिकतर एकाक्षर होती हैं। इनमें प्रत्यय जोड़कर पद या शब्द बनते हैं।
  6. प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं। जो प्रत्यय धातु में जोड़े जाते हैं उन्हें कृत (Primary) कहते हैं और जो कृत लगाने के बाद जोड़े जाते हैं उन्हें तद्धित (Secondary)। तद्धित के भी तीन भेद हैं जो क्रम से शब्द, कारक के उपयुक्त पद कालानुसार क्रिया बनाते हैं।
  7. इस परिवार में पूर्वसर्ग या पूर्व विभक्तियाँ सम्बन्ध-सूचना देने के लिए पद बनाने के लिए बान्टू आदि कुलों की भाँति नहीं प्रयुक्त होतीं। उनका प्रयोग होता है, और पर्याप्त मात्रा में होता है पर उनसे शब्दों या धातुओं के अर्थ को परिवर्तित करने का काम लिया जाता है। जैसे विहार, आहार, परिहार आदि में ‘वि’, ‘आ’, ‘और’ ‘परि’ आदि लगाकर किया गया है। 
  8. समास-रचना की विशेष शक्ति इस परिवार में है। इसकी रचना के समय विभक्तियों का लोप हो जाता है और समास द्वारा बने शब्द का अर्थ ठीक वही नहीं रहता जो उसके अलग-अलग शब्दों को एक स्थान पर रखने से होता है। उसमें एक नया अर्थ आ जाता है। जैसे काशी-नागरी-प्रचारिणी-सभा अर्थात् काशी की वह सभा जो नागरी का प्रचार करती है। वेल्श भाषा में समासों से बहुत बड़े-बड़े शब्द बनते हैं। किसी टापू में बसे एक वेल्श ग्राम का नाम समास पर आधारित है, 57 वगोर्ऋं का है।
  9. इस परिवार की एक प्रधान विशेषता यह भी है कि स्वर-परिवर्तन से सम्बन्धतत्व सम्बन्धी परिवर्तन हो जाता है। आरम्भ में स्वराघात के कारण ऐसा हुआ होगा। स्वराघात के कारण स्वर-परिवर्तन हो गया और जब धीरे-धीरे प्रत्ययों का लोप हो गया तो वे स्वर-परिवर्तन ही सम्बन्ध-परिवर्तन को भी स्पष्ट करने लगे। अंगे्रजी की कुछ बली क्रियाओं में यह बात स्पष्टत: देखी जा सकती है- drink, drank, drunk। यहाँ आई (i) का , (a) और यू (u) में परिवर्तन हुआ है, और इसी से उमसें काल सम्बन्धी परिवर्तन आ गया है।
  10. एक स्थान से चल कर अलग होने पर इस परिवार की भाषाओं का अलग-अलग विकास हुआ और सभी में प्रत्ययों की आवश्यकता पड़ी, अत: यह प्रत्ययों की संख्या बहुत अधिक हो गई है। अन्य किसी भी परिवार में इनकी संख्या इससे अधिक नहीं है।

मूल भारोपीय ध्वनियाँ

मूल भारोपीय ध्वनियों के निर्धारण का प्रयास पिछली सदी के दूसरे चरण से ही आरम्भ हो गया था। अब तक इस पर थोड़ा-बहुत काम होता जा रहा है, किन्तु अन्तिम रूप तक, अभी तक विद्वान् नहीं पहुंच सके हैं। स्वरों का निर्धारण तो हुआ ही, कई व्यंजनों के बारे में भी विवाद है। भारतीय विद्वानों में किसी ने भी इस पर अनुसंधान के स्तर पर कार्य नहीं किया है, किन्तु डॉ. सुनीतिकुमार चटर्जी, सुकुमार सेन, डॉ. बाबूराम सक्सेना, डॉ. श्यामसुन्दर दास तथा डॉ. उदय तिवारी आदि ने अंग्रेजी, फ्रेंच या जर्मन आदि की पुस्तकों के आधार पर अपनी पुस्तकों में इन ध्वनियों को संक्षेप में दिया है। विषय की विवादास्पदता का अनुमान इसी से किया जा सकता है, कि उपर्युक्त सभी विद्वानों ने जो सामग्री दी है, वह पूर्णतया एक नहीं यहाँ मूल प्रश्न को उठाकर तुलना के आधार पर ध्वनियों का निर्धारण सम्भव नहीं है। यहाँ संक्षेप में केवल सूची दी जा रही है। यह चयन अपने निर्णय के आधार पर किया गया है, और हिन्दी या अन्य भाषाओं की एक या अधिक पुस्तकों से पाठक इन्हें भिé पा सकते हैं।

स्वर

मूल स्वर

(क) अति हृस्व अ
(ख) हृस्व अ एॅ ओ
(ग) दीर्घ आ ए ओ

संयुक्त स्वर

संयुक्त स्वरों की संख्या लगभग छत्तिस थी, जो उपर्युक्त हृस्व और दीर्घ स्वरों के साथ इ, ऋ, लृ, उ, न्, म् के मिलने से बनते थे जैसे अइ, आलृ तथा ओउ आदि।

अंत:स्थ

य् (इ), व् (उ), ल् (लृ)
र् (ऋ), न् (ऩ), म् (म़)

व्यंजन

(क) स्पर्श (1) कवर्ग (i) क्, ख्, ग्, घ्
                               (ii) क़्, ख़्, ग़्, घ़्
                               (iii) क्व्, ख्व्, ग्व्, ध्व्
                (2) तवर्ग1 त्, थ्, द्, घ्
                (3) पवर्ग प्, फ्, ब्, भ्
(ख) ऊष्म स (ज़)

‘ह’ ध्वनि के सम्बन्ध में मतभेद हैं। कुछ लोगों के अनुसार यह ध्वनि नहीं थी। कुछ लोगों का हित्ती के आधार पर यह कहना है कि इसका एक रूप था। कुछ अन्य लोग इसके ‘धोष’ और ‘अघोष’ दोनों रूपों की स्थिति मानते हैं। ऊष्म या संघष्र्ाी व्यंजनों में कुछ लोग केवल एक ‘स’ को मानते हैं, जैसा कि ऊपर दिया गया है, किन्तु कुछ अन्य विद्वान् क्, ख्, ग्, घ्, त्, थ्, द्, ध्, झ्, आदि अन्य संघष्र्ाी व्यंजनों का भी अनुमान लगाते हैं।

ध्वनि-सम्बन्धि कुछ अन्य विशेषताएँ

  1. स्वरों के अनुनासिक रूपों (जैसे अँ, इँ) का प्रयोग नहीं होता था।
  2. दो या अधिक मूलस्वर एक साथ नहीं आ सकते थे।
  3. संधि के नियम लागू होते थे।
  4. दो या अधिक व्यंजन एक साथ आ सकते थे।

