शून्य आधारित बजट क्या है?

अनुक्रम [छुपाएँ]


शून्य आधारित बजट-प्रणाली का अर्थ

जीरो बेस बजटिंग की कई व्याख्याएं की जाती हैं। कुछ विद्वान यह मानते हैं कि यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें हर चीज को बाहर फेंक दिया जाता है और फिर नए सिरे से हर वस्तु को प्रारभ्भ से शुरू किया जाता है अथवा यह पहिए की फिर से खोज करना है। स्पष्टत: यह धारणा ठीक नहीं है। पीहर (Pyhrr) का कथन हैं कि व्यावहारिक शब्दावली में जीरो बेस बजटिंग का अर्थ सभी कार्यक्रमों का मूल्यांकन करना हैं। विकल्पों और कार्यक्रमों की उपलब्धि के मूल्यांकन पर कभी-कभी हमें फिर से पुनर्विचार करना होता है और एक कार्यक्रम को फिर से निर्देशित करना होता है। ऐसी स्थिति में जरूर हम हर वस्तु को बाहर फेंक देते हैं और पुन: फिर से प्रक्रिया शुरू करते हैं। किन्तु अधिकतर स्थितियों में कार्यक्रम जारी रहेंगे उनमें सुधारों और परिवर्तनों का समावेश कर लिया जाएगा, क्योंकि अधिकतर कार्यक्रमों में विश्लेषण का केन्द्र-बिन्दु कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावकारिता के मूल्यांकन और विभिन्न स्तरों पर जो प्रयास किए जा रहे हैं, उनकी प्राथमिकताओं और मूल्यांकन पर होगा।

जीरो बेस बजटिंग में जिन दो मूल प्रश्नों पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है, वे हैं :
  1. क्या वर्तमान क्रियाएं कुशल तथा प्रभावकारी हैं ?
  2. क्या वर्तमान क्रियाओं को समाप्त कर दिया जाए अथवा कम कर दिया जाए, ताकि उच्च प्राथमिकता वाले नए कार्यक्रमों को धन दिया जा सके अथवा वर्तमान बजट को कम कर दिया जाए। ZBB कार्य पद्धति में यह अनिवार्य है कि प्रत्येक संगठन अपने सभी कार्यक्रमों और क्रियाओं को चाहे वे चल रही हैं अथवा नई हैं, व्यवस्थित ढंग से उन पर पुनर्विचार करे और उनका मूल्यांकन करे, क्रियाओं पर पुनर्विचार उत्पादन अथवा उपलब्धि तथा लागत के आधार पर किया जाए, ताकि प्रबन्धकीय निर्णय करने पर बल दिया जा सके, संख्योन्मुख बजट बन सकें और विश्लेषण को बढ़ाया जा सके। ZBB एक दृष्टिकोण है। यह एक जड़ कार्यविधि नहीं है जिसको सभी संगठनों में समान रूप से लागू किया जा सके। इस प्रक्रिया को प्रत्येक संगठन की विशेष आवश्यकताओं के अनुकूल ढालना जरूरी होगा। किन्तु इस दृष्टिकोण के लिए चार मूल कदम हैं जो इस प्रकार हैं :
    1. निर्णय करने वाली इकाइयों की पहचान करना।
    2. ‘‘निर्णय समूह’’ में प्रत्येक निर्णय इकाई का विश्लेषण करना।
    3. सभी निर्णय समूहों का मूल्यांकन तथा श्रेणीकरण करना, ताकि खर्चे के लिए प्रार्थना की जा सके।
    4. विस्तृत परिचालन बजट तैयार करना जिनमें वह निर्णय-समूह प्रतिबिम्बित हों जिनको बजट के खर्चे में स्वीकृति दे दी गई है।
संगठन में प्रत्येक बजट इकाई को विभिन्न स्तरों के वित्तीय बंटवारे के लिए आकस्मिकताओं का विकार करना होगा। वित्तीय बंटवारे का अधिकतम मूल स्तर बचे रहने का न्यूनतम खर्च, (जिसे सर्वाईवल पैकेज कहते हैं), होगा-अर्थात वित्तीय बंटवारे का वह न्यूनतम स्तर जो संगठन के जीवित रहने के लिए और अपनी मौलिक सेवाओं को उपलब्ध कराने के लिए चाहिए, संगठन की इकाइयों को यह भी पूछा जा सकता है कि यदि उनके बजटों में 5 अथवा 10% की कटौती कर दी जाए, तो वह क्या करेंगे और अपनी सेवाओं के वर्तमान स्तरों को बनाए रखने के लिए उन्हे कितनी आवश्यकता है।

