शून्य आधारित बजट क्या है?

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जैसा कि आपको इस अवधारणा के नाम से ही स्पष्ट है कि इस बजट के अन्तर्गत कोई पूर्व निर्धारित आधार नहीं होता है। अत: इस बजट के निर्माण के लिए पूर्ववर्ती मदों को शून्य मान लिया जाता है। अर्थात् इस बजट का निर्माण बिना किसी आधार के किया जाता है। यह बजट पूर्ण रूप से लेखा परीक्षण की पद्धति पर अधारित किया गया है। आपको यह समझना होगा कि शून्य आधार बजट में पूर्व में आवंटित राशि वाली मदों या कार्यक्रमों को आवश्यक रूप से स्थान नहीं दिया जाता है। चालू वित्तीय वर्ष के बजट के लिए नया आर्थिक आधार तैयार किया जाता है जो पूर्व के वित्तीय वर्ष में संचालित कार्यक्रमों या योजनाओं के आलोचनात्मक मूल्यांकन के आधार पर निर्धारित किया जाता है।

सामान्य रूप से शून्य आधार बजटिंग का मुख्य आधार कार्यक्रम या योजनाओं की लागत के बाद उसके परिणामों का आलोचनात्मक विश्लेषणा माना गया है। इस बजट में उसी मद को व्यय के लिए उचित ठहराया जाता है तो लागत-हित विश्लेषण के आधार पर पूर्ण रूप से खरी उतरती है। इस बजट में इस बात की कोई गारण्टी नहीं होती है कि एक बार में आवंटित होने वाली मद का आगामी वित्तीय वर्ष या बजट में यथास्थान बना रहेगा। किसी भी मद को बजट में उस समय तक स्थान नहीं दिया जाता है जब तक कि उस मद को लागत-हित विश्लेषण के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सके। शून्य आधार बजट में मदों एवं योजनाओं के आलोचनात्मक मूल्यांकन के आधार पर सार्वजनिक व्यय के अपव्यय को रोकने का प्रयास किया जाता है।

शून्य आधार बजटिंग बजट को अर्थशास्त्रियों द्वारा इस रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया है।
  1. पीटर पायरेर के अनुसार, ‘‘शून्य पर आधारित बजटिंग एक संचालित नियोजन एवं बजटिंग प्रक्रिया है, जिसमें प्रत्येक मैनेजर के अपने सम्पूर्ण बजट प्रस्तावों का औचित्य शून्य से बताना होता है तथा प्रत्येक मैनेजर पर सबूत का भार डाल दिया जाता है कि उसे कोई धन क्यों व्यय करना चाहिये।’’
  2. जिमी कार्टर के शब्दों में, ‘‘शून्य पर आधारित बजटिंग में बजट को इकाइयों में रखा जाता है जिसे ‘निर्णय पैकेज’ कहा जाता है और जो प्रत्येक स्तर पर मैनेजर द्वारा तैयार किये जाते हैं। यह पैकेज विभाग की विद्यमान या प्रस्तावित क्रियाओं को पूर्ण करते हैं।’’
शून्य आधार बजटिंग की नयी अवधारणा का प्रयोग सर्वप्रथम 1977 में अमेरिका के राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने अपने देश में अपनाया था। भारत में प्रथम बार 1986 में तत्कालीन वित्तमंत्री वी0पी0 सिंह ने अपनाना स्वीकार किया था। 1987-88 में केन्द्रीय सरकार के अनेक विभागों ने इस तकनीकी को अपनाया था।