भारोपीय मूल भाषा का व्याकरण

  1. रूप अधिक थे। व्याकरण बड़ा जटिल था।
  2. धातु में प्रत्यय जोड़कर शब्द (पद) बनते थे।
  3. आरम्भ में उपसर्गों का बिलकुल प्रचलन न था।
  4. मध्य-विन्यस्त प्रत्यय या मध्यसर्ग (Infix) का प्रयोग नहीं होता था।
  5. संज्ञा, क्रिया और अव्यय अलग-अलग होते थे। विशेषण और सर्वनाम आदि संज्ञा के अन्तर्गत ही समझे जाते थे। अव्यय भी अविकारी न होकर विकारी होते थे।
  6. सर्वनाम के रूपों में विविधता थी। पुरुष तीन थे।
  7. एक, द्वि और बहु, इन तीनों वचनों का प्रयोग होता था।
  8. स्त्राीलिंग, पुलिंग और नपंसुक लिंग थे। उनका विचार केवल संज्ञा के अनुसार होता था। पहले प्राकृतिक लिंग थे, किन्तु बाद में प्रत्यय के साथ लिंग के संयोग के कारण व्याकरणिक लिंग की उत्पत्ति प्रारम्भ हो गई थी।
  9. क्रिया में उत्तम, मध्य और अन्य पुरुष के अनुसार भी प्रत्येक के तीन रूप होते थे, अर्थात् तीन पुरुष थे। 
  10. क्रिया में उसके किये जाने और फल का विचार-प्रधान था और काल का गौण। यों काल चार थे यद्यपि काल-विचार बहुत विकसित नहीं कहा जा सकता है।
  11. पद दो थे - आत्मनेपद और परस्मैपद।
  12. संज्ञा की आठ विभक्तियाँ थीं।
  13. समास का प्रयोग होता था, जिसकी रचना में प्रत्ययों को छोड़ा दिया जाता था।
  14. पद-रचना में स्वर-क्रम का महत्वपूर्ण हाथ था। ग्रीक आदि में बहुत से ऐसे शब्द मिलते हैं, जिनमें यदि ‘ए’ स्वर है तो अर्थ वर्तमानसूचक है पर यदि उसके स्थान पर ‘ओ’ हो गया तो अर्थ भूतकाल का हो जाता है।
  15. सुर का भी प्रयोग होता था। भाषा संगीतात्मक थी।
  16. सम्बन्धत्व और अर्थतत्व इतने दूध और पानी की भाँति मिले रहते थे कि दोनों को अलग कर पाना साधारण कार्य नहीं था।
  17. मूल भाषा अतंर्मुखी श्लिष्ट-योगात्मक थी।
  18. अपश्रुति (ablaut) प्रणाली थी।
भारोपीय भाषा-भाषी धीरे-धीरे अलग हुए और उनकी भाषाओं का अलग-अलग विकास हुआ, जिससे निकली आज सैकड़ों भाषाएँ और कई हजार बोलियाँ हैं।

‘भारोपीय परिवार’ का विभाजन

भारोपीय परिवार की भाषाओं को ध्वनि के आधार पर ‘सप्तम्’ और ‘केंतुम्’ दो वर्गों में रक्खा गया है। कुछ लोगों का विचार हैं कि मूल भारोपीय की आरम्भ में ये दो बोलियाँ या विभाषाएँ थीं। किन्तु यह मान्यता संदिग्ध है।

पहले पहल अस्कोली ने 1870 ई. में विद्वानों के समक्ष यह विचार रखा कि भारोपीय मूल भाषा की कंठस्थानीय ध्वनियाँ (ऊपर दी गई ध्वनियों में प्रथम, तालव्य कवर्ग) कुछ शाखाओं में ज्यों का त्यों रह गई, पर कुछ में वे संघर्षों (स्, श, ज, आदि) या स्पर्श-संघष्र्ाी (च, ज आदि) हो गई। इसी आधार पर वान ब्रैडके ने इस परिवार के ‘सतम्’ और ‘केन्तुम’ दो वर्ग बनाये। इन दोनों शब्दों का अर्थ 100 है। यह नाम इसलिए रखे गये कि ‘सौ’ के लिए पाये जाने वाले शब्दों में यह भेद स्पष्ट है। ‘सतम्’ अवेस्ता का श्ब्द है और ‘केंतुम’ लैटिन का।
स्पष्टता के लिए दोनों वर्ग की भाषाओं में ‘सौ’ के लिए पाये जाने वाले शब्दों को यहाँ देख लेना ठीक होगा-

सतम् वर्ग       केन्तुम वर्ग
अवेस्ता- सतम्       लैटिन - केन्तुम
फ़ारसी-सद       ग्रीक-हेक्टोन
संस्कृत-शतम्       इटैलियन - केन्तो
हिन्दी-सौ       फ्रेंच-केन्त
रूसी-स्तो       ब्रीटन - कैन्ट
बल्गेरियन-सुतो       गेलिक-क्युड
लिथुआनियन-िस्ज़म्तास       तोखारी-कन्ध

इन उदाहरणों को दखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि एक वर्ग (सतम्) में ‘स’ ध्वनि सर्वत्र है, और दूसरे वर्ग (केंतुम) में वह सर्वत्र ‘क’ ध्वनि हो गई है। केंतुम् और सतम् में एक और भी अन्तर है। मूल भारोपीय का तीसरा कवर्ग, (क्व, ख्व आदि) केंतुम में तो प्राय: सुरक्षित है, किन्तु सतम् में वह लुप्त हो गया।

आरम्भ में लोगों का यह विचार था कि पश्चिम में पाई जाने वाली भाषाओं को ‘केन्तुम्’ वर्ग को तथा पूरब में पाई जाने वाली भाषाओं को ‘सतम्’ वर्ग की कहा जा सकता है। किन्तु बाद में पूरब में हिट्टाइट और तोखारी दो भाषाएँ ऐसी मिलीं, जिनमें ‘स’ के स्थान पर ‘क’ ध्वनि है, अत:पूरब और पश्चिमी के आधार पर वर्ग अलग-अलग करना ठीक नहीं है। अब दोनों वर्गों (केन्तुम और सतम्) की भाषाओं पर अलग-अलग विचार किया जा रहा है:-

केंतुम् वर्ग

इस वर्ग की भाषाएँ (या शाखाएँ) ये हैं:-
ट्यूटानिक
हेलेनिक
तोख़ारी
केन्तुम लैटिन

केल्टिक या केल्टी

आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व इस शाखा के बोलने वाले मध्य यूरोप, उत्तरी इटली, फ्रांस (उस समय का नाम ‘गाल’ था) के एक बड़े भाग, स्पेन, एशिया माइनर और ग्रेट ब्रिटेन आदि में रहते थे, पर, अब आयरलैण्ड, वेल्स, स्काटलैंड, मानद्वीप और ब्रिटेनी तथा कार्नवाल के ही कुछ भागों में इसका क्षेत्र शेष रह गया है। लैटिन शाखा से इस शाखा का बहुत साम्य है-
  1. दोनों में ही पुलिंग और नपुंसक लिंग ओकारान्त संज्ञाओं में सम्बन्ध-कारक के लिए-ई प्रत्यय का प्रयोग होता है।
  2. दोनों ही में क्रियार्थक संज्ञा अधिकतरशन (tion) प्रत्यय लगाकर बनाई जाती है।
  3. कर्मवाच्य की बनावट भी दोनों में लगभग एक-सी है।
  4. दोनों ही में उच्चारण-भेद के कारण ‘क’ और ‘प’ दो वर्ग बनाये सकते हैं। कुछ भाषाओं में जहाँ ‘प’ मिलता है वहाँ दूसरी भाषाओं में उसके स्थान पर ‘क’ मिलता है, जैसे वेल्श में ‘पम्प’ (=पाँच) का आइरिश में ‘कोइक’ है। ‘प’ वर्ग को ब्रिटानिक और ‘क’ वर्ग को गायलिक कहते हैं। इसके अतिरिक्त एक गालिक शब्द भी है। इस प्रकार इसके तीन वर्ग हैं।
    1. गालिक      
    2. ब्रिटानिक या ब्रिथोनिक     
      1. सिमरिक या वेल्श 
      2. कार्निश
      3. ब्रिटन या आर्मोंरिकन
    3. गोइडेलिक या रायलिक                     
      1. आयरिश
      2. स्कॉच
      3. मैंक्स
गालिक, रोम के राजा प्रथम सीज़र के समय में बोली जाती थी। 270 ई. पू. में यह एिश्या माइनर में पहुंच गई थी। अब इस भाषा का दर्शन कुछ स्थान तथा आदमियों के नामों, पुराने लेखकों द्वारा उद्धत शब्दों, सिôों और लगभग 25 अभिलेखों में ही मिलता है, अत: इसके विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता।

