कार्ल मार्क्स का जीवन परिचय

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कार्ल मार्क्स का जन्म 8 मई, 1818 को जर्मनी के एक छोटे से नगर ट्रीवीज में हुआ। मार्क्स का प्रारम्भिक पालन-पोषण यहूदी संस्कारों के तहत हुआ। उसके पिता हरशेल मार्क्स एक वकील थे और उसकी मां हैनरीटा प्रेसबर्ग एक घरेलू कामकाजी महिला थी। 1824 में मार्क्स परिवार ने यहूदी धर्म के स्थान पर ईसाई धर्म अपना लिया। इस घटना ने बालक कार्ल मार्क्स के मानस पटल को इतना अत्यधिक प्रभावित कर दिया कि वह अपने सम्पूर्ण जीवन में यहूदियों का कटु-आलोचक बना रहा, इसी कारण उसने धर्म को अफीम कहा। मार्क्स बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि का स्वामी था, उसके मन में गरीब लोगों के लिए गहरा प्रेम था। उसकी प्रारम्भिक शिक्षा उदारवादी विचारक वैस्टफेलन के मार्ग-दर्शन में हुई। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए उसे 1835 में बॉन विश्वविद्यालय में भेजा गया लेकिन यहां पर उसने कानून की शिक्षा ग्रहण करने की बजाय इतिहास और दर्शन शास्त्र का अध्ययन शुरू हुआ। इसके एक वर्ष बाद ही मार्क्स ने बर्लिन विश्वविद्यालय में इतिहास व दर्शन पर ही अपना सम्पूर्ण ध्यान लगा दिया। यहां पर उसने हीगल के द्वन्द्ववादी चिन्तन का अध्ययन किया। 1841 में उसने जेना विश्वविद्यालय से ‘डेमोक्रिटस’ और एपिक्यूरस के प्राकृतिक दर्शन मे भेद (The Differences between the Natural Philosophy of Democritus and Epicurus) पर निबन्ध लिखकर अपनी डॉक्टरेट (Ph.D) की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उसने अध्यापक बनने का निश्चय किया। परन्तु उसके हमदर्द फ्यूरबेक और ब्रुनीब्यूर को सरकार विरोधी नीतियों के कारण जर्मनी से निष्कासित कर दिया तो उससे उसका अध्यापक बनने का स्वप्न चकनाचूर हो गया। इसके बाद उसने अक्तूबर, 1842 में अपनी आजीविका चलाने के लिए ‘रीनचे जीतूंग’ (Rheinisch Zaitung) पत्र में सम्पादक के तौर पर कार्य किया। यहां भी उसके क्रान्तिकारी विचारों (धर्म की आलोचना) के कारण इस पत्र पर सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया और वह बेकार होकर घूमने लगा। इस दौरान उसने फ्रांस, इंग्लैण्ड, जर्मनी तथा अमेरिका के इतिहास का मैकियावली, रुसो, सन्त साइमन, मॉण्टेस्कयू तथा फोरियर जैसे काल्पनिक समाजवादियों की रचनाओं का गहन अध्ययन किया और समाजवादी साहित्य के प्रति अपनी आस्था में वृद्धि की।

