प्लेटो का शिक्षा का सिद्धान्त

अनुक्रम
प्लेटो अपने आदर्श राज्य में न्याय की प्राप्ति के लिए जिन दो तरीकों को पेश करता है, उनमें से शिक्षा एक सकारात्मक तरीका है। समाज में शिक्षा की बहुत आवश्यकता होती है। शिक्षा द्वारा ही समाज में भ्रातृभाव और एकता की भावना पैदा होती है। शिक्षा के महत्त्व को स्वीकारते हुए प्लेटो कहता है- “राज्य वृक्षों या चट्टानों से निर्मित नहीं होता, बल्कि उन व्यक्तियों के चरित्रा से निर्मित होता है, जो उसमें रहते हैं, व्यक्तियों को श्रेष्ठ व चरित्रावान बनाने के लिए शिक्षा की बहुत आवश्यकता है। बार्कर के अनुसार- “शिक्षा एक मानसिक रोग का मानसिक औषधि से इलाज करने का प्रयास है।” शिक्षा व्यक्ति का समाज के प्रति दृष्टिकोण बदलकर उसे अच्छा व्यक्ति बनाती है।

शिक्षा का महत्त्व

  1. शिक्षा का सिद्धान्त न्याय सिद्धान्त का तार्किक परिणाम : अपने आदर्श राज्य को न्याय पर आधारित करने हेतु प्लेटो ने शिक्षा के महत्त्व को स्वीकार किया है। न्याय का अर्थ व्यक्तियों और वर्गों द्वारा अपने स्वभावानुकूल विशिष्ट कार्यों का सम्पन्न करना है। शिक्षा द्वारा व्यक्ति को विशिष्ट कार्य का प्रशिक्षण देकर कुशल व दक्ष बनाया जा सकता है। प्लेटो न्याय की रक्षा के लिए भी शिक्षा को आवश्यक मानता है।
  2. नागरिकों को सदग्ग्ण्णी बनाना : प्लेटो का शिक्षा-सिद्धान्त इस बात पर आधारित है कि “सदग् णा ही ज्ञान है “ यदि सद्गुण ज्ञान है तो उसे सिखाया जा सकता है। नागरिकों को सद्गुणी बनाने के लिए शिक्षा की आवश्यकता है ताकि समाज के तीनों वर्ग सद्गुणी बनकर अपने-अपने कर्त्तव्यों को स्वेच्छा से पूरा कर सकें।
  3. शिक्षा द्वारा व्यक्ति की आत्मा का विकास : प्लेटो का मानना है कि मनुष्य की आत्मा में अनेक श्रेष्ठ तत्त्व निवास करते हैं। इन्हीं अन्तर्निहित तत्त्वों को बाहर निकाल कर सही दिशा में गतिमान करना ही प्लेटो की शिक्षा का उद्देश्य है। शिक्षा एक ऐसा वातावरण तैयार करती है जो आत्मा को अपने विकास के प्रत्येक स्तर पर सहायता करती है। शिक्षा के अभाव में मानव आत्मा पथभ्रष्ट हो सकती है, जो समाज और व्यक्ति दोनों के लिए घातक है।
  4. शिक्षा व्यक्ति को सामाजिक बनाती है : शिक्षा व्यक्ति के हृदय में समष्टि का भाव भरती है और उसे आत्मसंयम का पाठ पढ़ाती है। यह व्यक्ति को सत्यवादी और आज्ञाकारी होने की सीख देती है तथा अहंकार व स्वार्थ को त्याग कर परमार्थ की ओर प्रेरित करती है। शिक्षा व्यक्ति की सामाजिक चेतना को जगाकर विभिन्न वर्गों में सामंजस्य व एकता स्थापित करती है।
  5. शिक्षा का राजनीतिक महत्त्व : शिक्षा के द्वारा शासक व सैनिक वर्ग को प्रशिक्षण प्राप्त होता है और दार्शनिक शासक का जन्म होता है। शिक्षा लोगों को राजनीतिक जीवन में भाग लेने के योग्य बनाती है। राज्य के प्रत्येक वर्ग को उसके कर्त्तव्य से अवगत कराती है। यह व्यक्ति के राजनीतिक जीवन को परिशुद्ध कर राज्य को एकता के सूत्रा में बाँधती है।
  6. शिक्षा का दार्शनिक महत्त्व : शिक्षा अपने आप में एक अच्छाई है। इसका अन्तिम लक्ष्य उस चरम सत्य की खोज करना है जो काल और स्थान से परे है, जो सृष्टि की सभी वस्तुओं का मूल कारण है, जो अपनी विभूति से सदा देदीप्यमान होता है एवं जिसकी ज्योति से समस्त चराचर प्रकाशित होता रहता है। इसी चिरंतन, शाश्वत और अटल सत्य की खोज कर व्यक्ति पार्थिव जीवन की सीमाओं से ऊपर उठने का प्रयास करता है।

शिक्षा सिद्धान्त का दार्शनिक आधार

प्लेटो की शिक्षा योजना के पीछे एक दार्शनिक दृष्टिकोण निहित है। प्लेटो की मान्यता है कि मनुष्य की आत्मा कोई निश्चेष्ट वस्तु न होकर सक्रिय तत्त्व है। अपनी सक्रियता के कारण मन अपने आप को पर्यावरण के हर पदार्थ की ओर अग्रसर करता है। अत: शिक्षक का कार्य तो इस सक्रिय आध्यात्मिक शक्ति को सौन्दर्य की ओर आकृष्ट करना है। प्लेटो के लिए शिक्षा का अर्थ है- “मन के ‘अन्तरचक्षु’ को प्रकाश की ओर प्रेरित करना।” प्लेटो की शिक्षा योजना का दूसरा महत्त्वपूर्ण दार्शनिक आधार यह है कि मनुष्य की आत्मा को अपनी सतत सक्रियता के लिए सतत भोज्य पदार्थ की उसी प्रकार आवश्यकता है जैसी कि भौतिक अस्तित्व के लिए शरीर को भोजन आवश्यकता है। अत: जब तब आत्मा का अस्तित्व है तब तक उसे शिक्षा द्वारा पोषक तत्त्व प्रदान किया जाना चाहिए। अत: शिक्षा जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। यह युवावस्था में भावनाओं और कल्पनाओं को संतुलित करती है तो प्रौढ़ावस्था में विज्ञान के द्वारा विवेक का विकास करती है और इसके बाद भी दर्शन के द्वारा विभिन्न शास्त्रों के पारस्परिक सम्बन्धों का ज्ञान कराती है एवं मानव जीवन के अन्तिम लक्ष्य को समझने हेतु अन्तर्दृष्टि प्रदान करती है।