सिमरिक् या वेल्श ‘प’ वर्ग की एक शाखा है। इसके बोलने वाले आज भी हैं। इसका प्रधान क्षेत्र वेल्श है। इसके आठवीं सदी तक के लेख मिलते हैं। साहित्य का आरम्भ 11वीं सदी से हुआ है और 13वीं तक कविता आदि की पर्याप्त संख्या में रचना हुई है। कुछ रचना आज भी होती है। इसके बोलने वालों को अपनी भाषा का बड़ा गर्व है। कार्निश कार्नवाल की एक बोली थी। 1770 ई. के लगभग इसकी इतिश्री हो गई। इसका प्राचीन साहित्य हमें अवश्य प्राप्त है, जिसकी प्रधान पुस्तक 15वीं सदी की एक ‘रहस्य’नाटिका’ है।

ब्रिटेन, फ्रांस के ब्रिटेनी प्रदेश में बोली जाती है। इसे आर्मेरिकन भी कहते हैं। यथार्थत: यह कार्निश की ही एक शाख है, जो पाँचवीं सदी के लगभग अलग हुई थी। इसके पुराने उदाहरण दसवीं सदी तक के मिलते हैं। 12वीं सदी से साहित्य भी मिलता है।

‘क’ वर्ग की प्रधान शाखा आयरिश है। यह केल्टिक शाखा की प्रधान भाषा आयर्लेण्ड में जब तक अंग्रेज़ी राज्य था भारत की ही भाँति अंगे्रजी का बोलबाला था पर देश के स्वतंत्रा होने के उपरांत आयरिश भाषा को भी उचित स्थान मिला है। उसके पुराने उदहारण पाँचवीं सदी के ‘ओघम’ के अभिलेखों में मिलते हैं। मध्यकाल में साहित्य (प्रधानत: काव्य और पौराणिक गाथा) की भी वृद्धि यथेष्ट हुई है। धार्मिक केन्द्र होने के कारण भी इस भाषा को कम बल नहीं मिला है। इस भाषा तथा इसके साहित्य की उéति डी वेलरा के प्रयास के फलस्वरूप बड़ी ही तेज़ी से हुई है।

स्कॉच स्काटलैण्ड के उत्तरी-पश्चिमी भाग की बोली थी। अब इसके बोलने वाले अंग्रेज़ी के प्रभाव कम हो गये हैं। कुछ स्कूलों में धार्मिक प्रार्थना के समय इस भाषा का प्रयोग वहाँ अब भी होता है। इसमें कुछ पुरानी कविताएँ भी है। मैक्स इंग्लैण्ड के समीप मानद्वीप की भाषा है।

ट्यूटानिक या जर्मनिक

यह शाखा भारोपीय परिवार की सबसे महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा की अंग्रेजी भाषा आज की अन्तराष्ट्रीय भाषा है। इस शाखा का नाम जर्मेनिक भी है।

यह शाखा अपनी ध्वनियों के परिवर्तन के लिए बहुत प्रसिद्ध है। पहला परिवर्तन प्रागैतिहासिक काल में हुआ, जिसके कारण भारोपीय परिवार की अन्य शाखाओं से यह कुछ दूर हो गई। दूसरा परिवर्तन 7वीं सदी के लगभग हुआ, जिसके कारण इस शाखा के ही उच्च जर्मन और निम्न जर्मन दो वर्ग हो गये। इन ध्वनि-परिवर्तनों का विस्तृत विवरण ‘ध्वनि-नियम’ के प्रकरण में दिया गया है।

इसके प्राचीनतम उदाहरण तीसरी सदी के मिलते हैं, जो इसकी पुरानी, रोमन और ग्रीक लिपि से भिन्न, रूनी लिपि में हैं। चौथी सदी के इंजील का एक अनुवाद भी मिलता है। साहित्य इधर हज़ार वर्षों के लगभग से आरम्भ हुआ है। इस वर्ग की भाषाएँ धीरे-धीरे संयोगात्म्क से वियोगात्मक होती जा रही हैं भारोपीय मूल भाषा में संगीतात्मक स्वराघात का प्रधान्य था। इस वर्ग में अब केवल स्वेडिश में ही संगीतात्मक स्वराघात शेष है। शेष सभी भाषाओं में बलात्मक स्वराघात विकसित हो गया है।
    प्राचीन सैक्सन बोलियाँ सैक्सन आंग्ल्स और ज्यूट्स लोगों की थीं। वेसेक्स, ससेक्स, एसेक्स, केन्ट, वाइट, पूर्वी ऐंग्लिया, मरकिया तथा दक्षिणी सैक्सन के पूर्वाद्ध्र में रहते थे। ब्रिटेन में इसकी तीन शाखाएँ विकसित हुई, जिन्हें मध्यवर्ती और दक्षिणी कह सकते हैं। आधुनिक अंग्रेजी मूलत: मध्यवर्ती विकसित हुई है। स्काटलैंड की बोलियों का जन्म उत्तरी से है। अंग्रेज़ी का आरम्भ 1100 ई. से माना जाता है। लगभग साढ़े तेरह सौ तक प्राचीन काल और साढ़े चौदह सौ तक मध्यकाल है। इसके बात अंग्रेज़ी का काल आरम्भ होता है। आज की अंग्रेज़ी भाषा और उसका साहित्य संसार में धनी कहा जा सकता है। अंग्रेज़ी भाषा की तीन बोलियाँ हैं, जिनमें स्कॉट के निम्न भाग की नार्थम्बरियन प्रधान है। जर्मनी के उत्तरी भाग में प्लात्तदिउश शाखा है, जिसके अंतर्गत कई बोलियाँ हैं।

    फ्रिजियन का आरम्भ तेरहवीं-चौदहवीं सदी से स्पष्ट मिलता है। इसमें तीन बोलियाँ थीं। पश्चिमी बौली का क्षेत्र हालैंड के उत्तरी भाग में था। पूर्वी फ्रिजीयन यम्स और वेजर नदी के मुहाने के बीच में बोली जाती थी, और उत्तरी बोली एब नदी के मुहाने के उत्तर में। अब इसके बोलने वाले केवल जर्मनी और हालैंड के कुछ भागों में है। शेष क्षेत्र में डच आदि भाषाओं ने अधिकार जमा लिया है।

