विकास प्रशासन का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएँ एवं क्षेत्र

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अनुक्रम
‘विकास प्रशासन’ दो शब्दों ‘विकास’ तथा ‘प्रशासन’ के योग या मेल से बना है।
‘ कम वांछित परिस्थिति से अधिक वांछित परिस्थितियों की ओर अग्रसर होने की प्रक्रिया’
को विकास की संज्ञा देते हैं जबकि ‘प्रशासन सरकार का कार्यात्मक पहलू है जिसका अभिप्राय
सरकार द्धारा लोक-कल्याण तथा जन-जीवन को व्यवस्थित करने हेतु किये गये प्रयासों से हैं।
लोक प्रशासन के शब्दकोष (Dictionary of Public Administration) के अनुसार”एक देश ,
विशेषतौर पर उभरते हुए नए देशों, की प्रशासनिक क्षमता को बढ़ाने हेतु वहाँ पर प्रविधियों,
प्रक्रियाओं, तथा व्यवस्थाओं में सुधार या उन्नति” को विकास प्रशासन कहते हैं।

एडवार्ड वीडनर के अनुसार, “विकास प्रशासन उन प्रगतिवादी राजनैतिक, आर्थिक तथा सामाजिक
उददेश्यों जो किसी न किसी रूप में आधिकारिक स्तर पर निर्धारित होते हैं, को प्राप्त करने के लिए
मार्गदर्शन की प्रक्रिया है। जॉन मोण्टगोमरी के अनुसार,” विकास प्रशासन का तात्पर्य अर्थव्यवस्था ( जैसे कि कृषि या उद्योग
या इन दोनों में से किसी से भी सम्बन्धित पूंजीगत आधारिक संरचना) तथा कुछ सीमा तक राज्य
की समाज सेवाओं (विशेषतया शिक्षा और लोक स्वास्थय) में नियोजित परिवर्तन लाना है।
सामान्यत: राजनैतिक योग्यताओं में सुधार करने के प्रयासों से इसका सम्बन्ध नहीं होता।”
फेनसोड ने विकास प्रशासन को परिभाषित करते हुए “इसे नवीन मूल्यों का वाहक बताया है।
“उनके अनुसार, “विकास प्रशासन में वे सभी कार्य साम्मिलित होते हैं जो विकासशील देशों ने
आधुनिकीकरण एंव औद्योगिकीकरण के मार्ग पर चलने के लिए ग्रहण किए हैं या अपनाएं है।ं प्राय:
विकास प्रशासन में संगठन और साधन सम्मिलित हैं जो नियोजन आर्थिक विकास तथा राष्ट्रीय आय
का प्रसार करने हेतू साधन जुटाने और उनके आबंटन के लिए स्थापित किए जाते हैं।”
रिग्स के अनुसार, “विकास प्रशासन को दो परस्पर सम्बन्धी रूपों में प्रयुक्त किया जाता है। प्रथम,
विकास प्रशासन का सम्बन्ध विकास कार्यक्रमों को लागू करने से , बड़े संगठनों, विशेष तौर पर
सरकारों, के द्धारा प्रयुक्त प्रणालियों, नीतियों और उन नीतियों के विकासवादी उद्देश्यों की प्राप्ति
हेतु बनाई गई योजनाओं के कार्यान्वयन से हैं दूसरे, अप्रत्यक्ष रूप में प्रशासनिक क्षमताओं में वृद्धि
लाना भी इसके अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता हैं।

विकास प्रशासन की विशेषताएँ

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम विकास प्रशासन की कुछ विशेषताओं का उल्लेख कर सकते
हैं। विकास प्रशासन की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन नीचे किया जा रहा है।

परिवर्तनोन्मुखी 

विकास प्रशासन की पहली प्रमुख विशेषता यह है कि यह परिवर्तनोन्मुखी
प्रशासन है अर्थात समय-समय पर आवश्यकताओं के अनुरूप अपने कार्यक्रमों, नीतियों एंव
योजनाओं में परिवर्तन लाता रहता है। विकास प्रशासन राष्ट्र के चहुमुखी विकास के लिए कुछ
कार्यक्रम बनाता है तथा उन्हें लागू करता है । क्रियान्वयन के पश्चात् विकास प्रशासन कार्यक्रमों
का विश्लेषण करता हैं जिसके आधार पर उन कार्यक्रमों में वांछित परिवर्तन किए जाते हैं। साथ ही
एक उद्देश्य के पूरा होना पर विकास प्रशासन अपने लिए दूसरे लक्ष्य निर्धारित कर लेता है। अत:
परिवर्तन विकास प्रशासन का अन्र्तनिहित गुण है और यदि विकास प्रशासन परिवर्तनोन्मुखी नही
होगा तो यह अर्थहीन हो जाएगा।

