कर प्रशासन क्या है?

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प्राचीन काल में करों का राजकीय व्यवस्था में कोई स्थान नहीं था तथा सन् 1500 तक इसके बारे में सोचा भी नहीं गया था। 1500 के बाद ही करों से आय प्राप्त करने की पहल की गयी। कर मुख्यतया धन एकत्र करने के उद्देश्य से लगाये जाते थे। राज्य की आय के स्रोतो में करों का प्रमुख स्थान होता है। आधुनिक युग में ‘कर’ सार्वजनिक आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा वसूल किया जाने वाला अनिवार्य भुगतान कर कहलाता है। कल्याणकारी कार्यों को पूरा करने तथा आर्थिक विकास हेतु साधन एकत्रित करने हेतु सरकार करारोपण का सहारा लेती है।

सरकार की समस्त क्रियाओं का आधार उसकी आय होती है, जिसका राजस्व में महत्वपूर्ण स्थान है। सरकार के कर्त्तव्यों में वृद्धि होने से सार्वजनिक व्यय की मात्रा बढ़ती जाती है और उसे पूरा करने के लिए जनता पर कर लगाये जाते हैं जिसे जनता को सहन करना ही होता है। वर्तमान समय में प्रशुल्क नीति की सहायता से सरकार देश की आर्थिक समस्याओं को दूर करने के प्रयास कर रही हैं। सार्वजनिक आय सम्बन्धी नीतियों का प्रयोग बचत, विनियोग एवं उत्पादन को बढ़ाने के लिए किया जाता है। विकसित एवं अविकसित राष्ट्रों में आर्थिक स्थिरता लाने के लिये आय सम्बन्धी नीति का प्रयोग किया जाता है। एक अच्छी कर प्रणाली में विभिन्न करों को इस प्रकार से समायोजित किया जाता है कि उनका सामूहिक प्रभाव समाज पर अच्छा पड़े। ‘कर’ सार्वजनिक आय का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। ‘कर’ मुद्रा के रूप में एक अनिवार्य अंशदान है, जो नागरिकों के सामान्य हित एवं कल्याण के लिए सरकार द्वारा नागरिकों से वसूल किया जाता है। प्रो. सेलिगमैन के अनुसार “कर व्यक्तियों द्वारा सरकार को दिया गया वह अनिवार्य भुगतान है, जो सामान्य लाभ के कार्यों हेतु लिया जाता है जिसका मिलने वाला विशेष लाभ से कोई सम्बन्ध नहीं होता है।”

कर के उद्देश्य

करारोपण के उद्देश्य हैं :

आय प्राप्त करना - 

करारोपण का सबसे प्रमुख तथा प्राचीनतम उद्देश्य आय प्राप्त करना है। राज्य को विभिन्न कार्यों को पूरा करने के लिए कर लगाने पड़ते हैं और इसलिये राज्य को कर लगाते समय यह देखना होता है कि इस कर से अधिक आय प्राप्त हो सकती है या नहीं। जिन करों से राज्य सरकार अधिक आय प्राप्त नहीं कर पाती, उनको समाप्त कर दिया जाता है।

उपभोग पर रोक लगाना -

कर का उद्देश्य यह भी होता है कि कुछ वस्तुओं के उपभोग पर रोक लगाई जा सके। समाज में कुछ ऐसी वस्तुओं का उपभोग होता है जिससे नैतिक पतन होने लगता है तथा लोगों का स्वास्थ्य गिर जाता है और स्वास्थ्य के गिरने पर कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है। उपभोक्ता अपनी आय का अधिकांश भाग इन मादक पदार्थों पर व्यय कर देता है और शेष आय इतनी रह जाती है कि जिससे अनिवार्य वस्तुओं तक का उपभोग करना कठिन हो जाता है। अत: मादक पदार्थों का उपभोग केवल उपभोक्ता के लिये हानिकारक नहीं होता, बल्कि देश के लिये भी वह हानिकारक होता है क्योंकि कार्य करने की क्षमता के कम होने से देश का उत्पादन घट जाता है। इन वस्तुओं के उपभोग को रोकने के लिये सरकार कर की सहायता लेती है।

समाज में धन की असमानता कम करना

आर्थिक असमानता देश की शत्रु होती है। एक लोक हितकारी राज्य (Welfare State) की स्थापना तभी हो सकती है जबकि देश में आर्थिक असमानता कम हो तथा धन का समान वितरण हो। इस असमानता को कर की सहायता से दूर किया जा सकता है। सरकार धनी वर्ग पर भी भारी मात्रा में प्रत्यक्ष कर (Direct Tax) लगाकर उनसे भारी मात्रा में धन खींच लेती है। जिससे वे अधिक धनी नहीं होने पाते। इन करों से जो आय प्राप्त होती है, उसे निर्धन वर्ग के हित पर व्यय किया जाता है जिससे निर्धनों का रहन-सहन का स्तर ऊंचा हो जाता है। इससे धनी और निर्धन के बीच असमानता की खाई कम होने लगती है।