25 वर्ष की आयु में मार्क्स ने 1843 ई0 में मार्क्स का विवाह अपने प्रारम्भिक शिक्षक वैस्टफेलन की पुत्री जैनी वैस्टफेलन से हुआ। विवाह के बाद मार्क्स दंपति पेरिस चला गया और वहां पर मार्क्स ‘फ्रेंको जर्मन शब्दकोष’ का सम्पादक बन गया। अपने शासन और तत्कालीन व्यवस्था विरोधी विचारों के कारण उसे इस पत्र का प्रकाशन बन्द करना पड़ा। फ्रांस में उसका सम्पर्क प्रौंधा तथा बाकुनिन जैसे अराजकतावादियों से हुआ। उनके विचारों ने उसे अत्यधिक प्रभावित किया। 1845 ई0 में उसने फ्रांस की सरकार के आदेश पर देश छोड़कर जाना पड़ा। अब वह सीधा इंग्लैण्ड गया और आजीवन वहीं रहा, यहां पर उसकी भेंट प्रसिद्ध उद्योगपति फ्रेडारिक ऐंजिल्स से हुई। मार्क्स ने ऐंजिल्स के साथ ही मिलकर अपना समाजवादी चिन्तन खड़ा किया और फरवरी, 1848 में साम्यवादी लीग की स्थापना की। यहां पर उन्होंने साम्यवादी विचारों पर वक्तव्य प्रकाशित किये जो विश्व में ‘साम्यवादी घोषणा-पत्र‘ के नाम से प्रसिद्ध हुए। यहीं से वैज्ञानिक समाजवाद का जन्म हुआ।

ऐंजिल्स से आर्थिक सहायता प्राप्त करके मार्क्स ने निर्बाध रूप से अपने क्रान्तिकारी विचारों को अपनी रचनाओं में प्रस्तुत किया। उसने स्वयं एंजिल्स का ऋण स्वीकार करते हुए अपने समाजवादी चिन्तन को ‘हमारा सिद्धान्त’ की संज्ञा दी है। अपने इस सहयोगी के कारण ही मार्क्स दास कैपिटल (Das Capital) जैसे महान ग्रन्थों की रचना कर सका। अपने इस ग्रन्थ के सिद्धान्तों को व्यावहारिक रूप देने के लिए उसने 1864 में लन्दन में प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन (First International) में जर्मनी में मजदूर वर्ग का प्रतिनिधित्व किया। इसकेबाद मार्क्स ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘दास कैपिटल’ (Das Capital) के शेष भागों को पूरा करने के लिए अपनी लेखनी उठाई। लेकिन खराब स्वास्थ्य के कारण वे इसे पूरा नहीं कर सके और इस साम्यवादी सन्त की कैंसर के रोग के कारण 14 मार्च, 1883 को मृत्यु हो गई।

कार्ल मार्क्स की महत्वपूर्ण रचनाएं

मार्क्स ने अपने जीवनकाल में अनेक रचनाएं लिखीं, उनकी दो सबसे महत्वपूर्ण रचनाएं - समाजवादी घोषणापत्र (Communist Manifesto) तथा दास कैपिटल (Das Capital) हैं।

समाजवादी घोषणापत्र

यह रचना मार्क्स और एंजिल्स द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गई। यह रचना साम्यवादी दर्शन और क्रान्ति प्रक्रिया का मूलाधार है जिसमें सर्वहारा वर्ग की क्रान्ति की भविष्यवाणी की गई है। इस रचना में मार्क्स के सभी सिद्धान्तों-वर्ग संघर्ष, पूंजीवादी के विकास, औद्योगिक संकटों, मध् यम वर्ग के लोग, मजदूरों के संगठन, मजदूर पार्टियों के आविर्भाव, निर्धन वर्ग की बढ़ती गरीबी, पूंजीपतियों द्वारा अपनी कब्र स्वयं खोदना, साम्यवादियों के मजदूरों के साथ सम्बन्ध, स्वप्नलोकीय (Utopian) समाजवादी की निन्दा तथा तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों को बलपूर्वक बल देने की बात कही गई है। इसमें मजदूरों को संगठित होने के लिए प्रेरित करते हुए कहा गया है-’’दुनिया के मजदूरों, संगठित हो जाओ’’। इसमें यह भी कहा गया है कि शासक वर्ग को क्रान्ति के भय से कांपने दो। तुम्हारे पास दासता की बेड़ियों को खोने के सिवाय कुछ नहीं है। यह पुस्तक साम्यवाद की गीता के रूप में मानी जाती है। इसमें सर्वप्रथम सर्वहारा वर्ग के महत्व को प्रतिपादित किया गया हैं लास्की ने इस पुस्तक की तुलना अमेरिका के घोषणापत्र से की है। इस पुस्तक का प्रकाशन ऐसे समय में हुआ जब यूरोप के अनेक देशों में क्रान्तियों का बिगुल बज रहा था। इसलिए इस रचना को मार्क्स की महत्वपूर्ण रचना कहा जाता है।