उद्देश्योन्मुखी

विकास प्रशासन की दूसरी प्रमुख विशेषता यह है कि विकास प्रशासन उद्देश्य
परक है अर्थात विकास प्रशासन अपने समक्ष कुछ लक्ष्य या उद्देश्य बनाता है जिन्हें वह एक समय
सीमा के अन्तर्गत प्राप्त करने के लिए कुछ कार्यक्रम तथा योजनाएँ भी बनाता हैं। उदाहरण के तौर
पर भारत में विकास प्रशासन अपने समक्ष अनेकों उद्देश्य लेकर चलता हैं जैसे कि गरीबी उन्मूलन,
, बेरोजगारी दूर करना, आर्थिक विषमताओं को दूर करना , ग्रामीण विकास, कृषि विकास,
औद्योगिक विकास महिला एवं बाल विकास आदि। वास्तव में विकास एक विवेकशील प्रक्रिया है
इसलिए स्वभाविक ही है कि विकास प्रशासन भी तर्कयुक्त एंव विवेकशील होगा और एक विवेकशील
प्रक्रिया के लिए यह आवश्यक है कि उसके कुछ लक्ष्य हों जिन्हें वह एक समय सीमा में प्राप्त करने
के लिए प्रयास करे।

परिणामोन्मुखी

विकास प्रशासन केवल उद्देश्य निर्धारित करने, उन उद्देश्यों की प्राप्ति के
लिए कार्यक्रम बनाने तथा उन्हें लागू करने तक ही सीमित नहीं हैं। अपितु यह प्रशासन ये जानने
का भी प्रयास करता है कि विकास के इन कार्यक्रमों के लागू होने से अभीष्ट परिणाम निकले अथवा
नहीं। अर्थात विकास प्रशासन अपने प्रयासों का सतत् रूप से विश्लेषण करता रहता है और अपने
प्रयासों के परिणामों पर ध्यान केन्द्रित रखता है । यदि आवश्यकता हो तो विकास प्रशासन
विश्लेषण के आधार पर प्राप्त परिणामों के मद्देनजर अपने कार्यक्रमों में आवश्यक परिवर्तन भी
करता हैं।

लोचशीलता

 विकास प्रशासन विकासशील देशों से सम्बन्धित है। और विकासशील देश
विकसित होने के लिए प्रयास कर रहे हैं अर्थात वे विकास के दौर से गुजर रहे हैं। इस कारण इन
देशों में सतत् या लगातार परिवर्तन हो रहे है। उनकी समस्याओं में भी लगातार परिवर्तन आ रहे
हैं। उदाहरण के तौर पर भारत में जो समस्याएं 1950 के दशक में थी वे 1960 या 1970 के दशक
में नहीं थी । इसी प्रकार भारत में जो समस्याएं पिछली शताब्दी में थी वे वर्तमान शताब्दी में नहीे
है; उन समस्याओं का स्थान दूसरी समस्याओं ने ले लिया है। क्योंकि विकास प्रशासन इन
समस्याओं के अनूरूप अपने उद्देश्य निर्धारित करता है तथा कार्यक्रम बनाता व लागू करता है।
अत: यह आवश्यक हो जाता है कि विकास प्रशासन लोचशील रहे।

नियोजित विकास

किसी भी देश में किसी भी समय समस्याएं असीमित होती है तथा संसाध्
ान सीमित । और यह तथ्य विकासशील देशें के सन्दर्भ में और भी सत्य हैं। अत: विकास प्रशासन,
जो अपने समक्ष विकासशील देशों के चहुमुखी विकास का उद्देश्य लेकर चलता हैं, के लिए यह
आवश्यक हो जाता है कि संसाधनों के सर्वथा उचित तथा सर्वोतम प्रयोग के लिए योजनाबद्ध रूप
से विकास करे।