प्लेटो मानव मस्तिष्क की सोद्देश्यता में विश्वास करता है। इसकी दो बातें प्रमुख हैं- (i) मानव मस्तिष्क सदा एक उद्देश्य की ओर बढ़ता है क्योंकि यह विवेक प्रेरित होता है। (ii) यह सदैव एक ही उद्देश्य की ओर बढ़ता है और वह उद्देश्य है शिव (Good) की प्राप्ति। अत: मस्तिष्क सदैव एक ही उद्देश्य की ओर बढ़ता है और उन्हीं वस्तुओं को जानने का प्रयास करता है जिनके कुछ उद्देश्य होते हैं। शिव के स्वरूप की खोज करना विश्व की समस्त वस्तुओं का आधार है। अत: प्लेटो की शिक्षा की परिणति शिव के स्वरूप के ज्ञान प्राप्त करने में होती है। शिव के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने का अर्थ है सदाचारपूर्ण कार्य करना। यही सभी वस्तुओं का अन्तिम लक्ष्य है। इसी वास्तविक एवं अन्तिम अर्थ में प्लेटो ने सद्गुण को ज्ञान कहा है। अत: ‘ज्ञान ही गुण है’, यही प्लेटो की शिक्षा का दार्शनिक आधार है।

प्लेटो का शिक्षा सिद्धान्त

प्लेटो ने रिपब्लिक में अपने शिक्षा-सिद्धान्त पर विस्तार से चर्चा की है। रूसो के शब्दों में- “रिपब्लिक राजनीतिशास्त्र पर ही, वरन् शिक्षा पर लिखा गया सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है।” सेवाईन का मत है कि- “शिक्षा एक सकारात्मक साधन है जिसके द्वारा शासक एक सामंजस्यपूर्ण राज्य का निर्माण करने के लिए मानव प्रकृति को सही दिशा में ढाल सकता है।” प्लेटो अपने समय के एथेन्स व यूनान की शिक्षा पद्धतियों का गहरा विद्वान था। उसने अपने आदर्श राज्य में न्याय की प्राप्ति के लिए शिक्षा का जो सकारात्मक साधन पेश किया, वह एथेन्स व स्पार्टा दोनों की शिक्षा पद्धतियों पर आधारित था। इसलिए प्लेटो की योजना को समझने से पहले इन दोनों पद्धतियों को जानना आवश्यक है।

एथेन्स और स्पार्टा की शिक्षा प्रणालियों का पुनरावलोकन

एथेन्स की शिक्षा व्यवस्थाएथेन्स में शिक्षा परिवार का अपना उत्तरदायित्व था और राज्य का उस पर कोई नियन्त्रण नहीं था। तत्कालीन एथेन्स में प्रचलित शिक्षा समाजोन्मुखी न होकर व्यक्तिपरक थी जिससे राज्य के लिए अच्छे व्यक्तियों का निर्माण असम्भव था। परिवार को स्वतन्त्रता थी कि वे अपने बच्चों को कैसी भी शिक्षा दें और कहीं भी दें। रोमन साम्राज्य के समय तक एथेन्स में कोई राज्य-नियन्त्रित स्कूल नहीं था। प्रसिद्ध विधिशास्त्री सोलन के नियम के अनुसार- “माता-पिता का यह कर्त्तव्य था कि वे अपने बच्चों की शिक्षा का प्रबन्ध करें।” लड़के एवं लड़कियों के लिए शिक्षा की समान व्यवस्था नहीं थी। लड़कियों को घरेलू आवश्यकताओं की ही शिक्षा दी जाती थी। एथेन्स की शिक्षा प्रणाली तीन स्तरों में विभाजित थी, जिसका वर्णन इस प्रकार है :-
  1. प्राथमिक शिक्षा : प्राथमिक शिक्षा में केवल पढ़ना लिखना ही सिखाया जाता था और प्राचीन कविता, व्यायाम व संगीत की शिक्षा दी जाती थी। यूनान में कवि धर्म गुरु माने जाते थे, अत: उन्हें साहित्य के अध्ययन में नीतिशास्त्र और धर्मशास्त्र का भी ज्ञान प्राप्त हो जाता था। शिक्षा का समय 6 से 14 वर्ष तक था।
  2. माध्यमिक शिक्षा : इस शिक्षा का लाभ अमीर लोग ही उठा सकते थे। भारी शिक्षा शुल्कों के कारण गरीब व्यक्ति शिक्षा से वंचित रह जाते थे। इसमें अलंकारशास्त्र, भाषण कला और राजनीति की शिक्षा दी जाती थीं इसका समय 14 से 18 वर्ष का था।
  3. सैनिक शिक्षा : एथेन्स के प्रत्येक युवक के लिए यह शिक्षा अनिवार्य थी। इस शिक्षा में दक्ष होने पर ही व्यक्ति को नागरिक अधिकार प्रदान किए जाते थे। शिक्षा का यह स्तर 18 से 20 वर्ष की आयु तक था। यह शिक्षा केवल 2 वर्ष तक राज्य द्वारा प्रदान की जाती थी।
एथेन्स की यह शिक्षा पद्धति व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और चारिित्राक विकास के लिए उपयुक्त थी, परन्तु इसका सबसे बड़ा दोष यह था कि इसमें शिक्षा देना राज्य का नहीं, परिवार का उत्तरदायित्व था। यह शिक्षा पद्धति राज्य की आवश्यकताओं और उसकी प्रकृति के अनुकूल नहीं थी। इसके परिणामस्वरूप एथेन्स अज्ञानी व अयोग्य शासकों द्वारा शासित रहा। प्लेटो ने इन दोषों को पहचानकर अपनी शिक्षा-पद्धति में इन दोषों का निराकरण किया। उसने इस शिक्षा प्रणाली की अच्छी-अच्छी बातों को ग्रहण कर लिया।

