विनिमय-पत्र या विपत्र क्या है?

अनुक्रम
धारा 5 के अनुसार, ‘‘विपत्र एक ऐसा लेखपत्र है जिसमें एक शर्तरहित आदेश, इसके लिखने वाले के हस्ताक्षर के अन्तर्गतए किसी विशेष व्यक्ति को एक निश्चित रकम, किसी निश्चित व्यक्ति के आदेशानुसार अथवा विलेख के वाहक को, देने का होता है।’’

विपत्र के आवश्यक तत्व अथवा परिभाषा का विश्लेषण -

यदि हम उपर्युक्त परिभाषा का विश्लेशणात्मक अध्ययन करें तो हमें यह पता चलता है कि एक विपत्र में इन तत्वों का होना आवश्यक है -
  1. एक विनिमय-पत्र लिखित (In writing) होना चाहिए।
  2. धनराशि को चुकाने का एक आदेश होना चाहिए, अनुरोध (निवेदन या याचना) नहीं (An order to pay)
  3. आदेश शर्तरहित होना चाहिए। देखते की या मांगने पर (At sight or on demand), देखने के कुछ दिन पश्चात (So many days after sight), लिखित तिथि के कुछ दिन पश्चात (So many days after date) अथवा निश्चित घटना जेसै मृत्यु के कुछ दिन पश्चात का शर्त नहीं माना जाता (Unconditional)।
  4. राशि भी निश्चित होनी चाहिए।
  5. विपत्र के लिखने वाले के हस्ताक्षर होने आवश्यक हैं (Signed by the drawer)।
  6. जिस व्यक्ति पर विपत्र लिखा जाएए वह व्यक्ति भी निश्चित होना चाहिए।
  7. विपत्र एक निश्चित व्यक्ति के पक्ष में होना चाएि जो स्वयं एक लेखक भी हो सकता है।

विनिमय-पत्र के तीन पक्षकार -

  1. विनिमय पत्र को लिखने वाला अर्थात् लेखक या आहर्ता (Drawer)।
  2. जिसके ऊपर विनियम पत्र लिखा जाता है अर्थात् देनदार या आहण्र्ाी या आहर्ती (Drawee)।
  3. जो रुपया पाने वाला है अर्थात् लेनदान या आदाता (Payee)।

विनियम-विपत्र के प्रकार

विनिमय-विपत्र दो प्रकार का होता है -

देशी विपत्र  - 

ऐसे विपत्र का प्रयोग देश की सीमा के अन्दर व्यापार में बिल व्यवस्था करने तथा ऋण चुकाने में किया जाता है। अत: देशी विपत्र के सभी पक्षकार देश के अन्दर ही होते हैं।

विदेशी बिल - 

विदेशी विपत्र साधारणतया तीन प्रतिलिपियों में बनाया जाता है और इन तीनों को एक-दूसरे विपत्र की प्रतिलिपी कहते हैं। जैसे ही इन तीनों में से एक का भुगतान कर दिया जाता है तो बाकी की दो बेकार हो जाती हैं। इन विपत्रों को विभिन्न भागों में बनाया जाता है तथा हर एक भाग को अलग-अलग भेजा जाता है। वास्तव में इनको अलग-अलग इसलिए बनाया और भेज सकता है। ये तीनों भाग मिलकर एक विपत्र कहलाते हैं। लेखक को तीन भागों पर हस्ताक्षर करना होता है और तीनों को ही भेजना होता है। किन्तु मुद्रांक (Stamp) केवल एक ही भाग पर लगाना होता है और केवल एक ही भाग स्वीकार करना होता है। इस प्रकार जब एक भाग स्वीकार कर लिया जाता हैं तो बाकी के सब भाग व्यर्थ समझे जाते हैं। किन्तु यदि एक व्यक्ति विपत्र के सभी भागों को स्वीकार कर लेता है या दूसरे व्यक्तियों के पक्ष में उनका बेचान कर देता है तो वह स्वयं और दूसरे बेचान करने वालेए ठीक उसी भांति उत्तरदायी होंगे जैसे वे एक भिन्न विपत्र की दशा में होते हैं। किन्तु यदि उसी बिल के भिन्न-भिन्न भाग यथाविधि-धारियों (Holder in due course) पर पहुंच जाएं तो जिस व्यक्ति ने अपने भाग का अधिकार प्राप्त किया होए वह दूसरे भागों तथा विपत्र में लिखी हुए रकम के लिए भी अधिकारी होगा।

