लेखा परीक्षण क्या है?

अनुक्रम
शब्द “लेखा-परीक्षण” लैटिन भाषा के शब्द Audire से नि:सृत हुआ है। पहले लेखा मंडलियां लेखा परीक्षक के सम्मुख प्रस्तुत होकर लेखे का वृत्तांत सुनाती थीं। सभ्यता के प्रारंभिक चरणों में लेखा विधियां इतनी अशिष्ट होती थी और रिकार्ड करने वाले सौदों की संख्या इतनी थोड़ी होती थी कि हर व्यक्ति अपने सौदों की जांच स्वयं ही कर सकता था, परन्तु साम्राज्यों की स्थापना के साथ लेखा सौदों का हिसाब रखने तथा उनके लेखा परीक्षण की प्रणाली का भी उत्कर्ष हुआ। जिस व्यक्ति को हिसाब-किताब करने का दायित्व दिया गया वह “लेखा-परीक्षक” के नाम से जाना जाने लगा।

लेखा परीक्षण लेखा रिकार्ड की ऐसी जांच पड़ताल है जो यह सुनिश्चित करने के लिये की जाती है कि यह रिकार्ड पूर्णतया एवं सत्य रूप से उन सभी सौदों को प्रतिबिंबित करता है जिनसे यह सम्बन्धित है। इसका उद्देश्य यह देखना है कि किये गए व्यय के लिए उचित अधिकारियों की स्वीकृति ले ली गयी है या नहीं तथा धन उन्हीं कामों पर खर्च किया गया या नहीं जिसके लिये स्वीकृति प्रदान की गयी थी। धन के दुरुपयोग तथा जालसाजी के परिपेक्ष्य के रूप में यह व्यय आधार-पत्रों द्वारा प्रमाणित होना चाहिये।

लेखा परीक्षण वित्तीय नियंत्रण का एक उपकरण है। व्यापारिक सौदों से अपने संबंधों में, यह स्वामी की ओर से अपव्यय, असावधानी अथवा धन एवं दूसरी परिसंपत्ति की वसूली तथा उसके उपयोग में कर्मचारियों द्वारा की जाने वाली जालसाजी के विरुद्ध एक रक्षोपाय का काम करती है। स्वामी की ओर से यह सुनिश्चित करता है कि सुचारु तथा सही रूप से रखे गये हिसाब-किताब केवल तथ्यों को दर्शाते हैं तथा किया गया व्यय उचित नियमितता एवं औचित्य के अनुकूल है। सरकार के वित्तीय सौदों को भी इसी प्रकार देखा जाता है। इस उद्देश्य के लिये प्रयोग किया गया माध्यम स्वतंत्र होना चाहिए तथा सरकार के उन कर्मचारियों पर आश्रित नहीं होना चाहिए जिनका काम सार्वजनिक धन एवं दूसरी परिसंपत्ति की वसूली तथा उपयोग करना है। भारत में यह कार्य भारतीय लेखा परीक्षण एवं लेखा विभाग को सौंपा गया है। जहां तक इसके लेखा परीक्षण के दायित्वों का संबंध है, भारतीय लेखा परीक्षण एवं लेखा विभाग (Indian Audit and Accounts Department) की स्थिति सरकारी सौदों में बड़ी हद तक लेखा परीक्षक जैसी है। इस संदर्भ में संसद, विधान मंडलों को “सरकारी संस्था” के अंशधारी के रूप में देखा जा सकता है जिसमें “कार्यपालिका सरकार” (Executive Government) को इस संस्था का निदेशक माना जा सकता है, फिर भी इस “संस्था” का उद्देश्यय लाभ कमाना नहीं है।

लेखा परीक्षण लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक है। ये स्तंभ हैं (i) संसद (ii) न्यायतंत्र (iii) समाचार पत्र, तथा (iv) लेखा परीक्षण। प्रथम स्थान पर संसद लोकतंत्र का सबसे अधिक महत्वपूर्ण अंग है। यह व्यस्क मताधिकार के आधार पर चुने गये जनता के प्रतिनिधियों द्वारा निर्मित है। संसद में बहुमत प्राप्त दल के प्रतिनिधि सरकार का गठन करते हैं। सरकार चलाने के लिये आवश्यक सारे कानून संसद द्वारा ही पारित किये जाते हैं। संसद उन करों को स्वीकृति प्रदान करती है जिनसे सरकार प्रशासनिक मशीनरी चलाने के लिये साधन जुटाती है। दूसरे स्थान पर न्यायतंत्र एवं समाचार-पत्र यह दो स्तंभ आते हैं जो न्याय प्रशासन तथा एक स्वस्थ लोकतंत्र को संचालन के लिए आवश्यक हैं। अंत में आता है लेखा परीक्षण जो संसद को “कार्यपालिका” के ऊपर वरिष्ठता को सुनिश्चित करने तथा नियंत्रण में केवल प्रदय पारित करना तथा कर निश्चित करना ही शामिल नहीं होता है अपितु यह सुनिश्चित करना भी शामिल होता है कि अनुदान की राशि उन्हीं उद्देश्यों के लिये खर्च की गई है या नहीं जिनके लिये उसे पारित किया गया था।