सृजनाकत्म

 सुजन का तात्पर्य है ‘नये विचारों का विकास करना तथा उन्हें लागू करनां’।
यदि इस रूप में देखा जाए तो विकास प्रशासन सृजनात्मक है। विकास प्रशासन सदैव ही प्रयासरत
रहता है कि अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए वह कौन से कार्यक्रम अपनाए जिससे कि उन
उद्देश्यों की पूर्ति कम से कम समय तथा कम से संसाधनों के द्धारा की जा सके। इस की पूर्ति
के लिए विकास प्रशासन सदैव ही प्रविधियों, पद्धतियों, संस्थाओं, प्रणालियों, सरंचनाओं, कार्यो ,
व्यवहारों, नीतियों, कार्यक्रमों योजनाओं आदि के साथ नये-नये प्रयोग करता रहता हैं। तथा उन
प्रयोंगें में सफलता मिलने पर उन्हें व्यापक,स्तर पर लागू भी करता है। उदाहरण के तौर पर भारत
में विकास प्रशासन ने स्वतन्त्रता के पश्चात् गरीबी हटाने, बेरोजगारी उन्मूलन तथा ग्रामीण विकास
के सन्दर्भ में कार्यक्रमों, पद्धतियों, प्रणालियों, सरंचनाओं आदि में अभी तक अनेकों प्रयोग किए हैं। ये
सभी भारत में विकास प्रशासन की सृजनात्मक प्रकृति के द्योतक हैं।

सहभागी प्रशासन 

विकास प्रशासन की प्रकृति सहभागिता पर आधारित है। अर्थात विकास
प्रशासन अपने कार्यक्रमों के सफल क्रियान्वयन के लिए जन सहयोग को बढ़ावा देता है। वास्वत
में कोई भी प्रशासन अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतु जन सहभागिता पर आधारित हेाता है और विकास
प्रशासन कोई अपवाद नही है। भारत में ग्रामीण विकास के लिए सन् 1952 में सामुदायिक विकास
कार्यक्रम लागू किया गया किन्तु ग्रामीण विकास की दिशा में सरकार का यह प्रयास असफल रहा।
बलवन्तराय मेहता समिति, जो कि इन कार्यक्रमों के मूल्यांकन के लिए गठित की गई थी , ने बताया
कि इन कार्यक्रमों की असफलता का कारण इनमें जनसहभागिता का अभाव था। इस समिति ने यह
भी सुझाव दिया कि जब तक सहभागिता को सुनिश्चित नहीं किया जाएगा, विकास की दिशा में
कोई भी प्रयास सफल नहीं होगा।

प्रबन्धकीय कार्यकुशलता

विकास प्रशासन केवल राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा
आर्थिक विकास हेतु ही लक्ष्य नहीं बनाता अपितु वह विकास प्रशासन में लगे कार्मिक एंव
अधिकारियों की क्षमताएं बढ़ाने का भी प्रयास करता है ताकि विकास कार्यक्रमों को सफलता एंव
कार्यकुशलता के साथ लागू किया जा सके। यह विकास प्रशासन की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।
क्योंकि यदि विकास प्रशासन से सम्बन्धित कार्मिक एंव अधिकारी कार्यकुशल नही होंगे तो विकास
प्रशासन कितने भी अच्छे कार्यक्रम क्यों न बनाए, वे कार्यक्रम इच्छित या अभीष्ट परिणाम नहीं दे
पांएगे तथा समय व संसाधनों दोनों का ही अपव्यय होगा जो कि एक विकासशील देश किसी भी
अवस्था में नहीं चाहेगा। अत: विकास प्रशासन का एक प्रमुख लक्ष्य अपने कार्मिकों तथा अधिकारियों
की कार्यकुशलता में वृद्धि करना होता हैं।

जन-आकांक्षाओं के अनुरूप

विकास प्रशासन सदैव ही अपने लाभार्थियों की आंकाक्षाओं एंव
इच्छाओं कों केन्द्र बिन्दु बनाकर चलता है तथा अपने जो भी कार्यक्रम बनाता है वह जन-आंकाक्षाओं
को ध्यान में रखकर बनाता है। जब विकास प्रशासन जन-आकांक्षाओं के अनुकूल कार्य नहीं करता
है अथवा जन-आंकाक्षाओं के अनुरूप विकास कायर्क्र्म नियोजित एंव क्रियान्वित नहीं करता है, तो
विकास प्रशासन को उसका मूल्य चुकाना पड़ता है तथा वह कार्यक्रम असफल सिद्ध होता है।
उदाहरण के तौर पर भारत मे विकास प्रशासन के अनेको कार्यक्रमों की असफलता का एक प्रमुख
कारण उन कार्यक्रमों में जन-आकांक्षाओं एंव अभिलाषाओं का समावेश न होना था।