आयात-निर्यात पर रोक लगाना -

कर लगाने का उद्देश्य कभी-कभी आयात-निर्यात पर रोक लगाने का भी होता है। जब सरकार यह समझती है कि वस्तुओं का उत्पादन देश में कम हो रहा है और वह देश के लिये पर्याप्त नहीं है तो सरकार उस पर भारी निर्यात कर (Export Duty) लगा देती है, जिससे विदेशी बाजार में वस्तु की कीमत बढ़ जाती है और विदेशी उपभोक्ता उसे खरीदना बन्द कर देते हैं जिससे उस वस्तु का निर्यात कम हो जाता है। इसी प्रकार यदि सरकार अपने देश में किसी उद्योग का विकास करना चाहती है तो वह वस्तु के आयात को कम करने के लिये भारी आयात कर ;प्उचवतज क्नजलद्ध लगायेगी, जिससे उस विदेशी वस्तु की कीमत देशी बाजार में अधिक हो जायेगी और लोग अपने देश की बनी वस्तुओं का उपभोग करेंगे। इस प्रकार आयात-निर्यात पर रोक लगाने के लिये भी सरकार कर का सहारा लेती है।

राष्ट्रीय आय में वृद्धि - 

करों के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय आय में वृद्धि हो जाती है तथा कर लगाने से इसका अच्छा प्रभाव उत्पादन व आय प्राप्त करने पर भी देखा जा सकता है।

लर्नर के अनुसार कराधान का मुख्य उद्देश्य व्यक्तियों की क्रय शक्ति को कम करना है। इसलिए सरकार मुद्रा-स्फीतिक परिस्थितियों में कराधान का प्रयोग करती है। इस प्रकार एक देश में कर प्रशासन को दो उद्देश्यों को पूरा करना पड़ता है प्रथम राष्ट्र की कर-संभाव्यता का दोहन करके राष्ट्रीय तंत्र को चलाने के लिए आगम एकत्र करना और द्वितीय राजकोषीय प्रभावों के द्वारा समुदाय के सामाजिक आर्थिक ढांचें में ऐच्छिक परिवर्तन लाना और कीमतों, उपभोग, रोजगार तथा आय-सम्पत्ति के वितरण को ऐच्छिक स्तर पर बनाए रखना।

एक देश की कर व्यवस्था उस देश की सरकार के सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक उद्देश्यों को प्रतिबिम्बित करती है। सरकार के लिए पर्याप्त मात्रा में साधन एकत्र करने के अलावा कर नीति के उद्देश्य स्फीति पर नियन्त्रण, आय के पुन-र्वितरण को प्रभावित करना, आय व सम्पत्ति के वितरण की असमानताओं को कम करना, अनैच्छिक उपभोग अथवा उत्पादन पर नियंत्रण करना आदि हैं। कर नीति के इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सक्षम कर प्रशासन सरकार के हाथों में एक बहुत बड़ा अस्त्र है।

इसके अतिरिक्त, प्रभावी व सक्षम कर प्रशासन की सहायता से सरकार नीतियों के निर्माता उद्देश्यों को पूरी करने के लिए बड़े पैमाने पर क्रियाओं और उनके विभिन्न संयोगों को अपना सकते हैं।

भारत में कर प्रशासन की मशीनरी

केन्द्रीय करों के प्रशासन की जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय, भारत सरकार की है। कर प्रशासन की दो शीर्ष संस्थायें केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड और केन्द्रीय उत्पाद शुल्क बोर्ड है। केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड में एक अध्यक्ष और तीन कार्यात्मक सदस्य (Functional Members) होते हैं। यह सभी सामूहिक रूप से प्रत्यक्ष कराधान से संबंधित नीतियों के निर्माण के लिए उत्तरदायी होते हैं। केन्द्रीय प्रत्यक्ष करों में निजी वैयक्तिक कर, निगम कर, सम्पत्ति कर, उपहार कर और पूंजीगत लाभ करों को शामिल किया जाता है। यह बोर्ड सम्पदा शुल्क के प्रशासन की भी देख-रेख करता है। बोर्ड स्वायत्त संस्था नहीं होती इसलिए बोर्ड के कार्यों में सरकार का हस्तक्षेप व प्रभाव इसकी एक सामान्य विशेषता है।

प्रत्यक्ष करों में निजी आय कर और निगम कर, कर राजस्व के प्रमुख स्रोत हैं। निजी आय प्रशासन में आयकर अधिकारी का महत्वपूर्ण पद है। प्रत्येक आयकर अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में एक निश्चित इलाका अथवा आय अर्जित करने वाला वर्ग होता है। आय कर अधिकारी के कार्य की जांच और नियंत्रण का कार्य सहायक आयुक्त (Assistant Commissioner) करता है। प्रथम स्तर पर अपील की सुनवाई सहायक आयुक्त अपील (Appellate Assistant Commissioner) द्वारा की जाती है। आयकर अधिकार, सहायक आयुक्त (निरीक्षण) और सहायक कमीशनर, अपील सभी आय कर आयुक्त के अन्तर्गत कार्य करते हैं। 1969-70 में एक नये कैडर अतिरिक्त आयकर आयुक्त (Additional Commissioner of Income Tax) का सृजन किया गया। आयकर आयुक्त पद के समकक्ष जांच निदेशक (निरीक्षण), अखिल भारतीय अपील, सम्पदा शुल्क नियंत्रक, जांच निदेशक (आय कर अंकेक्षण), जांच निदेशक (अनुसंधान, सांख्यिकी और प्रकाशन) और CPM निदेशक के अलावा तीन अन्य निदेशक हैं जो प्रत्यक्ष कर प्रशासन के समूचे तंत्र का पर्यवेक्षण और नियंत्रण करते हैं।

