विश्व की भाषाएँ तथा भाषा परिवार

अनुक्रम

इसमें के बारे में अध्ययन करेंगे।


विश्व में कई भाषाएँ बोली जाती है। इंग्लैंड में अंग्रेज़ी, फ्रांस में फ्रांसीसी, रूस में रूसी। भारत में भी हिंदी, पंजाबी, गुजराती, मराठी, कन्नड़ आदि भाषाएँ बोली जाती हैं। विश्व में कुल कितनी भाषाएँ बोली जाती हैं। अनुमान है विश्व में 6,000 से ऊपर भाषाएँ बोली जाती हैं। और भारत में हिंदी 61 प्रतिशत की मातृभाषा है।

विश्व के भाषा परिवार 

विश्व की समस्त भाषाओं को दस परिवारों में बाँटा जाता है।

1) भारोपीय परिवार या भारत-यूरोप परिवार -

इस परिवार में प्राचीन भाषाएँ संस्कृत, लैटिन, ग्रीक शामिल हैं; इस परिवार की आधुनिक भाषाओं में अंग्रेज़ी, जर्मन, फ्रांसीसी, इतालवी, स्पैनिश, ग्रीक, रूसी, चेक, फ़ारसी, पश्तो आदि के साथ हिंदी, बांगला, गुजराती, मराठी आदि भारतीय भाषाएँ, सिंहली आदि आती हैं। इसका मतलब यह है कि इस परिवार की भाषाएँ बोलने वाले अमेरिका महाद्वीप, आस्ट्रेलिया महाद्वीप, यूरोप में अधिसंख्यक हैं, एशिया में भी इस भाषा परिवार के बोलन वालों की अच्छी संख्या है। भारत-ईरानी इसी परिवार का एक वर्ग है और हिंदी आदि भारतीय आर्य भाषाएँ इस उपकुल की एक प्रमुख शाखा में आती है।

2) सेमेटिक-हैमेटिक परिवार -

इन भाषाओं के बोलने वालों का क्षेत्र यानी मध्य एशिया पुरानी बैबिलोन और सुमेर संस्कृतियों का केंद्र था। लिपि का उदय इसी क्षेत्र में हुआ। यहाँ की पुरानी लिपि ‘कीलाक्षर’ अब भी सुरक्षित है। हीबू्र में बाइबिल की रचना हुई और अरबी में कुरान की। पुरानी हीब्रू लगभग समाप्त हो गयी थी, लेकिन अब इस्राइल में बसे यहूदियों ने इसे पुनर्जीवित किया। पुरानी अरबी अब नये रूपों में मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका के कई देशों में बोली जाती है। हीब्रू और अरबी की अपनी अलग लिपियाँ हैं। हैमेटिक वर्ग की भाषाएँ उत्तरी अफ्रीका के कई देशों में बोली जाती हैं। हौज़ा इस वर्ग की प्रमुख भाषा है। कई विद्वान इन दोनों वर्गों को अलग परिवार मानते हैं। 

3) सूडानी भाषा परिवार -

 इसका क्षेत्र उत्तरी अफ्ऱीका में सूडान तथा अन्य देश हैं। वास्तव में यह कई भिन्न भाषा परिवारों का समूह है। 

4) नाइजर-कांगो परिवार -

इसका क्षेत्र शेष अफ्रीका है। इसमें कई शाखाएँ हैं। पश्चिमी अफ्ऱीकी शाखा में नाइजीरिया की कई भाषाएँ हैं। मध्य शाखा विस्तार के कारण महत्त्वपूर्ण है। इसमें स्वाहिली, और दक्षिणी अफ्ऱीकी की बुशमैन महत्त्वपूर्ण हैं। ये भाषाएँ अब रोमन में लिखी जा रही है और इनमें आधुनिक युग में साहित्य रचना हो रही है। 

5) यूरल-अल्टाइक परिवार -

इस परिवार के दो प्रमुख वर्ग हैं। फिनलैंड-अग्रिक वर्ग में फिनलैंड की भाषा, हंगेरी की भाषा आती है। अल्टाइक वर्ग में तुर्की, मंगोल भाषा, मंच भाषा आदि आती है। कई विद्वान जापानी तथा कोरियाई भाषाओं को भी इसी परिवार में गिनते हैं और कुछ उन्हें अलग परिवार में रखते हैं।