लेखा परीक्षण प्रशासन को मूल्यवान प्रदान करता है। सभी देशों में लेखा परीक्षण को केवल एक आवश्यक बुराई के रूप में नहीं देखा जाता है बल्कि एक ऐसे अच्छे साथी के रूप में देखा जाता है जो कार्यविधि विषयक एवं तकनीकी अनियमितताओं तथा व्यक्तियों के दोषों को सामने लाता है चाहे वे मूल्यांकन से जुड़ी त्रुटियां हों या असावधानियां अथवा कपट के इरादे से किये गये कार्य हों। सरकारी मशीनरी को अधिक स्वस्थ बनाने की आवश्यकता होने के कारण लेखा परीक्षण तथा प्रशासन की पूरक भूमिकाओं को वास्तविक रूप में स्वीकार कर लिया गया है। अंतिम विश्लेषण के रूप में यह कहा जा सकता है कि लेखा परीक्षण और प्रशासन सरकारी भारत में लेखा प्रणाली एवं लेखा परीक्षा प्रणाली मशीनरी के संघटक हैं। अधिकतम परिणाम तभी प्राप्त किये जा सकते हैं जब इन दोनों संघटकों के कार्यों में समन्वय हो।

भारत में लेखा परीक्षण

भारत तथा अन्य देशों में लेखा परीक्षण का उत्कर्ष एक कृत्रिम प्रक्रिया है। यह सरकारी गतिविधियों से संबंधित रही है। इसका संबंध आन्तरिक नियंत्रण तथा सरकारी विभागों की प्रबंध व्यवस्था से भी रहा है।

युद्ध से पूर्व सरकार के मुख्य काम होते थे राजस्व इकट्ठा करना, कानून और व्यवस्था बनाये रखना, देश की रक्षा करना तथा कुछ प्रकार के निर्माण कार्य को करना। बहुत कम सरकारें वाणिज्य गतिविधियों में भाग लेती थीं। ऐसी परिस्थिति में लेखा परीक्षण का काम मुख्यत: नियमित लेखा परीक्षण तथा अनुपालन लेखा परीक्षण (Compounce Audit) तक ही सीमित होता था। युद्ध से पूर्व लेखा परीक्षण के मुख्य अंश होते थे (क) बजट में किये गये प्रावधानों का लेखा परीक्षण (ख) दी गई स्वीकृतियों का लेखा परीक्षण (ग) धन के हिसाब-किताब एवं विनियोजन का लेखा परीक्षण (घ) व्यय का लेखा परीक्षण तथा (ड़) औचित्य लेखा परीक्षण। बजट में किये गये प्रावधानों तथा दी गयी स्वीकृतियों के लेखा परीक्षण को अनुपालन लेखा परीक्षण एवं नियमित लेखा परीक्षण के नाम से जाना जाता था। परंपरागत रूपरेखा के अन्दर लेखा परीक्षण का सर्वश्रेष्ठ रूप माना जाता था औचित्य लेखा परीक्षण। ऐसे सौदों पर भी जो हर प्रकार से ठीक था तथा व्यवस्था एवं नियमों के अनुरूप था, लेकिन आपत्ति केवल इस आधार पर की जा सकती थी कि यह सौदा व्यापक धारणाओं तथा नैतिक नियमों का उल्लंघन करता था।

युद्ध के बाद जन कल्याण वाले राष्ट्रों को कई ऐसी सामाजिक एवं आर्थिक, व्यापारिक एवं औद्योगिक परियोजनाएं चलानी पड़ी जिनसे विकास की गति बढ़ सके और जिनसे जनता के जीवन स्तर में सुधार लाया जा सके। लेखा परीक्षण का महत्व भी इसके अनुकूल बदल गया जिससे लेखा परीक्षक संसद को इस बारे में रिपोर्ट दे सकता था कि ये परियोजनाएं सही गतिविधियों के उद्देश्य से पूरे हुए हैं या नहीं। परिणामस्वरूप नये क्षेत्रों में लेखा परीक्षण का विस्तार किया गया और इसकी नई विधियां विकसित की गई। गतिविधियों में विस्तार के साथ ही सरकारी विभागों तथा अभिकरणों को आन्तरिक नियंत्रण के लिये अपनी-अपनी प्रणालियां विकसित करनी पड़ीं। इस प्रकार परंपरागत लेखा परीक्षण से लेकर गतिविधियों की अर्थव्यवस्था, दक्षता एवं प्रभावशीलता के लेखा परीक्षण तक का परिवर्तन संभव हुआ। लेखा परीक्षण नाम के अंतस्थ चरण द्वारा “धन का मूल्य” अर्थव्यवस्था तथा दक्षता के इन पहियों को अपनी परिधि में ले आया।