1972 में जांच निदेशालय (निरीक्षण) में एक विशिष्ट कक्ष का सृजन किया गया। यह भारत के बड़े व्यवसायिक घरानों के कर-मूल्यांकन पर नजर रखता है। ‘विदेशी कर प्रभाग’ के नाम से एक अलग प्रभाग को कायम किया गया। बम्बई, कलकत्ता और मद्रास के सबसे वरिष्ठ आय कर आयुक्तों को उनके क्षेत्रों में जांच निदेशक के तौर पर काला धन निकालने के लिए नियुक्त किया जाता है। इन जांच निदेशकों को काफी अधिकार और शक्तियां प्राप्त होती हैं। संघ द्वारा लगाये गये प्रमुख अप्रत्यक्ष करों में सीमा और उत्पाद शुल्क हैं। अप्रत्यक्ष कर का केन्द्रीय बोर्ड अप्रत्यक्ष करों से सम्बन्धित नीतियों को संचालित करने में सरकार को सलाह देने वाली सबसे शीर्ष संस्था है। यह संस्था भारत सरकार की अप्रत्यक्ष करों के प्रशासन और निर्देशित करने में भी सहायक होती है। इसमें एक अध्यक्ष और तीन सदस्य होते हैं। विशिष्ट ड्यूटी पर कुछ अधिकारी और निदेशक इसके अन्तर्गत कार्य करते हैं। बोर्ड में एक प्रशासनिक और अपील खंड होता है। अप्रत्यक्ष कर प्रशासन का सीमा व उत्पादन शुल्क सम्बन्धी सारा दायित्व संग्राहकों (Collectors) पर होता है। इन अधिकारियों की एक खंड से दूसरे खंड में बदली होती रहती है।

कर प्रशासन की मुख्य विशेषतायें

भारत को ब्रिटिश साम्राज्य से कर प्रशासन विरासत में प्राप्त हुआ। इस कर प्रशासन को मिलीटरी-नुमा प्रशासन चलाने अथवा एक नीति को क्रियान्वित करने के लिए कायम किया गया ताकि ज्यादा से ज्यादा वसूली की जा सके। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् इसी प्रशासन का उपयोग प्रजातांत्रिक कल्याणकारी राजस्व जिसके कुछ विशिष्ट आर्थिक-सामाजिक उद्देश्य थे, की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया गया।

जनता के विश्वास का अभाव - 

हमें यह समझना चाहिए कि कोई भी प्रशासन शून्य (vacuum) में कार्य नहीं करता। प्रत्येक चरण पर इसका सम्बन्ध जनता के साथ होता है और चूंकि एक रूप में अथवा अन्य रूप में एक कर या करों का प्रभाव लगभग प्रत्येक व्यक्ति तक अवश्य पहुंचता है। इसलिए कर प्रशासन को समूचे देश के साथ सम्बन्ध बनाना पड़ता है। कर अधिकारियों का आम जनता के प्रति जो दृष्टिकोण होता है उसके कारण आम जनता का कर प्रशासन में विश्वास नहीं होता। करदाताओं के साथ समझदारी व नम्रता के साथ पेश आना चाहिए। प्रजातांत्रिक देशों में यह महसूस किया गया है कि करों का संग्रह अविवेकपूर्ण और असुविधाजनक होता है। हाल ही में कर अधिकारियों के दृष्टिकोण व जो कुछ बदलाव आया है उसमें अभी और परिवर्तन की जरूरत है। सामान्य अर्थव्यवस्था पर कर कानूनों और नीति का प्रभाव कर प्रशासन द्वारा की गयी व्याख्या (Interpretation) पर निर्भर करता है यदि कर प्रशासन इतना कमजोर अथवा भ्रष्ट है कि कर चोरी की दर काफी अधिक है तब नीतिगत निर्णयों का क्रियान्वयन व्यर्थ हो जाता है और इसके परिणामस्वरूप समाज का सामाजिक-आर्थिक ढांचा विकृत हो जाता है। एक अच्छी या श्रेष्ठ कर प्रणाली के लिए निम्न मूल दशाओं का होना आवश्यक है :
  1. कर कानून सरल और स्पष्ट भाषा में होना चाहिए जिससे प्रशासन सुचारू रूप से कार्य कर सके और करदाता भी आसानी से समझ सके।
  2. अतार्किक और अविवेकी करों से जहां तक संभव हो, बचा जाना चाहिए।
  3. निजी और निगम आय कर का आधार व्यापक होना चाहिए जिससे करों की दरों को बढ़ाये बिना पर्याप्त मात्रा में राजस्व प्राप्त हो सके। कर की दरें कम होने पर करों की चोरी की संभावना थी कम होगी।
  4. जिस वस्तु अथवा सेवा पर कर लगाया जा रहा है जहां तक संभव हो, उसके बारे में पूरी और सही सूचना प्राप्त की जानी चाहिए। कर प्रशासन के कर्मचारियों को इस कार्य के लिए पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित और प्रबंध की आधुनिक तकनीकों से सुसज्जित करना चाहिए। कर प्रशासन प्रवैगिक होना चाहिए जो समाज के आर्थिक और सामाजिक ढांचे के अनुसार परिवर्तित हो सके तथा जनता का विश्वास जीत सके।

