निजीकरण क्या है इसके गुण दोष की विवेचना

निजीकरण वह सामान्य प्रक्रिया है जिसके द्वारा निजी क्षेत्र किसी सरकारी उद्यम का स्वामी बन जाता है अथवा उसका प्रबंध करता है। निजीकरण की और अभिप्रेरित करने वाला एक प्रमुख घटक जापान तथा एशिया ने  नव औद्योगीकृत देश-सिंगापुर ताईवान, हांगकांग, कोरिया आदि का सफल आर्थिक निष्पादन है। इन देशों ने अपने आर्थिक विकास के लिये निजीकरण का मार्ग चुना है। दूसरा महत्वपूर्ण घटक सार्वजनिक उपक्रमों की अकुशलता हैं सार्वजनिक क्षेत्र के जो उपक्रम लाभ भी प्राप्त कर रहे हैं उनमें से अधिकांश एकाधिकारी कंपनियाँ हैं । इसके अतिरिक्त विश्व के घटनाक्रमों के तरह भी सरकार ने निजीकरण को बल देना प्रारंभ किया। 

निजीकरण के उद्देश्य 

विकसित तथा विकासशील दोनों ही प्रकार के देशों में निजीकरण को महत्व दिया जा रहा हैं। निजीकरण के विचारधारा के पक्ष में निम्नलिखित उद्देश्यों का उल्लेख किया जाता है।
  1. अर्थव्यवस्था की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के आवश्यक वित्तीय संसाधनों को जुटाना।
  2. प्रबंधकीय योग्यता और दक्षता प्रदान करना।
  3. राष्ट्रीय आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के अनुरूप निजी क्षेत्र की उत्पादन-क्रियाओं को सार्वजनिक क्षेत्र के साथ समन्वित करना।
  4. नई औद्योगिक इकाइयों की स्थापना करना तथा योजनाओं में आरंभ की गई आयात प्रतिस्थापन क्रिया को बल प्रदान करना।
  5. उपयुक्त तकनीक के प्रसार, अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण तथा उद्योगों के विवेकीकरण के वास्तें औद्य शोध व विकास कार्यक्रम तेज करना और उनका विस्तार करना।
  6. बाहय ऋणों को घटाना।
  7. प्रतियोगिता में वृद्धि करना
  8. उत्पादकता में वृद्धि करना तथा परिचालन क्षमता को बढ़ाना।

भारत में निजीकरण को प्रोत्साहित करने वाले कारक

1. नये आर्थिक सुधार कार्यक्रम:- 1991 में भारत सरकार ने नये आर्थिक सुधारों के तरत अनेक घोषणाएँ की इनमें 100 करोड़ रुपये से अधिक सम्पति वाली संस्थाएँ बिल के केन्द्रीय सरकार की अनुमति के भी स्थापित हो सकेगी। सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों में कमी बड़े औद्योगिक घरानों को विस्तार से छूट लाइसेंस समाप्ति एवं सरलीकरण, विदेशी विनियोजनकों का उपक्रम में 51 प्रतिषत तक समता पूंजी को रखने की छूट, फेरा एवं एमआर. टी.पी. अधिनियमों में ढील, रूपये की पूर्ण परिवर्तनीयता सीमा व उत्पाद शुल्कों में कमी आदि प्रमुख रूप से शामिल है। इन सबके फलस्वरूप एक ऐसा वातावरण तैयार हुआ जिसमें निजी उद्यमी अधिक स्वतंत्रता के साथ कार्य कर सकते है। 

2. सरकार पर बढ़ता ऋणभार:- स्वतंत्रता के पश्चात भारत की सार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता के आधार पर विकसित करने का निर्णय सातवीं योजना तक चलता रहा फलस्वरूप सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं व विदेशी सरकारों से ऋण प्राप्त करती रहीं इस समय अधिकांश सार्वजनिक उपक्रम घाटे में चलते रहे तथा सरकार उन्हें सहायता प्रदान करती रही अतः सरकारी विदेशी ऋण जाल में फसती चली गयी। अब सरकार इस ऋण जाल से निकलने के लिए निजीकरण का सहारा ले रही हैं जिससे इन स्थापित उद्योगों का कुशलपूर्वक संचालन संभव हो सकेगा तथा सरकार को और अधिक ऋण नहीं लेना पड़ेगा। 

3.विदेशी कपंनियो की उपस्थितिः- जहाँ एक ओर विकसित पूंजीवादी देशों में आर्थिक मंदी के फलस्वरूप अति उत्पादन तथा बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत के विदेशी उत्पादनों के उपयोग पर बढ़ते हुये प्रभाव को देखते हुये भारत के विस्तृत बाजार तथा कम प्रतियोगिता को देखते हुये भारत की ओर आकर्षित हुये। फलस्वरूप भारत में निजीकरण को प्रोत्साहन मिला।

4. भारतीय उद्योगों को प्रतियोगीः- भारतीय उद्योगों को सरकार के पिछले 45 वर्षों से संरक्षण में रखा जिससे इन उद्यमों में नो लागत कम करने का प्रयास किया और न ही अपनी वस्तु की किस्म में सुधार किया अतः स्पष्ट है कि यदि हमें अपने उत्पादनों को निर्यातोन्मुखी बनाना हैं तो भारतीय उद्योगों की गुणवत्ता कीमत की दृष्टि से प्रतियोगी बनाना होगा और यह निजीकरण द्वारा ही संभव हो सकता हे। 