स्पार्टा की शिक्षा-प्रणाली

यह शिक्षा पद्धति राज्य द्वारा पूर्णतया नियन्त्रित थी। स्पार्टा का समाज प्राचीन ढंग का योद्धाओं का समाज था जिसके लिए योद्धाओं की आवश्यकता थी। इसलिए राज्य में सैनिक शिक्षा पर विशेष जोर दिया जाता था। शिक्षा परिवार का उत्तरदायित्व न होकर राज्य का अपना उत्तरदायित्व था। बच्चे 7 वर्ष की आयु तक ही अपनी माता के पास रहते थे। शिक्षा को राज्य के उद्देश्यों के अनुकूल ढालने के लिए बच्चों को 7 वर्ष के बाद राज्य अपने नियन्त्रण में ले लेता था। इसके बाद बच्चों को उनकी प्रतिभा, योग्यता, अभिरुचि के अनुसार राज्य द्वारा शिक्षा दी जाती थी। इस शिक्षा का उद्देश्य अच्छे लड़ाकू व रक्षक पैदा करना था। स्त्रियों के लिए भी शारीरिक शिक्षा जरूरी थी। प्लूटार्क ने लाइकरगस (स्पार्टा का विधि निर्माता) की जीवनी में लिखा है- “यहाँ बालक-बालिकाएँ एक साथ नग्नावस्था में विविध प्रकार के व्यायाम करते थे। युवतियों के शरीर दौड़, कुश्ती, बर्छी, भाला फेंकने आदि के व्यायामों द्वारा सुपुष्ट बनाए जाते थे ताकि उनकी सन्तान बलवान और पुष्ट हो सके और स्वयं स्त्रिया भी राज्य रक्षा में पुरुषों की भाँति भाग ले सकें।” इस तरह स्पार्टा में राज्य हित की पूर्ति के लिए परिवार को गौण बना दिया था और जीवन के सभी सुखों का सैनिक आवश्यकताओं के ऊपर बलिदान कर दिया था। स्पार्टा में 20 वर्ष की आयु के बाद विवाह की स्वतन्त्रता थी। विवाह एक गुप्त एवं अवैध सम्बन्ध होता था। पति-पत्नी वैवाहिक जीवन का आनन्द नहीं ले सकते थे। स्पार्टा की सामाजिक व्यवस्था भी राज्य की सैनिक आवश्यकताओं के अनुकूल थी। सभी नागरिक सामूहिक भोजनालयों में भोजन करते थे। स्पार्टा में अमीर गरीब का भेदभाव नहीं था। वहाँ कोई सोना या चाँदी रख सकता था। लोहे की मुद्रा प्रचलित थी। स्पार्टा का शासन कुलीन व्यक्तियों के हाथों में था। जनता आर्थिक व पारिवारिक चिन्ताओं से दूर अपना सारा समय राज्य के लिए अर्पित कर देते थे। इस शिक्षा प्रणाली को समस्त यूनान में ख्याति प्राप्त थी और समस्त यूनान विशेष तौर पर एथेन्स से युवक शिक्षा प्राप्ति के लिए वहाँ जाते थे।

स्पार्टा की इस शिक्षा प्रणाली का पाठ्यक्रम भी संकुचित एवं एकांगी था। इसमें साहित्यिक शिक्षा की उपेक्षा की गई थी, जिससे स्पार्टा की अधिकांश जनता पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे। उन्हें यूनान के साहित्य का कोई ज्ञान नहीं था। स्पार्टा में शारीरिक विकास तो हो सकता था लेकिन वहाँ मानसिक एवं बौद्धिक विकास उपेक्षित था। अत: यह शिक्षा व्यक्ति को पूर्ण नहीं बना सकती थी।

उपर्युक्त दोनों शिक्षा पद्धतियों का विश्लेषण करके बार्कर ने कहा है- “एथेन्स से प्लेटो की शिक्षा योजना का व्यक्तिगत पहलू आता है - मानव का सम्पूर्ण विकास होना चाहिए, स्पार्टा से उसका सामाजिक पहलू आता है - नागरिक को राज्य में उसके उचित स्थान पर प्रतिष्ठित करने की दृष्टि से शिक्षा राज्य द्वारा नियन्त्रित होनी चाहिए।”

प्लेटो की शिक्षा के उद्देश्य

प्लेटो की शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करना है। यह विकास ज्ञान पर ही निर्भर होताहै। इसलिए प्लेटो ने अपनी शिक्षा के उद्देश्य बताए हैं :-
  1. व्यक्तित्व के पूर्णत्व की प्राप्ति के लिए प्लेटो के अनुसार शिक्षा को व्यक्ति के सामाजिक और वैयक्तिक दोनों के पक्षों के पूर्ण विकास के उद्देश्य को पूर्ण करना चाहिए।
  2. आदर्श राज्य के निर्माण को सम्भव बनाने के लिए विशेषकर संरक्षक वर्ग (सैनिक व दार्शनिक शासक) को प्रशिक्षित करना शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए।
  3. स्वस्थ शरीर में स्वस्थ आत्मा का निवास होता है। अत: शिक्षा का उद्देश्य शरीर और मस्तिष्क दोनों का विकास करना होना चाहिए।
  4. प्लेटो का मत है - सदाचार ही ज्ञान है। अत: शिक्षा का उद्देश्य केवल सैद्धान्तिक ज्ञान प्राप्त करना ही नहीं, उसे उस ज्ञान को आचरण में कैसे उतारा जाए इसका व्यावहारिक प्रशिक्षण भी देना चाहिए, प्लेटो के अनुसार विद्यार्थियों को पहले सैद्धान्तिक शिक्षा और उसे बाद प्रयोगात्मक शिक्षा दी जानी चाहिए।
  5. मनुष्य की आत्मा का गुण ज्ञान होने के कारण, शिक्षा का उद्देश्य भी ज्ञान प्राप्त करना है, प्लेटो के अनुसार मानव-आत्मा के पास स्वयं ज्ञान-नेत्रा होता है, शिक्षा तो उस ज्ञान-नेत्रा का रुख प्रकाश की ओर आकर्षित करती है। शिक्षा एक ऐसा वातावरण देती है कि आत्मा का ज्ञान स्वत: ही प्रकट हो जाए। प्लेटो के अनुसार शिक्षा आत्मनेत्रा को प्रकाशोन्मुख करती है।
  6. शिक्षा का उद्देश्य मात्रा वस्तुगत जगत् का ज्ञान प्राप्त करना नहीं है, अपितु वस्तुगत जगत् के मूल में निहित ‘सत्’ अर्थात अनन्त वास्तविकता का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना है।
  7. शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को सौन्दर्य के प्रति आकर्षित करना है; अत: विशिष्ट कलाओं; जैसे साहित्य, संगीत आदि का प्रशिक्षण देना भी शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए।

