गरीबी की अवधारणा, कारण एवं गरीबी-उन्मूलन के उपाय

In this page:


अक्सर यह माना जाता है कि वे लोग गरीब हैं जो एक निश्चित न्यूनतम उपभोग का स्तर प्राप्त करने में असफल रहते हैं। परन्तु जिन विशेषज्ञों ने गरीबी की समस्या का अध्ययन किया है। वे इस बात पर एक मत नहीं है कि कितनी आय न्यूनतम उपभोग स्तर प्रदान करने के लिए काफी हैं। जुलाई 1962 में योजना आयोग द्वारा गठित एक समिति ने इस बात का अनुमान लगाने का प्रयास किया था कि राष्ट्रीय आधार पर गरीबी को परिभाषित करने के लिए न्यूनतम उपभोग स्तर कितना लिया जाए। इस समिति ने सुझाव दिया था कि प्रचलित कीमतों के आधार पर न्यूनतम जीवन स्तर के लिए प्रतिव्यक्ति निजी उपभोग पर 20 रु. मासिक व्यय होना चाहिए। समिति किस आधार पर इस राशि तक पहुंची थी, यह स्पष्ट नहीं है। इसके अतिरिक्त, समिति ने शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग-अलग व्यय की राशियां न बतलाकर एक ही राशि की सिफारिश की थी जो सही नहीं है। इसका कारण यह है कि शहरी क्षेत्रों में रहन-सहन की लागतें ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक होती है। क्योंकि न केवल शहरों में कीमतें अधिक होती हैं। बल्कि शहरों में रहने वाले लोगों को कुछ ऐसे खर्च भी करने पड़ते हैं। जो ग्रामीण लोगों को नहीं करने पड़ते। परन्तु फिर भी योजना आयोग ने पहले समिति की इस परिभाषा को स्वीकार कर लिया था जहां तक विभिन्न अर्थशािस्त्रायों का संबंध है, बी.एस. मिन्हास और ए.वैद्यनाथन ने ग्रामीण गरीबी के अपने अध्ययनों में इसी परिभाषा को अपनाया है जबकि पी.के. वर्धन, दांडेकर व रथ, तथा एम.एव.आहलूवालिया ने अपनी-अपनी गरीबी रेखाऐं स्वयं परिभाषित की हैं।

योजना आयोग ने अब एक वैकल्पिक परिभाषा अपनाई हैं। जिसमें आहार संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखा गया है। ऐसी परिभाषा अपनाई है। जिसमें आहार संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखा गया है। इस परिभाषा के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में एक व्यक्ति के प्रतिदिन के भोजन 2400 कैलोरी तथा शहरी क्षेत्र में एक व्यक्ति के प्रतिदिन के भोजन में 2100 कैलोरी होनी चाहिए। आहार संबंधी इन जरूरतों को ध्यान में रखकर, 1979-80 की कीमतों पर ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा 76 रुपये तथा शहरी क्षेत्र में 88 रुपये होती है।

गरीबी का अनुमान

भारत में गरीबी के अनुमान लगाने के लिए कोई सीधे व उपयुक्त आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि अभी तक आप के वितरण से संबन्धित जानकारी इकट्ठा करने की कोशिश नहीं की गई है। हां, इतना अवश्य है कि राष्ट्रीय सेंपिल सर्वेक्षण में उपभोग व्यय से सम्बन्धित जो जानकारी उपलब्ध है उसके आधार पर शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी का अनुमान लगाने का प्रयास किया जा सकता है। अर्थशास्त्रियों ने इसी स्त्रोत का अधिकतर प्रयोग किया है। हालांकि दांडेकर व रथ, मिन्हास, वर्धन और आहलूवालिया ने आंकड़ों के एक ही स्त्रोत का प्रयोग किया है परन्तु गरीबी की अलग-अलग संकल्पना लेने के कारण गरीबी-सम्बन्धी उनके अनुमान अलग-अलग हैं।

