प्रशिक्षण का अर्थ, परिभाषा, प्रकार एवं विधियाँ

By Bandey No comments
अनुक्रम

प्रशिक्षण का अर्थ एवं परिभाषा

  1. फिलिप्पों के अनुसार, ‘‘प्रशिक्षण किसी विशेष कार्य को करने के लिए एक कर्मचारी के ज्ञान एवं
    कौशल में रूचि उत्पन्न करता है।’’
  2. जूसियस के अनुसार, ‘‘प्रशिक्षण एक ऐसी क्रिया है जिसके द्वारा विशेष कार्यो को करने के लिए
    कर्मचारियों की रूचि, योग्यता और निपुणता में वृद्धि की जाती है।
  3. डेल एस0 ब्रीच के अनुसार, ‘‘प्रशिक्षण एक ऐसी संगठित क्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति एक निश्चित
    उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ज्ञान अथवा चातुर्य सीखते है।’’

प्रशिक्षण की विशेषताएँ

  1. प्रशिक्षण एक पूर्ण व्यवस्थित, नियोजित एवं निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।
  2. प्रशिक्षण से कर्मचारी की कार्य-कुशलता बढ़ती है जिसके फलस्वरूप वह कार्य में
    पूर्णता एवं दक्षता प्राप्त कर लेता है।
  3. प्रशिक्षण चातुर्य और ज्ञान के विकास का एक साधन है।
  4. प्रशिक्षण कर्मचारी और संगठन दोनों के ही हित में है।
  5. प्रशिक्षण पर किया गया व्यय अपव्यय नहीं अपितु विनियोग है।
  6. प्रशिक्षण शिक्षा से भिन्न होता है।

प्रशिक्षण की आवश्यकता

  1. नवीन कर्मचारियों को उस काम का प्रशिक्षण देना आवश्यक है जो उनके लिए नया
    है तथा जिसका उन्हें व्यावहारिक ज्ञान नहीं है।
  2. विश्वविद्यालय की शिक्षा सैठ्ठान्तिक ज्ञान की ठोस नींव तो डाल देती है, किन्तु विभिन्न
    कार्यो के निष्पादन हेतु व्यावहारिक ज्ञान व विशिष्ट योग्यता की आवश्यकता होती है
    जो प्रशिक्षण द्वारा ही पूरी की जा सकती है।
  3. सामान्यत: कारखानों मे काम के तरीके बदलते रहते हैं तथा कर्मचारी भी एक कार्य
    से दूसरे कार्य पर जाते रहते है, अत: नवीन दायित्व के कुशल निष्पादन के लिए
    प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।
  4. उत्पादन की नवीन विधियाँ व तकनीक का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षण एक
    अनिवार्यता है।
  5. ‘‘कला’’ की प्रबन्धकीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी प्रशिक्षण आवश्यक है।
    6ण् देश में व्यावसायिक गतिशीलता बढ़ गयी है, क्योकिं स्थान-स्थान पर रोजगार के
    अवसरों में वृठ्ठि हो रही है। अत: विभिन्न स्तरों पर प्रशिक्षण की माँग बढ़ रही है।
  6. निम्न स्तर से उच्च पर कर्मचारियों की पदोन्नति के लिए प्रशिक्षण आवश्यक होता है।

प्रशिक्षण के लाभ

  1. अच्छे प्रशिक्षण का उद्देश्य कर्मचारी को कार्य की श्रेष्ठ पठ्ठतियों में दक्ष बनाना है। इससे
    कच्चे माल तथा साजो-सामान का सही तथा मितव्ययी उपयोग किया जाता है।
  2. प्रशिक्षण से कर्मचारी की कुशलता बढ़ती है, इससे वह अधिक और अच्छा उत्पादन
    करता है।
  3. प्रशिक्षित कर्मचारी अपने-अपने काम में निपुण तथा दक्ष होते है, प्रबन्धकों को अपना
    अधिकांश समय इनके कार्य की देख-रेख करने में नहीं लगाना पड़ता।
  4. प्रशिक्षण उपयोग की सही विधियां है। फलस्वरूप इससे दुर्घटनाओं की सम्भावना कम
    हो जाती है।
  5. अच्छे प्रशिक्षण से कर्मचारियों में कार्य-सन्तुष्टि अर्थात् अपना कार्य अच्छे और
    संतोषजनक ढंग से करने की प्रसन्नता होती है।
  6. प्रशिक्षण के दौरान प्रबन्धक कर्मचारियों के चुनाव की जांच कर सकते है। यदि कोई
    कर्मचारी अधिक कुशल तथा योग्य है तो वह अपने कार्य को अधिक आसानी से सीख
    लेगा।
  7. निरन्तर प्रशिक्षण के फलस्वरूप कर्मचारियों में नए-नए सुधारों तथा विधियों को
    सीखने तथा उनके अनुसार कार्य करने की योग्यता बढ़ जाती है। फलत: संस्था को
    नवीनतम पठ्ठतियों को लागू करने में कठिनाई नहीं होती।
  8. प्रशिक्षण से कर्मचारियों का न केवल विकास होता है, बल्कि वे अपने से ऊँचे पदों को
    सम्भालने के योग्य भी हो जाते है। इससे उनको पदोन्नति में सहायता
    मिलती है।