सांविधानिक लेखा परीक्षण का उद्देश्य तीन परतों (Three-Fold) वाला है। सबसे पहले यह लेखा कार्य का परीक्षण है जो इस बात की जांच करता है कि गणना से सम्बद्ध कोई गलती है या नहीं। उसे यह भी देखना है कि सारे भुगतान रसीदी परचियों द्वारा प्रमाणित है या नहीं। सार में यह निजी लेखा परीक्षकों के सीमित परीक्षण से भिन्न नहीं है। इसके उद्देश्य हैं (i) जालसाजी की खोज, (ii) तकनीकी गलतियों की खोज, तथा (iii) सिद्धांत की गलतियों की खोज। आमतौर पर यह एक निरंतर लेखा परीक्षण है किंतु सौदों के एक छोटे से प्रतिशत तक ही। दूसरी बात यह है कि यह व्यय के वर्गीकरण की जांच करने का विनियोजन लेखा परीक्षण हैं यह लेखा परीक्षण इसलिए किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि व्यय लेखा पद्धति की उचित इकाइयों में डाला गया है या नहीं तथा यह व्यय उस धनराशि से अधिक तो नहीं है जिसका प्रावधान किया गया हैं तीसरी बात यह है कि यह एक प्रकार का प्रशासनिक लेखा परीक्षण अथवा स्वीकृतियों का लेखा परीक्षण है जो यह जांच करने के लिये है कि व्यय निर्धारित व्यवस्था एवं नियमों के अनुसार किया गया है या नहीं तथा इस व्यय के लिये उचित अधिकारियों की स्वीकृति प्राप्त कर ली गयी है या नहीं।

सांविधानिक लेखा परीक्षण संसद को इस बात का विश्वास दिला सकता है कि उस धन-राशि का जिसका प्रावधान किया गया था व्यय व्यवस्था एवं नियमों के अनुसार निर्धारित सीमाओं के भीतर किया गया है। हिसाब-किताब की तथ्यता को प्रमाणित कर सकता है तथा धनराशि के दुरुपयोग, जालसाजी तथा गबन की जांच कर सकता है।

आन्तरिक लेखा परीक्षण

दूसरी ओर आन्तरिक लेखा परीक्षण किसी भी संस्था की आन्तरिक बात है। वहां लेखा परीक्षण का कार्य किसी ऐसे विभाग अथवा एजेंसी द्वारा किया जाता है जिसकी स्थापना उस संस्था के प्रबंधक करते हैं। यह संस्था का अविभाज्य अंग होता है तथा संस्था के मुख्य कार्यसंचालक के नीचे काम करता है। यह कार्यसंचालकों के पास निर्विघ्न एवं कुशल कार्य करने हेतु तथा संस्था के कार्य का अवलोकन करने तथा इसके कार्यकौशल में सुधार लाने के लिये एक आन्तरिक सेवा के रूप में होता है। आन्तरिक लेखा परीक्षण के समान उद्देश्य, अन्य बातों के साथ-साथ, इस प्रकार होते हैं -
  1. आन्तरिक नियंत्रण प्रणाली की उपयुक्तता, अनुकूलता एवं स्वस्थता की जांच कर उसे ठीक करना,
  2. जालसाजी को रोकना तथा उसे खोज निकालना,
  3. हिसाब-किताब तथा रिपोर्ट बनाने की प्रणाली की पर्याप्तता एवं विश्वसनीयता की जांच करना, तथा
  4. प्रबंधकों द्वारा निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति के लिये चलाई गई योजनाओं, गतिविधियों का निष्पादन एवं दक्षता लेखा परीक्षण करना।
किसी भी संस्था में आन्तरिक लेखा परीक्षण को वह स्वतंत्रता उपलब्ध नहीं होती जो भारतीय लेखा पद्धति एवं लेखा परीक्षण विभाग द्वारा किये जाने वाले बाहरी लेखा परीक्षण को होती है। फिर भी आन्तरिक तथा बाहरी एवं सांविधानिक लेखा परीक्षण आन्तरिक परीक्षण के कार्य की जांच करने तक ही सीमित होता है।