दास कैपिटल 

यह पुस्तक मार्क्स की समस्त रचनाओं में अद्वितीय है। मार्क्सवाद की पूरी जानकारी का आधार यही पुस्तक है। मार्क्स ने यह पुस्तक अपने परम मित्र एंजिल्स के सहयोग से लिखनी शुरू की और इसका प्रथम खण्ड 1867 में जर्मन भाषा में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में कुल तीन खण्ड है। मार्क्स ने प्रथम खण्ड में पूंजीवाद का व्यापक विश्लेषण किया और उसके स्वरूप पर प्रकाश डाला। मार्क्स की मृत्यु होने के कारण इसके अन्तिम दो खण्ड एंजिल्स ने पूरे किए और मार्क्स को सच्ची श्रद्धांजलि दी गई, इस पुस्तक को साम्यवादी साहित्य का वेद माना जाता है। यह रचना समाजवादी साहित्य पर सर्वश्रेष्ठ प्रामाणिक ग्रन्थ, साम्यवादी सिद्धान्तों की आधारशिला, श्रमिकों का ग्रन्थ तथा धनिकों का दिमाग ठण्डा करने का नुस्खा है। इस पुस्तक की बराबरी मार्क्सवादी साहित्य में अन्य कोई रचना नहीं कर सकती।

इसके अतिरिक्त मार्क्स की अन्य रचनाएं The Poverty of Philosopy (1847), The Critique of Political Economy (1859), Inaugural Address to the International Working Men Association (1864), Value, Price and Profit (1865), The Civil War in France (1870 - 71), The Gotha Programme (1875), Class - Struggle in France (1848), The German Ideology, The Holy Family आदि हैं।

इनमें से ‘The Holy Family’ पुस्तक में इतिहास की आर्थिक व्याख्या की गई है। यह पुस्तक मार्क्स के साम्यवादी सिद्धान्तों का आधार व प्रारम्भ बिन्दु है।

मार्क्स के विचारों के प्रेरणा-स्त्रोत

मार्क्स का दर्शन इतना मौलिक नहीं है जितना दिखाई देता है। सच्चाई तो यह है कि उसने अपने समय की नब्ज को पहचान लिया था। उसने तत्कालीन विचारधाराओं से ग्रहण करने में जरा सा भी संकोच नहीं किया। इसलिए उसका दर्शन मौलिक नहीं कहा जा सकता। वह कई विचारधारकों से प्रभावित हुआ। इसलिए उसके विचारों का महत्व उसके विचारों की मौलिकता में न होकर उनकी गतिशील समग्रता में है। मार्क्स भली भांति जानते थे कि यदि उन्हें सफल होना है तो उन्हें वही भाषा बोलनी चाहिए जिसे लोग चाहते हैं। इसलिए उसने अनेक विचारधाराओं को समयानुसार गतिशीलता प्रदान करके उन्हें जन उपयोगी बनाया। ग्रे का कथन है-’’यह निर्विवाद सत्य है कि मार्क्स ने अपने चिन्तन के भवन के विभिन्न भागों के निर्माण हेतु विभिन्न स्रोत ों से प्रेरणा ग्रहण की। उसने उसका निर्माण करने के लिए बहुत से भट्टों से र्इंटें ली, लेकिन उनका प्रयोग अलग तरीके से किया।’’ सोरोकिन ने कहा है कि ‘‘मार्क्सवाद अनेक विचारधाराओं का ढेर है।’’ उसके सम्बन्ध में यह भी कहा जा सकता है कि ‘‘मार्क्स ने एक चतुर माली की तरह विभिन्न रंग-रूपों सम्बन्धी सुन्दर फूलों (विचारधाराओं) को एकत्रित करके उन्हें वैज्ञानिक समाजवाद रूपी उस माला (विचारधारा) में पिरो दिया जिसने सर्वहारा वर्ग के गले की शोभा बढ़ाई।’’ इस तरह मार्क्स के विचारों पर अनेक विचारधाराओं का व्यापक प्रभाव पड़ा।