प्रशिक्षण के सिद्धान्त

विभिन्न प्रकार के व्यवसायों के लिए प्रशिक्षण के सर्वमान्य सिद्धान्तों की सूची तैयार करना, यदि
असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य प्रतीत होता है। प्रत्येक व्यवसाय की अपनी विशेषता होती है
जिसका व्यवसाय में दिए जाने वाले प्रशिक्षण की प्रकृति पर गहरा प्रभाव पड़ता है। प्रशिक्षण के सिद्धान्त है, जिनका प्रयोग व्यवसाय में किया जा सकता है।

  1. प्रेरणा का सिद्धान्त – प्रत्येक, व्यक्ति (कर्मचारी) अपने
    जीवन में कुछ अभिलाषाएँ रखता है जैसे धनोपार्जन, पदोन्नति, प्रशंसा, प्रतिष्ठा आदि
    प्राप्त करने के लिए वह सदैव उत्सुक रहता है। यदि प्रशिक्षण के माध्यम से वह अपनी
    इन अभिलाषाओं को पूरा करना सरल समझता है तो उसे प्रशिक्षण के लिए सरलता
    से अभिप्रेरित किया जा सकता है।
  2. अभ्यास का सिद्धान्त – वास्तव में प्रशिक्षण की सफलता के
    लिए सैठ्ठान्तिक एवं व्यावहारिक दोनों प्रकार का ज्ञान आवश्यक है। अत: प्रशिक्षण
    प्राप्त करने वाले कर्मचारी को वास्तविक कार्य स्थितियों में अभ्यास करने का पर्याप्त
    अवसर दिया जाना चाहिए।
  3. प्रगति प्रतिवेदन का सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के
    अनुसार कर्मचारी को प्रशिक्षण की पूर्ण सूचना दी जानी चाहिए अर्थात् प्रशिक्षण प्राप्त
    करने वाले ने प्रशिक्षण काल में क्या-क्या सीखा है और कार्य के सम्बन्ध में उसकी क्या
    कठिनाई है।
  4. पूर्ण बनाम आंशिक प्रशिक्षण का सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के अनुसार इस बात का निर्णय किया जाता है कि
    कर्मचारियों को समपूर्ण कार्य का प्रशिक्षण दिया जाए अथवा कार्य के एक भाग का
    प्रशिक्षण दिया जाए। इस बात का निर्णय संस्था के साधनो, कार्य की प्रगति और
    कर्मचारियों की योग्यता के आधार पर किया जाता है।
  5. पुन: प्रवर्तन का सिद्धान्त- प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए अधिकाधिक कर्मचारियों को
    आकर्षित करने के लिए जिस उद्देश्य से प्रशिक्षण दिया गया था प्रशिक्षण की अवधि
    समाप्त होने पर उस उद्देश्य की पूर्ति की जानी चाहिए। उदाहरणार्थ, यदि वेतन में
    बढ़ाने की बात थी तो वेतन वृठ्ठि की जानी चाहिए और पदोन्नति की बात थी तो
    पदोन्नति होनी चाहिए।
  6. व्यक्तिगत गुणों का सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के
    अनुसार प्रशिक्षण देते समय जिन व्यक्तियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है उनके
    शारीरिक, मानसिक और बौठ्ठिक गुणों एवं योग्यताओं का पूरा-पूरा ध्यान रखना
    चाहिए।

प्रशिक्षण के प्रकार

प्रारम्भिक प्रशिक्षण –

कर्मचारी की नियुक्ति के बाद उसे कार्य
पर लगाने से पहले इस प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें कर्मचारी को संगठन
के उद्देश्यों, इतिहास, नियमों, निर्णयों तथा अवसरों से परिचित कराया जाता है। इस
प्रशिक्षण के तीन उद्देश्य है:

  1. सेवा की शर्तो को परिभाषित करना,
  2. नए कर्मचारियों को अपने कार्य की आवश्यकता के बारे में विस्तारपूर्वक
    जानकारी देना।
  3. ऐसा प्रयत्न करना कि कर्मचारी में उपक्रम के प्रति स्वयं अपने काम करने की
    योग्यता का विश्वास पैदा हो।