कर कानूनों में कमी के फलस्वरूप करों की चोरी - 

जनता को यह विश्वास दिलाया जाना चाहिए कि कर उचित ही लगाए हैं और प्रत्येक व्यक्ति अपने भाग का भुगतान करता है। यदि आम जनता में यह भावना घर कर जाती है कि कर व्यवस्था कर चोरी और कमियों का पुलिंदा है तो इससे ईमानदार कर दाता नैतिक रूप से हतोत्साहित हो जाएगा। अब कर चोरी लगातार बड़े पैमाने पर हो तो यह कर दाता, अधिकारी, और राजनीतिज्ञों के गठबंधन के कारण ही संभव होती है। कर चोरी काली मुद्रा के सृजन का एक बहुत बड़ा कारण है।

जटिल कर व्यवस्था और कानून - 

भारत में साधारणतया कर कानून जटिल और उलझनपूर्ण हैं। यह कानून संशोधनों और पुन: संशोधनों की उपज है। औपचारिक ढांचे में यह काफी परिनिष्ठित और सुरक्षित दिखायी पड़ते हैं लेकिन वास्तविकता में यह कमियों और अस्पष्टताओं से भरे पड़े हैं जिसमें मनमर्जीपन, अक्षमता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।

कर संग्रहण में बहु-सत्ता - 

केन्द्र और राज्यों द्वारा लगाए गए विभिन्न करों का संग्रहण अलग-अलग सत्ताधारियों द्वारा किया जाता है। राज्य में भूमि राजस्व, शहरी भूमि पर कर उसे प्रत्यक्ष कर और बिक्री कर व राज्य उत्पाद शुल्क जैसे अप्रत्यक्ष कर होते हैं। इन करों का प्रशासन राज्य के विभिन्न कर सत्ताधारियों के हाथों में होता है। संघ सरकार भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों का संग्रहण विभिन्न प्रशासनिक व्यवस्थाओं के माध्यम से करती है। सही कर-आधार की जांच के लिए न तो इनमें आपस में कोई राय होती है और न ही तिरछी जांच (Cross-Checking) की जाती है। एक उत्पाद पर प्रारम्भ में उत्पादन शुल्क की, की गई चोरी आयकर, बिक्री कर आदि चोरी के लिए प्रेरित करती है। अत: कर प्रशासन की विभिन्न व्यवस्थाओं में समन्वय होना बहुत आवश्यक है ताकि करों की चोरी को रोका जा सके।

कर प्रशासन के द्वारा कराधान में न्याय संभव नहीं - 

भारतीय कराधान जांच आयोग ने इस पक्ष पर जोर देते हुए यह पाया है कि, “राज्य-नागरिकों के सम्बन्धों में करों के अलावा शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां यह इतना आवश्यक है कि न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए बल्कि न्याय होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।” इसलिए कर कानून स्पष्ट होने चाहिए तथा कर संग्रहण शीघ्रतापूर्वक किया जाना चाहिए। कर संग्रहण के कार्य में जो कर्मचारी कार्यरत हैं। उन्हें पूरी क्षमता के साथ धैर्य व चतुराई से अपने कार्य को अंजाम देना चाहिए। भारतीय कर प्रशासन कर संग्रहण के कार्य को बहुत अच्छी प्रकार से पूरा करती है लेकिन यह उस स्तर से यह कार्य नहीं कर पायी जिसकी एक विकासशील समाजवादी अर्थव्यवस्था में आशा की जाती है।

आदाताओं की संख्या में वृद्धि

भारत में कर आदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है जिसके कारण कर प्रशासनिक मशीनरी पर कार्य का बोझ और तनाव बढ़ गया है। कानूनों और प्रक्रियाओं की जटिलता तथा कार्य भार में बढ़ोत्तरी के कारण बकाया राशि में भारी वृद्धि हुई है। 31 दिसम्बर, 1971 तक बकाया राशि की मात्रा बढ़कर 1009 करोड़ रुपए हो गयी। बकाया राशि का संचय भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है।

संघीय उत्पाद शुल्क का प्रशासन -

 संघीय उत्पादन शुल्क का प्रशासन सीधा और प्रभावशाली है। यह व्यवस्था भी काफी व्यापक है। विनिर्माताओं को लाइसेंस जारी किया जाता है और उत्पाद शुल्क अधिकारी फैक्ट्री परिसर में ही कार्य करते हैं। इनको प्रवेश, तलाशी, पकड़ने व रोकने (Detention) संबंधी काफी अधिकार होते हैं। विनिर्माताओं पर अधिकारियों का पूर्ण नियंत्रण रहता है। कर का संग्रहण निकासी (Clearance) पर किया जाता है।