लेखा परीक्षण की किस्में

लेखा परीक्षण का व्यापक उद्देश्य करदाताओं के वित्तीय हितों की रक्षा करना तथा संसद/राज्य/संघ प्रशासित क्षेत्रों के विधान मंडलों के प्रमुखों के ऊपर वित्तीय नियंत्रण रखने में सहायता करना है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (Controller Auditor General) का यह कर्त्तव्य है कि वह सुनिश्चित करे कि संविधान में अथवा संविधान के अन्तर्गत स्थापित विभिन्न प्राधिकरण वित्तीय मामलों में संविधान द्वारा, संसद द्वारा अथवा उचित विधान मंडलों द्वारा निर्धारित या जारी किये गये नियमों एवं आदेशों के अनुसार कार्य करें। संविधान द्वारा सौंपे गये लेखा परीक्षण संबंधी दायित्वों को निभाने के लिये नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) कई प्रकार के लेखा परीक्षण, नियमितता लेखा परीक्षण, राजस्व रसीदों का लेखा परीक्षण, वाणिज्य लेखा परीक्षण, निष्पादन/अनुष्ठान लेखा परीक्षण, संग्रह एवं भंडारों का लेखा परीक्षण इत्यादि कार्य करता है। इस व्यापक कार्य को पूरा करने में अलग-अलग मंत्रालयों में स्थित लेखा अधिकारी तथा अलग-अलग राज्यों में कार्य कर रहे मुख्य लेख अधिकारी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की सहायता करते हैं। वित्तीय लेखा परीक्षण, नियमितता लेखा परीक्षण, राजस्व रसीदों का लेखा परीक्षण, निष्पादन/अनुष्ठान लेखा परीक्षण की कुछ विशिष्टताओं का वर्णन नीचे किया जा रहा है।

वित्तीय लेखा परीक्षण

वित्तीय लेखा परीक्षण वह लेखा परीक्षण है जो भारतीय लेखा परीक्षण एवं लेखा कार्य विभाग को यह सुनिश्चित करने के लिये करता है कि संचालकों के प्रशासनिक कार्य केवल निर्धारित कानून, वित्तीय नियमों एवं प्रक्रियाओं के अनुरूप ही नहीं हो अपितु यह उचित हो तथा इनके फलस्वरूप कोई अपव्यय न हो। वित्तीय लेखा परीक्षण प्रशासनिक संस्थाओं एवं प्रक्रियाओं से संबंधित नहीं होता तथा प्रशासनिक लेखा परीक्षण से भिन्न होता है। व्यवस्था, नियम एवं आदेश बनाने का दायित्व अथवा कर्त्तव्य कार्यकारी सरकार का होता है तथा अधीनस्थ अधिकारियों को इन नियमों का पालन करना होता है, तथापि यदि प्रशासनिक काम के किसी विशेष पथ का परिणाम क्षय, अपव्यय अथवा अनुचित व्यय होता है तो लेखा परीक्षक का यह कर्त्तव्य बन जाता है कि वह इस प्रकार के मामलों पर विशेष ध्यान दे तथा संसद के सन्मुख रखे। उदाहरण के तौर पर, किसी नहर निर्माण परियोजना में लेखा परीक्षण का नहर के वास्तविक निर्माण के प्रशासनिक ढांचे से कोई संबंध नहीं होता है और न ही इस बात से सरोकार होता है कि नहर किसी विशेष क्षेत्र से ही गुजरे। यह प्रशासनिक मामले हैं तथा लेखा परीक्षक इन प्रक्रियाओं की जांच नहीं करेगा। परन्तु यदि यह पाया जाये कि परियोजनाओं का रेखांकन अपर्याप्त आंकड़ों के आधार पर किया गया था तथा इसके परिणामस्वरूप परियोजना में परिवर्तन करने पड़े और अतिरिक्त व्यय का भार उठाना पड़ा अथवा इसके वित्तीय परिणाम आशा के अनुरूप नहीं मिल पाये तो ऐसी स्थिति में लेखा परीक्षण का यह दायित्व बन जाता है कि वह उन परिस्थितियों की जांच करे जिनके कारण गलत रेखांकन हुआ तथा जिसके फलस्वरूप करदाता को बजटीय घाटा उठाना पड़ा। लेखा परीक्षक तभी हस्तक्षेप करता है जब किसी प्रशासनिक कार्य से गम्भीर वित्तीय उलझाव पैदा हो जाते हैं अथवा कोई कार्य निर्धारित कानून एवं वित्तीय व्यवस्था तथा नियमों के अनुरूप नहीं होता। औचित्य लेखा परीक्षण अथवा परंपरागत वित्तीय नियमों के व्यापक सिद्धांतों का परीक्षण भी इस लेखा परीक्षण में सम्मिलित है। इस प्रकार वित्तीय लेखा परीक्षण सरकारी व्यय में हो रहे क्षय को संसद के सम्मुख लाकर करदाताओं के हितों की रक्षा करता है।

