जेरेमी बेन्थम का जीवन परिचय, सिद्धान्त एवं राजनीतिक विचार

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असाधारण प्रतिभा के धनी उपयोगितावादी विचारक जेरेमी बेन्थम का जन्म 15 फरवरी 1748 ई0 को लन्दन के एक प्रतिष्ठित वकील परिवार में हुआ। उसने अपनी विलक्षण बुद्धि के बल पर मात्र 4 वर्ष की आयु में ही लेटिन भाषा का ज्ञान प्राप्त कर लिया। उसने 13 वर्ष की आयु में मैट्रिक तथा 15 वर्ष की आयु में 1763 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से स्नातक की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। उसके बाद उसने ‘लिंकन्स इन’ में कानून का अध्ययन किया और वहाँ से कानून का अध्ययन करने के पश्चात् उसने वकालत करना शुरू कर दिया। वकालत के पेशे से उसको अनुभव हुआ कि इंगलैण्ड के कानून में भारी त्रुटियाँ हैं। यदि ये त्रुटियाँ इंगलैण्ड के कानून में रहेंगी तो न्याय-व्यवस्था निरर्थक रहेगी। उसने महसूस किया कि कानून भंग करने वाले दण्ड से आसानी से बच जाते थे और निरपराध दण्ड पाते थे। उसने इंगलैंड के कानून के समस्त दोषों को दूर करने के प्रयास शुरू कर दिए। उसने 1776 में अपनी पुस्तक 'Fragments on Government' प्रकाशित करके इंगलैण्ड की राजनीति में तहलका मचा दिया। इस पुस्तक में बलेकस्टोन द्वारा प्रतिपादन इंगलिश कानून की टीकाओं में प्रतिपादित सिद्धान्तों की आलोचना की गई। इसके बाद कानून विशेषज्ञों ने बेन्थम के सुझावों के अनुसार ही इंगलैंड की कानून व न्याय व्यवस्था में परिवर्तन व सुधार करने शुरू कर दिए। इसके पश्चात् भी बेन्थम प्रतिदिन कुछ न कुछ लिखता रहा। उसकी ख्याति को देखकर उसके पिता ने उसके लिए एक सौ पौण्ड की वार्षिक आय की व्यवस्था कर दी ताकि वह आर्थिक चिन्ता से मुक्त होकर अपना लेखन कार्य करता रहे। उसने नीतिशास्त्र, कानून, तर्कशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, दण्डशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि विषयों का गहरा ज्ञान था। उसने इन क्षेत्रें में अपनी प्रतिभा के जौहर दिखाए और एक विशाल राजनीतिक चिन्तन को जन्म दिया। 1789 में उसकी रचना ‘नैतिकता और विधान निर्माण के सिद्धान्त’ का प्रकाशन हुआ। इससे उसकी प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई। 1792 में फ्रांस की राष्ट्रीय सभा ने उसे ‘फ्रेंच नागरिक’ की सम्मानजनक पदवी प्रदान की। इसी वर्ष उसके पिता की मृत्यु हो गई। विरासत में मिले धन से उसकी आर्थिक स्थिति अधिक सुदृढ़ हो गई और उसने अपने जीवन का शेष समय लन्दन स्थित अपने भवन 'Hermitage' में बिताया। यहीं पर उसने एक उग्र-सुधारवादी के रूप में अपना कार्य किया। उसने अपने उपयोगितावादी दर्शन को इसी भवन में परिपक्व किया। 6 जून 1832 को 84 वर्ष की आयु में उसका इसी स्थान पर निधन हो गया।

महत्त्वपूर्ण रचनाएँ

बेन्थम निर्बाध रूप से लिखने वाला एक महान् विचारक था। उसने तर्कशास्त्र, कानून, दण्डशास्त्र, नीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि विविध क्षेत्रें में अपनी प्रतिभा के जौहर दिखाए। उसकी अधिकतर रचनाएँ अपूर्ण हैं। उसका सम्पूर्ण लेखन कार्य 148 सन्दूकों में पाण्डुलिपियों के रूप में लन्दन विश्वविद्यालय और ब्रिटिश संग्रहालय में सुरक्षित रखा हुआ है। उसकी प्रमुख रचनाएँ हैं :-
  1. फ्रेगमेण्टस ऑन गवर्नमेंट : यह पुस्तक 1776 ई0 में प्रकाशित हुई। यह बेन्थम की प्रथम पुस्तक है। इस पुस्तक में बेन्थम ने ब्लैकस्टोन की कानूनी टीकाओं पर तीव्र प्रहार किए हैं। इस पुस्तक ने इंगलैण्ड के न्यायिक क्षेत्रें में हलचल मचा दी और इससे बेन्थम का सम्मान बढ़ा। इस पुस्तक में बेन्थम ने तत्कालीन इंगलैण्ड की न्याय-व्यवस्था के दोषों व उन्हें दूर करने के उपायों का वर्णन किया है।
  2. एन इण्ट्रोडक्शन टू दि प्रिन्सिपल्स ऑफ मारल्स एण्ड लेजिस्लेशन : इस पुस्तक का प्रकाशन 1789 ई0 में हुआ। इस पुस्तक में उपयोगितावाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। यह बेन्थम की सर्वोत्तम रचना है।
इन दो पुस्तकों के अतिरिक्त भी बेन्थम ने कुछ अन्य रचनाएँ भी लिखीं जो हैं :-
  1. डिसकोर्सेज आन सिविल एण्ड पेनल लेजिस्लेशन (Discourses on Civil and Penal Legislation, 1802)
  2. प्रिन्सिपल्स ऑफ इण्टरनेशनल लॉ (Principles of International Law)
  3. ए थ्योरी ऑफ पनिशमेण्ट एण्ड रिवाड्र्स (A Theory of Punishment and Rewards, 1811)
  4. ए ट्रीएटाईज ऑन ज्यूडिशियल एवीडेंस (A treatise on Judicial Evidence, 1813)
  5. दॉ बुक ऑफ फैलेसीज (The Book of Fallacies, 1824)
  6. कॉन्सटीट्यूशनल कोड ;Constituttional Code, 1830)

अध्ययन पद्धति

बेन्थम ने अपने चिन्तन में प्रयोगात्मक पद्धति का अनुसरण किया है। उसके उपयोगितावाद का सम्बन्ध जीवन के व्यावहारिक मूल्यों से है। इसलिए उसने वास्तविक जगत् के मनुष्यों के व्यवहार को जानने के लिए अनुभवमूलक पद्धति का ही सहारा लिया है। बेन्थम ने निरीक्षण, प्रमाण और अनुभव के आधार पर ही वास्तविक तथ्यों को जानने का प्रयास किया है। वह किसी वस्तु को कल्पना के आधार पर स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है। उसका विश्वास है कि निरीक्षण-परीक्षण एवं अनुभव पर आधारित परिणाम के अनुसार ही सत्य या असत्य की पहचान हो सकती है। वह प्रत्येक वस्तु को उपयोगिता की कसौटी पर रखता है। यदि कोई वस्तु उपयोगिता की दृष्टि से निरर्थक है, तो वह त्याज्य है। उपयोगिता की धारणा मूलत: प्रयोगात्मक है। बेन्थम उस अनुभव में विश्वास करता है जो वास्तविक तथ्यों से उत्पन्न होता है और जिसका प्रयोग व्यावहारिक जगत् में किया जा सकता है। उसका मानना है कि अनुभव ही ज्ञान का स्रोत है और सत्यता की कसौटी है। यदि किसी तथ्य के बारे में कोई सन्देह होता है तो उसका समाधान अनुभव के द्वारा ही किया जा सकता है। इस प्रकार अनुभव विचारों का अन्तिम स्रोत भी है। इसके अतिरिक्त बेन्थम ने तथ्यों की बौद्धिक व्याख्या एवं वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए इन्द्रिय संसर्ग का होना भी अनिवार्य माना है। इन्द्रिय संसर्ग से संवेदना उत्पन्न होती है और संवेदना से विचार उत्पन्न होते हैं। यही संसर्ग अनुभव को प्रभावित करता रहता है। इस प्रकार बेन्थम की पद्धति संसर्ग, निरीक्षण, अनुभव और प्रमाण पर आधारित होने के कारण आगमनात्मक, अनुभवात्मक, विश्लेषणात्मक व विवेचनात्मक है। बेन्थम की प्रयोगात्मक पद्धति उसकी महत्त्वपूर्ण देन है।

जेरेमी बेन्थम का सिद्धान्त

उपयोगितावाद का सिद्धान्त

उपयोगितावाद का सिद्धान्त बेन्थम की सबसे महत्त्वपूर्ण एवं अमूल्य देन है। उसके अन्य सभी राजनीतिक विचार उसके उपयोगितावाद पर ही आधारित हैं। लेकिन उसे इसका प्रवर्तक नहीं माना जा सकता। रोचक बात यह है कि बेन्थम ने कहीं भी उपयोगितावाद शब्द का प्रयोग नहीं किया। बेन्थम के उपयोगितावादी दर्शन का वर्णन उसकी दो पुस्तकों - ‘फ्रैग्मेण्ट्स ऑन दि गवर्नमेंट’ (Fragments on the Government) तथा ‘इण्ट्रोडक्शन टू दॉ पिंसिपल्स ऑफ मॉरल्स एण्ड लेजिस्लेशन’ (Introduction to the Principles of Morals and Legislation) में मिलता है।