शून्य आधार बजटिंग की विशेषताएँ

  1. शून्य आधार बजटिंग का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक व्ययों पर नियंत्रण करने से लगाया गया है ताकि सरकारी धन का अपव्यय न हो सके एवं उसका प्रयोग सार्वजनिक हित में हो सके।
  2. शून्य आधार बजटिंग के अन्तर्गत पूर्ववर्ती कार्यक्रमों अथवा योजनाओं के आलोचनात्मक मूल्यांकन की व्यवस्था की गयी है जिसके आधार पर उस मद को बजट में यथास्थान दिलाया जा सके।
  3. यह बजट लागत-लाभ विश्लेषण पर आधारित है। इसलिये यह प्रयास किया जाता है कि किसी कार्यक्रम या मद पर आने वाली-लागत तथा उस मद से प्राप्त होने वाले सामाजिक हित के मध्य कम से कम अन्तर हो।
  4. शून्य आधारित बजटिंग में किसी कार्यक्रम या योजना को अनिवार्य रूप से भविष्य में बनाये रखना आवश्यक नहीं होता है।
  5. इस प्रकार की बजटिंग प्रणाली के संचालन के लिए कुशल एवं ईमानदार कर्मचारियों एवं अधिकारियों की आवश्यकता है जो सभी अर्थव्यवस्थाओं में प्राय: सम्भव नहीं है।
  6. शून्य आधार बजटिंग के लिए बजट बनाते समय पूर्व में संचालित मदों की पूर्ण एवं सही जानकारी होनी चाहिए ताकि उस मद के औचित्य को सही रूप में प्रस्तुत किया जा सके।

शून्य आधार बजटिंग की कठिनाइयाँ

शून्य आधार बजटिंग के निर्माण एवं क्रियान्वयन में अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं जिन्हें इन रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
  1. शून्य आधारित बजट के अन्तर्गत कार्यक्रमों एवं योजनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन उसी विभाग एवं मंत्रालय के अधिकारियों एवं प्रभारियों द्वारा किया जाना होता है जिसके अन्तर्गत यह कार्यक्रम या योजनायें संचालित हैं। ऐसी स्थिति में स्वमूल्यांकन उनके विरूद्ध नहीं जा सकता है। इसीलिये पूर्ववर्ती मदों को ही आधार बनाना आवश्यक हो जाता है जो शून्य आधार बजट की संकल्पना के अनुकूल नहीं है।
  2. शून्य आधारित बजट के निर्माण एवं क्रियान्वयन के लिए ईमानदार एवं पूर्ण कुशल अधिकारियों एवं कर्मचारियों की आवश्यकता है जो प्राय: सभी देशों में सम्भव नहीं है। इसके साथ बजट का प्रत्येक चरण एक तकनीकी प्रशिक्षण पर आधारित होता है इसके लिये सम्बन्धित कर्मचारियों को पूर्ण प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी जो स्वयं में ही एक समस्या बन जाती है।
  3. शून्य आधारित बजटिंग मितव्ययता एवं पूर्ण नियंत्रणात्मक सार्वजनिक व्यय पर आधारित है जो प्रजातांत्रिक एवं सत्तालोलुप सरकारों द्वारा समभव नहीं हो सकता है। आपको यहाँ विदित हो कि प्रजातांत्रिक सरकारें जनता को खुश करने के लिये अपव्यय तथा गैर नियंत्रणात्मक व्ययों का सहारा लेती हैं।
  4. विकाशील तथा पिछडे़ देशों में शून्य आधारित बजटिंग की प्रणाली कारगर सिद्ध नहीं हो सकती क्योंकि यहाँ पर बजट प्रणाली में लचीलापन अत्यन्त ही आवश्यक समझा गया है जो शून्य आधारित बजट के विपरीत है।

भारत में बजटिंग प्रक्रिया

भारत में बजट कार्यकारिणी सभा द्वारा तैयार किया जाता है। संघीय बजट को लोक सभा के केन्द्रीय मंत्रीमण्डल तथा राज्यों में विधानसभाओं की कार्यकारिणियों द्वारा तैयार किया जाता है। बजट का निर्माण करने से पूर्व निम्न मदों/शीर्षकों को दर्शाया जाता है।
  1. पिछले वर्ष की वास्तविक आय तथा वास्तविक व्यय
  2. चालू वर्ष से सम्बन्धित स्वीकृत आय तथा व्यय के अनुमान
  3. चालू वर्ष के वास्तविक आय-व्यय के आंकड़े
  4. आगामी वर्ष के बजट अनुमान
  5. चालू वर्ष के संशोधित आय-व्यय के अनुमान
उपर्युक्त दस्तावेजों के साथ भारत में बजटिंग को अनेक महत्वपूर्ण प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जिनको आप निम्न बिन्दुओं के आधार पर आसानी से समझ सकते हैं।