आर्थिक विकास महत्वपूर्ण घटक

विकास प्रशासन बहुउद्देश्यीय है अर्थात इसके विभिन्न
आयाम या घटक हैं जैसे कि राजनैतिक विकास, सामाजिक विकास, मानवीय विकास, आर्थिक
विकास, सांस्कृतिक विकास आदि। साथ ही विकास प्रशासन को इन सभी आयामों में सन्तुलन बना
कर भी चलना होता है अन्यथा विकास असंतुलित होगा। किन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि विकास
प्रशासन के लिए सबसे महत्वपूर्ण आयाम आर्थिक विकास है । इसका कारण यह है कि आर्थिक
विकास अन्य सभी विकास की आधारशिला है एंव आर्थिक विकास के अभाव में अन्य विकास
अर्थहीन हो जाते है। उदाहरणार्थ यदि एक व्यक्ति की आधारभूत आवश्यकताएं (रोटी, कपड़ा और
मकान) की पूर्ति नहीं होती तो राजनैतिक विकास (अधिकारों एंव कर्त्तव्यों का बोध आदि) अर्थहीन
हो जाते हैं। इसी प्रकार एक व्यक्ति का सामाजिक स्तर उसकी आर्थिक सम्पन्नता पर निर्भर करता
है।

इसी प्रकार कोई भी देश आर्थिक दृष्टि से समृद्ध हुए बिना शक्तिशाली नहीं बन सकता । एक देश
को अपने अस्तित्व के लिए आर्थिक रूप से समृद्ध एंव सम्पन्न बनना आवश्यक है। “इसलिए विकास
प्रशासन ऐसे प्रशासनिक संगठन की रचना करता है जो देश की आर्थिक प्रगति को संभव बनाता
है तथा आर्थिक विकास के लिए मार्ग प्रस्तुत करता है।”
यदि हम भारत में विकास कार्यक्रमों पर नजर डालें तो यह स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। अत:
ग्रामीण विकास के लिए जितने भी कार्यक्रम प्रशासन द्धारा बनाए गए उन सभी का मुख्य उद्देश्य
ग्रामीणों को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाना रहा है। किन्तु हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि
आर्थिक पहलू के अन्य पहलुओं से महत्वपूर्ण होने का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि विकास के
अन्य पहलू अर्थहीन हो जाते है।

विकास प्रशासन का क्षेत्र

व्यवहाारिक रूप से विकास प्रशासन के क्षेत्र में वे सभी गतिविधियाँ सम्मिलित की जाती हैं जो कि
एक देश के प्रशासन के द्वारा उस देश के विकास के लिए सम्पन्न की जाती हैं। अत: विकास
प्रशासन के क्षेत्र के अन्तर्गत वे सभी गतिविधियाँ आती है जो सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक,
सांस्कृतिक, औद्योगिक, कृषि , मानवीय , प्रशासनिक आदि क्षेत्रों से सम्बन्धित है एंव सरकार द्धारा
संचालित हों । किन्तु इस प्रकार से विकास प्रशासन के क्षेत्र को परिभाषित करने का कोई भी
प्रयास वैज्ञानिक रूप में सफल नहीं हो सकेगा । इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि विकास
प्रशासन के क्षेत्र की कुछ सीमाएं निर्धारित की जाएं।