    फ्रैंक भाषा का क्षेत्र राइन से नीदरलैंड तक था। धीरे-धीरे इसकी भी उत्तरी, मध्य और दक्षिणी तीन शाखाएँ हो गई। दक्षिणी में उच्च जर्मन की प्रकृति है और उत्तरी में निम्न जर्मन की। मध्यवर्ती शाखा दोनों के बीच की है। इसमें दोनों की ही कुछ-कुछ बातें आ गई हैं। उत्तरी शाखा से ही नीदरलैंड की बोलियों का भी विकास हुआ है, जिनका साहित्य तेरहवीं सदी से मिलता है। इन बोलियों में डच और हालैंड की बोलियाँ प्रधान हैं। फ्लेनिश फ्लेंडर लोगों की बोली है, जो प्रमुखत: उच्चारण में ही डच से भिé हैं। ‘बारबंत’ बोली भी इसी का साधारण भिéता लिये हुए एक रूप है। टयूटानिक की पश्चिमी शाखा की ऊपर दी गई भाषाएँ तथा बोलियाँ केवल मध्य (जो तटस्थ हैं) तथा दक्षिणी (जो उच्च जर्मन में हैं) को छोड़कर निम्न जर्मन के अन्तर्गत आती हैं।

    अब हम उच्च जर्मन को ले सकते हैं। संपूर्ण जर्मनी तथा आस्ट्रिया के एक बड़े भाग की यह साहित्यिक भाषा है। इसमें 3 प्रधान शाखाएँ हैं। अलमानिक का क्षेत्र, स्विटजरलैंड का जर्मन भाषा-भाषी प्रदेश, अलसेस तथा बादेन के दक्षिण में है। स्वाबियन पश्चिमी बवेरिया, उटेमबर्ग आदि में बोली जाती हैं बवेरियन बोलने वाले शेष बवेरिया तथा आस्ट्रिया के एक बड़े भाग में हैं।

    उच्च जर्मन का इतिहास तीन कालों में विभक्त है। प्राचीन उच्च जर्मन, द्वितीय वर्ण-परिवर्तन के पश्चात् 7वीं सदी से आरम्भ होकर बारहवीं तक है। इसमें कुछ पुरानी कविताएँ, बाइबिल के खंडित अंश तथा कुछ और लेख आदि मिलते हैं। इसके बाद मध्य जर्मन का समय है। ‘निबेलुंजेन’ काव्य की रचना इसी में हुई है। वर्तमान उच्च जर्मन बहुत ही गंभीर और सुसंस्कृत है। यह रचनात्मक (building language) भाषा है, जिसमें किसी भी भाषा के किसी भी शब्द का अनुवाद आसानी से किया जा सकता है। पूरे ट्îूटानिक परिवार में उच्च जर्मन अपेक्षाकृत अपने मूल के सबसे अधिक निकट है। इसमें अंगे्रज़ी, फ्रेंच आदि से कुछ शब्द अवश्य उधार लिये गये हैं, पर उनका भी प्राय: स्वदेशीकरण कर लिया गया है। उच्च जर्मन भाषियों ने संस्कृत का भी गम्भीर अध्ययन किया है, और दर्शन एवं भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में उनका प्रमुख स्थान है।

    ट्îुटानिक वर्ग की सबसे प्राचीन भाषा गाथिक है। इसके अवशेष उलफ़िला नामक पादरी द्वारा किये गये बाइबिल के अनुवाद के अंश रूप में मिलते हैं। बाइबिल की पांडुलिपि लगभग पाँचवीं सदी की है, यद्यपि इसका रचना काल 350 ई. के समीप का है।

    इसका क्षेत्र कारपैथियन्स के दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में था। कुछ प्रचार स्पेन और इटली में भी हुआ पर वहाँ से शीघ्र ही यह समाप्त हो गई। कृष्ण सागर के किनारे यह भाषा नवीं सदी तक रहीं और कुछ स्थानों पर इसके 16वीं सदी तक रहने का भी संकेत मिलता है। आकृति की दृष्टि से यह अंत तक संयोगात्मक रही है। साथ ही द्विवचन आदि भारोपीय की पुरानी बातें भी इसमें सुरक्षित थीं। इस भाषा को संस्कृत के बहुत निकट कहा जाता है। अब इसके क्षेत्र में नार्स भाषाओं का प्रयोग होता है।

    पूर्वी शाखा की दूसरी उपशाखा उत्तरी ट्यूटानिक या प्राचीन नार्स हैं रूनीलिपि में इसके अभिलेख 5वीं सदी तक के मिलते हैं। आज से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व तक इसकी शाखाओं में अन्तर नहीं हुआ था। सभी में ध्वनि-सम्बन्धी कुछ विशेषताएँ एक थीं। आइसलैंडिक भाषा में उसके उदाहरण हैं। आइसलैंडिक में लगभग 13वीं सदी के ‘एड्डा’ नाम पौराणिक गीत तथा स्काल्ड लोगों की कुछ कविताएँ भी हैं ।

    दसवीं सदी के लगभग उत्तरी ट्îयूटानिक की दो प्रधान शाखाएँ पूर्वी और पश्चिमी हो गई। पूर्वी नार्स का विकास स्वेडिश के रूप में हुआ तथा पश्चिमी का नारवेजियन एवं आइसलैंडिक के रूप में। डैनिश भाषा डेनमार्क के अतिरिकत उत्तरी श्लेस्विग तथा नार्वे के कुछ सभ्य लोगों में प्रयुक्त होता है। इसके नमूने 13वीं सदी तक के मिलते हैं। इसमें मुख-सुख के लिए ध्वनि-विकास खूब हुआ है। अन्य भाषाओं का भी इस भाषा पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। स्वेडिश का प्रधान क्षेत्र स्वीडन तथा फिनलैंड का कुछ भाग है। इस भाषा में अब तक बहुत पुरानी प्रकृति पाई जाती है। भारोपीय परिवार की जीवित भाषाओं में से केवल यही एक ऐसी भाषा है, जिसमें संगीतात्मक स्वराघात आज भी स्पष्टत: मिलता है। नार्वे की भाषा नारवेजियन है। सम्पूर्ण आइसलैंड तथा स्कैण्डिनेविया के पश्चिमी भाग में आइसलैंडिक भाषा का प्रयोग होता है। यह भाषा अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण अब तक लगभग संयोगात्मक है और दूसरी भाषाओं का प्रभाव भी इस पर कम ही पड़ा है। इसमें इधर कुछ साहित्य-रचना भी हुई हैं

    लैटिन

    इसका नाम इटाली भी है। इसको सबसे पुरानी भाषा लैटिन है, जो आज रोमन कैथलिक सम्प्रदाय की धार्मिक भाषा है। आरम्भ में लैटिन शाखा का प्रधान क्षेत्र इटली में था। केल्टिक की भाँति ही इस शाखा के भी दो वर्ग ‘प’ और ‘क’ हैं।

    लैटिन = ओस्कन 
    क्वाम = पाम 
    यकुअस = येपो 

    ‘क’ वर्ग को लैटिन वर्ग तथा ‘प’ को अम्ब्रो-सेम्निटिक इन वर्ग कहते हैं।

    अम्ब्रियन भाषा के भी प्राचीन लेख मिलते हैं, जो लगभग 200 वर्ष ई. पू. के हैं। अब इन सबके क्षेत्र में ‘क’ वर्ग की बोलियों का ही आधिपत्य है।