बिक्री कर प्रशासन -

भारत में बिक्री कर कानूनों में तीन प्रमुख कमियां हैं-प्रथम, कर कानून अस्प्ष्ट और काफी जटिल हैं जिसमें करों की चोरी आसानी से हो जाती है। द्वितीय, जांच (Assessment) के कार्य में काफी देरी हो जाती है जिससे ईमानदार कर दाता के विश्वास को ठेस पहुंचती है। तीसरे, जांच व निरीक्षण के कार्य में अधिकारियों द्वारा लापरवाही बरती जाती है। कर प्रशासन लोक आर्थिक प्रशासन का एक महत्वपूर्ण खंड है जिसके द्वारा राजकोषीय उपायों के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक उद्देश्यों और ठोस वित्तीय शस्त्र की प्राप्ति की जाती है। इस खंड की दक्षता सरकारी प्रशासन की एक पूर्व दशा है। राष्ट्रीय आर्थिक-सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों की सफलता काफी कुछ कर प्रशासन की कुशलता पर निर्भर करते हैं।
अत: समाजवादी विकासशील अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भारतीय कर प्रशासन पर ध्यान देने की आवश्यकता काफी अधिक है। करों को विभिन्न व्यक्तियों पर पड़ने वाले प्रभावों के आधार पर दो भागों में बांटा जाता है - (i) प्रत्यक्ष रक एवं (ii) अप्रत्यक्ष कर। इन दोनों प्रकार के करों में अनतर समझने से पूर्व हमें इनके अर्थ को भली प्रकार समझ लेना चाहिए।

प्रत्यक्ष कर

प्रत्यक्ष कर वह है जो कि उन्हीं व्यक्तियों द्वारा भुगतान किए जाते हैं जिन पर कि ये लगाये जाते हैं। अर्थात् उनका भार किसी दूसरे व्यक्ति पर नहीं डाला जा सकता। प्रत्यक्ष करों का भार उसी व्यक्ति को अन्तिम रूप से वहन करना पड़ता है जिन पर इसे लगाया जाता है। ये कर प्राय: किसी व्यक्ति की आय और धन पर लगाया जाता है। भारत में आय-कर व धन-कर इसके अच्छे उदाहरण हैं। प्रो. मेहता के अनुसार-”प्रत्यक्ष कर वह कर है जो उसी व्यक्ति द्वारा पूर्ण रूप से दिया जाता है जिस पर कि वह लगाया जाता है।”

अप्रत्यक्ष कर

प्रत्यक्ष कर के विपरीत अप्रत्यक्ष कर वे कर हैं जो कि जिन व्यक्तियों पर लगाया जाता है वे यद्यपि सरकार को इसका भुगतान करने के लिए उत्तरदायी हैं लेकिन वे इस कर को किसी दूसरे व्यक्ति से वसूल कर सकते हैं अत: कर का भार दूसरे व्यक्ति को विवर्तित किया जा सकता है। इस प्रकार वे कर लगाये किसी व्यक्ति पर जाते हैं जबकि इसका अन्तिम भार अन्य व्यक्तियों पर पड़ता है। इस प्रकार के कर प्राय: वस्तुओं पर उनके उत्पादन अथवा बिक्री के समय लगाये जाते हैं। भारत में उत्पादन कर, बिक्र कर, मनोरंजन कर आदि अप्रत्यक्ष कर के उदाहरण हैं। करदाता इन करों को वस्तुओं के मूल्य में जोड़कर उपभोक्ता से वसूल कर लेते हैं।

प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों में अन्तर

प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों में अन्तर का मुख्य आधार कर का दायित्व (Impact) एवं कर का भार (Incidence) है। प्रत्यक्ष कर में कर का दायित्व एवं भार एक ही व्यक्ति पर होता है अर्थात् ये जिस व्यक्ति पर लगाये जाते हैं उसी व्यक्ति द्वारा वास्तव में भुगतान भी किए जाते हैं। इनका विर्वतन संभव नहीं है। जबकि दूसरी ओर अप्रत्यक्ष करों में कर का दायित्व एवं कर का भार अलग-अलग व्यक्तियों पर होता है। जिस व्यक्ति पर कर का दायित्व डाला जाता है वास्तव में वह व्यक्ति उस कर को वस्तुओं के मूल्यों में जोड़कर वस्तु के क्रेता से वसूल कर लेता है और इस प्रकार उसका भार विवर्त कर दिया जाता है और वह अन्तिम रूप से उसके द्वारा वहन नहीं किया जाता जिस पर यह डाला गया था। इसके अतिरिक्त प्रत्यक्ष कर व्यक्तियों पर लगाये जाते हैं जबकि अप्रत्यक्ष कर जैसे बिक्री कर उत्पादन कर आदि वस्तुओं पर लगाये जाते हैं।

प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों के सापेक्षिक गुण-दोष

प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों का अर्थ समझ लेने के पश्चात् अब हम उनके सापेक्षिक गुण-दोषों पर विचार करेंगे।