दांडेकर व रथ के अनुमान : गरीबी का अनुमान लगाने के लिए दांडेकर व रथ योजना आयोग की समिति द्वारा दी गई गरीबी रेखा को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार वह उपभोग व्यय वांछनीय है जो कैलोरी के रूप में कम से कम न्यूनतम आवश्यक आहार उपलब्ध करा सकें। 1960.61 में यह ग्रामीण क्षेत्रों में 170 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रति वर्ष तथा शहरी क्षेत्रों में 271 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष था। इस प्रकार योजना आयोग की तुलना में, दांडेकर व रथ का ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अनुमान काफी कम था। जबकि शहरी क्षेत्रों के लिए कुछ अधिक था। गरीबी का अनुमान लगाने के लिए दांडेकर व रथ न्यूनतम ग्रामीण व्यय को थोड़ा बढ़ाकर 180 रुपये प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति (अर्थात 15 रुपये प्रतिमास) लेते हैं और न्यूनतम शहरी व्यय को 270 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष (अर्थात 22.5 रुपये प्रतिमास) लेते हैं। इस आधार पर दांडेकर व रथ के अनुसार, 1960-61 में लगभग 40 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या और 50 प्रतिशत शहरी जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे हैं। 1960-61 में गरीबी का अनुमान लगाने के बाद दांडेकर व रथ ने यह जानने का प्रयास किया है कि विकास से होने वाले लाभों का वितरण सातवें दशक के दौरान जनसंख्या के विभिन्न वर्गों को कितना हो पाया हैं। इस संबंध में उनका अनुमान है कि 1960 से 1968-69 के बीच के आठ वर्षों में औसत उपभोग में वास्तविक रुप में 4.8 प्रतिशत की वृद्धि है। निश्चय ही यह बहुत कम है। इससे भी निराशाजनक बात यह है कि इतनी कम वृद्धि का वितरण भी सभी वर्गों के बीच समान रूप से नहीं हुआ है।
पी.के.वर्धन के अनुमान : वर्धन के द्वारा परिभाषित गरीबी की रेखा दांडेकर व रथ की अपेक्षा कम है। 1960-61 की कीमतों पर वर्धन ने गरीबी की रेखा ग्रामीण क्षेत्रों में 15 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिमास और शहरी क्षेत्रों में 18 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिमास ली है। राष्ट्रीय सेंपिल सर्वेक्षण में दिए गए उपभोग व्यय के आकडों तथा खेतिहार मजदूरों के उपभोक्ता कीतम सूचकांक का प्रयोग करके वर्धन इस अनुमान पर पहुंचते है कि 1968-69 में 55 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या गरीबी की रेखा से से नीचे थी। इस वर्ष शहरी क्षेत्रों में 41 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी की रेखा से नीचे थी। यदि बर्धन योजना आयोग द्वारा परिभाषित गरीबी की रेखा लेते तो ग्रामीण व शहरी क्षेणों मे गरीबी अनुमान और भी ज्यादा होते ।

बी.एस. मिन्हास के अनुसार:- मिन्हास ने 1956-57 से 1967-68 की अवधि के लिए गरीबी की रेखा की परिभाषा को दो अनुमानों में प्रस्तुत किया है। एक अनुमान में योजना आयोग द्वारा स्वीकृत गरीबी की रेखा की परिभाषा ली गई। जबकि दूसरे अनुमान में उन्होने अपनी गरीबी की रेखा ली है। (जो 1960-61 की कीमतों पर 200रू प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष थी) मिन्हास का यह तर्क ठीक लगता हैं कि यदि 1960-61 की कीमतों पर शहरी क्षेत्रों मे न्यूनतम वांछनीय जीवन स्तर 240 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष लिया जाए तो यही जीवन स्तर ग्रामीण क्षेत्रों में 200 रू प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति को प्राप्त होता है। मिन्हास के अनुसार यदि गरीबी की रेखा को 1960-61 की कीमतों पर 240 रूपयें प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष लिया जाता है। तो गरीबो की संख्या में 1956-57 से 1967-68 के बीच कोई खास अन्तर दिखाई नही देता। हां इतना आवश्यक है कि सूखे के वर्षो में इससे कुछ वृद्वि तथा अच्छी फसलों के वर्षो में इसमें कुछ कमी अवश्य दिखाई देती है। परन्तु अनुपात के रूप में गरीबी से नीचे लोगों की संख्या गिरी है। जहां 1956-57 में 65.0 प्रतिशत लोग इस रेखा के नीचे थे। वहाँ 1967. 68 में 50ण्6 प्रतिशत लोग इस रेखा के नीचे थे। यदि गरीबी की रेखा 1960-61 की कीमतों पर 200 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष रखी जाए (जैसा कि मिन्हास ने परिभाषित की है) तो गरीबी की रेखा से नीचे न केवल लोगों का अनुपात 1956. 57 में 52.4 प्रतिशत से गिरकर 1967-68 में 37.1 प्रतिशत रह जाता है। परन्तु गरीबो की कुल संख्या में काफी कमी नजर आती है। यद्यपि 1968-69 व 1968-69 वे 1969-70 के लिए मिन्हास ने गरीबी के अनुमान प्रस्तुत नहीं किए है परन्तु उनका विश्वास हैं कि इन दोनों परिभाषाओं के आधार पर 1970 में भी गरीबी की रेखा से नीचे लोगों की संख्या 1967-68 की तुलना मे कम नहीं होगी।