नियमितता लेखा परीक्षण

नियमितता लेखा परीक्षण का कार्य मुख्यत: इस बात की जांच करना होता है कि सारे भुगतानों के लिये उचित अधिकारियों की स्वीकृति प्राप्त कर ली गई है या नहीं तथा इनको प्रमााणित करने वाली सभी रसीदें उचित रूप में उपलब्ध हैं या नहीं। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी भुगतान संविधान में दिये गये प्रसंगोचित प्रशासनिक वित्तीय, बजट संबंधी एवं लेखा पद्धति संबंधी व्यवस्थाओं एवं नियमों तथा संसद द्वारा बनाये गये कानूनों के अनुरूप हो। नियमितता लेखा परीक्षण के लक्ष्य जैसा कि लेखा परीक्षण नियमावली में निर्धारित किये गये हैं अन्य बातों के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना है कि -
  1. व्यय के लिये कोष का प्रावधान है तथा यह उचित अधिकारियों द्वारा अधिकृत है;
  2. व्यय हेतु प्रदान की गयी अनुमति के अनुरूप है तथा यह व्यय अधिकृत अफसरों द्वारा ही किया गया है;
  3. भुगतान की मांगे नियमों के अनुसार तथा उचित रूप में की गई हैं;
  4. व्यय संबंधी सारी प्रारंभिक आवश्यकतायें पूरी कर ली गई हैं। उदाहरणस्वरूप सभी निर्माण कार्यों पर होने वाले व्यय के उचित अनुमान तैयार कर लिये गये हैं तथा उचित अधिकारियों की स्वीकृति प्राप्त कर ली गई है, जहां आवश्यक था वहां स्वास्थ्य सर्टीफिकेट (Health Certificate) प्राप्त कर लिया गया है एवं सरकारी कर्मचारियों को वेतन का भुगतान किया गया है।
  5. सीमित अवधि के लिये स्वीकृत व्यय उस अवधि के पश्चात् बिना नई स्वीकृति प्राप्त किये लेखा परीक्षण के लिये स्वीकार न किया जाये;
  6. भुगतान करने वाले अधिकारी ने उन सारे नियमों को ध्यान में रखा है जो भुगतान के तरीकों को समंजित करते हैं;
  7. भुगतान किसी व्यक्ति को किया गया है और प्रमाण के रूप में लिखित रूप से यह मान लिया गया है कि उस आशय की सरकार से दूसरी मांग सम्भव नहीं है;
  8. सारे भुगतान मौलिक लेख पत्रों में ठीक-ठीक दर्ज कर लिये गये हैं।
कोष के प्रावधानों के लेखा परीक्षण का उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि सारा व्यय उन्हीं कार्यों पर किया गया है, जिनके लिये उसका प्रावधान किया गया था तथा व्यय विनियोजित धनराशि से अधिक नहीं है। व्यय की जांच पड़ताल के संबंध में लेखा परीक्षण को यह भी सुनिश्चित करना होता है कि व्यय के प्रत्येक विषय के लिये उचित अधिकारी की स्वीकृति प्राप्त कर ली गई है। व्यवस्था एवं नियमों का लेखा परीक्षण, नियमितता लेखा परीक्षण का एक महत्वपूर्ण पहलू है। यह इस बात को सुनिश्चित करता है कि व्यय संविधान में किये गये प्रसंगोचित प्रावधानों तथा उसके अन्तर्गत बनाये गये कानूनों एवं नियमों के अनुरूप है। व्यय का नियमितता लेखा परीक्षण अर्द्धन्यायिक प्रकृति का कार्य है जो लेखा परीक्षण अधिकारियों द्वारा किया जाता है। इसमें नियमों, आदेशों तथा संविधान की व्याख्या करना सम्मिलित है।

आय/राजस्व वसूली लेखा परीक्षण

आय/राजस्व वसूली लेखा परीक्षण में संघीय स्तर पर आय कर, उत्पादन शुल्क तथा सीमा शुल्क की वसूली सम्मिलित है। राज्य स्तर पर बिक्री कर तथा राज्य उत्पादन शुल्क इसमें शामिल होते हैं। सन् 1905 से भारतीय लेखा परीक्षण एवं लेखा विभाग आय/राजस्व वसूली संबंधी कार्य को करता आ रहा है।
आय/राजस्व वसूली के लेखा परीक्षण में लेखा परीक्षण विभाग का काम यह सुनिश्चित करना है कि पर्याप्त नियमों एवं प्रक्रियाओं का गठन कर लिया गया है तथा राजस्व विभाग उनका पालन कर रहा है। यह कार्य कर निर्धारण, कर वसूली तथा राजस्व के उचित आबंटन पर प्रभावशाली नियंत्रण रखने के लिये आवश्यक है, क्योंकि राजस्व विभाग में कर निर्धारण का काम अर्द्धन्यायिक प्रकृति का होता है। लेखा परीक्षण को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि स्वनिर्णय का अधिकार उचित तथा न्यायसंगत रूप में प्रयोग किया गया है।

निष्पादन/अनुष्ठान लेखा परीक्षण

आमतौर पर व्यक्तिगत सौदों की जांच ही वित्तीय तथा नियमितता लेखा परीक्षण की परिधि में आता है। वे अपना ध्यान उन योजनाओं एवं परियोजनाओं के मूल्यांकन पर केंद्रित नहीं करते जो ऐसे सौदों से संबंधित होती है। इसलिये किसी भी संस्था के निष्पादन के मूल्यांकन के लिये यह दोनों प्रकार के लेखा परीक्षण अपर्याप्त सिद्ध हुये हैं।