    लैटिन बोलने वाले लोग लैटिअम के मैदानों में रहते थे। रोमन राज्य के विकास के साथ इस भाषा का भी विकास हुआ। इसके लेख 500 ई. पू. तक के मिलते हैं। धीरे-धीरे इस भाषा का प्रसार इतना हुआ था कि आज की रोमान्स भाषाओं के पूरे क्षेत्र में यह बोली जाने लगी थी। बहुत पहले से ही धीरे-धीरे यह संयोग से वियोग की ओर आ रही थी।

    इसके इतिहास को तीन कालों में बांटा जा सकता है। प्राचीन लैटिन का काल 500 ई. पू. से तीसरी सदी तक है। मध्यकालीन लैटिन के दो रूप हैं। एक तो बहुत संस्कृत थी, जो सभ्य लोगों की एवं साहित्य की भाषा थी। दूसरी भारतीय आर्य-भाषा के सादृश्य पर प्राकृत लैटिन कही जा सकती है। यह साधारण लोगों की भाषा थी। संस्कृत लैटिन का साहित्य में प्रयोग तीसरी सदी से 7वीं तक होता रहा। धीरे-धीरे प्राकृत लैटिन कही जा सकती है। यह साधारण लोगों की भाषा थी। संस्कृत लैटिन का साहित्य में प्रयोग तीसरी सदी से 7वीं तक होता रहा। धीरे-धीरे प्राकृत लैटिन में बहुत विकास हो गया। यही बाद में नियो-लैटिन हुई, जिसका क्षेत्र इटली, सिसिली, स्पेन, गाल और डेसिया में था। यह विजयी लोगों की भाषा थी और हारे हुए लोगों पर लादी गई, अत: परिवर्तन तेजी से होने लगा, जिसके फलस्वरूप यह रोमन साम्राज्य की राष्ट्रभाषा, अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग रूप में विकसित होनी लगी। थोड़े ही दिनों में अलग बोली, फिर अलग भाषाएँ हो गई। इन्हें अब रोमान्स भाषाएँ इसलिए कहा जाता है कि ये रोम साम्राज्य की भाषाएँ थीं। यहाँ प्रधान रोमन्स भाषाओं पर विचार किया जा रहा है।

    इटाली या इतालवी का क्षेत्र इटली, टिसिनी, सिसली तथा कार्सिका में है। इसके लेख 7वीं सदी तक के मिलते हैं। इसमें भी कई बोलियाँ हो गई हैं। फ्लारेन्स की बोली ही प्रधान है, जिसमें दाँते न 10वीं सदी में अपना काव्य लिखा। यही साहित्यिक भाषा भी है। बोलियों में आपस में अन्तर अधिक है। सबका साहित्य भी पृथक्-पृथक् है। रोटोरोमन का नाम ‘रेटियन’, -रोमाँश’ या ‘लेडिक’ भी है। यह इटली, स्विट्ज़रलैंड तथा आस्ट्रिया के कुछ भागों में बोली जाती हैं। इस पर ट्युटानिक परिवार का काफ़ी प्रभाव अधिक पड़ा है।

    रोमानियन भाषा रूमानिया, ट्रान्सिलवेनिया तथा ग्रीक के कुछ भागों में बोली जाती है। यह डैन्यूब नदी पर बसे रोमन लोगों की भाषा से निकली है। इसके लगभग चालीस प्रतिशत शब्द स्लाविक हैं। अन्य रोमान्स भाषाओं के प्रतिकूल इस में बलगेरियन की भाँति उपपद (article) प्रत्यय की तरह शब्दों के अन्त में लगाये जाते हैं।

    प्रोवेंकल भाषा रोमान्स भाषाओं में प्रथम भाषा है। जिसमें साहित्य-साधन का श्रीगणेश हुआ। इसकी प्रथम कविता नवीं सदी की है। इसका क्षेत्र दक्षिणी फ्रांस है। 12वीं से 13वीं सदी तक इसमें साहित्य लिखा गया। बाद में फ्रेंच भाषा ने इसे दबा लिया और अब इसके बोलने वाले फ्रांस के दक्षिणी-पूर्वी भाग में थोड़े से ही और बचे हैं।

    प्राकृत लैटिन के स्पेन में पहुंचने के पूर्व वहाँ बास्कर और अबरी का राज्य था इन दोनों (बास्क तथा अरबी) का ही शब्दसमूह तथा ध्वनि के क्षेत्र में स्पैनिश भाषा पर प्रभाव पड़ा। इसी कारण रोमांस भाषाओं में स्पैनिश ही मूल लैटिन से अपेक्षाकृत बहुत दूर हट गई है। इसके चिन्ह तो सातवीं सदी तक मिले हैं, पर बारहवीं सदी के नियम मित लेख मिलते हैं। इसमें बहुत-सी बोलियाँ हैं, जिनमें कैस्टाइल प्रधान है। यही वहाँ की साहित्यिक एवं राज्य-भाषा है। स्पेन के लोगों के साथ-साथ अब यह स्पेन से बाहर भी चली गई है। अमेरिका में भी इसके बोलनेवाली काफ़ी हैं। फ्रांसीसी इस वर्ग की सबसे प्रधान भाषा है। यह पेरिस की बोली का विकसित रूप है। इसके चिन्ह आठवीं सदी उत्तरार्द्ध तक के मिलते हैं। 9वीं से 13वीं सदी तक इसका प्राचील काल है। उसके बाद इसका विकास तेजी से आरम्भ हुआ। इसके बोलने वालों ने सभी भाषाओं के शब्द उधार लेकर तथा अनेक नये शब्द गढ़ कर शब्द-समूह धनी बनाया, और साहित्य भी पर्याप्त रूप में लिखा। इसका उच्चारण बहुत कठिन तथा लिखित भाषा से बहुत भिन्न होता है। यह बहुत दिनों तक यूरोप की अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है। अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में भी इसके कुछ क्षेत्र हैं। इसमें संगीतात्मक बलाघात काफ़ी मात्रा में विद्यमान हैं तथा यह बहुत ही मधुर है।

    पुर्तगाली भाषा स्पैनिश से मिलती-जुलती है। इस पर फ्रेंच और मूर लोगों का भी प्रभाव पड़ा है। इसके लेख तेरहवीं सदी उत्तरार्द्ध से मिलते हैं। अफ्रीका में भी इसके छोटे-छोटे क्षेत्र हैं। भारतीय भाषाओं के शब्द-समूह पर इसका कुछ प्रभाव पड़ा है।

    पुर्तगाल और स्पेन के यहूदियों की भाषा पूर्तगाली और स्पैनिश से भिन्न है। जिसे सेफ़ार्डी कहते हैं। इसका ढाँचा तो स्पैनिश-सा ही है पर शेष बातें सेमिटिक परिवार से मिलती-जुलती हैं।