एम.एस. आहलूवालिया के अनुसार : आहलूवालिया ने 1960-61 की कीमतों पर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए गरीबी की रेखा को 15 रूपये प्रति मास परिभाषित किया है तथा प्रत्येक बर्ष बदलती कीमतों के प्रभाव के अनुरूप गरीबी की रेखा को समायोजित (adjust) करने के लिए खेतिहर मजदूरों के उभोक्ता कीमत सूचकांको का प्रयोग किया है। आहलूवालिया के अनुसार, 1956-57 में ग्रामीण जनता का 54.1 प्रतिशत गरीबी की रेखा के नीचे था। यह प्रतिशत 1960-91 में कम होंकर 38.9 रह गया। इसके बाद 1966-67 तक न केवल गरीबी की रेखा से नीचे लोगों की संख्या बढ़ती अपितु उनकी प्रतिशत संख्या की बढ़ी। इसके बाद गरीबी में फिर गिरावट हुई और 1973-74 में ग्रामीण जनसंख्या का 46.1 प्रतिशत गरीबी भी रेखा से नीचा था। आहलूवालिया का अध्ययन महत्वपूर्ण है। क्योंकि इसमें सबसे लम्बी अवधि (1957-58 से 1973-74) के लिए अनुमान प्रस्तुत किए गए हैं। इस अध्ययन से यह बात स्पष्ट होती हे कि ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी की कोई दीर्घकालीन प्रवृति नही थी, अपितु उतार चढ़ाव होते रहते थे और इन उतार चढ़ावों का सीधा सम्बन्ध कृषि उत्पादन से था। जिस वर्ष वर्षा अच्छी होती थी और उत्पादन अधिक होता था, उस वर्ष खाद्यानों की कीमत गिरती थी तथा गरीबी की रेखा से नीचे लोगों की संख्या भी कम हो जाती थी। कम वर्षा वाले वर्षो में इससे उल्टी प्रवृति देखने को मिलती थी।

ऊपर दिए गए सब अनुमान अब पुराने हो चुके है। ये अनुमान काफी अलग-अलग निष्कर्ष भी देते है। उदाहरण के लिए, जहां मिन्हास के अनुसार 1967-68 में ग्रामीण जनसंख्या का केवल 37.1 प्रतिशत गरीबी की रेखा के नीचे था वहां बर्धन के अनुसार 54 प्रतिशत तथा आहलूवलिया के अनुसार 56.5 प्रतिशत गरीबी की रेखा के नीचे था। दांडेकर व रथ के अनुसार 1968-69 में ग्रामीण जनता का 40 प्रतिशत गरीबी की रेखा से नीचे था। आहलूवालिया बर्धन, तथा दांडेंकर व रथ ने गरीबी की रेखा को मिन्हास की तुलना में कम स्तर पर परिभाषित किया है। परन्तु गरीबी के उनके अनुमान मिन्हास की तुलना में अधिक है। इसका कारण यह है। कि यद्यपि उनके आंकडो के स्त्रोत एक ही है, यथापि गणना की उनकी रिति अलग अलग है। एक बात जिस पर कोई मतभेद नही हो सकता यह है कि देश में गरीबी काफी बडे़ पैमाने पर विद्यमान है और जनसंख्या का काफी बड़ा अंश अत्यंत दयनीय हालत में जिन्दगी बसर कर रहा है। बी.एस. मिन्हास, एल.आर. जैन ओर एस.डा. तेन्दुलकर योजना आयोग के इन अनुमानों को गढे़ हुए तथ्य (arte facts) बताते है। इनकी राय मे योजना आयोग ने गरीबी की व्यापकता का अनुमान लगाने के लिए गलत रीतियों को प्रयोग किया है। वी.एम. दांडेकर की राय में भी योजना आयोग के गरीबों की व्यापकता के बारे में अनुमानों पर मिन्हास, जैन और तेंदुलकर को आपत्ति सही है। वी.एम. दांडेकर की राय में भी योजना आयोग के गरीबी की व्यापकता के बारे में अनुमानों पर मिन्हास, जैन और तेन्दुलकर ने गरीबी की रेखा के नीचे लोगों के जो अनुमान दिए है वे सही सांख्यिकीय रीतियों के प्रयोग द्वारा प्राप्त किए गए है। इन अुनमानों से स्पष्ट है कि 1987-88 में भी ग्रामीण क्षेत्रों में 48.69 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों 37.76 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे था। और संपूर्ण देश में दोनों क्षेत्रों को मिलाकर देखने पर 45.85 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे थी। इस तरह गरीबी की व्यापकता में कमी के बारे में योजना आयोग का दावा ठीक नहीं है।