6) द्रविड़ भाषा परिवार -

इस परिवार की भाषाएँ दक्षिण भारत में बोली जाती हैं जिनमें तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाएँ शामिल हैं। इन भाषाओं में संस्कृत और अरबी-फारसी के हज़ारों शब्द हैं, जिनके कारण ये आर्य भाषाओं के निकट आती हैं। 

7) चीनी-तिब्बती परिवार -

इसमें म्यानमार की बर्मी आदि भाषाएँ हैं। चीन की संस्कृति प्राचीन और उन्नत है। चीनी भाषा की लिपि चित्रात्मक (हर शब्द का एक वर्ण वाली) है, अध्ययन की दृष्टि से जटिल है। तिब्बती में कई प्राचीन बौद्ध धर्म ग्रंथ उपलब्ध हैं। भारत में पूर्वी क्षेत्र में इस परिवार की कई भाषाएँ बोली जाती हैं। गारो, बोड़ों आदि पहाड़ी भाषाएँ, अरूणाचल की भाषाएँ, मिजो, मणिपुरी आदि इस परिवार की भारतीय भाषाएँ हैं। 

8) आस्ट्रो-एशियाटिक परिवार -

इस परिवार का क्षेत्र भारत से लेकर पूर्व एशिया में इंडो-चीन तक है। दक्षिण म्याँनमार की मोन, कंबोडिया की ख्मेर, विएतनामी इस वर्ग की भाषाएँ हैं। भारत में मुंडा भाषाएँ आस्ट्रिक भाषाएँ हैं, जिनमें बिहार की संथाली प्रमुख है। मेघालय की खासी भाषा, निकोबार की निकाबारी आदि इस परिवार की भारतीय भाषाएँ हैं। 

9) मलय-पालिनेशियन परिवार -

इस परिवार में दो वर्ग हैं। मलय वर्ग में मलाया की भाषा मलय और इंडोनेशिया की भाषा इंडोनेशियन आती हैं। पालिनेशियन वर्ग में न्यूज़ीलैंड से हवाई द्वीप समूह तक की कई भाषाएँ आती हैं। 

10) अमेरिकी भाषाएँ -

अमेरिका के मूल निवासी (रेड इंडियन) अमेरिकी भाषाएँ बोलते हैं। वैसे ये निवासी कम होते जा रहे हैं और कई अंग्रेज़ी भाषी हो गए हैं। इनके अलवा कार्केशियन भाषाएँ, बैस्क क्षेत्र की भाषाएँ, आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की भाषाएँ अवर्गीकृत हैं या अपने स्वतंत्र परिवार हैं। परिवारों के वर्गीकरण में ऐसी कई अनबूझ पहेलियाँ रह ही जाती हैं।

भारोपीय परिवार

भारोपीय परिवार की भाषाओं को ‘सप्तम्’ और ‘केंतुम्’ दो वर्गों में रक्खा गया है। 

केंतुम् वर्ग

1. केल्टिक - आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व इस शाखा के बोलने वाले मध्य यूरोप, उत्तरी इटली, फ्रांस अब आयरलैण्ड, वेल्स, स्काटलैंड, मानद्वीप और ब्रिटेनी तथा कार्नवाल के ही कुछ भागों में इसका क्षेत्र शेष रह गया है

2. जर्मनिक - यूरोप की दो प्रमुख भाषाएँ अंग्रेज़ी और जर्मनी इसी वर्ग की भाषाएँ हैं। इस शाखा की उत्तरी उपशाखा में स्वीडन, डेनमार्क और नार्वे की भाषाएँ (स्वीडिश, डेनिश और नार्वीजियन) आती हैं। अंग्रेज़ी पश्चिमी उपशाखा की ही भाषा थी, जिसका व्यवहार आंग्ल और सैक्सन नामक जातियाँ करती थीं। इन्होंने इंग्लैंड पर आक्रमण कर उसपर आधिपत्य किया। इसी कारण पुरानी अंग्रेज़ी को एंग्लो-सैक्सन भी कहा जाता था। डच, जर्मन इस शाखा की अन्य प्रमुख भाषाएँ हैं। पूर्वी उपशाखा में पुरानी भाषा गाथिक का नाम उल्लेखनीय है, जिसमें पाँचवीं शताब्दी के लेख मिलते हैं। यह उपशाखा लुप्तप्राय हैं।

3. लैटिन - इसका नाम इटाली भी है। इसको सबसे पुरानी भाषा लैटिन है, जो आज रोमन कैथलिक सम्प्रदाय की धार्मिक भाषा है। आरम्भ में लैटिन शाखा का प्रधान क्षेत्र इटली में था। 