उपयोगितावाद का विकास

उपयोगितावाद के सर्वप्रथम आचारशास्त्र के एक सिद्धान्त के रूप में प्राचीन यूनान के एपीक्यूरियन सम्प्रदाय में ही दर्शन होते हैं। इस सम्प्रदाय के अनुसार मनुष्य पूर्णतया सुखवादी है। वह सुख की ओर भागता है तथा दु:खों से बचना चाहता है। इसके बाद सामाजिक समझौतावादियों ने भी 17 वीं शताब्दी में इसका कुछ विकास किया। हॉब्स ने कहा कि मनुष्य पशुवत आचरण करने वाला एक सुखवादी प्राणी है। लॉक तथा पाश्चात्य दर्शन के सिरेनाक वर्ग के प्रचारकों ने भी उपयोगितावाद का विकास किया। डेविड ह्यूम ने भी इसका विकास किया। आगे चलकर ह्येसन ने अपनी पुस्तक ‘नैतिक दर्शन पद्धति’ (System of Moral Philosophy) में उपयोगितावाद के मूलमन्त्र ‘अधिकतम संख्या के अधिकतम सुख’ (The Greatest Happiness of the Greatest Number) का प्रथम बार प्रयोग किया। आगे प्रीस्टले ने भी इसी मूलमन्त्र का प्रयोग किया। इसके बाद बेन्थम ने भी प्रीस्टले के निबन्ध 'Priestley's Essay on Government' से उपयोगितावाद की प्रेरणा ग्रहण की। बेन्थम ने बताया कि राज्य की सार्थकता तभी है जब वह अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख की व्यवस्था करे।

उपयोगितावाद का अर्थ

उपयोगितावाद राजनीतिक सिद्धान्तों का ऐसा कोई संग्रह नहीं है जिसमें राज्य और सरकार के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया हो। यह मानव आचरण की प्रेरणाओं से सम्बन्धित एक नैतिक सिद्धान्त है। उपयोगितावाद 18 वीं शताब्दी के आदर्शवाद के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया है जो इन्द्रियानुभववाद की स्थापना करता है। उपयोगितावादियों की दृष्टि में उपयोगितावाद का अर्थ - ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख’ है। इसका अर्थ “किसी वस्तु का वह गुण है जो लाभ, सुविधा, आनन्द, भलाई या सुख प्रदान करता है तथा अनिष्ट, कष्ट, बुराई या दु:ख को पैदा होने से रोकता है।” बेन्थम के मतानुसार- “उपयोगिता किसी कार्य या वस्तु का वह गुण है जिससे सुखों की प्राप्ति तथा दु:खों का निवारण होता है।” बेन्थम ने आगे कहा है कि उपयोगितावाद की अवधारणा हमें यह बताती है कि हमें क्या करना चाहिए तथा क्या नहीं करना चाहिए। यह हमारे जीवन के समस्त निर्णयों की आधारशिला है। उपयोगितावाद का वास्तविक अर्थ सुख है। व्यक्ति ही नहीं सम्पूर्ण समाज का लक्ष्य भी सुख की प्राप्ति है।

उपयोगितावाद की विशेषताएँ

बेन्थम के उपयोगितावाद के सिद्धान्त की विशेषताएँ हैं :-
  1. सुख और दु:ख पर आधारित: बेन्थम का उपयोगितावादी सिद्धान्त सुख और दु:ख के दो आधारों पर आधारित है। बेन्थम का मानना है कि जो कार्य हमें सुख देता है, उपयोगी है तथा जो कार्य दु:ख पहुँचाया है, उपयोगी नहीं। बेन्थम का मानना है कि प्रकृति ने मनुष्य को सुख और दु:ख की दो शक्तियों के अधीन रखा है। यही शक्तियाँ हमें बताती हैं कि मनुष्य को क्या करना चाहिए और क्या नहीं। सही और गलत के मानदण्ड उन शक्तियों से बँधे हुए हैं।
  2. सुख की प्राप्ति और दु:ख का निवारण : बेन्थम का मत है कि जो वस्तु सुख प्रदान करती है, वह अच्छी है और उपयोगी है। जिस कार्य या वस्तु से मनुष्य को दु:ख प्राप्त होता है वह अनुपयोगी है। मानव के समस्त कार्यों की कसौटी उपयोगितावाद है। बेन्थम का मानना है कि जिस कार्य से प्रसन्नता या आनन्द में वृद्धि होती है तो वह कार्य उपयोगी है। उससे सुख की प्राप्ति होती है और दु:ख का निवारण होताहै। अत: उपयोगितावाद का सिद्धान्त सुख की प्राप्ति और दु:ख के निवारण का सिद्धान्त है।
  3. सुख व दुु:ख का वर्गीकरण : बेन्थम ने सुख-दु:ख को दो भागों - सरल व जटिल में विभाजित किया है। उसके अनुसार सरल सुख 14 प्रकार के तथा सरल दु:ख 12 प्रकार के हैं। सरल सुखों या दु:खों को परस्पर मिलाने से जटिल सुख या दु:ख का जन्म होता है। सरल सुख : (1) मित्रता का सुख (2) इन्द्रिय सुख (3) सहायता का सुख (4) सम्पर्क सुख (5) दया का सुख (6) स्मरण- शक्ति का सुख (7) आशा का सुख (8) सत्ता का सुख (9) धार्मिकता का सुख (10) ईष्र्या का सुख (11) उदारता का सुख (12) सम्पत्ति का सुख (13) कुशलता का सुख (14) यात्रा का सुख सरल दु:ख - (1) अपमान का दुःख (2) धर्मनिष्ठा का दु:ख (3) सम्पर्क का दुःख (4) कल्पना का दु:ख  शत्रुता का दुख (6) इन्द्रिय दुःख (7) अभाव का दु:ख (8) स्मरण शक्ति का दुःख (9) उदारता का दु:ख (10) आशा का दु:ख (11) ईर्ष्या का दुःख (12) अकुशलता का दु:ख।
  4. सुख-दुःख के स्रोत : बेन्थम ने सुख-दुःख के चार स्रोत - धर्म, राजनीति, नैतिकता तथा भौतिक मानते हैं। धार्मिक सुख धर्म में आस्था रखने से व धार्मिक व्यवस्था को स्वीकार करने से प्राप्त होता है। जैसे कुम्भ के मेले में स्नान करना। यदि वहाँ कोई अनहोनी हो जाए तो उसे धार्मिक दु:ख कहा जाएगा। राजनीतिक सुख राज्य की नीतियों व कार्यों से प्राप्त होता है। जैसे सरकार द्वारा धर्मनिरपेक्ष नीति का पालन करना। यदि सरकार कोई ऐसा कार्य करे जो जन-कल्याण के विपरीत हो तो उससे प्राप्त दु:ख राजनीतिक दु:ख होगा। व्यक्ति को नैतिक सुख उसके नैतिक आचरण से प्राप्त होता है। जैसे दूसरों की सहायता करना। यदि आवश्यकता पड़ने पर तुम्हें कोई सहायता न मिले तो उससे प्राप्त दु:ख नैतिक दु:ख कहलाएगा। भौतिक सुख प्राकृतिक वस्तुओं से प्राप्त होता है। जैसे सन्तुलित वर्षा का होना सभी को सुख प्रदान करता है। यदि वर्षा अत्यधिक मात्रा में होकर जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दे तो इससे प्राप्त दु:ख भौतिक या प्राकृतिक दु:ख कहलाएगा।
  5. सुखों में मात्रात्मक अन्तर : बेन्थम का मानना है कि सभी सुख गुणों में एक जैसे होते हैं। इसलिए उनमें गुणात्मक की बजाय मात्रात्मक अन्तर पाया जाता है, उसका कहना है कि “पुष्पिन (बच्चों का खेल) उतना ही अच्छा है जितना कविता पढ़ना” खेलने से भौतिक-सुख प्राप्त होता है जबकि कविता पढ़ने से मानसिक सुख। दोनों सुखी की मात्रा को मापा जा सकता है। इनकी गणना सम्भव है। बेन्थम ने कहा है कि एक कील भी उतना ही दर्द करती है जितना कर्कश आवाज। अत: सुखों में मात्रात्मक अन्तर है, गुणात्मक नहीं। 
  6. सुखों-दु:खों का मापन : बेन्थम के अनुसार सुखों व दु:खों को परिमाणिक तौरपर मापा जा सकता है। इससे कोई अपने सुख या दु:ख को माप सकता है। यह मापन ही किसी वस्तु या कार्य को सुख-दु:ख के आधार पर अच्छा या बुरा प्रमाणित कर सकता है। ये सुख-दु:ख मानवीय क्रियाओं के आचार व उद्देश्य होते हैं। इन सुखों को फेलिसिफिक केलकुलस द्वारा मापा जा सकता है।
  7. सुखवादी मापक यन्त्र  : बेन्थम का विचार है कि सुख-दु:ख को तुलनात्मक आधार पर परखा जा सकता है। बेन्थम ने सुख-दु:ख के मापन की जो पद्धति सुझाई है, उसे सुखवादी मापक यन्त्र (Felicific Calculus) का नाम दिया गया है। बेन्थम का मानना है कि सुख-दु:ख का गणित के सहारे पारिमाणिक नापतोल (Mathematical Computation), सम्भव है। इस सिद्धान्त के अन्तर्गत तीव्रता (Intensity), अवधि (Duration), निश्चिन्तता (Certainty), अनिश्चित्तता (Uncertainty), सामीप्य (Propinquity), अन्य सुख उत्पन्न करने की क्षमता (Fecundity), विशुद्धता (Purity) व विस्तार (Extent) के आधार पर सुख-दु:ख का मापन किया जाता है। बेन्थम ने स्पष्ट किया है कि जो सुख तीव्र होता है, वह अधिक समय तक टिका रहता है। कम तीव्र सुख कम समय तक रहते हैं। निश्चित सुख अनिश्चित की तुलना में अधिक मात्रा वाला होता है। इस प्रकार अन्य तथ्यों के आधार पर भी सुख-दु:ख का निरूपण किया जा सकता है। बेन्थम ने सुख-दु:ख की गणना करते समय सुखों के समस्त मूल्यों को एक तरफ तथा दु:खों के समस्त मूल्यों को दूसरी तरफ जोड़ने का सुझाव दिया है। यदि एक-दूसरे को आपस में घटाने से सुख बच जाए तो वह कार्य उचित है अन्यथा अनुचित। इस प्रकार इस सिद्धान्त के द्वारा बेन्थम ने यह सिद्ध किया है कि कोई कार्य उचित है या अनुचित। 
  8. परिणामों पर जोर : बेन्थम का उपयोगितावाद का सिद्धान्त परिणामों पर आधारित है, नीयत (Motive) पर नहीं। बेन्थम का मानना है कि सुख और दु:ख स्वयं ही उद्देश्य हैं। इनके होते हुए अच्छे या बुरे इरादों को मानने की आवश्यकता नहीं। किसी भी कार्य की अच्छाई या नैतिकता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वह किस उद्देश्य को लेकर किया जाता है, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि उसके परिणाम क्या निकलते हैं। बेन्थम का मानना है कि किसी भी विधि या संस्था की उपयोगिता की जाँच इस आधार पर ही हो सकती है कि स्त्रियों या पुरुषों पर उनका क्या प्रभाव पड़ता है। बेन्थम नीयत (Motive) को उसी सीमा तक स्वीकार करता है, जहाँ तक वह परिणाम को निर्धारित करती है। इस प्रकार उसने नैतिक बुद्धि, ईश्वरीय इच्छा, कानून के नियम आदि को तिलांजलि दे दी। उसने किसी वस्तु के परिणाम को ही सत्य-असत्य, अच्छाई-बुराई का मापदण्ड स्वीकार किया है।
  9. राज्य का उद्देश्य अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख है : बेन्थम के अनुसार राज्य के वे कार्य ही उपयोगी हैं जो व्यक्तियों को लाभ पहुँचाते हैं। सभी व्यक्ति राज्य के आदेशों का पालन इसलिए करते हैं, क्योंकि वे उनके लिए उपयोगी हैं। राज्य का उद्देश्य किसी एक व्यक्ति को सुख प्रदान करना नहीं है बल्कि अधिक से अधिक व्यक्तियों को सुख प्रदान करना है। इसलिए बेन्थम कहता है कि व्यक्ति को अधिक से अधिक लोगों के कल्याण में राज्य को सहयोग देना चाहिए।
  10. अनुशस्तियों का सिद्धान्त : बेन्थम का मानना है कि व्यक्ति के अधिकतम सुख तथा व्यक्तियों के अधिकतम सुख के मध्य संघर्ष की सम्भावना को देखते हुए व्यक्ति पर अंकुश लगाना आवश्यक होता है ताकि वह दूसरों के सुख को कोई हानि नहीं पहुँचाए। इसलिए दूसरों के सुखों का ध्यान रखने में व्यक्ति को प्रेरित करने के लिए कुछ अनुशस्तियों (Sanctions) की आवश्यकता पड़ती है। सुख की अनुशस्तियाँ शारीरिक, नैतिक, धार्मिक और राजनीतिक 4 प्रकार की होती है। धार्मिक अनुशस्ति व्यक्ति के आचरण को ठीक करती है। नैतिक अनुशस्ति व्यक्ति के मन को अनुशासित करती है। यह सदैव उपयोगी होती है। राजनीतिक अनुशस्ति राज्य द्वारा पुरस्कार और दण्ड के रूप में व्यक्तियों पर लगाई जाती है। इसे कानून अनुशस्ति भी कहा जाता है।