राष्ट्र निर्माण और सामाजिक गठबंधन/संसर्ग –

अपने उपनिवेशों में लोगों को संगठित होकर साम्राज्यवादी सत्ता को चुनौती देने से रोकने के लिए
साम्राज्यवादी शक्तियों ने दमनकारी नीति अपनाने के साथ-साथ और भी कई हत्थकण्डे अपनाए।
इनमें से एक प्रमुख था ‘फूट डालो और राज करो’। इसके परिणमस्वरूप साम्राज्यवादी शक्तियों
नें अपने उपनिवेशों में लोगों में सामाजिक असहिष्णुता की भावना फैलाई तथा उन्हें अनेकों आधारों
पर बाँटकर आपस में लड़वा दिया ताकि इन उपनिवेशों के लोग असंगठित रहे और साम्राज्यवादी
सत्ता और उसके द्धारा किए जा रहे शोषण को चुनौती देने के बारे में उन्हें सोचने का अवसर ही
न मिले। उदाहरण के तौर पर आजादी से पूर्व अंग्रेजों ने भारत की जनता को धर्म, जाति, प्रदेश
आदि अनेकों आधारों पर बांटकर आपस में लड़वा दिया। फलस्वरूप दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति
के पश्चात् एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के नव-स्वतन्त्र राष्ट्रों को धार्मिक-सामाजिक तथा
सांस्कृतिक असहिष्णुता विरासत में मिली। इसीलिए इन नव-स्वतन्त्र राष्ट्रों के समक्ष न केवल
आर्थिक विकास की समस्या थी अपितु राष्ट्र निर्माण व सामाजिक गठबन्धन या संसर्ग भी एक प्रमुख
चुनौती थी जो कि विकास प्रशासन के क्षेत्र का एक अभिन्न अंग बन गया। विभिन्न नव-स्वतन्त्र
या विकासशील देशों के प्रशासन ने पाया कि वहाँ का समाज अनेको आधारों पर बंटा हुआ था और
वहां पर पुराने व संकुचित सामाजिक सम्बन्ध, जो कि भाई-भतीजावाद, जाति, धर्म, क्षेत्रवाद आदि
से प्रभावित थे, विद्यमान थे। किन्तु इस प्रकार के सामाजिक सम्बन्ध राष्ट्र-निर्माण में बाधक होते
हैं । इसलिए विकास प्रशासन इन सामाजिक संरचानाओं को तोड़कर नई सरंचनाएँ गठित करता
है। साथ ही विकास प्रशासन विभिन्न वर्गो के मध्य सामाजिक- धार्मिक तनाव दूर करके सामाजिक
सद्भावना लाने का प्रयास करता है ताकि एक स्वच्छ एंव स्वस्थ समाज का निर्माण हो सके।

विकासात्मक नियोजन

किसी भी अर्थव्यवस्था में सदैव ही संसाधन सीमित होते हैं तथा समस्यांए असीमित । यह तथ्य
विकासशील देशों के सन्दर्भ में और भी अधिक सटीक है। क्योंकि विकासशील देश एक ओर जहाँ
तकनीक और प्रौद्योगिकी के अभाव में अपने संसाधनों का समुचित दोहन नहीं कर पाते वहीं दूसरी
ओर उनके समक्ष समस्याएं भी अधिक होती है। अत: यह नितान्त आवश्यक हो जाता है कि विकास
प्रशासन सीमित संसाधनों तथा समय के समुचित उपयोग के लिए नियोजित विकास की शरण ले।
अत: विकास प्रशासन समस्याओं समाधान के हेतु प्राथमिताएँ (priorities) निर्धारित करता है और के
संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार उन्हें संसाधन आवंटित करता हैं दूसरे शब्दों में हम कह सकते है
कि विकासात्मक नियोजन (Development Planning) विकास प्रशासन का एक प्रमुख कार्य है तथा
उसके क्षेत्र के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता हैं।

विकास कार्यक्रम

विभिन्न क्षेत्रों (सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक आदि ) में निर्धारित उद्देश्यों के सन्दर्भ
में विकास योजनाओं को लागू करने के लिए विकास प्रशासन अनेक कार्यक्रम तैयार करता है तथा
उन्हें लागू करता है। अत: विकास कार्यक्रम भी विकास प्रशासन के क्षेत्र का अभिन्न अंग हैं।
यदि हम भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें तों भारतीय प्रशासन ने स्वतन्त्रत प्राप्ति के पश्चात् से आज तक
विभिन्न वगोर्ं के विकास के लिएअनेकों कार्यक्रम चलाए है।