बजट की तैयारी करना : भारतीय बजट बनाने की शुरूआत प्रत्येक वर्ष अगस्त माह में कर दी जाती है। भारतीय वित्त मंत्रालय द्वारा विभिन्न मंत्रालयों द्वारा अनुमानित आय तथा व्यय के अनुमानित लेखे मांगे जाते हैं। अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह तक सभी मंत्रालयों द्वारा अपने-अपने अनुमानित आय तथा व्यय के अनुमान वित्त मंत्रालय को भेज दिये जाते हैं। भारत में संघीय तथा राज्जीय बजट की तैयारी केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा अलग-अलग की जाती है।

बजट को पेश करना : सम्बन्धित सभी मंत्रालयों तथा विभागों द्वारा अनुमानित आय तथा व्यय के अनुमान प्राप्त हो जाने के उपरान्त सम्पूर्ण बजट दस्तावेजों को संसद में प्रस्तुत किया जाता है। बजट प्रस्तुत करते समय वित्तमंत्री अपना बजट भाषण प्रस्तुत करता है जिसमें भारतीय अर्थव्यवस्था की आर्थिक समीक्षा होती है। बजट भाषण में नये कर लगाने तथा नये व्ययों को करने का उल्लेख किया जाता है।

नये करों को लगाने तथा नये व्ययों के उद्देश्यों को भी स्पष्ट किया जाता है।

बजट के प्रकार तथा आवश्यकता पर प्रकाश डाला जाता है। बजट द्वारा सामान्य जनता पर पड़ने वाले प्रभावों का भी स्पष्टीकरण वित्तमंत्री द्वारा दिया जाता है। वित्त मंत्री द्वारा जो बजट भाषण सदन में दिया जाता है उसकी एक-एक प्रति सभी सदस्यों के मध्य अध्ययन हेतु वितरित कर दी जाती है। ताकि आगामी प्रक्रिया में सदस्य अपना तर्क-वितर्क दे सके।

सामान्य बहस का होना : बजट पेश करने के बाद बजट भाषण पूरा होने पर बजट का अध्ययन करने के लिए सदस्यों को सामान्यत: कुछ दिन का समय दिया जाता है तथा बजट भाषण पर बहस के लिये एक दिन निश्चित कर दिया जाता है। उस दिन बजट भाषण पर पक्ष तथा विपक्ष के सदस्यों द्वारा सामान्य रूप से चर्चा की जाती है। सदस्यों को बजट से सम्बन्धित आय तथा व्यय की मदों की आलोचना एवं समीक्षा की जाती है तथा बजट के प्रकार तथा सम्बन्धित विभिन्न पक्षों पर पक्ष तथा विपक्ष द्वारा अनेक प्रश्न किये जाते हैं जिनका जबाव वित्तमंत्री द्वारा दिया जाता है। बजट सम्बन्धी अनेक आशंकाओं का समाधान सत्तापक्ष द्वारा किया जाता है। सामान्य बहस में बजट के सामान्य जनता के जीवन के विभिन्न पक्षों पर पड़ने वाले प्रभावों की आलाचेनात्मक समीक्षा की जाती है। सामान्य रूप से नये कर लगाने एवं कर की दरें बढ़ाने तथा गरीब जनता पर बजट के पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों की आलोचना की जाती है।

मतदान : बजट पर सामान्य बहस होने के बाद विभिन्न मंत्रालयों के मंत्री अपने-अपने विभागों के लिये अनुदान की मांग करते हैं तथा इन मांगों पर बहस होती है। व्यय की कुछ मदें अनिवार्य रूप की होती हैं जिन्हें संचित कोष से मांगा जाता है। इन मांगों पर सदस्यों को मतदान करकाने का अधिकार नहीं होता है। विभाग के प्रत्येक मंत्री को अपनी अनुदान मागों के औचित्य को स्पष्ट करना होता है।