उपयोगितावाद की आलोचनाएँ

बेन्थम ने अपने उपयोगितावाद के सिद्धान्त को सरल और सुबोध बनाने का इतना अधिक प्रयास किया कि इस सिद्धान्त में अनेक दोष उत्पन्न हो गए। आलोचकों ने उसके इस सिद्धान्त को भ्रम एवं विरोधाभास का पिटारा कह दिया। इसकी आलोचना के प्रमुख आधार हैं:-
  1. मौलिकता का अभाव : यह सिद्धान्त बेन्थम की मौलिक देन नहीं है। बेन्थम ने पी्रस्टले के विचारों को ही नया रूप देने का प्रयास किया है। बेन्थम ने भी प्रीस्टले के ही इस विचार को उधार लिया है कि राज्य का उद्देश्य ‘अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख’ प्रदान करना है। ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख’ का विचार प्रीस्टले के माध्यम से बेन्थम तक पहुँचा। अत: इसमें मौलिकता का अभाव है।
  2. अमनोवैज्ञानिक सिद्धान्त : बेन्थम ने मानव-प्रकृति को कोरा सुखवादी माना है। उसके अनुसार मनुष्य घोर स्वार्थी और अपने सुख के लिए प्रयास करने वाला प्राणी है। किन्तु सत्य तो यह है कि मनुष्य स्वार्थी न होकर परोपकारी भी है। वह दूसरों के लिए भी जीवन जीता है। वह सुख की भावना से नहीं बल्कि देश-प्रेम, बलिदान, त्याग आदि भावनाओं से भी प्रेरित होकर कार्य करता है। ईसा मसीह ने मृतयु को गले क्यों लगाया ? राम वन में क्यों गए ? इन सब के पीछे एक ही कारण था - परोपकार। इस प्रकार बेन्थम ने आध्यात्मिक विकास एवं उच्च आदर्शों की अवहेलना करके केवल सुख को ही महत्त्व दिया है। अत: यह सिद्धान्त अमनोवैज्ञानिक है जो मानव-प्रकृति का गलत चित्रण करता है।
  3. स्पष्टता का अभाव : बेन्थम ने सब कार्यों का आधार ‘अधिकतम संख्या के अधिकतम सुख के विचार को माना है। बेन्थम ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि प्रधानता व्यक्तियों की संख्या को दी जाएगी या सुख की मात्रा को। उदाहरण के लिए हम मान लें कि कानून बनाने से 10 मिल मालिकों में से प्रत्येक को 1000 रुपये का लाभ होता है किन्तु मजदूरों की मजदूरी में 2 रुपये प्रति मजदूर के हिसाब से 1000 मजदूरों को 2000 रुपये की हानि होती है। मालिकों को कुल 10000 रुपये का लाभ होता है। इसमें देखा जाए तो 10 मालिकों का लाभ 1000 मजदूरों की हानि से अधिक है। अत: कानून बनाना उपयोगी है। यदि अधिकतम लोगों की दृष्टि से देखा जाए तो 1000 मजदूरों की हानि को महत्त्व देकर कानून बनाया जाए। ऐसी अवस्था में अधिकतम संख्या व अधिकतम सुख में अन्तर्विरोध उत्पन्न होता है। इसलिए उपयोगिता का सिद्धान्त यह स्पष्ट नहीं करता कि कानून किसके पक्ष में बनाया जाए। अत: इस विषय में यह सिद्धान्त पद-प्रदर्शन न कर पाने के कारण अस्पष्ट व दोषपूर्ण है।
  4. सुखवादी मान्यता दोषपूर्ण है : बेन्थम केवल सुख को ही मानवीय क्रियाओं का एकमात्र प्रेरक कारण मानते हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि संसार में केवलमात्र सुख को ही प्रेरक मान लिया जाए तो सुखों की प्राप्ति की होड़ लग जाएगी। इससे कर्त्तव्य व स्वार्थ का संघर्ष समाप्त हो जाएगा। यदि भौतिक सुख ही सब कुछ होता तो कवि कविता की रचना क्यों करता? महात्मा बुद्ध राजसी ठाठबाट का त्याग क्यों करते ? जिस प्रकार सुख की खोज मानव-स्वभाव का अंग है, वैसे ही देशभक्ति, त्याग, परोपकार आदि उदात्त भावनाएँ भी उसके स्वभाव का अंग है। मानव जीवन आदर्शों पर आधारित है, न कि सुखवादी दृष्टिकोण पर।
  5. सुखवादी मापन यन्त्र दोषपूर्ण है : बेन्थम द्वारा बताई गई इस विधि से सुखों का मात्रा को सही ढंग से मापना असम्भव है। बेन्थम ने सुख मापन के विभिन्न तत्त्वों की तुलना करने का मूल्यांकन करने की निश्चित पद्धति नहीं बताई है। उदाहरण के लिए यदि एक सुख की प्रगाढ़ता (Intensity) कम तथा अवधि (Duration) अधिक हो तथा दूसरे की प्रगाढ़ता (Intensity) अधिक तथा अवधि (Duration) कम हो तो दोनों सुखों की मात्रा और तारतम्य का निर्धारण कैसे हो ? इस विषय पर बेन्थम कुछ नहीं कह सका। अत: यह अनुपयोगी पद्धति है। व्यक्तियों की रुचि, समय और परिस्थितियों के कारण सुख-दु:ख में भी परिवर्तन आता रहता है। एक समय पर सुख देने वाली वस्तु दूसरे समय दु:ख भी प्रदान कर सकती है। रुचि वैचित्रय के कारण अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख का अनुमान लगाना कठिन हो जाता है। अत: सुखवादी मापन यन्त्र में अस्पष्टता तथा अनिश्चितता है।
  6. बहुसंख्यकों की निरंकुशता : बेन्थम का सिद्धान्त प्रत्येक व्यक्ति के सुख पर नहीं बल्कि बहुसंख्या के सुख पर जोर देता है। यदि बहुसंख्यक अपने आनन्द के लिए अल्पसंख्यकों को दास भी बनाना चाहें तो उचित है। इस दशा में अल्पसंख्यकों का सुख बहुसंख्यकों के सुख के नीचे हमेशा दफन रहेगा। इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से यह सिद्धान्त बहुसंख्यकों के अत्याचार को उचित व न्यायपूर्ण ठहराता है। इसलिए यदि सुख स्वाभाविक प्रवृत्ति है तो उसे प्राप्त करने का अधिकार सभी को मिलना चाहिए। अत: यह सिद्धान्त बहुसंख्यकों के अत्याचार व अन्याय को प्रोत्साहन देता है।
  7. नैतिकता की उपेक्षा : बेन्थम ने केवल भौतिक सुखों के आधार पर अपना सिद्धान्त खड़ा किया हैं उसने सुख को ही जीवन का चरम लक्ष्य माना है। उसकी दृष्टि में उच्च नैतिक भावना, अन्त:करण और धर्म-अधर्म का कोई महत्त्व नहीं है। उदाहरणार्थ पाँच डाकू एक सज्जन पुरुष को लूटकर उसे जान से मार दें तो इससे अधिकतम का ही लाभ हुआ। उस सज्जन व्यक्ति की हानि का कोई महत्त्व नहीं रह जाता है। किन्तु नैतिक रूप से ऐसा नहीं होना चाहिए। अत: बेन्थम ने नैतिकता की घोर उपेक्षा करके अव्यवस्था को ही जन्म देने वाली स्थिति पैदा की है।
  8. सुखों के गुणात्मक भेद की उपेक्षा - बेन्थम की दृष्टि से विभिन्न वस्तुओं और कार्यों से प्राप्त सुख मात्रात्मक होता है, गुणात्मक नहीं। उसका कहना है कि आनन्द का जितनी मात्रा घर पर रहने से मिलती है, उतनी ही घूमने से नहीं मिलती है। दोनों सुखों में मात्रात्मक अन्तर होता है। लेकिन सत्य तो यह है कि एक चित्रकार को चित्र बनाने में जो आनन्द प्राप्त होता है, वह उस चित्र को देखने वाले के आनन्द से अलग होता है। स्वादिष्ट वस्तुओं से मिलने वाला आनन्द, खेलने से प्राप्त होने वाले आनन्द से भिन्न है। इन सब में मात्रात्मक भेद के साथ-साथ गुणात्मक भेद भी होता है। घर पर लेटे रहना एक निकृष्ट कोटि का आनन्द है, एवरेस्ट पर चढ़ना एक उत्कृष्ट कोटि का आनन्द है। अत: बेन्थम का सिद्धान्त गुणों की उपेक्षा करने के कारण दोषपूर्ण है। बेन्थम के अनुयायी जे0 एस0 मिल ने भी इस भूल को स्वीकार किया। 
  9. शासन विषयक सिद्धान्त : बेन्थम ने राज्य और सरकार में कोई अन्तर नहीं किया है। वह व्यक्ति द्वारा सुख की प्राप्ति के लक्ष्य पर बल देता है। वह मनुष्य के और राज्य के पारस्परिक सम्बन्धों का विवेचन नहीं करता। वह केवल इतना कहता है कि राज्य को न्यूनतम हस्तक्षेप करना चाहिए। वह केवल शासन कार्यों का विवेचन करता है, राज्य के सैद्धान्तिक पक्ष का नहीं।
  10. अतकर्सगंत : बेन्थम ने एक सुख से दूसरे सुख की उत्पत्ति की बात तो कही है लेकिन इस सुख कके जनक की अवहले ना की है। प्रत्येक सुख की उत्पत्ति के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। बेन्थम इसका कारण बताने में असफल रहे हैं। अत: यह सिद्धान्त तर्कसंगत नहीं है।
  11. सभी सुख समान नहीं होते : बेन्थम ने भौतिक सुख और मानसिक सुखों को समान माना है। शरीर और आत्मा की अनुभूति के उद्देश्य और मात्रा असमान होते हैं। बेन्थम ने मात्रात्मक आधार पर सुखों में अन्तर मानकर मनुष्य को पशु स्तर तक गिरा दिया है। मैक्सी का कहना है- “बेन्थम की धारणा के अनुसार मनुष्य सूअर है।”
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि बेन्थम का उपयोगितावाद का दर्शन गलत धारणाओं पर आधारित है। बेन्थम ने सुख और आनन्द को समानाथ्र्ाी मान लिया है। यह अन्तर्विरोधों से ग्रस्त है। यह गुणात्मक पहलू की उपेक्षा करता है। उसका सुखवादी मापन यन्त्र वैज्ञानिक तरीका नहीं है। ‘सबसे बड़ा सुख’ और ‘सबसे बड़ी संख्या’ के मध्य कोई तार्किक सम्बन्ध नहीं है। यह सिद्धान्त बहुमत की निरंकुशता को बढ़ावा देता है। अत: यह सिद्धान्त भ्रान्त, भौतिक व एकांगी है। इसमें यथार्थवाद व मनोवैज्ञानिकता का पुट नहीं है। इसलिए यह सिद्धान्त अस्पष्ट व अपूर्ण है। लेकिन अनेक दोषों के बावजूद भी यह सिद्धान्त लोक-कल्याणकारी राज्य की उदात्त भावना से प्रेरित है। आधुनिक प्रजातन्त्र में इसका विशेष महत्त्व है।