4. ग्रीक - इस शाखा में कुछ भौगोलिक कारणों से बहुत पहले से छोटे-छोटे राज्य और उनकी बहुत-सी बोलियाँ हो गई हैं। इसके प्राचीन उदाहरण महाकवि होमर के इलियड और ओडिसी महाकाव्यों में मिलते हैं। इनका समय एक हज़ार ई. पू. माना जाता है। ये दोनों महाकाव्य अधिक दिन तक मौखिक रूप में रहने के कारण अपने मूल रूप में आज नहीं मिलते, फिर भी उनसे ग्रीक के पुराने रूप का कुछ पता तो चल ही जाता है। ग्रीक भाषा बहुत-सी बातें में वैदिक संस्कृत से मिलती-जुलती है। 

जब ग्रीस उन्नति पर था होमरिक ग्रीक का विकसित रूप ही साहित्य में प्रयुक्त हुआ। उसकी बोलियाँ भी उसी समय अलग-अलग हो गई।

एट्टिक बोली का लगभग चार सौ ई. पू. में बोलबाला था, अत: यही भाषा यहाँ की राज्य भाषा हुई। आगे चलकर इसका नाम ‘कोइने’ हुआ और यह शुद्ध एट्टिक से धीरे-धीरे कुछ दूर पड़ गई और एशिया माइनर तक इसका प्रचार हुआ। उधर मिस्र आदि में भी यह जा पहुंची और स्वभावत: सभी जगह की स्थानीय विशेषताएँ इसमें विकसित होने लगीं।

सतम् वर्ग

भारोपीय परिवार की सतम् वर्ग की शाखाओं को इस प्रकार दिखाया जा सकता है-

1. इलीरियन - इस शाखा को ‘अल्बेनियन’ या ‘अल्बेनी’ भी कहते हैं। अल्बेनियन के बोलने वाले अल्बेनिया तथा कुछ ग्रीस में हैं। इसके अन्तर्गत बहुत सी बोलियाँ हैं, जिनके घेघ और टोस्क दो वर्ग बनाये जा सकते हैं। घेघ का क्षेत्र उत्तर में और टोस्क का दक्षिण में है। अल्बेनियन साहित्य लगभग 17वीं सदी से आरम्भ होता है। इसमें कुछ लेख 5वीं सदी में भी मिलते हैं। इधर इसने तुर्की, स्लावोनिक, लैटिन और ग्रीक आदि भाषाओं से बहुत शब्द लिए हैं। अब यह ठीक से पता चलाना असंभव-सा है कि इसके अपने पद कितने हैं। इसका कारण यह है कि ध्वनि-परिवर्तन के कारण बहुत घाल-मेल हो गया है। बहुत दिनों तक विद्वान् इसे इस परिवार की स्वतंत्र शाखा मानने को तैयार नहीं थे किन्तु जब यह किसी से भी पूर्णत: न मिल सकी तो इसे अलग मानना ही पड़ा

2. बाल्टिक - इसे लैट्टिक भी कहते हैं। इसमें तीन भाषाएँ आती हैं।  इसका क्षेत्र उत्तर-पूरब में है। यह रूस के पश्चिमी भाग में लेटिवियाव राज्य की भाषा है। 

3. आर्मेनियन या आर्मीनी - इसे कुछ लोग आर्य परिवार की ईरानी भाषा के अन्तर्गत रखना चाहते हैं। इसका प्रधान कारण यह है कि इसका शब्द-समूह ईरानी शब्दों से भरा है। पर, ये शब्द केवल उधार लिये हुए हैं।  5वीं सदी में ईरान के युवराज आर्मेनिया के राजा थे, अत: ईरानी शब्द इस भाषा में अधिक आ गये। तुर्की और अरबी शब्द भी इसमें काफ़ी हैं। इस प्रकार आर्य और आर्येतर भाषाओं के प्रभाव इस पर पड़े हैं। इसके व्यंजन आदि संस्कृत से मिलते हैं। जैसे फ़ारसी ‘दह’ और संस्कृत ‘दशन्’ के भाँति 10 के लिए इसमें ‘तस्न’ शब्द है। दूसरी ओर हस्व स्वर ए और अेॉ आदि इसमें अत: इसे आर्य और ग्रीक के बीच में कहा जाता है।