जब से सरकार ने पंचवष्र्ाीय योजनाओं का क्रम आरम्भ किया है, देश की सामाजिक एवं आर्थिक उन्नति को गति प्रदान करने के लिये चलाई गई विकास गतिविधियों पर भारी पूंजी निवेश हुआ है। बहुत मामलों में इस पूंजी निवेश का लाभ आशा के अनुरूप नहीं हुआ। इसलिये जनता को यह जानने का अधिकार है कि परिणाम पूंजी निवेश के अनुरूप हुये हैं या नहीं। जनता की इस चिंता के फलस्वरूप सरकार में निष्पादन/अनुष्ठान बजट की प्रथा शुरू की गई। पिछले कुछ समय में व्यय को तद्नुसार वास्तविक परिणामों से जोड़ने की आवश्यकता के बारे में सरकार के चिन्तन में आये परिवर्तन ने उसे लेखा परीक्षण के कार्यों के बारे में पुन: सोचने पर बाध्य किया है। इस बात को स्वीकार कर लिया गया है कि नियमितता लेखा परीक्षण/औचित्य लेखा परीक्षण व्यय पर संसदीय नियंत्रण के लिये आवश्यक है। परन्तु पंचवष्र्ाीय योजनाओं पर निरन्तर बढ़ते हुये व्यय को ध्यान में रखते हुये, लेखा परीक्षण के उद्देश्य एवं लक्ष्यों के बारे में विशेष परियोजनाओं, गतिविधियों तथा योजनाओं की उपलब्धियों का निरीक्षण करना चाहिये। इस बात का आभास किया गया है कि लेखा परीक्षण के वे मामले प्रकाश में लाने चाहिये जहां साधनों का उपयोग अनुकूलतम से नीचे रहा है। परिणामस्वरूप निष्पादन/अनुष्ठान लेखा परीक्षण जिसको दक्षता का लेखा परीक्षण भी कहा जाता है, की आवश्यकता पर गंभीर रूप से विचार किया जा रहा है।

निष्पादन/अनुष्ठान लेखा परीक्षण इस बात को जानने का प्रयत्न करता है कि साधनों को अनुकूलतम तरीके से परिनियोजन कर उनका उपयोग दक्षतापूर्वक किया गया है या नहीं। यह उन सीमाओं का विशेष से वर्णन करता है जहां तक साधनों का प्रयोग उत्पादक उद्देश्यों के लिये किया गया है। यह इस बात का भी विशेष रूप से वर्णन करता है कि किस हद तक ऐसे परिनियोजन से परिभाषित लाभों की आशा की जा सकती है।

यद्यपि निष्पादन/अनुष्ठान लेखा परीक्षण की विधि स्वस्थ/मजबूत एवं लाभदायक है, परन्तु इसको वास्तविक रूप देने में बहुत सारी समस्यायें हैं। पहली बात तो यह है कि किसी भी गतिविधि का निष्पादन मूल्यांकन उन लक्ष्यों के प्रकाश में ही किया जा सकता है जिनकी पूर्ति की इन्हें आशा हो तथा लक्ष्य किसी भी गतिविधि के वांछित परिणामों को दर्शाते हों। जहां किसी गतिविधि में होने वाले निवेश को मापना सरल है वहीं उसके उत्पादन को परिभाषित करने तथा मापने के लिये गम्भीर प्रयासों की आवश्यकता पड़ती है, विशेषत: वहां जहां इस उत्पादन का सामाजिक संदर्भ होता है। दूसरी बात यह है कि “वास्तविक जन कल्याण” की संकल्पना के अनुसार, साधनों का प्रयोग केवल उस बिन्दु तक ही सर्वाधिक नहीं होना चाहिये जिस तक उनका परिनियोजन किया गया है अपितु उन अन्य बिन्दुओं तक भी होना चाहिये जहां तक किये जाने वाले निवेश के प्रभाव पड़ते हैं। दूसरी शब्दों में निवेश के निर्णयों को सामाजिक मूल्य-लाभ विश्लेषण की विधि के अनुप्रयोग से न्यायसंगत सिद्ध करने की आवश्यकता है। तीसरी बात, पूंजी निवेश के उद्देश्य प्राय: वित्तीय एवं अवित्तीय कारणों का सम्मिलित रूप होता है।