कार्य प्रशिक्षण – 

इसका उद्देश्य कर्मचारियों को काम करने की
श्रेष्ठतम प्रणाली सिखाना और उपलब्ध माल तथा साजो-सामान के कुशलतम उपयोग
में दक्ष बनाना है। ऐसे प्रशिक्षण में कर्मचारियों को कार्य से सम्बन्धित पूरी प्रक्रिया में
प्रशिक्षित किया जाता है, जिससे वे उत्पादन-प्रक्रिया में स्थान-स्थान पर काम के
एकित्रात हो जाने से पैदा होने वाले गतिरोध की समस्या को आसानी से समझ सके
और उससे बचने की व्यवस्था कर सकें। इससे दुर्घटनाओं की सम्भावना भी कम हो
जाती है।

पुर्नाभ्यास प्रशिक्षण –

योडर के शब्दों में, ‘‘इसका उद्देश्य
पुराने कर्मचारियों को काम करने की पठ्ठति फिर से सिखाना है, जिससे वे समय के
बीतने के साथ अपने पुराने प्रशिक्षण में सीखे गए ज्ञान को, भूल जाने पर फिर से ताजा
कर सकें।’’ यह प्रशिक्षण निश्चय: ही पुराने प्रशिक्षण की तुलना में कम अवधि में ही
पूरा किया जाता है। कभी-कभी इस प्रशिक्षण में पुराने कर्मचारियों को नए-नए
तरीकों से भी परिचित और प्रशिक्षित कराया जाता हैं।

पदोन्नति के लिए प्रशिक्षण – 

अधिकाशं संस्थाएँ अपने
यहाँ उच्च पदों पर नियुक्ति अपने ही योग्य अधिकारी को पदोन्नति देकर करती है।
कर्मचारियों को प्रेरणा देने की यह एक महत्वपूर्ण विधि है। लेकिन कर्मचारियों को
निम्न पदों से उच्चतर पदों पर पदोन्नति देते समय, उन्हें नए पदों की जिम्मेदारियों तथा
बारीकियों के बारे में प्रशिक्षित कराना अनिवार्य है। प्रशिक्षण के बल पर ही वे नए
वातावरण और अपने उत्तरदायित्व में कुशल तथा सफल सिठ्ठ हो सकेंगे।

प्रशिक्षण की कार्यविधि

  1. प्रशिक्षण कार्य को पूरा करने के लिए एक समय सारणी  तैयार की
    जानी चाहिए। उसी के अनुसार कार्य प्रारम्भ करना चाहिए जिसमे प्रशिक्षणाथ्र्ाी द्वारा
    अर्जित किया गया ज्ञान प्रमापित हो सके।
  2. कार्य का विभाजन प्रमुख क्रियाओं के मध्य होना चाहिए। कार्य विश्लेषण और कार्य
    विवरण प्रशिक्षण से पूर्व की अवस्थाएँ है।
  3.  प्रशिक्षण के स्थान की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे समय पर कोई कठिनाई
    न हो।
  4. प्रशिक्षण के लिए सभी आवश्यक सामग्री शीघ्र सुलभ होनी चाहिए।
  5. प्रशिक्षण देने वाले और प्रशिक्षण पाने वाले की तैयारी की जाँच की जानी चाहिए।
  6. इसके बाद जो कार्य किया जाना है उसकी स्वयं की भी जांच होनी चाहिए।
  7. सभी प्रकार की आवश्यकता व्यवस्था और जांच के बाद कर्मचारी को स्वतन्त्र रूप से
    कार्य पर छोड़ दिया जाना चाहिए जिससे वह स्वयं भी कार्य कर सके। आवश्यकता
    पड़ने पर किसी की सहायता भी सुलभ कराई जा सकती है, जिससे की वह स्वयं कार्य
    में दक्षता प्राप्त कर ले।

प्रशिक्षण की विधियाँ

अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से प्रशिक्षण की विधियों को  तीन वर्गो में बाँटा जा सकता
है –

प्रशिक्षण की सामान्य प्रणालियाँ

  1. कार्य पर प्रशिक्षण
  2. कार्य से पृथक प्रशिक्षण
  3. शिक्षाथ्र्ाी या अप्रेंटिस प्रशिक्षण
  4. संयुक्त प्रशिक्षण
  5. प्रशिक्षण केन्द्रों में प्रशिक्षण

प्रबन्ध अधिकारियों का प्रशिक्षण

  1. कार्य पर प्रशिक्षण
  2. कार्य से पृथक प्रशिक्षण

पर्यवेक्षकों का प्रशिक्षण

  1. कारखाने में प्रशिक्षण
  2. प्रशिक्षण संस्थान में प्रशिक्षण

अत: प्रशिक्षण वह महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो HRM का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम एवं साधन है आज के
वैज्ञानिक, तकनीकी एवं संचार के युग में कई संगठन इसे नजरअंदाज कर गातिमान संगठन की
श्रेणी में नहीं रह सकता।

Leave a Reply