शून्यात्मक बजट प्रणाली की प्रक्रिया

शून्यात्मक बजट प्रणाली की प्रक्रिया के कई सोपान हैं। इसका कार्यान्वयन सोपानों के निष्पादन के क्रम में होता है। यह सोपान इस प्रकार हैं :
  1. विभागीय-इकाइयों का समेकन,
  2. विभागीय उद्देश्यों तथा लक्ष्यों का अभिप्रेषण,
  3. निर्णय-घटकों की सरंचना तथा विकास,
  4. वरीयता-क्रम का निर्धारण,
  5. शीर्षस्थ-प्रबन्धन-स्तर पर विचार विमर्श,
  6. अन्तिम वरीयता क्रम निर्धारण एवं स्वीकृति,
  7. वित्तीयन
किसी भी संगठन में इस प्रणाली को लागू करने के लिए विभागीय प्रखण्डों को इकाइयों के रूप में समेकित किया जाता है। इस प्रखण्ड के प्रधान का दायित्व सम्बन्धित इकाई के आर्थिक कार्यकलापों से सम्बन्धित प्रारूप तैयार करना होता है। इकाई के आर्थिक प्रारूप का निर्धारण संगठन में व्यावसायिक उद्देश्यों तथा निर्धारित लक्ष्यों के परिप्रेक्ष्य में किया जाता है। शीर्षस्थ प्रबन्धन, संगठन के उद्देश्य तथा वार्षिक बजट के लक्ष्यों की प्रत्येक इकाई को सूचित करता है। प्रत्येक इकाई का प्रधान अपनी आवश्यकतानुसार निर्णय लेता है कि प्रत्येक गतिविधि का आर्थिक प्रारूप क्या होगा ? इस गतिविधि से सम्बन्धित प्रारूप को ‘‘निर्णय घटक’’ कहा जाता है। हर घटक की संगठन की उपयोगिता के अनुसार लागत लाभ तथा निष्पादन शैली के सन्दर्भ में समीक्षा की जाती है। इसे निर्णय घटकों का विकास कहा जाता है। फिर ‘‘निर्णय घटकों’’ को संगठन की आवश्यकता तथा अन्य पक्षों के अनुसार वरीयता क्रम प्रदान किया जाता है, तदुपरान्त इन्हें शीर्षस्थ प्रबन्धन को विचारार्थ अग्रसारित किया जाता है। इस स्तर पर अभीष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु इकाई प्रधान से विचार विमर्श किया जाता है। इसके पश्चात् पुन: सभी घटकों को संगठन स्तर पर वरीयता क्रम प्रदान किया जाता है, तत्पश्चात् संगठन के उपलब्ध आर्थिक संसाधनों की क्षमता के अनुसार वरीयता प्राप्त घटकों का वित्तीय अनुमोदन तथा अन्तिम रूप से वित्तीय किया जाता है।

शून्यात्मक बजट प्रणाली से लाभ

शून्यात्मक बजट प्रणाली की अपनी कुछ विशेषताएँ है, जिसकी वजह से इसे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में प्रतिस्थापित किया जा रहा है। ऋइस प्रणाली में बजट प्रक्रिया पूर्णतया वरीयता विश्लेषण पर आधारित है। इसमें संगठन या राष्ट्रों के उद्देश्यों तथा सामयिक आवश्यकताओं को पूर्ण महत्व प्रदान किया जाता है। दूसरे शब्दों में, इस प्रणाली में राष्ट्रीय अभीष्ट लक्ष्यों का पूर्ण समावेश रहता हैं।

दूसरे, इस प्रणाली में नियोजन तथा बजट निष्पादन में कारणगत सम्बन्ध होता है। प्रस्तावित नियोजन का मूल्यांकन, विश्लेषण तथा उपयोगिता ही बजट का स्वरूप निर्धारित करती है।

तीसरे, इस प्रणाली में निर्णय घटकों की सरंचना तथा विकास लागत तथा लाभ के विश्लेषण के आधार पर की जाती है। यदि कोई कार्यकलाप, संगठन के उद्देश्यों के अनुसार निश्चित लागत के लिए अपेक्षित लाभ नहीं प्रदान करता है तो उसे अनुत्पादक समझा जाता है। इस प्रकार यह प्रणाली वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है।

चौथे, इसकी निष्पादन प्रक्रिया में सभी स्तर के अधिकारी सम्मिलित रहते हैं जिसे प्रत्येक स्तर पर कर्तव्य बोध का वातावरण बना रहता है। इसके अतिरिक्त नैतिकता भी प्रत्येक स्तर पर दायित्व निर्वाह में पे्ररणा देती है। निष्क्रिय साधन भी सक्रियता प्राप्त करते हैं।