विनियम-विपत्र के अन्य प्रकार

एक विपत्र के देशी और विदेशी होने के अतिरिक्त और भी बहुत प्रकार हैं जो हैं :-
  1. अनुग्रह अथवा सहायतार्थ विपत्र (Accommodation Bill) - सभी विपत्र वास्तव में व्यापारिक विपत्र नहीं होते। कभी-कभी विपत्र किसी मित्रा की सहायता के लिए भी स्वीकार किए जाते हैं। जब कोई व्यक्ति बिना प्रतिफल के किसी दूसरे व्यक्ति की सहायता करने के उद्देश्य से विपत्र को स्वीकार करता है तो ऐसे विपत्र को ‘अनुग्रह विपत्र‘ कहते हैं। वह व्यक्ति जो दूसरे व्यक्ति की सहायता के लिए अनुग्रहकर्त्ता पक्ष (Accomodating Party) कहलाता है और वह पक्ष जो सहायता पाता है ‘अनुग्रहीत पक्ष’ (Accommodated Party) कहलाता है।
  2. अपूर्ण विपत्र (Incomplete Bill) - जब एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को एक विपत्र हस्ताक्षर करके तथा उस पर उचित मुद्रांक लगाकर दे दे और उसे पूरा खाली छोड़ दे या आंशिक रूप से लिखे और उसको यह अधिकार दे दे कि वह खाली स्थान को स्वयं लिख ले तो ऐसे विपत्र को अपूर्ण विपत्र कहेंगे। जिस व्यक्ति ने ऐसे विपत्र पर हस्ताक्षर किए हैं वह विपत्र के लिए दायी होता है क्योंकि विपत्र का हस्तान्तरण इस बात का प्रमाण है कि विपत्र के देने वाले ने विपत्र पाने वाले को पूरा करने का अधिकार दिया है। [धारा 20]
  3. बिना तिथि का विपत्र (Undated Bill) - कोई भी धारी निर्माण या स्वीकृति की तिथि को डाल सकता है। यदि कभी ऐसा हो जाए कि धारी से विपत्र पर तिथि सद्भावना में गलत पड़ जाए तो इसे भी सही मान लिया जाएगा यदि बाकी सब कानूनी शर्तें पूरी हों। [धारा 18]
  4. संदिग्ध विपत्र (Ambiguous Bill) - यदि कोई विपत्र ऐसे ढंग से लिखा गया हो कि उसे या तो विपत्र या प्रतिज्ञा-पत्र दोनों ही समझा जा सके तो ऐसे विपत्र को संदिग्ध विपत्र कहते हैं। जब विपत्र लिखने वाला लेखक तथा देनदार दोनों की ही स्थिति में हो या देनदार कोई कल्पित व्यक्ति होए या उसे प्रसंविदा करने का अधिकार न होए तो ऐसी स्थिति में धारक ऐसे विपत्र को प्रतिज्ञा-पत्र य विपत्र कुछ भी मान सकता है। [धारा 17] 
  5. कल्पित विपत्र (Fictitious Bill) - जब किसी विपत्र में लिखने वाला या जिसके ऊपर लिखा जा रहा हो या भुगतान पाने वालाए कोई भी कल्पित व्यक्ति हो - चाहे ऐसा व्यक्ति जीवित भी न हो तो ऐसे विपत्र को अंग्रेजी नियम के अनुसार ‘वाहक देय’ (Payable to bearer) कहते हैं। भारत में यदि किसी विपत्र में कोई भी व्यक्ति कल्पित हो तो ऐसा विपत्र परिवर्तनीय नहीं होता किन्तु यथाविधिधारी के हितों की रक्षा कल्पित विपत्र में भी होती है।

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