अनुदानों मांगों पर बहस एक से अधिक दिनों तक भी चल सकती है। पहले दिन जब बहस पूरी नहीं होती है तब दूसरे दिन की बहस जारी रहती है। कुछ अनुदानों की मांगों में कटौती प्रस्ताव लाया जा सकता है। सामान्य रूप से कटौती प्रस्ताव का उद्देश्य अनुदान मांगों का मितव्ययपूर्ण होता है। कटौती प्रस्ताव पर वित्त मंत्री द्वारा स्पष्टीकरण दिया जाता है। फिर भी यदि सदस्यों के सन्तुष्ट न होने पर कटौती प्रस्ताव पर मतदान कराया जाता है। कटौती प्रस्ताव पारित भी हो सकता है तथा यह प्रस्ताव गिर भी जाता है। कटौती प्रस्ताव पारित होने पर प्राय: यह मान लिया जाता है कि सरकार अल्पमत में आ गयी है। लेकिन ऐसी स्थिति में सरकार को त्यागपत्र देने की कोई बाध्यता नहीं होती है। वित्तमंत्री द्वारा सदस्यों को संतुष्ट करने पर सदस्यों द्वारा कटौती प्रस्ताव वापिस ले लिया जाता है और मतदान नहीं होता है।

विनियोग विधेयक : बजट की माँगों पर सामान्य बसह के बाद सदन में विनियोग विधेयक लाया जाता है। यह विनियोग विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है। साधारण विधेयक की तर्ज पर विनियोग विधेयक सरकार द्वारा नये कर लगाने तथा पुराने करों की दरों में वृद्धि करने से सम्बन्धित होता है। इस विधेयक पर भी लोकसभा में सामान्य बहस होती है। इन कर सम्बन्धी परिवर्तनों के औचित्य को स्पष्ट किया जाता है जो करारोपण के लिए आवश्यक होता है। सदन द्वारा अधिक आपत्ति या विरोध करने पर विनियोग विधेयक में आवश्यक संशोधनों को सरकार द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है। विनियोग विधेयक के अन्तर्गत वित्त विधेयक तथा द्रात्यिक विधेयकों को शामिल किया जाता है। विनियोग विधेयक के पारित होने पर इसे राज्य सभा की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है। विवादास्पद स्थिति में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला ली जाती है।

अनुपूरक माँगें : आपको यह भी स्पष्ट करना होगा कि कभी-कभी किसी वर्ष सरकार की व्यय राशि स्वीकृत तथा निर्धारित व्यय से अधिक हो जाती है तथा निर्धारित व्यय वर्ष की समाप्ति से पूर्व ही समाप्त हो जाता है। वर्ष की शेष अवधि के लिए और धनराशि की आवश्यकता होती है। इसके लिए सदन में अनुपूरक मांगे रखी जाती हैं। अनुपूरक मांगों पर सामान्य बहस के बाद पारित किया जाता है तथा बिल पारित होने पर उसे उच्च सदन की स्वीकृति के लिये भेज दिया जाता है।

सांकेतिक मांगे : सामान्य बजट अनुमानों को अर्थव्यवस्था की सामान्य स्थितियों के आधार पर लगाया जाता है। लेकिन कभी कभी अर्थव्यवस्था के सम्मुख ऐसी स्थितियाँ बन जाती हैं कि बजट से बाहर वाली मदों पर भी व्यय करना पड़ता है। जैसे युद्ध, अकाल, बाढ़ तथा कोई अन्य प्राकृतिक आपदा आदि के कारण सरकारी व्यय की आवश्यकता होती है। ऐसी स्थिति में सरकार एक रूपये का व्यय भी बिना सदन की स्वीकृति के नहीं कर सकती है। सांकेतिक मांगों को सामान्य बजट की तरह ही पारित किया जाता है।

बजट को क्रियान्वित किया जाना : आपको बजट निर्माण की प्रक्रिया भलीभांति समझ में आ गयी होगी। बजट के निर्माण तथा पारित होने के बाद बजट के क्रियान्वित करने के लिए अर्थव्यवस्था पर लागू किया जाता है। बजट का क्रियान्वयन 1 अप्रैल से आगामी वर्ष की 31 मार्च तक क लिये किया जाता है। बजट में प्रस्ािवित करों से प्राप्त आय को भारत के संचित कोष में जमा किया जाता है। बाद में इस राशि को आवश्यकतानुसार निकाला जाता है। इसी प्रकार बजट की व्यय राशि को उच्च अधिकारियों की अनुमति से सम्बन्धित अधिकारी खातों से निकालते हैं।