आदर्श राज्य में शिक्षा-योजना

प्लेटो की शिक्षा योजना स्पार्टा व एथेन्स की शिक्षा योजनाओं का मिला-जुला रूप है। लेकिन यह प्लेटो की अपनी देन होने के कारण मौलिकता के गुण से भी युक्त है। प्लेटो ने शिक्षा को जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया बताया है। प्लेटो की शिक्षा योजना 6 से 50 वर्ष तक की आयु तक चलने वाली प्रक्रिया व पाठ्यक्रम है। प्लेटो की शिक्षा योजना को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है :-
  1. प्रारम्भिक शिक्षा (Elementary Education)
  2. उच्चस्तरीय शिक्षा (Higher Education)

1. प्रारम्भिक शिक्षा

प्लेटो प्रारम्भिक शिक्षा को तीन भागों में बाँटता है :-

(i) प्रारम्भिक शिक्षा 6 वर्ष की शिक्षा : इस समय में जन्म से 6 वर्ष की शिक्षा शामिल है। इस दौरान बालक को मुख्यत: छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से नैतिक और धार्मिक शिक्षा दी जाती है।

(ii) 6 से 18 वर्ष तक की शिक्षा : इसमें किशोरों को व्यायाम, अक्षरबोध, संगीत की शिक्षा शामिल है। प्लेटो ने इसे दो विषयों में समाहित किया है- (i) व्यायाम (Gymnastics) (ii) संगीत (Music) शिक्षा की यह योजना एथेनियन पाठ्यक्रम पर ही आधारित है जिसमें कुछ सुधार किए गए हैं।
  1. व्यायाम : व्यायाम द्वारा शरीर को स्वस्थ बनाया जा सकता है। बार्कर के शब्दों में-”व्यायाम मस्तिष्क के लिए शरीर का प्रशिक्षण है।” प्लेटो ने इसमें शरीर की समस्त शिक्षा को शामिल किया है। इसमें खुराक, व्यायाम और चिकित्सा भी शामिल है। प्लेटो का उद्देश्य है कि व्यायाम द्वारा विद्यार्थियों को हृष्ट-पुष्ट बनाकर उन्हें रोगमुक्त रखा जाए। प्लेटो ने व्यक्ति के शारीरिक विकास के लिए सात्विक भोजन पर बल दिया है। नैटलशिप के शब्दों में- “शारीरिक प्रशिक्षण में खुराक का सादापन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण वस्तु है।” प्लेटो का मानना है कि जो व्यक्ति सादा भोजन करेगा, वह रोगमुक्त हो जाएगा। यदि नागरिक नियमित रूप से व्यायाम और सात्विक भोजन लेते रहेंगे तो वे कभी रोग की चपेट में नहीं आएँगे और उन्हें डॉक्टर की जरूरत नहीं होगी।
  2. संगीत : प्लेटो ने व्यायाम की तरह संगीत का भी व्यापक अर्थ में प्रयोग किया है। संगीत का अर्थ केवल गान-विद्या नहीं है। बार्कर के अनुसार- “यह मन के सामान्य प्रशिक्षण का मार्ग है।” प्लेटो के शिक्षा सिद्धान्त में काव्य, साहित्य, इतिहास, गीत व नृत्य, चित्राकला, मूर्तिकला आदि सभी आ जाते हैं। प्लेटो के अनुसार संगीत मन को उसी तरह साधता है, जिस प्रकार व्यायाम शरीर को। काव्य, संगीत व मूर्तिकला का प्रभाव व्यापक होता है। इनकी ओर व्यक्ति स्वत: ही आकृष्ट होता है और अपने जीवन में नवजात शक्ति का अनुभव करता है। प्लेटो के अनुसार, संगीत शिक्षा द्वारा मनुष्य के शौर्यत्व पर संयम कायम रखा जाता है तथा बौद्धिक गुणों को बाहर निकला गया है। यह आत्मा का विकास करता है। अत: प्लेटो ने उसी संगीत का समर्थन किया है जो न्यायपरायणता के भाव भरे। प्लेटो ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा में सत् साहित्य को भी शामिल किया है। उसके अनुसार जो साहित्य व्यक्ति के उज्ज्वल चरित्रा, गुरुजनों तथा माता-पिता के प्रति आदर, भ्रातृ-भाव, साहस, सत्यप्रियता, आत्मसंयम आदि गुणों का विकास करता हो सत् साहित्य कहलाने का अधिकारी है। जो साहित्य भय, क्रोध, घृणा, पथभ्रष्टता आदि बुराइयों को बढ़ावा दे उसे छोड़ देना चाहिए। प्लेटो ने जन उपयोगी कविता को ही महऋत्त्व दिया है। वह देवमन्त्रा (Hymns to the Gods) तथा यशस्वी व्यक्तियों की प्रशस्तियाँ ही अपनी कविता में शामिल करना चाहता है, अन्य नहीं। कविता की ही तरह वह नाटक पर रोक लगाने का पक्षधर है। प्लेटो ने धर्म सुधार और साहित्यिक आलोचना का ही सूत्रापात किया है। प्लेटो ने धर्म, विश्वास और साहित्य के सही स्वरूप की रक्षा के लिए सुधार और आलोचना के तरीके अपनाए हैं। प्लेटो ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा में वाद्ययन्त्रों के चयन पर काफी जोर दिया है। वह नगरवासियों के लिए ‘लिरे’ (Lyre) तथा हार्प (Harp) को तथा ग्रामवासियों के लिए ‘पाइप’ (Pipe) को उचित ठहराया है। उसने वंशी को स्वीकृति प्रदान नहीं की है। प्लेटो संगीत के प्रभाव को शाश्वत मानता है। वह राग-रागनियों को सावधानीपूर्वक संगीत में शामिल करने की बात करता है। वह सरल लय व ताल को अपनाने की बात करता है। प्लेटो का कहना है कि सुरताल को सरल भेदों तक ही सीमित होना चाहिए। वह संगीत कभी भी मान्य नहीं हो सकता जिसमें न्याय की प्रभुत्वमयी छवि प्रतिबिम्बित नहीं हो।
(iii) 18 से 20 वर्ष तक की शिक्षा : प्लेटो इस अवधी के दौरान या 2 वर्ष तक सैनिक शिक्षा का प्रावधान करता है। इससे विद्यार्थियों में साहस, आत्म-नियन्त्रण तथा अनुशासन की प्रवृत्ति बढ़ेगी और वे राज्य की रक्षा करने के योग्य बनेंगे। यह शिक्षा राज्य की सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण होगी।