योजना आयोग ने उसके द्वारा गरीबी का व्यापकता के 1987-88 के अनुमानों की आलोचनाओ को ध्यान में रखकर इस मुद्दे पर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस की और गरीबी की व्यापकता का फिर से अनुमान लगाने के लिए एक विशेषज्ञ दल की नियुक्ति की। इस विशेषज्ञ दल ने जो रिपोर्ट 1993 में प्रस्तुत की उसमें माना गया कि यद्यपि 1973-74 से 1987-88 के बीच गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का अनुपात कम हुआ। लेकिन फिर भी 1987-88 में देश की 39.3 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी के रेखा के नीचे थी। इस रिपोर्ट के अनुसार 1987-88 में जहां ग्रामीण जनसंख्या का 39.1 प्रतिशत गरीबी की रेखा के नीचे था। वहां 41.1 प्रतिशत शहरी जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे थी।

गरीबी का वर्ग आधार

गरीबी की समस्या के समाधान के लिए नीति बनाने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि गरीब “कौन” है। अर्थात् गरीबों का वर्ग आधार क्या है। परन्तु दुर्भाग्यवश सरकार ने इस दिशा में कोई गम्भीर प्रयास नहीं किया है। राष्ट्रीय सैंपिल सर्वेक्षण के आंकड़ों का सहारा लेकर मिन्हास, वर्धन, दांडेकर व रथ तथा कुछ अर्थशािस्त्रायों ने इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने की कोशिश की है। उनके अनुसार, गरीबों में अधिकतर भाग निम्नलिखित लोगों का है :-
  1. खेतिहर मजदूरों के परिवार जिनके पास भूमि बिल्कुल नहीं है और जो कुल खेतिहर मजदूरों के परिवारों का लगभग 60 प्रतिशत है।
  2. खेतिहर मजदूरों के परिवार जिनके पास बहुत थोड़ी सी भूमि है और जो कुल खेतिहर मजदूरों के परिवार का लगभग 40 प्रतिशत है।
  3. ऐसे ग्रामीण श्रमिकों के परिवार जो खेती नहीं करते और जिनके पास भूमि भी नहीं है। इनमें गांवों में काम करने वाले वे दस्तकार (Village artisans) परिवार भी शामिल हैं जिनके परम्परागत रोजगार अब समाप्त हो रहे हैं। 
  4. भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों पर खेती करने वाले लोग (इसमें वे किसान शामिल हैं जो 2 हैक्टयर से कम भूमि पर खेती करते हैं और विशेष रूप से वे किसान शामिल है जो 1 हैक्टेयर से कम भूमि पर खेती करते हैं।)
जहां तक शहरी क्षेत्र के गरीबों का प्रश्न हैं, दांडेकर व रथ के अनुसार : ये लोग भी ग्रामीण क्षेत्रों से ही आए हैं ओर इनकी जड़ें भी गांवों में ही हैं। इसलिए वे सभी उसी वर्ग विशेष का हिस्सा हैं जिसका हिस्सा ग्रामीण लोग हैं। लेकिन लम्बे अरसे तक शहरों में रहने के कारण इन लोगों की कुछ स्पष्ट विशेषताऐं बन जाती हैं। बढ़ते हुए और फैलते हुए शहरों के माहौल में इन लोगों की जिन्दगी के बारे में कोई खास जानकारी उपलब्ध नहीं है।

गरीबी के कारण

भारत में निर्धनता की समस्या तथा उसके कारणों की विवेचना दीर्घकाल से अलग-अलग लोगों द्वारा अलग-अलग प्रकार से की जाती रही है। सन् 1870 में दादाभाई नौरोजी ने भारत की निर्धनता के कारणों की विवेचना की थी। इसके मुख्य कारणों को दो भागों में बांटा जा सकता है।
  1. आर्थिक कारक
  2. गैर आर्थिक कारक