बेन्थम का राजनीतिक विचार

राजनीतिक दश्रन के इतिहास में यह एक विवादास्पद मुद्दा रहा है कि क्या बेन्थम को एक राजनीतिक दार्शनिक माना जाए या नहीं। कई लेखक उसको राजनीतिक दार्शनिक की बजाय एक राजनीतिक सुधारक मानते हैं। उनके अनुसार बेन्थम का ध्येय किसी राजनीतिक सिद्धान्त का प्रतिपादन करना नहीं था बल्कि अपने सुधारवादी कार्यक्रम की पृष्ठभूमि के लिए राज्य के सम्बन्ध में कुछ विचार प्रस् करना था ताकि इंगलैण्ड की शासन प्रणाली में वांछित सुधार किए जा सकें। उसके प्रमुख राजनीतिक विचार उसके सुधारवादी कार्यक्रम का ही एक हिस्सा हैं। उसके प्रमुख राजनीतिक विचार हैं :-

राज्य सम्बन्धी विचार 

बेन्थम राज्य को एक कृत्रिम संस्था मानता है। उसने राज्य की उत्पत्ति के ‘सामाजिक समझौता सिद्धान्त’ का खण्डन किया है। वह राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता को नकारते हुए कहता है कि इस प्रकार का समझौता कभी हुआ ही नहीं था और यदि हुआ भी हो तो वर्तमान पीढ़ी को इसे स्वीकार करने के लिए बाध्य करना न्यायसंगत नहीं है। उसका कहना है कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि समझौता हुआ हो। उसका कहना है कि यदि समझौता होना स्वीकार कर भी लिया जाए तो समझौते द्वारा आज्ञा पालन के कर्त्तव्य की कोई निश्चित व्याख्या नहीं की जा सकती। बेन्थम का मानना है कि मनुष्य द्वारा कानून तथा सरकार की अधीनता स्वीकार करने का मुख्य कारण मूल समझौता न होकर वर्तमान हित व उपयोगिता है। सरकारों का अस्तित्व इसलिए है कि वे सुख को बढ़ाती हैं। मनुष्य कानून और राज्य की आज्ञा का पालन इसलिए करते हैं कि वे जानते हैं कि “आज्ञा पालन से होने वाली संभावित हानि आज्ञा का पालन न करने से होने वाली हानि से कम होती है।” इसलिए राज्य की उत्पत्ति का आधार सामाजिक उपयोगिता है न कि सामाजिक समझौता। उसके अनुसार- “राज्य एक काल्पनिक संगठन है जो व्यक्तियों के हितों का योग मात्र है।” राज्य का हित उसमें रहने वाले व्यक्तियों के हितों का योग मात्र होता है। बेन्थम के मतानुसार- “राज्य व्यक्तियों का एक समूह है जिसका संगठन उपयोगिता अथवा सुख की वृद्धि करने के लिए किया गया है।” उसके अनुसार राज्य का ध्येय या लक्ष्य न तो व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारना है और न ही समुदाय के सद् और नैतिक जीवन की उन्नति करना है बल्कि वह तो ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ में वृद्धि करना है। 

इस प्रकार बेन्थम राज्य की उत्पत्ति के ‘सामाजिक समझौता सिद्धान्त’, ‘आदर्शवादी सिद्धान्त’, ‘आंगिक सिद्धान्त’, आदि का खण्डन करते हुए राज्य की उत्पत्ति का आधार सामाजिक उपयोगिता को मानते हुए राज्य को एक कृत्रिम संस्था स्वीकार करता है। उसके अनुसार राज्य व्यक्तियों के हितों का योग मात्र है। वह राज्य को एक साध्य न मानकर एक साधन मात्र मानता है जिसका उद्देश्य सार्वजनिक हित में वृद्धि करने के साथ-साथ ‘अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख’ को खोजना है। अत: राज्य की उत्पत्ति का यह सिद्धान्त सीमित व संकुचित है। इसके अनुसार राज्य व्यक्ति के सुख का साधन मात्र है। यह एक व्यक्तिवादी धारणा है।

राज्य की विशेषताएँ

बेन्थम के सिद्धान्त के अनुसार राज्य को निम्नलिखित विशेषताएँ है :
  1. यह अधिकतम सुख को बढ़ाने वाला एक मानवी अभिकरण है।
  2. यह व्यक्ति के अधिकारों का स्रोत है।
  3. यह व्यक्ति के हितों में वृद्धि करने का एक साधन है।
  4. इसका लक्ष्य अपने नागरिकों के सुख में वृद्धि करना है।
  5. यह दण्ड-विधान द्वारा नागरिकों को अनुचित कार्यों को करने से रोकने वाला साधन है।
इस प्रकार राज्य अपने नागरिकों के हितों को अधिकतम सीमा तक बढ़ाने के लिए कानून का सहारा लेता है। वह कानून को ढाल बनाकर ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ में वृद्धि के मार्ग में आने वाली रुकावटों पर अंकुश लगाता है।