लेखा परीक्षण के परिणाम

भारतीय लेखा एवं परीक्षण विभाग द्वारा किये गये लेखा परीक्षण घटना घटने में जांच के रूप में होता है। कुछ विषयों में कुछ धनराशियों का भुगतान तभी किया जाता है जब मांगे लेखा परीक्षक द्वारा जांच कर पारित कर दी जाती है, परन्तु ऐसे भुगतान सरकार के पूरे खर्च (व्यय) की उपेक्षणीय प्रतिशत के रूप में होते हैं। क्योंकि लेखा परीक्षण घटना घटने के बाद किया जाता है। इसलिये अधिक भुगतान अथवा वित्तीय व्यवस्था एवं नियमों की उपेक्षा को रोका नहीं जा सकता। यदि सौदा करते समय कार्यवाहक अधिकारी कोई अनियमितता अथवा औचित्य के विपरीत कुछ करते हैं तो भी लेखा परीक्षक उनको ऐसा करने से नहीं रोक सकता। परन्तु लेखा परीक्षण की प्रभावशीलता लेखा परीक्षक के उस अधिकार पर निर्भर करती है जिसके अनुसार वह लेखा परीक्षण के परिणामों की रिपोर्ट उचित अधिकारियों को प्रस्तुत कर सकता है, चाहे वे अधिकारी विभागीय हों, स्वयं सरकार हो अथवा च्।ब् द्वारा संसद हो। इन रिपोर्टों के आधार पर यह संस्थाएं अनियमितताओं तथा औचित्यों के उल्लंघन का सुधार कर सकती हैं।

लेखा परीक्षण के प्रमाणों की सूचना लेखा परीक्षक द्वारा संबंधित अधिकारियों को शीघ्रतम देने की आवश्यकता होती है। तब लेखा परीक्षकों द्वारा की गई आपत्तियों का समाधान करना इन प्रशासनिक अधिकारियों का दायित्व बन जाता है। प्रशासनिक अधिकारियों का यह भी दायित्व बन जाता है कि वे उस धनराशि को वापस लेने का प्रयास करें जिसका भुगतान अनुचित था। लेखा परीक्षण अधिकारी उस समय तक अपने द्वारा की गई आपत्तियों का मूल्यांकन करते रहते हैं जब तक कि प्रशासनिक अधिकारी विश्वसनीय रूप से उनका समाधान नहीं कर लेते। अन्तत: एक वर्ष के हिसाब-किताब के पूरा हो जाने पर लेखा परीक्षण के परिणामों की रिपोर्ट संबंधित सरकारों तथा विधान मंडलों को लेखा परीक्षण में रिपोर्ट के रूप में दे दी जाती है। यद्यपि लेखा परीक्षण रिपोर्टें घटनाओं के घटने के पश्चात् प्रस्तुत की जाती हैं, फिर भी ये अनेक उद्देश्यों की पूर्ति करती हैं। यह रिपोर्टें प्रशासन/प्रबंधकों को यह निश्चित करने में सहायक होती हैं कि भविष्य में यह अनियमितताएं दोहराई न जाएं। दोष भरी परियोजनाओं को न विचारने में ये परियोजना क्रिया में सहायता करती है। चल रही परियोजनाओं के बीच में ही सुधार कर लेने के संकेत देती हैं। इन रिपोर्टों के आधार पर ही प्रशासनिक अधिकारी उन कर्मचारियों के खिलाफ उचित अनुशासनात्मक कार्यवाही कर सकते हैं जिनकी अवहेलना/लापरवाही के कारण सरकारी कोष को क्षय पहुंचा हो। ऐसी कार्यवाही प्रतिरोधक का काम करती है। तथापि यह रिपोर्ट सामायिक होनी चाहिये तथा सभी असफलताओं, त्रुटियों अथवा हीनताओं को शीघ्र से शीघ्र सामने लोने में सक्षम होनी चाहिए ताकि प्रशासन तुरन्त इनको सुधारने के उपाय कर सके। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा लेखा परीक्षण की रिपोर्टों की प्रस्तुति की प्रक्रिया संविधान में निर्धारित है। नियंत्रक एवं महालेखा निरीक्षक की संघीय लेखा संबंधी रिपोर्टें राष्ट्रपति को तथा राज्यों के लेखा संबंधी रिपोर्टें राज्यपाल को दी जाती हैं। इस समय तीन विभिन्न प्रकार की रिपोर्टें दी जाती हैं। (i) विनियोजित लेखा पर लेखा परीक्षण रिपोर्ट, (ii) वित्त लेखा पर रिपोर्ट, तथा (iii) संघीय तथा राज्य सरकारों द्वारा राजस्व वसूली तथा वाणिज्य एवं सार्वजनिक संस्थानों के बारे में रिपोर्ट। इन रिपोर्टों की प्रस्तुति के साथ ही नियंत्रक एवं महालेख परीक्षक का दायित्व समाप्त हो जाता है। यह रिपोर्टें मिलने पर राष्ट्रपति एवं राज्यपाल इनको क्रमश: संसद एवं राज्य के विधान मंडलों के पास भिजवाने का प्रबंध करते हैं। वास्तविक स्थिति यह है कि विभिन्न सरकारों के बारे में लेखा परीक्षण रिपोर्ट राष्ट्रपति की ओर से वित्त मंत्रालय द्वारा स्वीकार की जाती है। वित्त मंत्री इन रिपोर्टों को दोनों सदनों में प्रस्तुत करता है। राज्य की लेखा परीक्षण रिपोर्टों के बारे में भी प्राय: सही प्रक्रिया अपनाई जाती है।