आर्थिक कारक 

आर्थिक कारण भारत में गरीबी की विद्यमानता हेतु प्रमुख रूप से उत्तरदायी हैं।
  1. राष्ट्रीय उत्पाद का निम्न स्तर (Low Level of National Product) :- भारत का कुल राष्ट्रीय उत्पाद जनसंख्या की तुलना में काफी कम है इस कारण देश के नागरिकों की प्रतिव्यक्ति आय का स्तर अत्यन्त निम्न है। भारत का शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन 2000-2001 में उसी वर्ष की कीमतों के आधार पर 16,79,982 करोड़ रुपये था तथा प्रतिव्यक्ति आय केवल 16,047 रुपये थी, इस दृष्टि से भारत जो यू.एन.ओ. द्वारा निर्धारित बहुत अधिक निर्धन देशों की कसौटी में आता है।
  2. विकास की कम दर :- भारत की पंचवष्र्ाीय योजनाओं में विकास की दर बहुत कम रही है। योजनाओं की अवधि में विकास की दर 4.1 प्रतिशत रही है। इसके विपरीत जनसंख्या 1.8 प्रतिशत की दर से बढत्र रही है। अतएव जनसंख्या वृद्धि दर की तुलना में विकास की दर बहुत कम बढ़ रही है। विकास की दर में कम वृद्धि होने के फलस्वरूप निर्धनता को दूर नहीं किया जा सकता है।
  3. कीमतों मे वृद्धि (Increase in Prices) :- भारत में द्वितीय पंचवष्र्ाीय योजना के आंरभ से ही कीमतों में जो बढ़ने की प्रवृति आरम्भ हुई है वह अभी तक जारी है। इस तीव्र गति में होने वाली कीमत वृद्धि का देश की निर्धन जनता पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इसके फलस्वरूप निर्धनता का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।
  4. जनसंख्या का अधिक दबाव (Heavy Pressure of Population) : भारत में जनसंख्या अत्यन्त द्रुतगति से बढ़ रही है भारत में जनंसख्या का आकार न केवल बड़ा है वरन् इसमें तेजी से वृद्धि हो रही हे। इस वृद्धि के कारण पिछले कई वर्षो से मृत्यु दर का कम हो जाना पर जन्म दर का लगभग स्थिर रहना है। जनसंख्या की वृद्धि की यह दर, जो 1941-51 से 1.0 प्रतिशत थी, बढ़कर 1981-91 में 2.1 प्रतिशत हो गई है। जनसंख्या 2000-2001 में बढ़कर 102.70 करोड़ हो गई, जबकि 1991 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या 84.63 करोड़ थी। जनसंख्या का यह दबाव विकास के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा रही। भारत में जनसंख्या इस गति से बढ़ रही है कि कुल उत्पादन बढ़ने पर प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में अधिक धन नहीं हो पाता, जिससे जीवन-स्तर ऊंचा नहीं हो पाता। प्रतिव्यक्ति भूमि भी कम होकर 0.13 हैक्टेयर रह गई है।
  5. निरन्तर रहने वाली बेरोजगारी (Chronic Unemployment and Under Employment) :- भारत में बेरोजगारी के विभिन्न प्रकारों प्रच्छन्न अल्प रोजगार, मौसमी आदि में प्रत्येक प्रकार की बेरोजगारी पाई जाती है। जनसंख्या के निरन्तर बढ़ने से यहां चिरकालीन बेरोजगारी व अर्द्धबेरोजगारी की स्थिति उत्पन्न हो गई हैं। भारत में शिक्षित बेरोजगारी से भी बढ़कर कृषि में अदृश्य बेरोजगारी की समस्या है। बेरोजगारी की समस्या निर्धनता का मुख्य कारण है। भारत में 2000-2001 में लगभग 90 लाख व्यक्ति बेरोजगार थे। बेरोजगारी के कारण राष्ट्र की श्रमशक्ति का उत्पादक कार्यों में पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता है। इसके अतिरिक्त कार्यशील जनसंख्या पर आश्रितों की संख्या भी बढ़ रही है। इससे आप तथा उपभोग का स्तर भी कम हो रहा है।
  6. पूंजी की अपर्याप्तता (Capital Deficiency) - यद्यपि पूंजी का सभी कार्यों में महत्व होता है किन्तु उद्योग, परिवहन, सिंचाई तथा विकास के अन्य साधनों की स्थापना में पूंजी का विशेष स्थान होता है। इसलिए किसी देश के आर्थिक पिछड़ेपन का मुख्य कारण वहां पर पूंजी का अभाव हुआ करता है। भारत में भी ऐसी स्थिति विद्यमान है। भारत में लोगों की बचत का स्तर अत्यन्त निम्न है।
  7. कुशल श्रम व तकनीकी ज्ञान की कमी (Lack of Skilled Labour and Technical Knowledge) :- भारत में औद्योगिक शिक्षा तथा प्रशिक्षण (Training) का भी उचित प्रबंध नहीं है। इस अभाव में जनसंख्या का आकार अधिक होने के कारण श्रम की पूर्ति तो बहुत अधिक है परन्तु व प्रशिक्षित श्रम का अभाव है।
  8. योग्य व निपुण उद्यमकर्र्त्ताओंं का अभाव (Paucity of Able and Efficient Enterpreneurs) - अल्प-विकसित देशों में औद्योगिक विकास की प्रारम्भिक अवस्था में साहस और कल्पना शक्ति रखने वाले, जोखिम उठाने की योग्यता रखने वाले तथा अपने कार्य में दक्ष, निपुण एवं चतुर उद्यमकर्त्ताओं का अभाव होता है भारत में भी ऐसे उद्यमकर्त्ताओं का नितान्त अभाव है। फलस्वरूप, देश में मुख्यत: उन्हीं उद्योगों का विकास हो सका है जिनमें बहुत कम जोखिम है।
  9. उचित औद्योगीकरण का अभाव (Lack of Proper Industrialisation) - औद्योगिक दृष्टि से भारत अभी बहुत पिछड़ा हुआ है। भारत की गिनती पिछड़े हुए राष्ट्रों में की जाती है। यह इस तथ्य से प्रमाणित हो जाता है कि आज भी बड़े स्तर के उद्योगों में भारत की कुल कार्यशील जनसंख्या का केवल 3 प्रतिशत भाग ही लगा हुआ है। यद्यपि उपभोक्ता वस्तु उद्योग जैसे साबुन, कपड़ा, चीनी, चमड़ा, तेल आदि उद्योगों का काफी सीमा तक विकास सम्भव हुआ है किन्तु पूंजीगत एवं उत्पादक वस्तुओं के उद्योगों का विकास अभी तक समुचित प्रकार से नहीं हो पाया है। इसके लिए आज भी भारत को विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है।
  10. पुरानी सामाजिक संस्थाए (Outdated Social Institutions) - भारतीय अर्थव्यवस्था का मूल सामाजिक आधार आज तक भी पुरानी सामाजिक संस्थाएं तथा रूढ़ियां हैं। यह वर्तमान समय के अनुकूल नहीं है। ये संस्थाएं हैं - जातिप्रथा, संयुक्त परिवार प्रथा और उत्तराधिकार के नियम आदि। ये सभी भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी से होने वाले परिवर्तनों में बाधा उपस्थित करते हैं।
  11. प्राकृतिक साधनों का उचित प्रयोग न होना (No Proper Use of Natural Resources) - भारत प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धि की दृष्टि से अत्यन्त ही सम्पन्न देश हैं। यहां लोहा, कोयला, मैगजीन, अभ्रक जैसे बहुमूल्य खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं तथा सम्पूर्ण वर्ष बहने वाली नदियां विद्युत शक्ति का एक महत्वपूर्ण साधन हैं। भारत में विभिन्न प्रकार की मिट्टी पाई जाती है जो भिन्न-भिन्न किस्म की फसलें उपजा सकती हैं तथा मानव शक्ति भी अन्य देशों से बहुत अधिक हैं। परन्तु इन सब साधनों का हमारे देश में ठीक प्रकार से प्रयोग नहीं हुआ है।
  12. आधारिक संरचना के समुुन्नत साधनों का अभाव (Lack of Well Developed Infrastructure) - भारत के विशाल क्षेत्र के अनुसार यहां यातायात एवं संदेशवाहन के साधनों का समुचित विकास नहीं हो सका है। सड़क और रेल यातायात के समुचित रूप से उन्नत न होने के कारण कृषि विपणन दोषपूर्ण है। उद्योगों में समय पर कच्चा माल नहीं पहुंच पाता तथा उत्पादित वस्तुओं का सही वितरण नहीं हो पाता।
  13. स्फीतिदारी दबाब (Inflationary Pressures) - भारत में विशेषकर आम जरूरत की वस्तुओं की लगातार बढ़ती हुई कीमतों के कारण गरीब एवं मध्यम वर्ग पर दबाब बढ़ता जाता है। निरन्तर बढ़ती हुई कीमतों के कारण गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाली जनसंख्या के आकार में निरन्तर वृद्धि हो रही है।