राज्य के कार्य 

बेन्थम के अनुसार राज्य के कार्य सकारात्मक न होकर नकारात्मक हैं। उसने राज्य को व्यक्ति की अपेक्षा कम महत्त्व प्रदान किया है। उसके अनुसार राज्य के कार्य हैं :-
  1. राज्य लोगों के सुख में वृद्धि तथा दु:ख में कमी करने का प्रयास करता है।
  2. वह नागरिकों को गलत कार्यों को करने से रोककर उनके आचरण का नियन्त्रित करता है।
इस प्रकार राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में बेन्थम का दृष्टिकोण नकारात्मक ही रहा है। उसने व्यक्तिवादी और लेसेज-फेरे (Individualist and Laissez-faire) की धारणा पर ही अपने राज्य सम्बन्धी विचारों को खड़ा किया है। उसका राज्य नागरिकों के व्यक्तित्व का विकास करने की बजाय उनके सुख में वृद्धि करना है। अत: बेन्थम की दृष्टि में नागरिकों का स्थान राज्य से उच्चतर है।

सरकार सम्बन्धी विचार

बेन्थम के सरकार या शासन सम्बन्धी विचार भी उसके उपयोगितावादी सिद्धान्त पर ही आधारित हैं। बेन्थम राज्य और सरकार में अन्तर करते हुए सरकार को राज्य का एक छोटा सा संगठन मानता है तो कानून तथा अधिकतम सुख के लक्ष्य को कार्यान्वित करता है। बेन्थम उपयोगितावाद के सिद्धान्त की कसौटी पर विभिन्न शासन प्रणालियों को परखकर गणतन्त्रीय सरकार का ही समर्थन करता है। उसका विश्वास है कि “अन्ततोगत्वा प्रतिनिधि लोकतन्त्र ही एक ऐसी सरकार है जिसमें अन्य सभी प्रकार की सरकारों की तुलना में अधिकतम लोगों की अधिकतम सुख प्राप्त कराने की क्षमता है।” उसके विचारानुसार गणतन्त्रीय सरकार में कुशलता, मितव्ययिता, बुद्धिमत्ता तथा अच्छाई जैसे गुण पाए जाते हैं। उसके विचार में राजतन्त्र बुद्धिमानों का शासन तो है, परन्तु वह ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ का पालन करने में असक्षम है। गणतन्त्र में कानून बनाने का अधिकार जनता के पास होने के कारण कानून जनता के हित में बनते हैं और ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ का लक्ष्य सरलता से प्राप्त हो सकता है। इसी तरह कुलीनतन्त्र में बुद्धिमत्ता तो पाई जाती है, क्योंकि यह गुणी और अनुभवी व्यक्तियों द्वारा संचालित होती है, लेकिन इसमें ईमानदारी कम पाई जाती है। यह शासन व्यवस्था भी “अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ के सिद्धान्त की उपेक्षा करती है। गणतन्त्र में जनता व शासक के हितों में समानता रहती है। इसलिए ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ का ध्येय गणतन्त्र में ही प्राप्त किया जा सकता है, अन्य शासन-प्रणालियों में नहीं। अत: गणतन्त्रीय सरकार ही सर्वोत्तम सरकार है।

सम्प्रभुुता सम्बन्धी विचार 

बेन्थम ने राज्य की सम्प्रभुता का समर्थन किया है। उसका मानना है कि शासक सभी व्यक्तियों और सब बातों के सम्बन्ध में कानून बना सकता है। चूँकि कानून आदेश होता है, अतएव यह सर्वोच्च शक्ति का ही आदेश हो सकता है। बेन्थम का मानना है कि राज्य का अस्तित्व तभी तक रहता है, जब तक सर्वोच्च सत्ता की आज्ञा की अनुपालन लोगों द्वारा स्वभावत: की जाती है। बेन्थम के अनुसार राज्य सम्प्रभु होता है, क्योंकि उसका कोई कार्य गैर-कानूनी नहीं होता। कानूनी दृष्टि से सम्प्रभु निरपेक्ष एवं असीमित होता है। उस पर प्राकृतिक कानून एवं प्राकृतिक अधिकार का कोई बन्धन नहीं हो सकता। लेकिन बेन्थम के अनुसार सम्प्रभु निरंकुश, अमर्यादित एवं अपरिमित नहीं हो सकता। बेन्थम के अनुसार व्यक्ति उसी सीमा तक सम्प्रभु की आज्ञा का पालन और कानून का आदर करते हैं, जिस सीमा तक वैसा करना उनके लिए लाभदायक और उपयोगी होता है। बेन्थम के मतानुसार शासक कानून बनाने का अधिकार तो रखता है लेकिन वह उसी सीमा तक कानून बना सकता है जहाँ तक व्यक्तियों के अधिकतम हित के लक्ष्य की प्राप्ति होती हो। यदि कानून व्यक्तियों के लिए लाभदायक व उपयोगी न हों तो जनता का यह कर्त्तव्य हो जाता है कि वह शासक व उसके द्वारा बनाए गए कानूनों का प्रतिरोध करे।

इस प्रकार हॉब्स की तरह बेन्थम भी कानून-निर्माण को सम्प्रभु का सर्वोच्च अधिकार मानता है लेकिन वह कार्यपालिका और न्यायपालिका सम्बन्धी अधिकारों को सम्प्रभु को नहीं सौंपता। वह शासक की असीमित शक्तियों के विरुद्ध है। उसके अनुसार शासक समस्त सामाजिक सत्ता का केन्द्र नहीं है। उसका सम्प्रभु तो कानून निर्माण के क्षेत्र में ही सर्वोच्च है, अन्य में नहीं।

प्राकृतिक अधिकारों सम्बन्धी धारणा 

बेन्थम ने प्राकृतिक अधिकारों की धारणा का खण्डन करते हुए प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त को मूर्खतापूर्ण, काल्पनिक, आधारहीन व आडम्बरपूर्ण बताया है। उसने कहा है- “प्राकृतिक अधिकार बकवास मात्र हैं - प्राकृतिक और हस्तान्तरणीय अधिकार आलंकारिक बकवास हैं - शब्दों के ऊपर भी बकवास है।” उसके मतानुसार प्रकृति एक अस्पष्ट शब्द हैं, इसलिए प्राकृतिक अधिकारों की धारणा भी निरर्थक है। उसके मतानुसार अधिकार प्राकृतिक न होकर कानूनी हैं जो सम्प्रभु की सर्वोच्च इच्छा का परिणाम हैं। उसके अनुसार पूर्ण स्वतन्त्रता पूर्ण रूप से असम्भव है, इसलिए अधिकार प्राकृतिक न होकर कानूनी हैं।

बेन्थम ने टामस पेन तथा गॉडविन जैसे प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त के समर्थक विचारकों का खण्डन करते हुए कहा कि प्राकृतिक अधिकार केवल एक प्रलाप और मूर्खता का नंगा नाच हैं। उसका मानना है कि प्राकृतिक अधिकारों का निर्माण केवल सामाजिक परिस्थितियों में होता है। वे अधिकारों का निर्माण केवल सामाजिक परिस्थितियों में होता है। वे अधिकार ही उचित हो सकते हैं जो ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ के लक्ष्य को प्राप्त कराने में सहायक हों। बेन्थम ने कहा है- “अधिकार मानव जीवन के सुखमय जीवन के वे नियम हैं जिन्हें राज्य के कानून मान्यता प्रदान करते हैं।”

अत: अधिकार प्रकृति-प्रदत्त न होकर समाज-प्रदत्त होते हैं। वे मनुष्य के सुख के लिए हैं जिन्हें राज्य मान्यता देता है और उनके अनुसार अपनी नीति बनाता है। राज्य ही अधिकारों का स्रोत है। नागरिक प्राकृतिक अधिकारों के लिए राज्य के विरुद्ध किसी प्रकार का दावा नहीं कर सकते, क्योंकि अधिकारों के साथ कुछ कर्त्तव्य भी बँधे हैं जिनके अभाव में अधिकार निष्प्राण व निरर्थक हैं।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि बेन्थम ने प्राकृतिक अधिकारों की धारणा को कोरी मूर्खता बताया है। उसके अनुसार अधिकार कानून की देन है और अच्छे कानून की परख ‘अधिकतम लोगों की अधिकतम सुख’ प्रदान करने के लक्ष्य को प्राप्त करने पर ही हो सकती है। इस तरह बेन्थम ने प्राकृतिक अधिकारों की धारणा का खण्डन करते हुए उन्हें काल्पनिक कहा है।

कानून सम्बन्धी विचार

बेन्थम का विचार है कि मनुष्य एक स्वाथ्र्ाी प्राणी होने के नाते सदैव अपने सुख की प्राप्ति में लगा रहने के कारण दूसरों के हितों के रास्ते में बाधा उत्पन्न कर सकता है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए कुछ बन्धनों का होना जरूरी है। इसलिए राज्य के पास कानून की शक्ति होती है जो परस्पर विरोधी हितों से उत्पन्न संघर्ष से अधिक कारगर ढंग से निपटने में सक्षम होती है। बेन्थम का मत है- “विभिन्न अनुशस्तियों के द्वारा व्यक्ति के हित और समुदाय के हितों के मध्य तालमेल बैठाया जाना चाहिए।” बेन्थम का मानना है कि इन अनुशस्तियों में सबसे अधिक कारगर अनुशस्ति कानून की होती है। राज्य मूलत: कानून का निर्माण करने वाला संगठन है और यह अपने व्यक्तियों पर कानून के द्वारा ही नियन्त्रण रखता है।