प्रत्यक्ष करो के गुण

  1. न्यायशील - ये कर समानता एवं न्यायशीलता के आधार पर लगाये जाते हैं क्योंकि ये कर प्रत्येक वर्ग की भुगतान-क्षमता (Ability to Pay) के आधार पर लगाये जाते हैं। अत: इनका भार धनी वर्ग पर अधिक ओर निर्धन वर्ग पर कम होता है। एक निश्चित सीमा तक आय वाले व्यक्ति इन करों से मुक्त रखे जाते हैं।
  2. मितव्ययी - ये कर मितव्ययी होते हैं क्योंकि इनको वसूल करने में अधिक व्यय नहीं करना पड़ता है। ये कर या तो स्रोत पर ही काट लिए जाते हैं या उस व्यक्ति द्वारा सीधे खजाने में जमा कर दिए जाते हैं जिन पर ये लगाये गये हैं।
  3. निश्चितता - इन करों में निश्चितता का गुण पाया जाता है। करदाता यह जानते हैं कि कर कितना, कब व किस दर पर भुगतान किया जाता है।
  4. लोचदार - प्रत्यक्ष कर लोचपूर्ण होते हैं। कर की दरों में थोड़ा सा परिवर्तन कर देने से आय में आसानी से वृद्धि की जा सकती है। आर्थिक संकट के समय सरकार इन करों की दरों में वृद्धि करती है।
  5. सामाजिक चेतना - प्रत्यक्ष कर सामाजिक चेतना को जागृत करते हैं। व्यक्ति जो कर देता है वह इस बात में भी दिलचस्पी लेता है कि सरकार कर द्वारा प्राप्त आय का प्रयोग किस प्रकार करती है। सरकार द्वारा उसका गलत प्रयोग करने पर वह उसके विरुद्ध आवाज उठाता है।

प्रत्यक्ष कर के दोष

  1. असुिवधाजनक - पत््रयक्ष कर करदाता के लिए असुविधाजनक एव कष्टदायक होते हैं। कोई भी व्यक्ति खुशी से कर का भुगतान नहीं करता है। ये कर कष्टदायक होते हैं क्योंकि करदाता को अनेक खाते व हिसाब-किताब रखने पड़ते हैं व अनेक औपचारिकतायें पूरी करनी होती हैं। इसके अतिरिक्त ये कर एक साथ ही भारी मात्रा में भुगतान करने पड़ते हैं जबकि करदाता को आय धीरे-धीरे प्राप्त होती है।
  2. कर चोरी - प्रत्यक्ष करों में चोरी की संभावना होती है। जिन व्यक्तियों की आय निश्चित नहीं होती वे अपने हिसाब-किताब गलत बनाकर कर से बच जाते हैं। भारत में काले धन की समस्या का मूल कारण यही है।
  3. मनचाही कर-दर - प्रत्यक्ष करों की दर का निर्धारण सरकार की इच्छा पर निर्भर करता है। इसके लिए कोई निश्चित सिद्धान्त नहीं है।
  4. सीमित क्षेत्र - इन करों का क्षेत्र बहुत सीमित है। एक बहुत बड़ी संख्या में लोग इन करों के क्षेत्र में नहीं आते। इस कर का प्रभाव बहुत कम लोगों पर ही पड़ता है।
  5. लोकप्रिय नहीं - इन करों का दायित्व एवं भार एक ही व्यक्ति पर होने के कारण इनका भार करदाता द्वारा अधिक महसूस किया जाता है। अत: वह कर को न देने का प्रयास करता है।
  6. प्रशासनिक व्यय अधिक - प्रत्यक्ष करों के लिए एक अलग से संगठन बनाना पड़ता है जोकि प्रत्येक करदाता को मिल सके व उनसे कर वसूल कर सके। इस प्रकार कर वसूली की लागत बहुत अधिक आती है तथा सरकार को इस स्रोत से शुद्ध आय (Net Revenue) कम होती है।
  7. उत्पादन पर बुरा प्रभाव - प्रत्यक्ष करों का लोगों पर काम करने की इच्छा व बचत करने की इच्छा पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता। लोग यह सोचते हैं कि वे जितना ज्यादा कमायेंगे उतना अधिक दर से उन्हें कर देना होगा। इसके अतिरिक्त कर बचाने के उद्देश्य से वह अपनी आय को कम दिखाता है लेकिन इस बची हुई आय का प्रयोग वह उत्पादन के लिए नहीं कर सकता। अत: उत्पादन व पूंजी निर्माण पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