गैर-आर्थिक कारण 

भारत में गरीबी की विकराल स्थिति की विद्यमानता हेतू केवल आर्थिक ही नहीं वरन् अनेक सामाजिक कारण भी समान रूप से उत्तरदायी रहे हैं। गरीबी के लिए प्रमुख उत्तरदायी कारण  हैं -
  1. ब्रिटिश शासन की विरासत (Legacy of British Rule) - अंग्रेजों ने अपने उपनिवेशी शासन के दौरान भारत में जमकर शोषण किया, यहां के परम्परागत उद्योग धंधों को नष्ट किया और इस देश के आर्थिक विकास के प्रतिकूल नीतियां अपनाई। इन सभी का सम्मिलित प्रभाव यह हुआ कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था इस प्रकार से छिन्न-भिन्न हुई की अभी तक संभल नहीं पाई है।
  2. जनसंख्या में तेजी से वृद्धि (Rapid Increase in Population) - भारत की जनसंख्या का आकार बड़ा है साथ ही इसमें बहुत तेजी से वृद्धि होती जा रही है। इसके कारण राष्ट्र की कुल आय में वृद्धि के बावजूद भी प्रतिव्यक्ति आय एवं उपभोग के स्तर में कोई खास वृद्धि नहीं हो पा रही है।
  3. सामाजिक कारण (Social Factors) - अशिक्षा, अज्ञानता, भाग्यवाद, पुरातनपंथी, पिछडे़-विरोधी ढाँचे, विचारों, मान्यताओं एवं परम्पराओं के कारण भी देश को विकास पथ अनेक बाधाओं से झुझना पड़ा है। इसके अतिरिक्त सरकार की कराधान और व्यय नीतियों का भी धनवान और गरीब के बीच के अंतराल को पटाने में ठीक प्रकार से अपनी उपयुक्त भूमिका का निर्वाह नहीं किया जा सकता है।