संसद एवं राज्य विधान मंडल को धन की आपूिर्त्त को प्रभावशाली बनाये रखने के लिये आवश्यक है कि संसद एवं राज्य विधान मंडल अपने आप विश्वस्त कर लें कि धन उन्हीं उद्देश्यों के लिये खर्च किया गया है जिनके लिये इसकी अनुमति दी गई थी। वे यह भी सुनिश्चित कर लें कि व्यय उस सीमा के अन्दर है जिसको स्वीकृत किया गया था। इनका विस्तृत उल्लेख नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की संघीय एवं राज्य सरकारों के बारे में दी गई लेखा एवं लेखा परीक्षण रिपोर्टों में मिलता है। व्यापक तथा तकनीकी प्रकृति के होने के कारण संसद तथा राज्य विधान मंडलों के लिये उनका विस्तारपूर्वक अध्ययन करना असंभव है। इन रिपोर्टों के बारे में उचित अध्ययन/निरीक्षण के आवश्यक कदम संसद नहीं जुटा पाती। इसलिये संसद (लोक सभा) तथा राज्य विधान सभाओं ने कमेटी का गठन किया है जिसको लोक लेखा समिति (Committee on Pubic Account) कहते हैं। लेखे का (विनियोजन एवं वित्त) तथा इनसे संबंधित लेखा परीक्षण के विस्तारपूर्वक अध्ययन का कार्यभार इस कमेटी को सौंपा गया है। यह सुनिश्चित करना कि सरकार ने उस धन का उपयोग जिसका अनुमोदन संसद ने किया था, मांग की परिधि के अन्दर ही खर्च किया गया है या नहीं। लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) का यह एक महत्वपूर्ण कार्य है। इसका अर्थ यह है कि अनुदान से संबंधित जो खर्च दिखाया गया है वह अनुदान राशि से अधिक नहीं होना चाहिए तथा अनुदान की राशि केवल उन्हीं उद्देश्यों पर खर्च की जानी चाहिए जो विस्तृत मांगों में बताये गये हैं। तथापि कमेटी का कार्य व्यय की औपचारिकता को लांघता हुआ उसकी “बुद्धिमता, विश्वसनीयता तथा मितव्ययिता” तक फैला हुआ है। जब कोई प्रमाणित लापरवाही का उदाहरण जिसके कारण कोई क्षय अथवा अपव्यय हुआ हो, एवं जब वह कमेटी के ध्यान में लाया जाता है तो वह संबंधित मंत्रालय विभाग से यह बताने को कहती है कि उसने ऐसी चीजें दोबारा न होने देने के लिये क्या उपाय किये हैं। ऐसी परिस्थितियों में कमेटी अपना मत निंदा के रूप में रिकार्ड कर सकती है अथवा अपव्यय एवं संबंधित विभाग एवं मंत्रालय के उचित नियंत्रण के अभाव की भत्र्सना कर सकती है। व्यापक अर्थ में कमेटी का नीति संबंधी प्रश्नों से कोई सरोकार नहीं होता है।

लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) कुशल रूप से कार्य कर सके, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे नियंत्रक एवं महालेखा निरीक्षक तथा दूसरे अधिकारियों की पूरी सहायता मिले। मौलिक सामग्री उपलब्ध कराने के अतिरिक्त लेखा परीक्षण लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) की विभिन्न प्रकार से सहायता करता है। यह कमेटी के सदस्यों को ऐसे परिपत्र प्रस्तुत करता है जिनमें उन अनियमितताओं एवं अशुद्धि के महत्व का वर्णन होता है जिन पर लेखा परीक्षण रिपोर्ट में टिप्पणी की गई है। इसके अतिरिक्त लेखा परीक्षक कमेटी के सदस्यों को अलिखित रूप से विषय के सारे पहलुओं का संक्षिप्त परिचय भी देता है ताकि वे मौखिक निरीक्षण के समय विभाग के गवाहों से स्पष्टीकरण एवं अतिरिक्त सूचना प्राप्त कर सकें। लेखा परीक्षक मौखिक एवं लिखित प्रमाणों की जांच के पश्चात् रिपोर्ट तैयार करने में भी कमेटी की सहायता करते हैं। वे सरकार द्वारा मान ली गयी सिफारिशों के कार्यान्वयन पर दृष्टि रखने में भी कमेटी की सहायता करते हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की लेखा परीक्षण रिपोर्टों पर आधारित अपनी रिपोर्ट संसद/राज्य की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) द्वारा मंत्रालयों/विभागों को कार्यान्वयन के लिये भेजी जाती है। मंत्रालयों के लिये यह आवश्यक होता है कि इन सिफारिशों के परिपालन के बारे में अपनी रिपोर्ट छ: महीने के अन्दर कमेटी को दे दें। सरकार प्राय: कमेटी की सिफारिशों को मान लेती है। ऐसे विषयों में जहां सरकार की यह सिफारिशें मान्य नहीं होती वहां सरकार को सिफारिशें न मानने के कारण कमेटी को बताने पड़ते हैं।

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