अप्रत्यक्ष करों के गुण

  1. सुविधाजनक - ये कर करदाता और सरकार दोनों के लिए ही सुविधाजनक हैं। करदाता इसका भुगतान वस्तु खरीदते समय उनके मूल्य के एक भाग के रूप में अदा कर देते हैं अत: उन्हें इनका भार महसूस नहीं होता है। इसके अतिरिक्त करदाता इन करों का भुगतान एक-साथ नहीं करता बल्कि जब भी वह वस्तुएं खरीदेगा केवल तभी उसका भुगतान किया जाएगा। सरकार के लिए भी इनकी वसूली सुविधाजनक है क्योंकि वह इनकी वसूली वस्तु के उत्पादकों एवं विक्रेताओं से आसानी से कर लेते हैं।
  2. प्रत्येक व्यक्ति का योगदान - ये कर क्योंकि वस्तुओं पर लगाये जाते हैं और प्रत्येक व्यक्ति कुछ न कुछ क्रय करता ही है इसलिए वस्तुओं के क्रय करते समय वह कुछ न कुछ कर का भी भुगतान करता है। इस प्रकार प्रत्येक नागरिक का राजस्व में कुछ-न-कुछ योगदान रहता है।
  3. कर बचाना संभव नहीं - अप्रत्यक्ष करों में कर बचना संभव नहीं है क्योंकि कर वस्तु के मूल्य का ही एक भाग होता है। अत: यदि कोई व्यक्ति वस्तु खरीदता है तो उसे कर देना ही पड़ता है।
  4. लोचदार - कुछ वस्तुएं इस प्रकार की होती हैं जिनकी मांग पर उनके मूल्य का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। सरकार ऐसी वस्तुओं की कर की दरों में थोड़ा सा संशोधन करने पर भी अधिक राजस्व प्राप्त कर लेती है।
  5. सामाजिक कल्याण - अप्रत्यक्ष कर सामाजिक कल्याण में वृद्धि करते हैं। सरकार उन वस्तुओं पर अधिक कर लगाती है जो कि हानिकारक हैं और इस प्रकार उन वस्तुओं के मूल्य बढ़ाकर उनके उपभोग को नियंत्रित करती है। इसलिए सरकार शराब, अफीम, सिगरेट आदि पर भारी कर लगाती है। इसी प्रकार सरकार कुछ वस्तुओं के उपभोग में वृद्धि करने के लिए करों को कम कर सकती है अथवा उनकों करों से मुक्त कर सकती है।
  6. विस्तृत आधार - अप्रत्यक्ष कर किसी एक वस्तु पर नहीं लगाया जाता है। एक बड़ी संख्या में वस्तुओं पर कर लगाकर सरकार बड़ी मात्रा में राजस्व प्राप्त करती है। अनेक वस्तुओं पर कर लगने से किसी एक मद के क्रेता पर ही अधिक कर-भार नहीं पड़ता है।
  7. न्यायशीलता - अप्रत्यक्ष कर समानता एवं न्यायशीलता के आधार पर लगाये जाते हैं। ऐसी वस्तुओं पर जिनका प्रयोग केवल धनी वर्ग करता है, कर की दर अधिक होती है। इसके विपरीत कुछ आवश्यक वस्तुओं पर तथा उन वस्तुओं पर जिनका प्रयोग निम्न आय वर्ग करता है कर की दर बहुत कम होती है अथवा उन पर कोई कर नहीं लगाया जाता है। इस प्रकार ये न्यायशीलता व समानता के सिद्धान्त पर आधारित हैं।

अप्रत्यक्ष करों के दोष

  1. न्यायपूर्ण नहीं - अप्रत्यक्ष कर इस कारण न्यायपूर्ण नहीं कहे जा सकते क्योंकि वे उपभोक्ता वस्तुओं पर पर लगाये जाते हैं और सभी व्यक्तियों से जो भी उनको खरीदता है समान कर वसूल किया जाता है। इस प्रकार कर का भार धनी वर्ग की अपेक्षा गरीबों पर अधिक पड़ता है।
  2. आर्थिक विषमता में सहायक - अप्रत्यक्ष करों से आर्थिक विषमता बढ़ती है। ये कर प्राय: आवश्यक वस्तुओं (लोचहीन मांग वाली) पर अधिक लगाये जाते हैं। एक निर्धन व्यक्ति अपनी आय का एक बड़ा भाग इन वस्तुओं पर खर्च करता है अत: उस पर इनका भार अधिक होता है। इस प्रकार समाज में आर्थिक विषमता बढ़ती है।
  3. अमितव्ययी - इस कर की वसूली पर आय का बड़ा भाग व्यय हो जाता है क्योंकि राज्य को इन करों की वसूली के लिए विभिन्न संगठन बनाने पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त इन करों की चोरी व्यापारियों एवं उपभोक्ताओं की सांठगांठ से बहुत अधिक होती है जिसका रोकने के लिए अनेक अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है। इस प्रकार ये कर अमितव्ययी हैं।
  4. अनिश्चितता - इन करों को लगाते अथवा वृद्धि के समय सरकार इनसे प्राप्त राजस्व का ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगा सकती। इसका प्रमुख कारण यह है कि कर से वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि हो जाती है जिसके कारण इसकी मांग कम हो जाती है। कर वृद्धि का वस्तु की मांग पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। अत: कर द्वारा प्राप्त राजस्व के बारे में अनिश्चितता बनी रहती है।
  5. सामाजिक चेतना का अभाव - अप्रत्यक्ष कर सामाजिक चेतना उत्पन्न नहीं करते। इसका प्रमुख कारण यह है कि कर वस्तु को क्रय करते समय ही उसके मूल्य के साथ अदा कर दिया जाता है जिसका उसे अधिक भार महसूस नहीं होता। अत: वह इस बात के लिए जागरूक नहीं रहता कि उस कर का प्रयोग सरकार द्वारा ठीक किया जा रहा है या नहीं।
  6. बेईमानी को बढ़ा़वा - अप्रत्यक्ष कर बेईमानी को बढ़ावा देते हैं क्योंकि - (i) दुकानदार वस्तुओं का मूल्य कर की राशि से अधिक बढ़ा देता है, (ii) पुराने कर मुक्त स्टॉक को भी वह टैक्स सहित बेचता है, (iii) दुकानदार साधारणतया विक्रय के लिए कोई कैशमीमों नहीं देता और न ही ग्राहक मांगता है, (iv) गलत हिसाब-किताब बनाकर प्रस्तुत किए जाते हैं।