भारत में गरीबी-उन्मूलन के उपाय 

गरीबी मानव सभ्यता में एक अभिशाप है जिसे दूर करना राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की प्राथमिकता एवं अनिवार्य आवश्यकता है। गरीबी दूर किए बिना न तो देश के समस्त व्यक्तियों को आर्थिक विकास में सहभागी ही है और न ही देश के आम आदमी को सम्मानजनक ढंग से जीवन जीने का अवसर ही प्रदान किये जा सकते है। इसलिए गरीबी उन्मूलन भारत की पंचवष्र्ाीय योजनाओं का एक प्रमुख उद्देश्य रहा है। गरीबी हटाने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित उपायो को अपनाना श्रेयस्कर होगा:

जनंसंख्या नियन्त्रण - 

सम्भवत: किसी राष्ट्र में गरीबी का अत्यंत महत्त्वपूर्ण कारण आवांछनीय जनसंख्या में वृद्धि रहा है। भारत में राष्ट्रीय आय एवं राष्ट्रीय आय एवं राष्ट्रीय उत्पादन में जिस दर से वृद्धि हुई है, प्रति व्यक्ति आय एवं प्रति व्यक्ति उत्पादन में उस दर से वृद्धि नहीं हो सकी है। गरीबी मेंं वृद्धि यहीं से प्रारम्भ हुई है। कुल उत्पादन में बढ़ोत्तरी होने से बावजूद भी आम आदमी के उपभोग स्तर में वृद्धि नहीं हो सकी और गरीबों की संख्या बढ़ती गई। अत: भारत में गरीबी, उन्मूलन के लिए जनसंख्या पर नियन्त्राण स्थापित करना आवश्यक है। इसके लिए परिवार नियोजन कार्यक्रम को प्रभावी रूप से लागू करना होगा।

आय का पुनर्वितरण  

आय और धन के वितरण की असमानता गरीबी को स्थायी बना देती है। यह नागरिकों की कार्यकुशलता को भी विपरीत रूप से प्रभावित करती है। जब देश की अर्थव्यवस्था का ढांचा इस प्रकार का हो कि विकास के प्रयत्नों के कारण बढ़ी हुई आय को अमीर लोग ही हड़प जाते हों तो विकास के सारे प्रयत्न ही बेकार हो जाते हैं। ऐसी स्थिति मे गरीबी घटने की बजाय और अधिक बढ़ जाती है। भारत में बहुत कुछ हद तक ऐसा ही हो रहा है। अत: यहां गरीबी उन्मूलन के लिए आय इस प्रकार पुनर्वितरण कराना आवश्यक है जिससे गरीब वर्ग की आय व उपभोग का स्तर ऊंचा उठ सके। इसके लिए राष्टऋ्रीय साधन, सम्पत्ति एवं आय के प्रवाह को अमीरों से गरीबों की ओर मोड़ना होगा।

विकास की ऊंची दर - 

गरीबी उन्मूलन के लिए आय का पुनर्वितरण, जनसंख्या नियन्त्रण आदि उपायों का महत्व है, किन्तु इनकी कुछ सीमाएं हैं। अत: यह आवश्यक है कि गरीबी के स्थायी उपचार हेतु आर्थिक विकास की दर बढ़ाने पर ही सर्वाधिक ध्यान देना होगा। यद्यपि आय के पुनर्वितरण के द्वारा वर्तमान वस्तुओं आपस में बंटवारा तो सम्भव है। किन्तु देश की वस्तुओं के कुल भंडारों में वृद्धि करने के लिए तो उत्पादन में वृद्धि करनी होगी। अत: भारत में गरीबी-उन्मूलन की दृष्टि से तीव्र आर्थिक विकास सर्वप्रथम अनिवार्य शर्त हैं तीव्र आर्थिक विकास के लिए हमें उत्पादकता एवं कार्यकुशलता बढ़ाने, तकनीकी ज्ञान के स्तर में सुधार लाने, देश के मानवीय व प्राकृतिक साधनों का पूरा-पूरा उपयोग करने जैसे उपाय करने होंगे।

यहाँ यह तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि विकास की ऊँची दर गरीबी हटाने की दृष्टि से एक अनिवार्य शर्त तो है किन्तु पर्याप्त शर्त नहीं। यह भी सम्भव है कि उत्पादन बढ़ने पर गरीबों के उपभोग-स्तर में सुधार न हो। ऐसा जनसंख्या के बढ़ने अथवा बढ़े हुए उत्पादन को देश के गिने-चुने अमीर लोगों द्वारा हड़प जाने के कारण हो सकता है। अत: तीव्र आर्थिक विकास के साथ-साथ ही जनसंख्या के नियंत्राण एवं आय के पुनर्वितरण के उपाय भी आवश्यक हैं। वास्तव में ये सभी उपाय एक दूसरे के पूरक हैं।