    हेलेनिक या ग्रीक

    इस शाखा में कुछ भौगोलिक कारणों से बहुत पहले से छोटे-छोटे राज्य और उनकी बहुत-सी बोलियाँ हो गई हैं। इसके प्राचीन उदाहरण महाकवि होमर के इलियड और ओडिसी महाकाव्यों में मिलते हैं। इनका समय एक हज़ार ई. पू. माना जाता है। ये दोनों महाकाव्य अधिक दिन तक मौखिक रूप में रहने के कारण अपने मूल रूप में आज नहीं मिलते, फिर भी उनसे ग्रीक के पुराने रूप का कुछ पता तो चल ही जाता है। ग्रीक भाषा बहुत-सी बातें में वैदिक संस्कृत से मिलती-जुलती है। दोनों ही में संगीतात्मक स्वराघात प्रधान था। कालान्तर में दोनों बलात्मक की ओर आने लगीं। दोनों ही में शब्दों के रूप बहुत अधिक हैं। हाँ, संस्कृत के परस्मैपद और आत्मनेपद की भाँति ग्रीक में ऐक्टिव और मिडिल वायस होते थे। द्विवचन दोनों में था। ग्रीक में संस्कृत की अपेक्षा स्वर अधिक हैं और संस्कृत में ग्रीक की अपेक्षा व्यंजन। ग्रीक ने भारोपीय मूल भाषा के स्वरों को बहुत सुरक्षित रखा है, पर व्यंजनों में परिवर्तन भी अधिक हो गया है।

    जब ग्रीस उन्नति पर था होमरिक ग्रीक का विकसित रूप ही साहित्य में प्रयुक्त हुआ। उसकी बोलियाँ भी उसी समय अलग-अलग हो गई।

    एट्टिक बोली का लगभग चार सौ ई. पू. में बोलबाला था, अत: यही भाषा यहाँ की राज्य भाषा हुई। आगे चलकर इसका नाम ‘कोइने’ हुआ और यह शुद्ध एट्टिक से धीरे-धीरे कुछ दूर पड़ गई और एशिया माइनर तक इसका प्रचार हुआ। उधर मिस्र आदि में भी यह जा पहुंची और स्वभावत: सभी जगह की स्थानीय विशेषताएँ इसमें विकसित होने लगीं।

    डोरिक स्पार्टा के निवासियों की भाषा थी। बाद में इसका इटली आदि में भी विस्तार हुआ। पिंडर कवि के गीत और कुछ खंडकाव्य इसके मुख्य साहित्य हैं।

    तोख़ारी

    अंग्रेज़, फ्रैंच, रूसी तथा जर्मन विद्वानों ने बीसवीं सदी के आरम्भ में पूर्वीय तुर्किस्तान के तुरफ़ान प्रदेश में कुछ ऐसे ग्रन्थ तथा पत्रा प्राप्त किये जो भारतीय लिपि (ब्राह्मी तथा खरोष्ठी) में थे। प्रो. सीग (Sieg) ने इनका अध्ययन किया, जिसके फलस्वरूप यह भाषा भारोपीय परिवार की सिद्ध हुई। इसके बालेने वाले ‘तोखार’ लोग थे; अत: इस भाषा को तोखारी कहा गया। समीपता के कारण इस पर यूराल-अल्टाई परिवार का बहुत प्रभाव पड़ा है। ग्रीयर्सन के अनुसार महाभारत एवं ग्रीक पुस्तकों में क्रम से ‘तुषारा:’ तथा तोखारोई जाति का नाम है। सम्भव है यह उन्हीं लोगों की भाषा हो। ये लोग दूसरी सदी ई. पू. में मध्य-एशिया के शासक थे। सातवीं सदी के लगभग यह भाषा लुप्त हो गई। तोखारी भाषा में स्वरों की जटिलता कम है। सन्धि-नियम कुछ संस्कृत जैसे हैं संख्याओं के नाम एवं सर्वनाम भी भारोपीय परिवार से साम्य रखते हैं। विभक्तियाँ भी उसी रूप में आठ हैं। शब्द-भंडार भी संस्कृत के समीप है।

    संस्कृत     तोख़ारी
    पितृ     पाचर्
    मातृ    माचर्
    वीर    विर्

    सौ के लिए तोखारी शब्द ‘कन्ध’ है, इसी कारण यह केन्तुम् वर्ग की भाषा मानी गई है। तोखारी भाषा में जो सामग्री मिली है उसके अध्ययन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इनमें दो बोलियों का प्रयोग हुआ है। एक को विद्वानों ने ‘अ’ तथा दूसरी को ‘ब’ कहा है। इनमें ‘अ’ तोखारों की भाषा है और ‘ब’ कूचा प्रदेश की। ऐसी स्थिति में पहली को तो ‘तोखारी’ और दूसरी को ‘कूची’ कहा जा सकता है।

    सतम् वर्ग

    भारोपीय परिवार की सतम् वर्ग की शाखाओं को इस प्रकार दिखाया जा सकता है-

    इलीरियन

    इस शाखा के बोलने वाले एड्रिआटिक सागर के किनारे कारिन्थियन की खाई से इटली के दक्षिण पूर्वी भाग तक फैले थे। इसके प्राचीन रूप का कोई भी आज अवशेष नहीं है।

    विभाजन में दिखाई हुई भाषाओं में से केवल अल्बेनियन के विषय में ही आज सामग्री प्राप्त है। शेष सभी बहुत पहले समाप्त हो गई थीं। इसी कारण इस शाखा को ‘अल्बेनियन’ या ‘अल्बेनी’ भी कहते हैं।

    अल्बेनियन के बोलने वाले अल्बेनिया तथा कुछ ग्रीस में हैं। इसके अन्तर्गत बहुत सी बोलियाँ हैं, जिनके घेघ और टोस्क दो वर्ग बनाये जा सकते हैं। घेघ का क्षेत्र उत्तर में और टोस्क का दक्षिण में है।

    अल्बेनियन साहित्य लगभग 17वीं सदी से आरम्भ होता है। इसमें कुछ लेख 5वीं सदी में भी मिलते हैं। इधर इसने तुर्की, स्लावोनिक, लैटिन और ग्रीक आदि भाषाओं से बहुत शब्द लिए हैं। अब यह ठीक से पता चलाना असंभव-सा है कि इसके अपने पद कितने हैं। इसका कारण यह है कि ध्वनि-परिवर्तन के कारण बहुत घाल-मेल हो गया है। बहुत दिनों तक विद्वान् इसे इस परिवार की स्वतंत्र शाखा मानने को तैयार नहीं थे किन्तु जब यह किसी से भी पूर्णत: न मिल सकी तो इसे अलग मानना ही पड़ा।

    बाल्टिक

    इसे लैट्टिक भी कहते हैं। इसमें तीन भाषाएँ आती हैं। प्रथम प्राचीन प्रशन है, जो सत्राहवीं सदी में ही समाप्त हो गई थी। इसका क्षेत्र बाल्टिक तट पर विश्चुला और तीन नदियों के बीच में प्रस्थित प्रशा प्रदेश था। 15वीं सदी के आरम्भ की तथा 16वीं सदी की लिखी कुछ पुस्तकें इसमें मिली हैं। दूसरी भाषा लिथुआनियन है। इसका क्षेत्र उत्तर-पूरब में है। इसका साहित्य भी 16वीं के बाद से आरम्भ होता है और पुरानी प्रसिद्ध पुस्तक महाकवि दोनेलेटिस की ‘सीज़न्स’ है, जो 1750 के लगभग लिखी गई थी। वैज्ञानिकों की दृष्टि से यह भाषा बड़ी ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका विकास बहुत धीरे-धीरे हुआ है, और इसी कारण आज भी यह मूल भारोपीय भाषा से निकटतम है। इसमें एस्ति (संस्कृत अस्ति) एवं जीवा: जैसे रूप अब भी हैं। संस्कृत की भाँति संगीतात्मकता और द्विवचन भी अभी इसमें हैं। इसका क्षेत्र अब रूस के अन्तर्गत हैं। इसकी तीसरी भाषा लेट्टिश है। यह रूस के पश्चिमी भाग में लेटिवियाव राज्य की भाषा है। यह लिथुआनियन से अधिक विकसित है। इसमें भी साहित्य का आरम्भ 16वीं सदी से हुआ है।