फ्रांसीसी समाजवाद 

मार्क्स से पहले भी फ्रांस में समाजवादी विचारधारा का प्रतिपादन सेण्ट साइमन, चाल्र्स फोरियर, प्रौंधा आदि विचारकों द्वारा किया जा चुका था। इस समाजवाद का स्वरूप काल्पनिक होते हुए भी क्रान्तिकारी था, इसके क्रान्तिकारी चरित्र ने मार्क्स को सोचने के लिए विवश कर दिया, सेण्ट साईमन ने ऐतिहासिक प्रणाली के आधार पर यह बताया कि आर्थिक परिवर्तन राजनीतिक परिवर्तनों का ही परिणाम है। फोरियर ने भी इतिहास की आर्थिक व्याख्या पर बल दिया, लेकिन मार्क्स ने फ्रांसीसी समाजवादी केबेट के विचारों कि ‘‘साम्यवाद की स्थापना तभी संभव है जब सारे आवश्यक कार्यों पर राज्य का नियन्त्रण हो’’ का अत्यधिक प्रभाव पड़ा। इससे स्पष्ट है कि मार्क्स और एंजिल्स को 1847 में साम्यवादी लीग की स्थापना करते समय ‘समाजवाद’ के स्थान पर ‘साम्यवाद’ शब्द का ही प्रयोग किया। इससे उसने काल्पनिक समाजवाद शब्द का ही प्रयोग किया। इससे उसने काल्पनिक समाजवाद से अपने साम्यवाद को अलग दर्शाया। मार्क्स ने वर्ग संघर्ष (Class - struggle) का सिद्धान्त, उत्पादन के साधनों के स्वामित्व का सिद्धान्त, श्रमिकों का उत्थान और पूंजीपति वर्ग के विनाश का सिद्धान्त आदि के फ्रांसीसी समाजवाद से ग्रहण किया, उसने ‘‘वर्ग-विहिन समाज’’ की कल्पना को सेण्ट साइमन से ग्रहण किया। मार्क्स तथा एंजिल्स ने स्वयं फ्रांसीसी समाजवादी विचारकों के प्रभाव को स्वीकार करते हुए कहा है कि ‘‘उन्होंने मजदूरों के प्रबोधन के लिए जो अमूल्य सामग्री प्रदान की है, उसे भूलाया नहीं हो सकता।’’ फ्रांसीसी समाजवादियों के ‘अमीर-गरीब के संघर्ष’ की अवधारणा पर ही मार्क्स का पूंजीपति वर्ग व मजदूर वर्ग के आपसी संघर्ष (वर्ग-संघर्ष) का विचार टिका हुआ है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि मार्क्स का वैज्ञानिक समाजवाद फ्रांसीसी समाजवाद के ऊपर ही आधारित है।