आर्मेनियन के प्रधान दो रूप हैं। एक का प्रयोग एशिया में होता है और दूसरे का यूरोप में। इसका क्षेत्र कुस्तुनतुनिया तथा कृष्ण सागर के पास है। एशिया वाली बोली का नाम अराराट है और यूरोप में बोली जाने वाली का स्तंबुल।

हिन्दी ईरानी या भारत ईरानी 

भारत-ईरानी शाखा भारोपीय परिवार की एक शाखा है। इस शाखा में भारत की आर्य भाषाएँ हैं, दूसरी तरफ ईरान क्षेत्र की भाषाएँ हैं जिनमें फ़ारसी प्रमुख है। इन दोनों को एक वर्ग में रखने का भाषा वैज्ञानिक आधार यही है कि दोनों भाषाओं में काफ़ी निकटता है। क्या दोनों उपशाखाओं की भाषाएँ बोलने वाले कभी एक थे और बाद में उनकी भाषाओं में अधिक अंतर आने लगा? ईरान के निवासी भी आर्य थे। ईरान शब्द ही ‘आर्यों का’ (आर्याणम्) का बदला हुआ रूप लगता है। प्राचीन ईरानी भाषा ‘अवेस्ता’ में आर्य का रूप ‘ऐर्य’ था। यह संबंध काल्पनिक नहीं है, प्राचीन युग में भारत और ईरान में धर्म का स्वरूप एक था, दोनों की भाषाओं (अवेस्ता और संस्कृत) में बहुत समानता थी। क्या ये लोग किसी तीसरी जगह से आकर इन दोनों क्षेत्रों में अलग-अलग बस गये थे? इस संबंध में विद्वानों में मतभेद है। लेकिन यह बात निर्विवाद है कि भारत और ईरान के आर्य एक ही मूल के थे। भारत-ईरानी शाखा की तीन उपशाखाएँ मानी जाती थी। 
  1. भारतीय आर्य भाषाएँ 
  2. भारत ईरानी दरद
  3. ईरानी

भारोपीय परिवार का महत्व

विश्व के भाषा परिवारों में भारोपीय का सर्वाधिक महत्व हैं। यह विषय, निश्चय ही सन्देह एवं विवाद से परे हैं। इसके महत्व के अनेक कारणों में से सर्वप्रथम, तीन प्रमुख कारण यहाँ उल्लेख है-
  1. विश्व में इस परिवार के भाषा-भाषियों की संख्या सर्वाधिक है।
  2. विश्व में इस परिवार का भौगोलिक विस्तार भी सर्वाधिक है।
  3. विश्व में सभ्यता, संस्कृति, साहित्य तथा सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक विकास की दृष्टि से भी इस परिवार की प्रगति सर्वाधिक हुई है।
  4. ‘तुलनात्मक भषाविज्ञान’ की नींव का आधार भारोपीय परिवार ही है।
  5. भाषाविज्ञान के अध्ययन के लिये यह परिवार प्रवेश-द्वार है।
  6. विश्व में किसी भी परिवार की भाषाओं का अध्ययन इतना नहीं हुआ है, जितना कि इस परिवार की भाषाओं का हुआ है।
  7. भाषाओं के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए इस परिवार में सभी सुविधाएँ हैं। जैसे- (क) व्यापकता, (ख) स्पष्टता, तथा (ग) निश्चयात्मकता। 
  8. प्रारम्भ से ही इस परिवार की भाषाओं का, भाषा की दृष्टि से, विवेचन होता रहा है, जिससे उनका विकासक्रम स्पष्ट होता है।
  9. संस्कृत, ग्रीक, लैटिन आदि इस परिवार की भाषाओं का प्रचुर साहित्य उपलब्ध है, जो प्राचीन काल से आज तक इन भाषाओं के विकास का ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत करता है और जिसके कारण इस परिवार के अध्ययन में निश्चयात्मकता रहती है।
  10. अपने राजनीतिक प्रभाव की दृष्टि से भी यह परिवार महत्वपूर्ण है। कारण, प्राचीनकाल में भारत ने तथा आधुनिक काल में योरोप ने विश्व के अन्य अनेक भू-भागों पर आधिपत्य प्राप्त करके अपनी भाषाओं का प्रचार तथा विकास किया है। 
इस प्रकार उपर्युक्त तथा अन्य अनेक कारणों से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो जाता है कि विश्व के भाषा-परिवारों में ‘भारोपीय परिवार’ का महत्व निस्सन्देह सर्वाधिक है।

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