2. उच्चस्तरीय शिक्षा

प्लेटो ने उन विद्यार्थियों के लिए जो प्राथमिक स्तर पर प्रतिभावान होते हैं, उच्च शिक्षा का प्रावधान किया है। शेष प्राथमिक स्तर की शिक्षा प्राप्त विद्यार्थियों को सैनिक वर्ग में स्थान दिया जाता है। प्लेटो ने उच्च शिक्षा के दो स्तर निर्धारित किए हैं :- (क) 20 से 30 वर्ष तक। (ख) 30 से 35 वर्ष तक।

(क) 20 से 30 वर्ष तक की आयु के लिए शिक्षा : प्लेटो ने इस वर्ग के विद्यार्थियों के लिए चार विषयों - अंकगणित, रेखागणित, ज्योतिशास्त्र तथा स्वर-विद्या को स्थान दिया है। प्लेटो ने इस आयु में जिन विषयों के अध्ययन पर जोर दिया है, वे वैज्ञानिक अध्ययन के प्रतीक माने गए हैं। प्लेटो मानव आचरण और विकास के सन्दर्भ में विज्ञान को बहुत महत्त्व प्रदान करता था। प्लेटो ने सबसे अधिक महत्त्व अंकगणित को दिया है। उसके बाद रेखागणित, ज्योतिशास्त्र व स्वर-विद्या के अध्ययन पर भी बहुत जोर दिया है।

(ख) 30 से 35 वर्ष तक की आयु के लिए शिक्षा : 20 से 30 वर्ष की आयु में वैज्ञानिक शिक्षा के बाद एक परीक्षा का आयोजन करके गिने-चुने विद्यार्थियों को 30 से 35 वर्ष की आयु में द्वन्द्व और दर्शन (Dialectic and Philosophy) की शिक्षा दी जाएगी। कवायर ने कहा है- “दर्शन प्रौढ़ अवस्था के लिए है, युवावस्था के लिए नहीं।” प्लेटो ने द्वन्द्वात्मकता को गणित से भी बढ़कर माना है।

हम द्वन्द्वात्मक को तर्कशास्त्र, तत्त्वमीमांसा या सीधे दर्शन का नाम दे सकते हैं। इसमें केवल मनोविज्ञान का ही अध्ययनन न होकर, सत्ता के आदि और अन्त, सत्ता के कारण व ज्ञान का लक्ष्य का अध्ययन होता है। यहाँ प्लेटो का सत्ता से तात्पर्य उस नियामक शक्ति से है जो इस ब्राह्माण्ड का संचालन करती है और सद् का अस्तित्व कायम करती है। प्लेटो के अनुसार- “द्वन्द्वात्मकवादी वह है जो प्रत्येक वस्तु को निचोड़ की सम्बोधन तक पहुँचाता है और श्रेय के भाव का दर्शन कर लेता है।” यद्यपि ग्रीक जगत् में द्वन्द्वात्मकता का सिद्धान्त सत्य तक पहुँचने के लिए और उसे साक्षात् करने के लिए एक प्रभावशाली साधन था लेकिन फिर भी इसे समझना कठिन होने के कारण सभी लोग इसे समझने में अयोग्य होते थे। यह सिद्धान्त श्रेष्ठ बुद्धि वाले उन लोगों की ही समझ में आ सकता था जो सद्गुणी होते थे। इसे समझने का अथक प्रयास करते थे।

अत: प्लेटो की शिक्षा प्रणाली इस बात का संकेत है कि एक तरफ तो प्लेटो का राज्य नागरिकों में सामाजिकता का भाव जागृत करके शरीर और मन को स्वस्थ व शुद्ध भाव में राज्य की रक्षा का भार सौंपना चाहता है और दूसरी तरफ वह एक ऐसे दार्शनिक शासक का निर्माण करना चाहता है जो सद्गुणी होकर निष्पक्ष रूप से शासन करते हुए प्रजा में तालमेल व संतुलन बनाए रख सके।

प्लेटो की यह शिक्षा सैद्धान्तिक पक्ष से सरोकार रखती है, व्यावहारिक पक्ष से नहीं। अत: प्लेटो ने आगामी 15 वर्षों तक जीवन की पाठशाला में कठिनाइयाँ झेलकर व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था की है। प्लेटो का मानना है कि 50 वर्ष की आयु में ही दार्शनिक शासक बनने की प्रक्रिया पूरी होती है और उसे शासक वर्ग में शामिल कर लिया जाता है। अब यह राज्य का संचालन संभालकर भावी पीढ़ी की शिक्षा योजना का संचालन करता है और अपने उत्तराधिकारी तैयार करता है। 50 वर्ष के बाद भी व्यक्ति के आत्म-साक्षात्कार तथा अन्तिम सत्य की खोज के लिए शिक्षा चलती रहती है। आयु के बढ़ने के साथ-साथ राजनीति का क्षेत्र खाली होता जाता है और स्वयं अन्तिम सत्य के अन्वेषण में लग जाते हैं।