हीगल एवं फ्यूअरबेक 

मार्क्स पर हीगल तथा फ्यूअरबेक जर्मन-दार्शनिकों का गहरा प्रभाव पड़ा है। उसने हीगल से गतिशीलता का सिद्धान्त ग्रहण करते हुए सीखा है कि इतिहास घटनाओं की श्रृंखला मात्र न होकर, विकास की एक क्रमिक प्रक्रिया है। इस बारे में मार्क्स ने हीगल की रचनाओं-‘Philosophy of Right’ तथा ‘Phenomenology of Mind’ से काफी कुछ ग्रहण किया है। उसने फ्यूअरबेक की रचना ‘Essence of Christianity’ से भी बहुत कुछ लिया है। मार्क्स ने हीगल की द्वन्द्वात्मक पद्धति को स्वीकार किया है। हीगल के अनुसार इस संसार में प्रत्येक वस्तु का विकास द्वन्द्वात्मक रूप में वाद (Thesis) प्रतिवाद (Anti - Thesis) तथा संवाद (Synthesis) की प्रक्रिया द्वारा होता है। हीगल का मानना है कि प्रत्येक वस्तु का होना ‘वाद’ है। ‘वाद’ में ही अन्तर्विरोध के कारण ‘प्रतिवाद’ छिपा रहता है। कालान्तर में ‘वाद’ प्रतिवाद बन जाता है और आगे चलकर वाद और प्रतिवाद दोनों के मेल से ‘संवाद’ का जन्म होता है। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। हीगल के अनुसार द्वन्द्ववादी निर्वचन आदर्शात्मक तथा विचारात्मक था। मार्क्स ने इस पद्धति को बदलकर विचारात्मक के स्थान पर भौतिकता का रूप दे दिया है। मार्क्स पदार्थ या आर्थिक शक्ति को द्वन्द्वात्मक विकास का आधार मानता है। मार्क्स ने फ्यूअरबेक के भौतिकवाद को हीगल के अमूर्त विचारवाद के साथ मिलाकर नई द्वन्द्वात्मक पद्धति को मूर्त रूप दिया है। मार्क्स ने अपने ग्रन्थ ‘Das Capital’ की भूमिका में लिखा है कि ‘‘मेरा द्वन्द्ववाद हीगल से न केवल भिन्न है बल्कि उससे ठीक उल्टा भी है।’’ सेबाइन ने कहा है कि ‘‘मार्क्स ने हीगल के द्वन्द्वात्मक चिन्तन जो शीर्षासन कर रहा था को पैरों के बल प्राकृतिक स्थिति में खड़ा किया है।’’ हीगल की द्वन्द्वात्मक पद्धति ही मार्क्स के दर्शन का आधार है। चाहे मार्क्स ने इसे किसी भी रूप में ग्रहण किया है, लेकिन हीगल का प्रभाव मार्क्स के दर्शन पर बहुत अधिक मात्रा में है। यद्यपि मार्क्स ने हीगल व फ्यूअरबेक का अन्धाधुन्ध अनुसरण न करके उपयोगी तत्वों को ही ग्रहण किया है। इस प्रकार परोक्ष रूप में मार्क्स ने हीगल से काफी कुछ ग्रहण किया। मार्क्स ने अपनी रचना ‘Das Capital’ में हीगल का परोक्ष प्रभाव स्वयं स्वीकार किया है।

ब्रिटिश राजनीतिक अर्थशास्त्र 

मार्क्स पर जिन अंग्रेज अर्थशास्त्रियों का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा वे हैं-एडमस्मिथ, रिकार्डो तथा हॉग्सकिन। इन अर्थशास्त्रियों ने ‘श्रम आधारित मूल्य सिद्धान्त’ तथा ‘अतिरिक्त मूल्य सिद्धान्त’ को प्रतिपादित करके पूंजीपतियों के हितों का पोषण किया था। मार्क्स ने इस सिद्धान्तों को अपना आधार बनाकर ‘‘अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त’’ (Theory of Surplus–Value) का निर्माण करके इसका प्रयोग श्रमिकों के हितों का पोषण करने के लिए किया। मार्क्स ने बताया कि अतिरिक्त पूंजी का प्रयोग पूंजीपति वर्ग श्रमिक वर्ग का शोषण करने के लिए करता है। यद्यपि इस पूंजी पर श्रमिकों का अधिकार बनता है। लेकिन पूंजीपति वर्ग अपने सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक प्रभाव के कारण श्रमिकों को उनके हक से वंचित करने में समर्थ होते हैं। इस प्रकार मार्क्स ने ब्रिटिश राजनीतिक अर्थशास्त्रियों के अतिरिक्त मूल्य सिद्धान्त को ज्यों का त्यों स्वीकार करके पूंजीपति वर्ग के स्थान पर केवल श्रमिक वर्ग के हितों की व्याख्या करने के लिए ही किया है। इसलिए ग्रे ने कहा है-’’सामान्य व्यक्ति के लिए मार्क्स का ‘अतिरिक्त मूल्य सिद्धान्त’ रिकार्डो के मूल्य सिद्धान्त के सिवाय कुछ नहीं है।’’ इस प्रकार कहा जा सकता है कि मार्क्स पर ब्रिटिश अर्थशास्त्रियों का भी व्यापक प्रभाव है। ब्रिटिश राजनीतिक अर्थशास्त्र मार्क्स के ‘अतिरिक्त मूल्य सिद्धान्त’ का प्रेरणा स्रोत है।