इन कार्यक्रमों में समाज के विभिन्न वर्गो को लक्ष्य बनाया गया तथा उनके विकास के लिए कार्य
किया गया। उदाहरण के तौर पर सूखा सम्भावित क्षेत्रीय कार्यक्रम, कमाण्ड क्षेत्र विकास कार्यक्रम,
पर्वतीय विकास कार्यक्रम, जनजाति विकास कार्यक्रम आदि क्षेत्रीय विकास के कार्यक्रम है। सघन
कृषि क्षेत्रीय कार्यक्रम, समग्र कृषि विकास कार्यक्रम, अधिक उपज किस्म कार्यक्रम आदि कृषि
उत्पादन के सम्बन्धित कार्यक्रम है। ग्रामीण निर्माण कार्यक्रम, ग्रामीण रोजगार के लिए सघन
कार्यक्रम, काम के बदले अनाज कार्यक्रम, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, ग्रामीण युवाओं के लिए
स्वरोजगार प्रशिक्षण, ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारण्टी कार्यक्रम, जवाहर रोजगार योजना प्रधानमंत्राी
रोजगार योजना, स्वर्णजयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना, सम्पूर्ण ग्राम रोजगार योजना आदि ग्रामीण
क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध करवाने तथा गरीबी दूर करने के उद्देश्य से चलाये गये कार्यक्रम है।

संस्था निर्माण

विकास-प्रशासन की गतिविधियां केवल योजनाओं, नीतियों व कार्यक्रमों के निर्माण तक ही सीमित
नहीं है अपितु इनका सफल एंव प्रभावपूर्ण क्रियान्वयन भी विकास प्रशासन का उत्तरदायित्व है।
विकास नीतियों, योजनाओं व कार्यक्रमों को लागू करने के लिए विकास प्रशासन को कुछ
सरंचनाओं की आवश्यकता होती है। इस उद्देश्य से विकास प्रशासन सर्वप्रथम पहले से विद्यमान
संस्थाओं का सहारा लेता है। कई बार ये संस्थाए विकास कार्यक्रमों को लागू करने में सहायक
होती है। किन्तु अनेकों अवसरों पर विकास प्रशासन को इन संस्थाओं में कुछ आवश्यक परिवर्तन
भी करने पड़ते हैं ताकि ये संस्थाऐ विकास कार्यक्रमों के सफल क्रियान्वयन में सहायक बन सकें।
इसके अतिरिक्त कई बार विकास प्रशासन को सर्वथा नई संस्थाए भी स्थापित करनी पड़ती हैं
क्योंकि वर्तमान विद्यमान संस्थाएं किसी या किन्हीं विशेष विकास कार्यक्रम या कार्यक्रमों के
प्रभावपूर्ण कार्यान्वयन में सहायक सिद्ध नहीं हो पाती। उदाहरण के तौर पर भारत में विकास
प्रशासन ने स्वतन्त्रता प्राप्ति से अब तक अनेकों विकास कार्यक्रम बनाए तथा लागू किए और इन
कार्यक्रमों के उद्देश्यों की प्राप्ति व उनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए अनेक संस्थागत परिवर्तन
किए गए। इसके अतिरिक्त प्रशासन ने आवश्यकता पड़ने पर कई बार नई संस्थाओं का भी निर्माण
किया। ग्रामीण विकास के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रत्येक जिले अन्तर्गत खण्ड स्तरीय
प्रशासनिक ढ़ांचे का निर्माण इसका एक उदाहरण है। इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रो के विकास के लिए
बनाए एंव लागू किए जाने वाले सभी कार्यक्रमों में समन्वय लाने के लिए जिला स्तर एक पर संस्था
जिला ग्रामीण विकास अभिकरण का गठन किया गया है इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है
कि संस्था निर्माण भी विकास प्रशासन का एक महत्वपूर्ण कार्य है एंव इसके क्षेत्र में सम्मिलित किया
जाता है।

पर्यावरण का अध्ययन

तुलनात्मक प्रशासनिक समूह (CAG) के विद्धानों द्धारा किये गये अध्ययनों से यह सिद्ध हो गया
कि विकास प्रशासन और उसके सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक पर्यावरण के मध्य सतत्
रूप से अन्त: क्रिया होती है तथा दोनों एक दूसरे को गहनतम रूप से प्रभावित करते हैं। अत: विकास
प्रशासन की प्रविधियां, पद्धतियां, व्यवहार तथा संरचनाएं इसके पर्यावरण से प्रभावित होते हैं। इसके
साथ ही इन अध्ययनों से यह निष्कर्ष भी निकला कि कोई भी प्रशासनिक संस्था या विकास कार्यक्रम
जो एक विशेष पर्यावरण (सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, संवैधानिक, राजनैतिक आदि) में प्रभावपूर्ण
रहा है और अभिष्ट फल दे रहा है, आवश्यक नहीं कि यदि उसी रूप में उस कार्यक्रम या संस्था
को दूसरे पर्यावरण में स्थापित किए जाने पर वह इच्छित परिणाम दे और सफल रहे। इसलिए यह
आवश्यक है। कि विकास प्रशासन किसी अन्य देश या पर्यावरण के सफल परीक्षणों को अपनाने से
पहले दोनों व्यवस्थाओं की परिस्थितिकी का अध्ययन करे। अत: पर्यावरण या सन्दर्भ या परिस्थितकी
का अध्ययन विकास प्रशासन का एक महत्वपूर्ण व अभिन्न अंग है तथा विकास प्रशासन के क्षेत्र के
अन्तर्गत इसके अध्ययन को आवश्यक रूप से सम्मिलित किया जाता है।