भारत में शून्य आधार बजटिंग

पिछले बिन्दुओं के अन्तर्गत आपने शून्य आधार बजटिंग की अवधारणा को समझने के साथ शून्य आधार बजटिंग की विशेषतायें तथा कठिनाइयों का भी अध्ययन किया। भारत में बजटिंग प्रक्रिया को भी आपने भली भांति समझ लिया होगा। प्रस्तुत बिन्दु के अन्तर्गत आप भारत में शून्य आधार बजटिंग से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

आपने शायद ध्यान दिया होगा कि भारत में सर्वप्रथम 1985-86 में शून्य आधार बजट की अवधारणा को स्वीकार किया गया था। केन्द्र सरकार द्वारा इस शून्य आधार बजट को अपनाने के लिए समस्त विभागों को निर्देश दिये गये थें वर्ष 1986-87 में केन्द्र सरकार के सभी विभागों ने शून्य आधार बजट को स्वीकार किया। सामान्यत: भारत में शून्य आधार बजट में अनुत्पादक व्यय तथा अधिकारियों की लापरवाही ने अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ पैदा की लेकिन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत में शून्य आधार बजट की अत्यन्त आवश्यकता थी। भारत में शून्य आधार बजट के लिये इन तथ्यों पर विशेष जोर दिया गया।
  1. बजट की मदों पर लागत-लाभ विश्लेषण करना।
  2. निष्क्रियता के स्थान पर सक्रिय मदों को स्थान देना।
  3. उद्देश्यों की प्राप्ति के प्रयासों की सही-सही जानकारी प्राप्त करना।
  4. विकल्पों की खोज के साथ मितव्ययता को महत्व देना।
  5. निर्णय सम्बन्धी पैकेज का डिजाइन तैयार करना तथा उसे क्रमबद्ध करना।

शून्यात्मक बजट प्रणाली से लाभ

शून्यात्मक बजट प्रणाली की अपनी कुछ विशेषताएँ है, जिसकी वजह से इसे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में प्रतिस्थापित किया जा रहा है। ऋइस प्रणाली में बजट प्रक्रिया पूर्णतया वरीयता विश्लेषण पर आधारित है। इसमें संगठन या राष्ट्रों के उद्देश्यों तथा सामयिक आवश्यकताओं को पूर्ण महत्व प्रदान किया जाता है। दूसरे शब्दों में, इस प्रणाली में राष्ट्रीय अभीष्ट लक्ष्यों का पूर्ण समावेश रहता हैं।

दूसरे, इस प्रणाली में नियोजन तथा बजट निष्पादन में कारणगत सम्बन्ध होता है। प्रस्तावित नियोजन का मूल्यांकन, विश्लेषण तथा उपयोगिता ही बजट का स्वरूप निर्धारित करती है।

तीसरे, इस प्रणाली में निर्णय घटकों की सरंचना तथा विकास लागत तथा लाभ के विश्लेषण के आधार पर की जाती है। यदि कोई कार्यकलाप, संगठन के उद्देश्यों के अनुसार निश्चित लागत के लिए अपेक्षित लाभ नहीं प्रदान करता है तो उसे अनुत्पादक समझा जाता है। इस प्रकार यह प्रणाली वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है।

चौथे, इसकी निष्पादन प्रक्रिया में सभी स्तर के अधिकारी सम्मिलित रहते हैं जिसे प्रत्येक स्तर पर कर्तव्य बोध का वातावरण बना रहता है। इसके अतिरिक्त नैतिकता भी प्रत्येक स्तर पर दायित्व निर्वाह में पे्ररणा देती है। निष्क्रिय साधन भी सक्रियता प्राप्त करते हैं।

पांचवें, इस प्रणाली द्वारा बजट निष्पादन में पर्याप्त समायोजनशीलता रहती हैं यदि किसी कारणवश, संगठन के आर्थिक संसाधनों में कमी के कारण वित्तीय व्यवस्था प्रतिकूल हो जाती है अथवा वित्त में सापेक्ष कमी हो जाती है तो क्रम वरीयता प्राप्त ‘‘निर्णय घटकों’’को बजट प्रक्रिया से पृथक् कर दिया जाता है। इससे न तो संगठन के उद्देश्यों पर प्रभाव पड़ता है और न ही संगठन की कार्य क्षमता पर। इस प्रकार यह प्रणाली वैज्ञानिकता पर आधारित है तथा साधारण परिस्थितियों में वास्तविकता के काफी समीप होने की विशिष्टता रखती है।

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