यूरोप में सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां 

मार्क्स के समय में यूरोप के समाज में पूंजीपति वर्ग (बुर्जआ वर्ग) सर्वहारा वर्ग का पूर्व शोषण कर रहा था। कारखानों पर बुर्जआ वर्ग का पूर्ण अधिकार था। यह वर्ग श्रमिक वर्ग (सर्वहारा वर्ग) के हितों की लगातार अनदेखी कर रहा था। उस युग में पैदा हुए समाजवादी चिन्तकों ने सर्वहारा वर्ग की दुर्दशा पर विचार किया और काफी कुछ लिखा। औद्योगिक क्रान्ति के दौरान पैदा हुए सर्वहारा वर्ग के बारे में सर्वप्रथम मार्क्स ने विस्तार से विचार किया। मार्क्स ने तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक विषमताओं को समाज के लिए घातक माना और पूंजीपति वर्ग के खिलाफ सर्वहारा वर्ग को संगठित करने का प्रयास किया, मार्क्स ने काल्पनिकि समाजवादियों के चक्रव्यूह को तोड़कर सर्वहारा वर्ग के हितों के लिए आवाज उठाई। उसने सर्वहारा वर्ग को क्रान्तिकारी दर्शन दिया। उसने अपनी पुस्तक ‘Communist Manifesto’ में मजदूर वर्ग को संगठित होने का आºवान किया ताकि वे पूंजीपति वर्ग के शोषण को समाप्त कर सकें। इस तरह मार्क्स ने तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से भी काफी कुछ सीखा और अपने दर्शन को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।

इस तरह कहा जा सकता है कि मार्क्स पर हीगल, फ्यूअरबेक, एडम स्मिथ, रिकार्डो, सेण्ट साइमन आदि के विचारों का काफी प्रभाव पड़ा। लेकिन मार्क्स ने उनकी मूल्यवान विचार सामग्री को ही ग्रहण किया और अनावश्यक व अनुपयोगी सामग्री का त्याग कर दिया। उसने प्रत्येक विचार को तार्किक आधार पर जांच-परख करके प्रयुक्त किया। उसने बिखरे हुए विचारों को तार्किक संगति (Logical Coherence) प्रदान की। इसलिए सोरोकिन का यह विचार सत्य है कि मार्क्सवाद अनेक विचारधाराओं का ढेर है। मार्क्स का साम्यवाद रूपी भवन अनेक विचारधाराओं रूपी र्इंटों का संग्रह है। उसके मार्क्सवाद का आधार अनेक विचारकों के मूल्यवान विचारों का समन्वय है। जो मार्क्स का महत्वपूर्ण प्रयास है। इसलिए मार्क्स का महत्व उसकी मौलिकता में नहीं, बल्कि उसकी संश्लेषणात्मकता में है। तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों ने इस संश्लेषणात्मकता को व्यापक आधार प्रदान किया है। ये परिस्थितियां ही मार्क्सवाद का प्रारम्भिक और अन्तिम बिन्दु है।

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