    बाल्टिक 
    1. प्राचीन प्रशन
    2. लेिट्ट्श
    3. लिथुआनियन

    स्लैवोनिक या स्लावी

    यह बहुत विस्तृत वर्ग है। इसमें पूर्वी यूरोप का एक काफ़ी बड़ा भाग आ जाता है। दूसरी-तीसरी सदी के लगभग तक इसके बोलने वाले एक सीमित क्षेत्र में थे, पर पाँचवीं सदी के बाद से ये लोग इधर-उधर फैलने लगे, और नवीं सदी तक रूस, बलगेरिया तथा स्लावोनिया आदि इसके कब्जे में आ गए। आज भी यह क्षेत्र इन्हीं का है। इनमें नवीं सदी तक के लेख मिलते हैं।

    पूर्वी शाखा का 12वीं सदी तक लगभग एक ही रूप मिलता है। इसमें साहित्य 19वीं सदी से भी पूर्व का है। महारूसी ही रूस की प्रधान भाषा है। 17वीं सदी तक यह बहुत अस्त-व्यस्त थी। उसके बाद इसे टकसाली रूप मिला। यह मूलत रूस कि एक बोली मात्रा है। श्वेत रूसी रूस के दक्षिणी भाग में बोली जाती है। लघु रूसी का दूसरा नाम रूथेनियन भी है। इसके बोलने वाले कुछ आस्ट्रिया के गलीसिया प्रांत हैं। आधुनिक साहित्य प्रमुखत: महारूसी में ही है। रूसी क्रान्ति के पश्चात् से इसका स्वरूप बहुत ही पूर्ण हो गया है। पश्चिमी शाखा की प्रधान भाषा जेक है। इसका दूसरा नाम बोहेमियन भी है। इसके लेख 9वीं सदी तक के हैं। नियमित साहित्य 12वीं सदी से मिलता है। 15वीं सदी के हुस्साइट युद्ध के समय साहित्य की उéति खूब हुई है। इधर डेढ़ सौ वर्षों से इसका साहित्य बढ़ रहा है। इसकी एक बोली उत्तरी हंगरी, तथा प्रेसवर्ग एवं कारपेथियन्स के मध्य जाती है।

    जेक की बहिन सर्बियन का नाम ‘सरोबियन’ एवं ‘वेंडिक’ भी है जो धीरे लुप्त हो रही है। प्रशा और सैक्सोनी में ही इसके कुछ बोलने वाले अब शेष हैं। प्राचीनतम रूप 16वीं सदी की एक प्रार्थना-पुस्तक में मिलता है। पोलिश भाषा का मूल क्षेत्र अब पोलैंड है। जर्मनी में भी इसका प्रचार कभी था पर फिर यह निकाल दी गई। इसमें कुछ प्रार्थनाओं के अनुवाद 13वीं सदी के मिलते हैं। वही इसका प्राचीनतम साहित्य है। निम्न एब के पास के गुलामों की भाषा पोलाबिश पोलिश की ही बहन थी। पोलाबिश का लोप बहुत पहले हो गया। अब इसमें साहित्य आदि कुछ भी नहीं मिलता।

    दक्षिणी शाखा की प्रसिद्ध भाषा वेल्गेरियन है। इसके पुराने रूप को प्राचीन बल्गेरियन या चर्च स्लैवोनिक कहा जाता है। इसमें बाइबिल का अनुवाद 9वीं सदी के मध्य का मिलता है। इसमें द्विवचन का प्रयोग भी है और भाषा अधिक वियोगात्मक नहीं है। वर्तमान बल्गेरियन पूर्णत: वियोगात्मक हो गई है। यह अपने प्राचीन रूप से बहुत दूर चली आई है। इसका प्रधान क्षेत्र बेल्गेरिया के अतिरिक्त यूरोपीय तुर्की तथा ग्रीस आदि भी है। सम्भवत: इसी कारण इसके शब्द-समूह में विदेशी तत्व अधिक आ गये हैं

    सर्वोक्रोटियन भाषा के बोलने वाले सर्विया, दक्षिणी हंगरी तथा स्लैवोनिया आदि कई स्थानों पर हैं। इसके अन्तर्गत बहुत-सी बोलियाँ हैं। भाषा-विज्ञान की दृष्टि से इसका महत्व अत्यधिक है। इसके 12वीं सदी तक के कुछ लेख मिलते हैं, पर पुराना साहित्य नहीं है। स्लोवेनियन का क्षेत्र कार्निओला, दक्षिणी कारिन्थिया एवं स्टीरिया में है। इसके प्राचीन लेख 10वीं सदी तक के मिलते हैं।

    आर्मेनियन या आर्मीनी

    इसे कुछ लोग आर्य परिवार की ईरानी भाषा के अन्तर्गत रखना चाहते हैं। इसका प्रधान कारण यह है कि इसका शब्द-समूह ईरानी शब्दों से भरा है। पर, ये शब्द केवल उधार लिये हुए हैं। इसकी योगात्मकता तथा
    ध्वनि आदि स्पष्ट: ईरानी से भिé है, अत: इसे भारोपीय परिवार की एक स्वतंत्रा शाखा मानना ही अधिक उपयुक्त है। इसके कीलाक्षर-लेख मिले हैं, जिससे इसके प्राचीन साहित्य का अनुमान होता है। यह साहित्य धार्मिक था, जिसे ईसाईयों ने चौथी सदी के लगभग नष्ट कर दिया। ईसाई साहित्य चौथी सदी से 11वीं सदी तक रचा गया। 9वीं सदी का एक इंजील का इसमें अनुवाद है। कुछ पंक्तियाँ यहाँ के मूल साहित्य की भी हैं। इसका नवीन रूप प्रत्येक दृष्टि से प्राचीन रूप से बहुत दूर चला आया है, पर पुराने रूप का प्रयोग धार्मिक कार्यों में अब भी संस्कृत और लैटिन आदि की भाँति होता है।

    5वीं सदी में ईरान के युवराज आर्मेनिया के राजा थे, अत: ईरानी शब्द इस भाषा में अधिक आ गये। तुर्की और अरबी शब्द भी इसमें काफ़ी हैं। इस प्रकार आर्य और आर्येतर भाषाओं के प्रभाव इस पर पड़े हैं।

    इसके व्यंजन आदि संस्कृत से मिलते हैं। जैसे फ़ारसी ‘दह’ और संस्कृत ‘दशन्’ के भाँति 10 के लिए इसमें ‘तस्न’ शब्द है। दूसरी ओर हस्व स्वर एॅ और अेॉ आदि इसमें अत: इसे आर्य और ग्रीक के बीच में कहा जाता है।
    यूरोप और एशिया के सरहद पर बोली जाने वाली प्राचीन भाषा फ्रीजियन भी इसी के अन्तर्गत मानी जाती है। वर्तमान आर्मेनियन के प्रधान दो रूप हैं। एक का प्रयोग एशिया में होता है और दूसरे का यूरोप में। इसका क्षेत्र कुस्तुनतुनिया तथा कृष्ण सागर के पास है। एशिया वाली बोली का नाम अराराट है और यूरोप में बोली जाने वाली का स्तंबुल। स्तंबुल में साहित्य रचना भी होती है, और यही इसकी प्रधान बोली है।