प्र्बन्धकीय क्षमता का विकास एवं प्रशासनिक सुधार

प्रो. रिग्स के अनुसार विकास प्रशासन के दो महत्वपूर्ण आयाम है। पहला, विकास प्रशासन उस प्रक्रिया
से जुड़ा हुआ है जिसके द्धारा प्रशासन सामाजिक सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनैतिक परिवर्तनों का
संचालन करता है। दूसरा, यह प्रशासनिक प्रक्रियाओं, पद्धतियों सरचंनाआं,े कार्यप्रणालियों, व्यवहारों
आदि का भी अध्ययन करता है। पहले आयाम को ‘विकास के प्रशासन’ तथा दूसरे को ‘प्रशासनिक
विकास’ की संज्ञा दी गई है। अत: प्रशासनिक विकास अर्थात विकास की समस्याओं के निवारण तथा
बदलती हुई परिस्थितियों में प्रशासनिक पद्धतियों, कार्यवाहियों, प्रणालियों, व्यवहारों, प्रक्रियाओं,
सरंचनाओं आदि में यथेचित परिवर्तन लाना विकास प्रशासन का महत्वपूर्ण भाग है। यदि विकास
प्रशासन प्रशासनिक विकास को नजरअंदाज करता है तो विकास प्रशासन को इसका मूल्य अपने
विकास कार्यक्रमों की असफलता के रूप में चुकाना पड़ता है । क्योंकि यदि प्रशासनिक
अधिकारी, उनका व्यवहार, कार्यप्रणालियों तथा नियम, सरंचानाएँ आदि विकास की आवश्यकताओं
के अनुकूल नहीं होंगे तो विकास कार्यक्रम भले ही कितने भी युक्तिसंगत तथा प्रभावपूर्ण क्यों न हो,
अभीष्ट परिणाम नहीं दे पायेंगें। इससे संसाधनों तथा समय दोनों की ही बर्बादी होगी जिसे कि एक
विकासशील देश को रोकने का हर संभव प्रयास करना चाहिए।

अत: विकास प्रशासन को विकास का प्रभावशाली यन्त्र बनाने के लिए प्रशासनिक पदाधिकारियों
के दृष्टिकोण में ,प्रशासकीय संगठनों सरंचनाओं के व्यवहार में तथा प्रशासन के ढ़ांचे में सतत् रूप
से परिवर्तन की प्रक्रिया जारी रखना अति आवश्यक है। इसके लिए उन प्रशासकीय पदाधिकारियों
जो कि सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक व राजनैतिक विकास की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाते
हैं, को समय-समय पर दृष्टिकोण प्रशिक्षण (Orientation Training ) प्रदान करवाने की आवश्यकता
होती है। इसके साथ-साथ प्रशासन की प्रक्रिया एंव प्रविधियों को भी सरल एंव विवेकपूर्ण
(Rational) बनाना आवश्यक है ताकि वह सकारात्मक परिवर्तन (विकास) की प्रक्रिया में बाधक न
बने अपितु सहायक बने। अत: प्रशासनिक विकास भी विकास प्रशासन के अध्ययन क्षेत्र का
महत्वपूर्ण अंग है।