पांचवें, इस प्रणाली द्वारा बजट निष्पादन में पर्याप्त समायोजनशीलता रहती हैं यदि किसी कारणवश, संगठन के आर्थिक संसाधनों में कमी के कारण वित्तीय व्यवस्था प्रतिकूल हो जाती है अथवा वित्त में सापेक्ष कमी हो जाती है तो क्रम वरीयता प्राप्त ‘‘निर्णय घटकों’’को बजट प्रक्रिया से पृथक् कर दिया जाता है। इससे न तो संगठन के उद्देश्यों पर प्रभाव पड़ता है और न ही संगठन की कार्य क्षमता पर। इस प्रकार यह प्रणाली वैज्ञानिकता पर आधारित है तथा साधारण परिस्थितियों में वास्तविकता के काफी समीप होने की विशिष्टता रखती है।

भारत में शून्यात्मक बजट प्रणाली अपनाने की कठिनाइयाँ

भारतीय परिवेश में शून्यात्मक बजट प्रणाली के निष्पादन में कुछ मूलभूत अवरोधक तत्वों का आभास होता है। यह तत्व ही प्रणाली की सफलता का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। सर्वप्रथम कठिनाई भारतीय अर्थव्यवस्था में व्याप्त प्रशासन की निष्क्रियता ही परिलक्षित होगी, हमारे प्रशासक स्वयं कार्य करने में विश्वास कम करते हैं- दायित्व-अन्तरण के फलस्वरूप, लिपिक वर्ग की ‘‘बुठ्ठिमत्ता का शिकार’’ यह प्रणाली भी हो सकती है, जिस प्रकार 1968.69 में निष्पादन बजट प्रणाली का तिरस्कार किया गया, उसी प्रकार यह सभ्भव है कि प्रशासक वर्ग इसका प्रत्यक्ष विरोध करें अथवा इसे असफलता के द्वार तक पहुंचा दें।

दूसरे, भारतीय अर्थव्यवस्था के पिछड़ेपन में कर्मचारी संघों तथा परम्परावादी राजनीतिज्ञों का अमूल्य सहयोग है, कर्मचारियों में काम न करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। संघ के नेताओं का परम उद्देश्य, संगठन को अगतिशील बनाना है, भारतीय उद्योगों में कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी का विरोध जिस प्रकार नेताओं ने किया है, उससे इस प्रणाली की सफलता पर प्रश्न चिह्न लगता प्रतीत होता है। यद्यपि परम्परावादी राजनीतिज्ञों का युग समाप्त-प्राय है तथापि कुछ सीमा तक उनकी आलोचना का शिकार होना निश्चित ही है।

तीसरे, इस प्रणाली में क्षमतावान, बुठ्ठिमान तथा अनुभवी अधिकारियों की ही आवश्यकता है। ऐसा नहीं है कि हमारे यहां ऐसे अधिकारियों की कमी है, परन्तु जिस प्रकार जातिवाद, पक्षपात के कारण जिम्मेदार पदों पर अक्षम अधिकारी नियुक्त किये जाते हैं, उससे यह प्रणाली अप्रभावित नही रह सकती है। वित्त सम्बन्धी मामलों में गैर वित्तीय भूमिका के अधिकारियों की नियुक्ति इसका स्पष्ट प्रमाण है।

चौथे, इस प्रणाली में आरम्भिक स्तर पर सम्प्रेषण, सूचनाओं तथा आँकड़ों से सम्बन्धित कार्य अधिक होता है। भारतीय परिवेश में निम्न सम्प्रेषण व्यवस्था सूचनाओं के संकलन तथा आँकड़ों के तथ्यपरक विश्लेषण में व्याप्त अक्षमता, इस प्रणाली की सफलता में मूलभूत रूप से बाधक सिठ्ठ होगी। आँकड़ों का संकलन इस प्रकार किया जाता है कि वास्तविकता पर पर्दा पड़ जाये। पाँचवें, भारतीय अर्थव्यवस्था में ग्रहण क्षमता (Adaptability) की कमी है, किसी भी तकनीकी ज्ञान को सम्पूर्ण रूप से समाहित करना, एक ही प्रयास में सभ्भव नहीं है, प्राथमिक स्तर पर प्रखर विरोध होता है। वित्त मन्त्रालय द्वारा घोषित आदेश के अनुसार इसका पूर्णरूपेण उपयोग 1987. 88 के बजट में किया गया। जबकि प्रत्येक स्तर पर नियुक्त दायित्वपूर्ण पदों के अधिकारियों को इसका समुचित ज्ञान भी नहीं है, जिससे वे इस प्रणाली के कार्यान्वयन में स्वयं बाधक सिठ्ठ होंगे।

Comments