प्लेटो की शिक्षा प्रणाली की विशेषताएँ

  1. चरित्र निर्माण  पर बल : प्लेटो की शिक्षा का उद्देश्य नागरिकों को अच्छे या सद्गुणी बनाकर उन्हें राज्य के प्रति नि:स्वार्थ सेवा की भावना जगाना है। प्लेटो शिक्षा को एक ऐसा विद्यात्मक साधन मानता है जो नागरिकों का चरित्र निर्माण करती है।
  2. राज्य द्वारा नियन्त्रित तथा अनिवार्य शिक्षा : प्लेटो शिक्षा को व्यक्तिगत क्षेत्र में नहीं छोड़ना चाहता। वह शिक्षा पर राज्य के नियन्त्रण का पक्षधर है। प्लेटो का मानना है कि राज्य के नियन्त्रण के अभाव में शिक्षा व्यक्तिगत हितों की ही पोषक होगी, सामाजिक हितों की नहीं। प्लेटो ने शिक्षा प्राप्त करना प्रत्येक परिवार व व्यक्ति के लिए अनिवार्य कर दिया है। राज्य की ओर से शिक्षा की अनिवार्य व्यवस्था हो गई है।
  3. कला और साहित्य पर नियन्त्रण : प्लेटो काव्य और साहित्य पर कठोर नियन्त्रण का पक्षधर है। प्लेटो का उद्देश्य गन्दे साहित्य का निर्माण रोकना है। उसका उद्देश्य युवकों को बुरे रास्ते से हटाकर सद्मार्ग पर चलाना है ताकि वे अच्छे नागरिक बन सकें।
  4. स्त्री-पुरुष दोनों के लिए समान शिक्षा : प्लेटो की शिक्षा योजना स्त्री और पुरुष दोनों के लिए है। प्लेटो स्त्री-पुरुष में कोई स्वाभाविक अन्तर नहीं मानता है। वह इस दृष्टि से एथेन्स की शिक्षा प्रणाली का दोष दूर कर देता है क्योंकि उस समय एथेन्स में केवल पुरुषों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त था। प्लेटो का विश्वास था कि स्त्रिया भी राज्य को शक्तिशाली बनाने में योगदान दे सकती हैं। इसलिए दोनों को समान व अनिवार्य शिक्षा मिलनी ही चाहिए।
  5. शिक्षा राज्य के कर्त्तव्य के रूप में : अपने आदर्श राज्य में व्यक्ति को गुणी से सामाजिक बनाने के लिए शिक्षा को अनिवार्य माना है अर्थात् शिक्षा व्यक्ति तथा समाज दोनों का निर्माण करती है। अत: प्लेटो शिक्षा को निजी हाथों में न सौंपकर राज्य को सौंपता है। प्लेटो का उद्देश्य योजनाबद्ध तरीके से नागरिकों में कर्त्तव्यभावना पैदा करके उन्हें समाज के अनुरूप बनाना है। सेबाइन ने लिखा है- “प्लेटो की राज्य नियन्त्रित शिक्षा प्रणाली एथेन्स की शैक्षणिक कार्यशैली का नया परिवर्तन था।”
  6. शिक्षा मानसिक रोग का मानसिक उपचार है : प्लेटो सारी बुराई की जड़ अज्ञानता को मानता है। उसका कहना है कि शिक्षा द्वारा ही बुराइयों का अन्त किया जा सकता है। शिक्षा व्यक्ति के स्वभाव को राज्य के उद्देश्य के अनुकूल बदलत सकती है। बार्कर के अनुसार- “शिक्षा मानसिक रोग के उपचार के लिए एक मानसिक औषधि है।” अर्थात् यह मानसिक रोग का मानसिक उपचार है।
  7. नैतिक विकास पर बल : प्लेटो की शिक्षा योजना ‘सद्गुण ही ज्ञान है’ के सिद्धान्त को स्वीकार करके व्यक्ति के नैतिक विकास की परिस्थितियाँ पैदा करती है। प्लेटो कला व साहित्य के ऐसे अंशों पर प्रतिबन्ध लगाने का पक्षधर है जो नागरिकों के नैतिक गुणों का Ðास करते हों।
  8. सर्वांगगीण विकास पर बल  : प्लेटो की शिक्षा प्रणाली व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक तीनों पक्षों के पूर्ण विकास पर बल देती है। प्लेटो की शिक्षा योजना व्यक्ति के प्रत्येक सद्गुण को विकसित करने का प्रयास करती है।
  9. शिक्षा केवल उच्च वर्ग के लिए : प्लेटो की शिक्षा प्रणाली में उत्पादक वर्ग के लिए शिक्षा का कोई पाठ्यक्रम ही नहीें है। प्लेटो की शिक्षा का मुख्य उद्देश्य राजनेताओं का निर्माण करना है जिससे आदर्श राज्य का सपना साकार हो सके। अत: प्लेटो संरक्षक वर्ग के लिए शिक्षा की व्यवस्था करने का पक्षपाती है।
  10. शिक्षा-योजना मनोवैज्ञानिक तत्त्वों पर आधारित है: प्लेटो ने मानव स्वभाव की प्रवृत्तियों और आत्मा के तीन तत्त्वों के अनुकूल ही अपनी शिक्षा व्यवस्था को आधारित किया है।
  11. शिक्षा का पाठ्यक्रम आयु-भेद व वर्ग-भेद पर आधारित : प्लेटो ने शिक्षा प्रणाली के दो भाग किए हैं - प्राथमिक व उच्च शिक्षा। दोनो शिक्षा स्तरों का आधार आयु व वर्ग-भेद है। प्रारम्भिक शिक्षा नौजवानों के लिए जबकि उच्च शिक्षा प्रौढ़ावस्था का प्रशिक्षण है तथा शासक वर्ग का भी इसमें गणित, तर्क, दर्शन व विज्ञान का ज्ञान दिया जाता है।
  12. प्लेटो की शिक्षा में सीखने की प्रक्रिया सरल से जटिल की और : प्लेटो की शिक्षा व्यवस्था में पाठ्यक्रम सरलता से जटिलता की आरे बढ़ता है। शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर पर संगीत, साहित्य, व्यायाम आदि सरल विषय पढ़ाए जाते हैं, परन्तु बीस वर्ष के बाद गणित, विज्ञान आदि कुछ जटिल विषय और अन्त में 30 वर्ष बाद द्वन्द्व व दर्शन का ज्ञान कराया जाता है।
  13. शिक्षा आजीवन प्रक्रिया : प्लेटो की शिक्षा योजना जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। 35 वर्ष से 50 वर्ष तक मनुष्य दार्शनिक व व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करता है। उसके बाद अन्तिम सत्य की खोज करता है। अत:यह आजीवन प्रक्रिया है।
  14. दार्शनिक शासक के लिए प्रशिक्षण : प्लेटो की शिक्षा का उद्देश्य एक ऐसे दार्शनिक शासक का निर्माण करना है जो सर्वगुणसम्पन्न हो और सैनिक व उत्पादक वर्ग पर समाज हित में पूर्ण नियन्त्रण व सभी वर्गों में एकता व सामंजस्य कायम रख सके।
  15. शिक्षा में गणित को महत्त्व : प्लेटो की शिक्षा योजना में सबसे अधिक महत्त्व गणित को दिया गया है। प्लेटो ने अपनी अकादमी के बाहर दरवाजे पर ये शब्द लिखे थे- “जिसे अंकगणित का ज्ञान नहीं, वह इसमें प्रवेश नहीं कर सकता।” अत: प्लेटो ने सर्वाधिक महत्त्व गणित को दिया है।