मानवीय तत्व या पक्ष का अध्ययन

विकास प्रशासन के क्षेत्र में मानवीय पक्ष का अध्ययन अपरिहार्य है। क्योंकि लोक प्रशासन (और
इसलिए विकास प्रशासन का उददेश्य ‘सेवा करना’ (To Serve) है। यूं तो सभी प्रशासन के अध्
ययन क्षेत्र में मानवीय तत्व का अध्ययन अवश्यंभावी है किन्तु विकास प्रशासन में इस तत्व का महत्व
और भी बढ़ जाता है क्योंकि यह (विकास प्रशासन) अधिक संवेदनशील है। विकास प्रशासन को
अनेकों बार समाज के उन नागरिकों के लिए कार्यक्रम बनाने तथा लागू करने होते हैं जो कि बाकि
समाज से पिछड़े हुए हैं। जैसे कि भारत में विकास प्रशासन के लाभार्थियों में महिला एवं शिशु ,
अनुसूचित जाति एंव जनजातियों के लोग, पिछड़ी जातियों या वगोर्ं के लोग सम्मिलित है। ऐसे वगोर्ं
को सेवित करने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि विकास प्रशासन की प्रणाली तथा
कार्यवाहियाँ मानवतापूर्ण हों। इसलिए “विकास प्रशासन में विविध समस्याओं को हमें मानवीय
व्यवहार के परिप्रेक्ष्य मे देखना चाहिए। इस प्रकार हम इसके अन्र्तगत सामाजिक मानक, मूल्यों,
व्यवहार, विचारों आदि का अध्ययन करते हैं।”

जन-सहभागिता

कोई भी प्रशासन जनसहभागिता के अभाव में अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह प्रभावपूर्ण तरीके से नहीं कर
सकता और विकास प्रशासन इसका अपवाद नहीं है। उदाहरणार्थ पुलिस प्रशासन जनसहयोग के
अभाव में अपराधियों और कानून तोड़ने वालों को पकड़ने में असुविधा का अनुभव करता है व
अपराधों को रोकने में पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाता । इसी प्रकार विकास प्रशासन भी जन सहयोग
और जन-सहभागिता के अभाव मे अपने विकास कार्यक्रमों को पूरी तत्परता से लागू नहीं कर पाता
है। यदि विकास कार्यक्रमों का निर्माण करते समय जन-सहभागिता को सुनिश्चित नहीं किया जाता
तो जनता उन कार्यक्रमों को लागू करवाने में कोई सहयोग नहीं देती जिससे कि ये कार्यक्रम
असफल हो जाते हैं। दूसरी ओर यदि कार्यक्रमों को बनाते समय लोगों की आकांक्षाओं को ध्यान
में रखा जाता है तथा उनके सहयोग से इनका निर्माण किया जाता है तो लोगों में ये भावना रहती
है कि ये कार्यक्रम उनके अपने हैं तथा वे उन कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू करवाने में पूरा
सहयोग देते हैं जिससे कि कार्यक्रम अभिष्ट परिणाम देते हैं।

आरम्भ में भारत में विकास प्रशासन ने विकास कार्यक्रमों में जन-सहभागिता को अवांछित समझा
और इन कार्यक्रमों के बनाने तथा लागू करने में जनसहयोग नहीं लिया। इसी कारण अनेकों विकास
कार्यक्रम इच्छित परिणाम नहीं दे पाए। किन्तु पिछले कुछ समय से विकास प्रशासन ने विकास
कार्यक्रमों के सफल क्रियान्वयन के लिए जन-सहभागिता के महत्व को समझते हुए अनेक विकास
कार्यक्रमों में जन-सहयोग को बढ़ावा दिया है इसका ज्वलंत उदाहरण है “स्वजल धारा।” यह
कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों मे पीने का पानी उपलब्ध करवाने के लिए चलाया जा रहा है। इस योजना
के अन्तर्गत ग्रामीणों को अपने गाँव मे पीने का पानी उपलब्ध करवाने के लिए स्वंय योजना बनानी
है तथा कुल लागत का 90% हिस्सा स्वंय देना है जबकि 10% भाग केन्द्रीय सरकार के द्वारा वहन
किया जाता है।

विकास प्रशासन के क्षेत्र का वर्णन करने का उपरोक्त प्रयास किसी भी तरह से पूर्ण नहीें कहा जा
सकता क्योंकि पहले तो विकास प्रशासन का क्षेत्र बहुत अधिक व्यापक है तथा दूसरे, समय समय
पर इसके क्षेत्र मेंपरिवर्तन होता रहता है। वास्तव में राज्य की क्रियाओं के क्षेत्र में परिवर्तन के
साथ-साथ विकास प्रशासन के क्षेत्र में भी परिवर्तन होता रहता है। उदाहरणार्थ, भारत में वर्तमान
में राज्य का क्षेत्र संकुचित हुआ है। इसके अनुरूप विकास प्रशासन का क्षेत्र भी सकुंचित हुआ है।

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