बेन्थम के मतानुसार- “कानून सम्प्रभु का आदेश है। कानून सम्प्रभुता की इच्छा का प्रकटीकरण है। समाज के व्यक्ति स्वाभाविक रूप से कानून की आज्ञा का पालन करते हैं। कानून न तो विवेक का और न ही किसी अलौकिक शक्ति की आज्ञा है। सामान्य रूप से यह उस सत्ता का आदेश है, जिसका पालन समाज के व्यक्ति अपनी आदत के कारण करते हैं।” कानून व्यक्ति की मनमानी पर अंकुश है। यह व्यक्ति व समुदाय के हितों में तालमेल बैठाने का साधन है जो अपना कार्य दण्ड व पुरस्कार के माध्यम से करता है। कानून का सम्बन्ध व्यक्ति के समस्त कार्यों से न होकर केवल उन्हीं कार्यों का नियमन करने से है जो व्यक्ति के अधिकतम सुख के लक्ष्य को प्राप्त कराने के लिए आवश्यक है।

बेन्थम का मानना है कि कानून इच्छा की अभिव्यक्ति है। ईश्वर और मनुष्य के पास तो इच्छा होती है लेकिन प्रकृति के पास कोई इच्छा नहीं होती। इसलिए दैवी कानून और मानवीय कानून तो हो सकते हैं, लेकिन प्राकृतिक कानून नहीं हो सकते। दैवी कानून भी अनिश्चित होता है। अत: मानवीय कानून ही सर्वोच्च कानून होता है जो समाज व व्यक्ति के सम्बन्धों का सही दिशा निर्देशन व नियमन कर पाने में सक्षम होता है।

कानून का उद्देश्य 

बेन्थम का मानना है कि कानून का उद्देश्य भी सामाजिक उपयेागिता है। कानून व्यक्ति के आचरण को अनुशासित करता है जिससे समाज में ‘अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख’ में वृद्धि होती है। बेन्थम के अनुसार कानून के चार उद्देश्य हैं - सुरक्षा, आजीविका, सम्पन्नता तथा समानता। बेन्थम का कहना है कि सार्वजनिक आज्ञा पालन ही कानून को स्थायित्व प्रदान करके उसे प्रभावी बनाता है और उसे अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख को प्राप्त करने में योगदान देता है। इसलिए कानून की भाषा स्पष्ट व सरल होनी चाहिए ताकि साधारण व्यक्ति भी उसका ज्ञान प्राप्त कर सके।

कानून के प्रकार 

बेन्थम ने कानून का वर्गीकरण करते हुए उसे चार भागों में बाँटा है :
  1. नागरिक कानून (Civil Law)
  2. फौजदारी कानून (Criminal Law)
  3. संवैधानिक कानून (Constitutional Law)
  4. अन्तरराष्ट्रीय कानून (International Law)
इस प्रकार बेन्थम ने कानून को सम्प्रभु का आदेश मानते हुए उसे व्यक्तियों के अधिकतम सुख प्राप्त करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक माना है। उसने मानवीय कानून को सर्वोच्च कानून माना है। अपने अन्य सभी सिद्धान्तों की तरह बेन्थम ने कानून को भी उपयोगितावादी आधार प्रदान किया है।

न्याय सम्बन्धी विचार 

अपने अन्य विचारा ें की ही तरह बेन्थम ने न्याय को भी उपयोगिता  के आधार पर परिभाषित किया है। बेन्थम का कहना है कि कानून पर आधारित होने के कारण न्याय का परिणाम उपयोगिता होना चाहिए। बेन्थम ने अपने न्याय सम्बन्धी विचारों में तत्कालीन इंगलैण्ड की न्याय व्यवस्था की कटु आलोचनाएँ की हैं। उसने कहा है कि मुकद्दमे में वादी और प्रतिवादी दोनों पक्षों के लिए न्याय प्राप्ति के मार्ग में दुर्गम बाधाएँ उपस्थित हो जाती हैं। उन्हें न्याय प्राप्त करने के लिए भारी फीसें वकीलों को देनी पड़ती हैं। साथ में ही समय अधिक लगता है। न्याय प्राप्त करने के लिए न्यायपालिका के कर्मचारियों को कदम कदम पर सुविधा शुल्क देने पड़ते हैं। इसलिए बेन्थम के तत्कालीन न्याय-व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- “इस देश में न्याय बेचा जाता है, बहुत महंगा बेचा जाता है और जो व्यक्ति इसके विक्रय मूल्य को नहीं चुका सकता है, न्याय पाने से वंचित रह जाता है।” बेन्थम न्यायधीशों को एक कम्पनी की संज्ञा देता है। यह कम्पनी अपने लाभ के लिए उन कानूनों का सहारा लेती है जिन्हें अपने लाभ के लिए न्यायधीशों ने बनाया है।

इस प्रकार बेन्थम ने तत्कालीन न्याय-व्यवस्था के दोषों पर भली-भान्ति विचार करके उन्हें अपने दर्शन में प्रस् किया है। उसके न्याय-सम्बन्धी विचार आज भी प्रासंगिक है। जैसे दोष उसने उस समय बताए थे, वे आज भी विद्यमान हैं।

बेन्थम : एक सुधारक के रूप में

अनेक लेखकों ने बेन्थम को एक राजनीतिक दार्शनिक की बजाए एक महान् सुधारवादी विचारक माना है। उसने तत्कालीन इंगलैण्ड की न्याय-व्यवस्था, जेलखानों, विधि, शासन-प्रणाली, शिक्षा-पद्धति, धार्मिक व्यवस्था आदि में जो सुधार किए, उन पर ही आगामी सुधारों की प्रक्रिया आश्रित हो गई। उनके सुधारवादी विचारों के सुझावों से ही सारे संसार में सुधारों की लहर चल पड़ी। सेबाइन ने कहा है- “सामाजिक दर्शन के इतिहास में ऐसे विचारक कम ही हुए हैं, जिन्होंने इतना व्यापक और इतना उपयोगी प्रभाव डाला हो, जितना बेन्थम ने।” इसी तरह मैक्सी ने कहा है- “यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि जिन सुधारों का बेन्थम में इतनी तत्परता और लाभ के साथ समर्थन किया था, उनमें से अनेक सुधार आज विभिन्न देशों में विधि का रूप पा चुके हैं।” बेन्थम के प्रमुख सुधारवादी विचार हैं :-

न्याय व्यवस्था में सुधार

बेन्थम ने तत्कालीन इंगलैण्ड की न्याय-व्यवस्था को दोषपूर्ण मानते हुए उसमें वांछित सुधारों का सुझाव दिया है। उसने महंगी व जटिल न्याय-व्यवस्था की कटु आलोचना की है। उसने तत्कालीन इंगलैण्ड की अदालतों की कार्य-विधि को आसान बनाने व उसकी कार्यक्षमता बढ़ाने के सुझाव दिए हैं। उसके प्रमुख सुझाव हैं -
  1. किसी मुकद्दमे का निर्णण एक ही न्यायधीश के द्वारा ही होना चाहिए, तीन या चार न्यायधीशों द्वारा नहीं। उसका मत है कि अधिक संख्या से उत्तरदायित्व में कमी आती है। पूर्ण उत्तरदायित्व की भावना केवल एक न्यायधीश में ही हो सकती है। अनेक न्यायधीशों में परस्पर मतभेद की सम्भावना होने के कारण न्याय निरपेक्ष नहीं रह जाता है। अत: पूर्ण न्याय की प्राप्ति के लिए न्यायधीशों की संख्या सीमित होनी चाहिए।
  2. प्रत्येक व्यक्ति को अपना वकील स्वयं बनना चाहिए ताकि वह मध्यस्थ की औपचारिक कार्यवाही से बच सके।
  3. न्याय-व्यवस्था में दक्षता, निपुणता और निष्पक्षता लाने के लिए यह आवश्यक है कि न्यायधीशों की नियुक्ति योग्यता, गुण और प्रशिक्षण के आधार पर होनी चाहिए, वंश या कुल के आधार पर नहीं। इससे न्याय-व्यवस्था में अज्ञान व पक्षपात को बढ़ावा मिलता है।
  4. मुकद्दमे का निर्णय कठोर नियमों के अनुसार न करके न्यायिक विवेक (Judicial Discretion) के अनुसार किया जाना चाहिए।
  5. न्याय-व्यवस्था सस्ती होनी चाहिए।
  6. न्याय शीघ्र मिलना चाहिए।
  7. न्यायिक प्रक्रिया में ज्यूरी पद्धति का प्रयोग करना चाहिए ताकि न्यायधीशों की निरंकुशता को रोका जा सके।
  8. न्याय-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए कानूनों की भाषा सरल व स्पष्ट होनी चाहिए।
  9. प्रत्येक न्यायालय का क्षेत्रधिकार अलग-अलग होना चाहिए ताकि अतिक्रमण को रोका जा सके।
  10. जनमत की अभिव्यक्ति के लिए न्याय-व्यवस्था में प्रेक्षक नियुक्त किए जाने चाहिएं।

जेल-व्यवस्था में सुधार 

बेन्थम के समय में जेलों में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था। उन्हें अन्धेरी कोठरियों व तहखानों में रखा जाता था। उन्हें गन्दा भोजन दिया जाता था। बालक और वयस्क अपराधियों को एक साथर रखा जाता था। जेल अपराधियों व अपराधों का अखाड़ा मात्र थे। जेल में जाने के बाद वहाँ से बाहर आने वाला प्रत्येक अपराधी भयानक व कुख्यात अपराधी की संज्ञा प्राप्त कर लेता था। इस व्यवस्था से दु:खी होकर बेन्थम ने इंगलैण्ड की जेल व्यवस्था मेंसुधारों का सुझाव दिया :-
  1. जेल में ही अपराधियों को औद्योगिक शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए ताकि वे बाहर आकर समाज की आमधारा से जुड़ जाएँ।
  2. उसने ‘गोलाकार कारावास’ (Panopticon) के निर्माण का सुझाव दिया ताकि उसमें रहकर कैदी ईमानदार और परिश्रमी बन सकें। उसने इस योजना के तहत अर्ध-चन्द्राकार इमारतें बनाने का सुझाव दिया ताकि जेल की अधिकारी अपने निवास स्थान से इन इमारतों पर नजर रख सके।
  3. अपराधियों को आत्मिक उत्थान हेतु नैतिक व धार्मिक शिक्षा भी दी जानी चाहिए ताकि वे जेल से बाहर जाने पर अच्छे नागरिक साबित हों।
  4. कारावास से मुक्त होने पर उनके लिए उस समय तक नौकरी देने की व्यवस्था की जाए जब तक वे समाज की अभिन्न धारा से न जुड़ जाएँ।
आगे चलकर जेलों में जो भी सुधार हुए उन पर बेन्थम का ही व्यापक प्रभाव पड़ा।