दोनो ही कर आवश्यक

प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों के गुण-दोषों का विश्लेषण करने पर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि दोनों में से कोई भी कर दोषमुक्त नहीं है। ये दोनों प्रकार के कर एक दूसरे के पूरक हैं। सरकार को एक विकासात्मक वित्त व्यवस्था के एक स्रोत के रूप में दोनों प्रकार के करों का उचित समावेश करना चाहिए जिससे एक ओर सरकार को अधिक कर मिल सके तथा दूसरी ओर समानता व न्यायशीलता के सिद्धान्त को बनाये रखते हुए उसका भार गरीब वर्ग पर कम-से- कम हो।

भारत में भी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के कर लगाये जाते हैं। आयकर, धनकर, निगम कर आदि प्रत्यक्ष कर के उदाहरण हैं जबकि विक्रय-कर, उत्पाद-शुल्क, सीमा-शुल्क आदि अप्रत्यक्ष कर के उदाहरण हैं। सरकार इन दोनों प्रकार के करों के माध्यम से कर की वसूली करती है। लेकिन दोनों में उचित सामंजस्य का अभाव है। प्रत्यक्ष कर व अप्रत्यक्ष करों का कुल राजस्व में योगदान 1991.92 में क्रमश: 17 व 83 प्रतिशत था जो कि 2000.2001 में क्रमश: 36 व 64 प्रतिशत है। इस प्रकार भारत में अप्रत्यक्ष करों के योगदान में अत्यधिक वृद्धि हुई है जोकि न्यायसंगत नहीं कही जा सकती। अप्रत्यक्ष करों का प्रभाव गरीब वर्ग पर अधिक पड़ता है जबकि प्रत्यक्ष करों का उत्पादन क्षमता व बचत पर कुप्रभाव पड़ता है। भारत में अप्रत्यक्ष करों का योगदान अधिक होने के कारण यह गरीब वर्ग के हित में नहीं है। इससे आर्थिक विषमता बढ़ती है।

कर प्रणाली की आलोचना

भारतीय संविधान एक अर्द्ध गण राज्य (Quasi federal) है जहां पर त्रि-स्तरीय सरकारें (Three-tier Government) कार्य करती हैं। यह सरकारें केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय सरकारें हैं। भारतीय संविधान स्थानीय सरकारों को कराधान के कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं देता। यह सरकारें सीधे तौर पर राज्य सरकारों के प्रभुत्व में होती हैं। कराधान के क्षेत्र में केन्द्र व राज्य सरकारों के बीच विवाद उत्पन्न न हो, इसलिए विभिन्न स्तर की सरकारों को कराधान के स्वतंत्र व अलग अधिकार प्रदान किए गए हैं। उदाहरण के लिए कराधान के क्षेत्र में तीन प्रमुख करों उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क व कम्पनी आय कर को केन्द्र सरकार को सौंपा गया तथा वस्तुओं की बिक्री और गतिशीलता पर कर लगाने का अधिकार राज्य सरकारों को सौंप दिया गया। प्रत्यक्ष करों के क्षेत्र में, गैर-कृषि आय और परिसम्पत्तियों के पूंजीगत मूल्य, कम्पनी कर, मृत्यु कर आदि कर केन्द्र को सौंपे गए। दूसरी तरफ कृषि आय, भूमि, भवन तथा कृषि सम्पत्ति के सम्बन्ध में उत्तराधिकार कर लगाने का अधिकार राज्य सरकार को सौंपा गया है।

केन्द्र सरकार मुख्य रूप से तीन कर-आयकर, सीमा शुल्क व संघीय उत्पाद शुल्क लगाती है। योजना के प्रारंभिक वर्षों में सीमा शुल्क केन्द्र सरकार के कर राजस्व का प्रमुख स्रोत था। परन्तु बाद के वर्षों में इसका महत्व कम हो गया। इसका मुख्य कारण उत्पाद शुल्क के सीमा क्षेत्र का विस्तार था। आजकल केन्द्र सरकार को सबसे अधिक कर राजस्व उत्पाद शुल्क से ही प्राप्त होता है। राज्य सरकारों को कर राजस्व स्टाम्प शुल्क, भूमि का रजिस्टे्रशन शुल्क, बिक्री कर, अल्कोहल व नशीले पदार्थों पर उत्पाद शुल्क आदि से प्राप्त होता है। अन्य करों के अलावा राज्य सरकार की बिक्री कर पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है। राज्य सरकारों को कर राजस्व का 40 प्रतिशत भाग बिक्री कर से ही प्राप्त होता है।

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