कृषि का विकास  - 

भारत मूल रूप से एक कृषि प्रधान देश है और भारत की खेती पिछड़ी हुई है। भारत में गरीबों का काफी बड़ा भाग कृषि क्षेत्र में ही पाया जाता है। अत: कृषि के विकास पर ध्यान देना प्रथम प्राथमिकता होना चाहिए। भूमिहीन किसानों व सीमान्त किसानों की स्थिति में सुधार लाने हेतु विशेष प्रयास किये जाने चाहिए। ग्रामीण क्षेत्र की गरीबी को दूर करने के लिए भूमि का पुनर्वितरण भी काफी उपयोगी उपाय है।

कुटीर व लघु उद्योगों का विकास 

भारत में बेरोजगार लोगों को रोजगार प्रदान करने की दृष्टि से कुटीर व लघु उद्योगों का विकास किया जाना आवश्यक है। इससे न केवल बेरोजगार गरीब लोगों को काम मिलेगा वरन् आय व असमानता भी घटेगी। 6. सामाजिक भागीदारी (Social Participation) - यदि गरीब लोग विकास के कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी प्रारम्भ कर दे तो गरीबी को दूर किया जाना सरल हो जाएगा। इसके लिए गरीबों को स्वयं को गरीबी-उन्मूलन और आर्थिक विकास के कार्यक्रमों में शामिल करना होगा। इस कार्य में पंचायती राज संस्थानों, स्वैच्छिक संगठनों और स्व-सहायता समूहों की भागीदारी को बढ़ाना आवश्यक होगा।

छिपी हई बेरोजगारी की समाप्ति औैर रोजगार में वृद्धि

निर्धनता दूर करने के लिए रोजगार, अर्द्धरोजगार तथा छिपी हुई बेरोजगारी को दूर करने के लिए विशेष प्रयत्न किये जाने आवश्यक हैं। ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने के अधिक अवसर हैं उनका पूरा लाभ उठाना चाहिए। कृषि का विकास करके भूमि पर एक से अधिक फसल उगाने के फलस्वरूप अर्द्धबेरोजगारी तथा छिपी बेरोजगारी को कम किया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्र में कुटीर उद्योग, निर्माण आदि के कार्यों का विकास किया जाना चाहिए। शहरों में लघु उद्योग, यातायात आदि का अधिक विकास किया जाना चाहिए। शिक्षा की प्रणाली में परिवर्तन करके शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार प्रदान किया जाना चाहिए। 8. उत्पादन की तकनीकों में परिवर्तन (Change in Technique of Production) - प्रो. गुन्नर मिर्डेल के अनुसार भारत के लिए पश्चिमी पूंजी प्रधान तकनीक अपनाई जानी चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्था में इस प्रकार का तकनीकी विकास करना चाहिए जिससे श्रम का पूरा उपयेाग हो सके। वास्तव में, भारत के लिए मध्यम तकनीकें, जो श्रम प्रधान तथा पूंजी प्रधान तकनीकों के मध्य का मार्ग हैं, अपनाई जानी चाहिए। इसके फलस्वरूप रोजगार की मात्रा बढे़गी तथा निर्धनता को दूर किया जा सकेगा।

पिछड़े  क्षेत्रों पर विशेष ध्यान - 

भारत में कुछ क्षेत्र जैसे उड़ीसा, नागालैंड, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में आज भी निर्धनों का अनुपात दूसरे प्रदेशों से अधिक है। सरकार को पिछड़े इलाकों में विशेष सुविधायें प्रदान करनी चाहिए जिससे निजी पूंजी उन प्रदेशों में निवेश किया जाना सम्भव हो सकें। इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्रों का भी विकास किया जाना चाहिए।

न्यूूनतम आवश्यकताओं की सन्तुष्टि - 

सरकार को निर्धनों की न्यूनतम आवश्यकताओं जैसे पीने का पानी, प्राथमिक चिकित्सा, प्राथमिक शिक्षा आदि को सन्तुष्ट करने के प्रयत्न करने चाहिए। इसके लिए यदि सरकार को अधिक से अधिक राशि व्यय करनी पडे़ तो कोई बुराई नहीं है।

निर्धनों की उत्पादकता में वृद्धि - 

डॉ. वी.के.आर.वी.राव के अनुसार निर्धनता को दूर करने के लिए निर्धनों की आर्थिक उत्पादकता को बढ़ाना आवश्यक है। निर्धनों को स्वयं सतर्क होकर रोजगार की अवस्था को प्राप्त करने के प्रयत्न करने चाहिए। सरकार को इसके लिए सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्रों में अधिक निवेश करना चाहिए। निर्धन वर्ग को रोजगार विन्मुख प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए तथा उनकी उत्पादकता बढ़ाने के प्रयत्न किये जाने चाहिए।

Comments