आलोचनाएँ

प्लेटो के शिक्षा सिद्धान्त की आलोचना के आधार हैं :-
  1. शिक्षा मात्रा अभिभावक वर्ग के लिए : प्लेटो शिक्षा को महान् वस्तु मानता है और उसे आदर्श राज्य का आचार बताता है किन्तु उसने समस्त नागरिकों के लिए शिक्षा का प्रबन्ध न करके केवल अभिभावक वर्ग (सैनिक व दार्शनिक वर्ग) के लिए ही शिक्षा की योजना प्रस्तुत की है। इस प्रकार उसकी शिक्षा योजना कुलीनतन्त्रावादी है जिसे आधुनिक दृष्टि से अप्रजातािन्त्राक कहा जाएगा। सेबाइन ने कहा है- “राज्य में शिक्षा के महत्त्वपूर्ण स्थान को देखकर यह आश्चर्यजनक प्रतीत होता है कि प्लेटो शिल्पियों (उत्पादक वर्ग) के लिए शिक्षा के सम्बन्ध में कोई विचार नहीं करता।” अत: यह सिद्धान्त अभिजातवर्ग का ही पोषक है।
  2. उत्पादक वर्ग की उपेक्षा : प्लेटो की शिक्षा प्रणाली संकुचित है। प्लेटो ने बहुसंख्यक उत्पादक वर्ग की पूर्ण उपेक्षा की है। प्लेटो के न्याय सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक वर्ग, जिसमें उत्पादक वर्ग भी एक है, को अपने समस्त कार्य विशिष्टता के साथ करने चाहिएं। किन्तु प्लेटो यह भूल जाता है कि उत्पादक वर्ग बिना शिक्षा व प्रशिक्षण के अभाव में कार्य-कौशल व विशेषज्ञता कैसे प्राप्त करेंगे। अत: प्लेटो द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में उत्पादक वर्ग की अपेक्षा न्याय के सिद्धान्त के विपरीत है।
  3. डॉक्टर एवं वकीलों का बहिष्कार : प्लेटो ने अपने राज्य से डॉक्टरों ओर सभी अदालती संस्थाओं का बहिष्कार किया है। उसके अनुसार व्यायाम और संगीत के प्रशिक्षण से नागरिक के शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहेंगे और इस प्रकार शारीरिक और मानसिक रोगों के होने की गुंजाइश ही नहीं रहेगी। आलोचकों ने कहा है कि प्लेटो ने अपनी शिक्षा प्रणाली यह ही भरोसा किया है, डॉक्टरों व वकीलों पर नहीं।
  4. साहित्य की उपेक्षा: प्लेटो ने अपनी शिक्षा योजना में गणित को अधिक तथा साहित्य को कम महत्त्व दिया है। साहित्य जीवन व समाज का दर्पण है और मानव की कोमन भावनाओं को विकसित कर उसके दृष्टिकोण को व्यापक करता है।
  5. कला और साहित्य पर कठोर नियन्त्रण : काव्य और साहित्य पर कठोर प्रतिबंध लगाना उचित नहीं होता। इससे स्वतन्त्रा कलात्मक प्रवृत्ति मुरझा सकती है और उस पर विध्वंसकारी प्रभाव पड़ सकता है। कला और साहित्य का विकास स्वतन्त्रा वातावरण में ही हो सकता है। बार्कर के शब्दों में- “एक नैतिक उद्देश्य के लिए राज्य के पास में जकड़ी हुई कला मानव की भावनाओं को स्पर्श नहीं कर सकती और जो कला विशुद्ध कला के रूप में श्रोता या पाठक की भावनाओं को गुदगुदा नहीं सकती, वह उसके आधार को भी प्रभावित नहीं कर सकती।” 
  6. शिक्षा क्रम लम्बा और खर्चीला है : प्लेटो का शिक्षा-क्रम इतना लम्बा और खर्चीला है कि इसको धनी-वर्ग ही ग्रहण कर सकता है। 35 वर्ष तक लगातार अध्ययन से ज्ञान का उत्साह कम हो जाता है और लोगों में इसके प्रति आकर्षण समाप्त हो जाता है। यह राज्य की व्यक्ति के ऊपर जबरदस्ती थोपी गई इच्छा है।
  7. पुरुषों व स्त्रियों की प्रकृ्रति और भावना में अन्तर : प्लेटो ने सभी पुरुषों एवं स्त्रियों के लिए एक ही प्रकार का पाठ्यक्रम निश्चित किया है। दोनों के स्वभाव एवं भावनाओं में अन्तर होने के कारण दोनों के पाठ्यक्रम में अन्तर होना आवश्यक है। प्लेटो ने दोनों के लिए समान शिक्षा व्यवस्था करने की भारी भूल है।
  8. शिक्षा-योजना में विरोधाभास : एक ओर तो प्लेटो शिक्षा व्यवस्था को आदर्श राज्य का आधार मानता है, दूसरी तरफ राज्य का नियन्त्रण स्थापित करता है। यदि उचित शिक्षा के द्वारा आदर्श राज्य की स्थापना हो सकती है तो राज्य का शिक्षा पर नियन्त्रण ठीक नहीं है। प्लेटो कहता है कि उचित शिक्षा की व्यवस्था राज्य द्वारा ही हो सकती है, लेकिन दूसरी ओर शिक्षा व्यवस्था आदर्श राज्य की स्थापना के बाद प्रारम्भ होती है। अत: प्लेटो के दृष्टिकोण में विरोधाभास है। बार्कर के अनुसार- “प्लेटो के शिक्षा सिद्धान्त में कार्य सम्बन्धी आदर्श तथा चिन्तन सम्बन्धी आदर्श के बीच एक प्रकार की डगमगाहट पाई जाती है।”
  9. तकनीकी शिक्षा का कोई प्रावधान नहीं : प्लेटो ने अपनी शिक्षा योजना में तकनीकी शिक्षा का कोई प्रावधान नहीं किया है जो आज के औद्योगिक और तकनीकी विकास के लिए आवश्यक है। तकनीकी विकास के बिना किसी भी राज्य का आर्थिक विकास नहीं हो सकता।
  10. अनावश्यक एकरूपता का दोष : प्लेटो ने अपनी शिक्षा योजना में सदैव के लिए एक स्थायी और अपरिवर्तनशील पाठ्यक्रम निश्चित किया है। परन्तु वह मानव स्वभाव की रुचि की विविधता को भूल जाता है जिससे वैचारिक संकीर्णता बढ़ती है।
  11. शिक्षा योजना में अधिनायकवाद : प्रो0 अल्फ्रेड हार्नले के अनुसार प्लेटो के शिक्षा सिद्धान्त में अधिनायकतन्त्रा के बीज छिपे हैं। फासीवादी, नाजीवादी और साम्यवादी के समान प्लेटो का राज्य भी शिक्षा पर पूर्ण नियन्त्रण रखता है, कला और साहित्य पर कठोर प्रतिबन्ध लगाता है, शासन के अनुरूप व्यक्ति के व्यक्तित्व को ढालता है एवं व्यक्ति को अपनी प्रतिभा को स्वतन्त्रा रूप से मुखरित करने से वंचित करता है।
  12. व्यक्तित्व का स्वतन्त्रा विकास नहीं : प्लेटो ने व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास राज्य के हित के अनुकूल किया है। प्लेटो ने राज्य के हितों पर व्यक्ति के हितों की बलि चढ़ाकर व्यक्ति के व्यक्तित्व की स्वतन्त्रता पर ध्यान नहीं दिया है। पापर के अनुसार- “प्लेटो की शिक्षा का उद्देश्य आत्म-समीक्षा करना एवं समीक्षात्मक विचारों को जगाना नहीं, अपितु मत-शिक्षण है - मस्तिष्क और आत्मा के एक ऐसे साँचे में ढालना है कि वे स्वतन्त्रा रूप से कुछ करे के योग्य न हो सकें। 