    आर्य

     इस शाखा के अन्य नाम ‘हिन्दी-ईरानी’ या ‘भारत-ईरानी’ भी हैं। भारोपीय परिवार की आर्य शाखा बहुत ही महत्वपूर्ण है इस परिवार का प्राचीनतम प्रामाणिक साहित्य अपने शुद्ध अर्थों में इसी शाखा में मिलता है। इतना ही नहीं ऋग्वेद के बराबर पुराना शुद्ध साहित्य संसार की किसी भी भाषा में कदाचित नहीं मिलता। ऋग्वेद की कुछ ऋचाएँ दो हजार ई. पू. तक लिखी जा चुकी थीं, ऐसी कुछ विद्वानों की धारणा है। और 1500 ई. पू. तक तो इसका बहुत अंश लिखा जा चुका था, ऐसा अधिकांश लोग मानते हैं। पारसियों का धर्मग्रंथ ‘जेन्द अवेस्ता’ भी लगभग 7वीं सदी ई. पू. का है। इसके अतिरिक्त इस शाखा की भाषाओं का गठन तथा उनका साहित्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भाषा-विज्ञान के अध्ययन के लिए इस शाखा ने सामग्री दी है और पश्चिम में भाषा-विज्ञान का अध्ययन तभी से यथार्थत: प्रारम्भ होता है, जब से उन लोगों को इस आर्य शाखा के मनन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस बात को भाषा-विज्ञान के इतिहास पर विचार करते समय कुछ अधिक विस्तार से किया जा सकेगा।

    इस शाखा के ‘विरोस’ अन्यों के साथ छोड़ने के बाद जब आगे बढ़े तो कुछ ईरान में रूक गये और कुछ लोग और बढ़कर भारतवर्ष में आ बसे। इस प्रकार इसी की भारतीय और ईरानी दो प्रमुख भाषाएँ हुई। बहुत लोगों ने इन दोनों को भारोपीय की अलग-अलग शाखा माना है, पर ऐसा मानना वैज्ञानिक नहीं है, क्योंकि ये दोनों बहुत सी बातें में साम्य रखती हैं, जिससे स्पष्ट है कि ये दोनों पहले से ही अलग न होकर एक शाखा के रूप में थीं और बाद में अलग हुई।

    हित्ती परिवार

    सन् 1906-7 में तुर्की के बोगाजकोई नामक स्थान पर हित्ती भाषा के कीलाक्षर-अभिलेखों से ही इस भाषा का पता चला है। इन्हें भारोपीय परिवार के प्राचीनतम अभिलेख माना जाता है, जिनका काल सन् 1900 ई. पू. से 1950 ई. पू. तक है। भारोपीय परिवार से हित्ती का सम्बन्ध वैसा ही है, जैसा कि संस्कृत अथवा ग्रीक का इतालवी (लैटिन) से।

    विद्वानों का विचार है कि हित्ती तथा तोखारी ये ही दोनों भाषाएँ हैं, जो सबसे पहले भारोपीय परिवार से पृथक् हुई थीं। यही कारण है कि ‘स्टर्टवाण्ट’ तथा कुछ अन्य विद्वान् भारोपीय परिवार को ‘भारत-हित्ती’ कहना अधिक उपयुक्त मानते हैं।

    हित्ती भाषा की प्रमुख विशेषताएँ

    1. यह केन्तुम् वर्ग की भाषा मानी जाती है क्योंकि यह लैटिन के बहुत अधिक निकट है।
    2. इसमें ह् ध्वनि दो प्रकार की है। यह हित्ती भाषा की प्रमुख विशेषता है जो भारोपीय परिवार की अन्य किसी भाषा में नहीं है।
    3. म् और न् ध्वनि का स्वरूप भारोपीय भाषाओं से भिé है।
    4. कारक छह हैं।
    5. लिग् दो हैं पुलिंग् और नपुंसकलिग्। स्त्राीलिग् का अभाव है।
    6. तीन वचन थे परन्तु द्विवचन का प्रयोग बहुत कम था।
    7. काल केवल दो थे- भूत और वर्तमान। दो क्रियार्थ भेद ;डववकद्ध थे- निश्चयार्थक और आज्ञार्थक।
    8. द्वित्व का प्रयोग क्रिया और संज्ञा रूपों में होता था। जैसे आक आकस् (मेंडक), काल कालटु रे (एक प्रकार का बाजा), काट्’काट्-एन (नहाना) आदि।
    9. इसमें योगात्मक और वियोगात्मक दोनों प्रवृत्ति पाई जाती हैं।
    डा. भोलानाथ तिवारी ने बाल्टिक और स्लाविक दो अलग अलग परिवार माने हैं परन्तु कुछ अन्य विद्वान् इन्हें एक ही परिवार के अन्तर्गत मानते हैं।

    भारोपीय परिवार का महत्त्व

    विश्व के भाषा परिवारों में भारोपीय का सर्वाधिक महत्त्व हैं। यह विषय, निश्चय ही सन्देह एवं विवाद से परे हैं। इसके महत्व के अनेक कारणों में से सर्वप्रथम, तीन प्रमुख कारण यहाँ उल्लेख है-
    1. विश्व में इस परिवार के भाषा-भाषियों की संख्या सर्वाधिक है।
    2. विश्व में इस परिवार का भौगोलिक विस्तार भी सर्वाधिक है।
    3. विश्व में सभ्यता, संस्कृति, साहित्य तथा सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक विकास की दृष्टि से भी इस परिवार की प्रगति सर्वाधिक हुई है।
    4. ‘तुलनात्मक भषाविज्ञान’ की नींव का आधार भारोपीय परिवार ही है।
    5. भाषाविज्ञान के अध्ययन के लिये यह परिवार प्रवेश-द्वार है।
    6. विश्व में किसी भी परिवार की भाषाओं का अध्ययन इतना नहीं हुआ है, जितना कि इस परिवार की भाषाओं का हुआ है।
    7. भाषाओं के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए इस परिवार में सभी सुविधाएँ हैं। जैसे- (क) व्यापकता, (ख) स्पष्टता, तथा (ग) निश्चयात्मकता। 
    8. प्रारम्भ से ही इस परिवार की भाषाओं का, भाषा की दृष्टि से, विवेचन होता रहा है, जिससे उनका विकासक्रम स्पष्ट होता है।
    9. संस्कृत, ग्रीक, लैटिन आदि इस परिवार की भाषाओं का प्रचुर साहित्य उपलब्ध है, जो प्राचीन काल से आज तक इन भाषाओं के विकास का ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत करता है और जिसके कारण इस परिवार के अध्ययन में निश्चयात्मकता रहती है।
    10. अपने राजनीतिक प्रभाव की दृष्टि से भी यह परिवार महत्वपूर्ण है। कारण, प्राचीनकाल में भारत ने तथा आधुनिक काल में योरोप ने विश्व के अन्य अनेक भू-भागों पर आधिपत्य प्राप्त करके अपनी भाषाओं का प्रचार तथा विकास किया है। 
    इस प्रकार उपर्युक्त तथा अन्य अनेक कारणों से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो जाता है कि विश्व के भाषा-परिवारों में ‘भारोपीय परिवार’ का महत्व निस्सन्देह सर्वाधिक है।


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