दण्ड-व्यवस्था में सुधार 

बेन्थम ने दण्ड-विधान के क्षेत्र में भी अपने उपयोगिता के सिद्धान्त को लागू करके उस समय में प्रचलित दण्ड-व्यवस्था के अनेक दोषों पर विचार किया है। उस समय छोटे-छोटे अपराधों के लिए अमानवीय व कठोर दण्ड दिया जाता था। बेन्थम ने महसूस किया कि छोटे से अपराध के लिए कठोर सजा देने से अपराधों में वृद्धि होती है। दण्ड का लक्ष्य समाज में अपराधों को रोकना होना चाहिए। इसलिए उसने दण्ड-व्यवस्था में कुछ सुधारों के उपाय सुझाए हैं।
  1. दण्ड समान भाव से देना चाहिए ताकि अपराधी को अनावश्यक पीड़ा उत्पन्न न हो। अर्थात् समान अपराध के लिए समान दण्ड का प्रावधान होना चाहिए।
  2. अपराधी को दण्ड अवश्य मिलना चाहिए। उसका मानना था कि दण्ड की निश्चितता अपराधों को रोकती है।
  3. दण्ड की पीड़ा अपराध की बुराई से थोड़ी ही अधिक होनी चाहिए ताकि अपराध की पुनरावृत्ति न हो।
  4. अपराधों का वर्गीकरण किया जाना चाहिए।
  5. दण्ड का उद्देश्य अपराधी को सुधारना होना चाहिए।
  6. दण्ड का स्वरूप अपराधी की आयु व लिंग के आधार पर निर्धारित होना चाहिए।
  7. दण्ड देने से पहले अपराधी की मानसिक स्थिति व अपराध के कारणों पर अच्छी तरह विचार करना चाहिए।
  8. कानून द्वारा दण्ड को कम करने या क्षमा करने की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए।
इस प्रकार बेन्थम ने अपने दण्ड विधान में सुधारों को प्रतिरोध सिद्धान्त (Deterrent Theory) तथा सुधारात्मक सिद्धान्त (Reformative Theory) के मिश्रण से तैयार किया है। उसके द्वारा सुझाए गए उपाय आज भी प्रासंगिक हैं। उसके सुझावों को आगे चलकर अनेक देशों ने स्वीकार किया है।

कानून-व्यवस्था में सुधार

बेन्थम ने अपने समय के कानून को अव्यावहारिक व अनुपयोगी मानते हुए उसकी आलोचना की है। उसने महसूस किया कि सभी कानून गरीबों को दबाने वाले हैं और अमीरों का पोषण करने वाले हैं। उसने तत्कालीन कानून-व्यवस्था में सुधारों के सुझाव दिए :-
  1. कानूनों का संहिताकरण (Codification) किया जाना चाहिए ताकि उनके मध्य क्रमबद्धता कायम की जा सके। इसके लिए कानूनों को विभिन्न श्रेणियों व वर्गों में बाँटा जाना चाहिए।
  2. सरकार को कानून की अनभिज्ञता को दूर करने के लिए अपने नागरिकों को अनिवार्य शिक्षा के माध्यम से प्रशिक्षित करना चाहिए। इसके लिए सरकार को सस्ते मूल्यों पर पुस्तकें जनता तक पहुँचानी चाहिएं।
  3. कानून की भाषा सरल व स्पष्ट होनी चाहिए ताकि आम व्यक्ति भी उसको समझ सके। कानून में प्रयुक्त होने वाले कठिन शब्दों का सरलीकरण किया जाना चाहिए।
  4. कानून जनता के हित को ध्यान में रखकर ही बनाए जाने चाहिएं।
इस प्रकार बेन्थम ने कानून को ऐसा बनाने का सुझाव दिया जिससे व्यक्तियों के सुखों में वृद्धि हो।

शासन व्यवस्था में सुधार 

बेन्थम ने सरकार या शासन का उद्देश्य अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख को प्रदान करना माना है। उसने सभी शासन-प्रणालियों में गणतन्त्रीय शासन-प्रणाली का ही समर्थन किया है। लेकिन उसने तत्कालीन ब्रिटिश -पद्धति को अपूर्ण मानकर उसमें कुछ सुधारों की योजना प्रस्तुत की है।
  1. उसने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का समर्थन किया है। उसने इसके लिए थोड़ा-बहुत पढ़ा-लिखा होना भी आवश्यक बताया है। उस समय संसद का सदस्य चुनने का अधिकार कम ही व्यक्तियों को प्राप्त था।
  2. उसने संसद के चुनाव प्रतिवर्ष समय पर कराने का सुझाव दिया है। इससे सदस्य क्रियाशील होंगे व निर्वाचकों को उनकी योग्यता परखने का अवसर प्राप्त होगा।
  3. उसने गुप्त मतदान प्रणाली का समर्थन किया है। इससे निष्पक्ष चुनावों को बढ़ावा मिलेगा।
  4. उसने संसद के उपरि सदन को समाप्त करने का भी सुझाव दिया है ताकि इसके अनावश्यक हस्तक्षेप का निम्न सदन पर दुष्प्रभाव न पड़ सके। 
उसने राजतन्त्र को समाप्त करके गणतन्त्रीय शासन प्रणाली अपनाने का सुझाव दिया है। उसका सोचना है कि गणतन्त्रीय शासन-प्रणाली ही लोकहित में कार्य करेगी। इससे जनता की स्वतन्त्रता सुरक्षित रहेगी। उसका गणतन्त्रीय व्यवस्था का समर्थन करना राजतन्त्र की आलोचना को दर्शाता है। उसके सुझावों को आज अनेक लोकतन्त्रीय देशों में अपनाया जा चुका है। आज इंगलैण्ड में उपरि सदन का महत्त्व गौण हो चुका है। इससे बेन्थम की राजनीतिक दूरदर्शिता का पता चलता है।

शिक्षा में सुधार

बेन्थम ने मनुष्य जाति के उत्थान के लिए शिक्षा को आवश्यक माना है। उसका मानना है कि शिक्षा व्यक्ति की कार्यक्षमता में वृद्धि करती है और आनन्द में भी वृद्धि करती है। इसलिए उसने तत्कालीन शिक्षा योजना को समाज के लिए अनुपयोगी बतलाया। उसने कहा कि यह शिक्षा-पद्धति अमीरों के एकाधिकार के रूप में उनके हितों का ही पोषण करती है। अत: इसे जनतान्त्रिक बनाने के लिए इसमें कुछ परिवर्तन करने जरूरी हैं। उसने शिक्षा में सुधार किए :-
  1. उसने मतदान के लिए पढ़ने की योग्यता को आवश्यक माना।
  2. उसे जेल में रहने वाले अपराधियों की औद्योगिक व नैतिक शिक्षा पर जोर दिया।
  3. उसने निर्धन वर्ग के छात्रों के लिए विषेष रूप से शिक्षा पर बल दिया। इसके लिए उसने अपने शिक्षा सम्बन्धी प्रस्ताव में दो प्रकार की शिक्षा-व्यवस्थाओं का सुझाव दिया। एक निर्धन वर्ग के लिए तथा दूसरी मध्यम तथा समृद्ध वर्ग के बच्चों के लिए।
  4. उसने शिक्षा में बौद्धिक विकास के विषयों के अध्ययन पर बल दिया।
  5. अपने छात्रों के लिए जीवन में उपयोगी तथा लाभदायक विषयों के अध्ययन पर जोर दिया।
  6. उसने छात्रों की नैसर्गिक क्षमता या स्वाभाविक रुचि के अनुसार ही शिक्षा प्रदान करने का समर्थन किया।
  7.  उसने उच्च वर्ग के लिए अलग शिक्षा पद्धति का सुझाव दिया। इसे 'Monitorial System' कहा जाता है।
बेन्थम के समय में सार्वजनिक शिक्षा के प्रति कोई रुचि नहीं थी। सत्तारूढ़ वर्ग को भय था कि यदि गरीब वर्ग शिक्षित हो गया तो वह उनकी सत्ता को चुनौती देकर उखाड़ फेंकेगा। इससे सरकारी खर्च में भी वृद्धि होगी। इसके बावजूद भी बेन्थम ने शिक्षा सुधारों की योजना प्रस् की जो आगे चलकर इंगलैण्ड की शिक्षा योजना का आधार बनी। अमेरिका, कनाडा तथा अन्य प्रगतिशील देशों ने भी बेन्थम के ही सुझावों को स्वीकार करके उसके महत्त्व को बढ़ाया है। अत: आधुनिक समय में शिक्षा-प्रणाली बेन्थम की बहुत ऋणी है। बेन्थम के शाश्वत महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता।