प्लेटो की शिक्षा सिद्धान्त का महत्त्व

प्लेटो के सिद्धान्त की अनेक आलोचनाएँ हुर्इं फिर भी उसका बहुत महत्त्व है। प्लेटो के विचार आधुनिक युग के लिए भी सत्य है। आधुनिक युग में भी स्त्रियों की शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है, यह प्लेटो की देन है। मानसिक विकास के साथ-साथ शारीरिक शिक्षा पर भी आज जोर दिया जा रहा है। आज विश्व के अनेक देशों में खराब साहित्य पर राज्य रोक लगाता है। प्लेटो के शिक्षा सिद्धान्त के महत्त्व हैं :-
  1. प्लेटो पहला चिन्तक है जिसने यह बताया कि शिक्षा का सम्बन्ध केवल जीवन के किसी एक निश्चित काल से न होकर समस्त जीवन से है। प्लेटो ने आजीवन शिक्षा की व्यवस्था की है।
  2. प्लेटो ने शिक्षा को आजीवन व निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया बताया है। यह सिर्फ मानसिक नहीं, धार्मिक, नैतिक और शारीरिक भी है; संकीर्ण नहीं, सर्वांगीण हैं, सैद्धान्तिक नहीं, व्यावहारिक भी है।
  3. प्लेटो उचित आयु के लिए उचित शिक्षा की व्यवस्था करता है।
  4. प्लेटो की शिक्षा का उद्देश्य शरीर और मस्तिष्क दोनों का विकास करना है।
  5. प्लेटो का प्राथमिक स्तर पर शिक्षा की अनिवार्य व्यवस्था आज के राज्यों में भी पाई जाती है। यह प्लेटो के सिद्धान्त का अनुसरण है।
मैक्सी के अनुसार- “प्लेटो की शिक्षा योजना अनेक दृष्टियों से आश्चर्यजनक रूप में आधुनिक लगती है।” प्लेटो ने शिक्षा पर जो बल दिया है तथा शिक्षा का जो व्यापक महत्त्व बताया है। उसके लिए संसार उस महान् शिक्षा-शास्त्री का सदैव ऋणी रहेगा। जावेट का सारगर्भित कथन है- “प्लेटो पहला लेखक है जो स्पष्ट रूप से कहता है कि शिक्षा का क्रम आजीवन चलना चाहिए।” अत: प्लेटो का शिक्षा सिद्धान्त राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में एक अमूल्य एवं बहुत ही महत्त्वपूर्ण देन है।

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