5. उत्पादन बढ़ाने का विस्तृत आधार- भारत में जहाँ एक ओर विस्तृत बाजार उपलब्ध हैं वहीं दूसरी ओर उसकी औद्योगिक अद्यः संरचना पर्याप्त रूप से विकसित हो चुकी हैं । भारत में सस्ता श्रम तकनीकी एवं प्रबंधकीय कुशलता तथा आवश्यक कच्चा माल प्रचुरता से उपलब्ध हैं। अतः निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने पर उत्पादक कम कीमत पर अच्छे किस्म की वस्तु का उत्पादन करने में समक्ष होगे जिससे न केवल घरेतु बाजार की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता हैं बल्कि विदेशी बाजारों में भी अपनी वस्तु को बेचने में सक्षम हो सकते हैं।

निजीकरण के लाभ / गुण

निजीकरण से प्राप्त होने वाले लाभों का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता सकता है।
  1. विनिवेश, निजीकृत कम्पनियों को बाजार अनुशासन से अवगत कराएगा। जिसके परिणामस्वरूप वे और अधिक दक्ष बनने के लिए बाध्य होंगे और वे अपने ही वित्तीय और आर्थिक बल पर जी सकेंगे। वे बाजार ताकतों का और तेजी से मुकाबला कर सकेंगे और अपनी वाणिज्यिक आवश्यकताओं की पूर्ति और अधिक व्यावसायिक तरीके से कर सकेंगे। विनिवेश से सरकारी क्षेत्र के उद्यमों की सरकारी नियंत्रण से भी छुटकारा मिलेगा और इससे निजीकृत कंपनियों के निगमित शासन की शुरूआत होगी।
  2. विनिवेश के परिणामस्वरूप, निजीकृत कम्पनियों के शेयरों की पेशकश छोटे निवेशकों और कर्मचारियों को करने के माध्यम से सम्पत्ति का व्यापक संभव हो पाएगा।
  3. विनिवेश का पूंजी बाजार पर लाभकारी प्रभाव होगा; चलायमान स्टॉक में वृद्धि से बाजार में और पकड़ अधिक और मजबूत होगी। निवेशकों को बाहर निकलने के सरल विकल्प मिलेंगे, मूल्यांकन और कीमत निर्धारण के लिए अधिक विशुद्ध नियम स्थापित करने में सहायता मिलेगी और निजीकृत कम्पनियों द्वारा अपनी परियोजनाओं अथवा उनके विस्तार के लिए निधियां जुटाने में सहायता मिलेगी।
  4. पूर्व के सार्वजनिक क्षेत्रों का उपर्युक्त निजी निवेशकों के लिए खोल देने से आर्थिक गतिविधि में वृद्धि होगी और मध्यम से दीर्घावधि तक अर्थव्यवस्था, रोजगार और कर-राजस्व पर कुल मिलाकर लाभकारी प्रभाव पडे़गा। 
  5. दूर संचार और पेट्रोलियम जैसे अनेक क्षेत्रों में, सार्वजनिक क्षेत्र का एकाधिकार समाप्त हो जाने से, अधिक विकल्पों और सस्ते तथा बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पादों और सेवाओं के द्वारा उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी जिससे जैसा कि पहले से ही होना आरम्भ हो गया है।

निजीकरण के दोष

भारत जैसे प्रजातािन्त्राक समाज में निजीकरण के कई खतरे अथवा कठिनाइयां हैं। इनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं।
  1. श्रमिक विरोध :- निजीकरण की प्रक्रिया की सबसे बड़ी कठिनाई यूनियन के माध्यम से श्रमिकों की ओर से होने वाले विरोध हैं वे बडे़ पैमाने पर छटंनी तथा पोजीशन खो जाना और काम के वातावरण में परिवर्तन जैसी बातों से आतंकित हैं।
  2. परिसम्पत्तियों का मूल्यांकन :- सरकार द्वारा विशुद्ध परिसम्पत्तियों के किताबी मूल्य के आधार पर निर्णय लेकर कपटपूर्ण व्यवहार करने का भी खतरा है।
  3. निगमीकरण को प्रोत्साहन :- यह सम्भव है कि निजीकरण द्वारा बड़े उद्योगों को लाभ पहुंचाने के लिए निगमीकरण को प्रोत्साहित किया जाए।
  4. प्रतियोगिता का अभाव :- निजीकरण प्रतियोगिता के बिना सार्वजनिक क्षेत्र के स्थान पर निजी क्षेत्र में अकार्यकुशल एकाधिकारी कंपनियों के रूप में ही परिवर्तित होकर रह जाएगा।
निजीकरण कार्यकुशलता औद्योगिक क्षेत्र की समस्याओं का एक मात्रा उपाय नहीं है। उसके लिए तो समुचित आर्थिक वातावरण और कार्य संस्कृति में आमूल चूक परिवर्तन होना भी आवश्यक है। भारत में निजीकरण को अर्थव्यवस्था की आज की समस्त समस्याओं को रामबाण औषधि नहीं माना जा सकता। इसे तो पूर्व निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने के एक सर्वोत्तम संभव माध्यम के रूप में ही देखना होगा।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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