अन्य सुधार

बेन्थम ने उपर्युक्त सुधारों के अतिरिक्त भी सुधार प्रस् किए हैं। उसने अहस्तक्षेप की नीति का समर्थन किया है। उसने उपनिवेशों को आर्थिक हित के लाभदायक नहीं माना है। उसने स्वतन्त्र व्यापार नीति का समर्थन किया है। उसने धर्म के क्षेत्र में चर्च की कटु आलोचना की है। वह चर्च को एक ऐसी संस्था बनाने का सुझाव देता है जो मनुष्य मात्र का हित पूरा करने में सक्षम हो। उसने गरीबों की भलाई के लिए (Poor Law) बनाने का सुझाव दिया है। उसने स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में भी अपनी योजनाएँ प्रस्तुत की हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जिस पर बेन्थम ने अपने सुधारवादी विचार प्रस्तुत न किए हों। अत: बेन्थम को राजनीतिक दार्शनिक की अपेक्षा एक सुधारवादी विचारक मानना सर्वथा सही है।

बेन्थम का योगदान

अनेक अन्तर्विरोधों व सम्भ्रान्तियों के बावजूद बेन्थम राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में एक श्रेष्ठ विचारक के रूप में गिना जाता है। उसने उन्नीसवीं शताब्दी के घटनाचक्र को इंगलैंड तथा अन्य देशों में सुधारने के रूप में इतना अत्यधिक प्रभावित किया, उतना अन्य किसी विचारक ने नहीं किया। उसके सुधारों सम्बन्धी सुझाव सम्पूर्ण संसार के लिए उपयोगी सिद्ध हुए हैं उसकी रचनाओं का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया गया और उसने रूस, स्पेन, पुर्तगाल व दक्षिणी अमेरिका की राजनीतिक विचारधारा को भी प्रभावित किया। उसका राजनीतिक चिन्तन के विकास में योगदान है :-

राज्य व सरकार का कल्याणकारी लक्ष्य 

बेन्थम ने राज्य व सरकार का लक्ष्य अधिकतम लोगो को अधिकतम सुख प्रदान करना बताया है। बेन्थम ने कहा कि राज्य मनुष्य के लिए है न कि मनुष्य राज्य के लिए है। उसने कहा कि वही राज्य उत्तम हो सकता है जो अपने प्रजाजनों का अधिकतम हित चाहता हो। उसने राज्य व सरकार की सफलता की कसौटी व्यक्तियों को अधिक से अधिक सुख प्रदान करने को माना है। बेन्थम ने राज्य व सरकार को कल्याणकारी संस्थाएँ माना है। उसका कहना है कि राज्य व सरकार की उत्पत्ति मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ही होती है और इनका अस्तित्व इन आवश्यकताओं की पूर्ति पर ही निर्भर है। इसलिए उसने राज्य व सरकार को जनता की भलाई के लिए अधिकतम प्रयास कर अपने अस्तित्व को न्यायसंगत सिद्ध करने के लिए कहा है। उसका ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख’ का लक्ष्य आधुनिक राज्यों व सरकारों का भी लक्ष्य है। अत: यह बेन्थम की शाश्वत देन है।

न्याय-व्यवस्था में सुधार

बेन्थम ने ब्रिटिश न्याय प्रणाली की कटु आलोचना करते हुए न्यायिक सुधार के सुझाव दिए हैं। उसने कहा है कि न्याय अमीरों को ही मिलता है, गरीबों को नहीं। उसने गरीबों के लिए श्च्ववत स्ूंश् बनाने का सुझाव दिया। उसने न्यायिक कार्यवाहियों को सरल व सस्ता बनाने का जो सुझाव दिया, वह आज भी अनेक देशों की न्यायिक व्यवस्थाओं में अपनाया गया है। इंगलैण्ड की सरकार ने भी बेन्थम के सुझावों पर ही अपनी न्याय-प्रणाली का विकास किया है।

कानूनों का सुधार 

बेन्थम ने कानून के क्षेत्र में अविलम्ब तथा स्थायी प्रभाव डाला है। उसने कानून में सरलता, स्पष्टता व व्यावहारिकता लाने का जो सुझाव दिया था, वह ब्रिटिश सरकार द्वारा बाद में अपनाया गया। उसने कानूनों को नागरिक, फौजदारी तथा अन्तरराष्ट्रीय कानून के रूप में बाँटकर कानूनशास्त्र को एक नई दिशा दी। अमेरिका, रूस तथा अन्य देशों ने उसके संहिताकरण के आधार पर ही अपनी कानून व्यवस्था को ढालने का प्रयास किया है। उसके प्रयत्न से ही कानून के मौलिक सिद्धान्तों के चिन्तन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। भारत में भी उसके सुधारों का व्यापक प्रभाव पड़ा है।

दण्ड व्यवस्था में परिवर्तन 

बेन्थम ने दण्ड व्यवस्था में सुधार के अनेक उपायों को प्रस् किया है। उसने जेलों में सुधार के अनेक उपायों को प्रस् किया है। उसने जेलों में सुधार की जो योजना सुझाई थी, वह आज भी अनेक देशों में व्यावहारिक रूप ले चुकी है।

समानता का विचार 

बेन्थम ने कहा है कि “एक व्यक्ति को एक ही गिनना चाहिए।” इस विचार स े समानता के सिद्धान्त का जन्म होता है। प्रत्येक व्यक्ति चाहे अमीर हो या गरीब, कानून की दृष्टि में समान है। उसका समानता का विचार प्रतिनिधि लोकतन्त्र का आधार है।

लोकतन्त्र का संस्थापक 

बेन्थम ने गुप्त मतदान, प्रेस की आजादी, वयस्क मताधिकार, धर्मनिरपेक्षता आदि विचारों का समर्थन करके लोकतन्त्र को सुदृढ़ आधार प्रदान किया है। आधुनिक युग में भी सभी प्रजातान्त्रिक देशों में इनका वही महत्त्व है जो बेन्थम ने सुझाया था। अत: बेन्थम लोकतन्त्र के संस्थापक हैं।

अनुसंधान व गवेषणा की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन 

बेन्थम ने ही सर्वप्रथम इस बात पर बल दिया कि राज्य की नीति सोच-विचार करके ही निश्चित की जानी चाहिए। उसने ही गवेषणात्मक पद्धति को सर्वप्रथम राजनीतिशास्त्र में लागू किया। उसने दर्शनशास्त्र के अनुभववाद तथा आलोचनात्मक पद्धति को राजनीति, शासन और कानून के क्षेत्र में लागू करने का प्रयास किया। उसने कहा कि राज्य के सिद्धान्त, परम्परा व कल्पनावादी अन्त:करण पर आधारित नहीं हो सकते। ये अनुसन्धान व प्रमाण पर ही आधारित होने चाहिएं। इसी धारणा को आगे चलकर अनेक राजनीतिशास्त्र के विचारकों ने अपनाया है। इसलिए यह उसकी एक महत्त्वपूर्ण देन है।

उपयोगितावादी सिद्धान्त को दार्शनिक आधार प्रदान किया 

बेन्थम ने सर्वप्रथम दार्शनिक सम्प्रदाय की स्थापना करके उसे वैज्ञानिक रूप देने का प्रयास किया है। यद्यपि उसने अपने उपयोगितावाद के मूल सिद्धान्त प्रीस्टले व हचेसन जैसे विद्वानों से ग्रहण किए हैं लेकिन इनको व्यवस्थित रूप प्रदान करने का श्रेय बेन्थम को ही जाता है।

मध्यकालीन राजनीतिक विचारों का खण्डन 

बेन्थम ने सामाजिक समझौता सिद्धान्त का खण्डन किया और कहा कि राज्य किसी काल्पनिक समझौते का परिणाम नहीं है। उसने प्रजाजनों द्वारा स्वाभाविक रूप से आज्ञापालन को राज्य का आधार बताया है। उसने कहा कि मनुष्य राज्य की आज्ञा का पालन अपने लाभ के लिए करते हैं। इसी तरह उसने मध्ययुग में प्रचलित राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धान्त का भी खण्डन किया है। उसने अपने अनुभववाद पर आधारित विचारों द्वारा मध्ययुगीन अन्धकार व रहस्यवाद के जाल में फँसी राजनीतिक व्यवस्था को नई आशा की किरण दिखाई।

राजनीतिक स्थिरता का सिद्धान्त

बेन्थम ने तीव्र परिवर्तनों की अपेक्षा धीरे-धीरे होने वाले सुधारों से ब्रिटिश प्रणाली में स्थिरता का गुण पैदा करने के सुझाव दिए। उसने सुधारों को क्रान्तियों की तुलना में अधिक वांछनीय और स्पृहणीय बताया। उसके सुझावों को ब्रिटिश सरकार द्वारा बाद में मान लिया गया। इससे ब्रिटिश राजनीति में स्थिरता के युग का सूत्रपात हुआ।

व्यक्तिवाद का आरक्षक 

बेन्थम ने व्यक्ति को राज्य के सर्वसत्ताकारवादी पाश से मुक्त कराने का प्रयास किया है। उसने स्पष्ट कहा है कि राज्य व्यक्ति के लिए है, न कि व्यक्ति राज्य के लिए। उसने राज्य को मनुष्यों की उपयोगिता की कसौटी पर परखने का सुझाव देकर व्यक्तिवाद की आधारशिला मजबूत की हैं आधुनिक युग में अनेक सरकारें व्यक्ति की उपयोगितावादी धारणा के आधार पर ही कार्य कर रही हैं। व्यक्ति आधुनिक युग में राज्य के प्रत्येक कार्य का केन्द्र-बिन्दु है।
बेन्थम ने अप्रत्यक्ष रूप से समाजवाद के विकास में भी योगदान दिया है। उसने स्वतन्त्र व्यापार तथा अहस्तक्षेप के सिद्धान्त का समर्थन करके समाजवाद का ही पोषण किया है।

अत: निष्कर्ष तौर पर कहा जा सकता है कि बेन्थम का राजनीति-दर्शन के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसकी महत्त्वपूर्ण देनों को भुलाया नहीं जा सकता। उसके विचार शाश्वत सत्य के हैं जो आधुनिक युग में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

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